02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 791–800
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 791–800
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स्मृतानि चित्रोज्ज्वलगन्धवन्ति ॥ ४ ॥
वत्स! जिसे तुम जल समझते थे, वह मद्य था । वह पापजनक और अपेय है, उसे कभी नहीं पीना चाहिये । दुष्ट पुरुष उसका उपयोग करते हैं तथा ये विचित्र, उज्ज्वल और सुगन्धित पुष्पमालाएँ भी मुनियोंके योग्य नहीं बतायी गयी हैं ॥ ४ ॥
रक्षांसि तानीति निवार्य पुत्रं विभाण्डकस्तां मृगयाम्बभूव । नासादयामास यदा त्र्यहेण तदा स पर्याववृतेऽऽश्रमाय ॥ ५ ॥
' ऐसी वस्तुएँ लानेवाले राक्षस ही हैं । ' ऐसा कहकर विभाण्डक मुनिने पुत्रको उससे मिलने - जुलनेसे मना कर दिया और स्वयं उस वेश्याकी खोज करने लगे । तीन दिनोंतक ढूँढ़नेपर भी जब वे उसका पता न लगा सके, तब आश्रमपर लौट आये ॥ ५ ॥
यदा पुनः काश्यपो वै जगाम फलान्याहर्तुं विधिनाऽऽश्रमात् सः । तदा पुनर्लोभयितुं जगाम सा वेशयोषा मुनिमृष्यशृङ्गम् ॥ ६ ॥
जब काश्यपनन्दन विभाण्डक मुनि आश्रमसे पुनः विधिके अनुसार फल लानेके लिये वनमें गये, तब वह वेश्या ऋष्यशृंग मुनिको लुभानेके लिये फिर उनके आश्रमपर आयी ॥ ६ ॥
दृष्ट्वैव तामृष्यशृङ्गः प्रहृष्टः सम्भ्रान्तरूपोऽभ्यपतत् तदानीम् । प्रोवाच चैनां भवतः श्रमाय गच्छाव यावन्न पिता ममैति ॥ ७ ॥
उसे देखते ही ऋष्यशृंग मुनि हर्ष - विभोर हो उठे और घबराकर तुरंत उसके पास दौड़ गये । निकट जाकर उन्होंने कहा – ' ब्रह्मन्! मेरे पिताजी जबतक लौटकर नहीं आते, तभीतक मैं और आप —दोनों आपके आश्रमकी ओर चल दें ' ॥ ७ ॥
ततो राजन् काश्यपस्यैकपुत्रं
प्रवेश्य योगेन विमुच्य नावम् ।
प्रमोदयन्त्यो विविधैरुपायै- राजग्मुरङ्गाधिपतेः समीपम् ॥ ८ ॥
राजन्! तदनन्तर विभाण्डक मुनिके इकलौते पुत्रको युक्तिसे नावमें ले जाकर वेश्याने नाव खोल दी । फिर सभी युवतियाँ भाँति- भाँतिके उपायोंद्वारा उनका मनोरंजन करती हुई अंगराजके समीप आयीं ॥ ८ ॥
संस्थाप्य तामाश्रमदर्शने तु
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संतारितां नावमथातिशुभ्राम् । नीरादुपादाय तथैव चक्रे नाव्याश्रमं नाम वनं विचित्रम् ॥ ९ ॥
नाविकोंद्वारा संचालित उस अत्यन्त उज्ज्वल नौकाको जलसे बाहर निकालकर राजाने एक स्थानपर स्थापित कर दिया और जितनी दूरीसे वह नौकागत आश्रम दिखायी देता था, उतनी दूरीके विस्तृत मैदानमें उन्होंने ऋष्यशृंग मुनिके आश्रम-म- जैसे ही एक विचित्र वनका निर्माण करा दिया, जो ' नाव्याश्रम' के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ९ ॥
अन्तःपुरे तं तु निवेश्य राजा
विभाण्डकस्यात्मजमेकपुत्रम् ।
ददर्श देवं सहसा प्रवृष्ट- मापूर्यमाणं च जगज्जलेन ॥ १० ॥
राजा लोमपादने विभाण्डक मुनिके इकलौते पुत्रको महलके भीतर रनिवासमें ठहरा दिया और देखा, सहसा उसी क्षण इन्द्रदेवने वर्षा आरम्भ कर दी तथा सारा जगत् जलसे परिपूर्ण हो गया ॥ १० ॥
सलोमपादः परिपूर्णकामः सुतां ददावृष्यशृङ्गाय शान्ताम् । क्रोधप्रतीकारकरं च चक्रे गाश्चैव मार्गेषु च कर्षणानि ॥ ११ ॥
लोमपादकी कामना पूरी हुई । उन्होंने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री शान्ता ऋष्यशृंग मुनिको ब्याह दी । फिर विभाण्डक मुनिके क्रोधके निवारणका भी उपाय कर दिया । जिस रास्तेसे महर्षि आनेवाले थे, उसमें स्थान - स्थानपर बहुत - से गाय - बैल रखवा दिये और किसानोंद्वारा खेतोंकी जुताई आरम्भ करा दी ॥ ११ ॥
विभाण्डकस्याव्रजतः स राजा
पशून् प्रभूतान् पशुपांश्च वीरान् ।
समादिशत् पुत्रगृद्धी महर्षि- र्विभाण्डकः परिपृच्छेद् यदा वः ॥ १२ ॥
स वक्तव्यः प्राञ्जलिभिर्भवद्भिः पुत्रस्य तेते पशवः कर्षणं च । किं ते प्रियं वै क्रियतां महर्षे दासाः स्म सर्वे तव वाचि बद्धाः ॥ १३ ॥
राजाने विभाण्डक मुनिके आगमन पथमें बहुत--से पशु तथा वीर पशुरक्षक भी नियुक्त कर दिये और सबको यह आदेश दे दिया था कि जब पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाले महर्षि विभाण्डक तुमसे पूछें तब हाथ जोड़कर उन्हें इस प्रकार उत्तर देना - ' ये सब आपके पुत्रके
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ही पशु हैं, ये खेत भी उन्हींके जोते जा रहे हैं । महर्षे! आज्ञा दें, हम आपका कौन - सा प्रिय कार्य करें । हम सब लोग आपके आज्ञापालक दास हैं ' ॥ १२-१३ ॥ अथोपायात् स मुनिश्चण्डकोपः स्वमाश्रमं मूलफलं गृहीत्वा । अन्वेषमाणश्च न तत्र पुत्रं ददर्श चुक्रोध ततो भृशं सः ॥ १४ ॥
इधर प्रचण्ड कोपधारी महात्मा विभाण्डक फल- मूल लेकर अपने आश्रमपर आये । वहाँ बहुत खोज करनेपर भी जब अपना पुत्र उन्हें दिखायी न दिया, तब वे अत्यन्त क्रोधमें भर गये ॥ १४ ॥
ततः स कोपेन विदीर्यमाण आशङ्कमानो नृपतेर्विधानम् । जगाम चम्पां प्रति धक्ष्यमाण- स्तमङ्गराजं सपुरं सराष्ट्रम् ॥ १५ ॥
कोपसे उनका हृदय विदीर्ण-सा होने लगा | उनके मनमें यह संदेह हुआ कि कहीं राजा लोमपादकी तो यह करतूत नहीं है । तब वे चम्पानगरीकी ओर चल दिये, मानो अंगराजको उनके राष्ट्र और नगरसहित जला देना चाहते हों ॥ १५ ॥
स वै श्रान्तः क्षुधितः काश्यपस्तान् घोषान् समासादितवान् समृद्धान् । गोपैश्च तैर्विधिवत् पूज्यमानो राजेव तां रात्रिमुवास तत्र ॥ १६ ॥
थककर भूखसे पीड़ित होनेपर विभाण्डक मुनि सायंकालमें उन्हीं समृद्धिशाली गोष्ठोंमें गये । गोपगणोंने उनकी विधिपूर्वक पूजा की । वे राजाकी भाँति सुख - सुविधाके साथ वहीं रातभर रहे ॥ १६ ॥
अवाप्य सत्कारमतीव तेभ्यः प्रोवाच कस्य प्रथिताः स्थ गोपाः । ऊचुस्ततस्तेऽभ्युपगम्य सर्वे धनं तवेदं विहितं सुतस्य ॥ १७ ॥
गोपगणोंसे अत्यन्त सत्कार पाकर मुनिने पूछा —' तुम किसके गोपालक हो? ' तब उन सबने निकट आकर कहा- ' यह सारा धन आपके पुत्रका ही है ' ॥ देशेषु देशेषु स पूज्यमान- स्तांश्चैव शृण्वन् मधुरान् प्रलापान् । प्रशान्तभूयिष्ठरजाः प्रहृष्टः समाससादाङ्गपतिं पुरस्थम् । १८ ॥
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देश-देशमें सम्मानित हो वे ही मधुर वचन सुनते- सुनते मुनिका रजोगुणजनित अत्यधिक क्रोध बिलकुल शान्त हो गया । वे प्रसन्नतापूर्वक राजधानीमें जाकर अंगराजसे मिले ॥ १८ ॥
स पूजितस्तेन नरर्षभेण ददर्श पुत्रं दिवि देवं यथेन्द्रम् । शान्तां स्नुषां चैव ददर्श तत्र सौदामनीमुच्चरन्तीं यथैव ॥ १ ९ ॥ नरश्रेष्ठ लोमपादसे पूजित हो मुनिने अपने पुत्रको उसी प्रकार ऐश्वर्यसम्पन्न देखा, जैसे देवराज इन्द्र स्वर्गलोकमें देखे जाते हैं । पुत्रके पास ही उन्होंने बहू शान्ताको भी देखा, जो विद्युत्के समान उद्भासित हो रही थी ॥ १ ९ ॥ ग्रामांश्च घोषांश्च सुतस्य दृष्ट्वा शान्तां च शान्तोऽस्य परः स कोपः । चकार तस्यैव परं प्रसादं विभाण्डको भूमिपतेर्नरेन्द्र ॥ २० ॥
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अपने पुत्रके अधिकारमें आये हुए ग्राम, घोष और बहू शान्ताको देखकर उनका महान् कोप शान्त हो गया । युधिष्ठिर! उस समय विभाण्डक मुनिने राजा लोमपादपर बड़ी कृपा की ॥ २० ॥
स तत्र निक्षिप्य सुतं महर्षि- रुवाच सूर्याग्निसमप्रभावः । जाते च पुत्रे वनमेवाव्रजेथा राज्ञः प्रियाण्यस्य सर्वाणि कृत्वा ॥ २१ ॥
सूर्य और अग्निके समान प्रभावशाली महर्षिने अपने पुत्रको वहीं छोड़ दिया और कहा —– ' बेटा! पुत्र उत्पन्न हो जानेपर इन अंगराजके सारे प्रिय कार्य सिद्ध करके फिर वनमें ही आ जाना' ॥ २१ ॥
स तद्वचः कृतवानृष्यशृङ्गो ययौ च यत्रास्य पिता बभूव । शान्ता चैनं पर्यचरन्नरेन्द्र खे रोहिणी सोममिवानुकूला ॥ २२ ॥
ऋष्यशृंगने पिताकी आज्ञाका अक्षरशः पालन किया। अन्तमें वे पुनः उसी आश्रममें चले गये जहाँ उनके पिता रहते थे । नरेन्द्र! शान्ता उसी प्रकार अनुकूल रहकर उनकी सेवा करती थी जैसे आकाशमें रोहिणी चन्द्रमाकी सेवा करती है ॥ २२ ॥
अरुन्धती वा सुभगा वसिष्ठं लोपामुद्रा वा यथा ह्यगस्त्यम् । नलस्य वै दमयन्ती यथाभूद् यथा शची वज्रधरस्य चैव ॥ २३ ॥
अथवा जैसे सौभाग्यशालिनी अरुन्धती वसिष्ठजीकी, लोपामुद्रा अगस्त्यजीकी, दमयन्ती नलकी तथा शची वज्रधारी इन्द्रकी सेवा करती है ॥ २३ ॥
नारायणी चेन्द्रसेना बभूव वश्या नित्यं मुद्गलस्याजमीढ । ( यथा सीता दाशरथेर्महात्मनो यथा तव द्रौपदी पाण्डुपुत्र । ) तथा शान्ता ऋष्यशृङ्गं वनस्थं प्रीत्या युक्ता पर्यचरन्नरेन्द्र ॥ २४ ॥
युधिष्ठिर! जैसे नारायणी इन्द्रसेना सदा महर्षि मुद्गलके अधीन रहती थी तथा पाण्डुनन्दन! जैसे सीता महात्मा दशरथनन्दन श्रीरामके अधीन रही हैं और द्रौपदी सदा तुम्हारे वशमें रहती आयी है, उसी प्रकार शान्ता भी सदा अधीन रहकर वनवासी ऋष्यशृंगकी प्रसन्नतापूर्वक सेवा करती थी ॥ २४ ॥
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तस्याश्रमः पुण्य एषोऽवभाति
महाह्रदं शोभयन् पुण्यकीर्तिः ।
अत्र स्नातः कृतकृत्यो विशुद्ध- स्तीर्थान्यन्यान्यनुसंयाहि राजन् ॥ २५ ॥
उनका यह पुण्यमय आश्रम, जो पवित्र कीर्तिसे युक्त है, इस महान् कुण्डकी शोभा बढ़ाता हुआ प्रकाशित हो रहा है, राजन्! यहाँ स्नान करके शुद्ध एवं कृतकृत्य होकर अन्य तीर्थोंकी यात्रा करो ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामृष्यशृङ्गोपाख्याने त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें ऋष्यशृंगोपाख्या0 नविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ११३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका आधा श्लोक मिलाकर कुल २५३ श्लोक हैं )
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चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः युधिष्ठिरका कौशिकी, गंगासागर एवं वैतरणी नदी होते हुए महेन्द्रपर्वतपर गमन वैशम्पायन उवाच
ततः प्रयातः कौशिक्याः पाण्डवो जनमेजय ।
आनुपूर्व्येण सर्वाणि जगामायतनान्यथ ॥ १ ॥
स सागरं समासाद्य गङ्गायाः संगमे नृप ।
नदीशतानां पञ्चानां मध्ये चक्रे समाप्लवम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने कौशिकी नदीके तटवर्ती सभी तीर्थों और मन्दिरोंकी क्रमशः यात्रा की । राजन्! उन्होंने गंगा-सागरसंगमतीर्थमें समुद्रतटपर पहुँचकर पाँच सौ नदियोंके जलमें स्नान किया ॥ १-२ ॥
ततः समुद्रतीरेण जगाम वसुधाधिपः ।
भ्रातृभिः सहितो वीरः कलिङ्गान् प्रति भारत ॥ ३ ॥
भारत! तत्पश्चात् वीर भूपाल युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ कलिंगदेश ( उड़ीसा ) में गये ॥ ३ ॥
लोमशउवाच
एते कलिङ्गाः कौन्तेय यत्र वैतरणी नदी ।
यत्रायजत धर्मोऽपि देवाञ्छरणमेत्य वै ॥ ४ ॥
तब लोमशजीने कहा -कुन्तीकुमार! यह कलिंग देश है, जिसमें वैतरणी नदी बहती है । जहाँ धर्मने भी देवताओंकी शरणमें जाकर यज्ञ किया था ॥ ४ ॥
ऋषिभिः समुपायुक्तं यज्ञियं गिरिशोभितम् ।
उत्तरं तीरमेतद्धि सततं द्विजसेवितम् ॥ ५ ॥
यह पर्वतमालाओंसे सुशोभित वैतरणीका वही उत्तर तट है जहाँ यज्ञका आयोजन किया गया था । बहुत - से ऋषि तथा ब्राह्मणलोग सदा इस उत्तर तटका सेवन करते आये हैं ॥ ५ ॥
समानं देवयानेन पथा स्वर्गमुपेयुषः ।
अत्र वै ऋषयोऽन्येऽपि पुरा क्रतुभिरीजिरे ॥ ६ ॥
स्वर्गलोककी प्राप्ति करनेवाले पुण्यात्मा मनुष्यके लिये यह स्थान ' देवयान’ मार्गके समान है । प्राचीन कालमें ऋषियों तथा अन्य लोगोंने भी यहाँ बहुत - से यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ॥ ६ ॥
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अत्रैव रुद्रो राजेन्द्र पशुमादत्तवान् मखे ।
पशुमादाय राजेन्द्र भागोऽयमिति चाब्रवीत् ॥ ७ ॥
राजेन्द्र! यहीं रुद्रदेवने यज्ञमें पशुको ग्रहण कर लिया था । उस पशुको ग्रहण करके उन्होंने कहा— ' यह तो मेरा हिस्सा है' ॥ ७ ॥
हृते पशौ तदा देवास्तमूचुर्भरतर्षभ ।
मा परस्वमभिद्रोग्धा मा धर्मान् सकलान् वशीः ॥ ८ ॥
भरतश्रेष्ठ! पशुका अपहरण हो जानेपर देवताओंने उनसे कहा - ' आप दूसरोंके धनसे द्रोह न करें ( दूसरोंके हिस्सेको न लें ) धर्मके साधनभूत समस्त यज्ञभागोंको लेनेकी इच्छा न करें ' ॥ ८ ॥
ततः कल्याणरूपाभिर्वाग्भिस्ते रुद्रमस्तुवन् ।
इष्ट्या चैनं तर्पयित्वा मानयांचक्रिरे तदा ॥ ९ ॥
यों कहकर उन्होंने कल्याणमय वचनोंद्वारा भगवान् रुद्रका स्तवन किया और इष्टिद्वारा उन्हें तृप्त करके उस समय उनका विशेष सम्मान किया ॥ ९ ॥
ततः स पशुमुत्सृज्य देवयानेन जग्मिवान् ।
तत्रानुवंशो रुद्रस्य तं निबोध युधिष्ठिर ॥ १० ॥
तब वे उस पशुको वहीं छोड़कर देवयान मार्गसे चले गये । युधिष्ठिर! यज्ञमें भगवान् रुद्रकी भागपरम्पराका बोधक एक श्लोक है, उसे बताता हूँ, सुनो - ॥। १० ॥
अयातयामं सर्वेभ्यो भागेभ्यो भागमुत्तमम् ।
देवाः संकल्पयामासुर्भयाद् रुद्रस्य शाश्वतम् ॥ ११ ॥
‘देवताओंने रुद्रदेवके भयसे उनके लिये शीघ्र ही सब भागोंकी अपेक्षा उत्तम एवं सनातन भाग देनेका संकल्प किया ' ॥ ११ ॥
इमां गाथामत्र गायन्नपः स्मृशति यो नरः ।
देवयानोऽस्य पन्थाश्च चक्षुषाभिप्रकाशते ॥ १२ ॥
जो मनुष्य यहाँ इस गाथाका गान करते हुए वैतरणीके जलका स्पर्श करता है उसकी दृष्टिमें देवयान मार्ग प्रकाशित हो जाता है ॥ १२ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो वैतरणीं सर्वे पाण्डवा द्रौपदी तथा ।
अवतीर्य महाभागास्तर्पयांचक्रिरे पितॄन् ॥ १३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर महान् भाग्यशाली समस्त पाण्डवों और द्रौपदीने वैतरणीके जलमें उतरकर अपने पितरोंका तर्पण किया ॥ १३ ॥
युधिष्ठिर उवाच उपस्पृश्येह विधिवदस्यां नद्यां तपोबलात् ।
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मानुषादस्मि विषयादपेतः पश्य लोमश ॥ १४ ॥
उस समय युधिष्ठिर बोले- लोमशजी! देखिये, इस वैतरणी नदीमें विधिपूर्वक स्नान करनेसे मुझे तपोबल प्राप्त हुआ है, जिसके प्रभावसे मैं मानवीय विषयोंसे दूर हो गया हूँ ॥ १४ ॥
सर्वांल्लोकान् प्रपश्यामि प्रसादात् तव सुव्रत ।
वैखानसानां जपतामेष शब्दो महात्मनाम् ॥ १५ ॥
सुव्रत! आपकी कृपासे इस समय मुझे सम्पूर्ण लोकोंका दर्शन हो रहा है । यह जप और स्वाध्यायमें लगे हुए महात्मा वैखानस ऋषियोंका शब्द है ॥ १५ ॥
लोमशउवाच
त्रिशतं वै सहस्राणि योजनानां युधिष्ठिर ।
यत्र ध्वनिं शृणोष्येनं तूष्णीमास्स्व विशाम्पते ॥ १६ ॥
लोमशजीने कहा- राजा युधिष्ठिर! जहाँसे आती हुई इस ध्वनिको तुम सुन रहे हो वह स्थान यहाँसे तीन लाख योजन दूर है; अतः अब चुप रहो ॥ १६ ॥
एतत् स्वयम्भुवो राजन् वनं दिव्यं प्रकाशते ।
यत्रायजत राजेन्द्र विश्वकर्मा प्रतापवान् ॥ १७ ॥
राजन्! यह ब्रह्माजीका दिव्य वन प्रकाशित हो रहा है; राजेन्द्र! यहीं प्रतापी विश्वकर्माने यज्ञ किया है ॥ १७ ||
यस्मिन् यज्ञे हि भूर्दत्ता कश्यपाय महात्मने ।
सपर्वतवनोद्देशा दक्षिणार्थे स्वयम्भुवा ॥ १८ ॥
उस यज्ञमें ब्रह्माजीने पर्वत और वनप्रान्तसहित यह सारी पृथ्वी महात्मा कश्यपको दक्षिणारूपमें दे दी थी ॥ १८ ॥
अवासीदच्च कौन्तेय दत्तमात्रा मही तदा ।
उवाच चापि कुपिता लोकेश्वरमिदं प्रभुम् ॥ १ ९ ॥
न मां मर्त्याय भगवन् कस्मैचिद् दातुमर्हसि ।
प्रदानं मोघमेतत् ते यास्याम्येषा रसातलम् ॥ २० ॥
कुन्तीकुमार! उनके द्वारा अपना दान होते ही पृथ्वी बहुत दुःखी हो गयी और कुपित हो लोकनाथ प्रभु ब्रह्मासे इस प्रकार बोली- ' भगवन्! आप मुझे किसी मनुष्यको न सौंपें । यदि मुझे मनुष्यको सौंपेंगे तो वह व्यर्थ होगा, क्योंकि मैं अभी रसातलको चली जाऊँगी' ॥ १ ९ -२० ॥
विषीदन्तीं तु तां दृष्ट्वा कश्यपो भगवानृषिः ।
प्रसादयाम्बभूवाथ ततो भूमिं विशाम्पते ॥ २१ ॥
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राजन्! पृथ्वी देवीको विषाद करती देख महर्षि भगवान् कश्यपने प्रार्थनाद्वारा उन्हें प्रसन्न किया ॥ २१ ॥
ततः प्रसन्ना पृथिवी तपसा तस्य पाण्डव ।
पुनरुन्नह्य सलिलाद् वेदीरूपा स्थिता बभौ ॥ २२ ॥
पाण्डुनन्दन! उनकी तपस्यासे प्रसन्न हुई पृथ्वी पुनः जलसे ऊपर उठकर वेदीके रूपमें स्थित हो गयी ॥
सैषा प्रकाशते राजन् वेदी संस्थानलक्षणा ।
आरुह्यात्र महाराज वीर्यवान् वै भविष्यसि ॥ २३ ॥
राजन्! वह पृथ्वी देवी ही यहाँ इस मिट्टीकी वेदीके रूपमें प्रकाशित हो रही है ।
महाराज! इसपर आरूढ़ होकर तुम बल पराक्रमसे सम्पन्न हो जाओगे ॥ २३ ॥
सैषा सागरमासाद्य राजन् वेदी समाश्रिता ।
एतामारुह्य भद्रं ते त्वमेकस्तर सागरम् ॥ २४ ॥
युधिष्ठिर! वही यह वेदीस्वरूपा पृथ्वी समुद्रका आश्रय लेकर स्थित है; तुम्हारा कल्याण हो । तुम अकेले ही इसपर चढ़कर समुद्रको पार करो ॥ २४ ॥
अहं च ते स्वस्त्ययनं प्रयोक्ष्ये
यथा त्वमेनामधिरोहसेऽद्य ।
स्पृष्टा हि मर्त्येन ततः समुद्र- मेषा वेदी प्रविशत्याजमीढ ॥ २५ ।
मैं तुम्हारे लिये स्वस्तिवाचन करूँगा, जिससे तुम आज इस वेदीपर चढ़ सको; अजमीढकुलनन्दन! नहीं तो मनुष्यके द्वारा स्पर्श हो जानेपर यह वेदी समुद्रमें प्रवेश कर जाती है ॥ २५ ॥
ॐ नमो विश्वगुप्ताय नमो विश्वपराय ते ।
सांनिध्यं कुरु देवेश सागरे लवणाम्भसि ॥ २६ ॥
( समुद्रमें स्नान करते समय उसकी प्रार्थनाके लिये निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये— ) जिनमें यह सम्पूर्ण विश्व लीन होता है तथा जो सबसे श्रेष्ठ हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है । देवेश्वर! आप खारे समुद्रमें निवास करें ॥ २६ ॥
अग्निर्मित्रो योनिरापोऽथ देव्यो विष्णो रेतस्त्वममृतस्य नाभिः एवं ब्रुवन् पाण्डव सत्यवाक्यं वेदीमिमां त्वं तरसाधिरोह ॥ २७ ॥
' हे समुद्र! अग्नि, मित्र ( सूर्य ) और दिव्य जल –ये सब तुम्हारी योनि ( उत्पत्ति- कारण ) हैं । तुम सर्वव्यापी परमात्माके रेतस् ( वीर्य या शक्ति ) हो और तुम्हीं अमृतकी उत्पत्तिके