02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 41–50

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 41–50

पृष्ठ 41

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मनसो दुःखमूलं तु स्नेह इत्युपलभ्यते ।

स्नेहात् तु सज्जते जन्तुर्दुःखयोगमुपैति च ॥ २७ ॥

' मनके दुःखका मूल कारण क्या है? इसका पता लगानेपर ' स्नेह ' ( संसारमें आसक्ति) -की ही उपलब्धि होती है । इसी स्नेहके कारण ही जीव कहीं आसक्त होता और दुःख पाता है ॥ २७ ॥

स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहजानि भयानि च ।

शोकहर्षौ तथाऽऽयासः सर्वं स्नेहात् प्रवर्तते ॥ २८ ॥

स्नेहाद् भावोऽनुरागश्च प्रजज्ञे विषये तथा ।

अश्रेयस्कावुभावेतौ पूर्वस्तत्र गुरुः स्मृतः ॥ २९ ॥

'दुःखका मूल कारण है आसक्ति । आसक्तिसे ही भय होता है । शोक, हर्ष तथा क्लेश -इन सबकी प्राप्ति भी आसक्तिके कारण ही होती है । आसक्तिसे ही विषयोंमें भाव और अनुराग होते हैं । ये दोनों ही अमंगलकारी हैं। इनमें भी पहला अर्थात् विषयोंके प्रति भाव महान् अनर्थकारक माना गया है ॥ २८-२९ ॥

कोटराग्निर्यथाशेषं समूलं पादपं दहेत् ।

धर्मार्थौ तु तथाल्पोऽपि रागदोषो विनाशयेत् ॥ ३० ॥

‘ जैसे खोखलेमें लगी हुई आग सम्पूर्ण वृक्षको जड़ -मूलसहित जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार विषयोंके प्रति थोड़ी- सी भी आसक्ति धर्म और अर्थ दोनोंका नाश कर देती है ॥ ३० ॥

विप्रयोगे न तु त्यागी दोषदर्शी समागमे ।

विरागं भजते जन्तुर्निर्वैरो निरवग्रहः ॥ ३१ ॥

' विषयोंके प्राप्त न होनेपर जो उनका त्याग करता है, वह त्यागी नहीं है; अपितु जो विषयोंके प्राप्त होनेपर भी उनमें दोष देखकर उनका परित्याग करता है, वस्तुतः वही त्यागी है — वही वैराग्यको प्राप्त होता है । उसके मनमें किसीके प्रति द्वेषभाव न होनेके कारण वह निर्वैर तथा बन्धनमुक्त होता है ॥ ३१ ॥

तस्मात् स्नेहं न लिप्सेत मित्रेभ्यो धनसंचयात् ।

स्वशरीरसमुत्थं च ज्ञानेन विनिवर्तयेत् ॥ ३२ ॥

‘ इसलिये मित्रों तथा धनराशिको पाकर इनके प्रति स्नेह ( आसक्ति) न करे । अपने शरीरसे उत्पन्न हुई आसक्तिको ज्ञानसे निवृत्त करे ॥ ३२ ॥

ज्ञानान्वितेषु युक्तेषु शास्त्रज्ञेषु कृतात्मसु ।

न तेषु सज्जते स्नेहः पद्मपत्रेष्विवोदकम् ॥ ३३ ॥

'जो ज्ञानी, योगयुक्त, शास्त्रज्ञ तथा मनको वशमें रखनेवाले हैं, उनपर आसक्तिका प्रभाव उसी प्रकार नहीं पड़ता, जैसे कमलके पत्तेपर जल नहीं ठहरता ॥ ३३ ॥

रागाभिभूतः पुरुषः कामेन परिकृष्यते ।

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इच्छा संजायते तस्य ततस्तृष्णा विवर्धते ॥ ३४ ॥

तृष्णा हि सर्वपापिष्ठा नित्योद्वेगकरी स्मृता ।

अधर्मबहुला चैव घोरा पापानुबन्धिनी ॥ ३५ ॥

‘ रागके वशीभूत हुए पुरुषको काम अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है । फिर उसके मनमें कामभोगकी इच्छा जाग उठती है । तत्पश्चात् तृष्णा बढ़ने लगती है । तृष्णा सबसे बढ़कर पापिष्ठ ( पापमें प्रवृत्त करनेवाली ) तथा नित्य उद्वेग करनेवाली बतायी गयी है । उसके द्वारा

प्रायः अधर्म ही होता है । वह अत्यन्त भयंकर पापाबन्धनमें डालनेवाली है ॥ ३४-३५ ॥

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः ।

योऽसौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम् ॥ ३६ ॥

' खोटी बुद्धिवाले मनुष्योंके लिये जिसे त्यागना अत्यन्त कठिन है, जो शरीरके जरासे जीर्ण हो जानेपर भी स्वयं जीर्ण नहीं होती तथा जिसे प्राणनाशक रोग बताया गया है, उस तृष्णाको जो त्याग देता है, उसीको सुख मिलता है ॥ ३६ ॥

अनाद्यन्ता तु सा तृष्णा अन्तर्देहगता नृणाम् ।

विनाशयति भूतानि अयोनिज इवानलः ॥ ३७ ॥

‘ यह तृष्णा यद्यपि मनुष्योंके शरीरके भीतर ही रहती है, तो भी इसका कहीं आदि-अन्त नहीं है । लोहेके पिण्डकी आगके समान यह तृष्णा प्राणियोंका विनाश कर देती ॥ ३७ ॥

यथैधः स्वसमुत्थेन वह्निना नाशमृच्छति ।

तथाकृतात्मा लोभेन सहजेन विनश्यति ॥ ३८ ॥

‘ जैसे काष्ठ अपनेसे ही उत्पन्न हुई आगसे जलकर भस्म हो जाता है, उसी प्रकार जिसका मन वशमें नहीं है, वह मनुष्य अपने शरीरके साथ उत्पन्न हुए लोभके द्वारा स्वयं नष्ट हो जाता है ॥ ३८ ॥

राजतः सलिलादग्नेश्चोरतः स्वजनादपि ।

भयमर्थवतां नित्यं मृत्योः प्राणभृतामिव ॥ ३ ९ ॥

‘ धनवान् मनुष्योंको राजा, जल, अग्नि, चोर तथा स्वजनोंसे भी सदा उसी प्रकार भय बना रहता है, जैसे सब प्राणियोंको मृत्युसे ॥ ३ ९ ॥

यथा ह्यामिषमाकाशे पक्षिभिः श्वापदैर्भुवि ।

भक्ष्यते सलिले मत्स्यैस्तथा सर्वत्र वित्तवान् ॥ ४० ॥

‘ जैसे मांसके टुकड़ेको आकाशमें पक्षी, पृथ्वीपर हिंस्र जन्तु तथा जलमें मछलियाँ खा जाती हैं, उसी प्रकार धनवान् पुरुषको सब लोग सर्वत्र नोचते रहते हैं ॥ ४० ॥

अर्थ एव हि केषांचिदनर्थं भजते नृणाम् ।

अर्थश्रेयसि चासक्तो न श्रेयो विन्दते नरः ॥ ४१ ॥

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' कितने ही मनुष्योंके लिये अर्थ ही अनर्थका कारण बन जाता है; क्योंकि अर्थद्वारा सिद्ध होनेवाले श्रेय ( सांसारिक भोग) - में आसक्त मनुष्य वास्तविक कल्याणको नहीं प्राप्त होता ॥ ४१ ॥

तस्मादर्थागमाः सर्वे मनोमोहविवर्धनाः ।

कार्पण्यं दर्पमानौ च भयमुद्वेग एव च ॥ ४२ ॥

अर्थजानि विदुः प्राज्ञाः दुःखान्येतानि देहिनाम् ।

अर्थस्योत्पादने चैव पालने च तथा क्षये ॥ ४३ ॥

सहन्ति च महद् दुःखं घ्नन्ति चैवार्थकारणात् ।

अर्था दुःखं परित्यक्तुं पालिताश्चैव शत्रवः ॥ ४४ ॥

‘ इसलिये धन-प्राप्तिके सभी उपाय मनमें मोह बढ़ानेवाले हैं । कृपणता, घमण्ड, अभिमान, भय और उद्वेग इन्हें विद्वानोंने देहधारियोंके लिये धनजनित दुःख माना है । धनके उपार्जन, संरक्षण तथा व्ययमें मनुष्य महान् दुःख सहन करते हैं और धनके ही कारण एक-दूसरेको मार डालते हैं । धनको त्यागनेमें भी महान् दुःख होता है और यदि उसकी रक्षा की जाय तो वह शत्रुका -सा काम करता है * ॥ ४२–४४ ॥

दुःखेन चाधिगम्यन्ते तस्मान्नाशं न चिन्तयेत् ।

असंतोषपरा मूढाः संतोषं यान्ति पण्डिताः ॥ ४५ ॥

‘ धनकी प्राप्ति भी दुःखसे ही होती है । इसलिये उसका चिन्तन न करे; क्योंकि धनकी चिन्ता करना अपना नाश करना है । मूर्ख मनुष्य सदा असंतुष्ट रहते हैं और विद्वान् पुरुष संतुष्ट ॥ ४५ ॥

अन्तो नास्ति पिपासायाः संतोषः परमं सुखम् ।

तस्मात् संतोषमेवेह परं पश्यन्ति पण्डिताः ॥ ४६ ॥

' धनकी प्यास कभी बुझती नहीं है; अतः संतोष ही परम सुख है । इसीलिये ज्ञानीजन संतोषको ही सबसे उत्तम समझते हैं ॥ ४६ ॥

अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं रत्नसंचयः ।

ऐश्वर्यं प्रियसंवासो गृध्येत् तत्र न पण्डितः ॥ ४७ ॥

‘ यौवन, रूप, जीवन, रत्नोंका संग्रह, ऐश्वर्य तथा प्रियजनोंका एकत्र निवास — ये सभी अनित्य हैं; अतः विद्वान् पुरुष उनकी अभिलाषा न करे ॥ ४७ ॥

त्यजेत संचयांस्तस्मात्तज्जान् क्लेशान् सहेत च ।

न हि संचयवान् कश्चिद् दृश्यते निरुपद्रवः ।

अतश्च धार्मिकैः पुंभिरनीहार्थः प्रशस्यते ॥ ४८ ॥

‘ इसलिये धन - संग्रहका त्याग करे और उसके त्यागसे जो क्लेश हो, उसे धैर्यपूर्वक सह ले । जिनके पास धनका संग्रह है, ऐसा कोई भी मनुष्य उपद्रवरहित नहीं देखा जाता । अतः

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धर्मात्मा पुरुष उसी धनकी प्रशंसा करते हैं जो दैवेच्छासे न्यायपूर्वक स्वतः प्राप्त हो गया हो ॥ ४८ ॥

धर्मार्थं यस्य वित्तेहा वरं तस्य निरीहता ।

प्रक्षालनाद्धि पंकस्य श्रेयो न स्पर्शनं नृणाम् ॥ ४ ९ ॥

' जो धर्म करनेके लिये धनोपार्जनकी इच्छा करता है उसका धनकी इच्छा न करना ही अच्छा है । कीचड़ लगाकर धोनेकी अपेक्षा मनुष्योंके लिये उसका स्पर्श न करना ही श्रेष्ठ है ॥ ४ ९ ॥

युधिष्ठिरैवं सर्वेषु न स्पृहां कर्तुमर्हसि ।

धर्मेण यदि ते कार्यं विमुक्तेच्छो भवार्थतः ॥ ५० ॥

' युधिष्ठिर! इस प्रकार आपके लिये किसी भी वस्तुकी अभिलाषा करनी उचित नहीं है ।

यदि आपको धर्मसे ही प्रयोजन हो तो धनकी इच्छाका सर्वथा त्याग कर दें ' ॥ ५० ॥

युधिष्ठिर उवाच

नाथपभोगलिप्सार्थमियमर्थेप्सुता मम ।

भरणार्थं तु विप्राणां ब्रह्मन् काङ्क्षे न लोभतः ॥ ५१ ॥

युधिष्ठिरने कहा— ब्रह्मन्! मैं जो धन चाहता हूँ वह इसलिये नहीं कि मुझे धनसम्बधी भोग भोगनेकी इच्छा है । मैं तो ब्राह्मणोंके भरण- पोषणके लिये ही धनकी इच्छा रखता हूँ, लोभवश नहीं ॥ ५१ ॥

कथं ह्यस्मद्विधो ब्रह्मन् वर्तमानो गृहाश्रमे ।

भरणं पालनं चापि न कुर्यादनुयायिनाम् ॥ ५२ ॥

विप्रवर! गृहस्थ - आश्रममें रहनेवाला मेरे जैसा पुरुष अपने अनुयायियोंका भरण-पोषण भी न करे, यह कैसे उचित हो सकता है? ॥ ५२ ॥

संविभागो हि भूतानां सर्वेषामेव दृश्यते ।

तथैवापचमानेभ्यः प्रदेयं गृहमेधिना ॥ ५३ ॥

गृहस्थके भोजनमें देवता, पितर, मनुष्य एवं समस्त प्राणियोंका हिस्सा देखा जाता है । गृहस्थका यह धर्म है कि वह अपने हाथसे भोजन न बनानेवाले संन्यासी आदिको अवश्य पका - पकाया अन्न दे ॥ ५३ ॥

तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता ।

सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ ५४ ॥

आसनके लिये तृण ( कुश ), बैठनेके लिये स्थान, जल और चौथी मधुर वाणी, सत्पुरुषोंके घरमें इन चार वस्तुओंका अभाव कभी नहीं होता ॥ ५४ ॥

देयमार्तस्य शयनं स्थितश्रान्तस्य चासनम् ।

तृषितस्य च पानीयं क्षुधितस्य च भोजनम् ॥ ५५ ॥

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रोग आदिसे पीड़ित मनुष्यको सोनेके लिये शय्या, थके - माँदे हुएको बैठनेके लिये आसन, प्यासेको पानी और भूखेको भोजन तो देना ही चाहिये ॥ ५५ ॥

चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्यात् सुभाषिताम् ।

उत्थाय चासनं दद्यादेष धर्मः सनातनः ।

प्रत्युत्थायाभिगमनं कुर्यान्न्यायेन चार्चनम् ॥ ५६ ॥

जो अपने घरपर आ जाय, उसे प्रेमभरी दृष्टिसे देखे, मनसे उसके प्रति उत्तम भाव रखे, उससे मीठे वचन बोले और उठकर उसके लिये आसन दे । यह गृहस्थका सनातन धर्म है । अतिथिको आते देख उठकर उसकी अगवानी और यथोचित रीतिसे उसका आदर- सत्कार करे ॥ ५६ ॥

अग्निहोत्रमनड्वांश्च ज्ञातयोऽतिथिबान्धवाः ।

पुत्रा दाराश्च भृत्याश्च निर्दहेयुरपूजिताः ॥ ५७ ॥

यदि गृहस्थ मनुष्य अग्निहोत्र, साँड, जाति- भाई, अतिथि- अभ्यागत, बन्धु - बान्धव, स्त्री- पुत्र तथा भृत्यजनोंका आदर- सत्कार न करे तो वे अपनी क्रोधाग्निसे उसे जला सकते हैं ॥ ५७ ॥

आत्मार्थं पाचयेन्नान्नं न वृथा घातयेत् पशून् ।

न च तत् स्वयमश्नीयाद् विधिवद् यन्न निर्वपेत् ॥ ५८ ॥

केवल अपने लिये अन्न न पकावे ( देवता- पितरों एवं अतिथियोंके उद्देश्यसे ही भोजन बनानेका विधान है ), निकम्मे पशुओंकी भी हिंसा न करे और जिस वस्तुको विधिपूर्वक देवता आदिके लिये अर्पित न करे, उसे स्वयं भी न खाय ॥ ५८ ॥

श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वयोभ्यश्चावपेद् भुवि ।

वैश्वदेवं हि नामैतत् सायं प्रातश्च दीयते ॥ ५ ९ ॥

कुत्तों, चाण्डालों और कौवोंके लिये पृथ्वीपर अन्न डाल दे । यह वैश्वदेव नामक महान् यज्ञ है, जिसका अनुष्ठान प्रातःकाल और सायंकालमें भी किया जाता है ॥ ५ ९ ॥

विघसाशी भवेत् तस्मान्नित्यं चामृतभोजनः ।

विघसो भुक्तशेषं तु यज्ञशेषं तथामृतम् ॥ ६० ॥

अतः गृहस्थ मनुष्य प्रतिदिन विघस एवं अमृत भोजन करे । घरके सब लोगोंके भोजन कर लेनेपर जो अन्न शेष रह जाय उसे ' विघस' कहते हैं तथा बलि - वैश्वदेवसे बचे हुए अन्नका नाम ' अमृत ' है ॥ ६० ॥

चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद् वाचं दद्याच्च सूनृताम् ।

अनुव्रजेदुपासीत स यज्ञः पञ्चदक्षिणः ॥ ६१ ॥

अतिथिको नेत्र दे ( उसे प्रेमभरी दृष्टिसे देखे ), मन दे ( मनसे हित-चिन्तन करे ) तथा मधुर वाणी प्रदान करे ( सत्य, प्रिय, हितकी बात कहे ) । जब वह जाने लगे तब कुछ दूरतक

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उसके पीछे - पीछे जाय और जबतक वह घरपर रहे तबतक उसके पास बैठे ( उसकी सेवामें लगा रहे ) । यह पाँच प्रकारकी दक्षिणाओंसे युक्त अतिथि- यज्ञ है ॥ ६१ ॥

यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते ।

श्रान्तायादृष्टपूर्वाय तस्य पुण्यफलं महत् ॥ ६२ ॥

जो गृहस्थ अपरिचित थके - माँदै पथिकको प्रसन्नतापूर्वक भोजन देता है, उसे महान् पुण्यफलकी प्राप्ति होती है ॥ ६२ ॥

एवं यो वर्तते वृत्तिं वर्तमानो गृहाश्रमे ।

तस्य धर्मं परं प्राहुः कथं वा विप्र मन्यसे ॥ ६३ ॥

ब्रह्मन्! जो गृहस्थ इस वृत्तिसे रहता है, उसके लिये उत्तम धर्मकी प्राप्ति बतायी गयी है, अथवा इस विषयमें आपकी क्या सम्मति है? ॥ ६३ ॥

शौनक उवाच

अहो बत महत् कष्टं विपरीतमिदं जगत् ।

येनापत्रपते साधुरसाधुस्तेन तुष्यति ॥ ६४ ॥

शौनकजीने कहा — अहो! बहुत दुःखकी बात है, इस जगत् में विपरीत बातें दिखायी देती हैं । साधु पुरुष जिस कर्मसे लज्जित होते हैं, दुष्ट मनुष्योंको उसीसे प्रसन्नता प्राप्त होती है ॥ ६४ ॥

शिश्नोदरकृतेऽप्राज्ञः करोति विघसं बहु ।

मोहरागवशाक्रान्त इन्द्रियार्थवशानुगः ॥ ६५ ॥

अज्ञानी मनुष्य अपनी जननेन्द्रिय तथा उदरकी तृप्तिके लिये मोह एवं रागके वशीभूत हो विषयोंका अनुसरण करता हुआ नाना प्रकारकी विषय- सामग्रीको यज्ञावशेष मानकर उसका संग्रह करता है ॥ ६५ ॥

ह्रियते बुध्यमानोऽपि नरो हारिभिरिन्द्रियैः ।

विमूढसंज्ञो दुष्टाश्वैरुद्भ्रान्तैरिव सारथिः ॥ ६६ ॥

समझदार मनुष्य भी मनको हर लेनेवाली इन्द्रियोंद्वारा विषयोंकी ओर खींच लिया जाता है । उस समय उसकी विचारशक्ति मोहित हो जाती है । जैसे दुष्ट घोड़े वशमें न होनेपर सारथिको कुमार्गमें घसीट ले जाते हैं, यही दशा उस अजितेन्द्रिय पुरुषकी भी होती है ॥ ६६ ॥

षडिन्द्रियाणि विषयं समागच्छन्ति वै यदा ।

तदा प्रादुर्भवत्येषां पूर्वसंकल्पजं मनः ॥ ६७ ॥

जब मन और पाँचों इन्द्रियाँ अपने विषयोंमें प्रवृत्त होती हैं, उस समय प्राणियोंके पूर्वसंकल्पके अनुसार उसीकी वासनासे वासित मन विचलित हो उठता है ॥ ६७ ॥

मनो यस्येन्द्रियस्येह विषयान् याति सेवितुम् ।

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तस्यौत्सुक्यं सम्भवति प्रवृत्तिश्चोपजायते ॥ ६८ ॥

मन जिस इन्द्रियके विषयोंका सेवन करने जाता है, उसीमें उस विषयके प्रति उत्सुकता भर जाती है और वह इन्द्रिय उस विषयके उपभोगमें प्रवृत्त हो जाती है ॥ ६८ ॥

ततः संकल्पबीजेन कामेन विषयेषुभिः ।

विद्धः पतति लोभाग्नौ ज्योतिर्लोभात् पतङ्गवत् ॥ ६ ९ ॥

तदनन्तर संकल्प ही जिसका बीज है, उस कामके द्वारा विषयरूपी बाणोंसे बिंधकर मनुष्य ज्योतिके लोभसे पतंगकी भाँति लोभकी आगमें गिर पड़ता है ॥ ६ ९ ॥

ततो विहारैराहारैर्मोहितश्च यथेप्सया ।

महामोहे सुखे मग्नो नात्मानमवबुध्यते ॥ ७० ॥

इसके बाद इच्छानुसार आहार- विहारसे मोहित हो महामोहमय सुखमें निमग्न रहकर वह मनुष्य अपने आत्माके ज्ञानसे वंचित हो जाता है ॥ ७० ॥

एवं पतति संसारे तासु तास्विह योनिषु ।

अविद्याकर्मतृष्णाभिर्भ्राम्यमाणोऽथ चक्रवत् ॥ ७१ ॥

इस प्रकार अविद्या, कर्म और तृष्णाद्वारा चक्रकी भाँति भ्रमण करता हुआ मनुष्य संसारकी विभिन्न योनियोंमें गिरता है ॥ ७१ ॥

ब्रह्मादिषु तृणान्तेषु भूतेषु परिवर्तते ।

जले भुवि तथाऽऽकाशे जायमानः पुनः पुनः ॥ ७२ ॥

फिर तो ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सभी प्राणियोंमें तथा जल, भूमि और आकाशमें वह मनुष्य बारंबार जन्म लेकर चक्कर लगाता रहता है ॥ ७२ ॥

अबुधानां गतिस्त्वेषा बुधानामपि मे शृणु ।

ये धर्मे श्रेयसि रता विमोक्षरतयो जनाः ॥ ७३ ॥

यह अविवेकी पुरुषोंकी गति बतायी गयी है । अब आप मुझसे विवेकी पुरुषोंकी गतिका वर्णन सुनें । जो धर्म एवं कल्याणमार्गमें तत्पर हैं और मोक्षके विषयमें जिनका निरन्तर अनुराग है, वे विवेकी हैं ॥ ७३ ॥

तदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च ।

तस्माद् धर्मानिमान् सर्वान् नाभिमानात् समाचरेत् ॥ ७४ ॥

वेदकी यह आज्ञा है कि कर्म करो और कर्म छोड़ो; अतः आगे बताये जानेवाले इन सभी धर्मोंका अहंकारशून्य होकर अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ७४ ॥

इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा दमः ।

अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ॥ ७५ ॥

यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, मन और इन्द्रियोंका संयम तथा लोभका परित्याग — ये धर्मके आठ मार्ग हैं ॥ ७५ ॥

अत्र पूर्वश्चतुर्वर्गः पितृयाणपथे स्थितः ।

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कर्तव्यमिति यत् कार्यं नाभिमानात् समाचरेत् ॥ ७६ ॥

इनमें पहले बताये हुए चार धर्म पितृयानके मार्गमें स्थित हैं; अर्थात् इन चारोंका सकामभावसे अनुष्ठान करनेपर ये पितृयानमार्गसे ले जाते हैं । अग्निहोत्र और संध्योपासनादि जो अवश्य करनेयोग्य कर्म हैं, उन्हें कर्तव्य - बुद्धिसे ही अभिमान छोड़कर करे ॥ ७६ ॥

उत्तरो देवयानस्तु सद्भिराचरितः सदा ।

अष्टाङ्गेनैव मार्गेण विशुद्धात्मा समाचरेत् ॥ ७७ ॥

अन्तिम चार धर्मोंको देवयानमार्गका स्वरूप बताया गया है । साधु पुरुष सदा उसी मार्गका आश्रय लेते हैं । आगे बताये जानेवाले आठ अंगोंसे युक्त मार्गद्वारा अपने अन्तःकरणको शुद्ध करके कर्तव्य- कर्मोंका कर्तृत्वके अभिमानसे रहित होकर पालन करे ॥ ७७ ॥

सम्यक्संकल्पसंबन्धात् सम्यक् चेन्द्रियनिग्रहात् ।

सम्यग्व्रतविशेषाच्च सम्यक् च गुरुसेवनात् ॥ ७८ ॥

सम्यगाहारयोगाच्च सम्यक् चाध्ययनागमात् ।

सम्यक्कर्मोपसंन्यासात् सम्यक् चित्तनिरोधनात् ॥ ७ ९ ॥

पूर्णतया संकल्पोंको एक ध्येयमें लगा देनेसे, इन्द्रियोंको भली प्रकार वशमें कर लेनेसे, अहिंसादि व्रतोंका अच्छी प्रकार पालन करनेसे, भली प्रकार गुरुकी सेवा करनेसे, यथायोग्य योगसाधनोपयोगी आहार करनेसे, वेदादिका भली प्रकार अध्ययन करनेसे, कर्मोंको भलीभाँति भगवत्समर्पण करनेसे और चित्तका भली प्रकार निरोध करनेसे मनुष्य परम कल्याणको प्राप्त होता है ॥ ७८-७९ ॥

एवं कर्माणि कुर्वन्ति संसारविजिगीषवः ।

रागद्वेषविनिर्मुक्ता ऐश्वर्यं देवता गताः ॥ ८० ॥

संसारको जीतनेकी इच्छावाले बुद्धिमान् पुरुष इसी प्रकार राग--द्वेषसे मुक्त होकर कर्म करते हैं । इन्हीं नियमोंके पालनसे देवतालोग ऐश्वर्यको प्राप्त हुए हैं ॥ ८० ॥

रुद्राः साध्यास्तथाऽऽदित्या वसवोऽथ तथाश्विनौ ।

योगैश्वर्येण संयुक्ता धारयन्ति प्रजा इमाः ॥ ८१ ॥

रुद्र, साध्य, आदित्य, वसु तथा दोनों अश्विनीकुमार योगजनित ऐश्वर्यसे युक्त होकर इन प्रजाजनोंका धारण- पोषण करते हैं ॥ ८१ ॥

तथा त्वमपि कौन्तेय शममास्थाय पुष्कलम् ।

तपसा सिद्धिमन्विच्छ योगसिद्धिं च भारत ॥ ८२ ॥

कुन्तीनन्दन! इसी प्रकार आप भी मन और इन्द्रियोंको भलीभाँति वशमें करके तपस्याद्वारा सिद्धि तथा योगजनित ऐश्वर्य प्राप्त करनेकी चेष्टा कीजिये ॥ ८२ ॥

पितृमातृमयी सिद्धिः प्राप्ता कर्ममयी च ते ।

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तपसा सिद्धिमन्विच्छ द्विजानां भरणाय वै ॥ ८३ ॥

यज्ञ, युद्धादि कर्मोंसे प्राप्त होनेवाली सिद्धि पितृ- मातृमयी ( परलोक और इहलोकमें भी लाभ पहुँचानेवाली ) है, जो आपको प्राप्त हो चुकी है । अब तपस्याद्वारा वह योगसिद्धि प्राप्त करनेका प्रयत्न कीजिये जिससे ब्राह्मणोंका भरण - पोषण हो सके ॥ ८३ ॥

सिद्धा हि यद् यदिच्छन्ति कुर्वते तदनुग्रहात् ।

तस्मात्तपः समास्थाय कुरुष्वात्ममनोरथम् ॥ ८४ ॥

सिद्ध पुरुष जो - जो वस्तु चाहते हैं, उसे अपने तपके प्रभावसे प्राप्त कर लेते हैं । अतः आप तपस्याका आश्रय लेकर अपने मनोरथकी पूर्ति कीजिये ॥ ८४ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि पाण्डवानां प्रव्रजने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ || इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें पाण्डवोंका प्रव्रजन (वनगमन)- विषयक दूसरा अध्याय पूराहुआ ॥ २ ॥

* धनके लोभसे मनुष्य धनके रक्षककी हत्या कर डालते हैं ।

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तृतीयोऽध्यायः युधिष्ठिरके द्वारा अन्नके लिये भगवान् सूर्यकी उपासना और उनसे अक्षयपात्रकी प्राप्ति वैशम्पायन उवाच

शौनकेनैवमुक्तस्तु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।

पुरोहितमुपागम्य भ्रातृमध्येऽब्रवीदिदम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! शौनकके ऐसा कहनेपर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर अपने पुरोहितके पास आकर भाइयोंके बीचमें इस प्रकार बोले- ॥ १ ॥

प्रस्थितं मानुयान्तीमे ब्राह्मणा वेदपारगाः ।

न चास्मि पोषणे शक्तो बहुदुःखसमन्वितः ॥ २ ॥

‘ विप्रवर! ये वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण मेरे साथ वनमें चल रहे हैं । परंतु मैं इनका पालन - पोषण करनेमें असमर्थ हूँ, यह सोचकर मुझे बड़ा दुःख हो रहा है ॥ २ ॥

परित्यक्तुं न शक्तोऽस्मि दानशक्तिश्च नास्ति मे ।

कथमत्र मया कार्यं तद् ब्रूहि भगवन् मम ॥ ३ ॥

‘ भगवन्! मैं इन सबका त्याग नहीं कर सकता; परंतु इस समय मुझमें इन्हें अन्न देनेकी शक्ति नहीं है । ऐसी अवस्थामें मुझे क्या करना चाहिये? यह कृपा करके बताइये ' ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच

मुहूर्तमिव स ध्यात्वा धर्मेणान्विष्य तां गतिम् ।

युधिष्ठिरमुवाचेदं धौम्यो धर्मभृतां वरः ॥ ४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धौम्य मुनिने युधिष्ठिरका प्रश्न सुनकर दो घड़ीतक ध्यान - सा लगाया और धर्मपूर्वक उस उपायका अन्वेषण करनेके पश्चात् उनसे इस प्रकार कहा ॥ ४ ॥

धौम्य उवाच

पुरा सृष्टानि भूतानि पीड्यन्ते क्षुधया भृशम् ।

ततोऽनुकम्पया तेषां सविता स्वपिता यथा ॥ ५ ॥

गत्वोत्तरायणं तेजो रसानुद्धृत्य रश्मिभिः ।

दक्षिणायनमावृत्तो महीं निविशते रविः ॥ ६ ॥

धौम्य बोले— राजन्! सृष्टिके प्रारम्भकालमें जब सभी प्राणी भूखसे अत्यन्त व्याकुल हो रहे थे, तब भगवान् सूर्यने पिताकी भाँति उन सबपर दया करके उत्तरायणमें जाकर