श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 601–610
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 601–610
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‘ अनघ! ब्रह्मा आदि सब देवता आपहीमें दिखायी देते हैं । इस जगत्के करने और करानेवाले सब कुछ आप ही हैं ॥ १२ ९ ॥
त्वत्प्रसादात् सुराः सर्वे मोदन्तीहाकुतोभयाः ।
एवं स्तुत्वा महादेवमृषिर्वचनमब्रवीत् ॥ १३० ॥
‘ आपके प्रसादसे सब देवता यहाँ निर्भय और प्रसन्न रहते हैं। ' इस प्रकार स्तुति करके ऋषिने फिर महादेवजीसे कहा- ॥ १३० ॥
त्वत्प्रसादान्महादेव तपो मे न क्षरेत वै ।
ततो देवः प्रहृष्टात्मा ब्रह्मर्षिमिदमब्रवीत् ॥ १३१ ॥
‘ महादेव! आपकी कृपासे मेरी तपस्या नष्ट न हो। ' तब महादेवजीने प्रसन्नचित्त हो महर्षिसे कहा— ॥ १३१ ॥
तपस्ते वर्धतां विप्र मत्प्रसादात् सहस्रधा ।
आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वया सह महामुने ॥ १३२ ॥
‘ब्रह्मन्! मेरे प्रसादसे आपकी तपस्या हजारगुनी बढ़े । महामुने! मैं तुम्हारे साथ इस आश्रममें रहूँगा ॥ १३२ ॥
सप्तसारस्वते स्नात्वा अर्चयिष्यन्ति ये तु माम् ।
न तेषां दुर्लभं किंचिदिहलोके परत्र च ॥ १३३ ॥
‘ जो सप्तसारस्वततीर्थमें स्नान करके मेरी पूजा करेंगे, उनके लिये इहलोक और परलोकमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं होगी ॥ १३३ ॥
सारस्वतं च ते लोकं गमिष्यन्ति न संशयः ।
एवमुक्त्वा महादेवस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १३४ ॥
‘ इतना ही नहीं, वे सरस्वतीके लोकमें जायँगे, इसमें संशय नहीं है । ' ऐसा कहकर महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ १३४ ॥
ततस्त्वौशनसं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥ १३५ ॥
तदनन्तर तीनों लोकोंमें विख्यात औशनसतीर्थकी यात्रा करे, जहाँ ब्रह्मा आदि देवता तथा तपस्वी ऋषि रहते हैं ॥ १३५ ॥
कार्तिकेयश्च भगवांस्त्रिसंध्यं किल भारत ।
सांनिध्यमकरोन्नित्यं भार्गवप्रियकाम्यया ॥ १३६ ॥
भारत! शुक्राचार्यजीका प्रिय करनेके लिये भगवान् कार्तिकेय भी वहाँ सदा तीनों संध्याओंके समय उपस्थित रहते हैं ॥ १३६ ॥
कपालमोचनं तीर्थं सर्वपापप्रमोचनम् ।
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १३७ ॥
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कपालमोचनतीर्थ सब पापोंसे छुड़ानेवाला है! नरश्रेष्ठ! वहाँ स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १३७ ॥
अग्नितीर्थं ततो गच्छेत् तत्र स्नात्वा नरर्षभ ।
अग्निलोकमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ १३८ ॥
नरश्रेष्ठ! वहाँसे अग्नितीर्थको जाय । उसमें स्नान करनेसे मनुष्य अग्निलोकमें जाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ १३८ ॥
विश्वामित्रस्य तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम ।
तत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ ब्राह्मण्यमधिगच्छति ॥ १३ ९ ॥
भरतसत्तम! वहीं विश्वामित्रतीर्थ है । नरश्रेष्ठ! वहाँ स्नान करनेसे ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है ॥ १३ ९ ॥
ब्रह्मयोनिं समासाद्य शुचिः प्रयतमानसः ।
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥ १४० ॥
पुनात्यासप्तमं चैव कुलं नास्त्यत्र संशयः । नरश्रेष्ठ! बह्मयोनितीर्थमें जाकर पवित्र एवं जितात्मा पुरुष वहाँ स्नान करनेसे ब्रह्मलोक प्राप्त कर लेता है । साथ ही अपने कुलकी सात पीढ़ियोंतकको पवित्र कर देता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १४० ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ १४१ ॥
पृथूदकमिति ख्यातं कार्तिकेयस्य वै नृप ।
तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः ॥ १४२ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर कार्तिकेयके त्रिभुवनविख्यात पृथूदकतीर्थकी यात्रा करे और वहाँ स्नान करके देवताओं तथा पितरोंकी पूजामें संलग्न रहे ॥ १४१-१४२ ॥
अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि स्त्रिया वा पुरुषेण वा ।
यत् किंचिदशुभं कर्म कृतं मानुषबुद्धिना ॥ १४३ ॥
तत् सर्वं नश्यते तत्र स्नातमात्रस्य भारत ।
अश्वमेधफलं चास्य स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ १४४ ॥
भारत! स्त्री हो या पुरुष, उसने मानव- बुद्धिसे अनजानमें या जान- बूझकर जो कुछ भी पापकर्म किया है, वह सब पृथूदकतीर्थमें स्नान करनेमात्रसे नष्ट हो जाता है और तीर्थसेवी पुरुषको अश्वमेधयज्ञके फल एवं स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है ॥ १४३-१४४ ॥
पुण्यमाहुः कुरुक्षेत्रं कुरुक्षेत्रात् सरस्वती ।
सरस्वत्याश्च तीर्थानि तीर्थेभ्यश्च पृथूदकम् ॥ १४५ ॥
कुरुक्षेत्रतीर्थको सबसे पवित्र कहते हैं, कुरुक्षेत्रसे भी पवित्र है सरस्वती नदी, सरस्वतीसे भी पवित्र हैं उसके तीर्थ और उन तीर्थोंसे भी पवित्र हैं पृथूदक ॥ १४५ ॥
उत्तमं सर्वतीर्थानां यस्त्यजेदात्मनस्तनुम् ।
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पृथूदके जप्यपरो नैव श्वो मरणं तपेत् ॥ १४६ ॥
वह सब तीर्थोंमें उत्तम है, जो पृथूदकतीर्थमें जपपरायण होकर अपने शरीरका त्याग करता है, उसे पुनर्मृत्युका भय नहीं होता ॥ १४६ ॥
गीतं सनत्कुमारेण व्यासेन च महात्मना ।
एवं स नियतं राजन्नभिगच्छेत् पृथूदकम् ॥ १४७ ॥
यह बात भगवान् सनत्कुमार तथा महात्मा व्यासने कही है । राजन्! इस प्रकार तीर्थयात्री नियमपूर्वक पृथूदकतीर्थकी यात्रा करे ॥ १४७ ॥
पृथूदकात् तीर्थतमं नान्यत् तीर्थं कुरूद्वह ।
तन्मेध्यं तत् पवित्रं च पावनं च न संशयः ॥ १४८ ॥
कुरुश्रेष्ठ! पृथूदकसे श्रेष्ठतम तीर्थ दूसरा कोई नहीं है । वही मेध्य, पवित्र और पावन है, इसमें संशय नहीं है ॥ १४८ ॥
तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति येऽपि पापकृतो नराः ।
पृथूदके नरश्रेष्ठ एवमाहुर्मनीषिणः ॥ १४ ९ ॥
नरश्रेष्ठ! पापी मनुष्य भी वहाँ पृथूदकतीर्थमें स्नान करनेसे स्वर्गलोकमें चले जाते हैं, ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं ॥ १४ ९ ॥
मधुस्रवं च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम ।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १५० ॥
भरतश्रेष्ठ! वहीं मधुस्रव तीर्थ है । राजन्! उसमें स्नान करनेसे मनुष्यको सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ १५० ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं मेध्यं यथाक्रमम् ।
सरस्वत्यरुणायाश्च संगमं लोकविश्रुतम् ॥ १५१ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर क्रमशः लोकविख्यात सरस्वती - अरुणासंगम नामक पवित्र तीर्थकी यात्रा करे ॥ १५१ ॥
त्रिरात्रोपोषितः स्नात्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया ।
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति मानवः ॥ १५२ ॥
आसप्तमं कुलं चैव पुनाति भरतर्षभ । वहाँ स्नान करके तीन रात उपवास करनेसे ब्रह्महत्यासे छुटकारा मिल जाता है । इतना
ही नहीं, वह मनुष्य अग्निष्टोम और अतिरात्रयज्ञोंसे मिलनेवाले फलको भी पा लेता है ।
भरतश्रेष्ठ! वह अपने कुलकी सात पीढ़ियोंको पवित्र कर देता है ॥ १५२३ ॥
अर्धकीलं च तत्रैव तीर्थं कुरुकुलोद्वह ॥ १५३ ॥
विप्राणामनुकम्पार्थं दर्भिणा निर्मितं पुरा ।
व्रतोपनयनाभ्यां चाप्युपवासेन वाप्युत ॥ १५४ ॥
क्रियामन्त्रैश्च संयुक्तो ब्राह्मणः स्यान्न संशयः ।
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क्रियामन्त्रविहीनोऽपि तत्र स्नात्वा नरर्षभ ।
चीर्णव्रतो भवेद् विद्वान् दृष्टमेतत् पुरातनैः ॥ १५५ ॥
कुरुकुलशिरोमणे! वहीं अर्धकील नामक तीर्थ है, जिसे पूर्वकालमें दर्भी मुनिने ब्राह्मणोंपर कृपा करनेके लिये प्रकट किया था । वहाँ व्रत, उपनयन और उपवास करनेसे मनुष्य कर्मकाण्ड और मन्त्रोंका ज्ञाता ब्राह्मण होता है, इसमें संशय नहीं है । नरश्रेष्ठ! क्रियाविहीन और मन्त्रहीन पुरुष भी उसमें स्नान करके व्रतका पालन करनेसे विद्वान् होता है, यह बात प्राचीन महर्षियोंने प्रत्यक्ष देखी है ॥ १५३–१५५ ॥
समुद्राश्चापि चत्वारः समानीताश्च दर्भिणा ।
तेषु स्नातो नरश्रेष्ठ न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥ १५६ ॥
फलानि गोसहस्राणां चतुर्णां विन्दते च सः । दर्भी मुनि वहाँ चार समुद्रोंको भी ले आये हैं । नरश्रेष्ठ! उनमें स्नान करनेवाला मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता और उसे चार हजार गोदानका भी फल मिलता है ॥ १५६३ ॥
ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थं शतसहस्रकम् ॥ १५७ ॥
साहस्रकं च तत्रैव द्वे तीर्थे लोकविश्रुते ।
उभयोर्हि नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १५८ ॥
दानं वाप्युपवासो वा सहस्रगुणितं भवेत् । धर्मज्ञ! तदनन्तर वहाँसे शतसहस्र और साहस्रक- तीर्थोंकी यात्रा करे । वे दोनों लोकविख्यात तीर्थ हैं । उनमें स्नान करनेसे मनुष्यको सहस्र गोदानका फल प्राप्त होता है । वहाँ किये हुए दान अथवा उपवासका महत्त्व अन्यत्रसे सहस्रगुना अधिक है ॥ १५७-१५८ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र रेणुकातीर्थमुत्तमम् ॥ १५ ९ ॥
तीर्थाभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा अग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ १६० ॥
राजेन्द्र! वहाँसे उत्तम रेणुकातीर्थकी यात्रा करे । पहले उस तीर्थमें स्नान करे; फिर देवताओं और पितरोंकी पूजामें तत्पर हो जाय। उससे तीर्थयात्री सब पापोंसे शुद्ध हो अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता है ॥ १५ ९-१६० ॥
विमोचनमुपस्पृश्य जितमन्युर्जितेन्द्रियः ।
प्रतिग्रहकृतैर्दोषैः सर्वैः स परिमुच्यते ॥ १६१ ॥
विमोचनतीर्थमें स्नान और आचमन करके क्रोध और इन्द्रियोंको काबूमें रखनेवाला मनुष्य प्रतिग्रहजनित सारे दोषोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १६१ ॥
ततः पञ्चवटीं गत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।
पुण्येन महता युक्तः सतां लोके महीयते ॥ १६२ ॥
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तदनन्तर ब्रह्मचारी एवं जितेन्द्रिय पुरुष पंचवटी -तीर्थमें जाकर महान् पुण्यसे युक्त हो सत्पुरुषोंके लोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १६२ ॥
यत्र योगेश्वरः स्थाणुः स्वयमेव वृषध्वजः ।
तमर्चयित्वा देवेशं गमनादेव सिध्यति ॥। १६३ ॥
वहाँ योगेश्वर एवं वृषभध्वज स्वयं भगवान् शिव निवास करते हैं । उन देवेश्वरकी पूजा करके मनुष्य वहाँ जानेमात्र से सिद्ध हो जाता है ॥ १६३ ॥
तैजसं वारुणं तीर्थं दीप्यमानं स्वतेजसा ।
यत्र ब्रह्मादिभिर्देवैर्ऋषिभिश्च तपोधनैः ॥ १६४ ॥
सैनापत्येन देवानामभिषिक्तो गुहस्तदा ।
तैजसस्य तु पूर्वेण कुरुतीर्थं कुरूद्वह ॥ १६५ ॥
वहीं तैजस नामक वरुणदेवतासम्बन्धी तीर्थ है, जो अपने तेजसे प्रकाशित होता है । जहाँ ब्रह्मा आदि देवताओं तथा तपस्वी ऋषियोंने कार्तिकेयको देवसेना- पतिके पदपर अभिषिक्त किया था । कुरुश्रेष्ठ! तैजसतीर्थके पूर्वभागमें कुरुतीर्थ है ॥ १६४-१६५ ॥
कुरुतीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥ १६६ ॥
जो मनुष्य ब्रह्मचर्यपालन और इन्द्रियसंयमपूर्वक कुरुतीर्थमें स्नान करता है, वह सब पापोंसे शुद्ध होकर ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ १६६ ॥
स्वर्गद्वारं ततो गच्छेन्नियतो नियताशनः ।
स्वर्गलोकमवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥ १६७ ॥
तदनन्तर नियमपरायण हो नियमित भोजन करते हुए स्वर्गद्वारको जाय । उस तीर्थके सेवनसे मनुष्य स्वर्गलोक पाता और ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ १६७ ॥
ततो गच्छेदनरकं तीर्थसेवी नराधिप ।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥ १६८ ॥
तत्र ब्रह्मा स्वयं नित्यं देवैः सह महीपते ।
अन्वास्ते पुरुषव्याघ्र नारायणपुरोगमैः ॥ १६ ९ ॥
नरेश्वर! तदनन्तर तीर्थसेवी पुरुष अनरकतीर्थमें जाय । राजन्! उसमें स्नान करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता । महीपते! पुरुषसिंह! वहाँ स्वयं ब्रह्मा नारायण आदि देवताओंके साथ नित्य निवास करते हैं ॥
सांनिध्यं तत्र राजेन्द्र रुद्रपत्न्याः कुरूद्वह ।
अभिगम्य च तां देवीं न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥ १७० ॥
कुरुश्रेष्ठ! महाराज! वहाँ रुद्रपत्नी दुर्गाजीका स्थान भी है । उस देवीके निकट जानेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता ॥ १७० ॥
तत्रैव च महाराज विश्वेश्वरमुमापतिम् ।
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अभिगम्य महादेवं मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥ १७१ ॥
महाराज! वहीं विश्वनाथ उमावल्लभ महादेवजीका स्थान है । वहाँकी यात्रा करके मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है ॥ १७१ ॥
नारायणं चाभिगम्य पद्मनाभमरिंदम ।
राजमानो महाराज विष्णुलोकं च गच्छति ॥ १७२ ॥
तीर्थेषु सर्वदेवानां स्नातः स पुरुषर्षभ ।
सर्वदुःखैः परित्यक्तो द्योतते शशिवन्नरः ॥ १७३ ॥
शत्रुदमन महाराज! पद्मनाभ भगवान् नारायणके निकट जाकर (उनका दर्शन करके ) मनुष्य तेजस्वी रूप धारण करके भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है । पुरुषरत्न! सब देवताओंके तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य सब दुःखोंसे मुक्त हो चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है ॥ १७२-१७३ ॥
ततः स्वस्तिपुरं गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप ।
प्रदक्षिणमुपावृत्य गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १७४ ॥
नरेश्वर! तदनन्तर तीर्थसेवी पुरुष स्वस्तिपुरमें जाय, उसकी परिक्रमा करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ १७४ ॥
पावनं तीर्थमासाद्य तर्पयेत् पितृदेवताः ।
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति भारत ॥ १७५ ॥
तत्पश्चात् पावनतीर्थमें जाकर देवताओं और पितरोंका तर्पण करे । भारत! ऐसा करनेवाले पुरुषको अग्निष्टोमयज्ञका फल मिलता है ॥ १७५ ॥
गङ्गाह्रदश्च तत्रैव कूपश्च भरतर्षभ ।
तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां तस्मिन् कूपे महीपते ॥ १७६ ॥
भरतश्रेष्ठ! वहीं गंगाह्रद नामक कूप है । भूपाल! उस कूपमें तीन करोड़ तीर्थोंका वास है ॥ १७६ ॥
तत्र स्नात्वा नरो राजन् स्वर्गलोकं प्रपद्यते ।
आपगायां नरः स्नात्वा अर्चयित्वा महेश्वरम् ॥ १७७ ॥
गाणपत्यमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् । राजन्! उसमें स्नान करके मानव स्वर्गलोकमें जाता है । जो मनुष्य आपगामें स्नान करके महादेवजीकी पूजा करता है, वह गणपति- पद पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ १७७३ ॥
ततः स्थाणुवटं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ १७८ ॥
तत्र स्नात्वा स्थितो रात्रिं रुद्रलोकमवाप्नुयात् । तदनन्तर त्रिभुवनविख्यात स्थाणुवटतीर्थमें जाय, वहाँ स्नान करके रातभर निवास करनेवाला मनुष्य रुद्रलोकमें जाता है ॥ १७८३ ॥
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बदरीपाचनं गच्छेद् वसिष्ठस्याश्रमं ततः ॥ १७९ ॥
बदरीं भक्षयेत् तत्र त्रिरात्रोपोषितो नरः ।
सम्यग् द्वादशवर्षाणि बदरीं भक्षयेत् तु यः ॥ १८० ॥
त्रिरात्रोपोषितस्तेन भवेत् तुल्यो नराधिप ।
रुद्रमार्गं समासाद्य तीर्थसेवी नराधिप ॥ १८१ ॥
अहोरात्रोपवासेन शक्रलोके महीयते । तदनन्तर बदरीपाचन नामसे प्रसिद्ध वसिष्ठके आश्रमपर जाय और वहाँ तीन रात उपवासपूर्वक रहकर बेरका फल खाय । जो मनुष्य वहाँ बारह वर्षोंतक भलीभाँति त्रिरात्रोपवासपूर्वक बेरका फल खाता है, वह उन्हीं वसिष्ठके समान होता है । राजन्! नरेश्वर! तीर्थसेवी मनुष्य रुद्रमार्गमें जाकर एक दिन - रात उपवास करे। इससे वह इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १७ ९-१८१३ ॥ एकरात्रं समासाद्य एकरात्रोषितो नरः ॥ १८२ ॥
नियतः सत्यवादी च ब्रह्मलोके महीयते । तदनन्तर एकरात्रतीर्थमें जाकर मनुष्य नियमपूर्वक और सत्यवादी होकर एक रात निवास करनेपर ब्रह्मलोकमें पूजित होता है ॥ १८२३ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ १८३ ॥
आदित्यस्याश्रमो यत्र तेजोराशेर्महात्मनः ।
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा पूजयित्वा विभावसुम् ॥ १८४ ॥
आदित्यलोकं व्रजति कुलं चैव समुद्धरेत् । राजेन्द्र! तत्पश्चात् उस त्रैलोक्यविख्यात तीर्थमें जाय, जहाँ तेजोराशि महात्मा सूर्यका आश्रम है । उसमें स्नान करके सूर्यदेवकी पूजा करनेसे मनुष्य सूर्यके लोकमें जाता और अपने कुलका उद्धार करता है ॥ १८३-१८४३ ॥ सोमतीर्थे नरः स्नात्वा तीर्थसेवी नराधिप ॥ १८५ ॥
सोमलोकमवाप्नोति नरो नास्त्यत्र संशयः । नरेश्वर! सोमतीर्थमें स्नान करके तीर्थसेवी मानव सोमलोकको प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १८५३ ॥
ततो गच्छेत धर्मज्ञ दधीचस्य महात्मनः ॥ १८६ ॥
तीर्थं पुण्यतमं राजन् पावनं लोकविश्रुतम् ।
यत्र सारस्वतो यातः सोऽङ्गिरास्तपसो निधिः ॥ १८७ ॥
धर्मज्ञ राजन्! तदनन्तर महात्मा दधीचके लोक- विख्यात परम पुण्यमय, पावन तीर्थकी यात्रा करे । जहाँ तपस्याके भण्डार सरस्वतीपुत्र अंगिराका जन्म हुआ II १८६-१८७ ॥
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् ।
सारस्वतीं गतिं चैव लभते नात्र संशयः ॥ १८८ ॥
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उस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता है और सरस्वतीलोकको प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १८८ ॥
ततः कन्याश्रमं गच्छेन्नियतो ब्रह्मचर्यवान् ।
त्रिरात्रोपोषितो राजन् नियतो नियताशनः ॥ १८ ९ ॥
लभेत् कन्याशतं दिव्यं स्वर्गलोकं च गच्छति । तदनन्तर नियमपूर्वक रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए कन्याश्रमतीर्थमें जाय । राजन्! वहाँ तीन रात उपवास करके नियमपालनपूर्वक नियमित भोजन करनेसे सौ दिव्य कन्याओंकी प्राप्ति होती है और वह मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है ॥ १८ ९ ३ ॥ ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थं संनिहतीमपि ॥। १ ९ ० ॥ धर्मज्ञ! तदनन्तर वहाँसे संनिहतीतीर्थकी यात्रा करे ॥ १ ९ ० ॥
तत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।
मासि मासि समायान्ति पुण्येन महतान्विताः ॥ १ ९ १ ॥
उस तीर्थमें ब्रह्मा आदि देवता और तपोधन महर्षि प्रतिमास महान् पुण्यसे सम्पन्न होकर जाते हैं ॥ १ ९ १ ॥
संनिहत्यामुपस्पृश्य राहुग्रस्ते दिवाकरे ।
अश्वमेधशतं तेन तत्रेष्टं शाश्वतं भवेत् ॥ १ ९ २ ॥
सूर्यग्रहणके समय संनिहतीमें स्नान करनेसे सौ अश्वमेधयज्ञोंका अभीष्ट एवं शाश्वत फल प्राप्त होता है ॥ १ ९ २ ॥
पृथिव्यां यानि तीर्थानि अन्तरिक्षचराणि च ।
नद्यो ह्रदास्तडागाश्च सर्वप्रस्रवणानि च ॥ १ ९ ३ ॥
उदपानानि वाप्यश्च तीर्थान्यायतनानि च ।
निःसंशयममावास्यां समेष्यन्ति नराधिप ॥ १ ९ ४ ॥
मासि मासि नरव्याघ्र संनिहत्यां न संशयः ।
तीर्थसंनिहनादेव संनिहत्येति विश्रुता ॥ १ ९ ५ ॥
पृथ्वीपर और आकाशमें जितने तीर्थ, नदी, ह्रद, तड़ाग, सम्पूर्ण झरने, उदपान, बावली, तीर्थ और मन्दिर हैं, वे प्रत्येक मासकी अमावस्याको संनिहतीमें अवश्य पधारेंगे । तीर्थोंका संघात या समूह होनेके कारण ही वह संनिहती नामसे विख्यात है ॥ १ ९३–१९५ ॥
तत्र स्नात्वा च पीत्वा च स्वर्गलोके महीयते ।
अमावास्यां तु तत्रैव राहुग्रस्ते दिवाकरे ॥ १ ९ ६ ॥
यः श्राद्धं कुरुते मर्त्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु ।
अश्वमेधसहस्रस्य सम्यगिष्टस्य यत् फलम् ॥ १ ९ ७ ॥
स्नात एव समाप्नोति कृत्वा श्राद्धं च मानवः ।
यत् किंचिद् दुष्कृतं कर्म स्त्रिया वा पुरुषेण वा ॥ १ ९ ८ ॥
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स्नातमात्रस्य तत् सर्वं नश्यते नात्र संशयः ।
पद्मवर्णेन यानेन ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥ १ ९९ ॥
राजन्! उसमें स्नान और जलपान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है । जो सूर्यग्रहणके समय अमावास्याको वहाँ पितरोंका श्राद्ध करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन सुनो— । भलीभाँति सम्पन्न किये हुए सहस्र अश्वमेध यज्ञोंका जो फल होता है, उसे मनुष्य उस तीर्थमें स्नानमात्र करके अथवा श्राद्ध करके पा लेता है । स्त्री या पुरुषने जो कुछ भी दुष्कर्म किया हो, वह सब वहाँ स्नान करनेमात्रसे नष्ट हो जाता है; इसमें संशय नहीं है । वह पुरुष कमलके समान रंगवाले विमानद्वारा ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ १ ९६–१९९ ॥
अभिवाद्य ततो यक्षं द्वारपालं मचक्रुकम् ।
कोटितीर्थमुपस्पृश्य लभेद् बहुसुवर्णकम् ॥ २०० ॥
तदनन्तर मचक्रुक नामक द्वारपाल यक्षको प्रणाम करके कोटितीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको प्रचुर सुवर्ण- राशिकी प्राप्ति होती है ॥ २०० ॥
गङ्गाह्रदश्च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम ।
तत्र स्नायीत धर्मज्ञ ब्रह्मचारी समाहितः ॥ २०१ ॥
राजसूयाश्वमेधाभ्यां फलं विन्दति मानवः । धर्मज्ञ भरतश्रेष्ठ! वहीं गंगाह्रद नामक तीर्थ है, उसमें ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो स्नान करे, इससे मनुष्यको राजसूय और अश्वमेध यज्ञोंद्वारा मिलनेवाले फलकी प्राप्ति होती है ॥ २०१३ ॥
पृथिव्यां नैमिषं तीर्थमन्तरिक्षे च पुष्करम् ॥ २०२ ॥
त्रयाणामपि लोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते ।
पांसवोऽपि कुरुक्षेत्राद् वायुना समुदीरिताः ॥ २०३ ॥
अपि दुष्कृतकर्माणं नयन्ति परमां गतिम् ।
दक्षिणेन सरस्वत्या उत्तरेण दृषद्वतीम् ॥ २०४ ॥
ये वसन्ति कुरुक्षेत्रे ते वसन्ति त्रिविष्टपे । भूमण्डलके निवासियोंके लिये नैमिष, अन्तरिक्ष -निवासियोंके लिये पुष्कर और तीनों लोकोंके निवासियोंके लिये कुरुक्षेत्र विशिष्ट तीर्थ हैं । कुरुक्षेत्रसे वायुद्वारा उड़ायी हुई धूल भी पापी - से - पापी मनुष्यपर भी पड़ जाय तो उसे परमगतिको पहुँचा देती है । सरस्वतीसे दक्षिण, दृषद्वतीसे उत्तर कुरुक्षेत्रमें जो लोग निवास करते हैं, वे मानो स्वर्गलोकमें बसते हैं ॥ २०२–२०४ ॥ कुरुक्षेत्रे गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम् ॥ २०५ ॥
अप्येकां वाचमुत्सृज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते । ' मैं कुरुक्षेत्रमें जाऊँगा, कुरुक्षेत्रमें निवास करूँगा' ऐसी बात एक बार मुँहसे कह देनेपर भी मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २०५३ ॥
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ब्रह्मवेदी कुरुक्षेत्रं पुण्यं ब्रह्मर्षिसेवितम् ॥ २०६ ॥
तस्मिन् वसन्ति ये मर्त्या न ते शोच्याः कथंचन ॥ २०७ ॥
कुरुक्षेत्र ब्रह्माजीकी वेदी है, इस पुण्यक्षेत्रका ब्रह्मर्षिगण सेवन करते हैं । जो मानव उसमें निवास करते हैं, वे किसी प्रकार शोकजनक अवस्थामें नहीं पड़ते ॥ २०६-२०७ ॥ तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं रामह्रदानां च मचक्रुकस्य च । एतत् कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चकं पितामहस्योत्तरवेदिरुच्यते ॥ २०८ ॥
तरन्तुक और अरन्तुकके तथा रामह्रद और मचक्रुकके बीचका जो भूभाग है, यही
कुरुक्षेत्र एवं समन्तपञ्चक है । इसे ब्रह्माजीकी उत्तरवेदी कहते हैं ॥ २०८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि पुलस्त्यतीर्थयात्रायां त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें पुलस्त्यतीर्थयात्राविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥