श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 911–920

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 911–920

पृष्ठ 911

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चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः बन्दी और अष्टावक्रका शास्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समङ्गामें स्नानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना अष्टावक्र उवाच अत्रोग्रसेन समितेषु राजन् समागतेष्वप्रतिमेषु राजसु । नावैमि बन्दिं वरमत्र वादिनां महाजले हंसमिवाददामि ॥ १ ॥

अष्टावक्र बोले- भयंकर सेनाओंसे युक्त महाराज जनक! इस सभामें सब ओरसे अप्रतिम प्रभावशाली राजा आकर एकत्र हुए हैं; परंतु मैं इन सबके बीचमें वादियोंमें प्रधान बन्दीको नहीं पहचान पाता हूँ। यदि पहचान लूँ तो अगाध जलमें हंसकी भाँति उन्हें अवश्य पकड़ लूँगा ॥ १ ॥

न मेऽद्य वक्ष्यस्यतिवादिमानिन् ग्लहं प्रपन्नः सरितामिवागमः । हुताशनस्येव समिद्धतेजसः स्थिरो भवस्वेह ममाद्य बन्दिन् ॥ २ ॥

अपनेको अतिवादी माननेवाले बन्दी! तुमने पराजित हुए पण्डितोंको पानीमें डुबवा देनेका नियम कर रखा है, किंतु आज मेरे सामने तुम्हारी बोली बंद हो जायगी । जैसे प्रलयकालके प्रज्वलित अग्निके समीप नदियोंका प्रवाह सूख जाता है, उसी प्रकार मेरे सामने आनेपर तुम भी सूख जाओगे - तुम्हारी

वादशक्ति नष्ट हो जायगी । बन्दी! आज मेरे सामने स्थिर होकर बैठो ॥ २ ॥

बन्द्युवाच व्याघ्रं शयानं प्रति मा प्रबोधय आशीविषं सृक्किणी लेलिहानम् । पदाहतस्येह शिरोऽभिहत्य नादष्टो वै मोक्ष्यसे तन्निबोध ॥ ३ ॥

बन्दीने कहा- मुझे सोता हुआ सिंह समझकर न जगाओ (न छेड़ो ), अपने जबड़ोंको चाटता हुआ विषैला सर्प मानो । तुमने पैरोंसे ठोकर मारकर मेरे

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मस्तकको कुचल दिया है । अब जबतक तुम डँस लिये नहीं जाते तबतक तुम्हें छुटकारा नहीं मिल सकता, इस बातको अच्छी तरह समझ लो ॥ ३ ॥

यो वै दर्पात् संहननोपपन्नः सुदुर्बलः पर्वतमाविहन्ति । तस्यैव पाणिः सनखो विदीर्यते न चैव शैलस्य हि दृश्यते व्रणः ॥ ४ ॥

जो देहधारी अत्यन्त दुर्बल होकर भी अहंकारवश अपने हाथसे पर्वतपर चोट करता है, उसीके हाथ और नख विदीर्ण हो जाते हैं । उस चोटसे पर्वतमें घाव होता नहीं देखा जाता है ॥ ४ ॥

अष्टावक्र उवाच

सर्वे राज्ञो मैथिलस्य मैनाकस्येव पर्वताः ।

निकृष्टभूता राजानो वत्सा अनडुहो यथा ॥ ५ ॥

अष्टावक्र बोले — जैसे सब पर्वत मैनाकसे छोटे हैं, सारे बछड़े बैलोंसे लघुतर हैं, उसी प्रकार भूमण्डलके समस्त राजा मिथिलानरेश महाराज जनककी अपेक्षा निम्न श्रेणीमें हैं ॥ ५ ॥

यथा महेन्द्रः प्रवरः सुराणां नदीषु गङ्गा प्रवरा यथैव । तथा नृपाणां प्रवरस्त्वमेको बन्दिं समभ्यानय मत्सकाशम् ॥ ६ ॥

राजन्! जैसे देवताओंमें महेन्द्र श्रेष्ठ हैं और नदियोंमें गंगा श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सब राजाओंमें एकमात्र आप ही उत्तम हैं । अब बन्दीको मेरे निकट बुलवाइये ॥ ६ ॥

लोमशउवाच एवमष्टावक्रः समितौ हि गर्जन्- जातक्रोधो बन्दिनमाह राजन् । उक्ते वाक्ये चोत्तरं मे ब्रवीहि वाक्यस्य चाप्युत्तरं ते ब्रवीमि ॥ ७ ॥

लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ( बन्दीके सामने आ जानेपर) राजसभामें गर्जते हुए अष्टावक्रने बन्दीसे कुपित होकर इस प्रकार कहा -' मेरी पूछी हुई बातका उत्तर तुम दो और तुम्हारी बातका उत्तर मैं देता हूँ ' ॥ ७ ॥

बन्द्युवाच

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एक एवाग्निर्बहुधा समिध्यते एकः सूर्यः सर्वमिदं विभाति । एको वीरो देवराजोऽरिहन्ता यमः पितॄणामीश्वरश्चैक एव ॥ ८ ॥

तब बन्दीने कहा – अष्टावक्र! एक ही अग्नि अनेक प्रकारसे प्रकाशित होती है, एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करता है । शत्रुओंका नाश करनेवाला देवराज इन्द्र एक ही वीर है तथा पितरोंका स्वामी यमराज भी एक ही है ॥ ८ ॥

अष्टावक्र उवाच द्वाविन्द्राग्नी चरतो वै सखायौ द्वौ देवर्षी नारदपर्वतौ च । द्वावश्विनौ द्वे रथस्यापि चक्रे भार्यापती द्वौ विहितौ विधात्रा ॥ ९ ॥

अष्टावक्र बोले- जो दो मित्रोंकी भाँति सदा साथ विचरते हैं, वे इन्द्र और अग्नि दो देवता हैं । परस्पर मित्रभाव रखनेवाले देवर्षि नारद और पर्वत भी दो ही हैं । अश्विनीकुमारोंकी भी संख्या दो ही है, रथके पहिये भी दो ही होते हैं तथा विधाताने ( एक - दूसरेके जीवनसंगी ) पति और पत्नी भी दो ही बनाये हैं ॥ ९ ॥

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बन्द्युवाच त्रिः सूयते कर्मणा वै प्रजेयं त्रयो युक्ता वाजपेयं वहन्ति । अध्वर्यवस्त्रिसवनानि तन्वते त्रयो लोकास्त्रीणि ज्योतींषि चाहुः ॥ १० ॥

बन्दीने कहा- यह सम्पूर्ण प्रजा कर्मवश देवता, मनुष्य और तिर्यक्रूप तीन प्रकारका जन्म धारण करती है, ऋक्, साम, और यजु — ये तीन वेद ही परस्पर संयुक्त हो बाजपेय आदि यज्ञ कर्मोंका निर्वाह करते हैं । अध्वर्युलोग भी प्रातःसवन, मध्याह्नसवन और सायंसवनके भेदसे तीन सवनों (यज्ञों ) -का ही अनुष्ठान करते हैं । ( कर्मानुसार प्राप्त होनेवाले भोगोंके लिये ) स्वर्ग, मृत्यु और नरक— ये लोक भी तीन ही बताये गये हैं और मुनियोंने सूर्य, चन्द्र और अग्निरूप तीन ही प्रकारकी ज्योतियाँ बतलायी हैं ॥ १० ॥

अष्टावक्र उवाच चतुष्टयं ब्राह्मणानां निकेतं चत्वारो वर्णा यज्ञमिमं वहन्ति । दिशश्चतस्रो वर्णचतुष्टयं च चतुष्पदा गौरपि शश्वदुक्ता ॥ ११ ॥

अष्टावक्र बोले — ब्राह्मणोंके लिये आश्रम चार हैं । वर्ण भी चार ही हैं जो इस यज्ञका भार वहन करते हैं । मुख्य दिशाएँ भी चार ही हैं । वर्ण भी चार ही हैं तथा गो अर्थात् वाणी भी सदा चार ही चरणोंसे युक्त बतायी गयी है ॥ ११ ॥

बन्द्युवाच पञ्चाग्नयः पञ्चपदा च पङ्क्ति- र्यज्ञाः पञ्चैवाप्यथ पञ्चेन्द्रियाणि । दृष्टा वेदे पञ्चचूडाप्सराश्च लोके ख्यातं पञ्चनदं च पुण्यम् ॥ १२ ॥

बन्दीने कहा- यज्ञकी अग्नि गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय, सभ्य और आवसथ्यके भेदसे पाँच प्रकारकी कही गयी है । पंक्ति छन्द भी पाँच पादोंसे ही बनता है, यज्ञ भी पाँच ही हैं - देवयज्ञ, पितृयज्ञ, ऋषियज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ । इसी प्रकार इन्द्रियोंकी संख्या भी पाँच ही हैं । वेदमें पाँच वेणीवाली

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( पंचचूड़ा ) अप्सराका वर्णन देखा गया है तथा लोकमें पाँच नदियोंसे विशिष्ट पुण्यमय पञ्चनद प्रदेश विख्यात है ॥ १२ ॥

अष्टावक्र उवाच षडाधाने दक्षिणामाहुरेके षट् चैवेमे ऋतवः कालचक्रम् । षडिन्द्रियाण्युत षट् कृत्तिकाश्च षट् साद्यस्काः सर्ववेदेषु दृष्टाः ॥ १३ ॥

अष्टावक्र बोले- कुछ विद्वानोंका मत है कि अग्निकी स्थापनाके समय दक्षिणामें छः गौ ही देनी चाहिये । ये छः ऋतुएँ ही संवत्सररूप कालचक्रकी सिद्धि करती हैं । मनसहित ज्ञानेन्द्रियाँ भी छः ही हैं । कृत्तिकाओंकी संख्या छः ही है तथा सम्पूर्ण वेदोंमें साद्यस्क नामक यज्ञ भी छ: ही देखे गये हैं ॥ १३ ॥

बन्द्युवाच सप्त ग्राम्याः पशवः सप्त वन्याः सप्तच्छन्दांसि क्रतुमेकं वहन्ति । सप्तर्षयः सप्त चाप्यर्हणानि सप्ततन्त्री प्रथिता चैव वीणा ॥ १४ ॥

बन्दीने कहा- ग्राम्य पशु सात हैं ( जिनके नाम इस प्रकार हैं ) - गाय, भैंस, बकरी, भेंड़, घोड़ा, कुत्ता और गदहा । जंगली पशु भी सात हैं ( यथा — सिंह, बाघ, भेड़िया, हाथी, वानर, भालू और मृग ) । गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् और जगती - ये सात ही छन्द एक-एक यज्ञका निर्वाह करते हैं । सप्तर्षि नामसे प्रसिद्ध ऋषियोंकी संख्या भी सात ही है ( यथा - मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, क्रतु, अंगिरा और वसिष्ठ ), पूजनके संक्षिप्त उपचार भी सात हैं ( यथा — गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, आचमन और ताम्बूल ) तथा वीणाके भी सात ही तार विख्यात हैं ॥ १४ ॥

अष्टावक्र उवाच अष्टौ शाणाः शतमानं वहन्ति तथाष्टपादः शरभः सिंहघाती । अष्टौ वसूञ्शुश्रुम देवतासु यूपश्चाष्टास्त्रिर्विहितः सर्वयज्ञे ॥ १५ ॥

अष्टावक्र बोले — तराजूमें लगी हुई सनकी डोरियाँ भी आठ ही होती हैं, जो सैकड़ोंका मान ( तौल ) करती हैं । सिंहको भी मार गिरानेवाले शरभके आठ ही

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पैर होते हैं । देवताओंमें वसुओंकी संख्या भी आठ ही सुनी गयी है और सम्पूर्ण यज्ञोंमें आठ कोणके ही यूपका निर्माण किया जाता है ॥ १५ ॥

बन्द्युवाच नवैवोक्ताः सामिधेन्यः पितॄणां तथा प्राहुर्नवयोगं विसर्गम् । नवाक्षरा बृहती सम्प्रदिष्टा नवयोगो गणनामेति शश्वत् ॥ १६ ॥

बन्दीने कहा - पितृयज्ञमें समिधा देकर अग्निको उद्दीप्त करनेके लिये जो मन्त्र पढ़े जाते हैं उन्हें सामिधेनी ऋचा कहते हैं, उनकी संख्या नौ ही बतायी गयी है। यह जो नाना प्रकारकी सृष्टि दिखायी देती है, इसमें प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व, अहंकार तथा पञ्चतन्मात्रा – इन नौ पदार्थोंका संयोग कारण है, ऐसा विज्ञ पुरुषोंका कथन है । बृहती छन्दके प्रत्येक चरणमें नौ अक्षर बताये गये हैं और एकसे लेकर नौ अंकोंका योग ही सदा गणनाके उपयोगमें आता है ॥ १६ ॥

अष्टावक्र उवाच दिशो दशोक्ताः पुरुषस्य लोके सहस्रमाहुर्दशपूर्णं शतानि । दशैव मासान् बिभ्रति गर्भवत्यो दशैरका दश दाशा दशार्हाः ॥ १७ ॥

अष्टावक्रने कहा – पुरुषके लिये संसारमें दस दिशाएँ बतायी गयी हैं । दस सौ मिलकर ही पूरा एक सहस्र कहा जाता है, गर्भवती स्त्रियाँ दस मासतक ही गर्भ धारण करती हैं, निन्दक भी दस ही होते हैं, शरीरकी अवस्थाएँ भी दस-' हैं तथा पूजनीय पुरुष भी दस ही बताये गये हैं ॥ १७ ॥

बन्द्युवाच एकादशैकादशिनः पशूना- मेकादशैवात्र भवन्ति यूपाः । एकादश प्राणभृतां विकारा एकादशोक्ता दिवि देवेषु रुद्राः ॥ १८ ॥

बन्दीने कहा — प्राणधारी पशुओं ( जीवों ) के लिये ग्यारह विषय हैं । उन्हें प्रकाशित करनेवाली इन्द्रियाँ भी ग्यारह ही हैं, यज्ञ, याग आदिमें यूप भी ग्यारह

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ही होते हैं, प्राणियोंके विकार भी ग्यारह हैं, तथा स्वर्गीय देवताओंमें जो रुद्र३ कहलाते हैं; उनकी संख्या भी ग्यारह ही है ॥ १८ ॥

अष्टावक्र उवाच संवत्सरं द्वादशमासमाहु- जगत्याः पादो द्वादशैवाक्षराणि । द्वादशाहः प्राकृतो यज्ञ उक्तो द्वादशादित्यान् कथयन्तीह धीराः ॥ १ ९ ॥ अष्टावक्र बोले - एक संवत्सरमें बारह महीने बताये गये हैं, जगती छन्दका प्रत्येक पाद बारह अक्षरोंका होता है, प्राकृत यज्ञ बारह दिनोंका माना गया है, ज्ञानी पुरुष यहाँ बारह आदित्योंका वर्णन करते हैं ॥ १ ९ ॥ बन्द्युवाच त्रयोदशी तिथिरुक्ता प्रशस्ता त्रयोदशद्वीपवती मही च । बन्दीने कहा — त्रयोदशी तिथि उत्तम बतायी गयी है तथा यह पृथ्वी तेरह द्वीपोंसे युक्त है । लोमशउवाच एतावदुक्त्वा विरराम बन्दी

श्लोकस्यार्धं व्याजहाराष्टवक्रः ।

लोमशजी कहते हैं— इतना कहकर बन्दी चुप हो गया । तब शेष आधे

श्लोककी पूर्ति अष्टावक्रने इस प्रकार की ।

अष्टावक्र उवाच त्रयोदशाहानि ससार केशी त्रयोदशादीन्यतिच्छन्दांसि चाहुः ॥ २० ॥

दिनोंतकअष्टावक्रयुद्ध कियाबोले —थाकेशी। वेदमेंनामकजो अतिशब्ददानवने- विशिष्टभगवान्छन्दविष्णुकेबताये गयेसाथहैं, उनकातेरह एक- एक पाद तेरह आदि अक्षरोंसे सम्पन्न होता है ( अर्थात् अतिजगती छन्दका एक पाद तेरह अक्षरोंका, अतिशक्वरीका एक पाद पन्द्रह अक्षरोंका, अत्यष्टिका प्रत्येक पाद सत्रह अक्षरोंका तथा अतिधृतिका हर एक पाद उन्नीस अक्षरोंका होता है ) ॥ २० ॥

ततो महानुदतिष्ठन्निनाद-

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स्तूष्णींभूतं सूतपुत्रं निशम्य ।

अधोमुखं ध्यानपरं तदानी- मष्टावक्रं चाप्युदीर्यन्तमेव ॥ २१ ॥

लोमशजी कहते हैं - इतना सुनते ही सूतपुत्र बन्दी चुप हो गया और मुँह नीचा किये किसी भारी सोच- विचार में पड़ गया । इधर अष्टावक्र बोलते ही रहे, यह सब देख दर्शकों और श्रोताओंमें महान् कोलाहल मच गया ॥ २१ ॥

तस्मिंस्तथा संकुले वर्तमाने

स्फीते यज्ञे जनकस्योत राज्ञः ।

अष्टावक्रं पूजयन्तोऽभ्युपेयु- र्विप्राः सर्वे प्राञ्जलयः प्रतीताः ॥ २२ ॥

महाराज जनकके उस समृद्धिशाली यज्ञमें जबकि चारों ओर कोलाहल व्याप्त हो रहा था, सब ब्राह्मण हाथ जोड़े हुए श्रद्धापूर्वक अष्टावक्रके समीप आये और उनका आदर- सत्कारपूर्वक पूजन किया ॥ २२ ॥

अष्टावक्र उवाच अनेनैव ब्राह्मणाः शुश्रुवांसो वादे जित्वा सलिले मज्जिताः प्राक् । तानेव धर्मानयमद्य बन्दी प्राप्नोतु गृह्याप्सु निमज्जयैनम् ॥ २३ ॥

तत्पश्चात् अष्टावक्रने कहा - महाराज! इस बन्दीने पहले बहुत से शास्त्रज्ञ ( विद्वान्) ब्राह्मणोंको शास्त्रार्थमें पराजित करके पानीमें डुबवाया है, अतः इसकी भी वही गति होनी चाहिये जो इसके द्वारा दूसरोंकी हुई । इसलिये इसे पकड़कर शीघ्र पानीमें डुबवा दीजिये ॥ २३ ॥

बन्द्युवाच अहं पुत्रो वरुणस्योत राज्ञ- स्तत्रास सत्रं द्वादशवार्षिकं वै । सत्रेण ते जनक तुल्यकालं तदर्थं ते प्रहिता मे द्विजाग्रयाः ॥ २४ ॥

बन्दी बोला — महाराज जनक! मैं राजा वरुणका पुत्र हूँ । मेरे पिताके यहाँ भी आपके इस यज्ञके समान ही बारह वर्षोंमें पूर्ण होनेवाला यज्ञ हो रहा था । उस यज्ञके अनुष्ठानके लिये ही (जलमें डुबानेके बहाने ) कुछ चुने हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको मैंने वरुणलोकमें भेज दिया था ॥ २४ ॥

ते तु सर्वे वरुणस्योत यज्ञं

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द्रष्टुं गता इह आयान्ति भूयः । अष्टावक्रं पूजये पूजनीयं यस्य हेतोर्जनितारं समेष्ये ॥ २५ ॥

वे सब- के - सब वरुणका यज्ञ देखनेके लिये गये हैं और अब पुनः लौटकर आ रहे हैं । मैं पूजनीय ब्राह्मण अष्टावक्रजीका सत्कार करता हूँ; जिनके कारण मेरा अपने पिताजीसे मिलना होगा ॥ २५ ॥

अष्टावक्र उवाच विप्राः समुद्राम्भसि मज्जिता ये वाचा जिता मेधया वा विदानाः । तां मेधया वाचमथोज्जहार यथा वाचमवचिन्वन्ति सन्तः ॥ २६ ॥

अष्टावक्र बोले — राजन्! बन्दीने अपनी जिस वाणी ( प्रवचनपटुता अथवा मेधा – बुद्धिबल ) -से विद्वान् ब्राह्मणोंको भी परास्त किया और समुद्रके जलमें डुबोया है, उसकी उस वाक्शक्तिको मैंने अपनी बुद्धिसे किस प्रकार उखाड़ फेंका है, यह सब इस सभामें बैठे हुए विद्वान् पुरुष मेरी बातें सुनकर ही जान गये होंगे ॥ २६ ॥

अग्निर्दहञ्जातवेदाः सतां गृहान् विसर्जयंस्तेजसा न स्म धाक्षीत् । बालेषु पुत्रेषु कृपणं वदत्सु तथा वाचमवचिन्वन्ति सन्तः ॥ २७ ॥

अग्नि स्वभावसे ही दहन करनेवाला है तो भी वह ज्ञेय विषयको तत्काल जाननेमें समर्थ है । इस कारण परीक्षाके समय जो सदाचारी और सत्यवादी होते हैं उनके घरोंको ( शरीरोंको ) छोड़ देता है, जलाता नहीं । वैसे ही संतलोग भी विनम्रभावसे बोलनेवाले बालक पुत्रोंके वचनोंमेंसे जो सत्य और हितकर बात होती है, उसे चुन लेते हैं - ( उसे मान लेते हैं, उनकी अवहेलना नहीं करते ) । भाव यह कि तुमको मेरे वचनोंका भाव समझकर उन्हें ग्रहण करना चाहिये ॥ २७ ॥

श्लेष्मातकी क्षीणवर्चाः शृणोषि उताहो त्वां स्तुतयो मादयन्ति । हस्तीव त्वं जनक विनुद्यमानो न मामिकां वाचमिमां शृणोषि ॥ २८ ॥

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राजन्! जान पड़ता है, तुमने लसोड़ेके पत्तोंपर भोजन किया है या उसका फल खा लिया है, इसीसे तुम्हारा तेज क्षीण हो गया है; अतः तुम बन्दीकी बात सुन रहे हो, अथवा इस बन्दीद्वारा की गयी स्तुतियाँ तुम्हें उन्मत्त कर रही हैं । यही कारण है कि अंकुशकी मार खाकर भी न माननेवाले मतवाले हाथीकी भाँति तुम मेरी इन बातोंको नहीं सुन रहे हो ॥ २८ ॥

जनक उवाच शृणोमि वाचं तव दिव्यरूपा- ममानुषीं दिव्यरूपोऽसि साक्षात् । अजैषीर्यद् बन्दिनं त्वं विवादे निसृष्ट एष तव कामोऽद्य बन्दी ॥ २ ९ ॥ जनकने कहा — ब्रह्मन्! मैं आपकी दिव्य एवं अलौकिक वाणी सुन रहा हूँ, आप साक्षात् दिव्यस्वरूप हैं, आपने शास्त्रार्थमें बन्दीको जीत लिया है । आपकी इच्छा अभी पूरी की जा रही है । देखिये यह है आपके द्वारा जीता हुआ बन्दी ॥ २ ९ ॥ अष्टावक्र उवाच

नान जीवता कश्चिदर्थो मे बन्दिना नृप ।

पिता यद्यस्य वरुणो मज्जयैनं जलाशये ॥ ३० ॥

अष्टावक्र बोले- महाराज! इस बन्दीके जीवित रहनेसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है । यदि इसके पिता वरुणदेव हैं तो उनके पास जानेके लिये इसे निश्चय ही जलाशयमें डुबो दीजिये ॥ ३० ॥

बन्द्युवाच अहं पुत्रो वरुणस्योत राज्ञो

न मे भयं विद्यते मज्जितस्य ।

इमं मुहूर्तं पितरं द्रक्ष्यतेऽय- मष्टावक्रश्चिरनष्टं कहोडम् ॥ ३१ ॥

बन्दीने कहा — राजन्! मैं वास्तवमें राजा वरुणका पुत्र हूँ, अतः जलमें डुबाये जानेका मुझे कोई भय नहीं है । ये अष्टावक्र दीर्घकालसे नष्ट हुए अपने पिता कहोडको इसी समय देखेंगे ॥ ३१ ॥

लोमशउवाच

ततस्ते पूजिता विप्रा वरुणेन महात्मना ।

उदतिष्ठंस्ततः सर्वे जनकस्य समीपतः ॥ ३२ ॥