श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 61–70

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 61–70

पृष्ठ 61

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गीताप्रेस गोरखपुर पाण्डवोंका वनगमन

पृष्ठ 62

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C गीताप्रेस गोरखपुर उर्वशीका अर्जुनकोशाप देना

पृष्ठ 63

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COOK गीताप्रेस गोरखपुर नलका अपने पूर्वरूपमें प्रकट होकर दमयन्तीसे मिलना

पृष्ठ 64

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गीताप्रेस गोरखपुर जमदग्निका परशुरामसे कार्तवीर्य अर्जुनका अपराध बताना

पृष्ठ 65

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GANDS गीताप्रेस गोरखपुर महाप्रलयके समय भगवान् मत्स्यके सींगमें बँधी हुई मनु और सप्तर्षियोंसहित नौका

पृष्ठ 66

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गीताप्रेस गोरखपुर मार्कण्डेय मुनिको अक्षयवटकी शाखापर बालमुकुन्दका दर्शन

पृष्ठ 67

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G गीताप्रेस गोरखपुर इन्द्रके द्वारा देवसेनाका स्कन्दको समर्पण

पृष्ठ 68

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गीताप्रेस गोरखपुर, कौरवोंद्वारा विराटकी गायोंका हरण गृह्णीष्व पिठरं ताम्रं मया दत्त नराधिप ।

पृष्ठ 69

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यावद् वर्त्स्यति पाञ्चाली पात्रेणानेन सुव्रत ॥ ७२ ॥

फलमूलामिषं शाकं संस्कृतं यन्महानसे ।

चतुर्विधं तदन्नाद्यमक्षय्यं ते भविष्यति ॥ ७३ ॥

राजन्! यह मेरी दी हुई ताँबेकी बटलोई लो । सुव्रत! तुम्हारे रसोईघरमें इस पात्रद्वारा फल, मूल, भोजन करनेके योग्य अन्य पदार्थ तथा साग आदि जो चार प्रकारकी भोजन-सामग्री तैयार होगी, वह तबतक अक्षय बनी रहेगी, जबतक द्रौपदी स्वयं भोजन न करके परोसती रहेगी ॥ ७२-७३ ॥

इतश्चतुर्दशे वर्षे भूयो राज्यमवाप्स्यसि ।

आजसे चौदहवें वर्षमें तुम अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लोगे ॥ ७३ ॥

वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा तु भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ ७४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इतना कहकर भगवान् सूर्य वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ७४ ॥

इमं स्तवं प्रयतमनाः समाधिना पठेदिहान्योऽपि वरं समर्थयन् । तत् तस्य दद्याच्च रविर्मनीषितं तदाप्नुयाद् यद्यपि तत् सुदुर्लभम् ॥ ७५ ॥

जो कोई अन्य पुरुष भी मनको संयममें रखकर चित्तवृत्तियोंको एकाग्र करके इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह यदि कोई अत्यन्त दुर्लभ वर भी माँगे तो भगवान् सूर्य उसकी उस मनोवांछित वस्तुको दे सकते हैं ॥ ७५ ॥

यश्चेदं धारयेन्नित्यं शृणुयाद् वाप्यभीक्ष्णशः ।

पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम् ।

विद्यार्थी लभते विद्यां पुरुषोऽप्यथवा स्त्रियः ॥ ७६ ॥

जो प्रतिदिन इस स्तोत्रको धारण करता अथवा बार- बार सुनता है, वह यदि पुत्रार्थी हो तो पुत्र पाता है, धन चाहता हो तो धन पाता है, विद्याकी अभिलाषा रखता हो तो उसे विद्या प्राप्त होती है और पत्नीकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको पत्नी सुलभ होती है ॥ ७६ ॥

उभे संध्ये पठेन्नित्यं नारी वा पुरुषो यदि ।

आपदं प्राप्य मुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात् ॥ ७७ ॥

स्त्री हो या पुरुष यदि दोनों संध्याओंके समय इस स्तोत्रका पाठ करता है तो आपत्तिमें पड़कर भी उससे मुक्त हो जाता है । बन्धनमें पड़ा हुआ मनुष्य बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ७७ ॥

एतद् ब्रह्मा ददौ पूर्वं शक्राय सुमहात्मने ।

पृष्ठ 70

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शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यस्तु तदनन्तरम् ।

धौम्याद् युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान् कामानवाप्तवान् ॥ ७८ ॥

यह स्तुति सबसे पहले ब्रह्माजीने महात्मा इन्द्रको दी, इन्द्रसे नारदजीने और नारदजीसे धौम्यने इसे प्राप्त किया । धौम्यसे इसका उपदेश पाकर राजा युधिष्ठिरने अपनी सब कामनाएँ प्राप्त कर लीं ॥ ७८ ॥

संग्रामे च जयेन्नित्यं विपुलं चाप्नुयाद् वसु ।

मुच्यते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं स गच्छति ॥ ७९ ॥

जो इसका अनुष्ठान करता है वह सदा संग्राममें विजयी होता है, बहुत धन पाता है, सब पापोंसे मुक्त होता और अन्तमें सूर्यलोकको जाता है ॥ ७ ९ ॥ वैशम्पायन उवाच

लब्ध्वा वरं तु कौन्तेयो जलादुत्तीर्य धर्मवित् ।

जग्राह पादौ धौम्यस्य भ्रातॄंश्च परिषस्वजे ॥ ८० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पूर्वोक्त वर पाकर धर्मके ज्ञाता कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर गंगाजीके जलसे बाहर निकले। उन्होंने धौम्यजीके दोनों चरण पकड़े और भाइयोंको हृदयसे लगा लिया ॥ ८० ॥

द्रौपद्या सह संगम्य वन्द्यमानस्तया प्रभुः ।

महानसे तदानीं तु साधयामास पाण्डवः ॥ ८१ ॥

द्रौपदीने उन्हें प्रणाम किया और वे उससे प्रेमपूर्वक मिले । फिर उसी समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने चूल्हेपर बटलोई रखकर रसोई तैयार करायी ॥ ८१ ॥

संस्कृतं प्रसवं याति स्वल्पमन्नं चतुर्विधम् ।

अक्षय्यं वर्धते चान्नं तेन भोजयते द्विजान् ॥ ८२ ॥

उसमें तैयार की हुई चार प्रकारकी थोड़ी- सी भी रसोई उस पात्रके प्रभावसे बढ़ जाती

और अक्षय हो जाती थी । उसीसे वे ब्राह्मणोंको भोजन कराने लगे ॥ ८२ ॥

भुक्तवत्सु च विप्रेषु भोजयित्वानुजानपि ।

शेषं विघससंज्ञं तु पश्चाद् भुङ्क्ते युधिष्ठिरः ॥ ८३ ॥

ब्राह्मणोंके भोजन कर लेनेपर अपने छोटे भाइयोंको भी भोजन करानेके पश्चात् ‘ विघस ’ संज्ञक अवशिष्ट अन्नको युधिष्ठिर सबसे पीछे खाते थे ॥ ८३ ॥

युधिष्ठिरं भोजयित्वा शेषमश्नाति पार्षती ।

द्रौपद्यां भुज्यमानायां तदन्नं क्षयमेति च ।

एवं दिवाकरात् प्राप्य दिवाकरसमप्रभः ॥ ८४ ॥

कामान् मनोऽभिलषितान् बाह्मणेभ्योऽददात् प्रभुः । पुरोहितपुरोगाश्च तिथिनक्षत्रपर्वसु ।