श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1911–1920

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1911–1920

पृष्ठ 1911

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तपसा नियतो देवं विधानं सर्वदेहिनाम् ॥ १ ९ ॥

ब्रह्मभूतममावास्यां पौर्णमास्यां तथैव च ।

योगभूतं परिचरन् केशवं महदाप्नुयात् ॥ २० ॥

जो मनुष्य तपस्यामें तत्पर हो संयम- नियमका पालन करते हुए अमावास्या और पूर्णिमाको समस्त देहधारियोंके आश्रय, ब्रह्म एवं योगस्वरूप भगवान् केशवकी आराधना करता है, वह परम पदको प्राप्त कर लेता है ॥ १ ९ -२० ॥

केशवः परमं तेजः सर्वलोकपितामहः ।

एनमाहुर्हृषीकेशं मुनयो वै नराधिप ॥ २१ ॥

नरेश्वर! सम्पूर्ण लोकोंके पितामह भगवान् श्रीकृष्ण परम तेज हैं । मुनिजन इन्हें हृषीकेश कहते हैं ॥ २१ ॥

एवमेनं विजानीहि आचार्यं पितरं गुरुम् ।

कृष्णो यस्य प्रसीदेत लोकास्तेनाक्षया जिताः ॥ २२ ॥

इस प्रकार इन भगवान् गोविन्दको तुम आचार्य, पिता और गुरु समझो । भगवान् श्रीकृष्ण जिसके ऊपर प्रसन्न हो जायँ, वह अक्षय लोकोंपर विजय पा जाता है ॥

यश्चैवैनं भयस्थाने केशवं शरणं व्रजेत् ।

सदा नरः पठंश्चेदं स्वस्तिमान् स सुखी भवेत् ॥ २३ ॥

जो मनुष्य भयके समय इन भगवान् श्रीकृष्णकी शरण लेता है और सर्वदा इस स्तुतिका पाठ करता है, वह सुखी एवं कल्याणका भागी होता है ॥ २३ ॥

ये च कृष्णं प्रपद्यन्ते ते न मुह्यन्ति मानवाः ।

भये महति मग्नांश्च पाति नित्यं जनार्दनः ॥ २४ ॥

जो मानव भगवान् श्रीकृष्णकी शरण लेते हैं, वे कभी मोहमें नहीं पड़ते । जनार्दन महान् भयमें निमग्न भगवान् उन मनुष्योंकी सदा रक्षा करते हैं ॥ २४ ॥

स तं युधिष्ठिरो ज्ञात्वा याथातथ्येन भारत ।

सर्वात्मना महात्मानं केशवं जगदीश्वरम् ।

प्रपन्नः शरणं राजन् योगानां प्रभुमीश्वरम् ॥ २५ ॥

भरतवंशी नरेश! इस बातको अच्छी तरह समझकर राजा युधिष्ठिरने सम्पूर्ण हृदयसे योगोंके स्वामी, सर्वसमर्थ, जगदीश्वर एवं महात्मा भगवान् केशवकी शरण ली है ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि विश्वोपाख्याने सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें विश्वोपाख्यानविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६७ ॥

पृष्ठ 1912

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१. केशव नामकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है - क-ब्रह्मा, अ = विष्णु, ईश =शिव जिनके वपु हैं ।

पृष्ठ 1913

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अष्टषष्टितमोऽध्यायः ब्रह्मभूतस्तोत्र तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महत्ता भीष्म उवाच

शृणु चेदं महाराज ब्रह्मभूतं स्तवं मम ।

ब्रह्मर्षिभिश्च देवैश्च यः पुरा कथितो भुवि ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - महाराज दुर्योधन! पूर्वकालमें इस भूतलपर ब्रह्मर्षियों तथा देवताओंने इनका जो ब्रह्मभूतस्तोत्र कहा है, उसे तुम मुझसे सुनो- ॥ १ ॥

साध्यानामपि देवानां देवदेवेश्वरः प्रभुः ।

लोकभावनभावज्ञ इति त्वां नारदोऽब्रवीत् ॥ २ ॥

' प्रभो! आप साध्यगण और देवताओंके भी स्वामी एवं देवदेवेश्वर हैं । आप सम्पूर्ण जगत्के हृदयके भावोंको जाननेवाले हैं । आपके विषयमें नारदजीने ऐसा ही कहा है ॥ २ ॥

भूतं भव्यं भविष्यं च मार्कण्डेयोऽभ्युवाच ह ।

यज्ञं त्वां चैव यज्ञानां तपश्च तपसामपि ॥ ३ ॥

‘ मार्कण्डेयजीने आपको भूत, भविष्य और वर्तमान स्वरूप बताया है । वे आपको यज्ञोंका यज्ञ और तपस्याओंका भी सारभूत तप बताया करते हैं ॥ ३ ॥

देवानामपि देवं च त्वामाह भगवान् भृगुः ।

पुराणं चैव परमं विष्णो रूपं तवेति च ॥ ४ ॥

‘ भगवान् भृगुने आपको देवताओंका भी देवता कहा है । विष्णो! आपका रूप अत्यन्त पुरातन और उत्कृष्ट है ॥

वासुदेवो वसूनां त्वं शक्रं स्थापयिता तथा ।

देव देवोऽसि देवानामिति द्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ ५ ॥

'प्रभो! आप वसुओंके वासुदेव तथा इन्द्रको स्वर्गके राज्यपर स्थापित करनेवाले हैं । देव! आप देवताओंके भी देवता हैं । महर्षि द्वैपायन आपके विषयमें ऐसा ही कहते हैं ॥ ५ ॥

पूर्वे प्रजानिसर्गे च दक्षमाहुः प्रजापतिम् ।

स्रष्टारं सर्वलोकानामङ्गिस्त्वां तथाब्रवीत् ॥ ६ ॥

‘ प्रथम प्रजासृष्टिके समय आपको ही दक्ष प्रजापति कहा गया है। आप ही सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा हैं — इस प्रकार अंगिरा मुनि आपके विषयमें कहते हैं ॥ ६ ॥

अव्यक्तं ते शरीरोत्थं व्यक्तं ते मनसि स्थितम् ।

देवास्त्वत्सम्भवाश्चैव देवलस्त्वसितोऽब्रवीत् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1914

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‘ अव्यक्त ( प्रधान ) आपके शरीरसे उत्पन्न हुआ है, व्यक्त महत्तत्त्व आदि कार्यवर्ग आपके मनमें स्थित है तथा सम्पूर्ण देवता भी आपसे ही उत्पन्न हुए हैं; ऐसा असित और देवलका कथन है ॥ ७ ॥

शिरसा ते दिवं व्याप्तं बाहुभ्यां पृथिवी तथा ।

जठरं ते त्रयो लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः ॥ ८ ॥

एवं त्वामभिजानन्ति तपसा भाविता नराः ।

आत्मदर्शनतृप्तानामृषीणां चासि सत्तमः ॥ ९ ॥

‘ आपके मस्तकसे द्युलोक और भुजाओंसे भूलोक व्याप्त है । तीनों लोक आपके उदरमें स्थित हैं । आप ही सनातन पुरुष हैं । तपस्यासे शुद्ध अन्तःकरण- वाले महात्मा पुरुष आपको ऐसा ही जानते हैं । आत्मसाक्षात्कारसे तृप्त हुए ज्ञानी महर्षियोंकी दृष्टिमें भी आप सबसे श्रेष्ठ हैं ॥ ८- ९ ॥

राजर्षीणामुदाराणामाहवेष्वनिवर्तिनाम् ।

सर्वधर्मप्रधानानां त्वं गतिर्मधुसूदन ॥ १० ॥

'मधुसूदन! जो सम्पूर्ण धर्मोंमें प्रधान और संग्रामसे कभी पीछे हटनेवाले नहीं हैं, उन उदार राजर्षियोंके परम आश्रय भी आप ही हैं ॥ १० ॥

इति नित्यं योगविद्भिर्भगवान् पुरुषोत्तमः ।

सनत्कुमारप्रमुखैः स्तूयतेऽभ्यर्च्यते हरिः ॥ ११ ॥

‘ इस प्रकार सनत्कुमार आदि योगवेत्ता पापापहारी आप भगवान् पुरुषोत्तमकी सदा ही स्तुति और पूजा करते हैं ' ॥ ११ ॥

एष ते विस्तरस्तात संक्षेपश्च प्रकीर्तितः ।

केशवस्य यथातत्त्वं सुप्रीतो भज केशवम् ॥ १२ ॥

तात! दुर्योधन! इस तरह विस्तार और संक्षेपसे मैंने तुम्हें भगवान् केशवकी यथार्थ महिमा बतायी है । अब तुम अत्यन्त प्रसन्न होकर उनका भजन करो ॥ १२ ॥

संजय उवाच

पुण्यं श्रुत्वैतदाख्यानं महाराज सुतस्तव ।

केशवं बहु मेने स पाण्डवांश्च महारथान् ॥ १३ ॥

संजय कहते हैं - महाराज! भीष्मजीके मुखसे यह पवित्र आख्यान सुनकर तुम्हारे पुत्रने भगवान् श्रीकृष्ण तथा महारथी पाण्डवोंको बहुत महत्त्वशाली समझा ॥ १३ ॥

तमब्रवीन्महाराज भीष्मः शान्तनवः पुनः ।

माहात्म्यं ते श्रुतं राजन् केशवस्य महात्मनः ॥ १४ ॥

नरस्य च यथातत्त्वं यन्मां त्वं पृच्छसे नृप ।

पृष्ठ 1915

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राजन्! उस समय शान्तनुनन्दन भीष्मजीने पुनः दुर्योधनसे कहा– ' नरेश्वर! तुमने महात्मा केशव तथा नरस्वरूप अर्जुनका यथार्थ माहात्म्य, जिसके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे थे, मुझसे अच्छी तरह सुन लिया ॥ १४३ ॥

यदर्थं नृषु सम्भूतौ नरनारायणावृषी ॥ १५ ॥

अवध्यौ च यथा वीरौ संयुगेष्वपराजितौ ।

यथा च पाण्डवा राजन्नवध्या युधि कस्यचित् ॥ १६ ॥

‘ऋषि नर और नारायण जिस उद्देश्यसे मनुष्योंमें अवतीर्ण हुए हैं, वे दोनों अपराजित वीर जिस प्रकार युद्धमें अवध्य हैं तथा समस्त पाण्डव भी जिस प्रकार समरभूमिमें किसीके लिये भी वध्य नहीं हैं, वह सब विषय तुमने अच्छी तरह सुन लिया ॥ १५-१६ ॥

प्रीतिमान् हि दृढ़ कृष्णः पाण्डवेषु यशस्विषु ।

तस्माद् ब्रवीमि राजेन्द्र शमो भवतु पाण्डवैः ॥ १७ ॥

‘ राजेन्द्र! भगवान् श्रीकृष्ण यशस्वी पाण्डवोंपर बहुत प्रसन्न हैं । इसीलिये मैं कहता हूँ कि पाण्डवोंके साथ तुम्हारी संधि हो जाय ॥ १७ ॥

पृथिवीं भुङ्क्ष्व सहितो भ्रातृभिर्बलिभिर्वशी ।

नरनारायणौ देवाववज्ञाय नशिष्यसि ॥ १८ ॥

' वे तुम्हारे बलवान् भाई हैं । तुम अपने मनको वशमें रखते हुए उनके साथ मिलकर पृथ्वीका राज्य भोगो । भगवान् नर- नारायण ( अर्जुन और श्रीकृष्ण) की अवहेलना करके तुम नष्ट हो जाओगे ॥ १८ ॥

एवमुक्त्वा तव पिता तूष्णीमासीद् विशाम्पते ।

व्यसर्जयच्च राजानं शयनं च विवेश ह ॥ १ ९ ॥

प्रजानाथ! ऐसा कहकर आपके ताऊ भीष्मजी चुप हो गये । तत्पश्चात् उन्होंने राजा दुर्योधनको विदा किया और स्वयं शयन करने चले गये ॥ १ ९ ॥

राजा च शिबिरं प्रायात् प्रणिपत्य महात्मने ।

शिश्ये च शयने शुभ्रे रात्रिं तां भरतर्षभ ॥ २० ॥

भरतश्रेष्ठ! राजा दुर्योधन भी महात्मा भीष्मको प्रणाम करके अपने शिविरमें चला आया और अपनी शुभ्र शय्यापर सो गया ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि विश्वोपाख्याने अष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमेंविश्वोपाख्यानविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ६८ ॥

पृष्ठ 1916

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एकोनसप्ततितमोऽध्यायः कौरवोंद्वारा मकरव्यूह तथा पाण्डवोंद्वारा श्येनव्यूहका निर्माण एवं पाँचवें दिनके युद्धका आरम्भ संजय उवाच

व्युषितायां तु शर्वर्यामुदिते च दिवाकरे ।

उभे सेने महाराज युद्धायैव समीयतुः ॥ १ ॥

संजय कहते हैं - महाराज! वह रात बीतनेपर जब सूर्योदय हुआ, तब दोनों ओरकी सेनाएँ आमने - सामने आकर युद्धके लिये डट गयीं ॥ १ ॥

अभ्यधावन्त संक्रुद्धाः परस्परजिगीषवः ।

ते सर्वे सहिता युद्धे समालोक्य परस्परम् ॥ २ ॥

पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च राजन् दुर्मन्त्रिते तव ।

व्यूहौ च व्यूह्य संरब्धाः सम्प्रहृष्टाः प्रहारिणः ॥ ३ ॥

सबने एक- दूसरेको जीतनेकी इच्छासे अत्यन्त क्रोधमें भरकर विपक्षी सेनापर आक्रमण किया । राजन्! आपकी कुमन्त्रणाके फलस्वरूप आपके पुत्र और पाण्डव एक-दूसरेको देखकर कुपित हो सब- के - सब अपने सहायकोंके साथ आकर सेनाकी व्यूह - रचना करके हर्ष और उत्साहमें भरकर परस्पर प्रहार करनेको उद्यत हो गये ॥ २-३ ॥

अरक्षन्मकरव्यूहं भीष्मो राजन् समन्ततः ।

तथैव पाण्डवा राजन्नरक्षन् व्यूहमात्मनः ॥ ४ ॥

राजन्! भीष्म सेनाका मकरव्यूह बनाकर सब ओरसे उसकी रक्षा करने लगे । इसी प्रकार पाण्डवोंने भी अपने व्यूहकी रक्षा की ॥ ४ ॥

(अजातशत्रुः शत्रूणां मनांसि समकम्पयत् ।

श्येनवद् व्यूह्य तं व्यूहं धौम्यस्य वचनात् स्वयम् ॥

स हि तस्य सुविज्ञात अग्निचित्येषु भारत ।

मकरस्तु महाव्यूहस्तव पुत्रस्य धीमतः ॥

स्वयं सर्वेण सैन्येन द्रोणेनानुमतस्तदा । यथाव्यूहं शान्तनवः सोऽन्ववर्तत तत् पुनः II )

स निर्ययौ महाराज पिता देवव्रतस्तव ।

महता रथवंशेन संवृतो रथिनां वरः ॥ ५ ॥

स्वयं अजातशत्रु युधिष्ठिरने धौम्य मुनिकी आज्ञासे श्येनव्यूहकी रचना करके शत्रुओंके हृदयमें कँपकँपी पैदा कर दी । भारत! अग्निचयनसम्बन्धी कर्मोंमें रहते हुए उन्हें

पृष्ठ 1917

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श्येनव्यूहका विशेष परिचय था । आपके बुद्धिमान् पुत्रकी सेनाका मकर नामक महाव्यूह निर्मित हुआ था । द्रोणाचार्यकी अनुमति लेकर उसने स्वयं सारी सेनाके द्वारा उस व्यूहकी रचना की थी । फिर शान्तनुनन्दन भीष्मने व्यूहकी विधिके अनुसार निर्मित हुए उस महाव्यूहका स्वयं भी अनुसरण किया था । महाराज! रथियोंमें श्रेष्ठ आपके ताऊ भीष्म विशाल रथसेनासे घिरे हुए युद्धके लिये निकले ॥ ५ ॥

इतरेतरमन्वीयुर्यथाभागमवस्थिताः ।

रथिनः पत्तयश्चैव दन्तिनः सादिनस्तथा ॥ ६ ॥

फिर यथाभाग खड़े हुए रथी, पैदल, हाथीसवार और घुड़सवार सब एक- दूसरेका अनुसरण करते हुए चल दिये ॥ ६ ॥

तान् दृष्ट्वाभ्युद्यतान् संख्ये पाण्डवा हि यशस्विनः ।

श्येनेन व्यूहराजेन तेनाजय्येन संयुगे ॥ ७ ॥

अशोभत मुखे तस्य भीमसेनो महाबलः ।

नेत्रे शिखण्डी दुर्धर्षो धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ ८ ॥

शत्रुओंको युद्धके लिये उद्यत हुए देख यशस्वी पाण्डव युद्धमें अजेय व्यूहराज श्येनके रूपमें संगठित हो शोभा पाने लगे । उस व्यूहके मुखभागमें महाबली भीमसेन शोभा पा रहे थे । नेत्रोंके स्थानमें दुर्धर्ष वीर शिखण्डी तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न खड़े थे ॥ ७-८ ॥

शीर्षे तस्याभवद् वीरः सात्यकिः सत्यविक्रमः ।

विधुन्वन् गाण्डिवं पार्थो ग्रीवायामभवत् तदा ॥ ९ ॥

शिरोभागमें सत्यपराक्रमी वीर सात्यकि और ग्रीवाभागमें गाण्डीवधनुषकी टंकार करते हुए कुन्तीकुमार अर्जुन खड़े हुए ॥ ९ ॥

अक्षौहिण्या समं तत्र वामपक्षोऽभवत् तदा ।

महात्मा द्रुपदः श्रीमान् सह पुत्रेण संयुगे ॥ १० ॥

पुत्रसहित श्रीमान् महात्मा द्रुपद एक अक्षौहिणी सेनाके साथ युद्धमें बायें पंखके स्थानमें खड़े थे ॥ १० ॥

दक्षिणश्चाभवत् पक्षः कैकेयोऽक्षौहिणीपतिः ।

पृष्ठतो द्रौपदेयाश्च सौभद्रश्चापि वीर्यवान् ॥ ११ ॥

एक अक्षौहिणी सेनाके अधिपति केकय दाहिने पंखमें स्थित हुए । द्रौपदीके पाँचों पुत्र और पराक्रमी सुभद्राकुमार अभिमन्यु — ये पृष्ठभागमें खड़े हुए ॥ ११ ॥

पृष्ठे समभवच्छ्रीमान् स्वयं राजा युधिष्ठिरः ।

भ्रातृभ्यां सहितो वीरो यमाभ्यां चारुविक्रमः ॥ १२ ॥

उत्तम पराक्रमसे सम्पन्न स्वयं श्रीमान् वीर राजा युधिष्ठिर भी अपने दो भाई नकुल और सहदेवके साथ पृष्ठभागमें ही सुशोभित हुए ॥ १२ ॥

प्रविश्य तु रणे भीमो मकरं मुखतस्तदा ।

पृष्ठ 1918

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भीष्ममासाद्य संग्रामे छादयामास सायकैः ॥ १३ ॥

तदनन्तर भीमसेनने रणक्षेत्रमें प्रवेश करके मकर- व्यूहके मुखभागमें खड़े हुए भीष्मको अपने सायकोंसे आच्छादित कर दिया ॥ १३ ॥

ततो भीष्मो महास्त्राणि पातयामास भारत ।

मोहयन् पाण्डुपुत्राणां व्यूढं सैन्यं महाहवे ॥ १४ ॥

भारत! तब उस महासमरमें पाण्डवोंकी उस व्यूहबद्ध सेनाको मोहित करते हुए भीष्म उसपर बड़े - बड़े अस्त्रोंका प्रयोग करने लगे ॥ १४ ॥

सम्मुह्यति तदा सैन्ये त्वरमाणो धनंजयः ।

भीष्मं शरसहस्रेण विव्याध रणमूर्धनि ॥ १५ ॥

उस समय अपनी सेनाको मोहित होती देख अर्जुनने बड़ी उतावलीके साथ युद्धके मुहानेपर एक हजार बाणोंकी वर्षा करके भीष्मको घायल कर दिया ॥ १५ ॥

प्रतिसंवार्य चास्त्राणि भीष्ममुक्तानि संयुगे ।

स्वेनानीकेन हृष्टेन युद्धाय समुपस्थितः ॥ १६ ॥

संग्राममें भीष्मके छोड़े हुए सम्पूर्ण अस्त्रोंका निवारण करके हर्षमें भरी हुई अपनी सेनाके साथ वे युद्धके लिये उपस्थित हुए ॥ १६ ॥

ततो दुर्योधनो राजा भारद्वाजमभाषत ।

पूर्वं दृष्ट्वा वधं घोरं बलस्य बलिनां वरः ॥ १७ ॥

भ्रातॄणां च वधं युद्धे स्मरमाणो महारथः ।

आचार्य सततं हि त्वं हितकामो ममानघ ॥ १८ ॥

तब बलवानोंमें श्रेष्ठ महारथी राजा दुर्योधनने पहले जो अपनी सेनाका घोर संहार हुआ था, उसको दृष्टिमें रखते हुए और युद्धमें भाइयोंके वधका स्मरण करते हुए भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यसे कहा — ' निष्पाप आचार्य! आप सदा ही मेरा हित चाहनेवाले हैं ॥ १७-१८ ॥

वयं हि त्वां समाश्रित्य भीष्मं चैव पितामहम् ।

देवानपि रणे जेतुं प्रार्थयामो न संशयः ॥ १९ ॥

किमु पाण्डुसुतान् युद्धे हीनवीर्यपराक्रमान् ।

स तथा कुरु भद्रं ते यथा वध्यन्ति पाण्डवाः ॥ २० ॥

‘ हमलोग आप तथा पितामह भीष्मकी शरण लेकर देवताओंको भी समरभूमिमें जीतनेकी अभिलाषा रखते हैं, इसमें संशय नहीं है । फिर जो बल और पराक्रममें हीन हैं, उन पाण्डवोंको जीतना कौन बड़ी बात है । आपका कल्याण हो । आप ऐसा प्रयत्न करें जिससे पाण्डव मारे जायँ' ॥ १ ९ -२० ॥ एवमुक्तस्ततो द्रोणस्तव पुत्रेण मारिष । (उवाच तत्र राजानं संक्रुद्ध इव निःश्वसन् ।

पृष्ठ 1919

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आर्य! आपके पुत्र दुर्योधनके ऐसा कहनेपर द्रोणाचार्य कुछ कुपित से हो उठे और लंबी साँस खींचते हुए राजा दुर्योधनसे बोले । द्रोणउवाच

बालिशस्त्वं न जानीषे पाण्डवानां पराक्रमम् ।

न शक्या हि यथा जेतुं पाण्डवा हि महाबलाः ॥

यथाबलं यथावीर्यं कर्म कुर्यामहं हि ते । द्रोणाचार्यने कहा – तुम नादान हो । पाण्डवोंका पराक्रम कैसा है, यह नहीं जानते । महाबली पाण्डवोंको युद्धमें जीतना असम्भव है, तथापि मैं अपने बल और पराक्रमके अनुसार तुम्हारा कार्य कर सकता हूँ । संजय उवाच इत्युक्त्वा ते सुतं राजन्नभ्यपद्यत वाहिनीम् । ) अभिनत् पाण्डवानीकं प्रेक्षमाणस्य सात्यकेः ॥ २१ ॥

संजय कहते हैं - राजन्! आपके पुत्रसे ऐसा कहकर द्रोणाचार्य पाण्डवोंकी सेनाका सामना करनेके लिये गये । वे सात्यकिके देखते-देखते पाण्डवसेनाको विदीर्ण करने लगे ॥ २१ ॥

सात्यकिस्तु ततो द्रोणं वारयामास भारत ।

तयोः प्रववृते युद्धं घोररूपं भयावहम् ॥ २२ ॥

भारत! उस समय सात्यकिने आगे बढ़कर द्रोणाचार्यको रोका । फिर तो उन दोनोंमें अत्यन्त भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया ॥ २२ ॥

शैनेयं तु रणे क्रुद्धो भारद्वाजः प्रतापवान् ।

अविध्यन्निशितैर्बाणैर्जत्रुदेशे हसन्निव ॥ २३ ॥

प्रतापी द्रोणाचार्यने युद्धमें कुपित होकर सात्यकिके गलेकी हँसलीमें हँसते हुए - से पैने बाणोंद्वारा प्रहार किया ॥ २३ ॥

भीमसेनस्ततः क्रुद्धो भारद्वाजमविध्यत ।

संरक्षन् सात्यकिं राजन् द्रोणाच्छस्त्रभृतां वरात् ॥ २४ ॥

राजन्! तब भीमसेनने कुपित होकर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यसे सात्यकिकी रक्षा करते हुए आचार्यको अपने बाणोंसे बींध डाला ॥ २४ ॥

ततो द्रोणश्च भीष्मश्च तथा शल्यश्च मारिष ।

भीमसेनं रणे क्रुद्धाश्छादयांचक्रिरे शरैः ॥ २५ ॥

आर्य! तदनन्तर द्रोणाचार्य, भीष्म तथा शल्य तीनोंने कुपित होकर भीमसेनको युद्धस्थलमें अपने बाणोंसे ढक दिया ॥ २५ ॥

तत्राभिमन्युः संक्रुद्धो द्रौपदेयाश्च मारिष ।

पृष्ठ 1920

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विव्यधुर्निशितैर्बाणैः सर्वास्तानुद्यतायुधान् ॥ २६ ॥

महाराज! तब वहाँ क्रोधमें भरे हुए अभिमन्यु और द्रौपदीके पुत्रोंने आयुध लेकर खड़े हुए उन सब कौरव महारथियोंको तीखे बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २६ ॥

द्रोणभीष्मौ तु संक्रुद्धावापतन्तौ महाबलौ ।

प्रत्युद्ययौ शिखण्डी तु महेष्वासो महाहवे ॥ २७ ॥

उस समय कुपित होकर आक्रमण करते हुए महा-बली द्रोणाचार्य और भीष्मका उस महासमरमें सामना करनेके लिये महाधनुर्धर शिखण्डी आगे बढ़ा ॥

प्रगृह्य बलवद् वीरो धनुर्जलदनिःस्वनम् ।

अभ्यवर्षच्छरैस्तूर्णं छादयानो दिवाकरम् ॥ २८ ॥

उस वीरने मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले अपने धनुषको बलपूर्वक खींचकर बड़ी शीघ्रताके साथ इतने बाणोंकी वर्षा की कि सूर्य भी आच्छादित हो गये ॥ २८ ॥

शिखण्डिनं समासाद्य भरतानां पितामहः ।

अवर्जयत संग्रामं स्त्रीत्वं तस्यानुसंस्मरन् ॥ २९ ॥

भरतकुलके पितामह भीष्मने शिखण्डीके सामने पहुँचकर उसके स्त्रीत्वका बारंबार स्मरण करते हुए युद्ध बंद कर दिया ॥ २ ९ ॥

ततो द्रोणो महाराज अभ्यद्रवत तं रणे ।

रक्षमाणस्तदा भीष्मं तव पुत्रेण चोदितः ॥ ३० ॥

महाराज! यह देखकर द्रोणाचार्य युद्धमें आपके पुत्रके कहने से भीष्मकी रक्षाके लिये शिखण्डीकी ओर दौड़े ॥ ३० ॥

शिखण्डी तु समासाद्य द्रोणं शस्त्रभृतां वरम् ।

अवर्जयत संत्रस्तो युगान्ताग्निमिवोल्बणम् ॥ ३१ ॥

शिखण्डी प्रलयकालकी प्रचण्ड अग्निके समान शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणका सामना पड़नेपर भयभीत हो युद्ध छोड़कर चल दिया ॥ ३१ ॥

ततो बलेन महता पुत्रस्तव विशाम्पते ।

जुगप भीष्ममासाद्य प्रार्थयानो महद्यशः ॥ ३२ ॥

प्रजानाथ! तदनन्तर आपका पुत्र दुर्योधन महान् यश पानेकी इच्छा रखता हुआ अपनी विशाल सेनाके साथ भीष्मके पास पहुँचकर उनकी रक्षा करने लगा ॥

तथैव पाण्डवा राजन् पुरस्कृत्य धनंजयम् ।

भीष्ममेवाभ्यवर्तन्त जये कृत्वा दृढ़ां मतिम् ॥ ३३ ॥

राजन्! इसी प्रकार पाण्डव भी विजय प्राप्तिके लिये दृढ़ निश्चय करके अर्जुनको आगे कर भीष्मपर ही टूट पड़े ॥ ३३ ॥

तद् युद्धमभवद् घोरं देवानां दानवैरिव ।

जयमाकाङ्क्षतां संख्ये यशश्च सुमहाद्भुतम् ॥ ३४ ॥