श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 81–90
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90
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तद् वै तस्मै न रुचामभ्युपैति ततश्चाहं क्षेममन्यन्न मन्ये ॥ १३ ॥
तब मैंने भी ऐसी बातें बतायीं जो सर्वथा उचित तथा कौरववंश एवं धृतराष्ट्रके लिये भी हितकर और लाभदायक थीं । वह बात उनको नहीं रुची और मैं उसके सिवा दूसरी कोई बात उचित नहीं समझता था ॥ १३ ॥
परं श्रेयः पाण्डवेया मयोक्तं न मे तच्च श्रुतवानाम्बिकेयः । यथाऽऽतुरस्येव हि पथ्यमन्नं न रोचते स्मास्य तदुच्यमानम् ॥ १४ ॥
पाण्डवो! मैंने दोनों पक्षके लिये परम कल्याणकी बात बतायी थी, परंतु अम्बिकानन्दन महाराज धृतराष्ट्रने मेरी वह बात नहीं सुनी। जैसे रोगीको हितकर भोजन अच्छा नहीं लगता, उसी प्रकार राजा धृतराष्ट्रको मेरी कही हुई हितकर बात भी पसंद नहीं आती ॥ १४ ॥
न श्रेयसे नीयतेऽजातशत्रो स्त्री श्रोत्रियस्येव गृहे प्रदुष्टा । ध्रुवं न रोचेद् भरतर्षभस्य पतिः कुमार्या इव षष्टिवर्षः ॥ १५ ॥
अजातशत्रो! जैसे श्रोत्रियके घरकी दुष्टा स्त्री श्रेयके मार्गपर नहीं लायी जा सकती, उसी प्रकार राजा धृतराष्ट्रको कल्याणके मार्गपर लाना असम्भव है । जैसे कुमारी कन्याको साठ वर्षका बूढ़ा पति अच्छा नहीं लगता, उसी प्रकार भरतश्रेष्ठ धृतराष्ट्रको मेरी कही हुई बात निश्चय ही नहीं रुचती ॥ १५ ॥
ध्रुवं विनाशो नृप कौरवाणां न वै श्रेय धृतराष्ट्रः परैति । यथा च पर्णे पुष्करस्यावसिक्तं जलं न तिष्ठेत् पथ्यमुक्तं तथास्मिन् ॥ १६ ॥
राजन्! राजा धृतराष्ट्र कल्याणकारी उपाय नहीं ग्रहण करते हैं, अतः यह निश्चय जान पड़ता है कि कौरवकुलका विनाश अवश्यम्भावी है । जैसे कमलके पत्तेपर डाला हुआ जल नहीं ठहर सकता, उसी प्रकार कही हुई हितकर बात राजा धृतराष्ट्रके मनमें स्थान नहीं पाती है ॥ १६ ॥
ततः क्रुद्धो धृतराष्ट्रोऽब्रवीन्मां यस्मिन् श्रद्धा भारत तत्र याहि । नाहं भूयः कामये त्वां सहायं महीमिमां पालयितुं पुरं वा ॥ १७ ॥
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उस समय राजा धृतराष्ट्रने कुपित होकर मुझसे कहा- ' भारत! जिसपर तुम्हारी श्रद्धा हो वहीं चले जाओ । अब मैं इस राज्य अथवा नगरका पालन करनेके लिये तुम्हारी सहायता नहीं चाहता' ॥ १७ ॥
सोऽहं त्यक्तो धृतराष्ट्रेण राज्ञा प्रशासितुं त्वामुपयातो नरेन्द्र । तद् वै सर्वं यन्मयोक्तं सभायां तद् धार्यतां यत् प्रवक्ष्यामि भूयः ॥ १८ ॥
नरेन्द्र! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्रने मुझे त्याग दिया है; अतः मैं तुम्हें उपदेश देनेके लिये आया हूँ । मैंने सभामें जो कुछ कहा था और पुनः इस समय जो कुछ कह रहा हूँ, वह सब तुम धारण करो ॥ १८ ॥
क्लेशैस्तीव्रैर्युज्यमानः सपत्नैः क्षमां कुर्वन् कालमुपासते यः । संवर्धयन् स्तोकमिवाग्निमात्मवान् स वै भुङ्क्ते पृथिवीमेक एव ॥ १ ९ ॥ जो शत्रुओंद्वारा दुःसह कष्ट दिये जानेपर भी क्षमा करते हुए अनुकूल अवसरकी प्रतीक्षा करता है; तथा जिस प्रकार थोड़ी - सी आगको भी लोग घास- फूसके द्वारा प्रज्वलित करके बढ़ा लेते हैं, वैसे ही जो मनको वशमें रखकर अपनी शक्ति और सहायकोंको बढ़ाता है, वह अकेला ही सारी पृथ्वीका उपभोग करता है ॥ १ ९ ॥ यस्याविभक्तं वसु राजन् सहायै- स्तस्य दुःखेऽप्यंशभाजः सहायाः । सहायानामेष संग्रहणेऽध्युपायः सहायाप्तौ पृथिवीप्राप्तिमाहुः ॥ २० ॥
राजन्! जिसका धन सहायकोंके लिये बँटा नहीं है; अर्थात् जिसके धनको सहायक भी अपना ही समझकर भोगते हैं, उसके दुःखमें भी वे सब लोग हिस्सा बँटाते हैं । सहायकोंके संग्रहका यही उपाय है । सहायकोंकी प्राप्ति हो जानेपर पृथ्वीकी ही प्राप्ति हो गयी, ऐसा कहा जाता है ॥ २० ॥
सत्यं श्रेष्ठं पाण्डव विप्रलापं तुल्यं चान्नं सह भोज्यं सहायैः । आत्मा चैषामग्रतो न स्म पूज्य एवंवृत्तिर्वर्धते भूमिपालः ॥ २१ ॥
पाण्डुनन्दन! व्यर्थकी बकवादसे रहित सत्य बोलना ही श्रेष्ठ है । अपने सहायक भाई-बन्धुओंके साथ बैठकर समान अन्नका भोजन करना चाहिये । उन सबके आगे अपनी मान-
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बड़ाई तथा पूजाकी बातें नहीं करनी चाहिये । ऐसा बर्ताव करनेवाला भूपाल सदा उन्नतिशील होता है ॥ २१ ॥
युधिष्ठिर उवाच एवं करिष्यामि यथा ब्रवीषि परां बुद्धिमुपगम्याप्रमत्तः । यच्चाप्यन्यद्देशकालोपपन्नं तद् वै वाच्यं तत् करिष्यामि कृत्स्नम् ॥ २२ ॥
युधिष्ठिर बोले- विदुरजी! मैं उत्तम बुद्धिका आश्रय ले सतत सावधान रहकर आप जैसा कहते हैं वैसा ही करूँगा । और भी देश- कालके अनुसार आप जो कर्तव्य उचित समझें, वह बतावें । मैं उसका पूर्णरूपसे पालन करूँगा ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरनिर्वासे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें विदुरनिर्वासनविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
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षष्ठोऽध्यायः धृतराष्ट्रका संजयको भेजकर विदुरको वनसे बुलवाना और उनसे क्षमा -प्रार्थना वैशम्पायन उवाच
गते तु विदुरे राजन्नाश्रमं पाण्डवान् प्रति ।
धृतराष्ट्रो महाप्राज्ञः पर्यतप्यत भारत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! जब विदुरजी पाण्डवोंके आश्रमपर चले गये, तब महाबुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रको बड़ा पश्चात्ताप हुआ ॥ १ ॥
विदुरस्य प्रभावं च संधिविग्रहकारितम् ।
विवृद्धिं च परां मत्वा पाण्डवानां भविष्यति ॥ २ ॥
उन्होंने सोचा, विदुर संधि और विग्रह आदिकी नीतिको अच्छी तरह जानते हैं, जिसके कारण उनका बहुत बड़ा प्रभाव है । वे पाण्डवोंके पक्षमें हो गये तो भविष्यमें उनका महान् अभ्युदय होगा ॥ २ ॥
स सभाद्वारमागम्य विदुरस्मारमोहितः ।
समक्षं पार्थिवेन्द्राणां पपाताविष्टचेतनः ॥ ३ ॥
विदुरका स्मरण करके वे मोहित से हो गये और सभाभवनके द्वारपर आकर सब राजाओंके देखते - देखते अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३ ॥
स तु लब्ध्वा पुनः संज्ञां समुत्थाय महीतलात् ।
समीपोपस्थितं राजा संजयं वाक्यमब्रवीत् ॥ ४ ॥
फिर होशमें आनेपर वे पृथ्वीसे उठ खड़े हुए और समीप आये हुए संजयसे इस प्रकार बोले— ॥ ४ ॥
भ्राता मम सुहृच्चैव साक्षाद् धर्म इवापरः ।
तस्य स्मृत्याद्य सुभृशं हृदयं दीर्यतीव मे ॥५ ॥
‘ संजय! विदुर मेरे भाई और सुहृद् हैं । वे साक्षात् दूसरे धर्मके समान हैं । उनकी याद आनेसे आज मेरा हृदय अत्यन्त विदीर्ण - सा होने लगा है ॥ ५ ॥
तमानयस्व धर्मज्ञं मम भ्रातरमाशु वै ।
इति ब्रुवन् स नृपतिः कृपणं पर्यदेवयत् ॥ ६ ॥
' तुम मेरे धर्मज्ञ भ्राता विदुरको शीघ्र यहाँ बुला लाओ । ' ऐसा कहते हुए राजा धृतराष्ट्र दीनभावसे फूट- फूटकर रोने लगे ॥ ६ ॥
पश्चात्तापाभिसंतप्तो विदुरस्मारमोहितः ।
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भ्रातृस्नेहादिदं राजा संजयं वाक्यमब्रवीत् ॥ ७ ॥
महाराज धृतराष्ट्र विदुरकी याद आनेसे मोहित हो पश्चात्तापसे खिन्न हो उठे और भ्रातृस्नेहवश संजयसे पुनः इस प्रकार बोले- ॥ ७ ॥
गच्छ संजय जानीहि भ्रातरं विदुरं मम ।
यदि जीवति रोषेण मया पापेन निर्धुतः ॥ ८ ॥
संजय! जाओ, मेरे भाई विदुरका पता लगाओ । मुझ पापीने क्रोधवश उन्हें निकाल दिया । वे जीवित तो हैं न? ॥ ८ ॥
न हि तेन मम भ्रात्रा सुसूक्ष्ममपि किंचन ।
व्यलीकं कृतपूर्वं वै प्राज्ञेनामितबुद्धिना ॥ ९ ॥
' अपरिमित बुद्धिवाले मेरे उन विद्वान् भाईने पहले कभी कोई छोटा- सा भी अपराध नहीं किया है ॥ ९ ॥
स व्यलीकं परं प्राप्तो मत्तः परमबुद्धिमान् ।
त्यक्ष्यामि जीवितं प्राज्ञ तं गच्छानय संजय ॥ १० ॥
‘ बुद्धिमान् संजय! मुझसे परम मेधावी विदुरका बड़ा अपराध हुआ । तुम जाकर उन्हें ले आओ, नहीं तो मैं प्राण त्याग दूँगा ' ॥ १० ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राज्ञस्तमनुमान्य च ।
संजयो बाढमित्युक्त्वा प्राद्रवत् काम्यकं प्रति ॥ ११ ॥
सोऽचिरेण समासाद्य तद् वनं यत्र पाण्डवाः ।
रौरवाजिनसंवीतं ददर्शाथ युधिष्ठिरम् ॥ १२ ॥
विदुरेण सहासीनं ब्राह्मणैश्च सहस्रशः ।
भ्रातृभिश्चाभिसंगुप्तं देवैरिव पुरंदरम् ॥ १३ ॥
राजाका यह वचन सुनकर संजयने उनका आदर करते हुए ' बहुत अच्छा ' कहकर काम्यकवनको प्रस्थान किया । जहाँ पाण्डव रहते थे, उस वनमें शीघ्र ही पहुँचकर संजयने देखा, राजा युधिष्ठिर मृगचर्म धारण करके विदुरजी तथा सहस्रों ब्राह्मणोंके साथ बैठे हुए हैं । और देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति अपने भाइयोंसे सुरक्षित हैं ॥ ११–१३ ॥
युधिष्ठिरमुपागम्य पूजयामास संजयः ।
भीमार्जुनयमाश्चापि तद्युक्तं प्रतिपेदिरे ॥ १४ ॥
युधिष्ठिरके पास पहुँचकर संजयने उनका सम्मान किया। फिर भीम, अर्जुन और नकुल- सहदेवने संजयका यथोचित सत्कार किया ॥ १४ ॥
राज्ञा पृष्टः स कुशलं सुखासीनश्च संजयः ।
शशंसागमने हेतुमिदं चैवाब्रवीद् वचः ॥ १५ ॥
राजा युधिष्ठिरके कुशल- प्रश्न करनेके पश्चात् जब संजय सुखपूर्वक बैठ गया, तब अपने आनेका कारण बताते हुए उसने इस प्रकार कहा ॥ १५ ॥
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संजय उवाच
राजा स्मरति ते क्षत्तर्धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
तं पश्य गत्वा त्वं क्षिप्रं संजीवय च पार्थिवम् ॥ १६ ॥
संजयने कहा- विदुरजी! अम्बिकानन्दन महाराज धृतराष्ट्र आपको स्मरण करते हैं ।
आप जल्दी चलकर उनसे मिलिये और उन्हें जीवनदान दीजिये ॥ १६ ॥
सोऽनुमान्य नरश्रेष्ठान् पाण्डवान् कुरुनन्दनान् ।
नियोगाद् राजसिंहस्य गन्तुमर्हसि सत्तम ॥ १७ ॥
साधुशिरोमणे! आप कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले इन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंसे आदरपूर्वक विदा लेकर महाराजके आदेशसे शीघ्र उनके पास चलें ॥ १७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु विदुरो धीमान् स्वजनवल्लभः ।
युधिष्ठिरस्यानुमते पुनरायाद् गजाह्वयम् ॥ १८ ॥
तमब्रवीन्महातेजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
दिष्ट्या प्राप्तोऽसि धर्मज्ञ दिष्ट्या स्मरसि मेऽनघ ॥ १ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! स्वजनोंके परम प्रिय बुद्धिमान् विदुरजीसे जब संजयने इस प्रकार कहा, तब वे युधिष्ठिरकी अनुमति लेकर फिर हस्तिनापुरमें आये । वहाँ महातेजस्वी अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रने उनसे कहा–' धर्मज्ञ विदुर! तुम आ गये, यह मेरे बड़े सौभाग्यकी बात है । अनघ! यह भी मेरे सौभाग्यकी बात है कि तुम मुझे भूले नहीं ॥ १८-१९ ॥
अद्य रात्रौ दिवा चाहं त्वत्कृते भरतर्षभ ।
प्रजागरे प्रपश्यामि विचित्रं देहमात्मनः ॥ २० ॥
‘ भरतकुलभूषण! मैं आज दिन- रात तुम्हारे लिये जागते रहनेके कारण अपने शरीरकी विचित्र दशा देख रहा हूँ' ॥ २० ॥
सोऽङ्कमानीय विदुरं मूर्धन्याघ्राय चैव ह ।
क्षम्यतामिति चोवाच यदुक्तोऽसि मयानघ ॥ २१ ॥
ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्रने विदुरको अपने हृदयसे लगा लिया और उनका मस्तक सूँघते हुए कहा – ' निष्पाप विदुर! मैंने तुमसे जो अप्रिय बात कह दी है, उसके लिये मुझे क्षमा करो ' ॥ २१ ॥
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विदुरउवाच
क्षान्तमेव मया राजन् गुरुर्मे परमो भवान् ।
एषोऽहमागतः शीघ्रं त्वद्दर्शनपरायणः ॥ २२ ॥
भवन्ति हि नरव्याघ्र पुरुषा धर्मचेतसः ।
दीनाभिपातिनो राजन् नात्र कार्या विचारणा ॥ २३ ॥
विदुरने कहा— राजन्! मैंने तो सब क्षमा कर ही दिया है । आप मेरे परम गुरु हैं । मैं शीघ्रतापूर्वक आपके दर्शनके लिये आया हूँ । नरश्रेष्ठ! धर्मात्मा पुरुष दीन जनोंकी ओर अधिक झुकते हैं । आपको इसके लिये मनमें विचार नहीं करना चाहिये ॥ २२-२३ ॥
पाण्डोः सुता यादृशा मे तादृशास्तव भारत ।
दीना इतीव मे बुद्धिरभिपन्नाद्य तान् प्रति ॥ २४ ॥
भारत! मेरे लिये जैसे पाण्डुके पुत्र हैं, वैसे ही आपके भी । परंतु पाण्डव इन दिनों दीन दशामें हैं, अतः उनके प्रति मेरे हृदयका झुकाव हो गया ॥ २४ ॥
वैशम्पायन उवाच
अन्योन्यमनुनीयैवं भ्रातरौ द्वौ महाद्युती ।
विदुरो धृतराष्ट्रश्च लेभाते परमां मुदम् ॥ २५ ॥
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वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! वे दोनों महातेजस्वी भाई विदुर और धृतराष्ट्र एक- दूसरेसे अनुनय - विनय करके अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि विदुरप्रत्यागमने षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें विदुरप्रत्यागमनविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
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सप्तमोऽध्यायः दुर्योधन, दुःशासन, शकुनि और कर्णकी सलाह, पाण्डवोंका वध करनेके लिये उनका वनमें जानेकी तैयारी तथा व्यासजीका आकर उनको रोकना वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा च विदुरं प्राप्तं राज्ञा च परिसान्त्वितम् ।
धृतराष्ट्रात्मजो राजा पर्यतप्यत दुर्मतिः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! विदुर आ गये और राजा धृतराष्ट्रने उन्हें सान्त्वना देकर रख लिया, यह सुनकर दुष्ट बुद्धिवाला धृतराष्ट्रकुमार राजा दुर्योधन संतप्त हो उठा ॥ १ ॥
स सौबलेयमानाय्य कर्णदुःशासनौ तथा ।
अब्रवीद् वचनं राजा प्रविश्याबुद्धिजं तमः ॥ २ ॥
उसने शकुनि, कर्ण और दुःशासनको बुलाकर अज्ञानजनित मोहमें मग्न हो इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
एष प्रत्यागतो मन्त्रो धृतराष्ट्रस्य धीमतः ।
विदुरः पाण्डुपुत्राणां सुहृद् विद्वान् हिते रतः ॥ ३ ॥
' बुद्धिमान् पिताजीका यह मन्त्री विदुर फिर लौट आया । विदुर विद्वान् होनेके साथ ही पाण्डवोंका सुहृद् और उन्हींके हितसाधनमें संलग्न रहनेवाला है ॥ ३ ॥
यावदस्य पुनर्बुद्धिं विदुरो नापकर्षति ।
पाण्डवानयने तावन्मन्त्रयध्वं हितं मम ॥ ४ ॥
‘ यह पिताजीके विचारको पुनः पाण्डवोंके लौटा लानेकी ओर जबतक नहीं खींचता, तभीतक मेरे हित - साधनके विषयमें तुमलोग कोई उत्तम सलाह दो ॥ ४ ॥
अथ पश्याम्यहं पार्थान् प्राप्तानिह कथंचन ।
पुनः शोषं गमिष्यामि निरम्बुर्निरवग्रहः ॥ ५ ॥
‘ यदि मैं किसी प्रकार पाण्डवोंको यहाँ आया देख लूँगा तो जलका भी परित्याग करके स्वेच्छासे अपने शरीरको सुखा डालूँगा ॥ ५ ॥
विषमुद्बन्धनं चैव शस्त्रमग्निप्रवेशनम् ।
करिष्ये न हि तानृद्धान् पुनर्द्रष्टुमिहोत्सहे ॥ ६ ॥
' मैं जहर खा लूँगा, फाँसी लगा लूँगा, अपने - आपको ही शस्त्रसे मार दूँगा अथवा जलती आगमें प्रवेश कर जाऊँगा; परंतु पाण्डवोंको फिर बढ़ते या फलते - फूलते नहीं देख
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सकूँगा' ॥ ६ ॥
शकुनिरुवाच
किं बालिशमतिं राजन्नास्थितोऽसि विशाम्पते ।
गतास्ते समयं कृत्वा नैतदेवं भविष्यति ॥ ७ ॥
शकुनि बोला— राजन्! तुम भी क्या नादान बच्चोंके से विचार रखते हो? पाण्डव प्रतिज्ञा करके वनमें गये हैं । वे उस प्रतिज्ञाको तोड़कर लौट आवें, ऐसा कभी नहीं होगा ॥ ७ ॥
सत्यवाक्यस्थिताः सर्वे पाण्डवा भरतर्षभ ।
पितुस्ते वचनं तात न ग्रहीष्यन्ति कर्हिचित् ॥ ८ ॥
भरतवंशशिरोमणे! सब पाण्डव सत्य वचनका पालन करनेमें संलग्न हैं । तात! वे तुम्हारे पिताकी बात कभी स्वीकार नहीं करेंगे ॥ ८ ॥
अथवा ते ग्रहीष्यन्ति पुनरेष्यन्ति वा पुरम् ।
निरस्य समयं सर्वे पणोऽस्माकं भविष्यति ॥ ९ ॥
अथवा यदि वे तुम्हारे पिताकी बात मान लेंगे और प्रतिज्ञा तोड़कर इस नगरमें आ जायँगे तो हमारा व्यवहार इस प्रकार होगा ॥ ९ ॥
सर्वे भवामो मध्यस्था राज्ञश्छन्दानुवर्तिनः ।
छिद्रं बहु प्रपश्यन्तः पाण्डवानां सुसंवृताः ॥ १० ॥
हम सब लोग राजाकी आज्ञाका पालन करते हुए मध्यस्थ हो जायँगे और छिपे -छिपे पाण्डवोंके बहुत- से छिद्र देखते रहेंगे ॥ १० ॥
दुःशासनउवाच
एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि मातुल ।
नित्यं हि मे कथयतस्तव बुद्धिर्विरोचते ॥ ११ ॥
दुःशासनने कहा – महाबुद्धिमान् मामाजी! आप जैसा कहते हैं, वही मुझे भी ठीक जान पड़ता है । आपके मुखसे जो विचार प्रकट होता है, वह मुझे सदा अच्छा लगता है ॥ ११ ॥
कर्णउवाच
काममीक्षामहे सर्वे दुर्योधन तवेप्सितम् ।
ऐकमत्यं हि नो राजन् सर्वेषामेव लक्षये ॥ १२ ॥
- कर्ण बोला – दुर्योधन! हम सब लोग तुम्हारी अभिलषित कामनाकी पूर्तिके लिये सचेष्ट हैं । राजन्! इस विषयमें हम सभीका एक मत दिखायी देता है ॥ १२ ॥
नागमिष्यन्ति ते धीरा अकृत्वा कालसंविदम् ।