श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 411–420
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 411–420
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छायाद्वितीयो म्लानस्रग्रजःस्वेदसमन्वितः ।
भूमिष्ठो नैषधश्चैव निमेषेण च सूचितः ॥ २५ ॥
उन पाँचोंमें एक पुरुष ऐसे हैं, जिनकी परछाईं पड़ रही है । उनके गलेकी पुष्पमाला कुम्हला गयी है । उनके अंगोंमें धूल-कण और पसीनेकी बूँदें भी दिखायी पड़ती हैं । वे पृथ्वीका स्पर्श किये बैठे हैं और उनके नेत्रोंकी पलकें गिरती हैं । इन लक्षणोंसे दमयन्तीने निषधराज नलको पहचान लिया ॥ २५ ॥
सा समीक्ष्य तु तान् देवान् पुण्यश्लोकं च भारत ।
नैषधं वरयामास भैमी धर्मेण पाण्डव ॥ २६ ॥
भरतकुलभूषण पाण्डुनन्दन! राजकुमारी दमयन्तीने उन देवताओं तथा पुण्यश्लोक नलकी ओर पुनः दृष्टिपात करके धर्मके अनुसार निषधराज नलका ही वरण किया ॥ २६ ॥
विलज्जमाना वस्त्रान्तं जग्राहायतलोचना ।
स्कन्ध देशेऽसृजत् तस्य स्रजं परमशोभनाम् ॥ २७ ॥
वरयामास चैवैनं पतित्वे वरवर्णिनी । विशाल नेत्रोंवाली दमयन्तीने लजाते -लजाते नलके वस्त्रका छोर पकड़ लिया और उनके गलेमें परम सुन्दर फूलोंका हार डाल दिया । इस प्रकार वरवर्णिनी दमयन्तीने राजा नलका पतिरूपमें वरण कर लिया ॥ २७ ॥
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ततो हाहेति सहसा मुक्तः शब्दो नराधिपैः ॥ २८ ॥
फिर तो दूसरे राजाओंके मुखसे सहसा ' हाहाकार' - का शब्द निकल पड़ा ॥ २८ ॥
देवैर्महर्षिभिस्तत्र साधु साध्विति भारत ।
विस्मितैरीरितः शब्दः प्रशंसद्भिर्नलं नृपम् ॥ २ ९ ॥
भारत! देवता और महर्षि वहाँ साधुवाद देने लगे । सबने विस्मित होकर राजा नलकी प्रशंसा करते हुए इनके सौभाग्यको सराहा ॥ २९ ॥
दमयन्तीं तु कौरव्य वीरसेनसुतो नृपः ।
आश्वासयद् वरारोहां प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ३० ॥
कुरुनन्दन! वीरसेनकुमार नलने उल्लसित हृदयसे सुन्दरी दमयन्तीको आश्वासन देते हुए कहा— ॥ ३० ॥
यत् त्वं भजसि कल्याणि पुमांसं देवसंनिधौ ।
तस्मान्मां विद्धि भर्तारमेवं ते वचने रतम् ॥ ३१ ॥
‘ कल्याणी! तुम देवताओंके समीप जो मुझ जैसे पुरुषका वरण कर रही हो, इस अलौकिक अनुरागके कारण अपने इस पतिको तुम सदा अपनी प्रत्येक आज्ञाके पालनमें तत्पर समझो ॥ ३१ ॥
यावच्च मे धरिष्यन्ति प्राणा देहे शुचिस्मिते ।
तावत् त्वयि भविष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ३२ ॥
‘ पवित्र मुसकानवाली देवि! मेरे इस शरीरमें जबतक प्राण रहेंगे, तबतक तुममें मेरा अनन्य अनुराग बना रहेगा, यह मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ ' ॥ ३२ ॥
दमयन्ती तथा वाग्भिरभिनन्द्य कृताञ्जलिः ।
तौ परस्परतः प्रीतौ दृष्ट्वा त्वग्निपुरोगमान् ॥ ३३ ॥
तानेव शरणं देवाञ्जग्मतुर्मनसा तदा । इसी प्रकार दमयन्तीने भी हाथ जोड़कर विनीत वचनोंद्वारा महाराज नलका अभिनन्दन किया । वे दोनों एक- दूसरेको पाकर बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने सामने अग्नि आदि देवताओंको देखकर मन- ही- मन उनकी ही शरण ली ॥ ३३३ ॥
वृते तु नैषधे भैम्या लोकपाला महौजसः ॥ ३४ ॥
प्रहृष्टमनसः सर्वे नलायाष्टौ वरान् ददुः । दमयन्तीने जब नलका वरण कर लिया, तब उन सब महातेजस्वी लोकपालोंने प्रसन्नचित्त होकर नलको आठ वरदान दिये ॥ ३४३ ॥
प्रत्यक्षदर्शनं यज्ञे गतिं चानुत्तमां शुभाम् ॥ ३५ ॥
नैषधाय ददौ शक्रः प्रीयमाणः शचीपतिः । शचीपति इन्द्रने प्रसन्न होकर निषधराज नलको यह वर दिया कि ' मैं यज्ञमें तुम्हें प्रत्यक्ष दर्शन दूँगा और अन्तमें सर्वोत्तम शुभ गति प्रदान करूँगा' ॥ ३५३ ॥
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अग्निरात्मभवं प्रादाद् यत्र वाञ्छति नैषधः ॥ ३६ ॥
लोकानात्मप्रभांश्चैव ददौ तस्मै हुताशनः । हविष्यभोक्ता अग्निदेवने नलको अपने ही समान तेजस्वी लोक प्रदान किये और यह भी कहा कि ‘ राजा नल जहाँ चाहेंगे, वहीं मैं प्रकट हो जाऊँगा' ॥ ३६३ ॥
यमस्त्वन्नरसं प्रादाद् धर्मे च परमां स्थितिम् ॥ ३७ ॥
यमराजने यह कहा कि ' राजा नलकी बनायी हुई रसोईमें उत्तमोत्तम रस एवं स्वाद उपलब्ध होगा और धर्ममें इनकी दृढ़ निष्ठा बनी रहेगी' ॥ ३७ ॥
अपां पतिरपां भावं यत्र वाञ्छति नैषधः ।
स्रजश्चोत्तमगन्धाढ्याः सर्वे च मिथुनं ददुः ॥ ३८ ॥
जलके स्वामी वरुणने नलकी इच्छाके अनुसार जल प्रकट होनेका वर दिया और यह भी कहा कि ' तुम्हारी पुष्पमालाएँ सदा उत्तम गन्धसे सम्पन्न होंगी । ' इस प्रकार सब देवताओंने दो -दो वर दिये ॥ ३८ ॥
वरानेवं प्रदायास्य देवास्ते त्रिदिवं गताः ।
पार्थिवाश्चानुभूयास्य विवाहं विस्मयान्विताः ॥ ३ ९ ॥
दमयन्त्याश्च मुदिताः प्रतिजग्मुर्यथागतम् ।
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इस प्रकार राजा नलको वरदान देकर वे देवता - लोग स्वर्गलोकको चले गये । स्वयंवरमें आये हुए राजा भी विस्मयविमुग्ध हो नल और दमयन्तीके विवाहोत्सवका - सा अनुभव करते हुए प्रसन्नतापूर्वक जैसे आये थे, वैसे लौट गये ॥ ३ ९ ३ ॥ गतेषु पार्थिवेन्द्रेषु भीमः प्रीतो महामनाः ॥ ४० ॥
विवाहं कारयामास दमयन्त्या नलस्य च । सब नरेशोंके विदा हो जानेपर महामना भीमने बड़ी प्रसन्नताके साथ नल- दमयन्तीका शास्त्रविधिके अनुसार विवाह कराया ॥ ४० ॥
उष्य तत्र यथाकामं नैषधो द्विपदां वरः ॥ ४१ ॥
भीमेन समनुज्ञातो जगाम नगरं स्वकम् । मनुष्योंमें श्रेष्ठ निषधनरेश नल अपनी इच्छाके अनुसार कुछ दिनोंतक ससुरालमें रहे, फिर विदर्भनरेश भीमकी आज्ञा ले ( दमयन्तीसहित) अपनी राजधानीको चले गये ॥ ४१३ || अवाप्य नारीरत्नं तु पुण्यश्लोकोऽपि पार्थिवः ॥ ४२ ॥
रेमे सह तया राजञ्छच्येव बलवृत्रहा । राजन्! पुण्यश्लोक महाराज नलने भी उस रमणीरत्नको पाकर उसके साथ उसी प्रकार विहार किया, जैसे शचीके साथ इन्द्र करते हैं ॥ ४२ ॥
अतीव मुदितो राजा भ्राजमानोंऽशुमानिव ॥ ४३ ॥
अरञ्जयत् प्रजा वीरो धर्मेण परिपालयन् । राजा नल सूर्यके समान प्रकाशित होते थे । वीरवर नल अत्यन्त प्रसन्न रहकर अपनी प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करते हुए उसे प्रसन्न रखते थे ॥ ४३३ ॥
ईजे चाप्यश्वमेधेन ययातिरिव नाहुषः ॥ ४४ ॥
अन्यैश्च बहुभिर्धीमान् क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः । उन बुद्धिमान् नरेशने नहुषनन्दन ययातिकी भाँति अश्वमेध तथा पर्याप्त दक्षिणावाले दूसरे बहुत - से यज्ञोंका भी अनुष्ठान किया ॥ ४४३ ॥
पुनश्च रमणीयेषु वनेषूपवनेषु च ॥ ४५ ॥
दमयन्त्या सह नलो विजहारामरोपमः । तदनन्तर देवतुल्य राजा नलने दमयन्तीके साथ रमणीय वनों और उपवनोंमें विहार किया ॥ ४५३ ॥
जनयामास च ततो दमयन्त्यां महामनाः ।
इन्द्रसेनं सुतं चापि इन्द्रसेनां च कन्यकाम् ॥ ४६ ॥
महामना नलने दमयन्तीके गर्भसे इन्द्रसेन नामक एक पुत्र और इन्द्रसेना नामवाली एक कन्याको जन्म दिया ॥ ४६ ॥
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एवं स यजमानश्च विहरंश्च नराधिपः ।
ररक्ष वसुसम्पूर्णां वसुधां वसुधाधिपः ॥ ४७ ॥
इस प्रकार यज्ञोंका अनुष्ठान तथा सुखपूर्वक विहार करते हुए महाराज नलने धन-धान्यसे सम्पन्न वसुन्धराका पालन किया ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीस्वयंवरे सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत दमयन्ती-स्वयंवरविषयक सत्तावनवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥
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अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः देवताओंके द्वारा नलके गुणोंका गान और उनके निषेध करनेपर भी नलके विरुद्ध कलियुगका कोप बृहदश्व उवाच
वृते तु नैषधे भैम्या लोकपाला महौजसः ।
यान्तो ददृशुरायान्तं द्वापरं कलिना सह ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं - राजन्! भीमकुमारी दमयन्तीद्वारा निषधनरेश नलका वरण हो जानेपर जब महातेजस्वी लोकपालगण स्वर्गलोकको जा रहे थे, उस समय मार्गमें उन्होंने देखा कि कलियुगके साथ द्वापर आ रहा है ॥ १ ॥
अथाब्रवीत् कलिं शक्रः सम्प्रेक्ष्य बलवृत्रहा ।
द्वापरेण सहायेन कले ब्रूहि क्व यास्यसि ॥ २ ॥
कलियुगको देखकर बल और वृत्रासुरका नाश करनेवाले इन्द्रने पूछा— ' कले! बताओ तो सही द्वापरके साथ कहाँ जा रहे हो? ' ॥ २ ॥
ततोऽब्रवीत् कलिः शक्रं दमयन्त्याः स्वयंवरम् ।
गत्वा हि वरयिष्ये तां मनो हि मम तां गतम् ॥ ३ ॥
तब कलिने इन्द्रसे कहा – ' देवराज! मैं दमयन्तीके स्वयंवरमें जाकर उसका वरण करूँगा; क्योंकि मेरा मन उसके प्रति आसक्त हो गया है ' ॥ ३ ॥
तमब्रवीत् प्रहस्येन्द्रो निर्वृत्तः स स्वयंवरः ।
वृतस्तया नलो राजा पतिरस्मत्समीपतः ॥ ४ ॥
तब इन्द्रने हँसकर कहा -' वह स्वयंवर तो हो गया । हमारे समीप ही दमयन्तीने राजा नलको अपना पति चुन लिया ॥ ४ ॥
एवमुक्तस्तु शक्रेण कलिः कोपसमन्वितः ।
देवानामन्त्र्य तान् सर्वानुवाचेदं वचस्तदा ॥ ५ ॥
इन्द्रके ऐसा कहनेपर कलियुगको क्रोध चढ़ आया और उसी समय उसने उन सब देवताओंको सम्बोधित करके यह बात कही- ॥ ५ ॥
देवानां मानुषं मध्ये यत् सा पतिमविन्दत ।
ततस्तस्या भवेन्न्याय्यं विपुलं दण्डधारणम् ॥ ६ ॥
‘ दमयन्तीने देवताओंके बीचमें मनुष्यका पतिरूपमें वरण किया है । अतः उसे बड़ा भारी दण्ड देना उचित प्रतीत होता है ' ॥ ६ ॥
एवमुक्ते तु कलिना प्रत्यूचुस्ते दिवौकसः ।
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अस्माभिः समनुज्ञाते दमयन्त्या नलो वृतः ॥ ७ ॥
कलियुगके ऐसा कहनेपर देवताओंने उत्तर दिया-' दमयन्तीने हमारी आज्ञा लेकर नलका वरण किया है ॥
का च सर्वगुणोपेतं नाश्रयेत नलं नृपम् ।
यो वेद धर्मानखिलान् यथावच्चरितव्रतः ॥ ८ ॥
योऽधीते चतुरो वेदान् सर्वानाख्यानपञ्चमान् ।
नित्यं तृप्ता गृहे यस्य देवा यज्ञेषु धर्मतः ।
अहिंसानिरतो यश्च सत्यवादी दृढव्रतः ॥ ९ ॥
यस्मिन् दाक्ष्यं धृतिर्ज्ञानं तपः शौचं दमः शमः ।
ध्रुवाणि पुरुषव्याघ्रे लोकपालसमे नृपे ॥ १० ॥
एवंरूपं नलं यो वै कामयेच्छपितुं कले ।
आत्मानं स शपेन्मूढो हन्यादात्मानमात्मना ॥ ११ ॥
' राजा नल सर्वगुणसम्पन्न हैं । कौन स्त्री उनका वरण नहीं करेगी? जिन्होंने भलीभाँति ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करके चारों वेदों तथा पंचम वेद समस्त इतिहास - पुराणका भी अध्ययन किया है, जो सब धर्मोंको जानते हैं, जिनके घरपर पंचयज्ञोंमें धर्मके अनुसार सम्पूर्ण देवता नित्य तृप्त होते हैं, जो अहिंसा -परायण, सत्यवादी तथा दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले हैं, जिन नरश्रेष्ठ लोकपाल-सदृश तेजस्वी नलमें दक्षता, धैर्य, ज्ञान, तप, शौच, शम और दम आदि गुण नित्य निवास करते हैं । कले! ऐसे राजा नलको जो मूढ़ शाप देनेकी इच्छा रखता है, वह मानो अपनेको ही शाप देता है । अपने द्वारा अपना ही विनाश करता है ॥ ८–११ ॥ एवंगुणं नलं यो वै कामयेच्छपितुं कले ।
कृच्छ्रे स नरके मज्जेदगाधे विपुले हृदे ।
एवमुक्त्वा'कलिं देवा द्वापरं च दिवं ययुः ॥ १२ ॥
‘ ऐसे सद्गुणसम्पन्न महाराज नलको जो शाप देनेकी कामना करेगा, वह कष्टसे भरे हुए अगाध एवं विशाल नरककुण्डमें निमग्न होगा। ' कलियुग और द्वापरसे ऐसा कहकर देवतालोग स्वर्गमें चले गये ॥ १२ ॥
ततो गतेषु देवेषु कलिर्द्वापरमब्रवीत् ।
संहर्तुं नोत्सहे कोपं नले वत्स्यामि द्वापर ॥ १३ ॥
भ्रंशयिष्यामि तं राज्यान्न भैम्या सह रंस्यते ।
त्वमप्यक्षान् समाविश्य साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥ १४ ॥
तदनन्तर देवताओंके चले जानेपर कलियुगने द्वापरसे कहा-' द्वापर! मैं अपने क्रोधका उपसंहार नहीं कर सकता । नलके भीतर निवास करूँगा और उन्हें राज्यसे वंचित
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कर दूँगा । जिससे वे दमयन्तीसे रमण नहीं कर सकेंगे । तुम्हें भी जूएके पासोंमें प्रवेश करके मेरी सहायता करनी चाहिये ' ॥ १३-१४ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि कलिदेवसंवादे अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें कलि-देवता- संवादविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५८ ॥
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एकोनषष्टितमोऽध्यायः नलमें कलियुगका प्रवेश एवं नल और पुष्करकी द्यूतक्रीडा, प्रजा और दमयन्तीके निवारण करनेपर भी राजाका द्यूतसे निवृत्त नहीं होना बृहदश्वउवाच
एवं स समयं कृत्वा द्वापरेण कलिः सह ।
आजगाम ततस्तत्र यत्र राजा स नैषधः ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं - राजन्! इस प्रकार द्वापरके साथ संकेत करके कलियुग उस स्थानपर आया, जहाँ निषधराज नल रहते थे ॥ १ ॥
स नित्यमन्तरप्रेप्सुर्निषधेष्ववसच्चिरम् ।
अथास्य द्वादशे वर्षे ददर्श कलिरन्तरम् ॥ २ ॥
वह प्रतिदिन राजा नलका छिद्र देखता हुआ निषधदेशमें दीर्घकालतक टिका रहा ।
बारह वर्षोंके बाद एक दिन कलिको एक छिद्र दिखायी दिया ॥ २ ॥
कृत्वा मूत्रमुपस्पृश्य संध्यामन्वास्त नैषधः ।
अकृत्वा पादयोः शौचं तत्रैनं कलिराविशत् ॥ ३ ॥
राजा नल उस दिन लघुशंका करके आये और हाथ- मुँह धोकर आचमन करनेके पश्चात् संध्योपासना करने बैठ गये; पैरोंको नहीं धोया। यह छिद्र देखकर कलियुग उनके भीतर प्रविष्ट हो गया ॥ ३ ॥
स समाविश्य च नलं समीपं पुष्करस्य च ।
गत्वा पुष्करमाहेदमेहि दीव्य नलेन वै ॥ ४ ॥
नलमें आविष्ट होकर कलियुगने दूसरा रूप धारण करके पुष्करके पास जाकर कहा ——चलो, राजा नलके साथ जूआ खेलो ॥ ४ ॥
अक्षद्यूते नलं जेता भवान् हि सहितो मया ।
निषधान् प्रतिपद्यस्व जित्वा राज्यं नलं नृपम् ॥ ५ ॥
मेरे साथ रहकर तुम जूएमें अवश्य राजा नलको जीत लोगे । इस प्रकार महाराज नलको उनके राज्यसहित जीतकर निषधदेशको अपने अधिकारमें कर लो ' ॥ ५ ॥
एवमुक्तस्तु कलिना पुष्करो नलमभ्ययात् ।
कलिश्चैव वृषो भूत्वा गवां पुष्करमभ्ययात् ६ ॥
कलिके ऐसा कहनेपर पुष्कर राजा नलके पास गया । कलि भी साँड़ बनकर पुष्करके साथ हो लिया ॥ ६ ॥
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आसाद्य तु नलं वीरं पुष्करः परवीरहा ।
दीव्यावेत्यब्रवीद् भ्राता वृषेणेति मुहुर्मुहुः ॥ ७ ॥
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पुष्करने वीरवर नलके पास जाकर उनसे बार- बार कहा
- ' हम दोनों धर्मपूर्वक जूआ खेलें । ' पुष्कर राजा नलका भाई लगता था ॥ ७ ॥
न चक्षमे ततो राजा समाह्वानं महामनाः ।
वैदर्भ्याः प्रेक्षमाणायाः पणकालममन्यत ॥ ८ ॥
महामना राजा नल द्यूतके लिये पुष्करके आह्वानको न सह सके । विदर्भराजकुमारी दमयन्तीके देखते - देखते उसी क्षण जुआ खेलनेका उपयुक्त अवसर समझ लिया ॥ ८ ॥
हिरण्यस्य सुवर्णस्य यानयुग्यस्य वाससाम् ।
आविष्टः कलिना द्यूते जीयते स्म नलस्तदा ॥ ९ ॥
तमक्षमदसम्मत्तं सुहृदां न तु कश्चन ।
निवारणेऽभवच्छक्तो दीव्यमानमरिंदमम् ॥ १० ॥
तब कलियुगसे आविष्ट होकर राजा नल हिरण्य, सुवर्ण, रथ आदि वाहन और बहुमूल्य वस्त्र दाँवपर लगाते तथा हार जाते थे । सुहृदोंमें कोई भी ऐसा नहीं था, जो द्यूतक्रीडाके मदसे उन्मत्त शत्रुदमन नलको उस समय जूआ खेलनेसे रोक सके ॥ ९ -१० ॥
ततः पौरजनाः सर्वे मन्त्रिभिः सह भारत ।
राजानं द्रष्टुमागच्छन् निवारयितुमातुरम् ॥ ११ ॥
भारत! तदनन्तर समस्त पुरवासी मनुष्य मन्त्रियोंके साथ राजासे मिलने तथा उन आतुर नरेशको द्यूतक्रीडासे रोकनेके लिये वहाँ आये ॥ ११ ॥
ततः सूत उपागम्य दमयन्त्यै न्यवेदयत् ।
एष पौरजनो देवि द्वारि तिष्ठति कार्यवान् ॥ १२ ॥
इसी समय सारथिने महलमें जाकर महारानी दमयन्तीसे निवेदन किया — ' देवि! ये पुरवासीलोग कार्यवश राजद्वारपर खड़े हैं ॥ १२ ॥
निवेद्यतां नैषधाय सर्वाः प्रकृतयः स्थिताः ।
अमृष्यमाणा व्यसनं राज्ञो धर्मार्थदर्शिनः ॥ १३ ॥
‘ आप निषधराजसे निवेदन कर दें । धर्म - अर्थका तत्त्व जाननेवाले महाराजके भावी संकटको सहन न कर सकनेके कारण मन्त्रियोंसहित सारी प्रजा द्वारपर खड़ी है ' ॥ १३ ॥
ततः सा बाष्पकलया वाचा दुःखेन कर्शिता ।
उवाच नैषधं भैमी शोकोपहतचेतना ॥ १४ ॥
यह सुनकर दुःखसे दुर्बल हुई दमयन्तीने शोकसे अचेत-सी होकर आँसू बहाते हुए गद्गदवाणीमें निषध - नरेशसे कहा— ॥ १४ ॥