02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 591–600
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 591–600
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भरतवंशी महाराज! वहीं मातृतीर्थ है, जिसमें स्नान करनेवाले पुरुषकी संतति बढती है और वह कभी क्षीण न होनेवाली सम्पत्तिका उपभोग करता है ॥
ततः सीतवनं गच्छेन्नियतो नियताशनः ।
तीर्थं तत्र महाराज महदन्यत्र दुर्लभम् ॥ ५ ९ ॥
तदनन्तर नियमसे रहकर नियमित भोजन करते हुए सीतवनमें जाय । महाराज! वहाँ महान् तीर्थ है, जो अन्यत्र दुर्लभ है ॥ ५ ९ ॥
पुनाति गमनादेव दृष्टमेकं नराधिप ।
केशानभ्युक्ष्य वै तस्मिन् पूतो भवति भारत ॥ ६० ॥
नरेश्वर! वह तीर्थ एक बार जाने या दर्शन करनेसे ही पवित्र कर देता है । भारत! उसमें केशोंको धो लेने मात्रसे ही मनुष्य पवित्र हो जाता ॥ ६० ॥
तीर्थं तत्र महाराज श्वाविल्लोमापहं स्मृतम् ।
यत्र विप्रा नरव्याघ्र विद्वांसस्तीर्थतत्पराः ॥ ६१ ॥
प्रीतिं गच्छन्ति परमां स्नात्वा भरतसत्तम ।
श्वाविल्लोमापनयने तीर्थे भरतसत्तम ॥ ६२ ॥
प्राणायामैर्निर्हरन्ति स्वलोमानि द्विजोत्तमाः ।
पूतात्मानश्च राजेन्द्र प्रयान्ति परमां गतिम् ॥ ६३ ॥
महाराज! वहाँ श्वाविल्लोमापह नामक तीर्थ है । नरव्याघ्र! उसमें तीर्थपरायण हुए विद्वान् ब्राह्मण स्नान करके बड़े प्रसन्न होते हैं । भरतसत्तम! श्वाविल्लोमापनयनतीर्थमें प्राणायाम ( योगकी क्रिया ) करनेसे श्रेष्ठ द्विज अपने रोएँ झाड़ देते हैं तथा राजेन्द्र! वे शुद्धचित्त होकर परमगतिको प्राप्त होते हैं ॥ ६१–६३ ॥
दशाश्वमेधिकं चैव तस्मिंस्तीर्थे महीपते ।
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र गच्छेत परमां गतिम् ॥ ६४ ॥
भूपाल! वहीं दशाश्वमेधिकतीर्थ भी है । पुरुषसिंह! उसमें स्नान करके मनुष्य उत्तम गति प्राप्त करता है ॥ ६४ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र मानुषं लोकविश्रुतम् ।
यत्र कृष्णमृगा राजन् व्याधेन शरपीडिताः ॥ ६५ ॥
विगाह्य तस्मिन् सरसि मानुषत्वमुपागताः ।
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्मचारी समाहितः ॥ ६६ ॥
सर्वपापविशुद्धात्मा स्वर्गलोके महीयते । राजेन्द्र! तदनन्तर लोकविख्यात मानुषतीर्थमें जाय । राजन्! वहाँ व्याधके बाणोंसे पीडित हुए कृष्णमृग उस सरोवरमें गोते लगाकर मनुष्य शरीर पा गये थे, इसीलिये उसका नाम मानुषतीर्थ है । ब्रह्मचर्यपालन- पूर्वक एकाग्रचित्त हो उस तीर्थमें स्नान करनेवाला मानव सब पापोंसे मुक्त हो स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ६५-६६३ ॥
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मानुषस्य तु पूर्वेण क्रोशमात्रे महीपते ॥ ६७ ॥
आपगा नाम विख्याता नदी सिद्धनिषेविता ।
श्यामाकं भोजने तत्र यः प्रयच्छति मानवः ॥ ६८ ॥
देवान् पितॄन् समुद्दिश्य तस्य धर्मफलं महत् ।
एकस्मिन् भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजिता ॥ ६ ९ ॥
राजन्! मानुषतीर्थसे पूर्व एक कोसकी दूरीपर आपगा नामसे विख्यात एक नदी है, जो सिद्धपुरुषोंसे सेवित है । जो मनुष्य वहाँ देवताओं और पितरोंके उद्देश्यसे भोजन कराते समय श्यामाक ( साँवा ) नामक अन्न देता है, उसे महान् धर्मफलकी प्राप्ति होती है । वहाँ एक ब्राह्मणको भोजन करानेपर एक करोड़ ब्राह्मणोंको भोजन करानेका फल मिलता है ॥ ६७ —६ ९ ॥
तत्र स्नात्वार्चयित्वा च पितॄन् वै दैवतानि च ।
उषित्वा रजनीमेकामग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ ७० ॥
वहाँ स्नान करके देवताओं और पितरोंके पूजनपूर्वक एक रात निवास करनेसे अग्निष्टोमयज्ञका फल मिलता है ॥ ७० ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् ।
ब्रह्मोदुम्बरमित्येव प्रकाशं भुवि भारत ॥ ७१ ॥
भरतवंशी राजेन्द्र! तदनन्तर ब्रह्माजीके उत्तम स्थानमें जाय, जो इस पृथ्वीपर ब्रह्मोदुम्बरतीर्थके नामसे प्रसिद्ध है ॥ ७१ ॥
तत्र सप्तर्षिकुण्डेषु स्नातस्य नरपुङ्गव ।
केदारे चैव राजेन्द्र कपिलस्य महात्मनः ॥ ७२ ॥
ब्रह्माणमधिगम्याथ शुचिः प्रयतमानसः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥ ७३ ॥
कपिलस्य च केदारं समासाद्य सुदुर्लभम् ।
अन्तर्धानमवाप्नोति तपसा दग्धकिल्बिषः ॥ ७४ ॥
वहाँ सप्तर्षिकुण्ड है । नरश्रेष्ठ महाराज! उन कुण्डोंमें तथा महात्मा कपिलके केदारतीर्थमें स्नान करनेसे पुरुषको महान् पुण्यकी प्राप्ति होती है । वह मनुष्य ब्रह्माजीके निकट जाकर उनका दर्शन करनेसे शुद्ध, पवित्रचित्त एवं सब पापोंसे रहित होकर ब्रह्मलोकमें जाता है । कपिलका केदार भी अत्यन्त दुर्लभ है । वहाँ जानेसे तपस्याद्वारा सब पाप नष्ट हो जानेके कारण मनुष्यको अन्तर्धानविद्याकी प्राप्ति हो जाती है ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र सरकं लोकविश्रुतम् ।
कृष्णपक्षे चतुर्दश्यामभिगम्य वृषध्वजम् ॥ ७५ ॥
लभेत सर्वकामान् हि स्वर्गलोकं च गच्छति ।
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राजेन्द्र! तदनन्तर लोकविख्यात सरकतीर्थमें जाय । वहाँ कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको भगवान् शंकरका दर्शन करनेसे मनुष्य सब कामनाओंको प्राप्त कर लेता और स्वर्गलोकमें जाता है ॥ ७५ ॥
तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां सरके कुरुनन्दन ॥ ७६ ॥
कुरुनन्दन! सरकमें तीन करोड़ तीर्थ हैं ॥ ७६ ॥
रुद्रकोट्यां तथा कूपे ह्रदेषु च महीपते ।
इलास्पदं च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम ॥ ७७ ॥
तत्र स्नात्वार्चयित्वा च दैवतानि पितृनथ ।
न दुर्गतिमवाप्नोति वाजपेयं च विन्दति ॥ ७८ ॥
राजन्! ये सब तीर्थ रुद्रकोटिमें, कूपमें और कुण्डोंमें हैं। भरतशिरोमणे! वहीं इलास्पदतीर्थ है, जिसमें स्नान और देवता -पितरोंका पूजन करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता और वाजपेययज्ञका फल पाता है ॥ ७७-७८ ॥
किंदाने च नरः स्नात्वा किंजप्ये च महीपते ।
अप्रमेयमवाप्नोति दानं जप्यं च भारत ॥ ७ ९ ॥
महीपते! वहाँ किंदान और किंजप्य नामक तीर्थ भी हैं । भारत! उनमें स्नान करनेसे मनुष्य दान और जपका असीम फल पाता है ॥ ७ ९ ॥
कलश्यां वार्युपस्पृश्य श्रद्दधानो जितेन्द्रियः ।
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ८० ॥
कलशीतीर्थमें जलका आचमन करके श्रद्धालु और जितेन्द्रिय मानव अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता है ॥
सरकस्य तु पूर्वेण नारदस्य महात्मनः ।
तीर्थं कुरुकुलश्रेष्ठ अम्बाजन्मेति विश्रुतम् ॥ ८१ ॥
कुरुकुलश्रेष्ठ! सरकतीर्थके पूर्वमें महात्मा नारदका तीर्थ है, जो अम्बाजन्मके नामसे विख्यात है ॥ ८१ ॥
तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा प्राणानुत्सृज्य भारत ।
नारदेनाभ्यनुज्ञातो लोकान् प्राप्नोत्यनुत्तमान् ॥ ८२ ॥
भारत! उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य प्राणत्यागके पश्चात् नारदजीकी आज्ञाके अनुसार परम उत्तम लोकोंमें जाता है ॥ ८२ ॥
शुक्लपक्षे दशम्यां च पुण्डरीकं समाविशेत् ।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् पुण्डरीकफलं लभेत् ॥ ८३ ॥
शुक्लपक्षकी दशमी तिथिको पुण्डरीकतीर्थमें प्रवेश करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्यको पुण्डरीकयागका फल प्राप्त होता है ॥ ८३ ॥
ततस्त्रिविष्टपं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
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तत्र वैतरणी पुण्या नदी पापप्रणाशिनी ॥। ८४ ॥ तदनन्तर तीनों लोकोंमें विख्यात त्रिविष्टपतीर्थमें जाय । वहाँ वैतरणी नामक पुण्यमयी पापनाशिनी नदी है ॥
तत्र स्नात्वार्चयित्वा च शूलपाणिं वृषध्वजम् ।
सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम् ॥ ८५ ॥
उसमें स्नान करके शूलपाणि भगवान् शंकरकी पूजा करनेसे मनुष्य सब पापोंसे शुद्धचित्त हो परम गतिको प्राप्त होता है ॥ ८५ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र फलकीवनमुत्तमम् ।
तत्र देवाः सदा राजन् फलकीवनमाश्रिताः ॥ ८६ ॥
तपश्चरन्ति विपुलं बहु वर्षसहस्रकम् ।
दृषद्वत्यां नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः ॥ ८७ ॥
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति भारत ।
तीर्थे च सर्वदेवानां स्नात्वा भरतसत्तम ॥ ८८ ॥
गोसहस्रस्य राजेन्द्र फलं विन्दति मानवः ।
पाणिखाते नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः ॥ ८ ९ ॥
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति भारत ।
राजसूयमवाप्नोति ऋषिलोकं च विन्दति ॥ ९ ० ॥
राजेन्द्र! वहाँसे फलकीवन नामक उत्तम तीर्थकी यात्रा करे । राजन्! देवतालोग फलकीवनमें सदा निवास करते हैं और अनेक सहस्र वर्षोंतक वहाँ भारी तपस्यामें लगे रहते हैं । भारत! दृषद्वतीमें स्नान करके देवता- पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम और अतिरात्र यज्ञोंका फल पाता है । भरतसत्तम राजेन्द्र! सर्वदेवतीर्थमें स्नान करनेसे मानव सहस्र गोदानका फल पाता है । भारत! पाणिखाततीर्थमें स्नान करके देवता- पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम और अतिरात्रयज्ञोंसे मिलनेवाले फलको प्राप्त कर लेता है; साथ ही वह राजसूययज्ञका फल पाता एवं ऋषिलोकमें जाता है ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र मिश्रकं तीर्थमुत्तमम् ।
तत्र तीर्थानि राजेन्द्र मिश्रितानि महात्मना ॥ ९ १ ॥
व्यासेन नृपशार्दूल द्विजार्थमिति नः श्रुतम् ।
सर्वतीर्थेषु स स्नाति मिश्रके स्नाति यो नरः ॥ ९ २ ॥
राजेन्द्र! तत्पश्चात् परम उत्तम मिश्रकतीर्थमें जाय । महाराज! वहाँ महात्मा व्यासने द्विजोंके लिये सभी तीर्थोंका सम्मिश्रण किया है; यह बात मेरे सुननेमें आयी है । जो मनुष्य मिश्रकतीर्थमें स्नान करता है, उसका वह स्नान सभी तीर्थोंमें स्नान करनेके समान है ॥ ९ १ - ९ २ ॥ ततो व्यासवनं गच्छेन्नियतो नियताशनः ।
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मनोजवे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ९ ३ ॥ तत्पश्चात् नियमपूर्वक रहते हुए मिताहारी होकर व्यासवनकी यात्रा करे । वहाँ मनोजवतीर्थमें स्नान करके मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है ॥ ९ ३ ॥
गत्वा मधुवटीं चैव देव्यास्तीर्थे नरः शुचिः ।
तत्र स्नात्वार्चयित्वा च पितॄन् देवांश्च पूरुषः ॥ ९ ४ ॥
स देव्या समनुज्ञातो गोसहस्रफलं लभेत् । मधुवटीमें जाकर देवीतीर्थमें स्नान करके पवित्र हुआ मानव वहाँ देवता- पितरोंकी पूजा करके देवीकी आज्ञाके अनुसार सहस्र गोदानका फल पाता है ॥ ९ ४३ ॥ कौशिक्याः संगमे यस्तु दृषद्वत्याश्च भारत ॥ ९ ५ ॥ स्नाति वै नियताहारः सर्वपापैः प्रमुच्यते । भारत! कौशिकी और दृषद्वतीके संगममें जो स्नान करता है तथा नियमपालनपूर्वक संयमित भोजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ९ ५३ ॥ ततो व्यासस्थली नाम यत्र व्यासेन धीमता ॥ ९ ६ ॥
पुत्रशोकाभितप्तेन देहत्यागे कृता मतिः ।
ततो देवैस्तु राजेन्द्र पुनरुत्थापितस्तदा ॥ ९ ७ ॥
अभिगत्वा स्थलीं तस्य गोसहस्रफलं लभेत् । तत्पश्चात् व्यासस्थलीमें जाय, जहाँ परम बुद्धिमान् व्यासने पुत्रशोकसे संतप्त हो शरीर त्याग देनेका विचार किया था । राजेन्द्र! उस समय उन्हें देवताओंने पुनः उठाया था । उस स्थलमें जानेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ९ ६-९ ७ ॥ किंदत्तं कूपमासाद्य तिलप्रस्थं प्रदाय च ॥ ९ ८ ॥
गच्छेत परमां सिद्धिमृणैर्मुक्तः कुरूद्वह ।
वेदीतीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ९९ ॥
किंदत्त नामक कूपके समीप जाकर एक प्रस्थ अर्थात् सोलह मुट्ठी तिल दान करे । कुरुश्रेष्ठ! ऐसा करनेसे मनुष्य तीनों ऋणोंसे मुक्त हो परम सिद्धिको प्राप्त होता है । वेदीतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है ॥ ९८- ९९ ॥
अहश्च सुदिनं चैव द्वे तीर्थे लोकविश्रुते ।
तयोः स्नात्वा नरव्याघ्र सूर्यलोकमवाप्नुयात् ॥ १०० ॥
अहन् और सुदिन — ये दो लोकविख्यात तीर्थ हैं। नरश्रेष्ठ! उन दोनोंमें स्नान करके मनुष्य सूर्यलोकमें जाता है ॥ १०० ॥
मृगधूमं ततो गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
तत्राभिषेकं कुर्वीत गङ्गायां नृपसत्तम ॥ १०१ ॥
नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर तीनों लोकोंमें विख्यात मृगधूम - तीर्थमें जाय और वहाँ गंगाजीमें स्नान करे ॥ १०१ ॥
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अर्चयित्वा महादेवमश्वमेधफलं लभेत् ।
देव्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १०२ ॥
वहाँ महादेवजीकी पूजा करके मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है । देवीतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ १०२ ॥
ततो वामनकं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
तत्र विष्णुपदे स्नात्वा अर्चयित्वा च वामनम् ॥ १०३ ॥
सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ।
कुलम्पुने नरः स्नात्वा पुनाति स्वकुलं ततः ॥ १०४ ॥
तत्पश्चात् त्रिलोकविख्यात वामनतीर्थमें जाय । वहाँ विष्णुपदमें स्नान और वामनदेवताका पूजन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे शुद्ध हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है । कुलम्पुनतीर्थमें स्नान करके मानव अपने कुलको पवित्र कर देता है ॥ १०३-१०४ ॥
पवनस्य ह्रदे स्नात्वा मरुतां तीर्थमुत्तमम् ।
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र विष्णुलोके महीयते ॥ १०५ ॥
नरव्याघ्र! तदनन्तर पवनहृदमें स्नान करे । वह मरुद्गणोंका उत्तम तीर्थ है । वहाँ स्नान करनेसे मानव विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १०५ ॥
अमराणां हृदे स्नात्वा समभ्यर्च्यामराधिपम् ।
अमराणां प्रभावेण स्वर्गलोके महीयते ॥ १०६ ॥
अमरह्रदमें स्नान करके अमरेश्वर इन्द्रका पूजन करे । ऐसा करके मनुष्य अमरोंके प्रभावसे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १०६ ॥
शालिहोत्रस्य तीर्थे च शालिसूर्ये यथाविधि ।
स्नात्वा नरवरश्रेष्ठ गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १०७ ॥
नरश्रेष्ठ! शालिहोत्रके शालिसूर्य नामक तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करके मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है ॥ १०७ ॥
श्रीकुञ्जं च सरस्वत्यास्तीर्थं भरतसत्तम ।
तत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ अग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ १०८ ॥
भरतसत्तम नरश्रेष्ठ! श्रीकुंज नामक सरस्वतीतीर्थमें स्नान करनेसे मानव अग्निष्टोमयज्ञका फल प्राप्त कर लेता है ॥ १०८ ॥
ततो नैमिषकुञ्जं च समासाद्य कुरूद्वह ।
ऋषयः किल राजेन्द्र नैमिषेयास्तपस्विनः ॥ १० ९ ॥
तीर्थयात्रां पुरस्कृत्य कुरुक्षेत्रं गताः पुरा ।
ततः कुञ्जः सरस्वत्याः कृतो भरतसत्तम ॥ ११० ॥
कुरुश्रेष्ठ! तत्पश्चात् नैमिषकुञ्जकी यात्रा करे । राजेन्द्र! कहते हैं, नैमिषारण्यके निवासी तपस्वी ऋषि पहले कभी तीर्थयात्राके प्रसंगसे कुरुक्षेत्रमें गये थे । भरतश्रेष्ठ! उसी समय
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उन्होंने सरस्वतीकुंजका निर्माण किया था ( वही नैमिषकुंज कहलाता है ) ॥ १० ९ -११० ॥
ऋषीणामवकाशः स्याद् यथा तुष्टिकरो महान् ।
तस्मिन् कुञ्जे नरः स्नात्वा अग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ १११ ॥
वह ऋषियोंका स्थान है, जो उनके लिये महान् संतोषजनक है । उस कुंजमें स्नान करके मनुष्य अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता है ॥ १११ ॥
ततो गच्छेत धर्मज्ञ कन्यातीर्थमनुत्तमम् ।
कन्यातीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ११२ ॥
धर्मज्ञ! तदनन्तर परम उत्तम कन्यातीर्थकी यात्रा करे । कन्यातीर्थमें स्नान करनेसे मानव सहस्र गोदानका फल पाता है ॥ ११२ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मणस्तीर्थमुत्तमम् ।
तत्र वर्णावरः स्नात्वा ब्राह्मण्यं लभते नरः ॥ ११३ ॥
ब्राह्मणश्च विशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम् । राजेन्द्र! तदनन्तर परम उत्तम ब्रह्मतीर्थमें जाय । वहाँ स्नान करनेसे ब्राह्मणेतर वर्णका मनुष्य भी ब्राह्मणत्व लाभ करता है । ब्राह्मण होनेपर शुद्धचित्त हो वह परम गतिको प्राप्त कर लेता है ॥ ११३ ॥
ततो गच्छेन्नरश्रेष्ठ सोमतीर्थमनुत्तमम् ॥ ११४ ॥
तत्र स्नात्वा नरो राजन् सोमलोकमवाप्नुयात् । नरश्रेष्ठ! तत्पश्चात् उत्तम सोमतीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मानव सोमलोकको जाता है ॥ ११४३ ॥
सप्तसारस्वतं तीर्थं ततो गच्छेन्नराधिप ॥ ११५ ॥
यत्र मङ्कणकः सिद्धो महर्षिर्लोकविश्रुतः ।
पुरा मङ्कणको राजन् कुशाग्रेणेति नः श्रुतम् ॥ ११६ ॥
क्षतः किल करे राजंस्तस्य शाकरसोऽस्रवत् ।
स वै शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टः प्रनृत्तवान् ॥ ११७ ॥
नरेश्वर! इसके बाद सप्तसारस्वत नामक तीर्थकी यात्रा करे, जहाँ लोकविख्यात महर्षि मंकणकको सिद्धि प्राप्त हुई थी । राजन्! हमारे सुननेमें आया है कि पहले कभी महर्षि मंकणकके हाथमें कुशका अग्रभाग गड़ गया, जिससे उनके हाथमें घाव हो गया । महाराज! उस समय उस हाथसे शाकका रस चूने लगा । शाकका रस चूता देख महर्षि हर्षावेशसे मतवाले हो नृत्य करने लगे ॥ ११५–११७ ॥
ततस्तस्मिन् प्रनृत्ते तु स्थावरं जंगमं च यत् ।
प्रनृत्तमुभयं वीर तेजसा तस्य मोहितम् ॥ ११८ ॥
वीर! उनके नृत्य करते समय उनके तेजसे मोहित हो सारा चराचर जगत् नृत्य करने लगा ॥ ११८ ॥
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ब्रह्मादिभिः सुरे राजन्नृषिभिश्च तपोधनैः ।
विज्ञप्तो वै महादेव ऋषेरथ नराधिप ॥ ११ ९ ॥
राजन्! नरेश्वर! उस समय ब्रह्मा आदि देवता तथा तपोधन महर्षिगण– सबने मंकणक मुनिके विषयमें महादेवजीसे निवेदन किया- ॥ ११ ९ ॥ नायं नृत्येद् यथा देव तथा त्वं कर्तुमर्हसि ।
तं प्रनृत्तं समासाद्य हर्षाविष्टेन चेतसा ।
सुराणां हितकामार्थमृषिं देवोऽभ्यभाषत ॥ १२० ॥
‘ देव! आप कोई ऐसा उपाय करें, जिससे इनका यह नृत्य बंद हो जाय । ' महादेवजी देवताओंके हितकी इच्छासे हर्षावेशसे नाचते हुए मुनिके पास गये और इस प्रकार बोले ॥ १२० ॥
भो भो महर्षे धर्मज्ञ किमर्थं नृत्यते भवान् ।
हर्षस्थानं किमर्थं वा तवाद्य मुनिपुङ्गव ॥ १२१ ॥
' धर्मज्ञ महर्षे! मुनिप्रवर! आप किसलिये नृत्य कर रहे हैं? आज आपके इस हर्षातिरेकका क्या कारण है? ' ॥ ऋषिरुवाच
तपस्विनो धर्मपथे स्थितस्य द्विजसत्तम ।
किं न पश्यसि मे ब्रह्मन् कराच्छाकरसं स्रुतम् ॥ १२२ ॥
यं दृष्ट्वा सम्प्रनृत्तोऽहं हर्षेण महतान्वितः । ऋषिने कहा— द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मन्! मैं धर्मके मार्गपर स्थिर रहनेवाला तपस्वी हूँ । मेरे हाथसे यह शाकका रस चू रहा है । क्या आप इसे नहीं देखते? इसीको देखकर मैं महान् हर्षसे नाच रहा हूँ ॥ १२२ ॥
तं प्रहस्याब्रवीद् देव ऋषिं रागेण मोहितम् ॥ १२३ ॥
महर्षि रागसे मोहित हो रहे थे । महादेवजीने उनकी बात सुनकर हँसते हुए कहीं - ॥ १२३ ॥
अहं तु विस्मयं विप्र न गच्छामीति पश्य माम् ।
एवमुक्त्वा नरश्रेष्ठ महादेवेन धीमता ॥ १२४ ॥
अङ्गुल्यग्रेण राजेन्द्र स्वावङ्गुष्ठस्ताडितोऽनघ ।
ततो भस्म क्षताद् राजन् निर्गतं हिमसंनिभम् ॥ १२५ ॥
' विप्रवर! मुझे तो यह देखकर कोई आश्चर्य नहीं हो रहा है । मेरी ओर देखिये । ' नरश्रेष्ठ! निष्पाप राजेन्द्र! ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् महादेवजीने अंगुलीके अग्रभागसे अपने अँगूठेको ठोंका । राजन्! उनके चोट करनेपर उस अँगूठेसे बर्फके समान सफेद भस्म गिरने लगा ॥ १२४-१२५ ॥
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तद् दृष्ट्वा व्रीडितो राजन् स मुनिः पादयोर्गतः ।
नान्यद् देवात् परं मेने रुद्रात् परतरं महत् ॥ १२६ ॥
महाराज! यह अद्भुत बात देखकर मुनि लज्जित हो महादेवजीके चरणोंमें पड़ गये और उन्होंने दूसरे किसी देवताको महादेवजीसे बढ़कर नहीं माननेका निश्चय किया ॥ १२६ ॥
सुरासुरस्य जगतो गतिस्त्वमसि शूलधृक् ।
त्वया सर्वमिदं सृष्टं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ १२७ ॥
वे बोले — ‘ भगवन्! देवता और असुरोंसहित सम्पूर्ण जगत्के आश्रय आप ही हैं । त्रिशूलधारी महेश्वर! आपने ही चराचर जीवोंसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको उत्पन्न किया है ॥ १२७ ॥
त्वमेव सर्वान् ग्रससि पुनरेव युगक्षये ।
देवैरपि न शक्यस्त्वं परिज्ञातुं कुतो मया ॥ १२८ ॥
‘ फिर प्रलयकाल आनेपर आप ही सब जीवोंको अपना ग्रास बना लेते हैं । देवता भी आपके स्वरूपको नहीं जान सकते, फिर मेरी तो बात ही क्या? ॥ १२८ ॥
त्वयि सर्वे प्रदृश्यन्ते सुरा ब्रह्मादयोऽनघ ।
सर्वस्त्वमसि लोकानां कर्ता कारयिता च ह ॥ १२ ९ ॥
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भगवान् शंकरका मंकणक मुनिको नृत्य करनेसे रोकना