02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 421–430
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 421–430
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राजन् पौरजनो द्वारि त्वां दिदृक्षुरवस्थितः ।
मन्त्रिभिः सहितः सर्वै राजभक्तिपुरस्कृतः ॥ १५ ॥
तं द्रष्टुमर्हसीत्येवं पुनः पुनरभाषत ।
तं तथा रुचिरापाङ्गीं विलपन्तीं तथाविधाम् ॥ १६ ॥
आविष्टः कलिना राजा नाभ्यभाषत किंचन ।
ततस्ते मन्त्रिणः सर्वे ते चैव पुरवासिनः ॥ १७ ॥
नायमस्तीति दुःखार्ता व्रीडिता जग्मुरालयान् ।
तथा तदभवद् द्यूतं पुष्करस्य नलस्य च ।
युधिष्ठिर बहून् मासान् पुण्यश्लोकस्त्वजीयत ॥ १८ ॥
‘ महाराज! पुरवासी प्रजा राजभक्तिपूर्वक आपसे मिलनेके लिये समस्त मन्त्रियोंके साथ द्वारपर खड़ी है । आप उन्हें दर्शन दें । ' दमयन्तीने इन वाक्योंको बार- बार दुहराया । मनोहर नयनप्रान्तवाली विदर्भ कुमारी इस प्रकार विलाप करती रह गयी, परंतु कलियुगसे आविष्ट हुए राजाने उससे कोई बाततक न की । तब वे सब मन्त्री और पुरवासी दुःखसे आतुर और लज्जित हो यह कहते हुए अपने - अपने घर चले गये कि ' यह राजा नल अब राज्यपर अधिक समयतक रहनेवाला नहीं है । ' युधिष्ठिर! पुष्कर और नलकी वह द्यूतक्रीडा
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कई महीनोंतक चलती रही । पुण्यश्लोक महाराज नल उसमें हारते ही जा रहे थे ॥ १५– १८ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलद्यूते एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलद्यूतविषयक उनसठवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ५ ९ ॥
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षष्टितमोऽध्यायः दुःखित दमयन्तीका वार्ष्णेयके द्वारा कुमार- कुमारीको कुण्डिनपुर भेजना बृहदश्वउवाच
दमयन्ती ततो दृष्ट्वा पुण्यश्लोकं नराधिपम् ।
उन्मत्तवदनुन्मत्ता देवने गतचेतसम् ॥ १ ॥
भयशोकसमाविष्टा राजन् भीमसुता ततः ।
चिन्तयामास तत् कार्यं सुमहत् पार्थिवं प्रति ॥ २ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं - राजन्! तदनन्तर दमयन्तीने देखा कि पुण्यश्लोक महाराज नल उन्मत्तकी भाँति द्यूतक्रीडामें आसक्त हैं। वह स्वयं सावधान थी । उनकी वैसी अवस्था देख भीमकुमारी भय और शोकसे व्याकुल हो गयी और महाराजके हितके लिये किसी महत्त्वपूर्ण कार्यका चिन्तन करने लगी ॥ १-२ ॥
सा शङ्कमाना तत् पापं चिकीर्षन्ती च तत्प्रियम् ।
नलं च हृतसर्वस्वमुपलभ्येदमब्रवीत् ॥ ३ ।
उसके मनमें यह आशंका हो गयी कि राजापर बहुत बड़ा कष्ट आनेवाला है । वह उनका प्रिय एवं हित करना चाहती थी । अतः महाराजके सर्वस्वका अपहरण होता जान धायको बुलाकर ( इस प्रकार बोली ) ॥ ३ ॥
बृहत्सेनामतियशां तां धात्रीं परिचारिकाम् ।
हितां सर्वार्थकुशलामनुरक्तां सुभाषिताम् ॥ ४ ॥
उसकी धायका नाम बृहत्सेना था । वह अत्यन्त यशस्विनी और परिचर्याके कार्यमें निपुण थी । समस्त कार्योंके साधनमें कुशल, हितैषिणी, अनुरागिणी और मधुरभाषिणी थी ॥ ४ ॥
बृहत्सेने व्रजामात्यानानाय्य नलशासनात् ।
आचक्ष्व यद्धृतं द्रव्यमवशिष्टं च यद् वसु ॥ ५ ॥
( दमयन्तीने उससे कहा)— ' बृहत्सेने! तुम मन्त्रियोंके पास जाओ तथा राजा नलकी आज्ञासे उन्हें बुला लाओ । फिर उन्हें यह बताओ कि अमुक- अमुक द्रव्य हारा जा चुका है और अमुक धन अभी अवशिष्ट है ' ॥ ५ ॥
ततस्ते मन्त्रिणः सर्वे विज्ञाय नलशासनम् ।
अपि नो भागधेयं स्यादित्युक्त्वा नलमाव्रजन् ॥ ६ ॥
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तब वे सब मन्त्री राजा नलका आदेश जानकर ' हमारा अहोभाग्य है ', ऐसा कहते हुए नलके पास आये ||
तास्तु सर्वाः प्रकृतयो द्वितीयं समुपस्थिताः ।
न्यवेदयद् भीमसुता न च तत् प्रत्यनन्दत ॥ ७ ॥
वे सारी ( मन्त्री आदि ) प्रकृतियाँ दूसरी बार राजद्वारपर उपस्थित हुईं । दमयन्तीने इसकी सूचना महाराज नलको दी, परन्तु उन्होंने इस बातका अभिनन्दन नहीं किया ॥ ७ ॥
वाक्यमप्रतिनन्दन्तं भर्तारमभिवीक्ष्य सा ।
दमयन्ती पुनर्वेश्म व्रीडिता प्रविवेश ह ॥ ८ ॥
निशम्य सततं चाक्षान् पुण्यश्लोकपराङ्मुखान् ।
नलं च हृतसर्वस्वं धात्रीं पुनरुवाच ह ॥ ९ ॥
बृहत्सेने पुनर्गच्छ वार्ष्णेयं नलशासनात् ।
सूतमानय कल्याणि महत् कार्यमुपस्थितम् ॥ १० ॥
पतिको अपनी बातका प्रसन्नतापूर्वक उत्तर देते न देख दमयन्ती लज्जित हो पुनः महलके भीतर चली गयी । वहाँ फिर उसने सुना कि सारे पासे लगातार पुण्यश्लोक राजा नलके विपरीत पड़ रहे हैं और उनका सर्वस्व अपहृत हो रहा है । तब उसने पुनः धायसे कहा
—' बृहत्सेने! फिर राजा नलकी आज्ञासे जाओ और वार्ष्णेय सूतको बुला लाओ ।
कल्याणि! एक बहुत बड़ा कार्य उपस्थित हुआ है ' ॥ ८–१० ॥
बृहत्सेना तु सा श्रुत्वा दमयन्त्याः प्रभाषितम् ।
वार्ष्णेयमानयामास पुरुषैराप्तकारिभिः ॥ ११ ॥
वार्ष्णेयं तु ततो भैमी सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया गिरा ।
उवाच देशकालज्ञा प्राप्तकालमनिन्दिता ॥ १२ ॥
बृहत्सेनाने दमयन्तीकी बात सुनकर विश्वसनीय पुरुषोंद्वारा वार्ष्णेयको बुलाया । तब अनिन्द्य स्वभाववाली और देश- कालको जाननेवाली भीमकुमारी दमयन्तीने वार्ष्णेयको मधुर वाणीमें सान्त्वना देते हुए यह समयोचित बात कही- ॥ ११-१२ ॥
जानीषे त्वं यथा राजा सम्यग् वृत्तः सदा त्वयि ।
तस्य त्वं विषमस्थस्य साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥ १३ ॥
' सूत! तुम जानते हो कि महाराज तुम्हारे प्रति कैसा अच्छा बर्ताव करते थे । आज वे विषम संकटमें पड़ गये हैं, अतः तुम्हें भी उनकी सहायता करनी चाहिये ॥ १३ ॥
यथा यथा हि नृपतिः पुष्करेणैव जीयते ।
तथा तथास्य वै द्यूते रागो भूयोऽभिवर्धते ॥ १४ ॥
‘ राजा जैसे - जैसे पुष्करसे पराजित हो रहे हैं, वैसे - ही- वैसे जूएमें उनकी आसक्ति बढ़ती जा रही है ॥
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यथा च पुष्करस्याक्षाः पतन्ति वशवर्तिनः ।
तथा विपर्ययश्चापि नलस्याक्षेषु दृश्यते ॥ १५ ॥
‘ जैसे पुष्करके पासे उसकी इच्छाके अनुसार पड़ रहे हैं, वैसे ही नलके पासे विपरीत पड़ते देखे जा रहे हैं ॥ १५ ॥
सुहृत्स्वजनवाक्यानि यथावन्न शृणोति च ।
ममापि च तथा वाक्यं नाभिनन्दति मोहितः ॥ १६ ॥
नूनं मन्ये न दोषोऽस्ति नैषधस्य महात्मनः ।
यत् तु मे वचनं राजा नाभिनन्दति मोहितः ॥ १७ ॥
‘ वे सुहृदों और स्वजनोंके वचन अच्छी तरह नहीं सुनते हैं । जूएने उन्हें ऐसा मोहित कर रखा है कि इस समय वे मेरी बातका भी आदर नहीं कर रहे हैं । मैं इसमें महामना नैषधका निश्चय ही कोई दोष नहीं मानती । जूएसे मोहित होनेके कारण ही राजा मेरी बातका अभिनन्दन नहीं कर रहे हैं ॥ १६-१७ ॥
शरणं त्वां प्रपन्नास्मि सारथे कुरु मद्वचः ।
न हि मे शुध्यते भावः कदाचित् विनशेदपि ॥ १८ ॥
‘ सारथे! मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ, मेरी बात मानो । मेरे मनमें अशुभ विचार आते हैं, इससे अनुमान होता है कि राजा नलका राज्यसे च्युत होना सम्भव है ॥ १८ ॥
नलस्य दयितानश्वान् योजयित्वा मनोजवान् ।
इदमारोप्य मिथुनं कुण्डिनं यातुमर्हसि ॥ १ ९ ॥
' तुम महाराजके प्रिय, मनके समान वेगशाली अश्वोंको रथमें जोतकर उसपर इन दोनों बच्चोंको बिठा लो और कुण्डिनपुरको चले जाओ ' ॥ १ ९ ॥
मम ज्ञातिषु निक्षिप्य दारकौ स्यन्दनं तथा ।
अश्वांश्चेमान् यथाकामं वस वान्यत्र गच्छ वा ॥ २० ॥
‘ वहाँ इन दोनों बालकोंको, इस रथको और इन घोड़ोंको भी मेरे भाई- बन्धुओंकी देख-रेखमें सौंपकर तुम्हारी इच्छा हो तो वहीं रह जाना या अन्यत्र कहीं चले जाना ' ॥ २० ॥
दमयन्त्यास्तु तद् वाक्यं वार्ष्णेयो नलसारथिः ।
न्यवेदयदशेषेण नलामात्येषु मुख्यशः ॥ २१ ॥
दमयन्तीकी यह बात सुनकर नलके सारथि वार्ष्णेयने नलके मुख्य- मुख्य मन्त्रियोंसे यह सारा वृत्तान्त निवेदित किया ॥ २१ ॥
तैः समेत्य विनिश्चित्य सोऽनुज्ञातो महीपते ।
ययौ मिथुनमारोप्य विदर्भांस्तेन वाहिना ॥ २२ ॥
राजन्! उनसे मिलकर इस विषयपर भलीभाँति विचार करके उन मन्त्रियोंकी आज्ञा ले सारथि वार्ष्णेयने दोनों बालकोंको रथपर बैठाकर विदर्भ देशको प्रस्थान किया ॥ २२ ॥
हयांस्तत्र विनिक्षिप्य सूतो रथवरं च तम् ।
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इन्द्रसेनां च तां कन्यामिन्द्रसेनं च बालकम् ॥ २३ ॥
आमन्त्र्य भीमं राजानमार्तः शोचन् नलं नृपम् ।
अटमानस्ततोऽयोध्यां जगाम नगरीं तदा ॥ २४ ॥
वहाँ पहुँचकर उसने घोड़ोंको, उस श्रेष्ठ रथ को तथा उस बालिका इन्द्रसेनाको एवं राजकुमार इन्द्रसेनको वहीं रख दिया तथा राजा भीमसे विदा ले आर्तभावसे राजा नलकी दुर्दशाके लिये शोक करता हुआ घूमता- घामता अयोध्या नगरीमें चला गया ॥ २३-२४ ॥
ऋतुपर्णं स राजानमुपतस्थे सुदुःखितः ।
भृतिं चोपययौ तस्य सारथ्येन महीपते ॥ २५ ॥
युधिष्ठिर! वह अत्यन्त दुःखी हो राजा ऋतुपर्णकी सेवामें उपस्थित हुआ और उनका सारथि बनकर जीविका चलाने लगा ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि कुण्डिनं प्रति कुमारयोः प्रस्थापने षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलकी कन्या और पुत्रको कुण्डिनपुर भेजनेसे सम्बन्ध रखनेवाला साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६० ॥
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एकषष्टितमोऽध्यायः नलका जूएमें हारकर दमयन्तीके साथ वनको जाना और पक्षियोंद्वारा आपद्ग्रस्त नलके वस्त्रका अपहरण बृहदश्वउवाच
ततस्तु याते वार्ष्णेये पुण्यश्लोकस्य दीव्यतः ।
पुष्करेण हृतं राज्यं यच्चान्यद् वसु किंचन ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर वार्ष्णेयके चले जानेपर जूआ खेलनेवाले पुण्यश्लोक महाराज नलके सारे राज्य और जो कुछ धन था, उन सबका जूएमें पुष्करने अपहरण कर लिया ॥ १ ॥
हृतराज्यं नलं राजन् प्रहसन् पुष्करोऽब्रवीत् ।
द्यूतं प्रवर्ततां भूयः प्रतिपाणोऽस्ति कस्तव ॥ २ ॥
राजन्! राज्य हार जानेपर नलसे पुष्करने हँसते हुए कहा कि ' क्या फिर जूआ आरम्भ हो? अब तुम्हारे पास दाँवपर लगानेके लिये क्या है? ' ॥ २ ॥
शिष्टा ते दमयन्त्येका सर्वमन्यज्जितं मया ।
दमयन्त्याः पणः साधु वर्ततां यदि मन्यसे ॥ ३ ॥
' तुम्हारे पास केवल दमयन्ती शेष रह गयी है और सब वस्तुएँ तो मैंने जीत ली हैं, यदि तुम्हारी राय हो तो दमयन्तीको दाँवपर रखकर एक बार फिर जूआ खेला जाय' ॥ ३ ॥
पुष्करेणैवमुक्तस्य पुण्यश्लोकस्य मन्युना ।
व्यदीर्यतेव हृदयं न चैनं किंचिदब्रवीत् ॥ ४ ॥
पुष्करके ऐसा कहनेपर पुण्यश्लोक महाराज नलका हृदय शोकसे विदीर्ण- सा हो गया, परंतु उन्होंने उससे कुछ कहा नहीं ॥ ४ ॥
ततः पुष्करमालोक्य नलः परममन्युमान् ।
उत्सृज्य सर्वगात्रेभ्यो भूषणानि महायशाः ॥ ५ ॥
एकवासा ह्यसंवीतः सुहृच्छोकविवर्धनः ।
निश्चक्राम ततो राजा त्यक्त्वा सुविपुलां श्रियम् ॥ ६ ॥
तदनन्तर महायशस्वी नलने अत्यन्त दुःखित हो पुष्करकी ओर देखकर अपने सब अंगोंके आभूषण उतार दिये और केवल एक अधोवस्त्र धारण करके चादर ओढ़े बिना ही अपनी विशाल सम्पत्तिको त्यागकर सुहृदोंका शोक बढ़ाते हुए वे राजभवनसे निकल पड़े ॥ ५-६ ॥ दमयन्त्येकवस्त्राथ गच्छन्तं पृष्ठतोऽन्वगात् ।
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स तया बाह्यतः सार्धं त्रिरात्रं नैषधोऽवसत् ॥ ७ ॥
दमयन्तीके शरीरपर भी एक ही वस्त्र था । वह जाते हुए राजा नलके पीछे हो ली । वे उसके साथ नगरसे बाहर तीन राततक टिके रहे ॥ ७ ॥
पुष्करस्तु महाराज घोषयामास वै पुरे ।
नले यः सम्यगातिष्ठेत् स गच्छेद् वध्यतां मम ॥ ८ ॥
महाराज! पुष्करने उस नगरमें यह घोषणा करा दी-डुग्गी पिटवा दी कि ' जो नलके साथ अच्छा बर्ताव करेगा, वह मेरा वध्य होगा' ॥ ८ ॥
पुष्करस्य तु वाक्येन तस्य विद्वेषणेन च ।
पौरा न तस्य सत्कारं कृतवन्तो युधिष्ठिर ॥ ९ ॥
युधिष्ठिर! पुष्करके उस वचनसे और नलके प्रति पुष्करका द्वेष होनेसे पुरवासियोंने राजा नलका कोई सत्कार नहीं किया ॥ ९ ॥
स तथा नगराभ्याशे सत्कारार्हो न सस्कृतः ।
त्रिरात्रमुषितो राजा जलमात्रेण वर्तयन् ॥ १० ॥
इस प्रकार राजा नल अपने नगरके समीप तीन राततक केवल जलमात्रका आहार करके टिके रहे । वे सर्वथा सत्कारके योग्य थे तो भी उनका सत्कार नहीं किया गया ॥ १० ॥
पीड्यमानः क्षुधा तत्र फलमूलानि कर्षयन् ।
प्रातिष्ठत ततो राजा दमयन्ती तमन्वगात् ॥ ११ ॥
वहाँ भूखसे पीड़ित हो फल- मूल आदि जुटाते हुए राजा नल वहाँसे अन्यत्र चले गये ।
केवल दमयन्ती उनके पीछे - पीछे गयी ॥ ११ ॥
क्षुधया पीड्यमानस्तु नलो बहुतिथेऽहनि ।
अपश्यच्छकुनान् कांश्चिद्धिरण्यसदृशच्छदान् ॥ १२ ॥
इसी प्रकार नल बहुत दिनोंतक क्षुधासे पीड़ित रहे । एक दिन उन्होंने कुछ ऐसे पक्षी देखे, जिनकी पाँखें सोनेकी - सी थीं ॥ १२ ॥
स चिन्तयामास तदा निषधाधिपतिर्बली ।
अस्ति भक्ष्यो ममाद्यायं वसु चेदं भविष्यति ॥ १३ ॥
उन्हें देखकर ( क्षुधातुर और आपत्तिग्रस्त होनेके कारण) बलवान् निषधनरेशके मनमें यह बात आयी कि ' यह पक्षियोंका समुदाय ही आज मेरा भक्ष्य हो सकता है और इनकी ये पाँखें मेरे लिये धन हो जायँगी ' ॥ १३ ॥
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ततस्तान् परिधानेन वाससा स समावृणोत् ।
तस्य तद् वस्त्रमादाय सर्वे जग्मुर्विहायसा ॥ १४ ॥
तदनन्तर उन्होंने अपने अधोवस्त्रसे उन पक्षियोंको ढँक दिया । किंतु वे सब पक्षी उनका वह वस्त्र लेकर आकाशमें उड़ गये ॥ १४ ॥
उत्पतन्तः खगा वाक्यमेतदाहुस्ततो नलम् ।
दृष्ट्वा दिग्वाससं भूमौ स्थितं दीनमधोमुखम् ॥ १५ ॥
उड़ते हुए उन पक्षियोंने राजा नलको दीनभावसे नीचे मुँह किये धरतीपर नग्न खड़ा देख उनसे कहा- ||
वयमक्षाः सुदुर्बुद्धे तव वासो जिहीर्षवः ।
आगता न हि नः प्रीतिः सवाससि गते त्वयि ॥ १६ ॥
' ओ खोटी बुद्धिवाले नरेश! हम (पक्षी नहीं ) पासे हैं और तुम्हारा वस्त्र अपहरण करनेकी इच्छासे ही यहाँ आये थे । तुम वस्त्र पहने हुए ही वहाँसे चले आये थे, इससे हमें प्रसन्नता नहीं हुई थी ' ॥ १६ ॥
तान् समीपगतानक्षानात्मानं च विवाससम् ।
पुण्यश्लोकस्तदा राजन् दमयन्तीमथाब्रवीत् ॥ १७ ॥
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येषां प्रकोपादैश्वर्यात् प्रच्युतोऽहमनिन्दिते ।
प्राणयात्रां न विन्देयं दुःखितः क्षुधयान्वितः ॥ १८ ॥
येषां कृते न सत्कारमकुर्वन् मयि नैषधाः ।
इमे ते शकुना भूत्वा वासो भीरु हरन्ति मे ॥ १ ९ ॥
राजन्! उन पासोंको नजदीकसे जाते देख और अपने - आपको नग्नावस्थामें पाकर पुण्यश्लोक नलने उस समय दमयन्तीसे कहा - ' सती साध्वी रानी! जिनके क्रोधसे मेरा ऐश्वर्य छिन गया, मैं क्षुधापीड़ित एवं दुःखित होकर जीवन निर्वाहके लिये अन्नतक नहीं पा रहा हूँ और जिनके कारण निषधदेशकी प्रजाने मेरा सत्कार नहीं किया, भीरु! वे ही ये पासे हैं, जो पक्षी होकर मेरा वस्त्र लिये जा रहे हैं ॥ १७–१९ ॥
वैषम्यं परमं प्राप्तो दुःखितो गतचेतनः ।
भर्ता तेऽहं निबोधेदं वचनं हितमात्मनः ॥ २० ॥
‘ मैं बड़ी विषम परिस्थितिमें पड़ गया हूँ । दुःखके मारे मेरी चेतना लुप्त सी हो रही है । मैं तुम्हारा पति हूँ, अतः तुम्हारे हितकी बात बता रहा हूँ, इसे सुनो- ॥ २० ॥
एते गच्छन्ति बहवः पन्थानो दक्षिणापथम् ।
अवन्तीमृक्षवन्तं च समतिक्रम्य पर्वतम् ॥ २१ ॥
' ये बहुत - से मार्ग हैं, जो दक्षिण दिशाकी ओर जाते हैं । यह मार्ग ऋक्षवान् पर्वतको लाँघकर अवन्ती - देशको जाता है ॥ २१ ॥
एष विन्ध्यो महाशैलः पयोष्णी च समुद्रगा ।
आश्रमाश्च महर्षीणां बहुमूलफलान्विताः ॥ २२ ॥
एष पन्था विदर्भाणामसौ गच्छति कोसलान् ।
अतः परं च देशोऽयं दक्षिणे दक्षिणापथः ॥ २३ ॥
‘ यह महान् पर्वत विन्ध्य दिखायी दे रहा है और यह समुद्रगामिनी पयोष्णी नदी है । यहाँ महर्षियोंके बहुत- से आश्रम हैं, जहाँ प्रचुर मात्रामें फल-मूल उपलब्ध हो सकते हैं । यह विदर्भदेशका मार्ग है और वह कोसलदेशको जाता है । दक्षिण दिशामें इसके बादका देश दक्षिणापथ कहलाता है' ॥ २२-२३ ॥
एतद् वाक्यं नलो राजा दमयन्तीं समाहितः ।
उवाचासकृदार्तो हि भैमीमुद्दिश्य भारत ॥ २४ ॥
भारत! राजा नलने एकाग्रचित्त होकर बड़ी आतुरताके साथ दमयन्तीसे उपर्युक्त बातें बार- बार कहीं ॥ २४ ॥
ततः सा बाष्पकलया वाचा दुःखेन कर्शिता ।
उवाच दमयन्ती तं नैषधं करुणं वचः ॥ २५ ॥
तब दमयन्ती अत्यन्त दुःखसे दुर्बल हो नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई गद्गद वाणीमें राजा नलसे यह करुण वचन बोली- ॥ २५ ॥