श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 461–470
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 461–470
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समूह स्वच्छ जलसे सुशोभित एक सुन्दर रमणीय नदीको पार कर रहा था । नदीका जल बहुत ठंडा था । उसका पाट चौड़ा था । उसमें कई कुण्ड थे और वह किनारेपर उगे हुए बेंतके वृक्षोंसे आच्छादित हो रही थी ॥ १० ९ –११२ ॥
प्रोद्धुष्टां क्रौञ्चकुररैश्चक्रवाकोपकूजिताम् ।
कूर्मग्राहझषाकीर्णां विपुलद्वीपशोभिताम् ॥ ११३ ॥
उसके तटपर क्रौंच, कुरर और चक्रवाक आदि पक्षी कूज रहे थे । कछुए, मगर और मछलियोंसे भरी हुई वह नदी विस्तृत टापूसे सुशोभित हो रही थी ॥ ११३ ॥
सा दृष्ट्वैव महासार्थं नलपत्नी यशस्विनी ।
उपसर्प्य वरारोहा जनमध्यं विवेश ह ॥ ११४ ॥
उस बहुत बड़े समूहको देखते ही यशस्विनी नलपत्नी सुन्दरी दमयन्ती उसके पास पहुँच कर लोगोंकी भीड़में घुस गयी ॥ ११४ ॥
उन्मत्तरूपा शोकार्ता तथा वस्त्रार्धसंवृता ।
कृशा विवर्णा मलिना पांसुध्वस्तशिरोरुहा ॥ ११५ ॥
उसका रूप उन्मत्त स्त्रीका - सा जान पड़ता था, वह शोकसे पीड़ित, दुर्बल, उदास और मलिन हो रही थी । उसने आधे वस्त्रसे अपने शरीरको ढक रखा था और उसके केशोंपर धूल जम गयी थी ॥ ११५ ॥
तां दृष्ट्वा तत्र मनुजाः केचिद् भीताः प्रदुद्रुवुः ।
केचिच्चिन्तापरा जग्मुः केचित् तत्र विचुक्रुशुः ॥ ११६ ॥
वहाँ दमयन्तीको सहसा देखकर कितने ही मनुष्य भयसे भाग खड़े हुए । कोई- कोई भारी चिन्तामें पड़ गये और कुछ लोग तो चीखने - चिल्लाने लगे ॥ ११६ ॥
प्रहसन्ति स्म तां केचिदभ्यसूयन्ति चापरे ।
अकुर्वत दयां केचित् पप्रच्छुश्चापि भारत ॥ ११७ ॥
कुछ लोग उसकी हँसी उड़ाते थे और कुछ उसमें दोष देख रहे थे । भारत! उन्हींमें कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्हें उसपर दया आ गयी और उन्होंने उसका समाचार पूछा ॥ ११७ ॥
कासि कस्यासि कल्याणि किं वा मृगयसे वने ।
त्वां दृष्ट्वा व्यथिताः स्मेह कच्चित् त्वमसि मानुषी ॥ ११८ ॥
‘ कल्याणि! तुम कौन हो? किसकी स्त्री हो और इस वनमें क्या खोज रही हो? तुम्हें
देखकर हम बहुत दुःखी हैं । क्या तुम मानवी हो? ॥ ११८ ॥
वद सत्यं वनस्यास्य पर्वतस्याथवा दिशः ।
देवता त्वं हि कल्याणि त्वां वयं शरणं गताः ॥ ११ ९ ॥
‘ कल्याणि! सच बताओ, तुम इस वन, पर्वत अथवा दिशाकी अधिष्ठात्री देवी तो नहीं हो? हम सब लोग तुम्हारी शरणमें आये हैं ॥ ११ ९ ॥
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यक्षी वा राक्षसी वा त्वमुताहोऽसि वराङ्गना सर्वथा कुरु नः स्वस्ति रक्ष वास्माननिन्दिते ॥ १२० ॥
यथायं सर्वथा सार्थः क्षेमी शीघ्रमितो व्रजेत् ।
तथा विधत्स्व कल्याणि यथा श्रेयो हि नो भवेत् ॥ १२१ ॥
' तुम यक्षी हो या राक्षसी अथवा कोई श्रेष्ठ देवांगना हो? अनिन्दिते! सर्वथा हमारा कल्याण एवं संरक्षण करो । कल्याणि! यह हमारा समूह शीघ्र कुशलपूर्वक यहाँसे चला जाय और हमलोगोंका सब प्रकारसे भला हो, ऐसी कृपा करो' ॥ १२०-१२१ ॥
तथोक्ता तेन सार्थेन दमयन्ती नृपात्मजा ।
प्रत्युवाच ततः साध्वी भर्तृव्यसनपीडिता ॥ १२२ ॥
उस यात्रीदलके द्वारा जब ऐसी बात कही गयी, तब पतिके वियोगजनित दुःखसे पीड़ित साध्वी राजकुमारी दमयन्तीने उन सबको इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ १२२ ॥
सार्थवाहं च सार्थं च जना ये चात्र केचन ।
युवस्थविरबालाश्च सार्थस्य च पुरोगमाः ॥ १२३ ॥
मानुषीं मां विजानीत मनुजाधिपतेः सुताम् ।
नृपस्नुषां राजभार्यां भर्तृदर्शनलालसाम् ॥ १२४ ॥
‘ इस जनसमुदायके जो सरदार हों, उनसे, इस जनसमूहसे तथा इसके ( भीतर रहनेवाले और) आगे चलनेवाले जो बाल- वृद्ध और युवक मनुष्य हों, उन सबसे मेरा यह कहना है कि आप सब लोग मुझे मानवी समझें । मैं एक नरेशपुत्री, महाराजकी पुत्रवधू तथा राजपत्नी हूँ । अपने स्वामीके दर्शनकी इच्छासे इस वनमें भटक रही हूँ ॥ १२३-१२४ ॥
विदर्भराण्मम पिता भर्ता राजा च नैषधः ।
नलो नाम महाभागस्तं मृग्याम्यपराजितम् ॥ १२५ ॥
‘विदर्भराज भीम मेरे पिता हैं, निषधनरेश महाभाग राजा नल मेरे पति हैं । मैं उन्हीं अपराजित वीर नलकी खोज कर रही हूँ ॥ १२५ ॥
यदि जानीत नृपतिं क्षिप्रं शंसत मे प्रियम् ।
नलं पुरुषशार्दूलममित्रगणसूदनम् ॥ १२६ ॥
‘ यदि आपलोग शत्रुसमूहका संहार करनेवाले मेरे प्रियतम पुरुषसिंह महाराज नलके विषयमें कुछ जानते हों तो शीघ्र बतावें ' ॥ १२६ ॥
तामुवाचानवद्याङ्गीं सार्थस्य महतः प्रभुः ।
सार्थवाहः शुचिर्नाम शृणु कल्याणि मद्वचः ॥ १२७ ॥
उस महान् समूहका मालिक और समस्त यात्रीदलका संचालक ( वणिक् ) शुचिनामसे -प्रसिद्ध था । उसने उस सुन्दरीसे कहा — ' कल्याणि! मेरी बात सुनो ' – ॥ १२७ ॥
अहं सार्थस्य नेता वै सार्थवाहः शुचिस्मिते ।
मनुष्यं नलनामानं न पश्यामि यशस्विनि ॥ १२८ ॥
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' शुचिस्मिते! मैं इस दलका नेता और संचालक हूँ । यशस्विनि! मैंने नल नामधारी किसी मनुष्यको इस वनमें नहीं देखा है ॥ १२८ ॥
कुञ्जरद्वीपिमहिषशार्दूलर्क्षमृगानपि ।
पश्याम्यस्मिन् वने कृत्स्ने ह्यमनुष्यनिषेविते ॥ १२ ९ ॥
' यह सम्पूर्ण वन मनुष्येतर प्राणियोंसे भरा है । इसके भीतर हाथियों, चीतों, भैंसों, सिंहों, रीछों और मृगोंको ही मैं देखता आ रहा हूँ ॥ १२ ९ ॥
ऋते त्वां मानुषीं मर्त्यं न पश्यामि महावने ।
तथा नो यक्षराडद्य मणिभद्रः प्रसीदतु ॥ १३० ॥
‘ तुम - जैसी मानव- कन्याके सिवा और किसी मनुष्यको मैं इस विशाल वनमें नहीं देख रहा हूँ । इसलिये यक्षराज मणिभद्र आज हमपर प्रसन्न हों ' ॥ १३० ॥
साब्रवीद् वणिजः सर्वान् सार्थवाहं च तं ततः ।
क्व नु यास्यति सार्थोऽयमेतदाख्यातुमर्हसि ॥ १३१ ॥
तब दमयन्तीने उन सब व्यापारियों तथा दलके संचालकसे कहा- ' आपका यह दल कहाँ जायगा? यह मुझे बताइये ' ॥ १३१ ॥
सार्थवाह उवाच
सार्थोऽयं चेदिराजस्य सुबाहोः सत्यदर्शिनः ।
क्षिप्रं जनपदं गन्ता लाभाय मनुजात्मजे ॥ १३२ ॥
सार्थवाहने कहा- राजकुमारी! हमारा यह दल शीघ्र ही सत्यदर्शी चेदिराज सुबाहुके जनपद ( नगर) -में विशेष लाभके उद्देश्यसे जायगा ॥ १३२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीसार्थवाहसंगमे चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें दमयन्तीकी सार्थवाहसे भेंटविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥
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पञ्चषष्टितमोऽध्यायः जंगली हाथियोंद्वारा व्यापारियोंके दलका सर्वनाश तथा दुःखित दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें सुखपूर्वक निवास बृहदश्वउवाच
सा तच्छ्रुत्वानवद्याङ्गी सार्थवाहवचस्तदा ।
जगाम सह तेनैव सार्थेन पतिलालसा ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं - राजन्! दलके संचालककी वह बात सुनकर निर्दोष एवं सुन्दर अंगोंवाली दमयन्ती पतिदेवके दर्शनके लिये उत्सुक हो व्यापारियोंके उस दलके साथ ही यात्रा करने लगी ॥ १ ॥
अथ काले बहुतिथे वने महति दारुणे ।
तडागं सर्वतोभद्रं पद्मसौगन्धिकं महत् ॥ २ ॥
ददृशुर्वणिजो रम्यं प्रभूतयवसेन्धनम् ।
बहुपुष्पफलोपेतं नानापक्षिनिषेवितम् ॥ ३ ॥
तदनन्तर बहुत समयके बाद एक भयंकर विशाल वनमें पहुँचकर उन व्यापारियोंने एक महान् सरोवर देखा, जिसका नाम था, पद्मसौगन्धिक । वह सब ओरसे कल्याणप्रद जान पड़ता था । उस रमणीय सरोवरके पास घास और ईंधनकी अधिकता थी, फूल और फल भी वहाँ प्रचुर मात्रामें उपलब्ध होते थे । उस तालाबपर बहुत-से पक्षी निवास करते थे ॥ २-३ ॥
निर्मलस्वादुसलिलं मनोहारि सुशीतलम् ।
सुपरिश्रान्तवाहास्ते निवेशाय मनो दधुः ॥ ४ ॥
सरोवरका जल स्वच्छ और स्वादु था, वह देखनेमें बड़ा ही मनोहर और अत्यन्त शीतल था । व्यापारियोंके वाहन बहुत थक गये थे । इसलिये उन्होंने वहीं पड़ाव डालनेका निश्चय किया ॥ ४ ॥
सम्म सार्थवाहस्य विविशुर्वनमुत्तमम् ।
उवास सार्थः सुमहान् वेलामासाद्य पश्चिमाम् ॥ ५ ॥
समूहके अधिपतिसे अनुमति लेकर सब लोगोंने उस उत्तम वनमें प्रवेश किया और वह महान् जनसमुदाय सरोवरके पश्चिम तटपर ठहर गया ॥ ५ ॥
अथार्धरात्रसमये निःशब्दस्तिमिते तदा ।
सुप्ते सार्थे परिश्रान्ते हस्तियूथमुपागमत् ॥ ६ ॥
पानीयार्थं गिरिनदीं मदप्रस्रवणाविलाम् ।
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अथापश्यत सार्थं तं सार्थजान् सुबहून् गजान् ॥ ७ ॥
तत्पश्चात् आधी रातके समय जब कहींसे भी कोई शब्द सुनायी नहीं देता था और उस दलके सभी लोग थककर सो गये थे, उस समय गजराजोंके मदकी धारासे मलिन जलवाली पहाड़ी नदीमें पानी पीनेके लिये ( जंगली ) हाथियोंका एक झुंड आ निकला । उस झुंडने व्यापारियोंके सोये हुए दलको और उसके साथ आये हुए बहुत-से हाथियोंको भी देखा ॥ ६-७ ॥
ते तान् ग्राम्यगजान् दृष्ट्वा सर्वे वनगजास्तदा ।
समाद्रवन्त वेगेन जिघांसन्तो मदोत्कटाः ॥ ८ ॥
तब वनमें रहनेवाले उन सभी मदोन्मत्त गजोंने उन ग्रामीण हाथियोंको देखकर उन्हें मार डालनेकी इच्छासे उनपर वेगपूर्वक आक्रमण किया ॥ ८ ॥
तेषामापततां वेगः करिणां दुःसहोऽभवत् ।
नगाग्रादिव शीर्णानां शृङ्गणां पततां क्षितौ ॥ ९ ॥
पर्वतकी चोटीसे टूटकर पृथ्वीपर गिरनेवाले बड़े-बड़े शिखरोंके समान उन आक्रमणकारी जंगली हाथियोंका वेग ( उस यात्रीदलके लिये ) अत्यन्त दुःसह था ॥ ९ ॥
स्पन्दतामपि नागानां मार्गा नष्टा वनोद्भवाः ।
मार्गं संरुध्य संसुप्तं पद्मिन्याः सार्थमुत्तमम् ॥ १० ॥
ग्रामीण हाथियोंपर आक्रमण करनेकी चेष्टावाले उन वनवासी गजराजोंके वन्य मार्ग अवरुद्ध हो गये थे । सरोवरके तटपर व्यापारियोंका महान् समुदाय उनका मार्ग रोककर सो रहा था ॥ १० ॥
ते तं ममर्दुः सहसा चेष्टमानं महीतले ।
हाहाकारं प्रमुञ्चन्तः सार्थिकाः शरणार्थिनः ॥ ११ ॥
वनगुल्मांश्च धावन्तो निद्रान्धा बहवोऽभवन् ।
केचिद् दत्तैः करैः केचित् केचित् पद्भयां हता गजैः ॥ १२ ॥
उन हाथियोंने सहसा पहुँचकर समूचे दलको कुचल दिया । कितने ही मनुष्य धरतीपर पड़े - पड़े छटपटा रहे थे । उस दलके कितने ही पुरुष हाहाकार करते हुए बचावकी जगह खोजते हुए जंगलके पौधोंके समूहमें भाग गये । बहुत - से मनुष्य तो नींदके मारे अन्धे हो रहे थे । हाथियोंने किन्हींको दाँतोंसे, किन्हींको सूड़ोंसे और कितनोंको पैरोंसे घायल कर दिया ॥ ११-१२ ॥
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निहतोष्ट्राश्वबहुलाः पदातिजनसंकुलाः ।
भयादाधावमानाश्च परस्परहतास्तदा ॥ १३ ॥
घोरान् नादान् विमुञ्चन्तो निपेतुर्धरणीतले ।
वृक्षेष्वारुह्य संरब्धाः पतिता विषमेषु च ॥ १४ ॥
उनके बहुत - से ऊँट और घोड़े मारे गये और उस समुदाय में बहुत - से पैदल लोग भी थे । वे सब लोग उस समय भयसे चारों ओर भागते हुए एक- दूसरेसे टकराकर चोट खा जाते थे । घोर आर्तनाद करते हुए सभी लोग धरतीपर गिरने लगे । कुछ लोग बड़े वेगसे वृक्षोंपर चढ़ते हुए नीचेकी विषम भूमियोंपर गिर पड़ते थे ॥ १३-१४ ॥
एवं प्रकारैर्बहुभिर्दैवेनाक्रम्य हस्तिभिः ।
राजन् विनिहतं सर्वं समृद्धं सार्थमण्डलम् ॥ १५ ॥
राजन्! इस प्रकार दैववश बहुतेरे जंगली हाथियोंने आक्रमण करके (प्रायः ) उस सम्पूर्ण समृद्धिशाली व्यापारियोंके समुदायको नष्ट कर दिया ॥ १५ ॥
आरावः सुमहांश्चासीत् त्रैलोक्यभयकारकः ।
एषोऽग्निरुत्थितः कष्टस्त्रायध्वं धावताधुना ॥ १६ ॥
रत्नराशिर्विशीर्णोऽयं गृह्णीध्वं किं प्रधावत ।
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उस समय वहाँ तीनों लोकोंको भयमें डालनेवाला महान् आर्तनाद एवं चीत्कार हो रहा था । कोई कहता— ‘ अरे! इधर बड़े जोरकी आग प्रज्वलित हो उठी है । यह भारी संकट आ गया ( अब ) दौड़ो और बचाओ । ' दूसरा कहता – ' अरे! ये ढेर- के - ढेर रत्न बिखरे पड़े हैं,
इन्हें सँभालकर रखो । इधर- उधर भागते क्यों हो? ' ॥ १६३ ॥
सामान्यमेतद् द्रविणं न मिथ्यावचनं मम ॥ १७ ॥
तीसरा कहता था — ‘ भाई! इस धनपर सबका समान अधिकार है, मेरी यह बात झूठी नहीं है ' ॥ १७ ॥
एवमेवाभिभाषन्तो विद्रवन्ति भयात् तदा ।
पुनरेवाभिधास्यामि चिन्तयध्वं सुकातराः ॥ १८ ॥
कोई कहता – ' ऐ कायरो! मैं फिर तुमसे बात करूँगा, अभी अपनी रक्षाकी चिन्ता करो । ' इस तरहकी बातें करते हुए सब लोग भयसे भाग रहे थे ॥ १८ ॥
तस्मिंस्तथा वर्तमाने दारुणे जनसंक्षये ।
दमयन्ती च बुबुधे भयसंत्रस्तमानसा ॥ १ ९ ॥
इस प्रकार जब वहाँ भयानक नरसंहार हो रहा था, उसी समय दमयन्ती भी जाग उठी ।
उसका हृदय भयसे संत्रस्त हो उठा ॥ १ ९ ॥
अपश्यद् वैशसं तत्र सर्वलोकभयंकरम् ।
अदृष्टपूर्वं तद् दृष्ट्वा बाला पद्मनिभेक्षणा ॥ २० ॥
संसक्तवदनाश्वासा उत्तस्थौ भयविह्वला ।
ये तु तत्र विनिर्मुक्ताः सार्थात् केचिदविक्षताः ॥ २१ ॥
तेऽब्रुवन् सहिताः सर्वे कस्येदं कर्मणः फलम् ।
नूनं न पूजितोऽस्माभिर्मणिभद्रो महायशाः ॥ २२ ॥
तथा यक्षाधिपः श्रीमान् न वै वैश्रवणः प्रभुः ।
न पूजा विघ्नकर्तॄणामथवा प्रथमं कृता ॥ २३ ॥
शकुनानां फलं वाथ विपरीतमिदं ध्रुवम् ।
ग्रहा न विपरीतास्तु किमन्यदिदमागतम् ॥ २४ ॥
वहाँ उसने वह महासंहार अपनी आँखों देखा, जो सब लोगोंके लिये भयंकर था । उसने ऐसी दुर्घटना पहले कभी नहीं देखी थी । यह सब देखकर वह कमलनयनी बाला भयसे व्याकुल हो उठी । उसको कहींसे कोई सान्त्वना नहीं मिल रही थी । वह इस प्रकार स्तब्ध हो रही थी, मानो धरतीसे सट गयी हो । तदनन्तर वह किसी प्रकार उठकर खड़ी हुई । दलके जो लोग उस संकटसे मुक्त हो आघातसे बचे हुए थे, वे सब एकत्र हो कहने लगे कि ' यह हमारे किस कर्मका फल है? निश्चय ही हमने महायशस्वी मणिभद्रका पूजन नहीं किया है । इसी प्रकार हमने श्रीमान् यक्षराज कुबेरकी भी पूजा नहीं की है अथवा विघ्नकर्ता विनायकोंकी भी पहले पूजा नहीं कर ली थी । अथवा हमने पहले जो -जो शकुन देखे थे, उसका यह
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विपरीत फल है । यदि हमारे ग्रह विपरीत न होते तो और किस हेतुसे यह संकट हमारे ऊपर कैसे आ सकता था? ' ॥ २०–२४ ॥
अपरे त्वब्रुवन् दीना ज्ञातिद्रव्यविनाकृताः ।
यासावद्य महासार्थे नारी ह्युन्मत्तदर्शना ॥ २५ ॥
प्रविष्टा विकृताकारा कृत्वा रूपममानुषम् ।
तयेयं विहिता पूर्वं माया परमदारुणा ॥ २६ ॥
दूसरे लोग जो अपने कुटुम्बीजनों और धनके विनाशसे दीन हो रहे थे, वे इस प्रकार कहने लगे — ' आज हमारे विशाल जनसमूहके साथ वह जो उन्मत्त - जैसी दिखायी देनेवाली नारी आ गयी थी, वह विकराल आकारवाली राक्षसी थी तो भी अलौकिक सुन्दर रूप धारण करके हमारे दलमें घुस गयी थी । उसीने पहलेसे ही यह अत्यन्त भयंकर माया फैला रखी थी ॥ २५-२६ ॥
राक्षसी वा ध्रुवं यक्षी पिशाची वा भयंकरी ।
तस्याः सर्वमिदं पापं नात्र कार्या विचारणा ॥ २७ ॥
पश्यामो यदि तां पापां सार्थघ्नीं नैकदुःखदाम् ।
लोष्टभिः पांसुभिश्चैव तृणैः काष्ठैश्च मुष्टिभिः ॥ २८ ॥
अवश्यमेव हन्यामः सार्थस्य किल कृत्यकाम् । ‘निश्चय ही वह राक्षसी, यक्षी अथवा भयंकर पिशाची थी— इसमें विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं कि यह सारा पापपूर्ण कृत्य उसीका किया हुआ है । उसने हमें अनेक प्रकारका दुःख दिया और प्रायः सारे दलका विनाश कर डाला । वह पापिनी समूचे सार्थके लिये अवश्य ही कृत्या बनकर आयी थी । यदि हम उसे देख लेंगे तो ढेलोंसे, धूल और तिनकोंसे, लकड़ियों और मुक्कोंसे भी अवश्य मार डालेंगे ॥ २७-२८३ ॥ दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा वाक्यं तेषां सुदारुणम् ॥ २ ९ ॥
ह्रीता भीता च संविग्ना प्राद्रवद् यत्र काननम् ।
आशङ्कमाना तत्पापमात्मानं पर्यदेवयत् ॥ ३० ॥
‘उनका वह अत्यन्त भयंकर वचन सुनकर दमयन्ती लज्जासे गड़ गयी और भयसे व्याकुल हो उठी । उनके पापपूर्ण संकल्पके संघटित होनेकी आशंका करके वह उसी ओर भाग गयी, जहाँ घना जंगल था । वहाँ जाकर अपनी इस परिस्थितिपर विचार करके वह विलाप करने लगी — ॥ २ ९ -३० ॥
अहो ममोपरि विधेः संरम्भो दारुणो महान् ।
नानुबध्नाति कुशलं कस्येदं कर्मणः फलम् ॥ ३१ ॥
‘ अहो! मुझपर विधाताका अत्यन्त भयानक और महान् कोप है, जिससे मुझे कहीं भी
कुशल- क्षेमकी प्राप्ति नहीं होती । न जाने, यह हमारे किस कर्मका फल है? ॥ ३१ ॥
न स्मराम्यशुभं किंचित् कृतं कस्यचिदण्वपि ।
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कर्मणा मनसा वाचा कस्येदं कर्मणः फलम् ॥ ३२ ॥
' मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी किसीका थोड़ा-सा भी अमंगल किया हो, इसकी याद नहीं आती, फिर यह मेरे किस कर्मका फल मिल रहा है? ॥ ३२ ॥
नूनं जन्मान्तरकृतं पापमापतितं महत् ।
अपश्चिमामिमां कष्टामापदं प्राप्तवत्यहम् ॥ ३३ ॥
‘ निश्चय ही यह मेरे दूसरे जन्मोंके किये हुए पापका महान् फल प्राप्त हुआ है, जिससे मैं इस अनन्त कष्टमें पड़ गयी हूँ ॥ ३३ ॥
भर्तृराज्यापहरणं स्वजनाच्च पराजयः ।
भर्त्रा सह वियोगश्च तनयाभ्यां च विच्युतिः ॥ ३४ ॥
‘ मेरे स्वामीके राज्यका अपहरण हुआ, उन्हें आत्मीयजनसे ही पराजित होना पड़ा, मेरा अपने पतिदेवसे वियोग हुआ और अपनी संतानोंके दर्शनसे भी वंचित हो गयी हूँ ॥ ३४ ॥
निर्नाथता वने वासो बहुव्यालनिषेविते । ‘ इतना ही नहीं, असंख्य सर्प आदि जन्तुओंसे भरे हुए इस वनमें मुझे अनाथकी - सी दशामें रहना पड़ता है ' ॥ अथापरेद्युः सम्प्राप्ते हतशिष्टा जनास्तदा ॥ ३५ ॥
देशात् तस्माद् विनिष्क्रम्य शोचन्ते वैशसं कृतम् ।
भ्रातरं पितरं पुत्रं सखायं च नराधिप ॥ ३६ ॥
तदनन्तर दूसरा दिन प्रारम्भ होनेपर मरनेसे बचे हुए लोग उस स्थानसे निकलकर उस विकट संहारके लिये शोक करने लगे । राजन्! कोई भाईके लिये दुःखी था, कोई पिताके लिये; किसीको पुत्रका शोक था और किसीको मित्रका ॥ ३५-३६ ॥
अशोचत् तत्र वैदर्भी किं नु मे दुष्कृतं कृतम् ।
योऽपि मे निर्जनेऽरण्ये सम्प्राप्तोऽयं जनार्णवः ॥ ३७ ॥
स हतो हस्तियूथेन मन्दभाग्यान्ममैव तत् ।
प्राप्तव्यं सुचिरं दुःखं नूनमद्यापि वै मया ॥ ३८ ॥
विदर्भराजकुमारी दमयन्ती भी इसके लिये शोक करने लगी कि ' मैंने कौन- सा पाप किया है, जिससे इस निर्जन वनमें मुझे जो यह समुद्रके समान जनसमुदाय प्राप्त हो गया था, वह भी मेरे ही दुर्भाग्यसे हाथियोंके झुंडद्वारा मारा गया। निश्चय ही मुझे अभी दीर्घकालतक दुःख-ही- दुःख भोगना है ॥ ३७-३८ ॥
नाप्राप्तकालो म्रियते श्रुतं वृद्धानुशासनम् ।
या नाहमद्य मृदिता हस्तियूथेन दुःखिता ॥ ३ ९ ॥
‘जिसकी मृत्युका समय नहीं आया है, वह इच्छा होते हुए भी मर नहीं सकता । वृद्ध पुरुषोंका यह जो उपदेश मैंने सुन रखा है, यह ठीक ही जान पड़ता है, तभी तो आज मैं
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दुःखित होनेपर भी हाथियोंके झुंडसे कुचलकर मर न सकी ॥ ३ ९ ॥
न ह्यदैवकृतं किंचिन्नराणामिह विद्यते ।
न च मे बालभावेऽपि किंचित् पापकृतं कृतम् ॥ ४० ॥
कर्मणा मनसा वाचा यदिदं दुःखमागतम् । ' मनुष्योंको इस जगत्में कोई भी सुख या दुःख ऐसा नहीं मिलता, जो विधाताका दिया हुआ न हो । मैंने बचपनमें भी मन, वाणी अथवा क्रियाद्वारा ऐसा पाप नहीं किया है, जिससे मुझे यह दुःख प्राप्त होता ॥ ४० ॥
मन्ये स्वयंवरकृते लोकपालाः समागताः ॥ ४१ ॥
प्रत्याख्याता मया तत्र नलस्यार्थाय देवताः ।
नूनं तेषां प्रभावेण वियोगं प्राप्तवत्यहम् ॥ ४२ ॥
एवमादीनि दुःखार्ता सा विलप्य वराङ्गना ।
प्रलापानि तदा तानि दमयन्ती पतिव्रता ॥ ४३ ॥
‘ मैं समझती हूँ, स्वयंवरके लिये जो लोकपाल देवगण पधारे थे, नलके कारण मैंने उनका तिरस्कार कर दिया था । अवश्य उन्हीं देवताओंके प्रभावसे आज मुझे वियोगका कष्ट प्राप्त हुआ है । ' इस प्रकार दुःखसे आतुर हुई सुन्दरी पतिव्रता दमयन्तीने उस समय अनेक प्रकारसे विलाप एवं प्रलाप किये ॥ ४१–४३ ॥
हतशेषैः सह तदा ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।
अगच्छद् राजशार्दूल चन्द्रलेखेव शारदी ॥ ४४ ॥
गच्छन्ती साचिराद् बाला पुरमासादयन्महत् ।
सायाह्ने चेदिराजस्य सुबाहोः सत्यदर्शिनः ॥ ४५ ॥
नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर मरनेसे बचे हुए वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ यात्रा करती हुई शरत्कालके चन्द्रमाकी कलाके समान वह सुन्दरी युवती थोड़े ही समयमें संध्या होते-होते सत्यदर्शी चेदिराज सुबाहुकी राजधानीमें जा पहुँची ॥ ४४-४५ ॥
अथ वस्त्रार्धसंवीता प्रविवेश पुरोत्तमम् ।
तं विह्वलां कृशां दीनां मुक्तकेशीममार्जिताम् ॥ ४६ ॥
शरीरमें आधी साड़ीको लपेटे हुए ही उसने उस उत्तम नगरमें प्रवेश किया । वह विह्वल, दीन और दुर्बल हो रही थी । उसके सिरके बाल खुले हुए थे । उसने स्नान नहीं किया था ॥ ४६ ॥
उन्मत्तामिव गच्छन्तीं ददृशः पुरवासिनः ।
प्रविशन्तीं तु तां दृष्ट्वा चेदिराजपुरीं तदा ॥ ४७ ॥
अनुजग्मुस्तत्र बाला ग्रामिपुत्राः कुतूहलात् ।
सा तैः परिवृतागच्छत् समीपं राजवेश्मनः ॥ ४८ ॥