श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 941–950
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 941–950
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बेटा! आज रैभ्यके इस कठोर कर्मसे मुझे पुत्रशोक प्राप्त हुआ है । तुम्हारे बिना मैं इस पृथ्वीपर अपने परम प्रिय प्राणोंका भी परित्याग कर दूँगा ॥ १४ ॥
यथाहं पुत्रशोकेन देहं त्यक्ष्यामि किल्बिषी ।
तथा ज्येष्ठः सुतो रैभ्यं हिंस्याच्छीघ्रमनागसम् ॥ १५ ॥
जैसे मैं पापी अपने पुत्रके शोकसे व्याकुल हो अपने शरीरका त्याग कर रहा हूँ, उसी प्रकार रैभ्यका ज्येष्ठ पुत्र अपने निरपराध पिताकी शीघ्र हत्या कर डालेगा ॥ १५ ॥
सुखिनो वै नरा येषां जात्या पुत्रो न विद्यते ।
ते पुत्रशोकमप्राप्य विचरन्ति यथासुखम् ॥ १६ ॥
संसारमें वे मनुष्य सुखी हैं, जिन्हें पुत्र पैदा ही नहीं हुआ है; क्योंकि वे पुत्रशोकका अनुभव न करके सदा सुखपूर्वक विचरते हैं ॥ १६ ॥
ये तु पुत्रकृताच्छोकाद् भृशं व्याकुलचेतसः ।
शपन्तीष्टान् सखीनार्तास्तेभ्यः पापतरो नु कः ॥ १७ ॥
जो पुत्रशोकसे मन- ही- मन व्याकुल हो गहरी व्यथाका अनुभव करते हुए अपने प्रिय मित्रोंको भी शाप दे डालते हैं, उनसे बढ़कर महापापी दूसरा कौन हो सकता है? ॥ १७ ॥
परासुश्च सुतो दृष्टः शप्तश्चेष्टः सखा मया ।
ईदृशीमापदं कोऽत्र द्वितीयोऽनुभविष्यति ॥ १८ ॥
मैंने अपने पुत्रकी मृत्यु देखी और प्रिय मित्रको शाप दे दिया । मेरे सिवा संसारमें दूसरा कौन - सा मनुष्य है जो ऐसी विपत्तिका अनुभव करेगा ॥ १८ ॥
लोमशउवाच
विलप्यैवं बहुविधं भरद्वाजोऽदहत् सुतम् ।
सुसमिद्धं ततः पश्चात् प्रविवेश हुताशनम् ॥ १ ९ ॥
लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इस तरह भाँति- भाँतिके विलाप करके भरद्वाजने अपने पुत्रका दाह - संस्कार किया । तत्पश्चात् स्वयं भी वे जलती आगमें प्रवेश कर गये ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां यवक्रीतोपाख्याने सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें यवक्रीतोपाख्यानविषयक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १३७ ॥
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अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः अर्वावसुकी तपस्याके प्रभावसे परावसुका ब्रह्महत्यासे मुक्त होना और रैभ्य, भरद्वाज तथा यवक्रीत आदिका पुनर्जीवित होना लोमशउवाच
एतस्मिन्नेव काले तु बृहद्युम्नो महीपतिः ।
सत्रं तेने महाभागो रैभ्ययाज्यः प्रतापवान् ॥ १ ॥
लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इन्हीं दिनों महान् सौभाग्यशाली एवं प्रतापी नरेश
बृहद्युम्नने एक यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ किया । वे रैभ्यके यजमान थे ॥ १ ॥
तेन रैभ्यस्य वै पुत्रावर्वावसुपरावसू ।
वृतौ सहायौ सत्रार्थं बृहद्युम्नेन धीमता ॥ २ ॥
बुद्धिमान् बृहद्द्द्युम्नने यज्ञकी पूर्तिके लिये रैभ्यके दोनों पुत्र अर्वावसु तथा परावसुको सहयोगी बनाया ॥ २ ॥
तत्र तौ समनुज्ञातौ पित्रा कौन्तेय जग्मतुः ।
आश्रमे त्वभवद् रैभ्यो भार्या चैव परावसोः ॥ ३ ॥
अथावलोककोऽगच्छद् गृहानेकः परावसुः ।
कृष्णाजिनेन संवीतं ददर्श पितरं वने ॥ ४ ॥
कुन्तीनन्दन! पिताकी आज्ञा पाकर वे दोनों भाई राजाके यज्ञमें चले गये । आश्रममें केवल रैभ्य मुनि तथा उनके पुत्र परावसुकी पत्नी रह गयी । एक दिन घरकी देख - भाल करनेके लिये परावसु अकेले ही आश्रमपर आये । उस समय उन्होंने काले मृगचर्मसे ढके हुए अपने पिताको वनमें देखा ॥ ३-४ ॥
जघन्यरात्रे निद्रान्धः सावशेषे तमस्यपि ।
चरन्तं गहनेऽरण्ये मेने स पितरं मृगम् ॥५ ॥
रातका पिछला पहर बीत रहा था और अभी अन्धकार शेष था । परावसु नींदसे अन्धे हो रहे थे; अतः उन्होंने गहन वनमें विचरते हुए अपने पिताको हिंसक पशु ही समझा ॥ ५ ॥
मृगं तु मन्यमानेन पिता वै तेन हिंसितः ।
अकामयानेन तदा शरीरत्राणमिच्छता ॥ ६ ॥
और उसे हिंसक पशु समझकर धोखेसे ही उन्होंने अपने पिताकी हत्या कर डाली । यद्यपि वे ऐसा करना नहीं चाहते थे, तथापि हिंसक पशुसे अपने शरीरकी रक्षाके लिये
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उनके द्वारा यह क्रूरतापूर्ण कार्य बन गया ॥ ॥
तस्य स प्रेतकार्याणि कृत्वा सर्वाणि भारत ।
पुनरागम्य तत् सत्रमब्रवीद् भ्रातरं वचः ॥ ७ ॥
इदं कर्म न शक्तस्त्वं वोढुमेकः कथंचन ।
मया तु हिंसितस्तातो मन्यमानेन तं मृगम् ॥ ८ ॥
सोऽस्मदर्थे व्रतं तात चर त्वं ब्रह्महिंसनम् ।
समर्थोऽप्यहमेकाकी कर्म कर्तुमिदं मुने ॥ ९ ॥
भारत! उसने पिताके समस्त प्रेतकर्म करके पुनः यज्ञमण्डपमें आकर अपने भाई अर्वावसुसे कहा— ‘ भैया! वह यज्ञकर्म तुम अकेले किसी प्रकार निभा नहीं सकते । इधर मैंने हिंसक पशु समझकर धोखेसे पिताजीकी हत्या कर डाली है; इसलिये तात! तुम तो मेरे लिये ब्रह्महत्यानिवारणके हेतु व्रत करो और मैं राजाका यज्ञ कराऊँगा । मुने! मैं अकेला भी इस कार्यका सम्पादन करनेमें समर्थ हूँ' ॥ ७– ९ ॥ अर्वावसुरुवाच
करोतु वै भवान् सत्रं बृहद्युम्नस्य धीमतः ।
ब्रह्मवध्यां चरिष्येऽहं त्वदर्थं नियतेन्द्रियः ॥ १० ॥
अर्वावसु बोले — भाई! आप परम बुद्धिमान् राजा बृहद्द्युम्नका यज्ञकार्य सम्पन्न करें और मैं आपके लिये इन्द्रियसंयमपूर्वक ब्रह्महत्याका प्रायश्चित्त करूँगा ॥ लोमशउवाच
स तस्य ब्रह्मवध्यायाः पारं गत्वा युधिष्ठिर ।
अर्वावसुस्तदा सत्रमाजगाम पुनर्मुनिः ॥ ११ ॥
ततः परावसुर्दृष्ट्वा भ्रातरं समुपस्थितम् ।
बृहद्युम्नमुवाचेदं वचनं हर्षगद्गदम् ॥ १२ ॥
एष ते ब्रह्महा यज्ञं मा द्रष्टुं प्रविशेदिति ।
ब्रह्महा प्रेक्षितेनापि पीडयेत् त्वामसंशयम् ॥ १३ ॥
लोमशजी कहते हैं- युधिष्ठिर! अर्वावसु मुनि भाईके लिये ब्रह्महत्याका प्रायश्चित्त पूरा करके पुनः उस यज्ञमें आये । परावसुने अपने भाईको वहाँ उपस्थित देखकर राजा बृहद्युम्नसे हर्षगद्गद वाणीमें कहा - ' राजन्! यह ब्रह्महत्यारा है । अतः इसे आपका यज्ञ देखनेके लिये इस मण्डपमें प्रवेश नहीं करना चाहिये । ब्रह्मघाती मनुष्य अपनी दृष्टिमात्रसे भी आपको महान् कष्टमें डाल सकता है, इसमें संशय नहीं है ' ॥ ११–१३ ॥ लोमश उवाच तच्छ्रुत्वैव तदा राजा प्रेष्यानाह स विट्पते ।
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प्रेष्यैरुत्सार्यमाणस्तु राजन्नर्वावसुस्तदा ॥ १४ ॥
न मया ब्रह्महत्येयं कृतेत्याह पुनः पुनः ।
उच्चमानोऽसकृत्प्रेष्यैर्ब्रह्मन्निति भारत ॥ १५ ॥
लोमशजी कहते हैं - प्रजानाथ! परावसुकी यह बात सुनते ही राजाने अपने सेवकोंको यह आज्ञा दी कि ' अर्वावसुको भीतर न आने दो। ' राजन्! उस समय सेवकोंद्वारा हटाये जानेपर अर्वावसुने बार- बार यह कहा कि ' मैंने ब्रह्महत्या नहीं की है । ' भारत! तो भी राजाके सेवक उन्हें ब्रह्महत्यारा कहकर ही सम्बोधित करते थे ॥ १४-१५ ॥
नैव स्म प्रतिजानाति ब्रह्मवध्यां स्वयंकृताम् ।
मम भ्रात्रा कृतमिदं मया स परिमोक्षितः ॥ १६ ॥
अर्वावसु किसी तरह उस ब्रह्महत्याको अपनी की हुई स्वीकार नहीं करते थे । उन्होंने बार- बार यही बतानेकी चेष्टा की कि ' मेरे भाईने ब्रह्महत्या की है । मैंने तो प्रायश्चित्त करके उन्हें पापसे छुड़ाया है ' ॥ १६ ॥
स तथा प्रवदन् क्रोधात् तैश्च प्रेष्यैः प्रभाषितः ।
तूष्णीं जगाम ब्रह्मर्षिर्वनमेव महातपाः ॥ १७ ॥
उनके ऐसा कहनेपर भी राजाके सेवकोंने उन्हें क्रोधपूर्वक फटकार दिया । तब वे महातपस्वी ब्रह्मर्षि चुपचाप वनको ही चले गये ॥ १७ ॥
उग्रं तपः समास्थाय दिवाकरमथाश्रितः ।
रहस्यवेदं कृतवान् सूर्यस्य द्विजसत्तमः ॥ १८ ॥
मूर्तिमांस्तं ददर्शाथ स्वयमग्रभुगव्ययः । वहाँ जाकर उन्होंने भगवान् सूर्यकी शरण ली और बड़ी उग्र तपस्या करके उन ब्राह्मणशिरोमणिने सूर्यसम्बन्धी रहस्यमय वैदिक मन्त्रका अनुष्ठान किया । तदनन्तर अग्रभोजी एवं अविनाशी साक्षात् भगवान् सूर्यने साकाररूपमें प्रकट हो अर्वावसुको दर्शन दिया ॥ १८३ ॥
लोमशउवाच प्रीतास्तस्याभवन् देवाः कर्मणार्वावसोर्नृप ॥ १ ९ ॥
तं ते प्रवरयामासुर्निरासुश्च परावसुम् ।
ततो देवा वरं तस्मै ददुरग्निपुरोगमाः ॥ २० ॥
लोमशजी कहते हैं - राजन्! अर्वावसुके उस कार्यसे सूर्य आदि सब देवता उसपर प्रसन्न हो गये । उन्होंने अर्वावसुका यज्ञमें वरण कराया एवं परावसुको निकलवा दिया । तत्पश्चात् अग्नि - सूर्य आदि देवताओंने उन्हें वर देनेकी इच्छा प्रकट की ॥ १ ९ -२० ॥
स चापि वरयामास पितुरुत्थानमात्मनः ।
अनागस्त्वं ततो भ्रातुः पितुश्चास्मरणं वधे ॥ २१ ॥
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तब अर्वावसुने यह वर माँगा कि ' मेरे पिताजी जीवित हो जायँ। मेरे भाई निर्दोष हों और उन्हें पिताके वधकी बात भूल जाय ' ॥ २१ ॥
भरद्वाजस्य चोत्थानं यवक्रीतस्य चोभयोः ।
प्रतिष्ठां चापि वेदस्य सौरस्य द्विजसत्तमः ।
एवमस्त्विति तं देवाः प्रोचुश्चापि वरान् ददुः ॥ २२ ॥
साथ ही उन्होंने यह भी माँगा कि ' भरद्वाज तथा यवक्रीत दोनों जी उठें और इस सूर्यदेवतासम्बन्धी रहस्यमय वेदमन्त्रकी प्रतिष्ठा हो । ' द्विजश्रेष्ठ अर्वावसुके इस प्रकार वर माँगनेपर देवता बोले — ‘ ऐसा ही हो । ' इस प्रकार उन्होंने पूर्वोक्त सभी वर दे दिये ॥ २२ ॥
ततः प्रादुर्बभूवुस्ते सर्व एव युधिष्ठिर ।
अथाब्रवीद् यवक्रीतो देवानग्निपुरोगमान् ॥ २३ ॥
समधीतं मया ब्रह्म व्रतानि चरितानि च ।
कथं च रैभ्यः शक्तो मामधीयानं तपस्विनम् ॥ २४ ॥
तथायुक्तेन विधिना निहन्तुममरोत्तमाः । युधिष्ठिर! इसके बाद पूर्वोक्त सभी मुनि जीवित हो गये । उस समय यवक्रीतने अग्नि आदि सम्पूर्ण देवताओंसे पूछा— ' देवेश्वरो! मैंने वेदका अध्ययन किया है, वेदोक्त व्रतोंका अनुष्ठान भी किया है । मैं स्वाध्यायशील और तपस्वी भी हूँ, तो भी रैभ्यमुनि इस प्रकार अनुचित रीतिसे मेरा वध करनेमें कैसे समर्थ हो सके ' ॥ २३-२४ ॥ देवा ऊचुः
मैवं कृथा यवक्रीत यथा वदसि वै मुने ।
ऋते गुरुमधीता हि सुखं वेदास्त्वया पुरा ॥ २५ ॥
अनेन तु गुरून् दुःखात् तोषयित्वाऽऽत्मकर्मणा ।
कालेन महता क्लेशाद् ब्रह्माधिगतमुत्तमम् ॥ २६ ॥
देवताओंने कहा – मुनि यवक्रीत! तुम जैसी बात कहते हो, वैसा न समझो । तुमने पूर्वकालमें बिना गुरुके ही सुखपूर्वक सब वेद पढ़े हैं और इन रैभ्यमुनिने बड़े क्लेश उठाकर अपने व्यवहारसे गुरुजनोंको संतुष्ट करके दीर्घकालतक कष्टसहनपूर्वक उत्तम वेदोंका ज्ञान प्राप्त किया है ॥ २५-२६ ॥ लोमशउवाच
यवक्रीतमथोक्त्वैवं देवाः साग्निपुरोगमाः ।
संजीवयित्वा तान् सर्वान् पुनर्जग्मुस्त्रिविष्टपम् ॥ २७ ॥
लोमशजी कहते हैं— राजन्! अग्नि आदि देवताओंने यवक्रीतसे ऐसा कहकर उन सबको नूतन जीवन प्रदान करके पुनः स्वर्गलोकको प्रस्थान किया ॥ २७ ॥
आश्रमस्तस्य पुण्योऽयं सदापुष्पफलद्रुमः ।
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अत्रोष्य राजशार्दूल सर्वं पापं प्रमोक्ष्यसि ॥ २८ ॥
नृपश्रेष्ठ! यह उन्हीं रैभ्यमुनिका पवित्र आश्रम है । यहाँके वृक्ष सदा फूल और फलोंसे लदे रहते हैं । यहाँ एक रात निवास करके तुम सब पापोंसे छूट जाओगे ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां यवक्रीतोपाख्याने अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३८ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें यवक्रीतोपाख्यानविषयक एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३८ ॥
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एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवोंकी उत्तराखण्ड - यात्रा और लोमशजीद्वारा उसकी दुर्गमताका कथन लोमशउवाच
उशीरबीजं मैनाकं गिरिं श्वेतं च भारत ।
समतीतोऽसि कौन्तेय कालशैलं च पार्थिव ॥ १ ॥
लोमशजी कहते हैं- भरतनन्दन युधिष्ठिर! अब तुम उशीरबीज, मैनाक, श्वेत और कालशैल नामक पहाड़ोंको लाँघकर आगे बढ़ आये ॥ १ ॥
एषा गङ्गा सप्तविधा राजते भरतर्षभ ।
स्थानं विरजसं पुण्यं यत्राग्निर्नित्यमिध्यते ॥ २ ॥
भरतश्रेष्ठ! यह देखो गंगाजी सात धाराओंसे सुशोभित हो रही हैं । यह रजोगुणरहित पुण्यतीर्थ है, जहाँ सदा अग्निदेव प्रज्वलित रहते हैं ॥ २ ॥
एतद् वै मानुषेणाद्य न शक्यं द्रष्टुमद्भुतम् ।
समाधिं कुरुताव्यग्रास्तीर्थान्येतानि द्रक्ष्यथ ॥ ३ ॥
यह अद्भुत तीर्थ कोई मनुष्य नहीं देख सकता, अतः तुम सब लोग एकाग्रचित्त हो जाओ । व्यग्रताशून्य हृदयसे तुम इन सब तीर्थोंका दर्शन कर सकोगे ॥ ३ ॥
एतद् द्रक्ष्यसि देवानामाक्रीडं चरणाङ्कितम् ।
अतिक्रान्तोऽसि कौन्तेय कालशैलं च पर्वतम् ॥ ४ ॥
श्वेतं गिरिं प्रवेक्ष्यामो मन्दरं चैव पर्वतम् ।
यत्र माणिवरो यक्षः कुबेरश्चैव यक्षराट् ॥ ५ ॥
यह देवताओंकी क्रीडास्थली है, जो उनके चरणचिह्नोंसे अंकित है । एकाग्रचित्त होनेपर तुम्हें इसका भी दर्शन होगा । कुन्तीकुमार! अब तुम कालशैल पर्वतको लाँघकर आगे बढ़ आये । इसके बाद हम श्वेतगिरि ( कैलास ) तथा मन्दराचल पर्वतमें प्रवेश करेंगे, जहाँ माणिवर यक्ष और यक्षराज कुबेर निवास करते हैं ॥
अष्टाशीतिसहस्राणि गन्धर्वाः शीघ्रगामिनः ।
तथा किंपुरुषा राजन् यक्षाश्चैव चतुर्गुणाः ॥ ६ ॥
अनेकरूपसंस्थाना नानाप्रहरणाश्च ते ।
यक्षेन्द्रं मनुजश्रेष्ठ माणिभद्रमुपासते ॥ ७ ॥
राजन्! वहाँ तीव्रगतिसे चलनेवाले अट्ठासी हजार गन्धर्व और उनसे चौगुने किन्नर तथा यक्ष रहते हैं । उनके रूप एवं आकृति अनेक प्रकारकी हैं । वे भाँति- भाँतिके अस्त्र- शस्त्र
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धारण करते हैं और यक्षराज माणिभद्रकी उपासनामें संलग्न रहते हैं ॥ ६-७ ॥
तेषामृद्धिरतीवात्र गतौ वायुसमाश्च ते ।
स्थानात् प्रच्यावयेयुर्ये देवराजमपि ध्रुवम् ॥ ८ ॥
यहाँ उनकी समृद्धि अतिशय बढ़ी हुई है । तीव्रगतिमें वे वायुकी समानता करते हैं । वे चाहें तो देवराज इन्द्रको भी निश्चय ही अपने स्थानसे हटा सकते हैं ॥ ८ ॥
तैस्तात बलिभिर्गुप्ता यातुधानैश्च रक्षिताः ।
दुर्गमाः पर्वताः पार्थ समाधिं परमं कुरु ॥ ९ ॥
तात युधिष्ठिर! उन बलवान् यक्ष और राक्षसोंसे सुरक्षित रहनेके कारण ये पर्वत बड़े दुर्गम हैं । अतः तुम विशेषरूपसे एकाग्रचित्त हो जाओ ॥ ९ ॥
कुबेरसचिवाश्चान्ये रौद्रा मैत्राश्च राक्षसाः ।
तैः समेष्याम कौन्तेय संयतो विक्रमेण च ॥ १० ॥
कुबेरके सचिवगण तथा अन्य रौद्र और मैत्र नामक राक्षसोंका हमें सामना करना पड़ेगा; अतः तुम पराक्रमके लिये तैयार रहो ॥ १० ॥
कैलासः पर्वतो राजन् षड्योजनसमुच्छ्रितः ।
यत्र देवा समायान्ति विशाला यत्र भारत ॥ ११ ॥
राजन्! उधर छः योजन ऊँचा कैलासपर्वत दिखायी देता है जहाँ देवता आया करते हैं ।
भारत! उसीके निकट विशालापुरी ( बदरिकाश्रमतीर्थ) है ॥ ११ ॥
असंख्येयास्तु कौन्तेय यक्षराक्षसकिन्नराः ।
नागाः सुपर्णा गन्धर्वाः कुबेरसदनं प्रति ॥ १२ ॥
कुन्तीनन्दन! कुबेरके भवनमें अनेक यक्ष, राक्षस, किन्नर, नाग, सुपर्ण तथा गन्धर्व निवास करते हैं ॥ १२ ॥
तान् विगाहस्व पार्थाद्य तपसा च दमेन च ।
रक्ष्यमाणो मया राजन् भीमसेनबलेन च ॥ १३ ॥
महाराज कुन्तीनन्दन! तुम भीमसेनके बल और मेरी तपस्यासे सुरक्षित हो तप एवं इन्द्रियसंयमपूर्वक रहते हुए आज उन तीर्थोंमें स्नान करो ॥ १३ ॥
स्वस्ति ते वरुणो राजा यमश्च समितिंजयः ।
गङ्गा च यमुना चैव पर्वतश्च दधातु ते ॥ १४ ॥
राजा वरुण, युद्धविजयी यमराज, गंगा- यमुना तथा यह पर्वत तुम्हें कल्याण प्रदान करें ॥ १४ ॥
मरुतश्च सहाश्विभ्यां सरितश्च सरांसि च ।
स्वस्ति देवासुरेभ्यश्च वसुभ्यश्च महाद्युते ॥ १५ ॥
महाद्युते! मरुद्गण, अश्विनीकुमार, सरिताएँ और सरोवर भी तुम्हारा मंगल करें ।
देवताओं, असुरों तथा वसुओंसे भी तुम्हें कल्याणकी प्राप्ति हो ॥ १५ ॥
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इन्द्रस्य जाम्बूनदपर्वताद् वै शृणोमि घोषं तव देवि गङ्गे । गोपायैनं त्वं सुभगे गिरिभ्यः सर्वाजमीढापचितं नरेन्द्रम् ॥ १६ ॥
देवि गंगे! मैं इन्द्रके सुवर्णमय मेरुपर्वतसे तुम्हारा कलकलनाद सुन रहा हूँ । सौभाग्यशालिनि! ये राजा युधिष्ठिर अजमीढवंशी क्षत्रियोंके लिये आदरणीय हैं। तुम पर्वतोंसे इनकी रक्षा कराओ ॥ १६ ॥
ददस्व शर्म प्रविविक्षतोऽस्य शैलानिमाञ्छैलसुते नृपस्य । उक्त्वा तथा सागरगां स विप्रो यत्तो भवस्वेति शशास पार्थम् ॥ १७ ॥
‘ शैलपुत्रि! ये इन पर्वतमालाओंमें प्रवेश करना चाहते हैं। तुम इन्हें कल्याण प्रदान करो । ' समुद्रगामिनी गंगानदीसे ऐसा कहकर विप्रवर लोमशने कुन्तीकुमार युधिष्ठिरको यह आदेश दिया कि ‘ अब तुम एकाग्रचित्त हो जाओ ' ॥ १७ ॥
युधिष्ठिर उवाच अपूर्वोऽयं सम्भ्रमो लोमशस्य कृष्णां च सर्वे रक्षत मा प्रमादम् । देशो ह्ययं दुर्गतमो मतोऽस्य तस्मात् परं शौचमिहाचरध्वम् ॥ १८ ॥
युधिष्ठिर बोले- बन्धुओ! आज महर्षि लोमशको बड़ी घबराहट हो रही है । यह एक अभूतपूर्व घटना है । अतः तुम सब लोग सावधान होकर द्रौपदीकी रक्षा करो । प्रमाद न करना । लोमशजीका मत है कि यह प्रदेश अत्यन्त दुर्गम है । अतः यहाँ अत्यन्त शुद्ध आचार- विचारसे रहो ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच ततोऽब्रवीद् भीममुदारवीर्यं कृष्णां यत्तः पालय भीमसेन । शून्येऽर्जुनेऽसंनिहिते च तात त्वामेव कृष्णा भजते भयेषु ॥ १ ९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिर महाबली भीमसे इस प्रकार बोले — ‘ भैया भीमसेन! तुम सावधान रहकर द्रौपदीकी रक्षा करो । तात! किसी निर्जन प्रदेशमें जबकि अर्जुन हमारे समीप नहीं हैं भयका अवसर उपस्थित होनेपर द्रौपदी तुम्हारा ही आश्रय लेती है ' ॥ १ ९ ॥
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ततो महात्मा स यमौ समेत्य मूर्धन्युपाघ्राय विमृज्य गात्रे । उवाच तौ बाष्पकलं स राजा मा भैष्टमागच्छतमप्रमत्तौ ॥ २० ॥
तत्पश्चात् महात्मा राजा युधिष्ठिरने नकुल सहदेवके पास जाकर उनका मस्तक सूँघा और शरीरपर हाथ फेरा । फिर नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए कहा- ' भैया! तुम दोनों भय न करो और सावधान होकर आगे बढ़ो ' ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां कैलासादिगिरिप्रवेशे एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें पाण्डवोंका कैलास आदि पर्वतमालाओंमें प्रवेशविषयक एक सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३९ ॥