02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 611–620
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 611–620
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चतुरशीतितमोऽध्यायः नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा पुलस्त्यउवाच
ततो गच्छेन्महाराज धर्मतीर्थमनुत्तमम् ।
यत्र धर्मो महाभागस्तप्तवानुत्तमं तपः ॥ १ ॥
पुलस्त्यजी कहते हैं - महाराज! तदनन्तर परम उत्तम धर्मतीर्थकी यात्रा करे, जहाँ महाभाग धर्मने उत्तम तपस्या की थी ॥ १ ॥
तेन तीर्थं कृतं पुण्यं स्वेन नाम्ना च विश्रुतम् ।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् धर्मशीलः समाहितः ॥ २ ॥
आसप्तमं कुलं चैव पुनीते नात्र संशयः । राजन्! उन्होंने ही अपने नामसे विख्यात पुण्य तीर्थकी स्थापना की है । वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य धर्मशील एवं एकाग्रचित्त होता है और अपने कुलकी सातवीं पीढ़ीतकके लोगोंको पवित्र कर देता है; इसमें संशय नहीं है ॥ २३ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र ज्ञानपावनमुत्तमम् ॥३ ॥
अग्निष्टोममवाप्नोति मुनिलोकं च गच्छति । राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम ज्ञानपावन तीर्थमें जाय । वहाँ जानेसे मनुष्य अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता और मुनिलोकमें जाता है ॥ ३३ ॥
सौगन्धिकवनं राजंस्ततो गच्छेत मानवः ॥ ४ ॥
राजन्! तत्पश्चात् मानव सौगन्धिक वनमें जाय ॥ ४ ॥
तत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।
सिद्धचारणगन्धर्वाः किंनराश्च महोरगाः ॥ ५ ॥
वहाँ ब्रह्मा आदि देवता, तपोधन ऋषि, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, किन्नर और बड़े -बड़े नाग निवास करते हैं ॥
तद् वनं प्रविशन्नेव सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
ततश्चापि सरिच्छ्रेष्ठा नदीनामुत्तमा नदी ॥ ६ ॥
प्लक्षाद्देवी स्रुता राजन् महापुण्या सरस्वती ।
तत्राभिषेकं कुर्वीत वल्मीकान्निःसृते जले ॥ ७ ॥
उस वनमें प्रवेश करते ही मानव सब पापोंसे मुक्त हो जाता है । उससे आगे सरिताओंमें श्रेष्ठ और नदियोंमें उत्तम नदी परम पुण्यमयी सरस्वतीदेवीका उद्गम स्थान है, जहाँ वे प्लक्ष ( पकड़ी ) नामक वृक्षकी जड़से टपक रही हैं । राजन्! वहाँ बाँबीसे निकले हुए जलमें स्नान करना चाहिये ॥ ६-७ ॥
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अर्चयित्वा पितॄन् देवानश्वमेधफलं लभेत् ।
ईशानाध्युषितं नाम तत्र तीर्थं सुदुर्लभम् ॥ ८ ॥
वहाँ देवताओं तथा पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्यको अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ।
वहीं ईशानाध्युषित नामक परम दुर्लभ तीर्थ है ॥ ८ ॥
षट्सु शम्यानिपातेषु वल्मीकादिति निश्चयः ।
कपिलानां सहस्रं च वाजिमेधं च विन्दति ॥ ९ ॥
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र दृष्टमेतत् पुरातनैः । जहाँ बाँबीका जल है, वहाँसे इसकी दूरी छः शम्यानिपात* है । यह निश्चित माप बताया गया है । नरश्रेष्ठ! उस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको सहस्र कपिलादान और अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है; इसे प्राचीन ऋषियोंने प्रत्यक्ष अनुभव किया है ॥ ९ ३ ॥ सुगन्धां शतकुम्भां च पञ्चयज्ञां च भारत । १० ॥ अभिगम्य नरश्रेष्ठ स्वर्गलोके महीयते । भारत! पुरुषरत्न! सुगन्धा, शतकुम्भा तथा पंचयज्ञा तीर्थमें जाकर मानव स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १०३ ॥
त्रिशूलखातं तत्रैव तीर्थमासाद्य भारत ॥ ११ ॥
तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः ।
गाणपत्यं च लभते देहं त्यक्त्वा न संशयः ॥ १२ ॥
भरतकुलतिलक! वहीं त्रिशूलखात नामक तीर्थ है; वहाँ जाकर स्नान करे और देवताओं तथा पितरोंकी पूजामें लग जाय । ऐसा करनेवाला मनुष्य देहत्यागके अनन्तर गणपति- पद प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ११-१२ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र देव्याः स्थानं सुदुर्लभम् ।
शाकम्भरीति विख्याता त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ १३ ॥
राजेन्द्र! वहाँसे परमदुर्लभ देवीस्थानकी यात्रा करे, वह देवी तीनों लोकोंमें शाकम्भरीके नामसे विख्यात है ॥ १३ ॥
दिव्यं वर्षसहस्रं हि शाकेन किल सुव्रता ।
आहारं सा कृतवती मासि मासि नराधिप ॥ १४ ॥
ऋषयोऽभ्यागतास्तत्र देव्या भक्त्या तपोधनाः ।
आतिथ्यं च कृतं तेषां शाकेन किल भारत ॥ १५ ॥
नरेश्वर! कहते हैं उत्तम व्रतका पालन करनेवाली उस देवीने एक हजार दिव्य वर्षोंतक एक-एक महीनेपर केवल शाकका आहार किया था । देवीकी भक्तिसे प्रभावित होकर बहुत - से तपोधन महर्षि वहाँ आये । भारत! उस देवीने उन महर्षियोंका आतिथ्य- सत्कार भी शाकके ही द्वारा किया ॥ १४-१५ ॥
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ततः शाकम्भरीत्येव नाम तस्याः प्रतिष्ठितम् ।
शाकम्भरीं समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः ॥ १६ ॥
त्रिरात्रमुषितः शाकं भक्षयित्वा नरः शुचिः ।
शाकाहारस्य यत् किंचिद् वर्षेर्द्वादशभिः कृतम् ॥ १७ ॥
तत् फलं तस्य भवति देव्याश्छन्देन भारत । भारत! तबसे उस देवीका ' शाकम्भरी' ही नाम प्रसिद्ध हो गया । शाकम्भरीके समीप जाकर मनुष्य ब्रह्मचर्य पालनपूर्वक एकाग्रचित्त और पवित्र हो वहाँ तीन राततक शाक खाकर रहे तो बारह वर्षोंतक शाकाहारी मनुष्यको जो पुण्य प्राप्त होता है, वह उसे देवीकी इच्छासे ( तीन ही दिनोंमें ) मिल जाता है ॥ १६-१७ ॥ ततो गच्छेत् सुवर्णाख्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ १८ ॥
तत्र विष्णुः प्रसादार्थं रुद्रमाराधयत् पुरा ।
वरांश्च सुबहँल्लेभे दैवतेषु सुदुर्लभान् ॥ १ ९ ॥
तदनन्तर त्रिभुवनविख्यात सुवर्णतीर्थकी यात्रा करे । वहाँ पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने रुद्रदेवकी प्रसन्नताके लिये उनकी आराधना की और उनसे अनेक देवदुर्लभ उत्तम वर प्राप्त किये ॥ १८-१९ ॥
उक्तश्च त्रिपुरघ्नेन परितुष्टेन भारत ।
अपि च त्वं प्रियतरो लोके कृष्ण भविष्यसि ॥ २० ॥
त्वन्मुखं च जगत् सर्वं भविष्यति न संशयः ।
तत्राभिगम्य राजेन्द्र पूजयित्वा वृषध्वजम् ॥ २१ ॥
अश्वमेधमवाप्नोति गाणपत्यं च विन्दति ।
धूमावतीं ततो गच्छेत् त्रिरात्रोपोषितो नरः ॥ २२ ॥
मनसा प्रार्थितान् कामाँल्लभते नात्र संशयः । भारत! उस समय संतुष्टचित्त त्रिपुरारि शिवने श्रीविष्णुसे कहा- ' श्रीकृष्ण! तुम मुझे लोकमें अत्यन्त प्रिय होओगे । संसारमें सर्वत्र तुम्हारी ही प्रधानता होगी, इसमें संशय नहीं है । ' राजेन्द्र! उस तीर्थमें जाकर भगवान् शंकरकी पूजा करनेसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और गणपतिपद प्राप्त कर लेता है । वहाँसे मनुष्य धूमावतीतीर्थको जार और तीन रात उपवास करे । इससे वह निःसंदेह मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ २०– २२ ॥ देव्यास्तु दक्षिणार्धेन रथावर्तो नराधिप ॥ २३ ॥
तत्रारोहेत धर्मज्ञ श्रद्दधानो जितेन्द्रियः ।
महादेवप्रसादाद्धि गच्छेत परमां गतिम् ॥ २४ ॥
नरेश्वर! देवीसे दक्षिणार्ध भागमें रथावर्त नामक तीर्थ है । धर्मज्ञ! जो श्रद्धालु एवं जितेन्द्रिय पुरुष उस तीर्थकी यात्रा करता है, वह महादेवजीके प्रसादसे परम गति प्राप्त कर
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लेता है ॥ २३-२४ ॥
प्रदक्षिणमुपावृत्य गच्छेत भरतर्षभ ।
धारां नाम महाप्राज्ञः सर्वपापप्रमोचनीम् ॥ २५ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर महाप्राज्ञ पुरुष उस तीर्थकी परिक्रमा करके धाराकी यात्रा करे, जो सब पापोंसे छुड़ानेवाली है ॥ २५ ॥
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र न शोचति नराधिप ।
नरव्याघ्र! नराधिप! वहाँ स्नान करके मनुष्य कभी शोकमें नहीं पड़ता ॥ २५३ ॥
ततो गच्छेत धर्मज्ञ नमस्कृत्य महागिरिम् ॥ २६ ॥
स्वर्गद्वारेण यत् तुल्यं गङ्गाद्वारं न संशयः ।
तत्राभिषेकं कुर्वीत कोटितीर्थे समाहितः ॥ २७ ॥
धर्मज्ञ! वहाँसे महापर्वत हिमालयको नमस्कार करके गंगाद्वार ( हरिद्वार ) -की यात्रा करे, जो स्वर्गद्वारके समान है; इसमें संशय नहीं है । वहाँ एकाग्रचित्त हो कोटितीर्थमें स्नान करे ॥ २६-२७ ॥
पुण्डरीकमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ।
उष्यैकां रजनीं तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ॥ २८ ॥
ऐसा करनेवाला मनुष्य पुण्डरीकयज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है । वहाँ एक रात निवास करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ २८ ॥
सप्तगङ्गे त्रिगङ्गे च शक्रावर्ते च तर्पयन् ।
देवान् पितॄंश्च विधिवत् पुण्ये लोके महीयते ॥ २ ९ ॥
सप्तगंग, त्रिगंग और शक्रावर्ततीर्थमें विधिपूर्वक देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करनेवाला मनुष्य पुण्य- लोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ २ ९ ॥
ततः कनखले स्नात्वा त्रिरात्रोपोषितो नरः ।
अश्वमेधमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ ३० ॥
तदनन्तर कनखलमें स्नान करके तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और स्वर्ग- लोकमें जाता है ॥ ३० ॥
कपिलावटं ततो गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप ।
उपोष्य रजनीं तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ३१ ॥
नरेश्वर! उसके बाद तीर्थसेवी मनुष्य कपिलावट- तीर्थमें जाय । वहाँ रातभर उपवास करनेसे उसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ३१ ॥
नागराजस्य राजेन्द्र कपिलस्य महात्मनः ।
तीर्थं कुरुवरश्रेष्ठ सर्वलोकेषु विश्रुतम् ॥ ३२ ॥
राजेन्द्र! कुरुश्रेष्ठ! वहीं नागराज महात्मा कपिलका तीर्थ है, जो सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात है ॥ ३२ ॥
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तत्राभिषेकं कुर्वीत नागतीर्थे नराधिप कपिलानां सहस्रस्य फलं विन्दति मानवः ॥ ३३ ॥
महाराज! वहाँ नागतीर्थमें स्नान करना चाहिये । इससे मनुष्यको सहस्र कपिलादानका फल प्राप्त होता है ॥ ३३ ॥
ततो ललितकं गच्छेच्छान्तनोस्तीर्थमुत्तमम् ।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥ ३४ ॥
तत्पश्चात् शान्तनुके उत्तम तीर्थ ललितकमें जाय। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता ॥ ३४ ॥
गङ्गायमुनयोर्मध्ये स्नाति यः संगमे नरः ।
दशाश्वमेधानाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ३५ ॥
जो मनुष्य गंगा-यमुनाके बीच संगम (प्रयाग) -में स्नान करता है, उसे दस अश्वमेधयज्ञोंका फल मिलता है और वह अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ३५ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र सुगन्धां लोकविश्रुताम् ।
सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोके महीयते ॥ ३६ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर लोकविख्यात सुगन्धातीर्थकी यात्रा करे। इससे सब पापोंसे विशुद्धचित्त हुआ मानव ब्रह्मलोकमें पूजित होता है ॥ ३६ ॥
रुद्रावर्तं ततो गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप ।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ ३७ ॥
नरेश्वर! तदनन्तर तीर्थसेवी पुरुष रुद्रावर्ततीर्थमें जाय । राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है ॥ ३७ ॥
गङ्गायाश्च नरश्रेष्ठ सरस्वत्याश्च संगमे ।
स्नात्वाश्वमेधं प्राप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ ३८ ॥
नरश्रेष्ठ! गंगा और सरस्वतीके संगममें स्नान करनेसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और स्वर्ग - लोकमें जाता है ॥ ३८ ॥
भद्रकर्णेश्वरं गत्वा देवमर्च्य यथाविधि ।
न दुर्गतिमवाप्नोति नाकपृष्ठे च पूज्यते ॥ ३ ९ ॥
भगवान् भद्रकर्णेश्वरके समीप जाकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करनेवाला पुरुष कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता और स्वर्गलोकमें पूजित होता है ॥ ३ ९ ॥
ततः कुब्जाम्रकं गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप ।
गोसहस्रमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ ४० ॥
नरेन्द्र! तत्पश्चात् तीर्थसेवी मानव कुब्जाम्रक - तीर्थमें जाय । वहाँ उसे सहस्र गोदानका फल मिलता है और अन्तमें वह स्वर्गलोकको जाता है ॥ ४० ॥
अरुन्धतीवटं गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप ।
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सामुद्रकमुपस्पृश्य ब्रह्मचारी समाहितः ॥ ४१ ॥
अश्वमेधमवाप्नोति त्रिरात्रोपोषितो नरः ।
गोसहस्रफलं विद्यात् कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ४२ ॥
नरपते! तत्पश्चात् तीर्थसेवी अरुन्धतीवटके समीप जाय और सामुद्रकतीर्थमें स्नान करके ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो तीन रात उपवास करे । इससे मनुष्य अश्वमेधयज्ञ और सहस्र गोदानका फल पाता तथा अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ४१-४२ ॥
ब्रह्मावर्तं ततो गच्छेद् ब्रह्मचारी समाहितः ।
अश्वमेधमवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ॥ ४३ ॥
तदनन्तर ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक चित्तको एकाग्र करके ब्रह्मावर्ततीर्थमें जाय । इससे वह अश्वमेधयज्ञका फल पाता और सोमलोकको जाता है ॥ ४३ ॥
यमुनाप्रभवं गत्वा समुपस्पृश्य यामुनम् ।
अश्वमेधफलं लब्ध्वा स्वर्गलोके महीयते ॥ ४४ ॥
यमुनाप्रभव नामक तीर्थमें जाकर यमुनाजलमें स्नान करके अश्वमेधयज्ञका फल पाकर मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ४४ ॥
दर्वीसंक्रमणं प्राप्य तीर्थं त्रैलोक्यपूजितम् ।
अश्वमेधमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ ४५ ॥
दर्वीसंक्रमण नामक त्रिभुवनपूजित तीर्थमें जानेसे तीर्थयात्री अश्वमेधयज्ञका फल पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ॥ ४५ ॥
सिन्धोश्च प्रभवं गत्वा सिद्धगन्धर्वसेवितम् ।
तत्रोष्य रजनीः पञ्च विन्देद् बहुसुवर्णकम् ॥ ४६ ॥
सिंधुके उद्गमस्थानमें जो सिद्ध- गन्धर्वोद्वारा सेवित है, जाकर पाँच रात उपवास करनेसे प्रचुर सुवर्णराशिकी प्राप्ति होती है ॥ ४६ ॥
अथ वेदीं समासाद्य नरः परमदुर्गमाम् ।
अश्वमेधमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ ४७ ॥
तदनन्तर मनुष्य परम दुर्गम वेदीतीर्थमें जाकर अश्वमेधयज्ञका फल पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ॥ ४७ ॥
ऋषिकुल्यां समासाद्य वासिष्ठं चैव भारत ।
वासिष्ठीं समतिक्रम्य सर्वे वर्णा द्विजातयः ॥ ४८ ॥
भरतनन्दन! ऋषिकुल्या एवं वासिष्ठतीर्थमें जाकर स्नान आदि करके वासिष्ठीको लाँघकर जानेवाले क्षत्रिय आदि सभी वर्णोंके लोग द्विजाति हो जाते हैं ॥ ४८ ॥
ऋषिकुल्यां समासाद्य नरः स्नात्वा विकल्मषः ।
देवान् पितॄंश्चार्चयित्वा ऋषिलोकं प्रपद्यते ॥ ४ ९ ॥
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ऋषिकुल्यामें जाकर स्नान करके पापरहित मानव देवताओं और पितरोंकी पूजा करके ऋषिलोकमें जाता है ॥ ४ ९ ॥
यदि तत्र वसेन्मासं शाकाहारो नराधिप ।
भृगुतुङ्गं समासाद्य वाजिमेधफलं लभेत् ॥ ५० ॥
नरेश्वर! यदि मनुष्य भृगुतुंगमें जाकर शाकाहारी हो वहाँ एक मासतक निवास करे तो उसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ५० ॥
गत्वा वीरप्रमोक्षं च सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
कृत्तिकामघयोश्चैव तीर्थमासाद्य भारत ॥ ५१ ॥
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलमाप्नोति मानवः ।
तत्र संध्यां समासाद्य विद्यातीर्थमनुत्तमम् ॥ ५२ ॥
उपस्पृश्य च वै विद्यां यत्र तत्रोपपद्यते ।
महाश्रमे वसेद् रात्रिं सर्वपापप्रमोचने ॥ ५३ ॥
एककालं निराहारो लोकानावसते शुभान् । वीरप्रमोक्षतीर्थमें जाकर मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है। भारत! कृत्तिका और मघाके तीर्थमें जाकर मानव अग्निष्टोम और अतिरात्र यज्ञोंका फल पाता है। वहीं प्रातः - संध्याके समय परम उत्तम विद्यातीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्य जहाँ- कहीं भी विद्या प्राप्त कर लेता है । जो सब पापोंसे छुड़ानेवाले महाश्रमतीर्थमें एक समय उपवास करके एक रात वहीं निवास करता है, उसे शुभ लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥ ५१-५३३ ॥ षष्ठकालोपवासेन मासमुष्य महालये ॥ ५४ ॥
सर्वपापविशुद्धात्मा विन्देद् बहुसुवर्णकम् ।
दशापरान् दश पूर्वान् नरानुद्धरते कुलम् ॥ ५५ ॥
जो छठे समय उपवासपूर्वक एक मासतक महालयतीर्थमें निवास करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त हो प्रचुर सुवर्णराशि प्राप्त करता है । साथ ही दस पहलेकी और दस बादकी पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है ॥
अथ वेतसिकां गत्वा पितामहनिषेविताम् ।
अश्वमेधमवाप्नोति गच्छेदौशनसीं गतिम् ॥ ५६ ॥
तत्पश्चात् ब्रह्माजीके द्वारा सेवित वेतसिकातीर्थमें जाकर मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और शुक्राचार्यके लोकमें जाता है ॥ ५६ ॥
अथ सुन्दरिकातीर्थं प्राप्य सिद्धनिषेवितम् ।
रूपस्य भागी भवति दृष्टमेतत् पुरातनैः ॥ ५७ ॥
तदनन्तर सिद्धसेवित सुन्दरिकातीर्थमें जाकर मनुष्य रूपका भागी होता है, यह बात प्राचीन ऋषियोंने देखी है ॥ ५७ ॥
ततो वै ब्राह्मणीं गत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।
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पद्मवर्णेन यानेन ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥ ५८ ॥
इसके बाद इन्द्रियसंयम और ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक ब्राह्मणीतीर्थमें जानेसे मनुष्य कमलके समान कान्तिवाले विमानद्वारा ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ ५८ ॥
ततस्तु नैमिषं गच्छेत् पुण्यं सिद्धनिषेवितम् ।
तत्र नित्यं निवसति ब्रह्मा देवगणैः सह ॥ ५ ९ ॥
तदनन्तर सिद्धसेवित पुण्यमय नैमिष ( नैमिषारण्य ) - तीर्थमें जाय । वहाँ देवताओंके साथ ब्रह्माजी नित्य निवास करते हैं ॥ ५ ९ ॥
नैमिषं मृगयानस्य पापस्यार्धं प्रणश्यति ।
प्रविष्टमात्रस्तु नरः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ६० ॥
नैमिषकी खोज करनेवाले पुरुषका आधा पाप उसी समय नष्ट हो जाता है और उसमें प्रवेश करते ही वह सारे पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ६० ॥
तत्र मासं वसेद् धीरो नैमिषे तीर्थतत्परः ।
पृथिव्यां यानि तीर्थानि तानि तीर्थानि नैमिषे ॥ ६१ ॥
धीर पुरुष तीर्थसेवनमें तत्पर हो एक मासतक नैमिषमें निवास करे । पृथ्वीमें जितने तीर्थ हैं, वे सभी नैमिषमें विद्यमान हैं ॥ ६१ ॥
कृताभिषेकस्तत्रैव नियतो नियताशनः ।
गवां मेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति भारत ॥ ६२ ॥
भारत! जो वहाँ स्नान करके नियमपालनपूर्वक नियमित भोजन करता है, वह गोमेधयज्ञका फल पाता है ॥ ६२ ॥
पुनात्यासप्तमं चैव कुलं भरतसत्तम ।
यस्त्यजेन्नैमिषे प्राणानुपवासपरायणः ॥ ६३ ॥
स मोदेत् सर्वलोकेषु एवमाहुर्मनीषिणः ।
नित्यं मेध्यं च पुण्यं च नैमिषं नृपसत्तम ॥ ६४ ॥
भरतश्रेष्ठ! अपने कुलकी सात पीढ़ियोंका भी वह उद्धार कर देता है । जो नैमिषमें उपवासपूर्वक प्राणत्याग करता है, वह सब लोकोंमें आनन्दका अनुभव करता है; ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है। नृपश्रेष्ठ! नैमिषतीर्थ नित्य, पवित्र और पुण्यजनक है ॥ ६३-६४ ॥
गङ्गोद्भेदं समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ।
वाजपेयमवाप्नोति ब्रह्मभूतो भवेत् सदा ॥ ६५ ॥
गंगोद्भेदतीर्थमें जाकर तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य वाजपेययज्ञका फल पाता और सदाके लिये ब्रह्मीभूत हो जाता है ॥ ६५ ॥
सरस्वतीं समासाद्य तर्पयेत् पितृदेवताः ।
सारस्वतेषु लोकेषु मोदते नात्र संशयः ॥ ६६ ॥
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सरस्वतीतीर्थमें जाकर देवता और पितरोंका तर्पण करे । इससे तीर्थयात्री सारस्वतलोकोंमें जाकर आनन्दका भागी होता है; इसमें संशय नहीं है ॥ ६६ ॥
ततश्च बाहुदां गच्छेद् ब्रह्मचारी समाहितः ।
तत्रोष्य रजनीमेकां स्वर्गलोके महीयते ॥ ६७ ॥
देवसत्रस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति कौरव । तदनन्तर बाहुदातीर्थमें जाय और ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो वहाँ एक रात उपवास करे; इससे वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है । कुरुनन्दन! उसे देवसत्रयज्ञका भी फल प्राप्त होता है ॥ ६७३ ॥
ततः क्षीरवतीं गच्छेत् पुण्यां पुण्यतरैर्वृताम् ॥ ६८ ॥
पितृदेवार्चनपरो वाजपेयमवाप्नुयात् । वहाँसे क्षीरवती नामक पुण्यतीर्थमें जाय, जो अत्यन्त पुण्यात्मा पुरुषोंसे भरी हुई है । वहाँ स्नान करके देवता और पितरोंके पूजनमें लगा हुआ मनुष्य वाजपेययज्ञका फल पाता है ॥ ६८३ ॥
विमलाशोकमासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः ॥ ६ ९ ॥ तत्रोष्य रजनीमेकां स्वर्गलोके महीयते । वहीं विमलाशोक नामक उत्तम तीर्थ है, वहाँ जाकर ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो एक रात निवास करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ गोप्रतारं ततो गच्छेत् सरय्वास्तीर्थमुत्तमम् ॥ ७० ॥
यत्र रामो गतः स्वर्गं सभृत्यबलवाहनः ।
स च वीरो महाराज तस्य तीर्थस्य तेजसा ॥ ७१ ॥
वहाँसे सरयूके उत्तम तीर्थ गोप्रतारमें जाय । महाराज! वहाँ अपने सेवकों, सैनिकों और वाहनोंके साथ गोते लगाकर उस तीर्थके प्रभावसे वे वीर श्रीरामचन्द्रजी अपने नित्यधामको पधारे थे ॥ ७०-७१ ॥
रामस्य च प्रसादेन व्यवसायाच्च भारत ।
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा गोप्रतारे नराधिप ॥ ७२ ॥
सर्वपापविशुद्धात्मा स्वर्गलोके महीयते । भरतनन्दन! नरेश्वर! उस सरयूके गोप्रतारतीर्थमें स्नान करके मनुष्य श्रीरामचन्द्रजीकी कृपा और उद्योगसे सब पापोंसे शुद्ध होकर स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है ॥ रामतीर्थे नरः स्नात्वा गोमत्यां कुरुनन्दन ॥ ७३ ॥
अश्वमेधमवाप्नोति पुनाति च कुलं नरः । कुरुनन्दन! गोमतीके रामतीर्थमें स्नान करके मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और अपने कुलको पवित्र कर देता है ॥ ७३ ॥
शतसाहस्रकं तीर्थं तत्रैव भरतर्षभ ॥ ७४ ॥
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तत्रोपस्पर्शनं कृत्वा नियतो नियताशनः ।
गोसहस्रफलं पुण्यं प्राप्नोति भरतर्षभ ॥ ७५ ॥
भरतकुलभूषण! वहीं शतसाहस्रकतीर्थ है । उसमें स्नान करके नियमपालनपूर्वक नियमित भोजन करते हुए मनुष्य सहस्र गोदानका पुण्यफल प्राप्त करता है ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र भर्तृस्थानमनुत्तमम् ।
अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ७६ ॥
राजेन्द्र! वहाँसे परम उत्तम भर्तृस्थानको जाय । वहाँ जानेसे मनुष्यको अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ७६ ॥
कोटितीर्थे नरः स्नात्वा अर्चयित्वा गुहं नृप ।
गोसहस्रफलं विद्यात् तेजस्वी च भवेन्नरः ॥ ७७ ॥
राजन्! मनुष्य कोटितीर्थमें स्नान करके कार्तिकेयजीका पूजन करनेसे सहस्र गोदानका फल पाता और तेजस्वी होता है ॥ ७७ ॥
ततो वाराणसीं गत्वा अर्चयित्वा वृषध्वजम् ।
कपिलाहृदे नरः स्नात्वा राजसूयमवाप्नुयात् ॥ ७८ ॥
तदनन्तर वाराणसी ( काशी ) - तीर्थमें जाकर भगवान् शंकरकी पूजा करे और कपिलाह्रदमें गोता लगाये; इससे मनुष्यको राजसूययज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ७८ ॥
अविमुक्तं समासाद्य तीर्थसेवी कुरूद्वह ।
दर्शनाद् देवदेवस्य मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥ ७९ ॥
प्राणानुत्सृज्य तत्रैव मोक्षं प्राप्नोति मानवः । कुरुश्रेष्ठ! अविमुक्त तीर्थमें जाकर तीर्थसेवी मनुष्य देवदेव महादेवजीका दर्शनमात्र करके ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है । वहीं प्राणोत्सर्ग करके मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ७ ९ ॥ मार्कण्डेयस्य राजेन्द्र तीर्थमासाद्य दुर्लभम् ॥ ८० ॥
गोमतीगङ्गयोश्चैव संगमे लोकविश्रुते ।
अग्निष्टोममवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ८१ ॥
राजेन्द्र! गोमती और गंगाके लोकविख्यात संगमके समीप मार्कण्डेयजीका दुर्लभ तीर्थ है । उसमें जाकर मनुष्य अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ८०-८१ ॥
ततो गयां समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः ।
अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ८२ ॥
तदनन्तर गयातीर्थमें जाकर ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ८२ ॥
तत्राक्षयवटो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ।