02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 71–80

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 71–80

पृष्ठ 71

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 71 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

यज्ञियार्थाः प्रवर्तन्ते विधिमन्त्रप्रमाणतः ॥ ८५ ॥

युधिष्ठिरको भोजन कराकर द्रौपदी शेष अन्न स्वयं खाती थी । द्रौपदीके भोजन कर लेनेपर उस पात्रका अन्न समाप्त हो जाता था । इस प्रकार सूर्यसे मनोवांछित वरोंको पाकर उन्हींके समान तेजस्वी प्रभावशाली राजा युधिष्ठिर ब्राह्मणोंको नियमपूर्वक अन्नदान करने लगे । पुरोहितोंको आगे करके उत्तम तिथि, नक्षत्र एवं पर्वोंपर विधि और मन्त्रके प्रमाणके अनुसार उनके यज्ञसम्बन्धी कार्य होने लगे ॥ ८४-८५ ॥

ततः कृतस्वस्त्ययना धौम्येन सह पाण्डवाः ।

द्विजसङ्घैः परिवृताः प्रययुः काम्यकं वनम् ॥ ८६ ॥

तदनन्तर स्वस्तिवाचन कराकर ब्राह्मणसमुदायसे घिरे हुए पाण्डव धौम्यजीके साथ काम्यकवनको चले गये ॥ ८६ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि काम्यकवनप्रवेशे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें काम्यकवनप्रवेशविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥

3. बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, आठ वसु, इन्द्र और प्रजापति - ये तैंतीस देवता हैं । २. सभापर्वके ११ वें अध्याय श्लोक ४६, ४७ में सात पितरोंके नाम इस प्रकार बताये हैं- वैराज, अग्निष्वात्त, सोमपा, गार्हपत्य, एकशृंग, चतुर्वेद और कला । * जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर- ये सात प्रधान द्वीप माने गये हैं। इनके सिवा, कई उपद्वीप हैं । उनको लेकर यहाँ १३ द्वीप बताये गये हैं ।

पृष्ठ 72

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 72 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चतुर्थोऽध्यायः विदुरजीका धृतराष्ट्रको हितकी सलाह देना और धृतराष्ट्रका रुष्ट होकर महलमें चला जाना वैशम्पायन उवाच वनं प्रविष्टेष्वथ पाण्डवेषु प्रज्ञाचक्षुस्तप्यमानोऽम्बिकेयः । धर्मात्मानं विदुरमगाधबुद्धिं सुखासीनो वाक्यमुवाच राजा ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! जब पाण्डव वनमें चले गये, तब प्रज्ञाचक्षु अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र मन-ही-मन संतप्त हो उठे । उन्होंने अगाधबुद्धि धर्मात्मा विदुरको बुलाकर स्वयं सुखद आसनपर बैठे हुए उनसे इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रउवाच प्रज्ञा च ते भार्गवस्येव शुद्धा धर्मं च त्वं परमं वेत्थ सूक्ष्मम् । समश्च त्वं सम्मतः कौरवाणां पथ्यं चैषां मम चैव ब्रवीहि ॥ २ ॥

धृतराष्ट्र बोले- विदुर! तुम्हारी बुद्धि शुक्राचार्यके समान शुद्ध है । तुम सूक्ष्म- से- सूक्ष्म श्रेष्ठ धर्मको जानते हो । तुम्हारी सबके प्रति समान दृष्टि है और कौरव तथा पाण्डव सभी तुम्हारा सम्मान करते हैं । अतः मेरे तथा इन पाण्डवोंके लिये जो हितकर कार्य हो, वह मुझे बताओ ॥ २ ॥

एवंगते विदुर यदद्य कार्यं

पौराश्च मे कथमस्मान् भजेरन् ।

ते चाप्यस्मान् नोद्धरेयुः समूलां- स्तत्त्वं ब्रूयाः साधुकार्याणि वेत्सि ॥ ३ ॥

विदुर! ऐसी दशामें अब हमारा जो कर्तव्य हो वह बताओ । ये पुरवासी कैसे हमलोगोंसे प्रेम करेंगे । तुम ऐसा कोई उपाय बताओ जिससे वे पाण्डव हमलोगोंको जड़ - मूलसहित उखाड़ न फेंके । तुम अच्छे कार्योंको जानते हो । अतः हमें ठीक - ठीक कर्तव्यका निर्देश करो ॥ ३ ॥

विदुरउवाच त्रिवर्गोऽयं धर्ममूलो नरेन्द्र

पृष्ठ 73

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 73 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

राज्यं चेदं धर्ममूलं वदन्ति । धर्मे राजन् वर्तमानः स्वशक्त्या पुत्रान् सर्वान् पाहि पाण्डोः सुतांश्च ॥ ४ ॥

विदुरजीने कहा — नरेन्द्र! धर्म, अर्थ और काम इन तीनोंकी प्राप्तिका मूल कारण धर्म ही है । धर्मात्मा पुरुष इस राज्यकी जड़ भी धर्मको ही बतलाते हैं, अतः महाराज! आप धर्मके मार्गपर स्थिर रहकर यथाशक्ति अपने तथा पाण्डुके सब पुत्रोंका पालन कीजिये ॥ ४ ॥

सवै धर्मो विप्रलब्धः सभायां पापात्मभिः सौबलेयप्रधानैः । आहूय कुन्तीसुतमक्षवत्यां पराजैषीत् सत्यसंधं सुतस्ते ॥ ५ ॥

शकुनि आदि पापात्माओंने द्यूतसभामें उस धर्मके साथ विश्वासघात किया; क्योंकि आपके पुत्रने सत्य -प्रतिज्ञ कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको बुलाकर उन्हें कपटपूर्वक पराजित किया है ॥ ५ ॥

एतस्य ते दुष्प्रणीतस्य राजन्

शेषस्याहं परिपश्याम्युपायम् ।

यथा पुत्रस्तव कौरव्य पापा- न्मुक्तो लोके प्रतितिष्ठेत साधु ॥ ६ ॥

कुरुराज! दुरात्माओंद्वारा पाण्डवोंके प्रति किये हुए इस दुर्व्यवहारकी शान्तिका उपाय मैं जानता हूँ, जिससे आपका पुत्र दुर्योधन पापसे मुक्त हो लोकमें भलीभाँति प्रतिष्ठा प्राप्त करे ॥ ६ ॥

तद् वै सर्वं पाण्डुपुत्रा लभन्तां यत् तद् राजन्नभिसृष्टं त्वयाऽऽसीत् । एष धर्मः परमो यत् स्वकेन राजा तुष्येन परस्वेषु गृध्येत् ॥ ७ ॥

आपने पाण्डवोंको जो राज्य दिया था, वह सब उन्हें मिल जाना चाहिये । राजाके लिये यह सबसे बड़ा धर्म है कि वह अपने धनसे संतुष्ट रहे । दूसरेके धनपर लोभभरी दृष्टि न डाले ॥ ७ ॥

यशो न नश्येज्ज्ञातिभेदश्च न स्याद् धर्मो न स्यान्नैव चैवं कृते त्वाम् । एतत् कार्यं तव सर्वप्रधानं तेषां तुष्टिः शकुनेश्चावमानः ॥ ८ ॥

पृष्ठ 74

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 74 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ऐसा कर लेनेपर आपके यशका नाश नहीं होगा, भाइयोंमें फूट नहीं होगी और आपको धर्मकी भी प्राप्ति होगी । आपके लिये सबसे प्रमुख कार्य यह है कि पाण्डवोंको संतुष्ट करें और शकुनिका तिरस्कार करें ॥ ८ ॥

एवं शेषं यदि पुत्रेषु ते स्या- देतद् राजंस्त्वरमाणः कुरुष्व । तथैतदेवं न करोषि राजन् ध्रुवं कुरूणां भविता विनाशः ॥ ९ ॥

राजन्! ऐसा करनेपर भी यदि आपके पुत्रोंका भाग्य शेष होगा तो उनका राज्य उनके पास रह जायगा; अतः आप शीघ्र ही यह काम कर डालिये । महाराज! यदि आप ऐसा न करेंगे तो कौरवकुलका निश्चय ही नाश हो जायगा ॥ ९ ॥

न हि क्रुद्धो भीमसेनोऽर्जुनो वा शेषं कुर्याच्छात्रवाणामनीके । येषां योद्धा सव्यसाची कृतास्त्रो धनुर्येषां गाण्डिवं लोकसारम् ॥ १० ॥

येषां भीमो बाहुशाली च योद्धा तेषां लोके किं नु न प्राप्यमस्ति । उक्तं पूर्वं जातमात्रे सुते ते मया यत् ते हितमासीत् तदानीम् ॥ ११ ॥

क्रोधमें भरे हुए भीमसेन अथवा अर्जुन अपने शत्रुओंकी सेनामें किसीको जीवित नहीं छोड़ेंगे । अस्त्रविद्यामें निपुण सव्यसाची अर्जुन जिनके योद्धा हैं, सम्पूर्ण लोकोंका सारभूत गाण्डीव जिनका धनुष है तथा अपने बाहुबलसे सुशोभित होनेवाले भीमसेन जिनकी ओरसे युद्ध करनेवाले हैं, उन पाण्डवोंके लिये संसारमें ऐसी कौन- सी वस्तु है जो प्राप्त न हो सके । आपके पुत्र दुर्योधनके जन्म लेते ही मुझे उस समय जो हितकी बात जान पड़ी, वह मैंने पहले ही बता दी थी ॥ १०-११ ॥ पुत्रं त्यजेममहितं कुलस्य

हितं परं न च तत् त्वं चकर्थ ।

इदं च राजन् हितमुक्तं न चेत् त्व- मेवं कर्ता परितप्तासि पश्चात् ॥ १२ ॥

मैंने साफ कह दिया था कि आपका यह पुत्र समस्त कुलका अहित करनेवाला है, अतः इसको त्याग दीजिये; परंतु आपने मेरी उत्तम और सात्त्विक सलाहके अनुसार कार्य नहीं किया । राजन्! इस समय भी मैंने जो यह आपके हितकी बात बतायी है यदि उसे आप नहीं करेंगे तो आपको बहुत पश्चात्ताप करना पड़ेगा ॥ १२ ॥

यद्येतदेवमनुमन्ता सुतस्ते

पृष्ठ 75

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 75 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सम्प्रीयमाणः पाण्डवैरेकराज्यम् ।

तापो न ते भविता प्रीतियोगा- न चेन्निगृह्णीष्व सुतं सुखाय ॥ १३ ॥

यदि आपका पुत्र दुर्योधन प्रसन्नतापूर्वक पाण्डवोंके साथ एक राज्य बनानेकी बात मान ले तो आपको पश्चात्ताप नहीं होगा, प्रसन्नता ही प्राप्त होगी। यदि दुर्योधन आपकी बात न माने तो समस्त कुलको सुख पहुँचानेके लिये आप अपने उस पुत्रपर नियन्त्रण कीजिये ॥ १३ ॥

दुर्योधनं त्वहितं वै निगृह्य पाण्डोः पुत्रं कुरुष्वाधिपत्ये । अजातशत्रुर्हि विमुक्तरागो धर्मेणेमां पृथिवीं शास्तु राजन् ॥ १४ ॥

इस प्रकार अहितकारक दुर्योधनको काबूमें करके आप पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको राज्यपर

अभिषिक्त कर दीजिये; क्योंकि वे अजातशत्रु हैं। उनका किसीसे राग या द्वेष नहीं है ।

राजन्! वे ही इस पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन करेंगे ॥ १४ ॥

ततो राजन् पार्थिवाः सर्व एव वैश्या इवास्मानुपतिष्ठन्तु सद्यः । दुर्योधनः शकुनिः सूतपुत्रः प्रीत्या राजन् पाण्डुपुत्रान् भजन्तु ॥ १५ ॥

महाराज! यदि ऐसा हुआ तो भूमण्डलके समस्त राजा वैश्योंकी भाँति उपहार ले हम कौरवोंकी सेवामें शीघ्र उपस्थित होंगे । राजराजेश्वर! दुर्योधन, शकुनि तथा सूतपुत्र कर्ण प्रेमपूर्वक पाण्डवोंको अपनावें ॥ १५ ॥

दुःशासनो याचतु भीमसेनं सभामध्ये द्रुपदस्यात्मजां च । युधिष्ठिरं त्वं परिसान्त्वयस्व राज्ये चैनं स्थापयस्वाभिपूज्य ॥ १६ ॥

दुःशासन भरी सभामें भीमसेन तथा द्रौपदीसे क्षमा माँगे और आप युधिष्ठिरको भलीभाँति सान्त्वना दे सम्मानपूर्वक इस राज्यपर बिठा दीजिये ॥ १६ ॥

त्वया पृष्टः किमहमन्यद् वदेय- मेतत् कृत्वा कृतकृत्योऽसि राजन् ॥ १७ ॥

कुरुराज! आपने हितकी बात पूछी है तो मैं इसके सिवा और क्या बताऊँ । यह सब कर लेनेपर आप कृतकृत्य हो जायँगे ॥ १७ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

पृष्ठ 76

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 76 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एतद् वाक्यं विदुर यत् ते सभाया- मिह प्रोक्तं पाण्डवान् प्राप्य मां च ।

हितं तेषामहितं मामकाना- मेतत् सर्वं मम नावैति चेतः ॥ १८ ॥

धृतराष्ट्रने कहा- विदुर! तुमने यहाँ सभामें पाण्डवोंके तथा मेरे विषयमें जो बात कही है वह पाण्डवोंके लिये तो हितकर है, पर मेरे पुत्रोंके लिये अहितकारक है, अतः यह सब मेरा मन स्वीकार नहीं करता है ॥ १८ ॥

इदं त्विदानीं गत एव निश्चितं तेषामर्थे पाण्डवानां यदात्थ । तेनाद्य मन्ये नासि हितो ममेति कथं हि पुत्रं पाण्डवार्थे त्यजेयम् ॥ १ ९ ॥ इस समय तुम जो कुछ कह रहे हो इससे यह भलीभाँति निश्चय होता है कि तुम पाण्डवोंके हितके लिये ही यहाँ आये थे । तुम्हारे आजके ही व्यवहारसे मैं समझ गया कि तुम मेरे हितैषी नहीं हो । मैं पाण्डवोंके लिये अपने पुत्रोंको कैसे त्याग दूँ ॥ १ ९ ॥ असंशयं तेऽपि ममैव पुत्रा दुर्योधनस्तु मम देहात् प्रसूतः । स्वं वै देहं परहेतोस्त्यजेति को नु ब्रूयात् समतामन्ववेक्ष्य ॥ २० ॥

इसमें संदेह नहीं कि पाण्डव भी मेरे पुत्र हैं, पर दुर्योधन साक्षात् मेरे शरीरसे उत्पन्न हुआ है । समताकी ओर दृष्टि रखते हुए भी कौन किसको ऐसी बातें कहेगा कि तुम दूसरेके हितके लिये अपने शरीरका त्याग कर दो ॥ २० ॥

स मां जिह्मं विदुर सर्वं ब्रवीषि मानं च तेऽहमधिकं धारयामि । यथेच्छकं गच्छ वा तिष्ठ वा त्वं सुसान्त्व्यमानाप्यसती स्त्री जहाति ॥ २१ ॥

विदुर! मैं तुम्हारा अधिक सम्मान करता हूँ; किंतु तुम मुझे सब कुटिलतापूर्ण सलाह दे रहे हो । अब तुम्हारी जैसी इच्छा हो, चले जाओ या रहो । तुमसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है । कुलटा स्त्रीको कितनी ही सान्त्वना दी जाय, वह स्वामीको त्याग ही देती है ॥ २१ ॥

वैशम्पायन उवाच एतावदुक्त्वा धृतराष्ट्रोऽन्वपद्य- दन्तर्वेश्म सहसोत्थाय राजन् । नेदमस्तीत्यथ विदुरो भाषमाणः

पृष्ठ 77

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 77 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सम्प्राद्रवद् यत्र पार्था बभूवुः ॥ २२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्र सहसा उठकर महलके भीतर चले गये । तब विदुरने यह कहकर कि अब इस कुलका नाश अवश्यम्भावी है, जहाँ पाण्डव थे वहाँ चले गये ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरवाक्यप्रत्याख्याने चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें विदुरवाक्यप्रत्याख्यान-विषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥

पृष्ठ 78

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 78 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पञ्चमोऽध्यायः पाण्डवोंका काम्यकवनमें प्रवेश और विदुरजीका वहाँ जाकर उनसे मिलना और बातचीत करना वैशम्पायन उवाच

पाण्डवास्तु वने वासमुद्दिश्य भरतर्षभाः ।

प्रययुर्जाह्नवीकूलात् कुरुक्षेत्रं सहानुगाः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भरतवंश- शिरोमणि पाण्डव वनवासके लिये गंगाजीके तटसे अपने साथियोंसहित कुरुक्षेत्रमें गये ॥ १ ॥

सरस्वतीदृषद्वत्यौ यमुनां च निषेव्य ते ।

ययुर्वनेनैव वनं सततं पश्चिमां दिशम् ॥ २ ॥

उन्होंने क्रमशः सरस्वती, दृषद्वती और यमुना नदीका सेवन करते हुए एक वनसे दूसरे वनमें प्रवेश किया । इस प्रकार वे निरन्तर पश्चिम दिशाकी ओर बढ़ते गये ॥ २ ॥

ततः सरस्वतीकूले समेषु मरुधन्वसु ।

काम्यकं नाम ददृशुर्वनं मुनिजनप्रियम् ॥ ३ ॥

तदनन्तर सरस्वती-तट तथा मरुभूमि एवं वन्य प्रदेशोंकी यात्रा करते हुए उन्होंने काम्यकवनका दर्शन किया, जो ऋषि- मुनियोंके समुदायको बहुत ही प्रिय था ॥ ३ ॥

तत्र ते न्यवसन् वीरा वने बहुमृगद्विजे ।

अन्वास्यमाना मुनिभिः सान्त्व्यमानाश्च भारत ॥ ४ ॥

भारत! उस वनमें बहुत- से पशु- पक्षी निवास करते थे । वहाँ मुनियोंने उन्हें बिठाया और

बहुत सान्त्वना दी । फिर वे वीर पाण्डव वहीं रहने लगे ॥ ४ ॥

विदुरस्त्वथ पाण्डूनां सदा दर्शनलालसः ।

जगामैकरथेनैव काम्यकं वनमृद्धिमत् ॥ ५ ॥

इधर विदुरजी सदा पाण्डवोंको देखनेके लिये उत्सुक रहा करते थे । वे एकमात्र रथके द्वारा काम्यकवनमें गये, जो वनोचित सम्पत्तियोंसे भरा - पूरा था ॥ ५ ॥

ततो गत्वा विदुरः काम्यकं त- च्छीघ्रैरश्वैर्वाहिना स्यन्दनेन । ददर्शासीनं धर्मात्मानं विविक्ते सार्धं द्रौपद्या भ्रातृभिर्ब्राह्मणैश्च ॥ ६ ॥

शीघ्रगामी अश्वोंद्वारा खींचे जानेवाले रथसे काम्यक -वनमें पहुँचकर विदुरजीने देखा धर्मात्मा युधिष्ठिर एकान्त प्रदेशमें द्रौपदी, भाइयों तथा ब्राह्मणोंके साथ बैठे हैं ॥ ६ ॥

पृष्ठ 79

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 79 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ततोऽपश्यद् विदुरं तूर्णमारा- दभ्यायान्तं सत्यसंधः स राजा । अथाब्रवीद् भ्रातरं भीमसेनं किं नु क्षत्ता वक्ष्यति नः समेत्य ॥ ७ ॥

सत्यप्रतिज्ञ राजा युधिष्ठिरने जब बड़ी उतावलीके साथ विदुरजीको अपने निकट आते देखा तब भाई भीमसेनसे कहा– ' ये विदुरजी हमारे पास आकर न जाने क्या कहेंगे ॥ ७ ॥

कच्चिन्नायं वचनात् सौबलस्य समाह्वाता देवनायोपयातः । कच्चित् क्षुद्रः शकुनिर्नायुधानि जेष्यत्यस्मान् पुनरेवाक्षवत्याम् ॥ ८ ॥

‘ ये शकुनिके कहनेसे हमें फिर जूआ खेलनेके लिये बुलाने तो नहीं आ रहे हैं । कहीं नीच शकुनि हमें फिर द्यूत- सभामें बुलाकर हमारे आयुधोंको तो जीत नहीं लेगा ॥ ८ ॥

समाहूतः केनचिदाद्रवेति नाहं शक्तो भीमसेनापयातुम् । गाण्डीवे च संशयिते कथं नु राज्यप्राप्तिः संशयिता भवेन्नः ॥ ९ ॥

‘ भीमसेन! आओ, कहकर यदि कोई मुझे ( युद्ध या द्यूतके लिये ) बुलावे तो मैं पीछे नहीं हट सकता । ऐसी दशामें यदि हम गाण्डीव धनुष किसी तरह जूएमें हार गये तो हमारी राज्य -प्राप्ति संशयमें पड़ जायगी' ॥ ९ ॥

वैशम्पायन उवाच तत उत्थाय विदुरं पाण्डवेयाः प्रत्यगृह्णन् नृपते सर्व एव । तैः सत्कृतः स च तानाजमीढो यथोचितं पाण्डुपुत्रान् समेयात् ॥ १० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर सब पाण्डवोंने उठकर विदुरजीकी अगवानी की । उनके द्वारा किया हुआ यथोचित स्वागत- सत्कार ग्रहण करके अजमीढवंशी विदुर पाण्डवोंसे मिले ॥ १० ॥

समाश्वस्तं विदुरं ते नरर्षभा- स्ततोऽपृच्छन्नागमनाय हेतुम् ।

पृष्ठ 80

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 80 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

स चापि तेभ्यो विस्तरतः शशंस यथावृत्तो धृतराष्ट्रोऽम्बिकेयः ॥ ११ ॥

विदुरजीके आदर- सत्कार पानेपर नरश्रेष्ठ पाण्डवोंने उनसे वनमें आनेका कारण पूछा । उनके पूछनेपर विदुरने भी अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने जैसा बर्ताव किया था, वह सब विस्तारपूर्वक कह सुनाया ॥ ११ ॥

विदुर उवाच अवोचन्मां धृतराष्ट्रोऽनुगुप्त- मजातशत्रो परिगृह्याभिपूज्य । एवं गते समतामभ्युपेत्य पथ्यं तेषां मम चैव ब्रवीहि ॥ १२ ॥

विदुरजी बोले – अजातशत्रो! राजा धृतराष्ट्रने मुझे अपना रक्षक समझकर बुलाया और मेरा आदर करके कहा - ' विदुर! आजकी परिस्थितिमें समभाव रखकर तुम ऐसा कोई उपाय बताओ जो मेरे और पाण्डवोंके लिये हितकर हो ' ॥ १२ ॥

मयाप्युक्तं यत् क्षेमं कौरवाणां हितं पथ्यं धृतराष्ट्रस्य चैव ।