02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 921–930
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 921–930
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लोमशजी कहते हैं — युधिष्ठिर! तदनन्तर महामना वरुणद्वारा पूजित हुए वे समस्त ब्राह्मण ( जो बन्दीद्वारा जलमें डुबोये गये थे, ) सहसा राजा जनकके समीप प्रकट हो गये ॥ ३२ ॥
कहोड उवाच
इत्यर्थमिच्छन्ति सुताञ्जना जनक कर्मणा ।
यदहं नाशकं कर्तुं तत् पुत्रः कृतवान् मम ॥ ३३ ॥
उस समय कहोडने कहा-जनकराज! लोग इसीलिये अच्छे कर्मोंद्वारा पुत्र पानेकी इच्छा रखते हैं, क्योंकि जो कार्य मैं नहीं कर सका, उसे मेरे पुत्रने कर दिखाया ॥ ३३ ॥
उताबलस्य बलवानुत बालस्य पण्डितः ।
उत वाविदुषो विद्वान् पुत्रो जनक जायते ॥ ३४ ॥
जनकराज! कभी - कभी निर्बलके भी बलवान्, मूर्खके भी पण्डित तथा अज्ञानीके भी ज्ञानी पुत्र उत्पन्न हो जाता है ॥ ३४ ॥
शितेन ते परशुना स्वयमेवान्तको नृप ।
शिरांस्यपाहरत्वाजौ रिपूणां भद्रमस्तु ते ॥ ३५ ॥
राजन्! आपका कल्याण हो, युद्धमें स्वयं ही यमराज तीखे फरसेसे आपके शत्रुओंके मस्तक काटते रहें ॥ ३५ ॥
महदौक्थ्यं गीयते साम चाग्रयं सम्यक् सोमः पीयते चात्र सत्रे । शुचीन् भगान् प्रतिजगृहुश्च हृष्टाः साक्षाद् देवा जनकस्योत राज्ञः ॥ ३६ ॥
महाराज जनकके इस यज्ञमें उत्तम एवं महत्त्वपूर्ण और औक्थ्य सामका गान किया जाता है, विधिपूर्वक सोमरसका पान हो रहा है, देवगण प्रत्यक्ष दर्शन देकर बड़े हर्षके साथ अपने - अपने पवित्र भाग ग्रहण कर रहे हैं ॥ ३६ ॥
लोमशउवाच समुत्थितेष्वथ सर्वेषु राजन् विप्रेषु तेष्वधिकं सुप्रभेषु । अनुज्ञातो जनकेनाथ राज्ञा विवेश तोयं सागरस्योत बन्दी ॥ ३७ ॥
लोमशजी कहते हैं— राजन्! बन्दीद्वारा जलमें डुबोये हुए वे सभी ब्राह्मण जब वहाँ अधिक तेजस्वी रूपसे प्रकट हो गये, तब राजाकी आज्ञा लेकर बन्दी स्वयं ही समुद्रके जलमें समा गया ॥ ३७ ॥
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अष्टावक्रः पितरं पूजयित्वा सम्पूजितो ब्राह्मणैस्तैर्यथावत् । प्रत्याजगामाश्रममेव चाग्रयं जित्वा सौतिं सहितो मातुलेन ॥ ३८ ॥
अष्टावक्र अपने पिताकी पूजा करके स्वयं भी दूसरे ब्राह्मणोंद्वारा यथोचितरूपसे सम्मानित हुए; और इस प्रकार बन्दीपर विजय पाकर पिता एवं मामाके साथ अपने श्रेष्ठ आश्रमपर ही लौट आये ॥ ३८ ॥
ततोऽष्टावक्रमातुरथान्तिके पिता नदीं समङ्गां शीघ्रमिमां विशस्व । प्रोवाच चैनं स तथा विवेश समैरङ्गैश्चापि बभूव सद्यः ॥ ३ ९ ॥ तदनन्तर पिता कहोडने अष्टावक्रकी माता सुजाताके निकट पुत्र अष्टावक्रसे कहा – ' बेटा! तुम शीघ्र ही इस ' समंगा ' नदीमें स्नानके लिये प्रवेश करो । ' पिताकी आज्ञाके अनुसार उन्होंने उस नदीमें स्नानके लिये प्रवेश किया । उसके जलका स्पर्श होनेपर तत्काल ही उनके सब अंग सीधे हो गये ॥ ३ ९ ॥ नदी समङ्गा च बभूव पुण्या यस्यां स्नातो मुच्यते किल्बिषाद्धि । त्वमप्येनां स्नानपानावगाहैः सभ्रातृकः सहभार्यो विशस्व ॥ ४० ॥
युधिष्ठिर! इसीसे समंगा नदी पुण्यमयी हो गयी । इसमें स्नान करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है । तुम भी स्नान, पान ( आचमन) और अवगाहनके लिये अपनी पत्नी और भाइयोंके साथ इस नदीमें प्रवेश करो ॥ ४० ॥
अत्र कौन्तेय सहितो भ्रातृभिस्त्वं
सुखोषितः सह विप्रैः प्रतीतः ।
पुण्यान्यन्यानि शुचिकर्मैकभक्ति- या सार्धं चरितस्याजमीढ ॥ ४१ ॥
अजमीढकुलभूषण कुन्तीनन्दन! तुम विश्वासपूर्वक अपने भाइयों और ब्राह्मणोंके साथ यहाँ एक रात सुखसे रहकर कलसे पुनः मेरे साथ पवित्र कर्मोंमें अविचल श्रद्धा - भक्ति रखते हुए दूसरे दूसरे पुण्यतीर्थोंकी यात्रा करना ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामष्टावक्रीये चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३४ ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अष्टावक्रीयोपाख्यानविषयक एक सौचौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३४ ॥
* यहाँ अष्टावक्रजीने परोक्षरूपमें ही प्रश्नका उत्तर दिया है । भाव यह है कि दो तत्त्व, जिनको वैदिक भाषामें रयि और प्राणके नामसे कहा है (देखिये प्रश्नोपनिषद् १।४) एवं अंग्रेजीमें जिनको पोजिटिव ( अनुलोम) और निगेटिव ( प्रतिलोम ) कहते हैं, स्वभावसे ही संयुक्त रहनेवाले हैं। इनका ही व्यक्त रूप विद्युत् - शक्ति है । उसे गर्भकी भाँति मेघ धारण किये रहता है । संघर्षसे वह प्रकट होती है और आकर्षण होनेपर बाजकी भाँति गिरती है । जहाँ गिरती है वहाँ सबको भस्म कर देती है; इसलिये यह कहा गया कि वह कभी आपके शत्रुओंके घरपर भी न पड़े । इन दो तत्त्वोंकी संयुक्त शक्तिसे ही मेघकी उत्पत्ति होती है । इसलिये यह कहा गया कि उस मेघरूप गर्भको ये उत्पन्न करते हैं । 3- ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास । २- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र । ३- पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर । ४- ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत और हल्। ५- परा, पश्यन्ती मध्यमा और वैखरी - ये वाणीके चार पैर हैं । ६- आठ - आठ अक्षरके पाँच पादोंसे पंक्तिछन्दकी सिद्धि होती है । ७- त्वचा, श्रोत्र, नेत्र, रसना और नासिका— ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं । - पंचचूड़ा अप्सराका उल्लेख महाभारतके अनुशासनपर्वमें ३८ वें अध्यायमें भी आया है । S- विपाशा (व्यास), इरावती ( रावी ), वितस्ता ( झेलम), चन्द्रभागा ( चिनाव ) और शतद्रू ( शतलज) ये ही पञ्चनद प्रदेशकी पाँच नदियाँ हैं । 3- हिरन, शूकर, खरगोश, गीदड़ आदि जन्तुओंका ग्रहण मृग नामसे ही हो जाता है । २- सप्तर्षि ये हैं— मरीचिरङ्गिराश्चात्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसिष्ठ इति सप्तैते मानसा निर्मिता हि ते ॥ (महा० शान्ति० ३४०।६ ९) ‘ ( भगवान्ने स्वयं ब्रह्माजीसे कहा है कि ) मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ — ये सातों महर्षि तुम्हारे ( ब्रह्माजीके ) द्वारा ही अपने मनसे रचे हुए हैं । ' ३- धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः । प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ (महा० आदि० ६६।१८ ) ‘ धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास - ये आठ वसु कहे गये हैं । ' ४- यथा रोगी, दरिद्र, शोकार्त्त, राजदण्डित, शठ, खल, वृत्तिसे वंचित, उन्मत्त, ईर्ष्यापरायण और कामी –ये दस निन्दक होते हैं । जैसा कि निम्नांकित श्लोकसे सिद्ध होता है - ' आमयी दुर्मतः शोकी दण्डितश्च शठः खलः । नष्टवृत्तिर्मदी चेष्यीं कामी च दश निन्दकाः || ´ ( इति नीतिशास्त्रोक्तिः ) ५- उन दसों अवस्थाओंके नाम इस प्रकार हैं -गर्भवास, जन्म, बाल्य, कौमार, पौगण्ड, कैशोर, यौवन, प्रौढ़, वार्द्धक्य तथा मृत्यु। ६- अध्यापक, पिता, ज्येष्ठ भ्राता, राजा, मामा, श्वशुर, नाना, दादा, अपनेसे बड़ी अवस्थावाले कुटुम्बी तथा पितृव्य ( चाचा- ताऊ) – ये दस पूजनीय पुरुष माने गये हैं । जैसा कि कूर्मपुराणका वचन है- उपाध्यायः पिता ज्येष्ठभ्राता चैव महीपतिः । मातुलः श्वशुरश्चैव मातामहपितामहौ ॥ बन्धुर्जेष्ठः पितृव्यश्च पुंस्येते गुरवो मताः ॥ 3- वाक्य बोलना, ग्रहण करना, चलना- फिरना, मलत्याग करना और मैथुनजनित सुखका अनुभव करना — ये पाँच कर्मेन्द्रियोंके विषय हैं । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध- ये पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके विषय हैं और इन सबका मनन –मनका विषय है । इस प्रकार कुल मिलाकर ग्यारह विषय हैं । २- काम- क्रोध, लोभ- मोह, मद-मत्सर, हर्ष- शोक, राग- द्वेष और अहंकार- ये ग्यारह विकार होते हैं । ३- एकादश रुद्र ये हैं—
मृगव्याधश्च सर्पश्च निर्ऋतिश्च महायशाः । अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी च परंतपः ॥
दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च महाद्युतिः । स्थाणुर्भवश्च भगवान् रुद्रा एकादश स्मृताः ॥
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(महाभारत आदि० ६६।२-३ ) ' मृगव्याध, सर्प, महायशस्वी निर्ऋति, अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, शत्रु- संतापन पिनाकी, दहन, ईश्वर, परमकान्तिमान् कपाली, स्थाणु और भगवान् भव – ये ग्यारह रुद्र माने गये हैं । ' ४- द्वादश आदित्य ये हैं—
धाता मित्रोऽर्यमा शक्रो वरुणस्त्वंश एव च । भगो विवस्वान् पूषा च सविता दशमस्तथा ॥
एकादशस्तथा त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते । (महा० आदि० ६५ / १५-१६) ‘ धाता, मित्र, अर्यमा, इन्द्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, दसवें सविता, ग्यारहवें त्वष्टा और बारहवें विष्णु कहे गये हैं । ' ५- नृसिंहपुराणमें यही बात कही गयी है - ' युयुधे विष्णुना सार्धं त्रयोदश दिनान्यसौ । ' उक्थ नाम यज्ञविशेषमें गाये जानेयोग्य सामको औक्थ्य कहते हैं ।
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पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः कर्दमिलक्षेत्र आदि तीर्थोंकी महिमा, रैभ्य एवं भरद्वाजपुत्र यवक्रीत मुनिकी कथा तथा ऋषियोंका अनिष्ट करनेके कारण मेधावीकी मृत्यु लोमशउवाच
एषा मधुविला राजन् समङ्गा सम्प्रकाशते ।
एतत् कर्दमिलं नाम भरतस्याभिषेचनम् ॥ १ ॥
लोमशजी कहते हैं - राजन्! यह मधुविला नदी प्रकाशित हो रही है । इसीका दूसरा नाम समंगा है और यह कर्दमिल नामक क्षेत्र है, जहाँ राजा भरतका अभिषेक किया गया था ॥ १ ॥
अलक्ष्म्या किल संयुक्तो वृत्रं हत्वा शचीपतिः ।
आप्लुतः सर्वपापेभ्यः समङ्गायां व्यमुच्यत ॥ २ ॥
कहते हैं, वृत्रासुरका वध करके जब शचीपति इन्द्र श्रीहीन हो गये थे, उस समय उस समंगा नदीमें गोता लगाकर ही वे अपने सब पापोंसे छुटकारा पा सके थे ॥ २ ॥
एतद् विनशनं कुक्षौ मैनाकस्य नरर्षभ ।
अदितिर्यत्र पुत्रार्थं तदन्नमपचत् पुरा ॥ ३ ॥
नरश्रेष्ठ! मैनाक पर्वतके कुक्षिभागमें यह विनशन नामक तीर्थ है, जहाँ पूर्वकालमें अदिति देवीने पुत्र-प्राप्तिके लिये साध्य देवताओंके उद्देश्यसे अन्न- तैयार किया था ॥ ३ ॥
एनं पर्वतराजानमारुह्य भरतर्षभाः ।
अयशस्यामसंशब्द्यामलक्ष्मीं व्यपनोत्स्यथ ॥ ४ ॥
भरतवंशके श्रेष्ठ पुरुषो! इस पर्वतराज हिमालयपर आरूढ़ होकर तुम सब अयश फैलानेवाली और नाम लेनेके अयोग्य अपनी श्रीहीनताको शीघ्र ही दूर भगा दोगे ॥ ४ ॥
एते कनखला राजन्नृषीणां दयिता नगाः ।
एषा प्रकाशते गङ्गा युधिष्ठिर महानदी ॥ ५ ॥
युधिष्ठिर! ये कनखलकी पर्वत- मालाएँ हैं जो ऋषियोंको बहुत प्रिय लगती हैं । ये महानदी गंगा सुशोभित हो रही हैं ॥ ५ ॥
सनत्कुमारो भगवानत्र सिद्धिमगात् पुरा ।
आजमीढावगाह्यैनां सर्वपापैः प्रमोक्ष्यसे ॥ ६ ॥
यहीं पूर्वकालमें भगवान् सनत्कुमारने सिद्धि प्राप्त की थी । अजमीढनन्दन! इस गंगामें स्नान करके तुम सब पापोंसे छुटकारा पा जाओगे ॥ ६ ॥
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अपां हृदं च पुण्याख्यं भृगुतुङ्गं च पर्वतम् ।
उष्णीगङ्गे च कौन्तेय सामात्यः समुपस्पृश ॥ ७ ॥
कुन्तीकुमार! जलके इस पुण्य सरोवर, भृगुतुंग पर्वतपर तथा ' उष्णीगंग' नामक तीर्थमें जाकर तुम अपने मन्त्रियोंसहित स्नान और आचमन करो ॥ ७ ॥
आश्रमः स्थूलशिरसो रमणीयः प्रकाशते ।
अत्र मानं च कौन्तेय क्रोधं चैव विवर्जय ॥ ८ ॥
यह स्थूलशिरा मुनिका रमणीय आश्रम शोभा पा रहा है । कुन्तीनन्दन! यहाँ अहंकार और क्रोधको त्याग दो ॥ ८ ॥
एष रैभ्याश्रमः श्रीमान् पाण्डवेय प्रकाशते ।
भारद्वाजो यत्र कविर्यवक्रीतो व्यनश्यत ॥ ९ ॥
पाण्डुनन्दन! यह रैभ्यका सुन्दर आश्रम प्रकाशित हो रहा है, जहाँ विद्वान् भरद्वाजपुत्र यवक्रीत नष्ट हो गये थे ॥ ९ ॥
युधिष्ठिरउवाच
कथं युक्तोऽभवदृषिर्भरद्वाजः प्रतापवान् ।
किमर्थं च यवक्रीतः पुत्रोऽनश्यत वै मुनेः ॥ १० ॥
युधिष्ठिरने पूछा —ब्रह्मन्! प्रतापी भरद्वाज मुनि कैसे योगयुक्त हुए थे और उनके पुत्र यवक्रीत किसलिये नष्ट हो गये थे? ॥ १० ॥
एतत् सर्वं यथावृत्तं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
कर्मभिर्देवकल्पानां कीर्त्यमानैर्भृशं रमे ॥ ११ ॥
ये सब बातें मैं यथार्थरूपसे ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ । उन देवोपम मुनियोंके चरित्रोंका वर्णन सुनकर मेरे मनको बड़ा सुख मिलता है ॥ ११ ॥
लोमशउवाच
भरद्वाजश्च रैभ्यश्च सखायौ सम्बभूवतुः ।
तावूषतुरिहात्यन्तं प्रीयमाणावनन्तरम् ॥ १२ ॥
लोमशजीने कहा- राजन्! भरद्वाज तथा रैभ्य दोनों एक- दूसरेके सखा थे और निरन्तर इसी आश्रममें बड़े प्रेमसे रहा करते थे ॥ १२ ॥
रैभ्यस्य तु सुतावास्तामर्वावसुपरावसू ।
आसीद् यवक्रीः पुत्रस्तु भरद्वाजस्य भारत ॥ १३ ॥
रैभ्यके दो पुत्र थे- अर्वावसु और परावसु । भारत! भरद्वाजके पुत्रका नाम ' यवक्री ’ अथवा ' यवक्रीत' था ॥ १३ ॥
रैभ्यो विद्वान् सहापत्यस्तपस्वी चेतरोऽभवत् ।
तयोश्चाप्यतुला कीर्तिर्बाल्यात् प्रभृति भारत ॥ १४ ॥
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भारत! पुत्रोंसहित रैभ्य बड़े विद्वान् थे, परंतु भरद्वाज केवल तपस्यामें संलग्न रहते थे । युधिष्ठिर! बाल्यावस्थासे ही इन दोनों महात्माओंकी अनुपम कीर्ति सब ओर फैल रही थी ॥ १४ ॥
यवक्रीः पितरं दृष्ट्वा तपस्विनमसत्कृतम् ।
दृष्ट्वा च सत्कृतं विप्रै रैभ्यं पुत्रैः सहानघ ॥ १५ ॥
निष्पाप युधिष्ठिर! यवक्रीतने देखा, मेरे तपस्वी पिताका लोग सत्कार नहीं करते हैं; परंतु पुत्रोंसहित रैभ्यका ब्राह्मणोंद्वारा बड़ा आदर होता है ॥ १५ ॥
पर्यतप्यत तेजस्वी मन्युनाभिपरिप्लुतः ।
तपस्तेपे ततो घोरं वेदज्ञानाय पाण्डव ॥ १६ ॥
यह देख तेजस्वी यवक्रीतको बड़ा संताप हुआ । पाण्डुनन्दन! वे क्रोधसे आविष्ट हो वेदोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये घोर तपस्यामें लग गये ॥ १६ ॥
स समिद्धे महत्यग्नौ शरीरमुपतापयन् ।
जनयामास संतापमिन्द्रस्य सुमहातपाः ॥ १७ ॥
उन महातपस्वीने अत्यन्त प्रज्ज्वलित अग्निमें अपने शरीरको तपाते हुए इन्द्रके मनमें संताप उत्पन्न कर दिया ॥
तत इन्द्रो यवक्रीतमुपगम्य युधिष्ठिर ।
अब्रवीत् कस्य हेतोस्त्वमास्थितस्तप उत्तमम् ॥ १८ ॥
युधिष्ठिर! तब इन्द्र यवक्रीतके पास आकर बोले— ' तुम किसलिये यह उच्चकोटिकी तपस्या कर रहे हो? ' ॥ १८ ॥
यवक्रीतउवाच
द्विजानामनधीता वै वेदाः सुरगणार्चित ।
प्रतिभान्त्विति तप्येऽहमिदं परमकं तपः ॥ १ ९ ॥
यवक्रीतने कहा — देववृन्दपूजित महेन्द्र! मैं यह उच्चकोटिकी तपस्या इसलिये करता हूँ कि द्विजातियोंको बिना पढ़े ही सब वेदोंका ज्ञान हो जाय ॥ १ ९ ॥
स्वाध्यायार्थं समारम्भो ममायं पाकशासन ।
तपसा ज्ञातुमिच्छामि सर्वज्ञानानि कौशिक ॥ २० ॥
पाकशासन! मेरा यह आयोजन स्वाध्यायके लिये ही है । कौशिक! मैं तपस्याद्वारा सब बातोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ ॥ २० ॥
कालेन महता वेदाः शक्या गुरुमुखाद् विभो ।
प्राप्तुं तस्मादयं यत्नः परमो मे समास्थितः ॥ २१ ॥
प्रभो! गुरुके मुखसे दीर्घकालके पश्चात् वेदोंका ज्ञान हो सकता है । अतः मेरा यह महान् प्रयत्न शीघ्र ही सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये है ॥ २१ ॥
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इन्द्र उवाच
अमार्ग एष विप्रर्षे येन त्वं यातुमिच्छसि ।
किं विघातेन ते विप्र गच्छाधीहि गुरोर्मुखात् ॥ २२ ॥
इन्द्र बोले- विप्रर्षे! तुम जिस राहसे जाना चाहते हो, वह अध्ययनका मार्ग नहीं है । स्वाध्यायके समुचित मार्गको नष्ट करनेसे तुम्हें क्या लाभ होगा? अतः जाओ गुरुके मुखसे ही अध्ययन करो ॥ २२ ॥
लोमशउवाच
एवमुक्त्वा गतः शक्रो यवक्रीरपि भारत ।
भूय एवाकरोद् यत्नं तपस्यमितविक्रमः ॥ २३ ॥
लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ऐसा कहकर इन्द्र चले गये; तब अत्यन्त पराक्रमी यवक्रीतने भी पुनः तपस्याके लिये ही घोर प्रयास आरम्भ कर दिया ॥ २३ ॥
घोरेण तपसा राजंस्तप्यमानो महत् तपः ।
संतापयामास भृशं देवेन्द्रमिति नः श्रुतम् ॥ २४ ॥
राजन्! उसने घोर तपस्याद्वारा महान् तपका संचय करते हुए देवराज इन्द्रको अत्यन्त संतप्त कर दिया; यह बात हमारे सुननेमें आयी है ॥ २४ ॥
तं तथा तप्यमानं तु तपस्तीव्रं महामुनिम् ।
उपेत्य बलभिद् देवो वारयामास वै पुनः ॥ २५ ॥
अशक्योऽर्थः समारब्धो नैतद् बुद्धिकृतं तव ।
प्रतिभास्यन्ति वै वेदास्तव चैव पितुश्च ते ॥ २६ ॥
महामुनि यवक्रीतको इस प्रकार तपस्या करते देख इन्द्रने उनके पास जाकर पुनः मना किया और कहा — ' मुने! तुमने ऐसे कार्यका आरम्भ किया है जिसकी सिद्धि होनी असम्भव है । तुम्हारा यह ( द्विजमात्रके लिये बिना पढ़े वेदका ज्ञान होनेका) आयोजन बुद्धि - संगत नहीं है; किंतु केवल तुमको और तुम्हारे पिताको ही वेदोंका ज्ञान होगा' ॥ २५-२६ ॥ यवक्रीत उवाच
न चैतदेवं क्रियते देवराज ममेप्सितम् ।
महता नियमेनाहं तप्स्ये घोरतरं तपः ॥ २७ ॥
यवक्रीतने कहा— देवराज! यदि इस प्रकार आप मेरे इष्ट मनोरथकी सिद्धि नहीं करते हैं तो मैं और भी कठोर नियम लेकर अत्यन्त भयंकर तपस्यामें लग जाऊँगा ॥ २७ ॥
समिद्धेऽग्नावुपकृत्याङ्गमङ्गं होष्यामि वा मघवंस्तन्निबोध । यद्येतदेवं न करोषि कामं ममेप्सितं देवराजेह सर्वम् ॥ २८ ॥
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देवराज इन्द्र! यदि आप यहाँ मेरी सारी मनोवांछित कामना पूरी नहीं करते हैं तो मैं प्रज्वलित अग्निमें अपने एक- एक अंगको होम दूँगा । इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें ॥ २८ ॥
लोमशउवाच
निश्चयं तमभिज्ञाय मुनेस्तस्य महात्मनः ।
प्रतिवारणहेत्वर्थं बुद्धया संचिन्त्य बुद्धिमान् ॥ २ ९ ॥
तत इन्द्रोऽकरोद् रूपं ब्राह्मणस्य तपस्विनः ।
अनेकशतवर्षस्य दुर्बलस्य सयक्ष्मणः ॥ ३० ॥
लोमशजी कहते हैं- युधिष्ठिर! उन महामुनिके उस निश्चयको जानकर बुद्धिमान् इन्द्रने उन्हें रोकनेके लिये बुद्धिपूर्वक कुछ विचार किया और एक ऐसे तपस्वी ब्राह्मणका रूप धारण कर लिया जिसकी उम्र कई सौ वर्षोंकी थी, तथा जो यक्ष्माका रोगी और दुर्बल दिखायी देता था ॥ २ ९ -३० ॥
यवक्रीतस्य यत् तीर्थमुचितं शौचकर्मणि ।
भागीरथ्यां तत्र सेतुं वालुकाभिश्चकार सः ॥ ३१ ॥
गंगाके जिस तीर्थमें यवक्रीत मुनि स्नान आदि किया करते थे, उसीमें वे ब्राह्मण देवता बालूद्वारा पुल बनाने लगे ॥ ३१ ॥
यदास्य वदतो वाक्यं न स चक्रे द्विजोत्तमः ।
वालुकाभिस्ततः शक्रो गङ्गां समभिपूरयन् ॥ ३२ ॥
द्विजश्रेष्ठ यवक्रीतने जब इन्द्रका कहना नहीं माना, तब वे बालूसे गंगाजीको भरने लगे ॥ ३२ ॥
वालुकामुष्टिमनिशं भागीरथ्यां व्यसर्जयत् ।
सेतुमभ्यारभच्छक्रो यवक्रीतं निदर्शयन् ॥ ३३ ॥
वे निरन्तर एक- एक मुट्ठी बालू गंगाजीमें छोड़ते थे और इस प्रकार उन्होंने यवक्रीतको दिखाकर पुल बाँधनेका कार्य आरम्भ कर दिया ॥ ३३ ॥
तं ददर्श यवक्रीतो यत्नवन्तं निबन्धने ।
प्रहसंश्चाब्रवीद् वाक्यमिदं स मुनिपुङ्गवः ॥ ३४ ॥
मुनिवर यवक्रीतने देखा, ब्राह्मण देवता पुल बाँधनेके लिये बड़े यत्नशील हैं, तब उन्होंने हँसते हुए इस प्रकार कहा— ॥ ३४ ॥
किमिदं वर्तते ब्रह्मन् किं च ते ह चिकीर्षितम् ।
अतीव हि महान् यत्नः क्रियतेऽयं निरर्थकः ॥ ३५ ॥
‘ ब्रह्मन्! यह क्या है? आप क्या करना चाहते हैं? आप प्रयत्न तो महान् कर रहे हैं, परंतु यह व्यर्थ है ' ॥
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इन्द्र उवाच
बन्धिष्ये सेतुना गङ्गां सुखः पन्था भविष्यति ।
क्लिश्यते हि जनस्तात तरमाणः पुनः पुनः ॥ ३६ ॥
इन्द्र बोले - तात! मैं गंगाजीपर पुल बाँधूंगा । इससे पार जानेके लिये सुखद मार्ग बन जायगा; क्योंकि पुलके न होनेसे इधर आने -जानेवाले लोगोंको बार - बार तैरनेका कष्ट उठाना पड़ता है ॥ ३६ ॥
यवक्रीतउवाच
नायं शक्यस्त्वया बद्धुं महानोघस्तपोधन ।
अशक्याद् विनिवर्तस्व शक्यमर्थं समारभ ॥ ३७ ॥
यवक्रीतने कहा —तपोधन! यहाँ अगाध जलराशि भरी है; अतः तुम पुल बाँधनेमें सफल नहीं हो सकोगे । इसलिये इस असम्भव कार्यसे मुँह मोड़ लो और ऐसे कार्यमें हाथ डालो जो तुमसे हो सके ॥ ३७ ॥
इन्द्र उवाच
यथैव भवता चेदं तपो वेदाथमुद्यतम् ।
अशक्यं तद्वदस्माभिरयं भारः समाहितः ॥ ३८ ॥
इन्द्र बोले — मुने! जैसे आपने बिना पढ़े वेदोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये यह तपस्या प्रारम्भ की है जिसकी सफलता असम्भव है, उसी प्रकार मैंने भी यह पुल बाँधनेका भार उठाया है ॥ ३८ ॥
यवक्रीत उवाच
यथा तव निरर्थोऽयमारम्भस्त्रिदशेश्वर ।
तथा यदि ममापीदं मन्यसे पाकशासन ॥ ३ ९ ॥
क्रियतां यद् भवेच्छक्यं त्वया सुरगणेश्वर ।
वरांश्च मे प्रयच्छान्यान् यैरन्यान् भवितास्म्यति ॥ ४० ॥
यवक्रीतने कहा – देवेश्वर पाकशासन! जैसे आपका यह पुल बाँधनेका आयोजन व्यर्थ है, उसी प्रकार यदि मेरी इस तपस्याको भी आप निरर्थक मानते हैं तो वही कार्य कीजिये जो सम्भव हो, मुझे ऐसे उत्तम वर प्रदान कीजिये, जिनके द्वारा मैं दूसरोंसे बढ़-चढ़कर प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकूँ ॥ ३ ९-४० ॥ लोमशउवाच
तस्मै प्रादाद् वरानिन्द्र उक्तवान् यान् महातपाः ।
प्रतिभास्यन्ति ते वेदाः पित्रा सह यथेप्सिताः ॥ ४१ ॥
यच्चान्यत् काङ्क्षसे कामं यवक्रीर्गम्यतामिति ।