श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 441–450

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 441–450

पृष्ठ 441

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हा नाथ मामिह वने ग्रस्यमानामनाथवत् ।

ग्राहेणानेन विजने किमर्थं नानुधावसि ॥ २३ ॥

(वह विलाप करती हुई कहने लगी- ) ' हा नाथ! इस निर्जन वनमें यह अजगर सर्प मुझे अनाथकी भाँति निगल रहा है । आप मेरी रक्षाके लिये दौड़कर आते क्यों नहीं हैं? ॥ २३ ॥

कथं भविष्यसि पुनर्मामनुस्मृत्य नैषध ।

कथं भवाञ्जगामाद्य मामुत्सृज्य वने प्रभो ॥ २४ ॥

‘ निषधनरेश! यदि मैं मर गयी, तो मुझे बार- बार याद करके आपकी कैसी दशा हो जायगी? प्रभो! आज मुझे वनमें छोड़कर आप क्यों चले गये? ॥ २४ ॥

पापान्मुक्तः पुनर्लब्ध्वा बुद्धिं चेतो धनानि च ।

श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य परिग्लानस्य नैषध ।

कः श्रमं राजशार्दूल नाशयिष्यति तेऽनघ ॥ २५ ॥

‘ निष्पाप निषधनरेश! इस संकटसे मुक्त होनेपर जब आपको पुनः शुद्ध बुद्धि, चेतना और धन आदिकी प्राप्ति होगी, उस समय मेरे बिना आपकी क्या दशा होगी? नृपप्रवर! जब आप भूखसे पीड़ित हो थके -माँदे एवं अत्यन्त खिन्न होंगे, उस समय आपकी उस थकावटको कौन दूर करेगा? ' ॥ २५ ॥

ततः कश्चिन्मृगव्याधो विचरन् गहने वने ।

आक्रन्दमानां संश्रुत्य जवेनाभिससार ह ॥ २६ ॥

इसी समय कोई व्याध उस गहन वनमें विचर रहा था । वह दमयन्तीका करुण क्रन्दन सुनकर बड़े वेगसे उधर आया ॥ २६ ॥

पृष्ठ 442

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तां तु दृष्ट्वा तथा ग्रस्तामुरगेणायतेक्षणाम् ।

त्वरमाणो मृगव्याधः समभिक्रम्य वेगतः ॥ २७ ॥

मुखतः पाटयामास शस्त्रेण निशितेन च ।

निर्विचेष्टं भुजङ्गं तं विशस्य मृगजीवनः ॥ २८ ॥

मोक्षयित्वा स तां व्याधः प्रक्षाल्य सलिलेन ह ।

समाश्वास्य कृताहारामथ पप्रच्छ भारत ॥ २ ९ ॥

उस विशाल नयनोंवाली युवतीको अजगरके द्वारा उस प्रकार निगली जाती हुई देख व्याधने बड़ी उतावलीके साथ वेगसे दौड़कर तीखे शस्त्रसे शीघ्र ही उस अजगरका मुख फाड़ दिया । वह अजगर छटपटाकर चेष्टारहित हो गया। मृगोंको मारकर जीविका चलानेवाले उस व्याधने सर्पके टुकड़े - टुकड़े करके दमयन्तीको छुड़ाया । फिर जलसे उसके सर्पग्रस्त शरीरको धोकर उसे आश्वासन दे उसके लिये भोजनकी व्यवस्था कर दी । भारत! जब वह भोजन कर चुकी, तब व्याधने उससे पूछा— ॥ २७–२९ ॥

कस्य त्वं मृगशावाक्षि कथं चाभ्यागता वनम् ।

कथं चेदं महत् कृच्छ्रं प्राप्तवत्यसि भाविनि ॥ ३० ॥

'मृगलोचने! तुम किसकी स्त्री हो और कैसे वनमें चली आयी हो? भामिनि! किस प्रकार तुम्हें यह महान् कष्ट प्राप्त हुआ है? ' ॥ ३० ॥

दमयन्ती तथा तेन पृच्छ्यमाना विशाम्पते ।

पृष्ठ 443

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सर्वमेतद् यथावृत्तमाचचक्षेऽस्य भारत ॥ ३१ ॥

भरतवंशी नरेश युधिष्ठिर! व्याधके पूछनेपर दमयन्तीने उसे सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे कह सुनाया ॥ ३१ ॥

तामर्धवस्त्रसंवीतां पीनश्रोणिपयोधराम् ।

सुकुमारानवद्याङ्गीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥ ३२ ॥

अरालपक्ष्मनयनां तथा मधुरभाषिणीम् ।

लक्षयित्वा मृगव्याधः कामस्य वशमीयिवान् ॥ ३३ ॥

स्थूल नितम्ब और स्तनोंवाली विदर्भकुमारीने आधे वस्त्रसे ही अपने अंगोंको ढँक रखा था । पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाली दमयन्तीका एक-एक अंग सुकुमार एवं निर्दोष था । उसकी आँखें तिरछी बरौनियोंसे सुशोभित थीं और वह बड़े मधुर स्वरमें बोल रही थी । इन सब बातोंकी ओर लक्ष्य करके वह व्याध कामके अधीन हो गया ॥ ३२-३३ ॥

तामेवं श्लक्ष्णया वाचा लुब्धको मृदुपूर्वया ।

सान्त्वयामास कामार्तस्तदबुध्यत भाविनी ॥ ३४ ॥

वह मधुर एवं कोमल वाणीसे उसे अपने अनुकूल बनानेके लिये भाँति - भाँतिके आश्वासन देने लगा । वह व्याध उस समय कामवेदनासे पीड़ित हो रहा था । सती दमयन्तीने उसके दूषित मनोभावको समझ लिया ॥ ३४ ॥

दमयन्त्यपि तं दुष्टमुपलभ्य पतिव्रता ।

तीव्ररोषसमाविष्टा प्रजज्वालेव मन्युना ॥ ३५ ॥

पतिव्रता दमयन्ती भी उसकी दुष्टताको समझकर तीव्र क्रोधके वशीभूत हो मानो रोषाग्निसे प्रज्वलित हो उठी ॥ ३५ ॥

पृष्ठ 444

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सती दमयन्तीके तेजसे पापी व्याधका विनाश स तु पापमतिः क्षुद्रः प्रधर्षयितुमातुरः ।

पृष्ठ 445

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दुर्धर्षां तर्कयामास दीप्तामग्निशिखामिव ॥ ३६ ॥

यद्यपि वह नीच पापात्मा व्याध उसपर बलात्कार करनेके लिये व्याकुल हो गया था, परंतु दमयन्ती अग्निशिखाकी भाँति उद्दीप्त हो रही थी; अतः उसका स्पर्श करना उसको अत्यन्त दुष्कर प्रतीत हुआ ॥ ३६ ॥

दमयन्ती तु दुःखार्ता पतिराज्यविनाकृता ।

अतीतवाक्पथे काले शशापैनं रुषान्विता ॥ ३७ ॥

पति तथा राज्य दोनोंसे वंचित होनेके कारण दमयन्ती अत्यन्त दुःखसे आतुर हो रही थी । इधर व्याधकी कुचेष्टा वाणीद्वारा रोकनेपर रुक सके, ऐसी प्रतीत नहीं होती थी । तब ( उस व्याधपर अत्यन्त रुष्ट हो) उसने उसे शाप दे दिया— ॥ ३७ ॥

यद्यहं नैषधादन्यं मनसापि न चिन्तये ।

तथायं पततां क्षुद्रो परासुर्मृगजीवनः ॥ ३८ ॥

' यदि मैं निषधराज नलके सिवा दूसरे किसी पुरुषका मनसे भी चिन्तन नहीं करती होऊँ, तो इसके प्रभावसे यह तुच्छ व्याध प्राणशून्य होकर गिर पड़े ' ॥ ३८ ॥

उक्तमात्रे तु वचने तथा स मृगजीवनः ।

व्यसुः पपात मेदिन्यामग्निदग्ध इव द्रुमः ॥ ३ ९ ॥

दमयन्तीके इतना कहते ही वह व्याध आगसे जले हुए वृक्षकी भाँति प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 446

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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि अजगरग्रस्तदमयन्तीमोचने त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें अजगरग्रस्तदमयन्तीमोचनविषयक तिरसठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥

पृष्ठ 447

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चतुःषष्टितमोऽध्यायः दमयन्तीका विलाप और प्रलाप, तपस्वियोंद्वारा दमयन्तीको आश्वासन तथा उसकी व्यापारियोंके दलसे भेंट बृहदश्वउवाच

साहित्य मृगव्याधं प्रतस्थे कमलेक्षणा ।

वनं प्रतिभयं शून्यं झिल्लिकागणनादितम् ॥ १ ॥

बृहदश्व मुनि कहते हैं— राजन्! व्याधका विनाश करके वह कमलनयनी राजकुमारी झिल्लियोंकी झंकारसे गूँजते हुए निर्जन एवं भयंकर वनमें आगे बढ़ी ॥ १ ॥

सिंहद्वीपिरुरुव्याघ्रमहिषर्क्षगणैर्युतम् ।

नानापक्षिगणाकीर्णं म्लेच्छतस्करसेवितम् ॥ २ ॥

वह वन सिंह, चीतों, रुरुमृग, व्याघ्र, भैंसों तथा रीछ आदि पशुओंसे युक्त एवं भाँति-भाँतिके पक्षि - समुदायसे व्याप्त था । वहाँ म्लेच्छ और तस्करोंका निवास था ॥ २ ॥

शालवेणुधवाश्वत्थतिन्दुकेङ्गुदकिंशुकैः ।

अर्जुनारिष्टसंछन्नं स्यन्दनैश्च सशाल्मलैः ॥ ३ ॥

जम्ब्वाम्रलोध्रखदिरसालवेत्रसमाकुलम् ।

पद्मकामलकप्लक्षकदम्बोदुम्बरावृतम् ॥ ४ ॥

बदरीबिल्वसंछन्नं न्यग्रोधैश्च समाकुलम् ।

प्रियालतालखर्जूरहरीतकबिभीतकैः ॥ ५ ॥

शाल, वेणु, धव, पीपल, तिन्दुक, इंगुद, पलाश, अर्जुन, अरिष्ट, स्यन्दन ( तिनिश ), सेमल, जामुन, आम, लोध, खैर, साखू, बेंत, पद्मक, आँवला, पाकर, कदम्ब, गूलर, बेर, बेल, बरगद, प्रियाल, ताल, खजूर, हर्रे तथा बहेड़े आदि वृक्षोंसे वह विशाल वन परिपूर्ण हो रहा था ॥

नानाधातुशतैर्नद्धान् विविधानपि चाचलान् ।

निकुञ्जान् परिसंघुष्टान् दरीश्चाद्भुतदर्शनाः ॥ ६ ॥

दमयन्तीने वहाँ सैकड़ों धातुओंसे संयुक्त नाना प्रकारके पर्वत, पक्षियोंके कलरवोंसे गुंजायमान कितने ही निकुंज और अद्भुत कन्दराएँ देखीं ॥ ६ ॥

नदीः सरांसि वापीश्च विविधांश्च मृगद्विजान् ।

सा बहून् भीमरूपांश्च पिशाचोरगराक्षसान् ॥ ७ ॥

पल्वलानि तडागानि गिरिकूटानि सर्वशः ।

सरितो निर्झराश्चैव ददर्शाद्भुतदर्शनान् ॥ ८ ॥

पृष्ठ 448

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कितनी ही नदियों, सरोवरों, बावलियों तथा नाना प्रकारके मृगों और पक्षियोंको देखा । उसने बहुत - से भयानक रूपवाले पिशाच, नाग तथा राक्षस देखे । कितने ही गड्ढों, पोखरों

और पर्वतशिखरोंका अवलोकन किया । सरिताओं और अद्भुत झरनोंको देखा ॥ ७-८ ॥

यूथशो ददृशे चात्र विदर्भाधिपनन्दिनी ।

महिषांश्च वराहांश्च ऋक्षांश्च वनपन्नगान् ॥ ९ ॥

तेजसा यशसा लक्ष्म्या स्थित्या च परया युता ।

वैदर्भी विचरत्येका नलमन्वेषती तदा ॥ १० ॥

विदर्भराजनन्दिनीने उस वनमें झुंड के झुंड भैंसे, सूअर, रीछ और जंगली साँप देखे । तेज, यश, शोभा और परम धैर्यसे युक्त विदर्भकुमारी उस समय अकेली विचरती और नलको ढूँढ़ती थी ॥ ९ -१० ॥

नाबिभ्यत् सा नृपसुता भैमी तत्राथ कस्यचित् ।

दारुणामटवीं प्राप्य भर्तृव्यसनपीडिता ॥ ११ ॥

वह पतिके विरहरूपी संकटसे संतप्त थी । अतः राजकुमारी दमयन्ती उस भयंकर वनमें प्रवेश करके भी किसी जीव- जन्तुसे भयभीत नहीं हुई ॥ ११ ॥

विदर्भतनया राजन् विललाप सुदुःखिता ।

भर्तृशोकपरीताङ्गी शिलातलमथाश्रिता ॥ १२ ॥

राजन्! विदर्भकुमारी दमयन्तीके अंग- अंगमें पतिके वियोगका शोक व्याप्त हो गया था, इसलिये वह अत्यन्त दुःखित हो एक शिलाके नीचे भागमें बैठकर बहुत विलाप करने लगी— ॥ १२ ॥

दमयन्त्युवाच

व्यूढोरस्क महाबाहो नैषधानां जनाधिप ।

क्व नु राजन् गतोऽस्यद्य विसृज्य विजने वने ॥ १३ ॥

अश्वमेधादिभिर्वीर क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ।

कथमिष्ट्वा नरव्याघ्र मयि मिथ्या प्रवर्तसे ॥ १४ ॥

दमयन्ती बोली - चौड़ी छातीवाले महाबाहु निषधनरेश महाराज! आज इस निर्जन वनमें ( मुझ अकेलीको ) छोड़कर आप कहाँ चले गये? नरश्रेष्ठ! वीरशिरोमणे! प्रचुर दक्षिणावाले अश्वमेध आदि यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी आप मेरे साथ मिथ्या बर्ताव क्यों कर रहे हैं? ॥ १३-१४ ॥

यत् त्वयोक्तं नरश्रेष्ठ तत् समक्षं महाद्युते ।

स्मर्तुमर्हसि कल्याण वचनं पार्थिवर्षभ ॥ १५ ॥

महातेजस्वी कल्याणमय राजाओंमें उत्तम नरश्रेष्ठ! आपने मेरे सामने जो बात कही थी, अपनी उस बातका स्मरण करना उचित है ॥ १५ ॥

पृष्ठ 449

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यच्चोक्तं विहगैर्हंसैः समीपे तव भूमिप ।

मत्समक्षं यदुक्तं च तदवेक्षितुमर्हसि ॥ १६ ॥

भूमिपाल! आकाशचारी हंसोंने आपके समीप तथा मेरे सामने जो बातें कही थीं, उनपर विचार कीजिये ॥ १६ ॥

चत्वार एकतो वेदाः साङ्गोपाङ्गाः सविस्तराः ।

स्वधीता मनुजव्याघ्र सत्यमेकं किलैकतः ॥ १७ ॥

नरसिंह! एक ओर अंग और उपांगोंसहित विस्तारपूर्वक चारों वेदोंका स्वाध्याय हो और दूसरी ओर केवल सत्यभाषण हो तो वह निश्चय ही उससे बढ़कर है ॥ १७ ॥

तस्मादर्हसि शत्रुघ्न सत्यं कर्तुं नरेश्वर ।

उक्तवानसि यद् वीर मत्सकाशे पुरा वचः ॥ १८ ॥

अतः शत्रुहन्ता नरेश्वर! वीर! आपने पहले मेरे समीप जो बातें कही हैं, उन्हें सत्य करना चाहिये ॥ १८ ॥

हा वीर नल नामाहं नष्टा किल तवानघ ।

अस्यामटव्यां घोरायां किं मां न प्रतिभाषसे ॥ १ ९ ॥

हा निष्पाप वीर नल! आपकी मैं दमयन्ती इस भयंकर वनमें नष्ट हो रही हूँ, आप मेरी बातका उत्तर क्यों नहीं देते? ॥ १ ९ ॥

कर्षयत्येष मां रौद्रो व्यात्तास्यो दारुणाकृतिः ।

अरण्यराट् क्षुधाविष्टः किं मां न त्रातुमर्हसि ॥ २० ॥

यह भयानक आकृतिवाला क्रूर सिंह भूखसे पीड़ित हो मुँह बाये खड़ा है और मुझपर आक्रमण करना चाहता है, क्या आप मेरी रक्षा नहीं कर सकते? ॥ २० ॥

न मे त्वदन्या काचिद्धि प्रियास्तीत्यब्रवीः सदा ।

तामृतां कुरु कल्याण पुरोक्तां भारतीं नृप ॥ २१ ॥

कल्याणमय नरेश! आप पहले जो सदा यह कहते थे कि तुम्हारे सिवा दूसरी कोई भी स्त्री मुझे प्रिय नहीं है, अपनी उस बातको सत्य कीजिये ॥ २१ ॥

उन्मत्तां विलपन्तीं मां भार्यामिष्टां नराधिप ।

ईप्सितामीप्सितोऽसि त्वं किं मां न प्रतिभाषसे ॥ २२ ॥

महाराज! मैं आपकी प्रिय पत्नी हूँ और आप मेरे प्रियतम पति हैं, ऐसी दशामें भी मैं यहाँ उन्मत्त विलाप कर रही हूँ तो भी आप मेरी बातका उत्तर क्यों नहीं देते? ॥ २२ ॥

कृशां दीनां विवर्णां च मलिनां वसुधाधिप वस्त्रार्धप्रावृतामेकां विलपन्तीमनाथवत् ॥ २३ ॥

यूथभ्रष्टामिवैकां मां हरिणीं पृथुलोचन ।

न मानयसि मामार्य रुदन्तीमरिकर्शन ॥ २४ ॥

पृष्ठ 450

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पृथ्वीनाथ! मैं दीन, दुर्बल, कान्तिहीन और मलिन होकर आधे वस्त्रसे अपने अंगोंको ढककर अकेली अनाथ - सी विलाप कर रही हूँ। विशाल नेत्रोंवाले शत्रुसूदन आर्य! मेरी दशा अपने झुंडसे बिछुड़ी हुई हरिणीकी- सी हो रही है । मैं यहाँ अकेली रो रही हूँ । परंतु आप मेरा मान नहीं रखते हैं ॥ २३-२४ ॥

महाराज महारण्ये अहमेकाकिनी सती ।

दमयन्त्यभिभाषे त्वां किं मां न प्रतिभाषसे ॥ २५ ॥

महाराज! इस महान् वनमें मैं सती दमयन्ती अकेली आपको पुकार रही हूँ, आप मुझे उत्तर क्यों नहीं देते? ॥ २५ ॥

कुलशीलोपसम्पन्न चारुसर्वाङ्गशोभन ।

नाद्य त्वां प्रतिपश्यामि गिरावस्मिन् नरोत्तम ॥ २६ ॥

नरश्रेष्ठ! आप उत्तम कुल और श्रेष्ठ शीलस्वभावसे सम्पन्न हैं । आप अपने सम्पूर्ण मनोहर अंगोंसे सुशोभित होते हैं । आज इस पर्वतशिखरपर मैं आपको नहीं देख पाती हूँ ॥ २६ ॥

वने चास्मिन् महाघोरे सिंहव्याघ्रनिषेविते ।

शयानमुपविष्टं वा स्थितं वा निषधाधिप ॥ २७ ॥

निषधनरेश! इस महाभयंकर वनमें, जहाँ सिंह- व्याघ्र रहते हैं, आप कहीं सोये हैं, बैठे हैं अथवा खड़े हैं? ॥ २७ ॥

प्रस्थितं वा नरश्रेष्ठ मम शोकविवर्धन ।

कं नु पृच्छामि दुःखार्ता त्वदर्थे शोककर्शिता ॥ २८ ॥

मेरे शोकको बढ़ानेवाले नरश्रेष्ठ! आप यहीं हैं या कहीं अन्यत्र चल दिये, यह मैं किससे पूछूं? आपके लिये शोकसे दुर्बल होकर मैं अत्यन्त दुःखसे आतुर हो रही हूँ ॥ २८ ॥

कच्चिद् दृष्टस्त्वयारण्ये संगत्येह नलो नृपः ।

को नु मे वाथ प्रष्टव्यो वनेऽस्मिन् प्रस्थितं नलम् ॥ २ ९ ॥

' क्या तुमने इस वनमें राजा नलसे मिलकर उन्हें देखा है? ' ऐसा प्रश्न अब मैं इस वनमें प्रस्थान करनेवाले नलके विषयमें किससे करूँ? ॥ २ ९ ॥

अभिरूपं महात्मानं परव्यूहविनाशनम् ।

यमन्वेषसि राजानं नलं पद्मनिभेक्षणम् ॥ ३० ॥

अयं स इति कस्याद्य श्रोष्यामि मधुरां गिरम् । ' शत्रुओंके व्यूहका नाश करनेवाले जिन परम सुन्दर कमलनयन महात्मा राजा नलको तू खोज रही है, वे यही तो हैं, ऐसी मधुर वाणी आज मैं किसके मुखसे सुनूँगी? ' ॥ ३०३ || अरण्यराडयं श्रीमांश्चतुर्दंष्ट्रो महाहनुः ॥ ३१ ॥

शार्दूलोऽभिमुखोऽभ्येति व्रजाम्येनमशङ्किता ।