03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 1901–1910

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1901–1910

पृष्ठ 1901

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षट्षष्टितमोऽध्यायः नारायणावतार श्रीकृष्ण एवं नरावतार अर्जुनकी महिमाका प्रतिपादन भीष्म उवाच

ततः स भगवान् देवो लोकानामीश्वरेश्वरः ।

ब्रह्माणं प्रत्युवाचेदं स्निग्धगम्भीरया गिरा ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं— दुर्योधन! तब लोकेश्वरोंके भी ईश्वर दिव्यरूपधारी श्रीभगवान्ने स्नेहमधुर गम्भीर वाणीमें ब्रह्माजीसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

विदितं तात योगासे सर्वमेतत् तवेप्सितम् ।

तथा तद् भवितेत्युक्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥ २ ॥

‘ तात! तुम्हारे मनमें जैसी इच्छा है, वह सब मुझे योगबलसे ज्ञात हो गयी है । उसके अनुसार ही सब कार्य होगा' – ऐसा कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ २ ॥

ततो देवर्षिगन्धर्वा विस्मयं परमं गताः ।

कौतूहलपराः सर्वे पितामहमथाब्रुवन् ॥ ३ ॥

तब देवता, ऋषि और गन्धर्व सभी बड़े विस्मयमें पड़े । उन सबने अत्यन्त उत्सुक होकर पितामह ब्रह्माजीसे कहा- ॥ ३ ॥

पृष्ठ 1902

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को न्वयं यो भगवता प्रणम्य विनयाद् विभो ।

वाग्भिः स्तुतो वरिष्ठाभिः श्रोतुमिच्छाम तं वयम् ॥ ४ ॥

‘ प्रभो! आपने विनयपूर्वक प्रणाम करके श्रेष्ठ वचनोंद्वारा जिनकी स्तुति की है, ये कौन थे? हम उनके विषयमें सुनना चाहते हैं' ॥ ४ ॥

एवमुक्तस्तु भगवान् प्रत्युवाच पितामहः ।

देवब्रह्मर्षिगन्धर्वान् सर्वान् मधुरया गिरा ॥ ५ ॥

उनके इस प्रकार पूछनेपर भगवान् ब्रह्माने उन समस्त देवताओं, ब्रह्मर्षियों और गन्धर्वोंसे मधुर वाणीमें कहा— ॥ ५ ॥

यत् तत् परं भविष्यं च भवितव्यं च यत्परम् ।

भूतात्मा च प्रभुश्चैव ब्रह्म यच्च परं पदम् ॥ ६ ॥

तेनास्मि कृतसंवादः प्रसन्नेन सुरर्षभाः ।

जगतोऽनुग्रहार्थाय याचितो मे जगत्पतिः ॥ ७ ॥

मानुषं लोकमातिष्ठ वासुदेव इति श्रुतः ।

असुराणां वधार्थाय सम्भवस्व महीतले ॥ ८ ॥

‘ श्रेष्ठ देवताओ! जो परम तत्त्व हैं, भूत, भविष्य और वर्तमान- तीनों जिनके उत्कृष्ट स्वरूप हैं तथा जो इन सबसे विलक्षण हैं, जिन्हें सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा और सर्वशक्तिमान् प्रभु कहा गया है, जो परम ब्रह्म और परम पदके नामसे विख्यात हैं, उन्हीं परमात्माने मुझे

पृष्ठ 1903

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दर्शन देकर मुझसे प्रसन्न हो बातचीत की है । मैंने उन जगदीश्वरसे सम्पूर्ण जगत्पर कृपा करनेके लिये यों प्रार्थना की है कि प्रभो! आप वासुदेव नामसे विख्यात होकर कुछ कालतक मनुष्यलोकमें रहें और असुरोंके वधके लिये इस भूतलपर अवतीर्ण हों ॥ ६— ८ ॥

संग्रामे निहता ये ते दैत्यदानवराक्षसाः ।

त इमे नृषु सम्भूता घोररूपा महाबलाः ॥ ९ ॥

‘ जो- जो दैत्य, दानव तथा राक्षस संग्रामभूमिमें मारे गये थे, वे मनुष्यलोकमें उत्पन्न हुए हैं और अत्यन्त बलवान् होकर जगत्के लिये भयंकर बन बैठे हैं ॥ ९ ॥

तेषां वधार्थं भगवान् नरेण सहितो वशी ।

मानुषीं योनिमास्थाय चरिष्यति महीतले ॥ १० ॥

‘ उन सबका वध करनेके लिये सबको वशमें करनेवाले भगवान् नारायण नरके साथ मनुष्ययोनिमें अवतीर्ण होकर भूतलपर विचरेंगे ॥ १० ॥

नरनारायणौ यौ तौ पुराणावृषिसत्तमौ ।

सहितौ मानुषे लोके सम्भूतावमितद्युती । ११ ॥

'ऋषियोंमें श्रेष्ठ जो पुरातन महर्षि अमित तेजस्वी नर और नारायण हैं, वे एक साथ मानवलोकमें अवतीर्ण होंगे ॥

अजेयौ समरे यत्तौ सहितैरमरैरपि ।

मूढास्त्वेतौ न जानन्ति नरनारायणावृषी ॥ १२ ॥

‘ युद्धभूमिमें यदि वे विजयके लिये यत्नशील हों तो सम्पूर्ण देवता भी उन्हें परास्त नहीं कर सकते । मूढ़ मनुष्य उन नर - नारायण ऋषिको नहीं जान सकेंगे ॥

तस्याहमग्रजः पुत्रः सर्वस्य जगतः प्रभुः ।

वासुदेवोऽर्चनीयो वः सर्वलोकमहेश्वरः ॥ १३ ॥

' सम्पूर्ण जगत्का स्वामी मैं ब्रह्मा उन भगवान्‌का ज्येष्ठ पुत्र हूँ । तुम सब लोगोंको उन सर्वलोकमहेश्वर भगवान् वासुदेवकी आराधना करनी चाहिये ॥ १३ ॥

तथा मनुष्योऽयमिति कदाचित् सुरसत्तमाः ।

नावज्ञेयो महावीर्यः शङ्खचक्रगदाधरः ॥ १४ ॥

' सुरश्रेष्ठगण! शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले उन महापराक्रमी भगवान् वासुदेवका ‘ ये मनुष्य हैं ' ऐसा समझकर अनादर नहीं करना चाहिये ॥ १४ ॥

एतत् परमकं गुह्यमेतत् परमकं पदम् ।

एतत् परमकं ब्रह्म एतत् परमकं यशः ॥ १५ ॥

एतदक्षरमव्यक्तमेतद् वै शाश्वतं महः । ' ये भगवान् ही परम गुह्य हैं । ये ही परम पद हैं । ये ही परम ब्रह्म हैं । ये ही परम यश हैं और ये ही अक्षर, अव्यक्त एवं सनातन तेज हैं ॥ १५३ ॥

पृष्ठ 1904

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यत् तत् पुरुषसंज्ञं वै गीयते ज्ञायते न च ॥ १६ ॥

एतत् परमकं तेज एतत् परमकं सुखम् ।

एतत् परमकं सत्यं कीर्तितं विश्वकर्मणा ॥ १७ ॥

‘ ये ही पुरुष नामसे कहे जाते हैं, किंतु इनका वास्तविक रूप जाना नहीं जा सकता । ये ही विश्वस्रष्टा ब्रह्माजीके द्वारा परम सुख, परम तेज और परम सत्य कहे गये हैं ॥ १६-१७ ॥

तस्मात् सेन्द्रैः सुरैः सर्वैर्लोकैश्चामितविक्रमः ।

नावज्ञेयो वासुदेवो मानुषोऽयमिति प्रभुः ॥ १८ ॥

' इसलिये ' ये मनुष्य हैं, ' ऐसा समझकर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओं तथा संसारके मनुष्योंको अमित पराक्रमी भगवान् वासुदेवकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये ॥

यश्च मानुषमात्रोऽयमिति ब्रूयात् स मन्दधीः ।

हृषीकेशमवज्ञानात् तमाहुः पुरुषाधमम् ॥ १ ९ ॥

‘ जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी इन भगवान् वासुदेवको केवल मनुष्य कहता है, वह मूर्ख है । भगवान्की अवहेलना करनेके कारण उसे नराधम कहा गया है ॥ १ ९ ॥

योगिनं तं महात्मानं प्रविष्टं मानुषीं तनुम् ।

अवमन्येद् वासुदेवं तमाहुस्तामसं जनाः ॥ २० ॥

‘ भगवान् वासुदेव साक्षात् परमात्मा हैं और योगशक्तिसे सम्पन्न होनेके कारण उन्होंने मानव- शरीरमें प्रवेश किया है । जो उनकी अवहेलना करता है, उसे ज्ञानी पुरुष तमोगुणी बताते हैं ॥ २० ॥

देवं चराचरात्मानं श्रीवत्साङ्कं सुवर्चसम् ।

पद्मनाभं च जानाति तमाहुस्तामसं बुधाः ॥ २१ ॥

‘ जो चराचरस्वरूप श्रीवत्सचिह्नभूषित उत्तम कान्तिसे सम्पन्न भगवान् पद्मनाभको नहीं जानता, उसे विद्वान् पुरुष तमोगुणी कहते हैं ॥ २१ ॥

किरीटकौस्तुभधरं मित्राणामभयंकरम् ।

अवजानम् महात्मानं घोरे तमसि मज्जति ॥ २२ ॥

'जो किरीट और कौस्तुभमणि धारण करनेवाले तथा मित्रों ( भक्तजनों) -को अभय देनेवाले हैं, उन परमात्माकी अवहेलना करनेवाला मनुष्य घोर नरकमें डूबता है ॥ २२ ॥

एवं विदित्वा तत्त्वार्थं लोकानामीश्वरेश्वरः ।

वासुदेवो नमस्कार्यः सर्वलोकैः सुरोत्तमाः ॥ २३ ॥

' सुरश्रेष्ठगण! इस प्रकार तात्त्विक वस्तुको समझकर सब लोगोंको लोकेश्वरोंके भी ईश्वर भगवान् वासुदेवको नमस्कार करना चाहिये ' ॥ २३ ॥

भीष्म उवाच

पृष्ठ 1905

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एवमुक्त्वा स भगवान् देवान् सर्षिगणान् पुरा ।

विसृज्य सर्वभूतात्मा जगाम भवनं स्वकम् ॥ २४ ॥

भीष्मजी कहते हैं - दुर्योधन! देवताओं तथा ऋषियोंसे ऐसा कहकर पूर्वकालमें सर्वभूतात्मा भगवान् ब्रह्माने उन सबको विदा कर दिया । फिर वे अपने लोकको चले गये ॥ २४ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वा मुनयोऽप्सरसोऽपि च ।

कथां तां ब्रह्मणा गीतां श्रुत्वा प्रीता दिवं ययुः ॥ २५ ॥

तत्पश्चात् ब्रह्माजीकी कही हुई उस परमार्थ- चर्चाको सुनकर देवता, गन्धर्व, मुनि और अप्सराएँ — ये सभी प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गलोकमें चले गये ॥ २५ ॥

एतच्छ्रुतं मया तात ऋषीणां भावितात्मनाम् ।

वासुदेवं कथयतां समवाये पुरातनम् ॥ २६ ॥

तात! एक समय शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षियोंका एक समाज जुटा हुआ था, जिसमें वे पुरातन भगवान् वासुदेवकी माहात्म्य- कथा कह रहे थे । उन्हींके मुँहसे मैंने ये सब बातें सुनी हैं ॥ २६ ॥

रामस्य जामदग्न्यस्य मार्कण्डेयस्य धीमतः ।

व्यासनारदयोश्चापि सकाशाद् भरतर्षभ ॥ २७ ॥

भरतश्रेष्ठ! इसके सिवा जमदग्निनन्दन परशुराम, बुद्धिमान् मार्कण्डेय, व्यास तथा नारदसे भी मैंने यह बात सुनी है ॥ २७ ॥

एतमर्थं च विज्ञाय श्रुत्वा च प्रभुमव्ययम् ।

वासुदेवं महात्मानं लोकानामीश्वरेश्वरम् ॥ २८ ॥

(जानामि भरतश्रेष्ठ कृष्णं नारायणं प्रभुम् । ) भरतकुलभूषण! इस विषयको सुन और समझकर मैं वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको अविनाशी प्रभु परमात्मा लोकेश्वरेश्वर और सर्वशक्तिमान् नारायण जानता हूँ ॥ २८ ॥

यस्य चैवात्मजो ब्रह्मा सर्वस्य जगतः पिता ।

कथं न वासुदेवोऽयमर्च्यश्चेज्यश्च मानवैः ॥ २९ ॥

सम्पूर्ण जगत्के पिता ब्रह्मा जिनके पुत्र हैं, वे भगवान् वासुदेव मनुष्योंके लिये आराधनीय तथा पूजनीय कैसे नहीं हैं? ॥ २ ९ ॥

वारितोऽसि मया तात मुनिभिर्वेदपारगैः ।

मा गच्छ संयुगं तेन वासुदेवेन धन्विना ॥ ३० ॥

मा पाण्डवैः सार्धमिति तत् त्वं मोहान्न बुध्यसे ।

मन्ये त्वां राक्षसं क्रूरं तथा चासि तमोवृतः ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1906

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तात! वेदोंके पारंगत विद्वान् महर्षियोंने तथा मैंने तुमको मना किया था कि तुम धनुर्धर भगवान् वासुदेवके साथ विरोध न करो, पाण्डवोंके साथ लोहा न लो; परंतु मोहवश तुमने इन बातोंका कोई मूल्य नहीं समझा। मैं समझता हूँ, तुम कोई क्रूर राक्षस हो; क्योंकि राक्षसोंके ही समान तुम्हारी बुद्धि सदा तमोगुणसे आच्छन्न रहती है ॥ ३०-३१ ॥

यस्माद् द्विषसि गोविन्दं पाण्डवं तं धनंजयम् ।

नरनारायणौ देवौ कोऽन्यो द्विष्याद्धि मानवः ॥ ३२ ॥

तुम भगवान् गोविन्द तथा पाण्डुनन्दन धनंजयसे द्वेष करते हो । वे दोनों ही नर और नारायण देव हैं । तुम्हारे सिवा दूसरा कौन मनुष्य उनसे द्वेष कर सकता है? ॥ ३२ ॥

तस्माद् ब्रवीमि ते राजन्नेष वै शाश्वतोऽव्ययः ।

सर्वलोकमयो नित्यः शास्ता धात्रीधरो ध्रुवः ॥ ३३ ॥

राजन्! इसलिये तुम्हें यह बता रहा हूँ कि ये भगवान् श्रीकृष्ण सनातन, अविनाशी, सर्वलोकस्वरूप, नित्य शासक, धरणीधर एवं अविचल हैं ॥ ३३ ॥

यो धारयति लोकांस्त्रींश्चराचरगुरुः प्रभुः ।

योद्धा जयश्च जेता च सर्वप्रकृतिरीश्वरः ॥ ३४ ॥

ये चराचरगुरु भगवान् श्रीहरि तीनों लोकोंको धारण करते हैं । ये ही योद्धा हैं, ये ही

विजय हैं और ये ही विजयी हैं । सबके कारणभूत परमेश्वर भी ये ही हैं ॥ ३४ ॥

राजन् सर्वमयो ह्येष तमोरागविवर्जितः ।

यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः ॥ ३५ ॥

राजन्! ये श्रीहरि सर्वस्वरूप और तम एवं रागसे रहित हैं । जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ धर्म है और जहाँ धर्म है, वहीं विजय है ॥ ३५ ॥

तस्य माहात्म्ययोगेन योगेनात्ममयेन च ।

धृताः पाण्डुसुता राजन् जयश्चैषां भविष्यति ॥ ३६ ॥

उनके माहात्म्ययोगसे तथा आत्मस्वरूपयोगसे समस्त पाण्डव सुरक्षित हैं । राजन्! इसीलिये इनकी विजय होगी ॥ ३६ ॥

श्रेयोयुक्तां सदा बुद्धिं पाण्डवानां दधाति यः ।

बलं चैव रणे नित्यं भयेभ्यश्चैव रक्षति ॥ ३७ ॥

वे पाण्डवोंको सदा कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करते हैं, युद्धमें बल देते हैं और भयसे नित्य उनकी रक्षा करते हैं ॥ ३७ ॥

स एष शाश्वतो देवः सर्वगुह्यमयः शिवः ।

वासुदेव इति ज्ञेयो यन्मां पृच्छसि भारत ॥ ३८ ॥

भारत! जिनके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे हो, वे सनातन देवता सर्वगुह्यमय कल्याणस्वरूप परमात्मा ही ' वासुदेव' नामसे जाननेयोग्य हैं ॥ ३८ ॥

ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैश्च कृतलक्षणैः ।

पृष्ठ 1907

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सेव्यतेऽभ्यर्च्यते चैव नित्ययुक्तैः स्वकर्मभिः ॥ ३ ९ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुभ लक्षणसम्पन्न शूद्र- ये सभी नित्य तत्पर होकर अपने कर्मोंद्वारा इन्हींकी सेवा - पूजा करते हैं ॥ ३ ९ ॥

द्वापरस्य युगस्यान्ते आदौ कलियुगस्य च ।

सात्वतं विधिमास्थाय गीतः संकर्षणेन वै ॥ ४० ॥

(कृष्णेति नाम्ना विख्यात इमं लोकं स रक्षति । ) द्वापरयुगके अन्त और कलियुगके आदिमें संकर्षणने श्रीकृष्णोपासनाकी विधिका आश्रय ले इन्हींकी महिमाका गान किया है । ये ही श्रीकृष्णनामसे विख्यात होकर इस लोककी रक्षा करते हैं ॥ ४० ॥

स एष सर्वं सुरमर्त्यलोकं समुद्रकक्ष्यान्तरितां पुरीं च । युगे युगे मानुषं चैव वासं पुनः पुनः सृजते वासुदेवः ॥ ४१ ॥

ये भगवान् वासुदेव ही युग- युगमें देवलोक, मर्त्यलोक तथा समुद्रसे घिरी हुई द्वारिका नगरीका निर्माण करते हैं और ये ही बारंबार मनुष्यलोकमें अवतार ग्रहण करते हैं ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि विश्वोपाख्याने षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें विश्वोपाख्यानविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥

[ दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४२ श्लोक हैं । ]

पृष्ठ 1908

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सप्तषष्टितमोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णकी महिमा दुर्योधन उवाच

वासुदेवो महद् भूतं सर्वलोकेषु कथ्यते ।

तस्यागमं प्रतिष्ठां च ज्ञातुमिच्छे पितामह ॥ १ ॥

दुर्योधनने पूछा- पितामह! वासुदेव श्रीकृष्णको सम्पूर्ण लोकोंमें महान् बताया जाता है; अतः मैं उनकी उत्पत्ति और स्थितिके विषयमें जानना चाहता हूँ ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

वासुदेवो महद् भूतं सर्वदैवतदैवतम् ।

न परं पुण्डरीकाक्षाद् दृश्यते भरतर्षभ ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा- भरतश्रेष्ठ! वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण वास्तवमें महान् हैं । वे सम्पूर्ण

देवताओंके भी देवता हैं । कमलनयन श्रीकृष्णसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है ॥ २ ॥

मार्कण्डेयश्च गोविन्दे कथयत्यद्भुतं महत् ।

सर्वभूतानि भूतात्मा महात्मा पुरुषोत्तमः ॥ ३ ॥

पृष्ठ 1909

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आपो वायुश्च तेजश्च त्रयमेतदकल्पयत् । मार्कण्डेयजी भगवान् गोविन्दके विषयमें अत्यन्त अद्भुत बातें कहते हैं। वे भगवान् ही सर्वभूतमय हैं और वे ही सबके आत्मस्वरूप महात्मा पुरुषोत्तम हैं । सृष्टिके आरम्भमें इन्हीं परमात्माने जल, वायु और तेज- इन तीन भूतों तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि की थी ॥ ३ ॥ स सृष्ट्वा पृथिवीं देवीं सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ॥ ४ ॥

अप्सु वै शयनं चक्रे महात्मा पुरुषोत्तमः ।

सर्वतेजोमयो देवो योगात् सुष्वाप तत्र ह ॥ ५ ॥

सम्पूर्ण लोकोंके ईश्वर इन भगवान् श्रीहरिने पृथ्वीदेवी की सृष्टि करके जलमें शयन किया । वे महात्मा पुरुषोत्तम सर्वतेजोमय देवता योगशक्तिसे उस जलमें सोये ॥ ४-५ ॥

मुखतः सोऽग्निमसृजत् प्राणाद् वायुमथापि च ।

सरस्वतीं च वेदांश्च मनसः ससृजेऽच्युतः ॥ ६ ॥

उन अच्युतने अपने मुखसे अग्निकी, प्राणसे वायुकी तथा मनसे सरस्वतीदेवी और वेदोंकी रचना की ॥ ६ ॥

एष लोकान् ससर्जादौ देवांश्च ऋषिभिः सह ।

निधनं चैव मृत्युं च प्रजानां प्रभवाप्ययौ ॥ ७ ॥

इन्होंने ही सर्गके आरम्भमें सम्पूर्ण लोकों तथा ऋषियोंसहित देवताओंकी रचना की थी । ये ही प्रलयके अधिष्ठान और मृत्युस्वरूप हैं । प्रजाकी उत्पत्ति और विनाश इन्हींसे होते हैं ॥ ७ ॥

एष धर्मश्च धर्मज्ञो वरदः सर्वकामदः ।

एष कर्ता च कार्यं च पूर्वदेवः स्वयम्प्रभुः ॥ ८ ॥

ये धर्मज्ञ, वरदाता, सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाले तथा धर्मस्वरूप हैं । ये ही कर्ता, कार्य, आदिदेव तथा स्वयं सर्वसमर्थ हैं ॥ ८ ॥

भूतं भव्यं भविष्यच्च पूर्वमेतदकल्पयत् ।

उभे संध्ये दिशः खं च नियमांश्च जनार्दनः ॥ ९ ॥

भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंकी सृष्टि भी पूर्वकालमें इन्हींके द्वारा हुई है । इन जनार्दनने ही दोनों संध्याओं, दसों दिशाओं, आकाश तथा नियमोंकी रचना की है ॥ ९ ॥

ऋषींश्चैव हि गोविन्दस्तपश्चैवाभ्यकल्पयत् ।

स्रष्टारं जगतश्चापि महात्मा प्रभुरव्ययः ॥ १० ॥

महात्मा अविनाशी प्रभु गोविन्दने ही ऋषियों तथा तपस्याकी रचना की है । जगत्स्रष्टा प्रजापतिको भी उन्होंने ही उत्पन्न किया है ॥ १० ॥

अग्रजं सर्वभूतानां संकर्षणमकल्पयत् ।

तस्मान्नारायणो जज्ञे देवदेवः सनातनः ॥ ११ ॥

पृष्ठ 1910

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उन पूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णने पहले सम्पूर्ण भूतोंके अग्रज संकर्षणको प्रकट किया, उनसे सनातन देवाधिदेव नारायणका प्रादुर्भाव हुआ ॥ ११ ॥

नाभौ पद्मं बभूवास्य सर्वलोकस्य सम्भवात् ।

तस्मात् पितामहो जातस्तस्माज्जातास्त्विमाः प्रजाः ॥ १२ ॥

नारायणकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ । सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिके स्थानभूत उस कमलसे पितामह ब्रह्माजी उत्पन्न हुए और ब्रह्माजीसे ये सारी प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं ॥ १२ ॥

शेषं चाकल्पयद् देवमनन्तं विश्वरूपिणम् ।

यो धारयति भूतानि धरां चेमां सपर्वताम् ॥ १३ ॥

जो सम्पूर्ण भूतोंको तथा पर्वतोंसहित इस पृथ्वीको धारण करते हैं, जिन्हें विश्वरूपी अनन्तदेव तथा शेष कहा गया है, उन्हें भी उन परमात्माने ही उत्पन्न किया है ॥

ध्यानयोगेन विप्राश्च तं विदन्ति महौजसम् ।

कर्णस्रोतोद्भवं चापि मधुं नाम महासुरम् ॥ १४ ॥

तमुग्रमुग्रर्माणमुग्रां बुद्धिं समास्थितम् ।

ब्रह्मणोऽपचितिं कुर्वन् जघान पुरुषोत्तमः ॥ १५ ॥

ब्राह्मणलोग ध्यानयोगके द्वारा इन्हीं परम तेजस्वी वासुदेवका ज्ञान प्राप्त करते हैं । जलशायी नारायणके कानकी मैलसे महान् असुर मधुका प्राकट्य हुआ था । वह मधु बड़े ही उग्र स्वभावका तथा क्रूरकर्मा था । उसने ब्रह्माजीका समादर करते हुए अत्यन्त भयंकर बुद्धिका आश्रय लिया था । इसलिये ब्रह्माजीका समादर करते हुए भगवान् पुरुषोत्तमने मधुको मार डाला था ॥

तस्य तात वधादेव देवदानवमानवाः ।

मधुसूदनमित्याहुऋषयश्च जनार्दनम् ॥ १६ ॥

तात! मधुका वध करनेके कारण ही देवता, दानव, मनुष्य तथा ऋषिगण श्रीजनार्दनको मधुसूदन कहते हैं ॥

वराहश्चैव सिंहश्च त्रिविक्रमगतिः प्रभुः ।

एष माता पिता चैव सर्वेषां प्राणिनां हरिः ॥ १७ ॥

वे ही भगवान् समय- समयपर वाराह, नृसिंह और वामनके रूपमें प्रकट हुए हैं । ये श्रीहरि ही समस्त प्राणियोंके पिता और माता हैं ॥ १७ ॥

परं हि पुण्डरीकाक्षान्न भूतं न भविष्यति ।

मुखतः सोऽसृजद् विप्रान् बाहुभ्यां क्षत्रियांस्तथा ॥ १८ ॥

वैश्यांश्चाप्यूरुतो राजन् शूद्रान् वै पादतस्तथा । इन कमलनयन भगवान्से बढ़कर दूसरा कोई तत्त्व न हुआ है, न होगा । राजन्! इन्होंने अपने मुखसे ब्राह्मणों, दोनों भुजाओंसे क्षत्रियों, जंघासे वैश्यों और चरणोंसे शूद्रोंको उत्पन्न किया है ॥ १८३ ॥