श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 51–60

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 51–60

पृष्ठ 51

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अपनी किरणोंसे पृथ्वीका रस (जल ) खींचा और दक्षिणायनमें लौटकर पृथ्वीको उस रससे आविष्ट किया ॥ ५-६ ॥

क्षेत्रभूते ततस्तस्मिन्नोषधीरोषधीपतिः ।

दिवस्तेजः समुद्धृत्य जनयामास वारिणा ॥ ७ ॥

इस प्रकार जब सारे भूमण्डलमें क्षेत्र तैयार हो गया, तब ओषधियोंके स्वामी चन्द्रमाने अन्तरिक्षमें मेघोंके रूपमें परिणत हुए सूर्यके तेजको प्रकट करके उसके द्वारा बरसाये हुए जलसे अन्न आदि ओषधियोंको उत्पन्न किया ॥ ७ ॥

निषिक्तश्चन्द्रतेजोभिः स्वयोनौ निर्गते रविः ।

ओषध्यः षड्रसा मेध्यास्तदन्नं प्राणिनां भुवि ॥ ८ ॥

चन्द्रमाकी किरणोंसे अभिषिक्त हुआ सूर्य जब अपनी प्रकृतिमें स्थित हो जाता है, तब छः प्रकारके रसोंसे युक्त पवित्र ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं । वही पृथ्वीमें प्राणियोंके लिये अन्न होता है ॥ ८ ॥

एवं भानुमयं ह्यन्नं भूतानां प्राणधारणम् ।

पितैष सर्वभूतानां तस्मात् तं शरणं व्रज ॥ ९ ॥

इस प्रकार सभी जीवोंके प्राणोंकी रक्षा करनेवाला अन्न सूर्यरूप ही है । अतः भगवान् सूर्य ही समस्त प्राणियोंके पिता हैं, इसलिये तुम उन्हींकी शरणमें जाओ ॥ ९ ॥

राजानो हि महात्मानो योनिकर्मविशोधिताः ।

उद्धरन्ति प्रजाः सर्वास्तप आस्थाय पुष्कलम् ॥ १० ॥

जो जन्म और कर्म दोनों ही दृष्टियोंसे परम उज्ज्वल हैं, ऐसे महात्मा राजा भारी तपस्याका आश्रय लेकर सम्पूर्ण प्रजाजनोंका संकटसे उद्धार करते हैं ॥ १० ॥

भीमेन कार्तवीर्येण वैन्येन नहुषेण च ।

तपोयोगसमाधिस्थैरुद्धता ह्यापदः प्रजाः ॥ ११ ॥

भीम, कार्तवीर्य अर्जुन, वेनपुत्र पृथु तथा नहुष आदि नरेशोंने तपस्या, योग और समाधिमें स्थित होकर भारी आपत्तियोंसे प्रजाको उबारा है ॥ ११ ॥

तथा त्वमपि धर्मात्मन् कर्मणा च विशोधितः ।

तप आस्थाय धर्मेण द्विजातीन् भर भारत ॥ १२ ॥

धर्मात्मा भारत! इसी प्रकार तुम भी सत्कर्मसे शुद्ध होकर तपस्याका आश्रय ले धर्मानुसार द्विजातियोंका भरण- पोषण करो ॥ १२ ॥

जनमेजय उवाच

कथं कुरूणामृषभः स तु राजा युधिष्ठिरः ।

विप्रार्थमाराधितवान् सूर्यमद्भुतदर्शनम् ॥ १३ ॥

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जनमेजयने पूछा — भगवन्! पुरुषश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने ब्राह्मणोंके भरण- पोषणके लिये, जिनका दर्शन अत्यन्त अद्भुत है, उन भगवान् सूर्यकी आराधना किस प्रकार की? ॥ १३ ॥

वैशम्पायन उवाच

शृणुष्वावहितो राजन् शुचिर्भूत्वा समाहितः ।

क्षणं च कुरु राजेन्द्र सम्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ १४ ॥

वैशम्पायनजीने कहा— राजेन्द्र! मैं सब बातें बता रहा हूँ। तुम सावधान, पवित्र और एकाग्रचित्त होकर सुनो और धैर्य रखो ॥ १४ ॥

धौम्येन तु यथा पूर्वं पार्थाय सुमहात्मने ।

नामाष्टशतमाख्यातं तच्छृणुष्व महामते ॥ १५ ॥

महामते! धौम्यने जिस प्रकार महात्मा युधिष्ठिरको पहले भगवान् सूर्यके एक सौ आठ नाम बताये थे, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ १५ ॥

धौम्य उवाच

सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्कः सविता रविः ।

गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः ॥ १६ ॥

पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम् ।

सोमो बृहस्पतिः शूक्रो बुधोऽङ्गारक एव च ॥ १७ ॥

इन्द्रो विवस्वान् दीप्तांशुः शुचिः शौरिः शनैश्चरः ।

ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वै वरुणो यमः ॥ १८ ॥

वैद्युतो जाठरश्चाग्निरैन्धनस्तेजसां पतिः ।

धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः ॥ १९ ॥

कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिः सर्वमलाश्रयः ।

कला काष्ठा मुहूर्ताश्च क्षपा यामस्तथा क्षणः ॥ २० ॥

संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः ।

पुरुषः शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तः सनातनः ॥ २१ ॥

कालाध्यक्षः प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः ।

वरुणः सागरोंऽशुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा ॥ २२ ॥

भूताश्रयो भूतपतिः सर्वलोकनमस्कृतः ।

स्रष्टा संवर्तको वह्निः सर्वस्यादिरलोलुपः ॥ २३ ॥

अनन्तः कपिलो भानुः कामदः सर्वतोमुखः ।

जयो विशालो वरदः सर्वधातुनिषेचिता ॥ २४ ॥

मनःसुपर्णो भूतादिः शीघ्रगः प्राणधारकः ।

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धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवोऽदितेः सुतः ॥ २५ ॥

द्वादशात्मारविन्दाक्षः पिता माता पितामहः ।

स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम् ॥ २६ ॥

देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः ।

चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेयः करुणान्वितः ॥ २७ ॥

एतद् वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यामिततेजसः ।

नामाष्टशतकं चेदं प्रोक्तमेतत् स्वयंभुवा ॥ २८ ॥

धौम्य बोले —१ सूर्य, २ अर्यमा, ३ भग, ४ त्वष्टा, ५ पूषा, ६ अर्क, ७ सविता, ८ रवि, ९ गभस्तिमान्, १० अज, ११ काल, १२ मृत्यु, १३ धाता, १४ प्रभाकर, १५ पृथिवी, १६ आप, १७ तेज, १८ ख ( आकाश ), १ ९ वायु, २० परायण, २१ सोम, २२ बृहस्पति, २३ शुक्र, २४ बुध, २५ अंगारक ( मंगल) २६ इन्द्र, २७ विवस्वान्, २८ दीप्तांशु, २ ९ शुचि, ३० शौरि, ३१ शनैश्चर, ३२ ब्रह्मा, ३३ विष्णु, ३४ रुद्र, ३५ स्कन्द, ३६ वरुण, ३७ यम, ३८ वैद्युताग्नि, ३ ९ जाठराग्नि, ४० ऐन्धनाग्नि, ४१ तेजः पति, ४२ धर्मध्वज, ४३ वेदकर्ता, ४४ वेदांग, ४५ वेदवाहन, ४६ कृत, ४७ त्रेता, ४८ द्वापर, ४ ९ सर्वमलाश्रय कलि, ५० कला - काष्ठा-- मुहूर्तरूप समय, ५१ क्षपा ( रात्रि ), ५२ याम, ५३ क्षण, ५४ संवत्सरकर ५५ अश्वत्थ, ५६ कालचक्रप्रवर्तक विभावसु, ५७ शाश्वत पुरुष, ५८ योगी, ५ ९ व्यक्ताव्यक्त, ६० सनातन, ६१ कालाध्यक्ष, ६२ प्रजाध्यक्ष, ६३ विश्वकर्मा, ६४ तमोनुद, ६५ वरुण, ६६ सागर, ६७ अंशु, ६८ जीमूत, ६ ९ जीवन, ७० अरिहा, ७१ भूताश्रय, ७२ भूतपति, ७३ सर्वलोक- नमस्कृत, ७४ स्रष्टा, ७५ संवर्तक, ७६ वह्नि, ७७ सर्वादि, ७८ अलोलुप, ७ ९ अनन्त, ८० कपिल, ८१ भानु, ८२ कामद, ८३ सर्वतोमुख, ८४ जय, ८५ विशाल, ८६ वरद, ८७ सर्वधातुनिषेचिता, ८८ मनःसुपर्ण, ८ ९ - भूतादि, ९० शीघ्रग ९ १ प्राणधारक, ९ २ धन्वन्तरि ९ ३ धूमकेतु, ९ ४ आदिदेव, ९ ५ अदितिसुत, ९ ६ द्वादशात्मा, ९ ७ अरविन्दाक्ष, ९८ पिता- माता- पितामह, ९९ स्वर्गद्वार-प्रजाद्वार, १०० मोक्षद्वार- त्रिविष्टप, १०१ देहकर्ता, १०२ प्रशान्तात्मा, १०३ विश्वात्मा, १०४ विश्वतोमुख, १०५ चराचरात्मा, १०६ सूक्ष्मात्मा, १०७ मैत्रेय तथा १०८ करुणान्वित — ये अमिततेजस्वी भगवान् सूर्यके कीर्तन करनेयोग्य एक सौ आठ नाम हैं, जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्माजीने किया है ॥ १६–२८ ॥ सुरगणपितृयक्षसेवितं ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम् । वरकनकहुताशनप्रभं प्रणिपतितोऽस्मि हिताय भास्करम् ॥ २९ ॥

( इन नामोंका उच्चारण करके भगवान् सूर्यको इस प्रकार नमस्कार करना चाहिये । ) समस्त देवता, पितर और यक्ष जिनकी सेवा करते हैं, असुर, राक्षस तथा सिद्ध जिनकी

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वन्दना करते हैं तथा जो उत्तम सुवर्ण और अग्निके समान कान्तिमान् हैं, उन भगवान् भास्करको मैं अपने हितके लिये प्रणाम करता हूँ ॥ २ ९ ॥ सूर्योदये यः सुसमाहितः पठेत् स पुत्रदारान् धनरत्नसंचयान् । लभेत जातिस्मरतां नरः सदा धृतिं च मेधां च स विन्दते पुमान् ॥ ३० ॥

जो मनुष्य सूर्योदयके समय भलीभाँति एकाग्रचित्त हो इन नामोंका पाठ करता है वह स्त्री, पुत्र, धन, रत्नराशि, पूर्वजन्मकी स्मृति, धैर्य तथा उत्तम बुद्धि प्राप्त कर लेता है ॥ ३० ॥

इमं स्तवं देववरस्य यो नरः

प्रकीर्तयेच्छुचिसुमनाः समाहितः ।

विमुच्यते शोकदवाग्निसागरा- ल्लभेत कामान् मनसा यथेप्सितान् ॥ ३१ ॥

जो मानव स्नान आदि करके पवित्र, शुद्धचित्त एवं एकाग्र हो देवेश्वर ' भगवान्' सूर्यके इस नामात्मक स्तोत्रका कीर्तन करता है वह शोकरूपी दावानलसे युक्त दुस्तर संसारसागरसे मुक्त हो मनचाही वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है ॥ ३१ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु धौम्येन तत्कालसदृशं वचः ।

विप्रत्यागसमाधिस्थः संयतात्मा दृढव्रतः ॥ ३२ ॥

धर्मराजो विशुद्धात्मा तप आतिष्ठदुत्तमम् ।

पुष्पोपहारैर्बलिभिरर्चयित्वा दिवाकरम् ॥ ३३ ॥

सोऽवगाह्य जलं राजा देवस्याभिमुखोऽभवत् ।

योगमास्थाय धर्मात्मा वायुभक्षो जितेन्द्रियः ॥ ३४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! पुरोहित धौम्यके इस प्रकार समयोचित बात कहनेपर ब्राह्मणोंको देनेके लिये अन्नकी प्राप्तिके उद्देश्यसे नियममें स्थित हो मनको वशमें रखकर दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हुए शुद्धचेता धर्मराज युधिष्ठिरने उत्तम तपस्याका अनुष्ठान आरम्भ किया । राजा युधिष्ठिरने गंगाजीके जलमें स्नान करके पुष्प और नैवेद्य आदि उपहारोंद्वारा भगवान् दिवाकरकी पूजा की और उनके सम्मुख मुँह करके खड़े हो गये । धर्मात्मा पाण्डुकुमार चित्तको एकाग्र करके इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए केवल वायु पीकर रहने लगे ॥ ३२—३४ ॥

गाङ्गेयं वार्युपस्पृश्य प्राणायामेन तस्थिवान् ।

शुचिः प्रयतवाग् भूत्वा स्तोत्रमारब्धवांस्ततः ॥ ३५ ॥

पृष्ठ 55

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गंगाजलका आचमन करके पवित्र हो वाणीको वशमें रखकर तथा प्राणायामपूर्वक स्थित रहकर उन्होंने पूर्वोक्त अष्टोत्तरशतनामात्मक स्तोत्रका जप किया ॥ ३५ ॥

युधिष्ठिर उवाच

त्वं भानो जगतश्चक्षुस्त्वमात्मा सर्वदेहिनाम् ।

त्वं योनिः सर्वभूतानां त्वमाचारः क्रियावताम् ॥ ३६ ॥

युधिष्ठिर बोले - सूर्यदेव! आप सम्पूर्ण जगत्के नेत्र तथा समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं । आप ही सब जीवोंके उत्पत्तिस्थान और कर्मानुष्ठानमें लगे हुए पुरुषोंके सदाचार हैं ॥ ३६ ॥

त्वं गतिः सर्वसांख्यानां योगिनां त्वं परायणम् ।

अनावृतार्गलद्वारं त्वं गतिस्त्वं मुमुक्षताम् ॥ ३७ ॥

सम्पूर्ण सांख्ययोगियोंके प्राप्तव्य स्थान आप ही हैं । आप ही सब कर्मयोगियोंके आश्रय हैं । आप ही मोक्षके उन्मुक्त द्वार हैं और आप ही मुमुक्षुओंकी गति हैं ॥ ३७ ॥

त्वया संधार्यते लोकस्त्वया लोकः प्रकाश्यते ।

त्वया पवित्रीक्रियते निर्व्याजं पाल्यते त्वया ॥ ३८ ॥

आप ही सम्पूर्ण जगत्को धारण करते हैं । आपसे ही यह प्रकाशित होता है । आप ही इसे पवित्र करते हैं और आपके ही द्वारा निःस्वार्थभावसे इसका पालन किया जाता है ॥ ३८ ॥

त्वामुपस्थाय काले तु ब्राह्मणा वेदपारगाः ।

स्वशाखाविहितैर्मन्त्रैरर्चन्त्यृषिगणार्चितम् ॥ ३ ९ ॥

सूर्यदेव! आप ऋषिगणोंद्वारा पूजित हैं । वेदके तत्त्वज्ञ ब्राह्मणलोग अपनी- अपनी वेदशाखाओंमें वर्णित मन्त्रोंद्वारा उचित समयपर उपस्थान करके आपका पूजन किया करते हैं ॥ ३ ९ ॥

तव दिव्यं रथं यान्तमनुयान्ति वरार्थिनः ।

सिद्धचारणगन्धर्वा यक्षगुह्यकपन्नगाः ॥ ४० ॥

सिद्ध, चारण, गन्धर्व, यक्ष, गुह्यक और नाग आपसे वर पानेकी अभिलाषासे आपके गतिशील दिव्य रथके पीछे - पीछे चलते हैं ॥ ४० ॥

त्रयस्त्रिंशच्च वै देवास्तथा वैमानिका गणाः ।

सोपेन्द्राः समहेन्द्राश्च त्वामिष्ट्वा सिद्धिमागताः ॥ ४१ ॥

तैंतीस देवता एवं विमानचारी सिद्धगण भी उपेन्द्र तथा महेन्द्रसहित आपकी आराधना करके सिद्धिको प्राप्त हुए हैं ॥ ४१ ॥

उपयान्त्यर्चयित्वा तु त्वां वै प्राप्तमनोरथाः ।

दिव्यमन्दारमालाभिस्तूर्णं विद्याधरोत्तमाः ॥ ४२ ॥

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गुह्याः पितृगणाः सप्त ये दिव्या ये च मानुषाः ।

ते पूजयित्वा त्वामेव गच्छन्त्याशु प्रधानताम् ॥ ४३ ॥

वसवो मरुतो रुद्रा ये च साध्या मरीचिपाः ।

वालखिल्यादयः सिद्धाः श्रेष्ठत्वं प्राणिनां गताः ॥ ४४ ॥

श्रेष्ठ विद्याधरगण दिव्य मन्दार- कुसुमोंकी मालाओंसे आपकी पूजा करके सफलमनोरथ हो तुरंत आपके समीप पहुँच जाते हैं । गुह्यक, सात प्रकारके पितृगण तथा दिव्य मानव ( सनकादि ) आपकी ही पूजा करके श्रेष्ठ पदको प्राप्त करते हैं । वसुगण, मरुद्गण, रुद्र, साध्य तथा आपकी किरणोंका पान करनेवाले वालखिल्य आदि सिद्ध महर्षि आपकी ही आराधनासे सब प्राणियोंमें श्रेष्ठ हुए हैं ॥ ४२-४४ ॥

सब्रह्मकेषु लोकेषु सप्तस्वप्यखिलेषु च ।

न तद्भूतमहं मन्ये यदर्कादतिरिच्यते ॥ ४५ ॥

सन्ति चान्यानि सत्त्वानि वीर्यवन्ति महान्ति च ।

न तु तेषां तथा दीप्तिः प्रभावो वा यथा तव ॥ ४६ ॥

ज्योतींषि त्वयि सर्वाणि त्वं सर्वज्योतिषां पतिः ।

त्वयि सत्यं च सत्त्वं च सर्वे भावाश्च सात्त्विकाः ॥ ४७ ॥

त्वत्तेजसा कृतं चक्रं सुनाभं विश्वकर्मणा ।

देवारीणां मदो येन नाशितः शार्ङ्गधन्वना ॥ ४८ ॥

ब्रह्मलोकसहित ऊपरके सातों लोकोंमें तथा अन्य सब लोकोंमें भी ऐसा कोई प्राणी नहीं दीखता जो आप भगवान् सूर्यसे बढ़कर हो । भगवन्! जगत्में और भी बहुत - से महान् शक्तिशाली प्राणी हैं; परंतु उनकी कान्ति और प्रभाव आपके समान नहीं हैं । सम्पूर्ण ज्योतिर्मय पदार्थ आपके ही अन्तर्गत हैं । आप ही समस्त ज्योतियोंके स्वामी हैं । सत्य, सत्त्व तथा समस्त सात्त्विक भाव आपमें ही प्रतिष्ठित हैं । ' शार्ङ्ग' नामक धनुष धारण करनेवाले भगवान् विष्णुने जिसके द्वारा दैत्योंका घमंड चूर्ण किया है उस सुदर्शन चक्रको विश्वकर्माने आपके ही तेजसे बनाया है ॥ ४५–४८ ॥

त्वमादायांशुभिस्तेजो निदाघे सर्वदेहिनाम् ।

सर्वौषधिरसानां च पुनर्वर्षासु मुञ्चसि ॥ ४ ९ ॥

आप ग्रीष्म-ऋतुमें अपनी किरणोंसे समस्त देहधारियोंके तेज और सम्पूर्ण ओषधियोंके रसका सार खींचकर पुनः वर्षाकालमें उसे बरसा देते हैं ॥ ४ ९ ॥

तपन्त्यन्ये दहन्त्यन्ये गर्जन्त्यन्ये तथा घनाः ।

विद्योतन्ते प्रवर्षन्ति तव प्रावृषि रश्मयः ॥ ५० ॥

वर्षा -ऋतुमें आपकी कुछ किरणें तपती हैं, कुछ जलाती हैं, कुछ मेघ बनकर गरजती, बिजली बनकर चमकती तथा वर्षा भी करती हैं ॥ ५० ॥

न तथा सुखयत्यग्निर्न प्रावारा न कम्बलाः ।

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शीतवातार्दितं लोकं यथा तव मरीचयः ॥ ५१ ॥

शीतकालकी वायुसे पीड़ित जगत्को अग्नि, कम्बल और वस्त्र भी उतना सुख नहीं देते जितना आपकी किरणें देती हैं ॥ ५१ ॥

त्रयोदशद्वीपवतीं गोभिर्भासयसे महीम् ।

त्रयाणामपि लोकानां हितायैकः प्रवर्तसे ॥ ५२ ॥

आप अपनी किरणोंद्वारा तेरह * द्वीपोंसे युक्त सम्पूर्ण पृथ्वीको प्रकाशित करते हैं; और अकेले ही तीनों लोकोंके हितके लिये तत्पर रहते हैं ॥ ५२ ॥

तव यद्युदयो न स्यादन्धं जगदिदं भवेत् ।

न च धर्मार्थकामेषु प्रवर्तेरन् मनीषिणः ॥ ५३ ॥

यदि आपका उदय न हो तो यह सारा जगत् अंधा हो जाय और मनीषी पुरुष धर्म, अर्थ एवं कामसम्बन्धी कर्मोंमें प्रवृत्त ही न हों ॥ ५३ ॥

आधानपशुबन्धेष्टिमन्त्रयज्ञतपःक्रियाः ।

त्वत्प्रसादादवाप्यन्ते ब्रह्मक्षत्रविशां गणैः ॥ ५४ ॥

गर्भाधान या अग्निकी स्थापना, पशुओंको बाँधना, इष्टि ( पूजा ), मन्त्र, यज्ञानुष्ठान और तप आदि समस्त क्रियाएँ आपकी ही कृपासे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यगणों द्वारा सम्पन्न की जाती हैं ॥ ५४ ॥

यदहर्ब्रह्मणः प्रोक्तं सहस्रयुगसम्मितम् ।

तस्य त्वमादिरन्तश्च कालज्ञैः परिकीर्तितः ॥ ५५ ॥

ब्रह्माजीका जो एक सहस्र युगोंका दिन बताया गया है, कालमानके जाननेवाले विद्वानोंने उसका आदि और अन्त आपको ही बताया है ॥ ५५ ॥

मनूनां मनुपुत्राणां जगतोऽमानवस्य च ।

मन्वन्तराणां सर्वेषामीश्वराणां त्वमीश्वरः ॥ ५६ ॥

मनु और मनुपुत्रोंके, जगत्के, ( ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेवाले ) अमानव पुरुषके, समस्त मन्वन्तरोंके तथा ईश्वरोंके भी ईश्वर आप ही हैं ॥ ५६ ॥

संहारकाले सम्प्राप्ते तव क्रोधविनिःसृतः ।

संवर्तकाग्निस्त्रैलोक्यं भस्मीकृत्यावतिष्ठते ॥ ५७ ॥

प्रलयकाल आनेपर आपके ही क्रोधसे प्रकट हुई संवर्तक नामक अग्नि तीनों लोकोंको भस्म करके फिर आपमें ही स्थित हो जाती है ॥ ५७ ॥

त्वद्दीधितिसमुत्पन्ना नानावर्णा महाघनाः ।

सैरावताः साशनयः कुर्वन्त्याभूतसम्प्लवम् ॥ ५८ ॥

आपकी ही किरणोंसे उत्पन्न हुए रंग- बिरंगे ऐरावत आदि महामेघ और बिजलियाँ सम्पूर्ण भूतोंका संहार करती हैं ॥ ५८ ॥

कृत्वा द्वादशधाऽऽत्मानं द्वादशादित्यतां गतः ।

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संहृत्यैकार्णवं सर्वं त्वं शोषयसि रश्मिभिः ॥ ५ ९ ॥ फिर आप ही अपनेको बारह स्वरूपोंमें विभक्त करके बारह सूर्योंके रूपमें उदित हो अपनी किरणोंद्वारा त्रिलोकीका संहार करते हुए एकार्णवके समस्त जलको सोख लेते हैं ॥ ५ ९ ॥

त्वामिन्द्रमाहुस्त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः ।

त्वमग्निस्त्वं मनः सूक्ष्मं प्रभुस्त्वं ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ६० ॥

आपको ही इन्द्र कहते हैं । आप ही रुद्र, आप ही विष्णु और आप ही प्रजापति हैं ।

अग्नि, सूक्ष्म मन, प्रभु तथा सनातन ब्रह्म भी आप ही हैं ॥ ६० ॥

त्वं हंसः सविता भानुरंशुमाली वृषाकपिः ।

विवस्वान् मिहिरः पूषा मित्रो धर्मस्तथैव च ॥ ६१ ॥

सहस्ररश्मिरादित्यस्तपनस्त्वं गवाम्पतिः ।

मार्तण्डोऽर्को रविः सूर्यः शरण्यो दिनकृत् तथा ॥ ६२ ॥

दिवाकरः सप्तसप्तिर्धामकेशी विरोचनः ।

आशुगामी तमोघ्नश्च हरिताश्वश्च कीर्त्यसे ॥ ६३ ॥

आप ही हंस ( शुद्धस्वरूप), सविता ( जगत्की उत्पत्ति करनेवाले ), भानु (प्रकाशमान ), अंशुमाली ( किरणसमूहसे सुशोभित ), वृषाकपि ( धर्मरक्षक ), विवस्वान् ( सर्वव्यापी), मिहिर ( जलकी वृष्टि करनेवाले ), पूषा ( पोषक ), मित्र ( सबके सुहृद), धर्म ( धारण करनेवाले ), सहस्ररश्मि ( हजारों किरणोंवाले ), आदित्य (अदितिपुत्र ), तपन ( तापकारी ), गवाम्पति ( किरणोंके स्वामी ), मार्तण्ड, अर्क ( अर्चनीय ), रवि, सूर्य ( उत्पादक ), शरण्य ( शरणागतकी रक्षा करनेवाले ), दिनकृत् ( दिनके कर्ता), दिवाकर ( दिनको प्रकट करनेवाले ), सप्तसप्ति ( सात घोड़ोंवाले ), धामकेशी ( ज्योतिर्मय किरणोंवाले), विरोचन ( देदीप्यमान ), आशुगामी ( शीघ्रगामी ), तमोघ्न ( अन्धकारनाशक ) तथा हरिताश्व ( हरे रंगके घोड़ोंवाले ) कहे जाते हैं ॥ ६१–६३ ॥

सप्तम्यामथवा षष्ठ्यां भक्त्या पूजां करोति यः ।

अनिर्विण्णोऽनहंकारी तं लक्ष्मीर्भजते नरम् ॥ ६४ ॥

जो सप्तमी अथवा षष्ठीको खेद और अहंकारसे रहित हो भक्तिभावसे आपकी पूजा करता है, उस मनुष्यको लक्ष्मी प्राप्त होती है ॥ ६४ ॥

न तेषामापदः सन्ति नाधयो व्याधयस्तथा ।

ये तवानन्यमनसः कुर्वन्त्यर्चनवन्दनम् ॥ ६५ ॥

भगवन्! जो अनन्य चित्तसे आपकी अर्चना और वन्दना करते हैं, उनपर कभी आपत्ति नहीं आती । वे मानसिक चिन्ताओं तथा रोगोंसे भी ग्रस्त नहीं होते ॥ ६५ ॥

सर्वरोगैर्विरहिताः सर्वपापविवर्जिताः ।

त्वद्भावभक्ताः सुखिनो भवन्ति चिरजीविनः ॥ ६६ ॥

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जो प्रेमपूर्वक आपके प्रति भक्ति रखते हैं वे समस्त रोगों तथा सम्पूर्ण पापोंसे रहित हो चिरंजीवी एवं सुखी होते हैं ॥ ६६ ॥

त्वं ममापन्नकामस्य सर्वातिथ्यं चिकीर्षतः ।

अन्नमन्नपते दातुमभितः श्रद्धयार्हसि ॥ ६७ ॥

अन्नपते! मैं श्रद्धापूर्वक सबका आतिथ्य करनेकी इच्छासे अन्न प्राप्त करना चाहता हूँ । आप मुझे अन्न देनेकी कृपा करें ॥ ६७ ॥

ये च तेऽनुचराः सर्वे पादोपान्तं समाश्रिताः ।

माठरारुणदण्डाद्यास्तांस्तान् वन्देऽशनिक्षुभान् ॥ ६८ ॥

आपके चरणोंके निकट रहनेवाले जो माठर, अरुण तथा दण्ड आदि अनुचर ( गण ) हैं,

वे विद्युत्के प्रवर्तक हैं । मैं उन सबकी वन्दना करता हूँ ॥ ६८ ॥

क्षुभया सहिता मैत्री याश्चान्या भूतमातरः ।

ताश्च सर्वा नमस्यामि पान्तु मां शरणागतम् ॥ ६ ९ ॥

क्षुभाके साथ जो मैत्रीदेवी तथा गौरी, पद्मा आदि अन्य भूतमाताएँ हैं, उन सबको मैं नमस्कार करता हूँ । वे सभी मुझ शरणागतकी रक्षा करें ॥ ६ ९ ॥ वैशम्पायन उवाच एवं स्तुतो महाराज भास्करो लोकभावनः । ततो दिवाकरः प्रीतो दर्शयामास'पाण्डवम् 1 दीप्यमानः स्ववपुषा ज्वलन्निव हुताशनः ॥ ७० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज! जब युधिष्ठिरने लोकभावन भगवान् भास्करका इस प्रकार स्तवन किया, तब दिवाकरने प्रसन्न होकर उन पाण्डुकुमारको दर्शन दिया । उस समय उनके श्रीअंग प्रज्वलित अग्निके समान उद्भासित हो रहे थे ॥ ७० ॥

विवस्वानुवाच

यत् तेऽभिलषितं किंचित् तत् त्वं सर्वमवाप्स्यसि ।

अहमन्नं प्रदास्यामि सप्त पञ्च च ते समाः ॥ ७१ ॥

भगवान् सूर्य बोले — धर्मराज! तुम जो कुछ चाहते हो, वह सब तुम्हें प्राप्त होगा। मैं बारह वर्षोंतक तुम्हें अन्न प्रदान करूँगा ॥ ७१ ॥

पृष्ठ 60

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