श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 431–440

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

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उद्वेजते मे हृदयं सीदन्त्यङ्गानि सर्वशः ।

तव पार्थिव संकल्पं चिन्तयन्त्याः पुनः पुनः ॥ २६ ॥

हृतराज्यं हृतद्रव्यं विवस्त्रं क्षुच्छ्रमान्वितम् ।

कथमुत्सृज्य गच्छेयमहं त्वां निर्जने वने ॥ २७ ॥

‘ महाराज! आपका मानसिक संकल्प क्या है, इसपर जब मैं बार- बार विचार करती हूँ, तब मेरा हृदय उद्विग्न हो उठता है और सारे अंग शिथिल हो उठते हैं । आपका राज्य छिन गया । धन नष्ट हो गया । आपके शरीरपर वस्त्रतक नहीं रह गया तथा आप भूख और परिश्रमसे कष्ट पा रहे हैं । ऐसी अवस्थामें इस निर्जन वनमें आपको असहाय छोड़कर मैं कैसे जा सकती हूँ? ॥

श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य चिन्तयानस्य तत् सुखम् ।

वने घोरे महाराज नाशयिष्याम्यहं क्लमम् ॥ २८ ॥

‘ महाराज! जब आप भयंकर वनमें थके -माँदे भूखसे पीड़ित हो अपने पूर्व सुखका चिन्तन करते हुए अत्यन्त दुःखी होने लगेंगे, उस समय मैं सान्त्वनाद्वारा आपके संतापका निवारण करूँगी ॥ २८ ॥

न च भार्यासमं किंचिद् विद्यते भिषजां मतम् ।

औषधं सर्वदुःखेषु सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २९ ॥

‘ चिकित्सकोंका मत है कि समस्त दुःखोंकी शान्तिके लिये पत्नीके समान दूसरी कोई औषध नहीं है; यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ' ॥ २ ९ ॥ नल उवाच

एवमेतद् यथाऽऽत्थ त्वं दमयन्ति सुमध्यमे ।

नास्ति भार्यासमं मित्रं नरस्यार्तस्य भेषजम् ॥ ३० ॥

नलने कहा — सुमध्यमा दमयन्ती! तुम जैसा कहती हो वह ठीक है । दुःखी मनुष्यके लिये पत्नीके समान दूसरा कोई मित्र या औषध नहीं है ॥ ३० ॥

न चाहं त्यक्तकामस्त्वां किमलं भीरु शङ्कसे ।

त्यजेयमहमात्मानं न चैव त्वामनिन्दिते ॥ ३१ ॥

भीरु! मैं तुम्हें त्यागना नहीं चाहता, तुम इतनी अधिक शंका क्यों करती हो? अनिन्दिते! मैं अपने शरीरका त्याग कर सकता हूँ, पर तुम्हें नहीं छोड़ सकता ॥ ३१ ॥

दमयन्त्युवाच

यदि मां त्वं महाराज न विहातुमिहेच्छसि ।

तत् किमर्थं विदर्भाणां पन्थाः समुपदिश्यते ॥ ३२ ॥

दमयन्तीने कहा – महाराज! यदि आप मुझे त्यागना नहीं चाहते तो विदर्भदेशका मार्ग क्यों बता रहे हैं? ॥ ३२ ॥

पृष्ठ 432

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अवैमि चाहं नृपते न तु मां त्यक्तुमर्हसि ।

चेतसा त्वपकृष्टेन मां त्यजेथा महीपते ॥ ३३ ॥

राजन्! मैं जानती हूँ कि आप स्वयं मुझे नहीं त्याग सकते, परंतु महीपते! इस घोर आपत्तिने आपके चित्तको आकर्षित कर लिया है, इस कारण आप मेरा त्याग भी कर सकते हैं ॥ ३३ ॥

पन्थानं हि ममाभीक्ष्णमाख्यासि च नरोत्तम ।

अतो निमित्तं शोकं मे वर्धयस्यमरोपम ॥ ३४ ॥

नरश्रेष्ठ! आप बार-बार जो मुझे विदर्भदेशका मार्ग बता रहे हैं। देवोपम आर्यपुत्र! इसके कारण आप मेरा शोक ही बढ़ा रहे हैं ॥ ३४ ॥

यदि चायमभिप्रायस्तव ज्ञातीन् व्रजेदिति ।

सहितावेव गच्छावो विदर्भान् यदि मन्यसे ॥ ३५ ॥

यदि आपका यह अभिप्राय हो कि दमयन्ती अपने बन्धु - बान्धवोंके यहाँ चली जाय तो आपकी सम्मति हो तो हम दोनों साथ ही विदर्भदेशको चलें ॥ ३५ ॥

विदर्भराजस्तत्र त्वां पूजयिष्यति मानद ।

तेन त्वं पूजितो राजन् सुखं वत्स्यसि नो गृहे ॥ ३६ ॥

मानद! वहाँ विदर्भनरेश आपका पूरा आदर- सत्कार करेंगे । राजन्! उनसे पूजित होकर आप हमारे घरमें सुखपूर्वक निवास कीजियेगा ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलवनयात्रायामेकषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलकी वनयात्राविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६१ ॥

पृष्ठ 433

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द्विषष्टितमोऽध्यायः राजा नलकी चिन्ता और दमयन्तीको अकेली सोती छोड़कर उनका अन्यत्र प्रस्थान नल उवाच

यथा राज्यं तव पितुस्तथा मम न संशयः ।

न तु तत्र गमिष्यामि विषमस्थः कथंचन ॥ १ ॥

नलने कहा – प्रिये! इसमें संदेह नहीं कि विदर्भराज्य जैसे तुम्हारे पिताका है, वैसे मेरा भी है, तथापि आपत्तिमें पड़ा हुआ मैं किसी तरह वहाँ नहीं जाऊँगा ॥ १ ॥

कथं समृद्धो गत्वाहं तव हर्षविवर्धनः ।

परिच्युतो गमिष्यामि तव शोकविवर्धनः ॥ २ ॥

एक दिन मैं भी समृद्धिशाली राजा था । उस अवस्थामें वहाँ जाकर मैंने तुम्हारे हर्षको बढ़ाया था और आज उस राज्यसे वंचित होकर केवल तुम्हारे शोककी वृद्धि कर रहा हूँ, ऐसी दशामें वहाँ कैसे जाऊँगा? ॥ २ ॥

बृहदश्वउवाच

इति ब्रुवन् नलो राजा दमयन्तीं पुनः पुनः ।

सान्त्वयामास कल्याणीं वाससोऽर्धेन संवृताम् ॥ ३ ॥

तावेकवस्त्रसंवीतावटमानावितस्ततः ।

क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ सभां कांचिदुपेयतुः ॥ ४ ॥

बृहदश्व मुनि कहते हैं - राजन्! आधे वस्त्रसे ढकी हुई कल्याणमयी दमयन्तीसे बार-बार ऐसा कहकर राजा नलने उसे सान्त्वना दी; क्योंकि वे दोनों एक ही वस्त्रसे अपने अंगोंको ढककर इधर- उधर घूम रहे थे । भूख और प्याससे थके - माँदे वे दोनों दम्पति किसी सभाभवन ( धर्मशाला ) -में जा पहुँचे ॥ ३-४ ॥

तां सभामुपसम्प्राप्य तदा स निषधाधिपः ।

वैदर्भ्या सहितो राजा निषसाद महीतले ॥ ५ ॥

तब उस धर्मशालामें पहुँचकर निषधनरेश राजा नल वैदर्भीके साथ भूतलपर बैठे ॥ ५ ॥

स वै विवस्त्रो विकटो मलिनः पांसुगुण्ठितः ।

दमयन्त्या सह श्रान्तः सुष्वाप धरणीतले ॥ ६ ॥

वे वस्त्रहीन, चटाई आदिसे रहित, मलिन एवं धूलि- धूसरित हो रहे थे । दमयन्तीके साथ थककर भूमिपर ही सो गये ॥ ६ ॥

पृष्ठ 434

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दमयन्त्यपि कल्याणी निद्रयापहृता ततः ।

सहसा दुःखमासाद्य सुकुमारी तपस्विनी ॥ ७ ॥

सुकुमारी तपस्विनी कल्याणमयी दमयन्ती भी सहसा दुःखमें पड़ गयी थी । वहाँ आनेपर उसे भी निद्राने घेर लिया ॥ ७ ॥

सुप्तायां दमयन्त्यां तु नलो राजा विशाम्पते ।

शोकोन्मथितचित्तात्मा न स्म शेते तथा पुरा ॥ ८ ॥

राजन्! राजा नलका चित्त शोकसे मथा जा रहा था । वे दमयन्तीके सो जानेपर भी स्वयं पहलेकी भाँति सो न सके ॥ ८ ॥

स तद् राज्यापहरणं सुहृत्त्यागं च सर्वशः ।

वने च तं परिध्वंसं प्रेक्ष्य चिन्तामुपेयिवान् ॥ ९ ॥

राज्यका अपहरण, सुहृदोंका त्याग और वनमें प्राप्त होनेवाले नाना प्रकारके क्लेशपर विचार करते हुए वे चिन्ताको प्राप्त हो गये ॥ ९ ॥

किं नु मे स्यादिदं कृत्वा किं नु मे स्यादकुर्वतः ।

किं नुन मे मरणं श्रेयः परित्यागो जनस्य वा ॥ १० ॥

वे सोचने लगे ‘ ऐसा करनेसे मेरा क्या होगा और यह कार्य न करनेसे भी क्या होगा ।

मेरा मर जाना अच्छा है कि अपनी आत्मीया दमयन्तीको त्याग देना ॥ १० ॥

मामियं ह्यनुरक्तैवं दुःखमाप्नोति मत्कृते ।

मद्विहीना त्वियं गच्छेत् कदाचित् स्वजनं प्रति ॥ ११ ॥

‘ यह मुझसे इस प्रकार अनुरक्त होकर मेरे ही लिये दुःख उठा रही है । यदि मुझसे अलग हो जाय तो यह कदाचित् अपने स्वजनोंके पास जा सकती है ॥ ११ ॥

मयि निःसंशयं दुःखमियं प्राप्स्यत्यनुव्रता ।

उत्सर्गे संशयः स्यात् तु विन्देतापि सुखं क्वचित् ॥ १२ ॥

‘ मेरे पास रहकर तो यह पतिव्रता नारी निश्चय ही केवल दुःख भोगेगी । यद्यपि इसे त्याग देनेपर एक संशय बना रहेगा तो भी यह सम्भव है कि इसे कभी सुख मिल जाय' ॥ १२ ॥

स विनिश्चित्य बहुधा विचार्य च पुनः पुनः ।

उत्सर्गं मन्यते श्रेयो दमयन्त्या नराधिप ॥ १३ ॥

राजन्! नल अनेक प्रकारसे बार- बार विचार करके एक निश्चयपर पहुँच गये और दमयन्तीका परित्याग कर देनेमें ही उसकी भलाई मानने लगे ॥ १३ ॥

न चैषा तेजसा शक्या कैश्चिद् धर्षयितुं पथि ।

यशस्विनी महाभागा मद्भक्तेयं पतिव्रता ॥ १४ ॥

‘ यह महाभागा यशस्विनी दमयन्ती मेरी भक्त और पतिव्रता है । पातिव्रत- तेजके कारण मार्गमें कोई इसका सतीत्व नष्ट नहीं कर सकता' ॥ १४ ॥

पृष्ठ 435

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एवं तस्य तदा बुद्धिर्दमयन्त्यां न्यवर्तत ।

कलिना दुष्टभावेन दमयन्त्या विसर्जने ॥ १५ ॥

ऐसा सोचकर उनकी बुद्धि दमयन्तीको अपने साथ रखनेके विचारसे निवृत्त हो गयी । बल्कि दुष्ट स्वभाववाले कलियुगसे प्रभावित होनेके कारण दमयन्तीको त्याग देनेमें ही उनकी बुद्धि प्रवृत्त हुई ॥ १५ ॥

सोऽवस्त्रतामात्मनश्च तस्याश्चाप्येकवस्त्रताम् ।

चिन्तयित्वाध्यगाद् राजा वस्त्रार्धस्यावकर्तनम् ॥ १६ ॥

तदनन्तर राजाने अपनी वस्त्रहीनता और दमयन्तीकी एकवस्त्रताका विचार करके उसके आधे वस्त्रको फाड़ लेना ही उचित समझा ॥ १६ ॥

कथं वासो विकर्तेयं न च बुध्येत मे प्रिया ।

विचिन्त्यैवं नलो राजा सभां पर्यचरत्तदा ॥ १७ ॥

फिर यह सोचकर कि ‘ मैं कैसे वस्त्रको काहूँ, जिससे मेरी प्रियाकी नींद न टूटे । ' राजा नल धर्मशालामें ( नंगे ही ) इधर - उधर घूमने लगे ॥ १७ ॥

परिधावन्नथ नल इतश्चेतश्च भारत ।

आससाद सभोद्देशे विकोशं खड्गमुत्तमम् ॥ १८ ॥

भारत! इधर- उधर दौड़- धूप करनेपर राजा नलको उस सभाभवनमें एक अच्छी - सी नंगी तलवार मिल गयी ॥ १८ ॥

पृष्ठ 436

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तेनार्धं वाससश्छित्त्वा निवस्य च परंतपः ।

सुप्तामुत्सृज्य वैदर्भी प्राद्रवद् गतचेतनाम् ॥ १ ९ ॥

उसीसे दमयन्तीका आधा वस्त्र काटकर परंतप नलने उसके द्वारा अपना शरीर ढँक लिया और अचेत सोती हुई विदर्भराजकुमारी दमयन्तीको वहीं छोड़कर वे शीघ्रतासे चले गये ॥ १ ९ ॥

ततो निवृत्तहृदयः पुनरागम्य तां सभाम् ।

दमयन्तीं तदा दृष्ट्वा रुरोद निषधाधिपः ॥ २० ॥

कुछ दूर जानेपर उनके हृदयका विचार पलट गया और वे पुनः उसी सभाभवनमें लौट आये । वहाँ उस समय दमयन्तीको देखकर निषधनरेश नल फूट- फूटकर रोने लगे ॥ २० ॥

यां न वायुर्न चादित्यः पुरा पश्यति मे प्रियाम् ।

सेयमद्य सभामध्ये शेते भूमावनाथवत् ॥ २१ ॥

( वे विलाप करते हुए कहने लगे - ) ' पहले जिस मेरी प्रियतमा दमयन्तीको वायु तथा सूर्य देवता भी नहीं देख पाते थे, वही आज इस धर्मशालामें भूमिपर अनाथकी भाँति सो रही है ॥ २१ ॥

इयं वस्त्रावकर्तेन संवीता चारुहासिनी ।

उन्मत्तेव वरारोहा कथं बुद्ध्वा भविष्यति ॥ २२ ॥

‘ यह मनोहर हास्यवाली सुन्दरी वस्त्रके आधे टुकड़ेसे लिपटी हुई सो रही है । जब इसकी नींद खुलेगी, तब पगली- सी होकर न जाने यह कैसी दशाको पहुँच जायगी ॥ २२ ॥

कथमेका सती भैमी मया विरहिता शुभा ।

चरिष्यति वने घोरे मृगव्यालनिषेविते ॥ २३ ॥

'यह भयंकर वन हिंसक पशुओं और सर्पोंसे भरा है। मुझसे बिछुड़कर शुभलक्षणा सती दमयन्ती अकेली इस वनमें कैसे विचरण करेगी? ॥ २३ ॥

आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ समरुद्गणौ ।

रक्षन्तु त्वां महाभागे धर्मेणासि समावृता ॥ २४ ॥

‘महाभागे! तुम धर्मसे आवृत हो, आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार और मरुद्गण —ये सब देवता तुम्हारी रक्षा करें ' ॥ २४ ॥

एवमुक्त्वा प्रियां भार्यां रूपेणाप्रतिमां भुवि ।

कलिनापहृतज्ञानो नलः प्रातिष्ठदुद्यतः ॥ २५ ॥

इस भूतलपर रूप - सौन्दर्यमें जिसकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी, उसी अपनी प्यारी पत्नी दमयन्तीके प्रति इस प्रकार कहकर राजा नल वहाँसे उठे और चल दिये । उस समय कलिने इनकी विवेकशक्ति हर ली थी ॥ २५ ॥

गत्वा गत्वा नलो राजा पुनरेति सभां मुहुः ।

पृष्ठ 437

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आकृष्यमाणः कलिना सौहृदेनावकृष्यते ॥ २६ ॥

राजा नलको एक ओर कलियुग खींच रहा था और दूसरी ओर दमयन्तीका सौहार्द ।

अतः वे बार- बार जाकर फिर उस धर्मशालामें ही लौट आते थे ॥ २६ ॥

द्विधेव हृदयं तस्य दुःखितस्याभवत् तदा ।

दोलेव मुहुरायाति याति चैव सभां प्रति ॥ २७ ॥

उस समय दुःखी राजा नलका हृदय मानो दुविधामें पड़ गया था । जैसे झूला बार- बार नीचे - ऊपर आता-जाता रहता है, उसी प्रकार उनका हृदय कभी बाहर जाता, कभी सभाभवनमें लौट आता था ॥ २७ ॥

अवकृष्टस्तु कलिना मोहितः प्राद्रवन्नलः ।

सुप्तामुत्सृज्य तां भार्यां विलप्य करुणं बहु ॥ २८ ॥

अन्तमें कलियुगने प्रबल आकर्षण किया, जिससे मोहित होकर राजा नल बहुत देरतक करुण विलाप करके अपनी सोती हुई पत्नीको छोड़कर शीघ्रतासे चले गये ॥ २८ ॥

नष्टात्मा कलिना स्पृष्टस्तत् तद् विगणयन् नृपः ।

जगामैकां वने शून्ये भार्यामुत्सृज्य दुःखितः ॥ २ ९ ॥

कलियुगके स्पर्शसे उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी थी; अतः वे अत्यन्त दुःखी हो विभिन्न बातोंका विचार करते हुए उस सूने वनमें अपनी पत्नीको अकेली छोड़कर चल दिये ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीपरित्यागे द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें दमयन्तीपरित्यागविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥

पृष्ठ 438

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त्रिषष्टितमोऽध्यायः दमयन्तीका विलाप तथा अजगर एवं व्याधसे उसके प्राण एवं सतीत्वकी रक्षा तथा दमयन्तीके पातिव्रत्यधर्मके प्रभावसे व्याधका विनाश बृहदश्वउवाच

अपक्रान्ते नले राजन् दमयन्ती गतक्लमा ।

अबुध्यत वरारोहा संत्रस्ता विजने वने ॥ १ ॥

अपश्यमाना भर्तारं शोकदुःखसमन्विता ।

प्राक्रोशदुच्चैः संत्रस्ता महाराजेति नैषधम् ॥ २ ॥

बृहदश्व मुनि कहते हैं - राजन्! नलके चले जानेपर जब दमयन्तीकी थकावट दूर हो गयी, तब उसकी आँख खुली । उस निर्जन वनमें अपने स्वामीको न देखकर सुन्दरी दमयन्ती भयातुर और दुःख- शोकसे व्याकुल हो गयी । उसने भयभीत होकर निषधनरेश नलको ‘ महाराज! आप कहाँ हैं? ' यह कहकर बड़े जोरसे पुकारा ॥ १-२ ॥

हा नाथ हा महाराज हा स्वामिन् किं जहासि माम् ।

हा हतास्मि विनष्टास्मि भीतास्मि विजने वने ॥ ३ ॥

‘ हा नाथ! हा महाराज! हा स्वामिन्! आप मुझे क्यों त्याग रहे हैं? हाय! मैं मारी गयी, नष्ट हो गयी, इस जनशून्य वनमें मुझे बड़ा भय लग रहा है ॥ ३ ॥

ननु नाम महाराज धर्मज्ञः सत्यवागसि ।

कथमुक्त्वा तथा सत्यं सुप्तामुत्सृज्य कानने ॥ ४ ॥

‘ महाराज! आप तो धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं; फिर वैसी सच्ची प्रतिज्ञा करके आज आप इस जंगलमें मुझे सोती छोड़कर कैसे चले गये? ॥ ४ ॥

कथमुत्सृज्य गन्तासि दक्षां भार्यामनुव्रताम् ।

विशेषतोऽनपकृते परेणापकृते सति ॥ ५ ॥

' मैं आपकी सेवामें कुशल और अनुरक्त भार्या हूँ । विशेषतः मेरे द्वारा आपका कोई अपराध भी नहीं हुआ है । यदि कोई अपराध हुआ है, तो वह दूसरेके ही द्वारा, मुझसे नहीं; तो भी आप मुझे त्यागकर क्यों चले जा रहे हैं? ॥ ५ ॥

शक्यसे ता गिरः सम्यक् कर्तुं मयि नरेश्वर ।

यास्तेषां लोकपालानां संनिधौ कथिताः पुरा ॥ ६ ॥

‘ नरेश्वर! आपने पहले स्वयंवरसभामें उन लोकपालोंके निकट जो बातें कहीं थीं, क्या आप उन्हें आज मेरे प्रति सत्य सिद्ध कर सकेंगे? ॥ ६ ॥

पृष्ठ 439

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नाकाले विहितो मृत्युर्मर्त्यानां पुरुषर्षभ ।

तत्र कान्ता त्वयोत्सृष्टा मुहूर्तमपि जीवति ॥ ७ ॥

‘ पुरुषशिरोमणे! मनुष्योंकी मृत्यु असमयमें नहीं होती, तभी तो आपकी यह प्रियतमा आपसे परित्यक्त होकर दो घड़ी भी जी रही है ॥ ७ ॥

पर्याप्तः परिहासोऽयमेतावान् पुरुषर्षभ ।

भीताहमतिदुर्धर्ष दर्शयात्मानमीश्वर ॥ ८ ॥

' पुरुषश्रेष्ठ! यहाँ इतना ही परिहास बहुत है। अत्यन्त दुर्धर्ष वीर! मैं बहुत डर गयी हूँ । प्राणेश्वर! अब मुझे अपना दर्शन दीजिये ॥ ८ ॥

दृश्यसे दृश्यसे राजन्नेष दृष्टोऽसि नैषध ।

आवार्य गुल्मैरात्मानं किं मां न प्रतिभाषसे ॥ ९ ॥

‘ राजन्! निषधनरेश! आप दीख रहे हैं, दीख रहे हैं, यह दिखायी दिये । लताओंद्वारा अपनेको छिपाकर आप मुझसे बात क्यों नहीं कर रहे हैं? ॥ ९ ॥

नृशंसं बत राजेन्द्र यन्मामेवंगतामिह ।

विलपन्तीं समागम्य नाश्वासयसि पार्थिव ॥ १० ॥

‘ राजेन्द्र! मैं इस प्रकार भय और चिन्तामें पड़कर यहाँ विलाप कर रही हूँ और आप आकर आश्वासन भी नहीं देते! भूपाल! यह तो आपकी बड़ी निर्दयता है ॥ १० ॥

न शोचाम्यहमात्मानं न चान्यदपि किंचन ।

कथं नु भवितास्येक इति त्वां नृप शोचिमि ॥ ११ ॥

‘ नरेश्वर! मैं अपने लिये शोक नहीं करती । मुझे दूसरी किसी बातका भी शोक नहीं है । मैं केवल आपके लिये शोक कर रही हूँ कि आप अकेले कैसी शोचनीय दशामें पड़ जायँगे! ॥ ११ ॥

कथं नु राजंस्तृषितः क्षुधितः श्रमकर्षितः ।

सायाह्ने वृक्षमूलेषु मामपश्यन् भविष्यसि ॥ १२ ॥

' राजन्! आप भूखे - प्यासे और परिश्रमसे थके - माँदे होकर जब सायंकाल किसी वृक्षके नीचे आकर विश्राम करेंगे, उस समय मुझे अपने पास न देखकर आपकी कैसी दशा हो जायगी? ' ॥ १२ ॥

ततः सा तीव्रशोकार्ता प्रदीप्तेव च मन्युना ।

इतश्चेतश्च रुदती पर्यधावत दुःखिता ॥ १३ ॥

तदनन्तर प्रचण्ड शोकसे पीड़ित हो क्रोधाग्निसे दग्ध होती हुई- सी दमयन्ती अत्यन्त दुःखी हो रोने और इधर- उधर दौड़ने लगी ॥ १३ ॥

मुहुरुत्पतते बाला मुहुः पतति विह्वला ।

मुहुरालीयते भीता मुहुः क्रोशति रोदिति ॥ १४ ॥

पृष्ठ 440

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दमयन्ती बार- बार उठती और बार- बार विह्वल होकर गिर पड़ती थी । वह कभी भयभीत होकर छिपती और कभी जोर- जोरसे रोने - चिल्लाने लगती थी ॥ १४ ॥

अतीव शोकसंतप्ता मुहुर्निःश्वस्य विह्वला ।

उवाच भैमी निःश्वस्य रुदत्यथ पतिव्रता ॥ १५ ॥

अत्यन्त शोकसंतप्त हो बार- बार लंबी साँसें खींचती हुई व्याकुल पतिव्रता दमयन्ती दीर्घ निःश्वास लेकर रोती हुई बोली- ॥ १५ ॥

यस्याभिशापाद् दुःखार्तो दुःखं विन्दति नैषधः ।

तस्य भूतस्य नो दुःखाद् दुःखमप्यधिकं भवेत् ॥ १६ ॥

‘ जिसके अभिशापसे निषधनरेश नल दुःखसे पीड़ित हो क्लेश- पर- क्लेश उठाते जा रहे हैं, उस प्राणीको हमलोगोंके दुःखसे भी अधिक दुःख प्राप्त हो ॥ १६ ॥

अपापचेतसं पापो य एवं कृतवान् नलम् ।

तस्माद् दुःखतरं प्राप्य जीवत्वसुखजीविकाम् ॥ १७ ॥

‘जिस पापीने पुण्यात्मा राजा नलको इस दशामें पहुँचाया है, वह उनसे भी भारी दुःखमें पड़कर दुःखकी ही जिंदगी बितावे ' ॥ १७ ॥

एवं तु विलपन्ती सा राज्ञो भार्या महात्मनः ।

अन्वेषमाणा भर्तारं वने श्वापदसेविते ॥ १८ ॥

उन्मत्तवद् भीमसुता विलपन्ती इतस्ततः ।

हा हा राजन्निति मुहुरितश्चेतश्च धावति ॥ १ ९ ॥

इस प्रकार विलाप करती तथा हिंस्र जन्तुओंसे भरे हुए वनमें अपने पतिको ढूँढ़ती हुई महामना राजा नलकी पत्नी भीमकुमारी दमयन्ती उन्मत्त हुई रोती- बिलखती और ‘ हा राजन्! हा महाराज ' ऐसा बार- बार कहती हुई इधर -उधर दौड़ने लगी ॥ १८-१९ ॥

तां क्रन्दमानामत्यर्थं कुररीमिव वाशतीम् ।

करुणं बहु शोचन्तीं विलपन्तीं मुहुर्मुहुः ॥ २० ॥

सहसाभ्यागतां भैमीमभ्याशपरिवर्तिनीम् ।

जग्राहाजगरो ग्राहो महाकायः क्षुधान्वितः ॥ २१ ॥

वह कुररी पक्षीकी भाँति जोर- जोरसे करुण क्रन्दन कर रही थी और अत्यन्त शोक करती हुई बार- बार विलाप कर रही थी । वहाँसे थोड़ी ही दूरपर एक विशालकाय भूखा अजगर बैठा था । उसने बार- बार चक्कर लगाती सहसा निकट आयी हुई भीमकुमारी दमयन्तीको ( पैरोंकी ओरसे ) निगलना आरम्भ कर दिया ॥ २०-२१ ॥

सा ग्रस्यमाना ग्राहेण शोकेन च परिप्लुता ।

नात्मानं शोचति तथा यथा शोचति नैषधम् ॥ २२ ॥

शोकमें डूबी हुई वैदर्भीको अजगर निगल रहा था, तो भी वह अपने लिये उतना शोक नहीं कर रही थी, जितना शोक उसे निषधनरेश नलके लिये था ॥ २२ ॥