श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 621–630
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 621–630
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तत्र दत्तं पितृभ्यस्तु भवत्यक्षयमुच्यते ॥ ८३ ॥
वहाँ तीनों लोकोंमें विख्यात अक्षयवट है । उनके समीप पितरोंके लिये दिया हुआ सब कुछ अक्षय बताया जाता है ॥ ८३ ॥
महानद्यामुपस्पृश्य तर्पयेत् पितृदेवताः ।
अक्षयान् प्राप्नुयाल्लोकान् कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ८४ ॥
महानदीमें स्नान करके जो देवताओं और पितरोंका तर्पण करता है, वह अक्षय लोकोंको प्राप्त होता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ८४ ॥
ततो ब्रह्मसरो गत्वा धर्मारण्योपशोभितम् ।
ब्रह्मलोकमवाप्नोति प्रभातामेव शर्वरीम् ॥ ८५ ॥
तदनन्तर धर्मारण्यसे सुशोभित ब्रह्मसरोवरकी यात्रा करके वहाँ एक रात प्रातःकालतक निवास करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त कर लेता है ॥ ८५ ॥
ब्रह्मणा तत्र सरसि यूपश्रेष्ठः समुच्छ्रितः ।
यूपं प्रदक्षिणं कृत्वा वाजपेयफलं लभेत् ॥ ८६ ॥
ब्रह्माजीने उस सरोवरमें एक श्रेष्ठ यूपकी स्थापना की थी। उसकी परिक्रमा करनेसे मानव वाजपेययज्ञका फल पा लेता है ॥ ८६ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र धेनुकं लोकविश्रुतम् ।
एकरात्रोषितो राजन् प्रयच्छेत् तिलधेनुकाम् ॥ ८७ ॥
सर्वपापविशुद्धात्मा सोमलोकं व्रजेद् ध्रुवम् । राजेन्द्र! वहाँसे लोकविख्यात धेनुतीर्थमें जाय । महाराज! वहाँ एक रात रहकर तिलकी गौका दान करे । * इससे तीर्थयात्री पुरुष सब पापोंसे शुद्धचित्त हो निश्चय ही सोमलोकमें जाता है ॥ ८७ ॥
तत्र चिह्नं महद् राजन्नद्यापि सुमहद् भृशम् ॥ ८८ ॥
कपिलायाः सवत्सायाश्चरन्त्याः पर्वते कृतम् ।
सवत्सायाः पदानि स्म दृश्यन्तेऽद्यापि भारत ॥ ८ ९ ॥
राजन्! वहाँ एक पर्वतपर चरनेवाली बछड़ेसहित कपिला गौका विशाल चरणचिह्न आज भी अंकित है । भरतनन्दन! बछड़ेसहित उस गौके चरणचिह्न आज भी वहाँ देखे जाते हैं ॥ ८८-८९ ॥
तेषूपस्पृश्य राजेन्द्र पदेषु नृपसत्तम ।
यत् किंचिदशुभं कर्म तत् प्रणश्यति भारत ॥ ९ ० ॥
भारत! नृपश्रेष्ठ! राजेन्द्र! उन चरणचिह्नोंका स्पर्श करके मनुष्यका जो कुछ भी अशुभ कर्म शेष रहता है, वह सब नष्ट हो जाता है ॥ ९ ० ॥ ततो गृध्रवटं गच्छेत् स्थानं देवस्य धीमतः ।
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स्नायीत भस्मना तत्र अभिगम्य वृषध्वजम् ॥ ९ १ ॥ तदनन्तर परम बुद्धिमान् महादेवजीके गृध्रवट नामक स्थानकी यात्रा करे और वहाँ भगवान् शंकरके समीप जाकर भस्मसे स्नान करे ( अपने शरीरमें भस्म लगाये ) ॥ ९ १ ॥
ब्राह्मणेन भवेच्चीर्णं व्रतं द्वादशवार्षिकम् ।
इतरेषां तु वर्णानां सर्वपापं प्रणश्यति ॥ ९ २ ॥
वहाँ यात्रा करनेसे ब्राह्मणको बारह वर्षोंतक व्रतके पालन करनेका फल प्राप्त होता है और अन्य वर्णके लोगोंके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ ९ २ ॥
उद्यन्तं च ततो गच्छेत् पर्वतं गीतनादितम् ।
सावित्र्यास्तु पदं तत्र दृश्यते भरतर्षभ ॥ ९ ३ ॥
भरतकुलभूषण! तदनन्तर संगीतकी ध्वनिसे गूँजते हुए उदयगिरिपर जाय । वहाँ सावित्रीका चरणचिह्न आज भी दिखायी देता है ॥ ९ ३ ॥
तत्र संध्यामुपासीत ब्राह्मणः संशितव्रतः ।
'ह्युपास्ता भवति संध्या द्वादशवार्षिकी ॥ ९ ४ ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण वहाँ संध्योपासना करे । इससे उसके द्वारा बारह वर्षोंतककी संध्योपासना सम्पन्न हो जाती है ॥ ९ ४ ॥
योनिद्वारं च तत्रैव विश्रुतं भरतर्षभ ।
तत्राभिगम्य मुच्येत पुरुषो योनिसंकटात् ॥ ९ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! वहीं विख्यात योनिद्वारतीर्थ है, जहाँ जाकर मनुष्य योनिसंकटसे मुक्त हो जाता है — उसका पुनर्जन्म नहीं होता ॥ ९ ५ ॥
कृष्णशुक्लावुभौ पक्षौ गयायां यो वसेन्नरः ।
पुनात्यासप्तमं राजन् कुलं नास्त्यत्र संशयः ॥ ९ ६ ॥
राजन्! जो मानव कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षोंमें गयातीर्थमें निवास करता है, वह अपने कुलकी सातवीं पीढ़ीतकको पवित्र कर देता है, इसमें संशय नहीं है ॥
एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् ।
यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ॥ ९ ७ ॥
बहुत- से पुत्रोंकी इच्छा करे । सम्भव है, उनमेंसे एक भी गयामें जाय या अश्वमेधयज्ञ करे अथवा नील वृषका उत्सर्ग ही करे ॥ ९ ७ ॥
ततः फल्गुं व्रजेद् राजंस्तीर्थसेवी नराधिप ।
अश्वमेधमवाप्नोति सिद्धिं च महतीं व्रजेत् ॥ ९ ८ ॥
राजन्! नरेश्वर! तदनन्तर तीर्थसेवी मानव फल्गुतीर्थमें जाय । वहाँ जानेसे उसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है और बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ९ ८ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र धर्मप्रस्थं समाहितः ।
तत्र धर्मो महाराज नित्यमास्ते युधिष्ठिर ॥ ९९ ॥
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महाराज! तदनन्तर एकाग्रचित्त हो मनुष्य धर्मप्रस्थकी यात्रा करे। युधिष्ठिर! वहाँ धर्मराजका नित्य निवास है ॥ ९९ ॥
तत्र कूपोदकं कृत्वा तेन स्नातः शुचिस्तथा ।
पितॄन् देवांस्तु संतर्प्य मुक्तपापो दिवं व्रजेत् ॥ १०० ॥
वहाँ कुएँका जल लेकर उससे स्नान करके पवित्र हो देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्यके सारे पाप छूट जाते हैं और वह स्वर्गलोकमें जाता है ॥ १०० ॥
मतङ्गस्याश्रमस्तत्र महर्षेर्भावितात्मनः ।
तं प्रविश्याश्रमं श्रीमच्छ्रमशोकविनाशनम् ॥ १०१ ॥
गवामयनयज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ।
धर्मं तत्राभिसंस्पृश्य वाजिमेधमवाप्नुयात् ॥ १०२ ॥
वहीं भावितात्मा महर्षि मतंगका आश्रम है । श्रम और शोकका विनाश करनेवाले उस सुन्दर आश्रममें प्रवेश करनेसे मनुष्य गवामयनयज्ञका फल पाता है । वहाँ धर्मके निकट जा उनके श्रीविग्रहका दर्शन और स्पर्श करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मस्थानमनुत्तमम् ।
तत्राभिगम्य राजेन्द्र ब्रह्माणं पुरुषर्षभ ॥ १०३ ॥
राजसूयाश्वमेधाभ्यां फलं विन्दति मानवः । राजेन्द्र! तदनन्तर परम उत्तम ब्रह्मस्थानको जाय । महाराज! पुरुषोत्तम! वहाँ ब्रह्माजीके समीप जाकर मनुष्य राजसूय और अश्वमेधयज्ञोंका फल पाता है ॥ १०३३ ॥
ततो राजगृहं गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप ॥ १०४ ॥
उपस्पृश्य ततस्तत्र कक्षीवानिव मोदते ।
यक्षिण्या नैत्यकं तत्र प्राश्नीत पुरुषः शुचिः ॥ १०५ ॥
यक्षिण्यास्तु प्रसादेन मुच्यते ब्रह्महत्यया । नरेश्वर! तदनन्तर तीर्थसेवी मनुष्य राजगृहको जाय । वहाँ स्नान करके वह कक्षीवान्के समान प्रसन्न होता है । उस तीर्थमें पवित्र होकर पुरुष यक्षिणीदेवीका नैवेद्य भक्षण करे । यक्षिणीके प्रसादसे वह ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है ॥ १०४-१०५३ ॥ मणिनागं ततो गत्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १०६ ॥
तदनन्तर मणिनागतीर्थमें जाकर तीर्थयात्री सहस्र गोदानका फल प्राप्त करे ॥ १०६ ॥
तैर्थिकं भुञ्जते यस्तु मणिनागस्य भारत ।
दष्टस्याशीविषेणापि न तस्य क्रमते विषम् ॥ १०७ ॥
तत्रोष्य जननीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् । भरतनन्दन! जो मणिनागका तीर्थप्रसाद ( नैवेद्य, चरणामृत आदि) का भक्षण करता है, उसे साँप काट ले तो भी उसपर विषका असर नहीं होता । वहाँ एक रात रहनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ १०७३ ॥
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ततो गच्छेत ब्रह्मर्षेर्गोतमस्य वनं प्रियम् ॥ १०८ ॥
अहल्याया हृदे स्नात्वा व्रजेत परमां गतिम् ।
अभिगम्याश्रमं राजन् विन्दते श्रियमात्मनः ॥ १० ९ ॥
तत्पश्चात् ब्रह्मर्षि गौतमके प्रिय वनकी यात्रा करे । वहाँ अहल्याकुण्डमें स्नान करनेसे मनुष्य परमगतिको प्राप्त होता है। राजन्! गौतमके आश्रममें जाकर मनुष्य अपने लिये लक्ष्मी प्राप्त कर लेता है ॥ १०८-१०९ ॥
तत्रोदपानं धर्मज्ञ त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
तत्राभिषेकं कृत्वा तु वाजिमेधमवाप्नुयात् ॥ ११० ॥
धर्मज्ञ! वहाँ एक त्रिभुवनविख्यात कूप है, जिसमें स्नान करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ११० ॥
जनकस्य तु राजर्षेः कूपस्त्रिदशपूजितः ।
तत्राभिषेकं कृत्वा तु विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥ १११ ॥
राजर्षि जनकका एक कूप है, जिसका देवता भी सम्मान करते हैं । वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य विष्णुलोकमें जाता है ॥ १११ ॥
ततो विनशनं गच्छेत् सर्वपापप्रमोचनम् ।
वाजपेयमवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ॥ ११२ ॥
तत्पश्चात् सब पापोंसे छुड़ानेवाले विनशनतीर्थको जाय, जिससे मनुष्यवाजपेययज्ञका फल पाता और सोमलोकको जाता है ॥ ११२ ॥
गण्डकीं तु समासाद्य सर्वतीर्थजलोद्भवाम् ।
वाजपेयमवाप्नोति सूर्यलोकं च गच्छति ॥ ११३ ॥
गण्डकी नदी सब तीर्थोंके जलसे उत्पन्न हुई है । वहाँ जाकर तीर्थयात्री अश्वमेधयज्ञका फल पाता और सूर्यलोकमें जाता है ॥ ११३ ॥
ततो विशल्यामासाद्य नदीं त्रैलोक्यविश्रुताम् ।
अग्निष्टोममवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ ११४ ॥
तत्पश्चात् त्रिलोकीमें विख्यात विशल्या नदीके तटपर जाकर स्नान करे । इससे वह अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ॥ ११४ ॥
ततोऽधिवङ्गं धर्मज्ञ समाविश्य तपोवनम् ।
गुह्यकेषु महाराज मोदते नात्र संशयः ॥ ११५ ॥
धर्मज्ञ महाराज! तदनन्तर वंगदेशीय तपोवनमें प्रवेश करके तीर्थयात्री इस शरीरके अन्तमें गुह्यकलोकमें जाकर निःसंदेह आनन्दका भागी होता है ॥ ११५ ॥
कम्पनां तु समासाद्य नदीं सिद्धनिषेविताम् ।
पुण्डरीकमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ ११६ ॥
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तत्पश्चात् सिद्धसेवित कम्पना नदीमें पहुँचकर मनुष्य पुण्डरीकयज्ञका फल पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ॥ ११६ ॥
अथ माहेश्वरीं धारां समासाद्य धराधिप ।
अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ११७ ॥
राजन्! तत्पश्चात् माहेश्वरी धाराकी यात्रा करनेसे तीर्थयात्रीको अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है और वह अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ११७ ॥
दिवौकसां पुष्करिणीं समासाद्य नराधिप ।
न दुर्गतिमवाप्नोति वाजिमेधं च विन्दति ॥ ११८ ॥
नरेश्वर! फिर देवपुष्करिणीमें जाकर मानव कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता और अश्वमेधयज्ञका फल पाता है ॥ ११८ ॥
अथ सोमपदं गच्छेद् ब्रह्मचारी समाहितः ।
माहेश्वरपदे स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् ॥ ११ ९ ॥
तदनन्तर ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो सोमपदतीर्थमें जाय । वहाँ माहेश्वरपदमें स्नान करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ॥ ११ ९ ॥
तत्र कोटिस्तु तीर्थानां विश्रुता भरतर्षभ ।
कूर्मरूपेण राजेन्द्र ह्यसुरेण दुरात्मना ॥ १२० ॥
ह्रियमाणा हृता राजन् विष्णुना प्रभविष्णुना ।
तत्राभिषेकं कुर्वीत तीर्थकोट्यां युधिष्ठिर ॥ १२१ ॥
पुण्डरीकमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति । भरतकुलतिलक! वहाँ तीर्थोंकी विख्यात श्रेणीको एक दुरात्मा असुर कूर्मरूप धारण करके हरकर लिये जाता था । राजन्! यह देख सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने उस तीर्थश्रेणीका उद्धार किया । युधिष्ठिर! वहाँ उस तीर्थकोटिमें स्नान करना चाहिये । ऐसा करनेवाले यात्रीको पुण्डरीकयज्ञका फल मिलता है और वह विष्णुलोकको जाता है ॥ १२०-१२१ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र स्थानं नारायणस्य च ॥ १२२ ॥
सदा संनिहितो यत्र विष्णुर्वसति भारत ।
यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥ १२३ ॥
आदित्या वसवो रुद्रा जनार्दनमुपासते ।
शालग्राम इति ख्यातो विष्णुरद्भुतकर्मकः ॥ १२४ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर नारायण स्थानको जाय । भरतनन्दन! वहाँ भगवान् विष्णु सदा निवास करते हैं । ब्रह्मा आदि देवता, तपोधन ऋषि, आदित्य, वसु तथा रुद्र भी वहाँ रहकर जनार्दनकी उपासना करते हैं । उस तीर्थमें अद्भुतकर्मा भगवान् विष्णु शालग्रामके नामसे प्रसिद्ध हैं ॥
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अभिगम्य त्रिलोकेशं वरदं विष्णुमव्ययम् ।
अश्वमेधमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति ॥ १२५ ॥
तीनों लोकोंके स्वामी उन वरदायक अविनाशी भगवान् विष्णुके समीप जाकर मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और विष्णुलोकमें जाता है ॥ १२५ ॥
तत्रोदपानं धर्मज्ञ सर्वपापप्रमोचनम् ।
समुद्रास्तत्र चत्वारः कूपे संनिहिताः सदा ॥ १२६ ॥
धर्मज्ञ! वहाँ एक कूप है, जो सब पापोंको दूर करनेवाला है । उसमें सदा चारों समुद्र निवास करते हैं ॥
तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र न दुर्गतिमवाप्नुयात् ।
अभिगम्य महादेवं वरदं रुद्रमव्ययम् ॥ १२७ ॥
विराजति यथा सोमो मेघैर्मुक्तो नराधिप ।
जातिस्मरमुपस्पृश्य शुचिः प्रयतमानसः ॥ १२८ ॥
राजेन्द्र! उसमें निवास करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता । सबको वर देनेवाले अविनाशी महादेव रुद्रके समीप जाकर मनुष्य मेघोंके आवरणसे मुक्त हुए चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित होता है । नरेश्वर! वहीं जातिस्मरतीर्थ है; जिसमें स्नान करके मनुष्य पवित्र एवं शुद्धचित्त हो जाता है । अर्थात् उसके शरीर और मनकी शुद्धि हो जाती है ॥ १२७-१२८ ॥
जातिस्मरत्वमाप्नोति स्नात्वा तत्र न संशयः ।
माहेश्वरपुरं गत्वा अर्चयित्वा वृषध्वजम् ॥ १२ ९ ॥
ईप्सिताल्लभते कामानुपवासान्न संशयः ।
ततस्तु वामनं गत्वा सर्वपापप्रमोचनम् ॥ १३० ॥
अभिगम्य हरिं देवं न दुर्गतिमवाप्नुयात् ।
कुशिकस्याश्रमं गच्छेत् सर्वपापप्रमोचनम् ॥ १३१ ॥
उस तीर्थमें स्नान करनेसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण करनेकी शक्ति प्राप्त हो जाती है, इसमें संशय नहीं है । माहेश्वरपुरमें जाकर भगवान् शंकरकी पूजा और उपवास करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण मनोवांछित कामनाओं को प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है । तत्पश्चात् सब पापोंको दूर करनेवाले वामनतीर्थकी यात्रा करके भगवान् श्रीहरिके निकट जाय । उनका दर्शन करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। इसके बाद सब पापोंसे छुड़ानेवाले कुशिकाश्रमकी यात्रा करे ॥ १२ ९ -१३१ ॥
कौशिकीं तत्र गच्छेत महापापप्रणाशिनीम् ।
राजसूयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ १३२ ॥
वहीं बड़े - बड़े पापोंका नाश करनेवाली कौशिकी ( कोशी ) नदी है । उसके तटपर जाकर स्नान करे । ऐसा करनेवाला मानव राजसूययज्ञका फल पाता है ॥ १३२ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र चम्पकारण्यमुत्तमम् ।
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तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १३३ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम चम्पकारण्य ( चम्पारन) - की यात्रा करे । वहाँ एक रात निवास करनेसे तीर्थयात्रीको सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ १३३ ॥
अथ ज्येष्ठिलमासाद्य तीर्थं परमदुर्लभम् ।
तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १३४ ॥
तत्पश्चात् परम दुर्लभ ज्येष्ठिलतीर्थमें जाकर एक रात निवास करनेसे मानव सहस्र गोदानका फल पाता है ॥ १३४ ॥
तत्र विश्वेश्वरं दृष्ट्वा देव्या सह महाद्युतिम् ।
मित्रावरुणयोर्लोकानाप्नोति पुरुषर्षभ ॥ १३५ ॥
त्रिरात्रोपोषितस्तत्र अग्निष्टोमफलं लभेत् । पुरुषरत्न! वहाँ पार्वतीदेवीके साथ महातेजस्वी भगवान् विश्वेश्वरका दर्शन करनेसे तीर्थयात्रीको मित्र और वरुण देवताके लोकोंकी प्राप्ति होती है, वहाँ तीन रात उपवास करनेसे अग्निष्टोमयज्ञका फल मिलता है ॥ १३५३ ॥
कन्यासंवेद्यमासाद्य नियतो नियताशनः ॥ १३६ ॥
मनोः प्रजापतेर्लोकानाप्नोति पुरुषर्षभ ।
कन्यायां ये प्रयच्छन्ति दानमण्वपि भारत ॥ १३७ ॥
तदक्षय्यमिति प्राहुर्ऋषयः संशितव्रताः । पुरुषश्रेष्ठ! इसके बाद नियमपूर्वक नियमित भोजन करते हुए तीर्थयात्रीको कन्यासंवेद्य नामक तीर्थमें जाना चाहिये । इससे वह प्रजापति मनुके लोक प्राप्त कर लेता है । भरतनन्दन! जो लोग कन्यासंवेद्यतीर्थमें थोड़ा- सा भी दान देते हैं, उनके उस दानको उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि अक्षय बताते हैं ॥ निश्चीरां च समासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुताम् ॥ १३८ ॥
अश्वमेधमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति ।
ये तु दानं प्रयच्छन्ति निश्चीरासंगमे नराः ॥ १३ ९ ॥
ते यान्ति नरशार्दूल शक्रलोकमनामयम् ।
तत्राश्रमो वसिष्ठस्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥ १४० ॥
तदनन्तर त्रिलोकविख्यात निश्चीरा नदीकी यात्रा करे । इससे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है और तीर्थयात्री पुरुष भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है । नरश्रेष्ठ! जो मानव निश्चीरासंगममें दान देते हैं, वे रोग- शोकसे रहित इन्द्रलोकमें जाते हैं । वहीं तीनों लोकोंमें विख्यात वसिष्ठ - आश्रम है ॥ १३८-१४० ॥
तत्राभिषेकं कुर्वाणो वाजपेयमवाप्नुयात् ।
देवकूटं समासाद्य ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥ १४१ ॥
अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ।
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वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य वाजपेययज्ञका फल पाता है । तदनन्तर ब्रह्मर्षियोंसे सेवित देवकूट - तीर्थमें जाकर स्नान करे । ऐसा करनेवाला पुरुष अश्वमेध- यज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ १४१ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र कौशिकस्य मुनेर्हदम् ॥ १४२ ॥
यत्र सिद्धिं परां प्राप्तो विश्वामित्रोऽथ कौशिकः ।
तत्र मासं वसेद् वीर कौशिक्यां भरतर्षभ ॥ १४३ ॥
राजेन्द्र! तत्पश्चात् कौशिक मुनिके कुण्डमें स्नानके लिये जाय, जहाँ कुशिकनन्दन विश्वामित्रने उत्तम सिद्धि प्राप्त की थी । वीर! भरतकुलभूषण! उस तीर्थमें कौशिकी नदीके तटपर एक मासतक निवास करे ॥ १४२-१४३ ॥
अश्वमेधस्य यत् पुण्यं तन्मासेनाधिगच्छति ।
सर्वतीर्थवरे चैव यो वसेत महाह्रदे ॥ १४४ ॥
न दुर्गतिमवाप्नोति विन्देद् बहु सुवर्णकम् । ऐसा करनेसे एक मासमें ही अश्वमेधयज्ञका पुण्यफल प्राप्त हो जाता है । जो सब तीर्थोंमें उत्तम महाह्रदमें स्नान करता है वह कभी दुर्गतिको नहीं प्राप्त होता और प्रचुर सुवर्णराशि प्राप्त कर लेता है ॥ १४४३ ॥
कुमारमभिगम्याथ वीराश्रमनिवासिनम् ॥ १४५ ॥
अश्वमेधमवाप्नोति नरो नास्त्यत्र संशयः । तदनन्तर वीराश्रमनिवासी कुमार कार्तिकेयके निकट जाकर मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १४५३ ॥
अग्निधारां समासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुताम् ॥ १४६ ॥
तत्राभिषेकं कुर्वाणो ह्यग्निष्टोममवाप्नुयात् । अग्निधारातीर्थ तीनों लोकोंमें विख्यात है । वहाँ जाकर स्नान करनेवाला पुरुष अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता है ॥ १४६३ ॥
अधिगम्य महादेवं वरदं विष्णुमव्ययम् ॥ १४७ ॥
वहाँ वर देनेवाले महान् देवता अविनाशी भगवान् विष्णुके निकट जाकर उनका दर्शन और पूजन करे ॥ १४७ ॥
पितामहसरो गत्वा शैलराजसमीपतः ।
तत्राभिषेकं कुर्वाणो ह्यग्निष्टोममवाप्नुयात् ॥ १४८ ॥
गिरिराज हिमालयके निकट पितामहसरोवरमें जाकर स्नान करनेवाले पुरुषको अग्निष्टोमयज्ञका फल मिलता है ॥ १४८ ॥
पितामहस्य सरसः प्रस्रुता लोकपावनी ।
कुमारधारा तत्रैव त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ १४ ९ ॥
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पितामहसरोवरसे सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करनेवाली एक धारा प्रवाहित होती है, जो तीनों लोकोंमें कुमारधाराके नामसे विख्यात है ॥ १४ ९ ॥
यत्र स्नात्वा कृतार्थोऽस्मीत्यात्मानमवगच्छति ।
षष्ठकालोपवासेन मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥ १५० ॥
उसमें स्नान करके मनुष्य अपने- आपको कृतार्थ मानने लगता है । वहाँ रहकर छठे समय उपवास करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे छुटकारा पा जाता है ॥ १५० ॥
ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थसेवनतत्परः ।
शिखरं वै महादेव्या गौर्यास्त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ १५१ ॥
धर्मज्ञ! तदनन्तर तीर्थसेवनमें तत्पर मानव महादेवी गौरीके शिखरपर जाय, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥ १५१ ॥
समारुह्य नरश्रेष्ठ स्तनकुण्डेषु संविशेत् ।
स्तनकुण्डमुपस्पृश्य वाजपेयफलं लभेत् ॥ १५२ ॥
नरश्रेष्ठ! उस शिखरपर चढ़कर मानव स्तनकुण्डमें स्नान करे । स्तनकुण्डमें अवगाहन करनेसे वाजपेययज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ १५२ ॥
तत्राभिषेकं कुर्वाणः पितृदेवार्चने रतः ।
हयमेधमवाप्नोति शक्रलोकं च गच्छति ॥ १५३ ॥
उस तीर्थमें स्नान करके देवताओं और पितरोंकी पूजा करनेवाला पुरुष अश्वमेधयज्ञका फल पाता और इन्द्रलोकमें पूजित होता है ॥ १५३ ॥
ताम्रारुणं समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः ।
अश्वमेधमवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥ १५४ ॥
तदनन्तर ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो ताम्रारुणतीर्थकी यात्रा करनेसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ १५४ ॥
नन्दिन्यां च समासाद्य कूपं देवनिषेवितम् ।
नरमेधस्य यत् पुण्यं तदाप्नोति नराधिप ॥ १५५ ॥
नन्दिनीतीर्थमें देवताओंद्वारा सेवित एक कूप है । नरेश्वर! वहाँ जाकर स्नान करनेसे मानव नरमेधयज्ञका पुण्यफल प्राप्त करता है ॥ १५५ ॥
कालिकासंगमे स्नात्वा कौशिक्यरुणयोर्गतः ।
त्रिरात्रोपोषितो राजन् सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १५६ ॥
राजन्! कौशिकी - अरुणा- संगम और कालिका - संगममें स्नान करके तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १५६ ॥
उर्वशीतीर्थमासाद्य ततः सोमाश्रमं बुधः ।
कुम्भकर्णाश्रमं गत्वा पूज्यते भुवि मानवः ॥ १५७ ॥
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तदनन्तर उर्वशीतीर्थ, सोमाश्रम और कुम्भ-कर्णाश्रमकी यात्रा करके मनुष्य इस भूतलपर पूजित होता है ॥ १५७ ॥
कोकामुखमुपस्पृश्य ब्रह्मचारी यतव्रतः जातिस्मरत्वमाप्नोति दृष्टमेतत् पुरातनैः ॥ १५८ कोकामुखतीर्थमें स्नान करके ब्रह्मचर्य एवं संयम-नियमका पालन करनेवाला पुरुष पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेकी शक्ति प्राप्त कर लेता है। यह बात प्राचीन पुरुषोंने प्रत्यक्ष देखी है ॥ १५८ ॥
प्राङ्नदीं च समासाद्य कृतात्मा भवति द्विजः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा शक्रलोकं च गच्छति ॥ १५ ९ ॥
प्राङ्नदीतीर्थमें जानेसे द्विज कृतार्थ हो जाता है । वह सब पापोंसे शुद्धचित्त होकर इन्द्रलोकमें जाता है ॥
ऋषभद्वीपमासाद्य मेध्यं क्रौञ्चनिषूदनम् ।
सरस्वत्यामुपस्पृश्य विमानस्थो विराजते ॥ १६० ॥
तीर्थसेवी मनुष्य पवित्र ऋषभद्वीप और क्रौञ्चनिषूदनतीर्थमें जाकर सरस्वतीमें स्नान करनेसे विमानपर विराजमान होता है ॥ १६० ॥
औद्दालकं महाराज तीर्थं मुनिनिषेवितम् ।
तत्राभिषेकं कृत्वा वै सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १६१ ॥
महाराज! मुनियोंसे सेवित औद्दालकतीर्थमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १६१ ॥
धर्मतीर्थं समासाद्य पुण्यं ब्रह्मर्षिसेवितम् ।
वाजपेयमवाप्नोति विमानस्थश्च पूज्यते ॥ १६२ ॥
परम पवित्र ब्रह्मर्षिसेवित धर्मतीर्थमें जाकर स्नान करनेवाला मनुष्य वाजपेययज्ञका फल पाता और विमानपर बैठकर पूजित होता है ॥ १६२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि पुलस्त्यतीर्थयात्रायां चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें पुलस्त्यकी तीर्थयात्रासे सम्बन्ध रखनेवाला चौरासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ८४ ॥
* शम्याका अर्थ है डंडा । कोई बलवान् पुरुष डंडेको खूब जोर लगाकर फेंके तो वह जहाँ गिरे, उतनी दूरके स्थानको एक शम्यानिपात कहते हैं । ऐसे ही छः शम्यानिपातकी दूरी समझ लेनी चाहिये । * तिलोंसे गौकी आकृति बनाकर उसका दान करे ।