02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 451–460

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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भवान् मृगाणामधिपस्त्वमस्मिन् कानने प्रभुः ॥ ३२ ॥

वह वनका राजा कान्तिमान् सिंह मेरे सामने चला आ रहा है, इसके चार दाढ़ें और विशाल ठोड़ी है । मैं निःशंक होकर इसके सामने जा रही हूँ और कहती हूँ, ‘ आप मृगोंके राजा और इस वनके स्वामी हैं ॥ ३१-३२ ॥

विदर्भराजतनयां दमयन्तीति विद्धि माम् ।

निषधाधिपतेर्भार्यां नलस्यामित्रघातिनः ॥ ३३ ॥

' मैं विदर्भराजकुमारी दमयन्ती हूँ। मुझे शत्रुघाती निषधनरेश नलकी पत्नी समझिये ॥ ३३ ॥

पतिमन्वेषतीमेकां कृपणां शोककर्षिताम् ।

आश्वासय मृगेन्द्रेह यदि दृष्टस्त्वया नलः ॥ ३४ ॥

' मृगेन्द्र! मैं इस वनमें अकेली पतिकी खोजमें भटक रही हूँ तथा शोकसे पीड़ित एवं दीन हो रही हूँ । यदि आपने नलको यहाँ कहीं देखा हो तो उनका कुशल- समाचार बताकर मुझे आश्वासन दीजिये ॥ ३४ ॥

अथवा त्वं वनपते नलं यदि न शंससि ।

मां खादय मृगश्रेष्ठ दुःखादस्माद् विमोचय ॥ ३५ ॥

‘ अथवा वनराज मृगश्रेष्ठ! यदि आप नलके विषयमें कुछ नहीं बताते हैं तो मुझे खा जायँ और इस दुःखसे छुटकारा दे दें ' ॥ ३५ ॥

श्रुत्वारण्ये विलपितं न मामाश्वासयत्ययम् ।

यात्येतां स्वादुसलिलामापगां सागरंगमाम् ॥ ३६ ॥

अहो! इस घोर वनमें मेरा विलाप सुनकर भी यह सिंह मुझे सान्त्वना नहीं देता । यह तो स्वादिष्ट जलसे भरी हुई इस समुद्रगामिनी नदीकी ओर जा रहा है ॥

इमं शिलोच्चयं पुण्यं शृङ्गैर्बहुभिरुच्छ्रितैः ।

विराजद्भिरिवानेकैर्नैकवर्णैर्मनोरमैः ॥ ३७ ॥

अच्छा, इस पवित्र पर्वतसे ही पूछती हूँ । यह बहुत- से ऊँचे - ऊँचे शोभाशाली बहुरंगे एवं मनोरम शिखरोंद्वारा सुशोभित है ॥ ३७ ॥

नानाधातुसमाकीर्णं विविधोपलभूषितम् ।

अस्यारण्यस्य महतः केतुभूतमिवोत्थितम् ॥ ३८ ॥

अनेक प्रकारके धातुओंसे व्याप्त और भाँति- भाँतिके शिला- खण्डोंसे विभूषित है । यह पर्वत इस महान् वनकी ऊपर उठी हुई पताकाके समान जान पड़ता है ॥ ३८ ॥

सिंहशार्दूलमातङ्गवराहर्क्षमृगायुतम् ।

पतत्त्रिभिर्बहुविधैः समन्तादनुनादितम् ॥ ३ ९ ॥

यह सिंह, व्याघ्र, हाथी, सूअर, रीछ और मृगोंसे परिपूर्ण है । इसके चारों ओर अनेक प्रकारके पक्षी कलरव कर रहे हैं ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 452

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किंशुकाशोकबकुलपुन्नागैरुपशोभितम् ।

कर्णिकारधवप्लक्षैः सुपुष्पैरुपशोभितम् ॥ ४० ॥

पलाश, अशोक, बकुल, पुन्नाग, कनेर, धव तथा प्लक्ष आदि सुन्दर फूलोंवाले वृक्षोंसे वह पर्वत सुशोभित हो रहा है ॥ ४० ॥

सरिद्भिः सविहङ्गाभिः शिखरैश्च समाकुलम् ।

गिरिराजमिमं तावत् पृच्छामि नृपतिं प्रति ॥ ४१ ॥

यह पर्वत अनेक सरिताओं, सुन्दर पक्षियों और शिखरोंसे परिपूर्ण है । अब मैं इसी गिरिराजसे महाराज नलका समाचार पूछती हूँ ॥ ४१ ॥

भगवन्नचलश्रेष्ठ दिव्यदर्शन विश्रुत ।

शरण्य बहुकल्याण नमस्तेऽस्तु महीधर ॥ ४२ ॥

‘ भगवन्! अचलप्रवर! दिव्य दृष्टिवाले! विख्यात! सबको शरण देनेवाले परम कल्याणमय महीधर! आपको नमस्कार है ॥ ४२ ॥

प्रणमाम्यभिगम्याहं राजपुत्रीं निबोध माम् ।

राज्ञः स्नुषां राजभार्यां दमयन्तीति विश्रुताम् ॥ ४३ ॥

‘ मैं निकट आकर आपके चरणोंमें प्रणाम करती हूँ। आप मेरा परिचय इस प्रकार जानें, मैं राजाकी पुत्री, राजाकी पुत्रवधू तथा राजाकी ही पत्नी हूँ । मेरी ' दमयन्ती' नामसे प्रसिद्धि ॥ ४३ ॥

राजा विदर्भाधिपतिः पिता मम महारथः ।

भीमो नाम क्षितिपतिश्चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता ॥ ४४ ॥

‘विदर्भदेशके स्वामी महारथी भीम नामक राजा मेरे पिता हैं । वे पृथ्वीके पालक तथा चारों वर्णोंके रक्षक हैं ॥ ४४ ॥

राजसूयाश्वमेधानां क्रतूनां दक्षिणावताम् ।

आहर्ता पार्थिवश्रेष्ठः पृथुचार्वञ्चितेक्षणः ॥ ४५ ॥

‘ उन्होंने ( प्रचुर) दक्षिणावाले राजसूय तथा अश्वमेध नामक यज्ञोंका अनुष्ठान किया है ।

वे भूमिपालोंमें श्रेष्ठ हैं । उनके नेत्र बड़े, चंचल और सुन्दर हैं ॥ ४५ ॥

ब्रह्मण्यः साधुवृत्तश्च सत्यवागनसूयकः ।

शीलवान् वीर्यसम्पन्नः पृथुश्रीर्धर्मविच्छुचिः ॥ ४६ ॥

‘ वे ब्राह्मणभक्त, सदाचारी, सत्यवादी, किसीके दोषको न देखनेवाले, शीलवान्, पराक्रमी, प्रचुर सम्पत्तिके स्वामी, धर्मज्ञ तथा पवित्र हैं ॥ ४६ ॥

सम्यग् गोप्ता विदर्भाणां निर्जितारिगणः प्रभुः ।

तस्य मां विद्धि तनयां भगवंस्त्वामुपस्थिताम् ॥ ४७ ॥

‘ वे विदर्भदेशकी जनताका अच्छी तरह पालन करनेवाले हैं । उन्होंने समस्त शत्रुओंको जीत लिया है, वे बड़े शक्तिशाली हैं । भगवन्! मुझे उन्हींकी पुत्री जानिये। मैं आपकी सेवामें

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(एक जिज्ञासा लेकर) उपस्थित हुई हूँ ॥ ४७ ॥

निषधेषु महाराजः श्वशुरो मे नरोत्तमः ।

गृहीतनामा विख्यातो वीरसेन इति स्म ह ॥ ४८ ॥

‘ निषधदेशके महाराज मेरे श्वशुर थे, वे प्रातः -स्मरणीय नरश्रेष्ठ वीरसेनके नामसे विख्यात थे ॥ ४८ ॥

तस्य राज्ञः सुतो वीरः श्रीमान् सत्यपराक्रमः ।

क्रमप्राप्तं पितुः स्वं यो राज्यं समनुशास्ति ह ॥ ४ ९ ॥

‘ उन्हीं महाराज वीरसेनके एक वीर पुत्र हैं, जो बड़े ही सुन्दर और सत्यपराक्रमी हैं । वे वंशपरम्परासे प्राप्त अपने पिताके राज्यका पालन करते हैं ॥ ४ ९ ॥

नलो नामारिहा श्यामः पुण्यश्लोक इति श्रुतः ।

ब्रह्मण्यो वेदविद् वाग्मी पुण्यकृत् सोमपोऽग्निमान् ॥ ५० ॥

‘उनका नाम नल है । शत्रुदमन, श्यामसुन्दर राजा नल पुण्यश्लोक कहे जाते हैं । वे बड़े ब्राह्मणभक्त, वेदवेत्ता, वक्ता, पुण्यात्मा, सोमपान करनेवाले और अग्निहोत्री हैं ॥ ५० ॥

यष्टा दाता च योद्धा च सम्यक् चैव प्रशासिता ।

तस्य मामबलां श्रेष्ठां विद्धि भार्यामिहागताम् ॥ ५१ ॥

त्यक्तश्रियं भर्तृहीनामनाथां व्यसनान्विताम् ।

अन्वेषमाणां भर्तारं त्वं मां पर्वतसत्तम ॥ ५२ ॥

‘ वे एक अच्छे यज्ञकर्ता, उत्तम दाता, शूरवीर योद्धा और श्रेष्ठ शासक हैं, आप मुझे उन्हींकी श्रेष्ठ पत्नी समझ लीजिये । मैं अबला नारी आपके निकट यहाँ उन्हींकी कुशल पूछनेके लिये आयी हूँ। गिरिराज! ( मेरे स्वामी मुझे छोड़कर कहीं चले गये हैं । ) मैं धन- सम्पत्तिसे वंचित, पतिदेवसे रहित, अनाथ और संकटोंकी मारी हुई हूँ । इस वनमें अपने पतिकी ही खोज कर रही हूँ ॥ ५१-५२ ॥

समुल्लिखद्भिरेतैर्हि त्वया शृङ्गशतैर्नृपः ।

कच्चिद् दृष्टोऽचलश्रेष्ठ वनेऽस्मिन् दारुणे नलः ॥ ५३ ॥

‘ पर्वतश्रेष्ठ! क्या आपने इन सैकड़ों गगनचुम्बी शिखरोंद्वारा इस भयानक वनमें कहीं राजा नलको देखा है? ॥ ५३ ॥

गजेन्द्रविक्रमो धीमान् दीर्घबाहुरमर्षणः ।

विक्रान्तः सत्त्ववान् वीरो भर्ता मम महायशाः ॥ ५४ ॥

निषधानामधिपतिः कच्चिद् दृष्टस्त्वया नलः ।

विलपतीं किमेकां मां पर्वतश्रेष्ठ विह्वलाम् ॥ ५५ ॥

गिरा नाश्वासयस्यद्य स्वां सुतामिव दुःखिताम् ।

पृष्ठ 454

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' मेरे महायशस्वी स्वामी निषधराज नल गजराजकी - सी चालसे चलते हैं । वे बड़े बुद्धिमान्, महाबाहु, अमर्षशील (दुःखको न सह सकनेवाले ), पराक्रमी, धैर्यवान् तथा वीर हैं । क्या आपने कहीं उन्हें देखा है? गिरिश्रेष्ठ! मैं आपकी पुत्रीके समान हूँ और ( पतिके वियोगसे बहुत ही) दुःखी हूँ । क्या आप व्याकुल होकर अकेली विलाप करती हुई मुझ अबलाको आज अपनी वाणीद्वारा आश्वासन न देंगे? ' ॥ ५४-५५३ ॥ वीर विक्रान्त धर्मज्ञ सत्यसंध महीपते ॥ ५६ ॥

यद्यस्यस्मिन् वने राजन् दर्शयात्मानमात्मना । वीर! धर्मज्ञ! सत्यप्रतिज्ञ और पराक्रमी महीपाल! यदि आप इसी वनमें हैं तो राजन्! अपने - आपको प्रकट करके मुझे दर्शन दीजिये ॥ ५६३ ॥

कदा सुस्निग्धगम्भीरां जीमूतस्वनसंनिभाम् ॥ ५७ ॥

श्रोष्यामि नैषधस्याहं वाचं ताममृतोपमाम् ।

वैदर्भीत्येव विस्पष्टां शुभां राज्ञो महात्मनः ॥ ५८ ॥

आम्नायसारिणीमृद्धां मम शोकविनाशिनीम् । मैं कब निषधराज नलकी मेघ गर्जनाके समान स्निग्ध, गम्भीर, अमृतोपम वह मधुर वाणी सुनूँगी । उन महामना राजाके मुखसे ' वैदर्भि! ' इस सम्बोधनसे युक्त शुभ, स्पष्ट, वेदके अनुकूल, सुन्दर पद और अर्थसे युक्त तथा मेरे शोकका विनाश करनेवाली वाणी मुझे कब सुनायी देगी ॥ ५७-५८ ॥ भीतामाश्वासयत मां नृपते धर्मवत्सल ॥ ५ ९ ॥ धर्मवत्सल नरेश्वर! मुझ भयभीत अबलाको आश्वासन दीजिये ॥ ५ ९ ॥

इति सा तं गिरिश्रेष्ठमुक्त्वा पार्थिवनन्दिनी ।

दमयन्ती ततो भूयो जगाम दिशमुत्तराम् ॥ ६० ॥

इस प्रकार उस श्रेष्ठ पर्वतसे कहकर वह राजकुमारी दमयन्ती फिर वहाँसे उत्तर दिशाकी ओर चल दी ॥ ६० ॥

सा गत्वा त्रीनहोरात्रान् ददर्श परमाङ्गना ।

तापसारण्यमतुलं दिव्यकाननशोभितम् ॥ ६१ ॥

लगातार तीन दिन और तीन रात चलनेके पश्चात् उस श्रेष्ठ नारीने तपस्वियोंसे युक्त एक वन देखा, जो अनुपम तथा दिव्य वनसे सुशोभित था ॥ ६१ ॥

वसिष्ठभृग्वत्रिसमैस्तापसैरुपशोभितम् ।

नियतैः संयताहारैर्दमशैचसमन्वितैः ॥ ६२ ॥

तथा वसिष्ठ, भृगु और अत्रिके समान नियम- परायण, मिताहारी तथा ( शम, ) दम, शौच आदिसे सम्पन्न तपस्वियोंसे वह शोभायमान हो रहा था ॥ ६२ ॥

अब्भक्षैर्वायुभक्षैश्च पत्राहारैस्तथैव च ।

जितेन्द्रियैर्महाभागैः स्वर्गमार्गदिदृक्षुभिः ॥ ६३ ॥

पृष्ठ 455

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वहाँ कुछ तपस्वीलोग केवल जल पीकर रहते थे और कुछ लोग वायु पीकर । कितने ही केवल पत्ते चबाकर रहते थे । वे जितेन्द्रिय महाभाग स्वर्गलोकके मार्गका दर्शन करना चाहते थे ॥ ६३ ॥

वल्कलाजिनसंवीतैर्मुनिभिः संयतेन्द्रियैः ।

तापसाध्युषितं रम्यं ददर्शाश्रममण्डलम् ॥ ६४ ॥

वल्कल और मृगचर्म धारण करनेवाले उन जितेन्द्रिय मुनियोंसे सेवित एक रमणीय आश्रममण्डल दिखायी दिया, जिसमें प्रायः तपस्वीलोग ही निवास करते थे ॥ ६४ ॥

नानामृगगणैर्जुष्टं शाखामृगगणायुतम् ।

तापसैः समुपेतं च सा दृष्ट्वैव समाश्वसत् ॥ ६५ ॥

उस आश्रममें नाना प्रकारके मृगों और वानरोंके समुदाय भी विचरते रहते थे । तपस्वी महात्माओंसे भरे हुए उस आश्रमको देखते ही दमयन्तीको बड़ी सान्त्वना मिली ॥ ६५ ॥

सुभ्रूः सुकेशी सुश्रोणी सुकुचा सुद्विजानना ।

वर्चस्विनी सुप्रतिष्ठा स्वसितायतलोचना ॥ ६६ ॥

उसकी भौंहें बड़ी सुन्दर थीं । केश मनोहर जान पड़ते थे । नितम्बभाग, स्तन, दन्तपंक्ति और मुख सभी सुन्दर थे । उसके मनोहर कजरारे नेत्र विशाल थे । वह तेजस्विनी और प्रतिष्ठित थी ॥ ६६ ॥

सा विवेशाश्रमपदं वीरसेनसुतप्रिया ।

योषिद्रत्नं महाभागा दमयन्ती तपस्विनी ॥ ६७ ॥

महाराज वीरसेनकी पुत्रवधू रमणीशिरोमणि महाभागा तपस्विनी उस दमयन्तीने आश्रमके भीतर प्रवेश किया ॥ ६७ ॥

साभिवाद्य तपोवृद्धान् विनयावनता स्थिता ।

स्वागतं त इति प्रोक्ता तैः सर्वैस्तापसोत्तमैः ॥ ६८ ॥

वहाँ तपोवृद्ध महात्माओंको प्रणाम करके वह उनके समीप विनीतभावसे खड़ी हो गयी । तब वहाँके सभी श्रेष्ठ तपस्वीजनोंने उससे कहा – ' देवि! तुम्हारा स्वागत है ' ॥ ६८ ॥

पूजां चास्या यथान्यायं कृत्वा तत्र तपोधनाः ।

आस्यतामित्यथोचुस्ते ब्रूहि किं करवामहे ॥ ६ ९ ॥

तदनन्तर वहाँ दमयन्तीका यथोचित आदर- सत्कार करके उन तपोधनोंने कहा — ' शुभे! बैठो, बताओ, हम तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करें' ॥ ६ ९ ॥

तानुवाच वरारोहा कच्चिद् भगवतामिह ।

तपःस्वग्निषु धर्मेषु मृगपक्षिषु चानघाः ॥ ७० ॥

कुशलं वो महाभागाः स्वधर्माचरणेषु च ।

तैरुक्ता कुशलं भद्रे सर्वत्रेति यशस्विनि ॥ ७१ ॥

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महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 456 का मूल पृष्ठ
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उस समय सुन्दर अंगोंवाली दमयन्तीने उनसे कहा– ' भगवन्! निष्पाप महाभागगण! यहाँ तप, अग्निहोत्र, धर्म, मृग और पक्षियोंके पालन तथा अपने धर्मके आचरण आदि विषयोंमें आपलोग सकुशल हैं न? ' तब उन महात्माओंने कहा- ' भद्रे! यशस्विनि! सर्वत्र कुशल है ॥ ७०-७१ ॥

ब्रूहि सर्वानवद्याङ्गि का त्वं किं च चिकीर्षसि ।

दृष्ट्वैव ते परं रूपं द्युतिं च परमामिह ॥ ७२ ॥

विस्मयो नः समुत्पन्नः समाश्वसिहि मा शुचः ।

अस्यारण्यस्य देवी त्वमुताहोऽस्य महीभृतः ॥ ७३ ॥

‘ सर्वांगसुन्दरी! बताओ, तुम कौन हो और क्या करना चाहती हो? तुम्हारे उत्तम रूप और परम सुन्दर कान्तिको यहाँ देखकर हमें बड़ा विस्मय हो रहा है । धैर्य धारण करो, शोक न करो । तुम इस वनकी देवी हो या इस पर्वतकी अधिदेवता ॥ ७२-७३ ॥

अस्याश्च नद्याः कल्याणि वद सत्यमनिन्दिते ।

साब्रवीत् तानृषीन् नाहमरण्यस्यास्य देवता ॥ ७४ ॥

न चाप्यस्य गिरेर्विप्रा नैव नद्याश्च देवता ।

मानुषीं मां विजानीत यूयं सर्वे तपोधनाः ॥ ७५ ॥

‘ अनिन्दिते! कल्याणि! अथवा तुम इस नदीकी अधिष्ठात्री देवी हो, सच- सच बताओ । ' दमयन्तीने उन ऋषियोंसे कहा — ' तपस्याके धनी ब्राह्मणो! न तो मैं इस वनकी देवी हूँ, न पर्वतकी अधिदेवता और न इस नदीकी ही देवी हूँ । आप सब लोग मुझे मानवी समझें ॥ ७४-७५ ॥

विस्तरेणाभिधास्यामि तन्मे शृणुत सर्वशः ।

विदर्भेषु महीपालो भीमो नाम महीपतिः ॥ ७६ ॥

' मैं विस्तारपूर्वक अपना परिचय दे रही हूँ, आपलोग सुनें । विदर्भदेशमें भीम नामसे प्रसिद्ध एक भूमिपाल हैं ॥ ७६ ॥

तस्य मां तनयां सर्वे जानीत द्विजसत्तमाः ।

निषधाधिपतिर्धीमान् नलो नाम महायशाः ॥ ७७ ॥

वीरः संग्रामजिद् विद्वान् मम भर्ता विशाम्पतिः ।

देवताभ्यर्चनपरो द्विजातिजनवत्सलः ॥ ७८ ॥

'द्विजवरो! आप सब महात्मा जान लें, मैं उन्हीं महाराजकी पुत्री हूँ । निषधदेशके स्वामी, संग्रामविजयी, वीर, विद्वान्, बुद्धिमान्, प्रजापालक महायशस्वी राजा नल मेरे पति हैं । वे देवताओंके पूजनमें संलग्न रहते हैं और ब्राह्मणोंके प्रति उनके हृदयमें बड़ा स्नेह है ॥ ७७-७८ ॥

गोप्ता निषधवंशस्य महातेजा महाबलः ।

सत्यवान् धर्मवित् प्राज्ञः सत्यसंधोऽरिमर्दनः ॥ ७९ ॥

पृष्ठ 457

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ब्रह्मण्यो दैवतपरः श्रीमान् परपुरंजयः ।

नलो नाम नृपश्रेष्ठो देवराजसमद्युतिः ॥ ८० ॥

मम भर्ता विशालाक्षः पूर्णेन्दुवदनोऽरिहा ।

आहर्ता क्रतुमुख्यानां वेदवेदाङ्गपारगः ॥ ८१ ॥

' वे निषधकुलके रक्षक, महातेजस्वी, महाबली, सत्यवादी, धर्मज्ञ, विद्वान्, सत्यप्रतिज्ञ, शत्रुमर्दन, ब्राह्मणभक्त, देवोपासक, शोभा और सम्पत्तिसे युक्त तथा शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले हैं । मेरे स्वामी नृपश्रेष्ठ नल देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी हैं । उनके नेत्र विशाल हैं, उनका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान सुन्दर है, वे शत्रुओंका संहार करनेवाले, बड़े-बड़े यज्ञोंके आयोजक और वेद - वेदांगोंके पारंगत विद्वान् हैं ॥ ७ ९ -८१ ॥

सपत्नानां मृधे हन्ता रविसोमसमप्रभः ।

स कैश्चिन्निकृतिप्रज्ञैरनार्यैरकृतात्मभिः ॥ ८२ ॥

आहूय पृथिवीपालः सत्यधर्मपरायणः ।

देवने कुशलैर्जिज्ञैर्हृतं राज्यं वसूनि च ॥ ८३ ॥

' युद्धमें उन्होंने कितने ही शत्रुओंका संहार किया है । वे सूर्य और चन्द्रमाके समान तेजस्वी और कान्तिमान् हैं । एक दिन कुछ कपटकुशल, अजितेन्द्रिय, अनार्य, कुटिल तथा द्यूतनिपुण जुआरिओंने उन सत्य - धर्मपरायण महाराज नलको जूएके लिये आवाहन करके उनके सारे राज्य और धनका अपहरण कर लिया ॥

तस्य मामवगच्छध्वं भार्यां राजर्षभस्य वै ।

दमयन्तीति विख्यातां भर्तुर्दर्शनलालसाम् ॥ ८४ ॥

' आप दमयन्ती नामसे विख्यात मुझे उन्हीं नृपश्रेष्ठ नलकी पत्नी जानें । मैं अपने स्वामीके दर्शनके लिये उत्सुक हो रही हूँ ॥ ८४ ॥

सा वनानि गिरींश्चैव सरांसि सरितस्तथा ।

पल्वलानि च सर्वाणि तथारण्यानि सर्वशः ॥ ८५ ॥

अन्वेषमाणा भर्तारं नलं रणविशारदम् ।

महात्मानं कृतास्त्रं च विचरामीह दुःखिता ॥ ८६ ॥

‘ मेरे पति महामना नल युद्धकलामें कुशल और सम्पूर्ण अस्त्र- शस्त्रोंके विद्वान् हैं । मैं उन्हींकी खोज करती हुई वन, पर्वत, सरोवर, नदी, गड्ढे और सभी जंगलोंमें दुःखी होकर घूमती हूँ ॥ ८५-८६ ॥

कच्चिद् भगवतां रम्यं तपोवनमिदं नृपः ।

भवेत् प्राप्तो नलो नाम निषधानां जनाधिपः ॥ ८७ ॥

यत्कृतेऽहमिदं ब्रह्मन् प्रपन्ना भृशदारुणम् ।

वनं प्रतिभयं घोरं शार्दूलमृगसेवितम् ॥ ८८ ॥

पृष्ठ 458

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 458 का मूल पृष्ठ
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‘ भगवन्! क्या आपके इस रमणीय तपोवनमें निषधनरेश नल आये थे? ब्रह्मन्! जिनके लिये मैं व्याघ्र, सिंह आदि पशुओंसे सेवित अत्यन्त दारुण, भयंकर, घोर वनमें आयी हूँ ॥ ८७-८८ ॥

यदि कैश्चिदहोरात्रैर्न द्रक्ष्यामि नलं नृपम् ।

आत्मानं श्रेयसा योक्ष्ये देहस्यास्य विमोचनात् ॥ ८ ९ ॥

‘ यदि कुछ ही दिन - रातमें मैं राजा नलको नहीं देखूँगी तो इस शरीरका परित्याग करके आत्माका कल्याण करूँगी ॥ ८ ९ ॥

को नु मे जीवितेनार्थस्तमृते पुरुषर्षभम् ।

कथं भविष्याम्यद्याहं भर्तृशोकाभिपीडिता ॥ ९ ० ॥

'उन पुरुषरत्न नलके बिना जीवन धारण करनेसे मेरा क्या प्रयोजन है? अब मैं पतिशोकसे पीड़ित होकर न जाने कैसी हो जाऊँगी? ' ॥ ९ ० ॥

तथा विलपतीमेकामरण्ये भीमनन्दिनीम् ।

दमयन्तीमथोचुस्ते तापसाः सत्यदर्शिनः ॥ ९ १ ॥

इस प्रकार वनमें अकेली विलाप करती हुई भीमनन्दिनी दमयन्तीसे सत्यका दर्शन करनेवाले उन तपस्वियोंने कहा- ॥ ९ १ ॥

उदर्कस्तव कल्याणि कल्याणो भविता शुभे ।

वयं पश्याम तपसा क्षिप्रं द्रक्ष्यसि नैषधम् ॥ ९ २ ॥

‘ कल्याणि! शुभे! हम अपने तपोबलसे देख रहे हैं, तुम्हारा भविष्य परम कल्याणमय होगा । तुम शीघ्र ही निषधनरेश नलका दर्शन प्राप्त करोगी ॥ ९ २ ॥

निषधानामधिपतिं नलं रिपुनिपातिनम् ।

भैमि धर्मभृतां श्रेष्ठं द्रक्ष्यसे विगतज्वरम् ॥ ९ ३ ॥

' भीमकुमारी! तुम शत्रुओंका संहार करनेवाले निषधदेशके अधिपति और धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा नलको सब प्रकारकी चिन्ताओंसे रहित देखोगी ॥ ९ ३ ॥

विमुक्तं सर्वपापेभ्यः सर्वरत्नसमन्वितम् ।

तदेव नगरं श्रेष्ठं प्रशासतमरिंदमम् ॥ ९ ४ ॥

द्विषतां भयकर्तारं सुहृदां शोकनाशनम् ।

पति द्रक्ष्यसि कल्याणि कल्याणाभिजनं नृपम् ॥ ९ ५ ॥

' तुम्हारे पति सब प्रकारके पापजनित दुखोंसे मुक्त और सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न होंगे । शत्रुदमन राजा नल फिर उसी श्रेष्ठ नगरका शासन करेंगे । वे शत्रुओंके लिये भयदायक और सुहृदोंके लिये शोकका नाश करनेवाले होंगे । कल्याणि! इस प्रकार सत्कुलमें उत्पन्न अपने पतिको तुम ( नरेशके पदपर प्रतिष्ठित) देखोगी' ॥ ९ ४ - ९ ५ ॥

एवमुक्त्वा नलस्येष्टां महिषीं पार्थिवात्मजाम् ।

अन्तर्हितास्तापसास्ते साग्निहोत्राश्रमास्तथा ॥ ९ ६ ॥

पृष्ठ 459

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नलकी प्रियतमा महारानी राजकुमारी दमयन्तीसे ऐसा कहकर वे सभी तपस्वी अग्निहोत्र और आश्रमसहित अदृश्य हो गये ॥ ९ ६ ॥

सा दृष्ट्वा महदाश्चर्यं विस्मिता ह्यभवत् तदा ।

दमयन्त्यनवद्याङ्गी वीरसेननृपस्नुषा ॥ ९ ७ ॥

उस समय राजा वीरसेनकी पुत्रवधू सर्वांगसुन्दरी दमयन्ती वह महान् आश्चर्यकी बात देखकर बड़े विस्मयमें पड़ गयी ॥ ९ ७ ॥

किं नु स्वप्नो मया दृष्टः कोऽयं विधिरिहाभवत् ।

क्व नु ते तापसाः सर्वे क्व तदाश्रममण्डलम् ॥ ९ ८ ॥

( उसने सोचा— ) ‘ क्या मैंने कोई स्वप्न देखा है? यहाँ यह कैसी अद्भुत घटना हो गयी? वे सब तपस्वी कहाँ चले गये और वह आश्रममण्डल कहाँ है? ' ॥ ९ ८ ॥

क्व सा पुण्यजला रम्या नदी द्विजनिषेविता ।

क्व नु ते ह नगा हृद्याः फलपुष्पोपशोभिताः ॥ ९९ ॥

'वह पुण्यसलिला रमणीय नदी, जिसपर पक्षी निवास कर रहे थे, कहाँ चली गयी? फल और फूलोंसे सुशोभित वे मनोरम वृक्ष कहाँ विलीन हो गये! ' ॥ ९९ ॥

ध्यात्वा चिरं भीमसुता दमयन्ती शुचिस्मिता ।

भर्तृशोकपरा दीना विवर्णवदनाभवत् ॥ १०० ॥

पवित्र मुसकानवाली भीमपुत्री दमयन्ती बहुत देरतक इन सब बातोंपर विचार करती रही । तत्पश्चात् वह पतिशोकपरायण और दीन हो गयी तथा उसके मुखपर उदासी छा गयी ॥ १०० ॥

सा गत्वाथापरां भूमिं बाष्पसंदिग्धया गिरा ।

विललापाश्रुपूर्णाक्षी दृष्ट्वाशोकतरुं ततः ॥ १०१ ॥

उपगम्य तरुश्रेष्ठमशोकं पुष्पितं वने ।

पल्लवापीडितं हृद्यं विहङ्गैरनुनादितम् ॥ १०२ ॥

तदनन्तर वह दूसरे स्थानपर जाकर अश्रुगद्गद वाणी से विलाप करने लगी । उसने आँसू भरे नेत्रोंसे देखा, वहाँसे कुछ ही दूरपर एक अशोकका वृक्ष था । दमयन्ती उसके पास गयी । वह तरुवर अशोक- फूलोंसे भरा था । उस वनमें पल्लवोंसे लदा हुआ और पक्षियोंके कलरवोंसे गुंजायमान वह वृक्ष बड़ा ही मनोरम जान पड़ता था ॥ १०१-१०२ ॥

अहो बतायमगमः श्रीमानस्मिन् वनान्तरे ।

आपीडैर्बहुभिर्भाति श्रीमान् पर्वतराडिव ॥ १०३ ॥

I (उसे देखकर वहमन-ही-- मन कहने लगी — ) ' अहो! इस वनके भीतर यह अशोक बड़ा ही सुन्दर है । यह अनेक प्रकारके फल, फूल आदि अलंकारोंसे अलंकृत सुन्दर गिरिराजकी भाँति सुशोभित हो रहा है ' ॥ १०३ ॥

विशोकां कुरु मां क्षिप्रमशोक प्रियदर्शन ।

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वीतशोकभयाबाधं कच्चित् त्वं दृष्टवान् नृपम् ॥ १०४ ॥

नलं नामारिदमनं दमयन्त्याः प्रियं पतिम् ।

निषधानामधिपतिं दृष्टवानसि मे प्रियम् ॥ १०५ ॥

( अब उसने अशोकसे कहा- ) ' प्रियदर्शन अशोक! तुम शीघ्र ही मेरा शोक दूर कर दो । क्या तुमने शोक, भय और बाधासे रहित शत्रुदमन राजा नलको देखा है? क्या मेरे प्रियतम, दमयन्तीके प्राणवल्लभ, निषधनरेश नलपर तुम्हारी दृष्टि पड़ी है? ॥ १०४-१०५ ॥

एकवस्त्रार्धसंवीतं सुकुमारतनुत्वचम् ।

व्यसनेनार्दितं वीरमरण्यमिदमागतम् ॥ १०६ ॥

‘ उन्होंने एक साड़ीके आधे टुकड़ेसे अपने शरीरको ढँक रखा है, उनके अंगोंकी त्वचा बड़ी सुकुमार है । वे वीरवर नल भारी संकटसे पीड़ित होकर इस वनमें आये ॥ १०६ ॥

यथा विशोका गच्छेयमशोकनग तत् कुरु ।

सत्यनामा भवाशोक अशोकः शोकनाशनः ॥ १०७ ॥

' अशोकवृक्ष! तुम ऐसा करो, जिससे मैं यहाँसे शोकरहित होकर जाऊँ । अशोक उसे कहते हैं, जो शोकका नाश करनेवाला हो, अतः अशोक! तुम अपने नामको सत्य एवं सार्थक करो ' ॥ १०७ ॥

एवं साशोकवृक्षं तमार्ता वै परिगम्य ह ।

जगाम दारुणतरं देशं भैमी वराङ्गना ॥ १०८ ॥

इस प्रकार शोकार्त हुई सुन्दरी दमयन्ती उस अशोकवृक्षकी परिक्रमा करके वहाँसे अत्यन्त भयंकर स्थानकी ओर गयी ॥ १०८ ॥

सा ददर्श नगान् नैकान् नैकाश्च सरितस्तथा ।

नैकांश्च पर्वतान् रम्यान् नैकांश्च मृगपक्षिणः ॥ १० ९ ॥

कन्दरांश्च नितम्बांश्च नदीश्चाद्भुतदर्शनाः ।

ददर्श तान् भीमसुता पतिमन्वेषती तदा ॥ ११० ॥

गत्वा प्रकृष्टमध्वानं दमयन्ती शुचिस्मिता ।

ददर्शाथ महासार्थं हस्त्यश्वरथसंकुलम् ॥ १११ ॥

उत्तरन्तं नदीं रम्यां प्रसन्नसलिलां शुभाम् ।

सुशीततोयां विस्तीर्णां ह्रदिनीं वेतसैर्वृताम् ॥ ११२ ॥

उसने अनेक प्रकारके वृक्ष, अनेकानेक सरिताओं, बहुसंख्यक रमणीय पर्वतों, अनेक मृग - पक्षियों, पर्वतकी कन्दराओं तथा उनके मध्यभागों और अद्भुत नदियोंको देखा । पतिका अन्वेषण करनेवाली दमयन्तीने उस समय पूर्वोक्त सभी वस्तुओंको देखा । इस तरह बहुत दूरतकका मार्ग तय कर लेनेके बाद पवित्र मुसकानवाली दमयन्तीने एक बहुत बड़े सार्थ ( व्यापारियोंके दल) -को देखा, जो हाथी, घोड़े तथा रथसे व्याप्त था । वह व्यापारियोंका