श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 781–790
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 781–790
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वेश्योवाच ममाश्रमः काश्यपपुत्र रम्य- स्त्रियोजनं शैलमिमं परेण । तत्र स्वधर्मो नाभिवादनं मे न चोदकं पाद्यमुपस्पृशामि ॥ ११ ॥
वेश्या बोली - काश्यपनन्दन! मेरा आश्रम बड़ा मनोहर है । वह इस पर्वतके उस पार तीन योजनकी दूरीपर स्थित है । वहाँ मेरा जो अपना धर्म है उसके अनुसार आपको मेरा अभिवादन ( प्रणाम ) नहीं करना चाहिये । मैं आपके दिये हुए अर्घ्य और पाद्यका स्पर्श नहीं करूँगी ॥ ११ ॥
भवता नाभिवाद्योऽहमभिवाद्यो भवान् मया ।
व्रतमेतादृशं ब्रह्मन् परिष्वज्यो भवान् मया ॥ १२ ॥
मैं आपके लिये वन्दनीय नहीं हूँ । आप ही मेरे वन्दनीय हैं । ब्रह्मन्! मेरा यह नियम है, जिसके अनुसार मुझे आपका आलिंगन करना चाहिये ॥ १२ ॥
ऋष्यशृङ्ग उवाच फलानि पक्वानि ददानि तेऽहं भल्लातकान्यामलकानि चैव । करूषकाणीङ्गदधन्वनानि पिप्पलानां कामकारं कुरुष्व ॥ १३ ॥
ऋष्यशृंगने कहा —ब्रह्मन्! मैं तुम्हें पके फल दे रहा हूँ । ये भिलावा, आँवले, करूषक ( फालसा ), इंगुद ( हिंगोट ), धन्वन ( धामिन ) और पीपलके फल प्रस्तुत हैं — इन सबका इच्छानुसार उपयोग कीजिये ॥ १३ ॥
लोमशउवाच सा तानि सर्वाणि विवर्जयित्वा भक्ष्याण्यनर्हाणि ददौ ततोऽस्य । तान्यृष्यशृङ्गस्य महारसानि भृशं सुरूपाणि रुचिं ददुर्हि ॥ १४ ॥
लोमशजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर वेश्याने उन सब फलोंको छोड़कर स्वयं ऋष्यशृंगको अत्यन्त सुन्दर और अमूल्य भक्ष्य पदार्थ ( फल आदि) दिये । उन परम सरस फलोंने उनकी रुचिको बढ़ाया ॥ १४ ॥
ददौ च माल्यानि सुगन्धवन्ति चित्राणि वासांसि च भानुमन्ति । पेयानि चाग्रयाणि ततो मुमोद
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चिक्रीड चैव प्रजहास चैव ॥ १५ ॥
सा कन्दुकेनारमतास्य मूले विभज्यमाना फलिता लतेव । गात्रैश्च गात्राणि निषेवमाणा समाश्लिषच्चासकृदृष्यशृङ्गम् ॥ १६ ॥
साथ ही सुगन्धित मालाएँ तथा विचित्र एवं चमकीले वस्त्र प्रदान किये । इतना ही नहीं, उसने मुनिकुमारको अच्छी श्रेणीके पेय पिलाये जिससे वे बहुत प्रसन्न हुए । वे उसके साथ खेलने और जोर- जोरसे हँसने लगे । वेश्या ऋष्यशृंगके पास ही गेंद खेलने लगी । वह अपने अंगोंको मोड़ती हुई फलोंके भारसे लदी लताकी भाँति झुक जाती और ऋष्यशृंग मुनिको बार- बार अपने अंकमें भर लेती थी । साथ ही अपने अंगोंसे उनके अंगोंको इस प्रकार दबाती मानो उनके भीतर समा जायगी ॥ १५-१६ ॥ सर्जानशोकांस्तिलकांश्च वृक्षान् सुपुष्पितानवनाम्यावभज्य । विलज्जमानेव मदाभिभूता प्रलोभयामास सुतं महर्षेः ॥ १७ ॥
वहाँ शाल, अशोक और तिलकके वृक्ष खूब फूले हुए थे । उनकी डालियोंको झुकाकर वह मदोन्मत्त वेश्या लज्जाका नाट्य-सा करती हुई महर्षिके उस पुत्रको लुभाने लगी ॥ १७ ॥
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अथर्ष्यशृङ्गं विकृतं समीक्ष्य पुनः पुनः पीड्य च कायमस्य । अवेक्ष्यमाणा शनकैर्जगाम कृत्वाग्निहोत्रस्य तदापदेशम् ॥ १८ ॥
ऋष्यशृंगकी आकृतिमें किंचित् विकार देखकर उसने बार- बार उनके शरीरको आलिंगनके द्वारा दबाया और अग्निहोत्रका बहाना बनाकर वह उनके द्वारा देखी जाती हुई धीरे - धीरे वहाँसे चली गयी ॥ १८ ॥
तस्यां गतायां मदनेन मत्तो विचेतनश्चाभवदृष्यशृङ्गः । तामेव भावेन गतेन शून्ये विनिःश्वसन्नार्तरूपो बभूव ॥ १ ९ ॥ उसके चले जानेपर उसके अनुरागसे उन्मत्त मुनिकुमार ऋष्यशृंग अचेत- से हो गये । उस निर्जन स्थानमें उनकी मनोवृति उसीकी ओर लगी रही और वे लंबी साँस खींचते हुए अत्यन्त व्यथित हो उठे ॥ १ ९ ॥ ततो मुहूर्ताद्धरिपिङ्गलाक्षः प्रवेष्टितो रोमभिरानखाग्रात् । स्वाध्यायवान् वृत्तसमाधियुक्तो विभाण्डकः काश्यपः प्रादुरासीत् ॥ २० ॥
तदनन्तर दो घड़ीके बाद हरे- पीले नेत्रोंवाले काश्यपनन्दन विभाण्डक मुनि वहाँ आ पहुँचे । वे सिरसे लेकर पैरोंके नखोंतक रोमावलियोंसे भरे हुए थे । महात्मा विभाण्डक स्वाध्यायशील, सदाचारी तथा समाधिनिष्ठ महर्षि थे ॥ २० ॥
सोऽपश्यदासीनमुपेत्य पुत्रं ध्यायन्तमेकं विपरीतचित्तम् । विनिःश्वसन्तं मुहुरूर्ध्वदृष्टिं विभाण्डकः पुत्रमुवाच दीनम् ॥ २१ ॥
न कल्प्यन्ते समिधः किं नु तात कच्चिद्धुतं चाग्निहोत्रं त्वयाद्य । सुनिर्णिक्तं स्रुक्स्रुवं होमधेनुः कच्चित् सवत्साद्य कृता त्वया च ॥ २२ ॥
न वै यथापूर्वमिवासि पुत्र चिन्तापरश्चासि विचेतनश्च । दीनोऽतिमात्रं त्वमिहाद्य किं नु पृच्छामि त्वां क इहाद्यागतोऽभूत् ॥ २३ ॥
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निकट आनेपर उन्होंने अपने पुत्रको अकेला उदासीन भावसे चिन्तामग्न होकर बैठा देखा । उसके चित्तकी दशा विपरीत थी । वह बार- बार ऊपरकी ओर दृष्टि किये उच्छ्वास ले रहा था । इस दयनीय दशामें पुत्रको देखकर विभाण्डक मुनिने पूछा— ' तात! आज तुम अग्निकुण्डमें समिधाएँ क्यों नहीं रख रहे हो! क्या तुमने अग्निहोत्र कर लिया? स्रुक् और स्रुवा आदि यज्ञपात्रोंको भलीभाँति शुद्ध करके रखा है न? कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि तुमने हवनके लिये दूध देनेवाली गायका बछड़ा खोल दिया हो जिससे वह सारा दूध पी गया हो । बेटा! आज तुम पहले -जैसे दिखायी नहीं देते । किसी भारी चिन्तामें निमग्न हो, अपनी सुध- बुध खो बैठे हो । क्या कारण है जो आज तुम अत्यन्त दीन हो रहे हो । मैं तुमसे पूछता हूँ, बताओ, आज यहाँ कौन आया था? ' ॥ २१–२३ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामृष्यशृङ्गोपाख्याने एकादशाधिकशततमोऽध्याययः ॥ १११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें ऋष्यशृंगोपाख्यानविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १११ ॥
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द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ऋष्यशृंगका पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारीरूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन ऋष्यशृङ्ग उवाच इहागतो जटिलो ब्रह्मचारी न वै ह्रस्वो नातिदीर्घो मनस्वी । सुवर्णवर्णः कमलायताक्षः स्वतः सुराणामिव शोभमानः ॥ १ ॥
ऋष्यशृंगने कहा — पिताजी! यहाँ एक जटाधारी ब्रह्मचारी आया था । वह न तो छोटा था और न बहुत बड़ा ही । उसका हृदय बहुत उदार था । उसके शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान थी और बड़ी - बड़ी आँखें कमलोंके सदृश जान पड़ती थीं । वह स्वयं देवताओंके समान सुशोभित हो रहा था ॥ १ ॥
समृद्धरूपः सवितेव दीप्तः सुश्लक्ष्णकृष्णाक्षिरतीव गौरः । नीलः प्रसन्नाश्च जटाः सुगन्धा हिरण्यरज्जुग्रथिताः सुदीर्घाः ॥ २ ॥
उसका रूप बड़ा सुन्दर था । वह सूर्यदेवकी भाँति उद्भासित हो रहा था । उसके नेत्र स्वच्छ, चिकने एवं कजरारे थे । वह बड़ा गोरा दिखाई देता था । उसकी जटाएँ बहुत लम्बी, साफ- सुथरी और नीले रंगकी थीं । उनसे बड़ी मधुर गन्ध फैल रही थी । वे सारी जटाएँ एक सुनहरी रस्सीसे गुँथी हुई थीं ॥ २ ॥
आश्चर्यरूपा पुनरस्य कण्ठे
विभ्राजते विद्युदिवान्तरिक्षे ।
द्वौ चास्य पिण्डावधरेण कण्ठा- दजातरोमौ सुमनोहरौ च ॥ ३ ॥
उसके गलेमें एक ऐसा आश्चर्यजनक आभूषण ( कण्ठा) था, जो आकाशमें बिजलीकी भाँति चमक रहा था । उसके गलेसे नीचे ( वक्षःस्थलपर) दो मांसपिण्ड थे, जिनपर रोएँ नहीं उगे थे । वे अत्यन्त मनोहर जान पड़ते थे ॥ ३ ॥
विलग्नमध्यश्च स नाभिदेशे कटिश्च तस्यातिकृतप्रमाणा । तथास्य चीरान्तरतः प्रभाति
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हिरण्मयी मेखला मे यथेयम् ॥ ४ ॥
उस ब्रह्मचारीके नाभिदेशके समीप जो शरीरका मध्य भाग था, वह बहुत पतला था और उसका नितम्बभाग अत्यन्त स्थूल था । जैसे मेरे कौपीनके नीचे यह मूँजकी मेखला बँधी है, इसी प्रकार उसके कटि प्रदेशमें भी एक सोनेकी मेखला ( करधनी ) थी, जो उसके चीरके भीतरसे चमकती रहती थी ॥ ४ ॥
अन्यच्च तस्याद्भुतदर्शनीयं विकूजितं पादयोः सम्प्रभाति । पाण्योश्च तद्वत् स्वनवन्निबद्धौ कलापकावक्षमाला यथेयम् ॥ ५ ॥
उसकी अन्य सब बातें भी अद्भुत एवं दर्शनीय थीं । पैरोंमें ( पायलकी ) छम- छम ध्वनि बड़ी मधुर प्रतीत होती थी। इसी प्रकार हाथोंकी कलाइयोंमें मेरी इस रुद्राक्षकी मालाकी भाँति उसने दो कलापक ( कंगन) बाँध रखे थे, उनसे भी बड़ी मधुर ध्वनि होती रहती थी ॥ ५ ॥
विचेष्टमानस्य च तस्य तानि कूजन्ति हंसाः सरसीव मत्ताः । चीराणि तस्याद्भुतदर्शनानि मानि तद्वन्मम रूपवन्ति ॥ ६ ॥
वह ब्रह्मचारी जब तनिक भी चलता- फिरता या हिलता डुलता था, उस समय उसके आभूषण बड़ी मनोहर झनकार उत्पन्न करते थे, मानो सरोवरमें मतवाले हंस कलरव कर रहे हों । उसके चीर भी अद्भुत दिखायी देते थे । मेरी कौपीनके ये वल्कलवस्त्र वैसे सुन्दर नहीं हैं ॥ ६ ॥
वक्त्रं च तस्याद्भुतदर्शनीयं प्रव्याहृतं ह्लादयतीव चेतः । पुंस्कोकिलस्येव च तस्य वाणी तां शृण्वतो मे व्यथितोऽन्तरात्मा ॥ ७ ॥
उसका मुख भी देखने ही योग्य था । उसकी अद्भुत शोभा थी । ब्रह्मचारीकी एक- एक बात मनको आनन्द - सिन्धुमें निमग्न-सा कर देती थी । उसकी वाणी कोकिलके समान थी, जिसे एक बार सुन लेनेपर अब पुनः सुननेके लिये मेरी अन्तरात्मा व्यथित हो उठी है ॥ ७ ॥
यथा वनं माधवमासि मध्ये समीरितं श्वसनेनेव भाति । तथा स भात्युत्तमपुण्यगन्धी निषेव्यमाणः पवनेन तात ॥ ८ ॥
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तात! जैसे माधवमास ( वैशाख या वसंत ऋतु ) में ( सौरभयुक्त मलय- ) समीरसे सेवित वन - उपवनकी शोभा होती है, उसी प्रकार पवनदेवसे सेवित वह ब्रह्मचारी उत्तम एवं पवित्र गन्धसे सुवासित और सुशोभित हो रहा था ॥ ८ ॥
सुसंयताश्चापि जटा विषक्ता द्वैधीकृता नातिसमा ललाटे । कर्णौ च चित्रैरिव चक्रवाकैः समावृतौ तस्य सुरूपवद्भिः ॥ ९ ॥
उसकी जटा सटी हुई और अच्छी प्रकार बँधी हुई थी, जो ललाटप्रदेशमें दो भागोंमें विभक्त थी; किंतु बराबर नहीं थी । उसके कुण्डलमण्डित कान सुन्दर एवं विचित्र चक्रवाकोंसे घिरे हुए - से जान पड़ते थे ॥ ९ ॥
तथा फलं वृत्तमथो विचित्रं समाहरत् पाणिना दक्षिणेन । तद् भूमिमासाद्य पुनः पुनश्च समुत्पतत्यद्भुतरूपमुच्चैः ॥ १० ॥
उसके पास एक विचित्र गोलाकार फल ( गेंद) था, जिसपर वह अपने दाहिने हाथसे आघात करता था । वह फल ( गेंद ) पृथ्वीपर जाकर बार - बार ऊँचेकी ओर उछलता था; उस समय उसका रूप अद्भुत दिखायी देता था ॥ १० ॥
तच्चाभिहत्य परिवर्ततेऽसौ वातेरितो वृक्ष इवावघूर्णन् । तं प्रेक्षतः पुत्रमिवामराणां प्रीतिः परा तात रतिश्च जाता ॥ ११ ॥
उस फल ( गेंद ) को मारकर वह चारों ओर घूमने लगता था, मानो वृक्ष हवाका झोंका खाकर झूम रहा हो । तात! देवपुत्रके समान उस ब्रह्मचारीको देखते समय मेरे हृदयमें बड़ा प्रेम और आनन्द उमड़ रहा था और मेरी उसके प्रति आसक्ति हो गयी है ॥ ११ ॥
स मे समाश्लिष्य पुनः शरीरं जटासु गृह्याभ्यवनाम्य वक्त्रम् । वक्त्रेण वक्त्रं प्रणिधाय शब्द चकार तन्मेऽजनयत् प्रहर्षम् ॥ १२ ॥
वह बार- बार मेरे शरीरका आलिंगन करके मेरी जटा पकड़ लेता और मेरे मुखको झुकाकर उसपर अपना मुख रख देता था, इस प्रकार मुख से -मुख मिलाकर उससे एक ऐसा शब्द किया, जिसने मेरे हृदयमें अत्यन्त आनन्द उत्पन्न कर दिया ॥ १२ ॥
न चापि पाद्यं बहु मन्यतेऽसौ फलानि चेमानि मयाऽऽहृतानि ।
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एवंव्रतोऽस्मीति च मामवोचत् फलानि चान्यानि समाददन्मे ॥ १३ ॥
मैंने जो पाद्य अर्पण किया, उसको उसने बहुत महत्त्व नहीं दिया । मेरे दिये हुए ये फल भी उसने स्वीकार नहीं किये और मुझसे कहा- ' मेरा ऐसा ही नियम है । ' साथ ही उसने मेरे लिये दूसरे दूसरे फल दिये ॥ १३ ॥
मयोपयुक्तानि फलानि यानि नेमानि तुल्यानि रसेन तेषाम् । न चापि तेषां त्वगियं यथैषां साराणि नैषामिव सन्ति तेषाम् ॥ १४ ॥
मैंने उसके दिये हुए जिन फलोंका उपयोग किया है, उनके समान रस हमारे इन फलोंमें नहीं है । उन फलोंके छिलके भी ऐसे नहीं थे, जैसे इन जंगली फलोंके हैं । इन फलोंके गूदे जैसे हैं, वैसे उसके दिये हुए फलोंके नहीं थे ( वे सर्वथा विलक्षण थे ) ॥ १४ ॥
तोयानि चैवातिरसानि मह्यं 'वै प्रादात् स वै पातुमुदाररूपः । पीत्वैव यान्यभ्यधिकः प्रहर्षो ममाभवद् भूश्चलितेव चासीत् ॥ १५ ॥
उदारताके मूर्तिमान् स्वरूप उस ब्रह्मचारीने मुझे पीनेके लिये अत्यन्त स्वादिष्ट जल भी दिया था । उस जलको पीते ही मेरे हर्षकी सीमा न रही । मुझे यह धरती डोलती - सी जान पड़ने लगी ॥ १५ ॥
इमानि चित्राणि च गन्धवन्ति माल्यानि तस्योद्ग्रथितानि पट्टैः । यानि प्रकीर्येह गतः स्वमेव स आश्रमं तपसा द्योतमानः ॥ १६ ॥
ये विचित्र सुगन्धित मालाएँ उसीने रेशमी डोरोंसे गूँथकर बनायी थीं, जिन्हें यहाँ बिखेरकर तपस्यासे प्रकाशित होनेवाला वह ब्रह्मचारी अपने आश्रमको चला गया था ॥ १६ ॥
गतेन तेनास्मि कृतो विचेता गात्रं च मे सम्परिदह्यतीव । इच्छामि तस्यान्तिकमाशु गन्तुं तं चेह नित्यं परिवर्तमानम् ॥ १७ ॥
उसके चले जानेसे मैं अचेत हो गया हूँ। मेरा शरीर जलता-सा जान पड़ता है । मैं चाहता हूँ, शीघ्र उसके पास ही चला जाऊँ अथवा वही यहाँ नित्य मेरे पास रहे ॥ १७ ॥
गच्छामि तस्यान्तिकमेव तात
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का नाम सा ब्रह्मचर्या च तस्य । इच्छाम्यहं चरितुं तेन सार्धं यथा तपः स चरत्यार्यधर्मा ॥ १८ ॥
पिताजी! मैं उसीके पास जाता हूँ, देखूँ, उसकी ब्रह्मचर्यकी साधना कैसी है? वह आर्यधर्मका पालन करनेवाला ब्रह्मचारी जिस प्रकार तप करता है, उसके साथ रहकर मैं भी वैसी ही तपस्या करना चाहता हूँ ॥ १८ ॥
चर्तुं तथेच्छा हृदये ममास्ति दुनोति चित्तं यदितं न पश्ये ॥ १ ९ ॥ वैसा ही तप करनेकी इच्छा मेरे हृदयमें भी है । यदि उसे नहीं देखूँगा तो मेरा यह चित्त संतप्त होता रहेगा ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामृष्यशृङ्गोपाख्याने द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११२ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें ऋष्यशृंगोपाख्यानविषयक एक सौ बारहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ११२ ॥
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त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ऋष्यशृंगका अंगराज लोमपादके यहाँ जाना, राजाका उन्हें अपनी कन्या देना, राजाद्वारा विभाण्डक मुनिका सत्कार तथा उनपर मुनिका प्रसन्न होना विभाण्डक उवाच रक्षांसि चैतानि चरन्ति पुत्र रूपेण तेनाद्भुतदर्शनेन । अतुल्यवीर्याण्यभिरूपवन्ति विघ्नं सदा तपसश्चिन्तयन्ति ॥ १ ॥
विभाण्डकने कहा — बेटा! इस प्रकार अद्भुत दर्शनीय रूप धारण करके तो राक्षस ही इस वनमें विचरा करते हैं । ये अनुपम पराक्रमी और मनोहर रूप धारण करनेवाले होते हैं, तथा ऋषि- मुनियोंकी तपस्यामें सदा विघ्न डालनेका ही उपाय सोचते रहते हैं ॥ १ ॥
सुरूपरूपाणि च तानि तात प्रलोभयन्ते विविधैरुपायैः । सुखाच्च लोकाच्च निपातयन्ति तान्युग्ररूपाणि मुनीन् वनेषु ॥ २ ॥
तात! वे मनोहर रूपधारी राक्षस नाना प्रकारके उपायोंद्वारा मुनिलोगोंको प्रलोभनमें डालते रहते हैं । फिर वे ही भयानक रूप धारण करके वनमें निवास करनेवाले मुनियोंको आनन्दमय लोकोंसे नीचे गिरा देते हैं ॥ २ ॥
न तानि सेवेत मुनिर्यतात्मा सतां लोकान् प्रार्थयानः कथंचित् । कृत्वा विघ्नं तापसानां रमन्ते पापाचारास्तापसस्तान् न पश्येत् ॥ ३ ॥
अतः जो साधु पुरुषोंको मिलनेवाले पुण्यलोकोंको पाना चाहता है, वह मुनि मनको संयममें रखकर उन राक्षसोंका ( जो मोहक रूप बनाकर धोखा देनेके लिये आते हैं ) किसी प्रकार सवेन न करे । वे पापाचारी निशाचर तपस्वी मुनियोंके तपमें विघ्न डालकर प्रसन्न होते हैं, अतः तपस्वीको चाहिये कि वह उनकी ओर आँख उठाकर देखे ही नहीं ॥ ३ ॥
असज्जनेनाचरितानि पुत्र पापान्यपेयानि मधूनि तानि । माल्यानि चैतानि न वै मुनीनां