02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 931–940

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 931–940

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स लब्धकामः पितरं समेत्याथेदमब्रवीत् ॥ ४२ ॥

लोमशजी कहते हैं- राजन्! तब इन्द्रने महातपस्वी यवक्रीतके कथनानुसार उन्हें वर देते हुए कहा — ‘ यवक्रीत! तुम्हारे पितासहित तुम्हें वेदोंका यथेष्ट ज्ञान प्राप्त हो जायगा । साथ ही और भी जो तुम्हारी कामना हो, वह पूर्ण हो जायगी । अब तुम तपस्या छोड़कर अपने आश्रमको लौट जाओ । ' इस प्रकार पूर्णकाम होकर, यवक्रीत अपने पिताके पास गये और इस प्रकार बोले ॥ ४१-४२ ॥ यवक्रीतउवाच

प्रतिभास्यन्ति वै वेदा मम तातस्य चोभयोः ।

अति चान्यान् भविष्यावो वरा लब्धास्तदा मया ॥ ४३ ॥

यवक्रीतने कहा — पिताजी! आपको और मुझे दोनोंको ही सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान हो जायगा । साथ ही हम दोनों दूसरोंसे ऊँची स्थितिमें हो जायँगे - ऐसा वर मैंने प्राप्त किया है ॥ ४३ ॥

भरद्वाज उवाच

दर्पस्ते भविता तात वराँल्लब्ध्वा यथेप्सितान् ।

स दर्पपूर्णः कृपणः क्षिप्रमेव विनङ्क्ष्यसि ॥ ४४ ॥

भरद्वाज बोले — तात! इस तरह मनोवाञ्छित वर प्राप्त करनेके कारण तुम्हारे मनमें अहंकार उत्पन्न हो जायगा और अहंकारसे युक्त होनेपर तुम कृपण होकर शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे ॥ ४४ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथा देवैरुदाहृताः ।

मुनिरासीत् पुरा पुत्र बालधिर्नाम वीर्यवान् ॥ ४५ ॥

इस विषयमें विज्ञजन देवताओंकी कही हुई यह गाथा सुनाया करते हैं - प्राचीनकालमें बालधि नामसे प्रसिद्ध एक शक्तिशाली मुनि थे ॥ ४५ ॥

स पुत्रशोकादुद्विग्नस्तपस्तेपे सुदुष्करम् ।

भवेन्मम सुतोऽमर्त्य इति तं लब्धवांश्च सः ॥ ४६ ॥

उन्होंने पुत्रशोकसे संतप्त होकर अत्यन्त कठोर तपस्या की । तपस्याका उद्देश्य यह था कि मुझे देवोपम पुत्र प्राप्त हो । अपनी उस अभिलाषाके अनुसार बालधिको एक पुत्र प्राप्त हुआ ॥ ४६ ॥

तस्य प्रसादो वै देवैः कृतो न त्वमरैः समः ।

नामर्त्यो विद्यते मर्त्यो निमित्तायुर्भविष्यति ॥ ४७ ॥

देवताओंने उनपर कृपा अवश्य की, परंतु उनके पुत्रको देवतुल्य नहीं बनाया और

वरदान देते हुए यह कहा 'कि मरणधर्मा मनुष्य कभी देवताके समान अमर नहीं हो सकता ।

अतः उसकी आयु निमित्त ( कारण) के अधीन होगी' ॥ ४७ ॥

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बालधिरुवाच

यथेमे पर्वताः शश्वत् तिष्ठन्ति सुरसत्तमाः ।

अक्षयास्तन्निमित्तं मे सुतस्यायुर्भविष्यति ॥ ४८ ॥

बालधि बोले — देववरो! जैसे ये पर्वत सदा अक्षयभावसे खड़े रहते हैं, वैसे ही मेरा पुत्र भी सदा अक्षय बना रहे। ये पर्वत ही उसकी आयुके निमित्त होंगे अर्थात् जबतक ये पर्वत यहाँ बने रहें तबतक मेरा पुत्र भी जीवित रहे ॥ ४८ ॥

भरद्वाज उवाच

तस्य पुत्रस्तदा जज्ञे मेधावी क्रोधनस्तदा ।

स तच्छ्रुत्वाकरोद् दर्पमृषींश्चैवावमन्यत ॥ ४ ९ ॥

भरद्वाज कहते हैं - यवक्रीत! तदनन्तर बालधिके पुत्रका जन्म हुआ, जो मेधायुक्त होनेके कारण मेधावी नामसे विख्यात था । वह स्वभावका बड़ा क्रोधी था । अपनी आयुके विषयमें देवताओंके वरदानकी बात सुनकर मेधावी घमण्डमें भर गया और ऋषियोंका अपमान करने लगा ॥ ४ ९ ॥

विकुर्वाणो मुनीनां च व्यचरत् स महीमिमाम् ।

आससाद महावीर्यं धनुषाक्षं मनीषिणम् ॥ ५० ॥

इतना ही नहीं, वह ऋषि- मुनियोंको सतानेके उद्देश्यसे ही इस पृथ्वीपर सब ओर विचरा करता था । एक दिन मेधावी महान् शक्तिशाली एवं मनीषी धनुषाक्षके पास जा पहुँचा ॥ ५० ॥

तस्यापचक्रे मेधावी तं शशाप स वीर्यवान् ।

भव भस्मेति चोक्तः स न भस्म समपद्यत ॥ ५१ ॥

और उनका तिरस्कार करने लगा । तब तपोबल- सम्पन्न ऋषि धनुषाक्षने उसे शाप देते हुए कहा — ' अरे, तू जलकर भस्म हो जा । ' परंतु उनके कहनेपर भी वह भस्म नहीं हुआ ॥ ५१ ॥

धनुषाक्षस्तु तं दृष्ट्वा मेधाविनमनामयम् ।

निमित्तमस्य महिषैर्भेदयामास वीर्यवान् ॥ ५२ ॥

शक्तिशाली धनुषाक्षने ध्यानमें देखा कि मेधावी रोग एवं मृत्युसे रहित है । तब उसकी आयुके निमित्तभूत पर्वतोंको उन्होंने भैंसोंद्वारा विदीर्ण करा दिया ॥ ५२ ॥

सनिमित्ते विनष्टे तु ममार सहसा शिशुः ।

तं मृतं पुत्रमादाय विललाप ततः पिता ॥ ५३ ॥

निमित्तका नाश होते ही उस मुनिकुमारकी सहसा मृत्यु हो गयी । तदनन्तर पिता उस मरे हुए पुत्रको लेकर अत्यन्त विलाप करने लगे ॥ ५३ ॥

लालप्यमानं तं दृष्ट्वा मुनयः परमार्तवत् ।

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ऊचुर्वेदविदः सर्वे गाथां यां तां निबोध मे ॥ ५४ ॥

अधिक पीड़ित मनुष्योंकी भाँति उन्हें विलाप करते देख वहाँके समस्त वेदवेत्ता मुनिगण एकत्र हो जिस गाथाको गाने लगे, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ ५४ ॥

न दिष्टमर्थमत्येतुमीशो मर्त्यः कथंचन ।

महिषैर्भेदयामास धनुषाक्षो महीधरान् ॥ ५५ ॥

‘ मरणधर्मा मनुष्य किसी तरह दैवके विधानका उल्लंघन नहीं कर सकता, तभी तो धनुषाक्षने उस बालककी आयुके निमित्तभूत पर्वतोंका भैंसोंद्वारा भेदन करा दिया' ॥ ५५ ॥

एवं लब्ध्वा वरान् बाला दर्पपूर्णास्तपस्विनः ।

क्षिप्रमेव विनश्यन्ति यथा न स्यात् तथा भवान् ॥ ५६ ॥

इस प्रकार बालक तपस्वी वर पाकर घमण्डमें भर जाते हैं और ( अपने दुर्व्यवहारोंके कारण) शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं । तुम्हारी भी यही अवस्था न हो ( इसलिये सावधान किये देता हूँ) ॥ ५६ ॥

एष रैभ्यो महावीर्यः पुत्रौ चास्य तथाविधौ ।

तं यथा पुत्र नाभ्येषि तथा कुर्यास्त्वतन्द्रितः ॥ ५७ ॥

ये रैभ्यमुनि महान् शक्तिशाली हैं । इनके दोनों पुत्र भी इन्हींके समान हैं । बेटा! तुम उन रैभ्यमुनिके पास कदापि न जाना और आलस्य छोड़कर इसके लिये सदा प्रयत्नशील रहना ॥ ५७ ॥

स हि क्रुद्धः समर्थस्त्वां पुत्र पीडयितुं रुषा ।

रैभ्यश्चापि तपस्वी च कोपनश्च महानृषिः ॥ ५८ ॥

बेटा! तुम्हें सावधान करनेका कारण यह है कि शक्तिशाली तपस्वी महर्षि रैभ्य बड़े क्रोधी हैं । वे कुपित होकर रोषसे तुम्हें पीड़ा दे सकते हैं ॥ ५८ ॥

यवक्रीत उवाच

एवं करिष्ये मा तापं तात कार्षीः कथंचन ।

यथा हि मे भवान् मान्यस्तथा रैभ्यः पिता मम ॥ ५ ९ ॥

यवक्रीत बोले- पिताजी! मैं ऐसा ही करूंगा, आप किसी तरह मनमें संताप न करें ।

जैसे आप मेरे माननीय हैं, वैसे रैभ्यमुनि मेरे लिये पिताके समान हैं ॥ ५ ९ ॥

लोमशउवाच

उक्त्वा स पितरं श्लक्ष्णं यवक्रीरकुतोभयः ।

विप्रकुर्वनृषीनन्यानतुष्यत् परया मुदा ॥ ६० ॥

लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! पितासे यह मीठी बातें कहकर यवक्रीत निर्भय विचरने लगे । दूसरे ऋषियोंको सतानेमें उन्हें अधिक सुख मिलता था । वैसा करके वे बहुत

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संतुष्ट रहते थे ॥ ६० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां यवक्रीतोपाख्याने पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें यवक्रीतोपाख्यानविषयक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३५ ॥

*-इस अन्नको ब्रह्मौदन कहते हैं, जैसा कि श्रुतिका कथन है-— ' साध्येभ्यो देवेभ्यो ब्रह्मौदनमपचत्' इति ।

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षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः यवक्रीतका रैभ्यमुनिकी पुत्रवधूके साथ व्यभिचार और रैभ्यमुनिके क्रोधसे उत्पन्न राक्षसके द्वारा उसकी मृत्यु लोमशउवाच

चङ्क्रम्यमाणः स तदा यवक्रीरकुतोभयः ।

जगाम माधवे मासि रैभ्याश्रमपदं प्रति ॥ १ ॥

लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! उन दिनों यवक्रीत सर्वथा भयशून्य होकर चारों ओर चक्कर लगाता था । एक दिन वैशाखमासमें वह रैभ्यमुनिके आश्रममें गया ॥ १ ॥

स ददर्शाश्रमे रम्ये पुष्पितद्रुमभूषिते ।

विचरन्तीं स्नुषां तस्य किन्नरीमिव भारत ॥ २ ॥

भारत! वह आश्रम खिले हुए वृक्षोंकी श्रेणियोंसे सुशोभित हो अत्यन्त रमणीय प्रतीत होता था । उस आश्रममें रैभ्यमुनिकी पुत्रवधू किन्नरीके समान विचर रही थी । यवक्रीतने उसे देखा ॥ २ ॥

यवक्रीस्तामुवाचेदमुपातिष्ठस्व मामिति ।

निर्लज्जो लज्जया युक्तां कामेन हृतचेतनः ॥ ३ ॥

देखते ही वह कामदेवके वशीभूत हो अपनी विचारशक्ति खो बैठा और लजाती हुई उस मुनि- वधूसे निर्लज्ज होकर बोला- ' सुन्दरी! तू मेरी सेवामें उपस्थित हो' ॥ ३ ॥

सा तस्य शीलमाज्ञाय तस्माच्छापाच्च बिभ्यती ।

तेजस्वितां च रैभ्यस्य तथेत्युक्त्वाऽऽजगाम ह ॥ ४ ॥

वह यवक्रीतके शील स्वभावको जानकर भी उसके शापसे डरती थी । साथ ही उसे रैभ्यमुनिकी तेजस्विताका भी स्मरण था । अतः ' बहुत अच्छा ' कहकर उसके पास चली आयी ॥ ४ ॥

तत एकान्तमुन्नीय मज्जयामास भारत ।

आजगाम तदा रैभ्यः स्वमाश्रममरिंदम ॥ ५ ॥

शत्रुविनाशन भारत! तब यवक्रीतने उसे एकान्तमें ले जाकर पापके समुद्रमें डुबो दिया ।

( उसके साथ रमण किया । ) इतनेहीमें रैभ्यमुनि अपने आश्रममें आ गये ॥ ५ ॥

रुदतीं च स्नुषां दृष्ट्वा भार्यामार्तां परावसोः ।

सान्त्वयन् श्लक्ष्णया वाचा पर्यपृच्छद् युधिष्ठिर ॥ ६ ॥

सा तस्मै सर्वमाचष्ट यवक्रीभाषितं शुभा ।

प्रत्युक्तं च यवक्रीतं प्रेक्षापूर्वं तथाऽऽत्मना ॥ ७ ॥

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आकर उन्होंने देखा कि मेरी पुत्रवधू एवं परावसुकी पत्नी आर्तभावसे रो रही है । युधिष्ठिर! यह देखकर रैभ्यने मधुर वाणीद्वारा उसे सान्त्वना दी तथा रोनेका कारण पूछा । उस शुभलक्षणा बहूने यवक्रीतकी कही हुई सारी बातें श्वशुरके सामने कह सुनायीं एवं स्वयं उसने भलीभाँति सोच - विचारकर यवक्रीतकी बातें माननेसे जो अस्वीकार कर दिया था, वह सारा वृत्तान्त भी बता दिया ॥ ६-७ ॥

शृण्वानस्यैव रैभ्यस्य यवक्रीत विचेष्टितम् ।

दहन्निव तदा चेतः क्रोधः समभवन्महान् ॥ ८ ॥

यवक्रीतकी यह कुचेष्टा सुनते ही रैभ्यके हृदयमें क्रोधकी प्रचण्ड अग्नि प्रज्वलित हो उठी, जो उनके अन्तःकरणको मानो भस्म किये दे रही थी ॥ ८ ॥

स तदा मन्युनाऽऽविष्टस्तपस्वी कोपनो भृशम् ।

अवलुच्य जटामेकां जुहावाग्नौ सुसंस्कृते ॥ ९ ॥

तपस्वी रैभ्य स्वभावसे ही बड़े क्रोधी थे, तिसपर भी उस समय उनके ऊपर क्रोधका आवेश छा रहा था । अतः उन्होंने अपनी एक जटा उखाड़कर संस्कारपूर्वक स्थापित की हुई अग्निमें होम दी ॥ ९ ॥

ततः समभवन्नारी तस्या रूपेण सम्मिता ।

अवलुच्यापरां चापि जुहावाग्नौ जटां पुनः ॥ १० ॥

उससे एक नारीके रूपमें कृत्या प्रकट हुई, जो रूपमें उनकी पुत्रवधूके ही समान थी ।

तत्पश्चात् एक- दूसरी जटा उखाड़कर उन्होंने पुनः उसी अग्निमें डाल दी ॥ १० ॥

ततः समभवद् रक्षो घोराक्षं भीमदर्शनम् ।

अब्रूतां तौ तदा रैभ्यं किं कार्यं करवावहै ॥ ११ ॥

उससे एक राक्षस प्रकट हुआ, जिसकी आँखें बड़ी डरावनी थीं । वह देखनेमें बड़ा भयानक प्रतीत होता था । उस समय उन दोनोंने रैभ्य मुनिसे पूछा - ' हम आपकी किस आज्ञाका पालन करें? ' ॥ ११ ॥

तावब्रवीदृषिः क्रुद्धो यवक्रीर्वध्यतामिति ।

जग्मतुस्तौ तथेत्युक्त्वा यवक्रीतजिघांसया ॥ १२ ॥

तब क्रोधमें भरे हुए महर्षिने कहा - ' यवक्रीतको मार डालो। ' उस समय ' बहुत अच्छा ’ कहकर वे दोनों यवक्रीतके वधकी इच्छासे उसका पीछा करने लगे ॥ १२ ॥

ततस्तं समुपास्थाय कृत्या सृष्टा महात्मना ।

कमण्डलुं जहारास्य मोहयित्वेव भारत ॥ १३ ॥

भारत! महामना रैभ्यकी रची हुई कृत्यारूप सुन्दरी नारीने पहले यवक्रीतके पास उपस्थित हो उसे मोहमें डालकर उसका कमण्डलु हर लिया ॥ १३ ॥

उच्छिष्टं तु यवक्रीतमपकृष्टकमण्डलुम् ।

तत उद्यतशूलः स राक्षसः समुपाद्रवत् ॥ १४ ॥

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कमण्डलु खो जानेसे यवक्रीतका शरीर उच्छिष्ट ( जूठा या अपवित्र) रहने लगा । उस दशामें वह राक्षस हाथमें त्रिशूल उठाये यवक्रीतकी ओर दौड़ा ॥ १४ ॥

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य शूलहस्तं जिघांसया ।

यवक्रीः सहसोत्थाय प्राद्रवद् येन वै सरः ॥ १५ ॥

राक्षस शूल हाथमें लिये मुझे मार डालनेकी इच्छासे मेरी और दौड़ा आ रहा है, यह देखकर यवक्रीत सहसा उठे और उस मार्गसे भागे जो एक सरोवरकी ओर जाता था ॥ १५ ॥

जलहीनं सरो दृष्ट्वा यवक्रीस्त्वरितः पुनः ।

जगाम सरितः सर्वास्ताश्चाप्यासन् विशोषिताः ॥ १६ ॥

इसके जाते ही सरोवरका पानी सूख गया । सरोवरको जलहीन हुआ देख यवक्रीत फिर तुरंत ही समस्त सरिताओंके पास गया; परंतु इसके जानेपर वे सब भी सूख गयीं ॥ १६ ॥

स काल्यमानो घोरेण शूलहस्तेन रक्षसा ।

अग्निहोत्रं पितुर्भीतः सहसा प्रविवेश ह ॥ १७ ॥

तब हाथमें शूल लिये उस भयानक राक्षसके खदेड़नेपर यवक्रीत अत्यन्त भयभीत हो सहसा अपने पिताके अग्निहोत्रगृहमें घुसने लगा ॥ १७ ॥

सवै प्रविशमानस्तु शूद्रेणान्धेन रक्षिणा ।

निगृहीतो बलाद् द्वारि सोऽवातिष्ठत पार्थिव ॥ १८ ॥

राजन्! उस समय अग्निहोत्रगृहके अंदर एक शूद्र जातीय रक्षक नियुक्त था, जिसकी दोनों आँखें अंधी थीं । उसने दरवाजेके भीतर घुसते ही यवक्रीतको बलपूर्वक पकड़ लिया और यवक्रीत वहीं खड़ा हो गया ॥ १८ ॥

निगृहीतं तु शूद्रेण यवक्रीतं स राक्षसः ।

ताडयामास शूलेन स भिन्नहृदयोऽपतत् ॥ १ ९ ॥

शूद्रके द्वारा पकड़े गये यवक्रीतपर उस राक्षसने शूलसे प्रहार किया । इससे उसकी छाती फट गयी और वह प्राणशून्य होकर वहीं गिर पड़ा ॥ १ ९ ॥

यवक्रीतं स हत्वा तु राक्षसो रैभ्यमागमत् ।

अनुज्ञातस्तु रैभ्येण तया नार्या सहावसत् ॥ २० ॥

इस प्रकार यवक्रीतको मारकर राक्षस रैभ्यके पास लौट आया और उनकी आज्ञा ले उस कृत्यास्वरूपा रमणीके साथ उनकी सेवामें रहने लगा ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां यवक्रीतोपाख्याने षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें यवक्रीतोपाख्यानविषयक एक सौ छत्तीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १३६ ॥

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Fut F2I CL) Kos Fas

पृष्ठ 939

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सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः भरद्वाजका पुत्रशोकसे विलाप करना, रैभ्यमुनिको शाप देना एवं स्वयं अग्निमें प्रवेश करना लोमशउवाच

भरद्वाजस्तु कौन्तेय कृत्वा स्वाध्यायमाह्निकम् ।

समित्कलापमादाय प्रविवेश स्वमाश्रमम् ॥ १ ॥

तं स्म दृष्ट्वा पुरा सर्वे प्रत्युत्तिष्ठन्ति पावकाः ।

न त्वेनमुपतिष्ठन्ति हतपुत्रं तदाग्नयः ॥ २ ॥

लोमशजी कहते हैं— कुन्तीनन्दन! भरद्वाज मुनि प्रतिदिनका स्वाध्याय पूरा करके बहुत - सी समिधाएँ लिये आश्रममें आये । उस दिनसे पहले सभी अग्नियाँ उनको देखते ही उठकर स्वागत करती थीं, परंतु उस समय उनका पुत्र मारा गया था, इसलिये अशौचयुक्त होनेके कारण उनका अग्नियोंने पूर्ववत् खड़े होकर स्वागत नहीं किया ॥ १२ ॥

वैकृतं त्वग्निहोत्रे स लक्षयित्वा महातपाः ।

तमन्धं शूद्रमासीनं गृहपालमथाब्रवीत् ॥ ३ ॥

अग्निहोत्रगृहमें यह विकृति देखकर उन महातपस्वी भरद्वाजने वहाँ बैठे हुए अन्धे गृहरक्षक शूद्रसे पूछा— ॥

किं नु मे नाग्नयः शूद्र प्रतिनन्दन्ति दर्शनम् ।

त्वं चापि न यथापूर्वं कच्चित् क्षेममिहाश्रमे ॥। ४ ॥

कच्चिन्न रैभ्यं पुत्रो मे गतवानल्पचेतनः ।

एतदाचक्ष्व मे शीघ्रं न हि शुद्धयति मे मनः ॥ ५ ॥

' दास! क्या कारण है कि आज अग्नियाँ पूर्ववत् मेरा दर्शन करके प्रसन्नता नहीं प्रकट करती हैं । इधर तुम भी पहले जैसे समादरका भाव नहीं दिखाते हो । इस आश्रममें कुशल तो है न? कहीं मेरा मन्दबुद्धि पुत्र रैभ्यके पास तो नहीं चला गया? यह बात मुझे शीघ्र बताओ; क्योंकि मेरा मन शान्त नहीं हो रहा है ' ॥ ५ ॥

शूद्र उवाच

रैभ्यं यातो नूनमयं पुत्रस्ते मन्दचेतनः ।

तथा हि निहतः शेते राक्षसेन बलीयसा ॥ ६ ॥

शूद्र बोला- भगवन्! अवश्य ही आपका यह मन्दमति पुत्र रैभ्यके यहाँ गया था ।

उसीका यह फल है कि एक महाबली राक्षसके द्वारा मारा जाकर पृथ्वीपर पड़ा है ॥ ६ ॥

प्रकाल्यमानस्तेनायं शूलहस्तेन रक्षसा ।

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अग्न्यागारं प्रति द्वारि मया दोर्भ्यां निवारितः ॥ ७ ॥

राक्षस अपने हाथमें शूल लेकर इसका पीछा कर रहा था और यह अग्निशालामें घुसा जा रहा था । उस समय मैंने दोनों हाथोंसे पकड़कर इसे द्वारपर ही रोक लिया ॥ ७ ॥

ततः स विहताशोऽत्र जलकामोऽशुचिर्ध्रुवम् ।

निहतः सोऽतिवेगेन शूलहस्तेन रक्षसा ॥ ८ ॥

निश्चय ही अपवित्र होनेके कारण यह शुद्धिके लिये जल लेनेकी इच्छा रखकर यहाँ आया था, परंतु मेरे रोक देनेसे यह हताश हो गया । उस दशामें उस शूलधारी राक्षसने इसके ऊपर बड़े वेगसे प्रहार करके इसे मार डाला ॥ ८ ॥

भरद्वाजस्तु तच्छ्रुत्वा शूद्रस्य विप्रियं महत् ।

गतासुं पुत्रमादाय विललाप सुदुःखितः ॥ ९ ॥

शूद्रका कहा हुआ यह अत्यन्त अप्रिय वचन सुनकर भरद्वाज बड़े दुखी हो गये और अपने प्राणशून्य पुत्रको लेकर विलाप करने लगे ॥ ९ ॥

भरद्वाज उवाच

ब्राह्मणानां किलार्थाय ननु त्वं तप्तवांस्तपः ।

द्विजानामनधीता वै वेदाः सम्प्रतिभान्त्विति ॥ १० ॥

भरद्वाजने कहा- बेटा! तुमने ब्राह्मणोंके हितके लिये भारी तपस्या की थी । तुम्हारी तपस्याका यह उद्देश्य था कि द्विजोंको बिना पढ़े ही सब वेदोंका ज्ञान हो जाय ॥ १० ॥

तथा कल्याणशीलस्त्वं ब्राह्मणेषु महात्मसु ।

अनागाः सर्वभूतेषु कर्कशत्वमुपेयिवान् ॥ ११ ॥

इस प्रकार महात्मा ब्राह्मणोंके प्रति तुम्हारा स्वभाव अत्यन्त कल्याणकारी था । किसी भी प्राणीके प्रति तुम कोई अपराध नहीं करते थे । फिर भी तुम्हारा स्वभाव कुछ कठोर हो गया था ॥ ११ ॥

प्रतिषिद्धो मया तात रैभ्यावसथदर्शनात् ।

गतवानेव तं द्रष्टुं कालान्तकयमोपमम् ॥ १२ ॥

यः स जानन् महातेजा वृद्धस्यैकं ममात्मजम् ।

गतवानेव कोपस्य वशं परमदुर्मतिः ॥ १३ ॥

तात! मैंने तुम्हें बार- बार मना किया था कि तुम रैभ्यके आश्रमकी ओर न देखना, परंतु तुम उसे देखने चले ही गये और वह तुम्हारे लिये काल, अन्तक एवं यमराजके समान हो गया । महान् तेजस्वी होनेपर भी उसकी बुद्धि बड़ी खोटी है । वह जानता था कि मुझ बूढ़ेके तुम एक ही पुत्र हो तो भी वह दुष्ट क्रोधके वशीभूत हो ही गया ॥ १२-१३ ॥

पुत्रशोकमनुप्राप्त एष रैभ्यस्य कर्मणा ।

त्यक्ष्यामि त्वामृते पुत्र प्राणानिष्टतमान् भुवि ॥ १४ ॥