श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 541–550

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 541–550

पृष्ठ 541

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जनार्दनं समासाद्य कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ) अभ्यभाषत दाशार्हमृषभं सर्वसात्वताम् ॥ १ ॥

समस्त यदुवंशियोंमें श्रेष्ठ दशार्हकुलनन्दन जनार्दन श्रीकृष्णके पास पहुँचकर कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

अयं स कालः सम्प्राप्तो मित्राणां मित्रवत्सल ।

न च त्वदन्यं पश्यामि यो न आपत्सु तारयेत् ॥ २ ॥

‘ मित्रवत्सल श्रीकृष्ण! मित्रोंकी सहायताके लिये यही उपयुक्त अवसर आया है। मैं आपके सिवा दूसरे किसीको ऐसा नहीं देखता, जो इस विपत्तिसे हमलोगोंका उद्धार करे ॥ २ ॥

त्वां हि माधवमाश्रित्य निर्भया मोघदर्पितम् ।

धार्तराष्ट्रं सहामात्यं स्वयं समनुयुङ्क्ष्महे ॥ ३ ॥

‘ आप माधवकी शरणमें आकर हम सब लोग निर्भय हो गये हैं और व्यर्थ ही घमंड दिखानेवाले धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन तथा उसके मन्त्रियोंको हम स्वयं युद्धके लिये ललकार रहे हैं ॥ ३ ॥

यथा हि सर्वास्वापत्सु पासि वृष्णीनरिंदम ।

पृष्ठ 542

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तथा ते पाण्डवा रक्ष्याः पाह्यस्मान् महतो भयात् ॥ ४ ॥

' शत्रुदमन! जैसे आप वृष्णिवंशियोंकी सब प्रकारकी आपत्तियोंसे रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आपको पाण्डवोंकी भी रक्षा करनी चाहिये । प्रभो! इस महान् भयसे आप हमारी रक्षा कीजिये ॥ ४ ॥

श्रीभगवानुवाच

अयमस्मि महाबाहो ब्रूहि यत् ते विवक्षितम् ।

करिष्यामि हि तत् सर्वं यत् त्वं वक्ष्यसि भारत ॥ ५ ॥

श्रीभगवान् बोले – महाबाहो! यह मैं आपकी सेवाके लिये सर्वदा प्रस्तुत हूँ। आप जो कुछ कहना चाहते हों, कहें । भारत! आप जो- जो कहेंगे, वह सब कार्य मैं निश्चय ही पूर्ण करूँगा ॥ ५ ॥

युधिष्ठिरउवाच

श्रुतं ते धृतराष्ट्रस्य सपुत्रस्य चिकीर्षितम् ।

एतद्धि सकलं कृष्ण संजयो मां यदब्रवीत् ॥ ६ ॥

तन्मतं धृतराष्ट्रस्य सोऽस्यात्मा विवृतान्तरः ।

यथोक्तं दूत'आचष्टे वध्यः स्यादन्यथा ब्रुवन् ॥ ७ ॥

युधिष्ठिरने कहा – श्रीकृष्ण! पुत्रोंसहित राजा धृतराष्ट्र क्या करना चाहते हैं, यह सब तो आपने सुन ही लिया । संजयने मुझसे जो कुछ कहा है, वह धृतराष्ट्रका ही मत है । संजय धृतराष्ट्रका अभिन्नस्वरूप होकर आया था । उसने उन्हींके मनोभावको प्रकाशित किया है । दूत संजय स्वामीकी कही हुई बातको ही दुहराया है; क्योंकि यदि वह उसके विपरीत कुछ कहता तो वधके योग्य माना जाता ॥ ६-७ ॥

अप्रदानेन राज्यस्य शान्तिमस्मासु मार्गति ।

लुब्धः पापेन मनसा चरन्नसममात्मनः ॥ ८ ॥

राजा धृतराष्ट्रको राज्यका बड़ा लोभ है । उनके मनमें पाप बस गया है । अतः वे अपने अनुरूप व्यवहार न करके राज्य दिये बिना ही हमारे साथ संधिका मार्ग ढूँढ़ रहे हैं ॥ ८ ॥

यत् तद् द्वादश वर्षाणि वनेषु ह्युषिता वयम् ।

छद्मना शरदं चैकां धृतराष्ट्रस्य शासनात् ॥ ९ ॥

स्थाता नः समये तस्मिन् धृतराष्ट्र इति प्रभो ।

नाहास्म समयं कृष्ण तद्धि नो ब्राह्मणा विदुः ॥ १० ॥

प्रभो! हम तो यही समझकर कि धृतराष्ट्र अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर रहेंगे, उन्हींकी आज्ञासे बारह वर्ष वनमें रहे और एक वर्ष अज्ञातवास किया । श्रीकृष्ण! हमने अपनी प्रतिज्ञा भंग नहीं की है; इस बातको हमारे साथ रहनेवाले सभी ब्राह्मण जानते हैं ॥ ९ -१० ॥

पृष्ठ 543

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गृद्धो राजा धृतराष्ट्रः स्वधर्मं नानुपश्यति ।

वश्यत्वात् पुत्रगृद्धित्वान्मन्दस्यान्वेति शासनम् ॥ ११ ॥

परंतु राजा धृतराष्ट्र तो लोभमें डूबे हुए हैं । वे अपने धर्मकी ओर नहीं देखते हैं । पुत्रोंमें आसक्त होकर सदा उन्हींके अधीन रहनेके कारण वे अपने मूर्ख पुत्र दुर्योधनकी ही आज्ञाका अनुसरण करते हैं ॥ ११ ॥

सुयोधनमते तिष्ठन् राजास्मासु जनार्दन ।

मिथ्या चरति लुब्धः सन् चरन् हि प्रियमात्मनः ॥ १२ ॥

जनार्दन! उनका लोभ इतना बढ़ गया है कि वे दुर्योधनकी ही हाँ में हाँ मिलाते हैं और अपना ही प्रिय कार्य करते हुए हमारे साथ मिथ्या व्यवहार कर रहे हैं ॥ १२ ॥

इतो दुःखतरं किं नु यदहं मातरं ततः ।

संविधातुं न शक्नोमि मित्राणां वा जनार्दन ॥ १३ ॥

जनार्दन! इससे बढ़कर महान् दुःखकी बात और क्या हो सकती है कि मैं अपनी माता तथा मित्रोंका भी अच्छी तरह भरण- पोषणतक नहीं कर सकता ॥ १३ ॥

काशिभिश्चेदिपञ्चालैर्मत्स्यैश्च मधुसूदन ।

भवता चैव नाथेन पञ्च ग्रामा वृता मया ॥ १४ ॥

मधुसूदन! यद्यपि काशी, चेदि, पांचाल और मत्स्यदेशके वीर हमारे सहायक हैं और आप हमलोगोंके रक्षक और स्वामी हैं; ( आपलोगोंकी सहायतासे हम सारा राज्य ले सकते हैं ) तथापि मैंने केवल पाँच ही गाँव माँगे थे ॥ १४ ॥

अविस्थलं वृकस्थलं माकन्दी वारणावतम् ।

अवसानं च गोविन्द कञ्चिदेवात्र पञ्चमम् ॥ १५ ॥

पञ्च नस्तात दीयन्तां ग्रामा वा नगराणि वा ।

वसेम सहिता येषु मा च नो भरता नशन् ॥ १६ ॥

गोविन्द! मैंने धृतराष्ट्रसे यही कहा था कि तात! आप हमें अविस्थल, वृकस्थल, माकन्दी, वारणावत और अन्तिम पाँचवाँ कोई सा भी गाँव जिसे आप देना चाहें, दे दें । इस प्रकार हमारे लिये पाँच गाँव या नगर दे दें; जिनमें हम पाँचों भाई एक साथ मिलकर रह सकें और हमारे कारण भरतवंशियोंका नाश न हो ॥ १५-१६ ॥

न च तानपि दुष्टात्मा धार्तराष्ट्रोऽनुमन्यते ।

स्वाम्यमात्मनि मत्वासावतो दुःखतरं नु किम् ॥ १७ ॥

परंतु दुष्टात्मा दुर्योधन सबपर अपना ही अधिकार मानकर उन पाँच गाँवोंको भी देनेकी

बात नहीं स्वीकार कर रहा है । इससे बढ़कर कष्टकी बात और क्या हो सकती है? ॥ १७ ॥

कुले जातस्य वृद्धस्य परवित्तेषु गृद्धयतः ।

लोभः प्रज्ञानमाहन्ति प्रज्ञा हन्ति हता ह्रियम् ॥ १८ ॥

पृष्ठ 544

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मनुष्य उत्तम कुलमें जन्म लेकर और वृद्ध होनेपर भी यदि दूसरोंके धनको लेना चाहता है तो वह लोभ उसकी विचारशक्तिको नष्ट कर देता है । विचारशक्ति नष्ट होनेपर उसकी लज्जाको भी नष्ट कर देती है ॥ १८ ॥

ता बाधते धर्मं धर्मो हन्ति हतः श्रियम् ।

श्रीर्हता पुरुषं हन्ति पुरुषस्याधनं वधः ॥ १ ९ ॥

नष्ट हुई लज्जा धर्मको नष्ट कर देती है । नष्ट हुआ धर्म मनुष्यकी सम्पत्तिका नाश कर देता है और नष्ट हुई सम्पत्ति उस मनुष्यका विनाश कर देती है, क्योंकि धनका अभाव ही मनुष्यका वध है ॥ १ ९ ॥

अधनाद्धि निवर्तन्ते ज्ञातयः सुहृदो द्विजाः ।

अपुष्पादफलाद् वृक्षाद् यथा कृष्ण पतत्त्रिणः ॥ २० ॥

श्रीकृष्ण! धनहीन पुरुषसे उसके भाई- बन्धु, सुहृद् और ब्राह्मणलोग भी उसी प्रकार मुँह मोड़ लेते हैं, जैसे पक्षी पुष्प और फलसे हीन वृक्षको छोड़कर उड़ जाते हैं ॥ २० ॥

एतच्च मरणं तात यन्मत्तः पतितादिव ।

ज्ञातयो विनिवर्तन्ते प्रेतसत्त्वादिवासवः ॥ २१ ॥

तात! जैसे पतित मनुष्यके निकटसे लोग दूर भागते हैं और जैसे मृत शरीरसे प्राण निकल जाते हैं, उसी प्रकार मेरे कुटुम्बीजन भी जो मुझसे मुँह मोड़ रहे हैं, यही मेरे लिये मरण है ॥ २१ ॥

नातः पापीयसीं काञ्चिदवस्थां शम्बरोऽब्रवीत् ।

यत्र नैवाद्य न प्रातर्भोजनं प्रतिदृश्यते ॥ २२ ॥

जहाँ आज और कल सबेरेके लिये भोजन नहीं दिखायी देता, उस दरिद्रतासे बढ़कर दूसरी कोई दुःखदायिनी अवस्था नहीं है; यह शम्बरका कथन है ॥ २२ ॥

धनमाहुः परं धर्मं धने सर्वं प्रतिष्ठितम् ।

जीवन्ति धनिनो लोके मृता ये त्वधना नराः ॥ २३ ॥

धनको उत्तम धर्मका साधक बताया गया है । धनमें सब कुछ प्रतिष्ठित है । संसारमें धनी

मनुष्य ही जीवन धारण करते हैं । जो निर्धन हैं, वे तो मरे हुएके ही समान हैं ॥ २३ ॥

ये धनादपकर्षन्ति नरं स्वबलमास्थिताः ।

ते धर्ममर्थं कामं च प्रमथ्नन्ति नरं च तम् ॥ २४ ॥

जो लोग अपने बलमें स्थित होकर किसी मनुष्यको धनसे वंचित कर देते हैं, वे उसके धर्म, अर्थ और कामको तो नष्ट करते ही हैं, उस मनुष्यको भी नष्ट कर देते हैं ॥ २४ ॥

एतामवस्थां प्राप्यैके मरणं वव्रिरे जनाः ।

ग्रामायैके वनायैके नाशायैके प्रवव्रजुः ॥ २५ ॥

इस निर्धन अवस्थाको पाकर कितने ही मनुष्योंने मृत्युका वरण किया है । कुछ लोग गाँव छोड़कर दूसरे गाँवमें जा बसे हैं, कितने ही जंगलोंमें चले गये हैं और कितने ही मनुष्य

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प्राण देनेके लिये घरसे निकल पड़े हैं ॥ २५ ॥

उन्मादमेके पुष्यन्ति यान्त्यन्ये द्विषतां वशम् ।

दास्यमेके च गच्छन्ति परेषामर्थहेतुना ॥ २६ ॥

कितने लोग पागल हो जाते हैं, बहुत - से शत्रुओंके वशमें पड़ जाते हैं और कितने ही मनुष्य धनके लिये दूसरोंकी दासता स्वीकार कर लेते हैं ॥ २६ ॥

आपदेवास्य मरणात् पुरुषस्य गरीयसी ।

श्रियो विनाशस्तद्धयस्य निमित्तं धर्मकामयोः ॥ २७ ॥

धन- सम्पत्तिका नाश मनुष्यके लिये भारी विपत्ति ही है । वह मृत्युसे भी बढ़कर है, क्योंकि सम्पत्ति ही मनुष्यके धर्म और कामकी सिद्धिका कारण है ॥ २७ ॥

यदस्य धर्म्यं मरणं शाश्वतं लोकवर्त्म तत् ।

समन्तात् सर्वभूतानां न तदत्येति कश्चन ॥ २८ ॥

मनुष्यकी जो धर्मानुकूल मृत्यु है, वह परलोकके लिये सनातन मार्ग है । सम्पूर्ण प्राणियोंमेंसे कोई भी उस मृत्युका सब ओरसे उल्लंघन नहीं कर सकता ॥ २८ ॥

न तथा बाध्यते कृष्ण प्रकृत्या निर्धनो जनः ।

यथा भद्रां श्रियं प्राप्य तया हीनः सुखैधितः ॥ २ ९ ॥

श्रीकृष्ण! जो जन्मसे ही निर्धन रहा है, उसे उस दरिद्रताके कारण उतना कष्ट नहीं पहुँचता, जितना कि कल्याणमयी सम्पत्तिको पाकर सुखमें ही पले हुए पुरुषको उस सम्पत्तिसे वंचित होनेपर होता है ॥ २ ९ ॥

स तदाऽऽत्मापराधेन सम्प्राप्तो व्यसनं महत् ।

सेन्द्रान् गर्हयते देवान् नात्मानं च कथञ्चन ॥ ३० ॥

यद्यपि वह मनुष्य उस समय अपने ही अपराधसे भारी संकटमें पड़ता है, तथापि वह इसके लिये इन्द्र आदि देवताओंकी ही निन्दा करता है; अपनेको किसी प्रकार भी दोष नहीं देता है ॥ ३० ॥

न चास्य सर्वशास्त्राणि प्रभवन्ति निबर्हणे ।

सोऽभिक्रुध्यति भृत्यानां सुहृदश्चाभ्यसूयति ॥ ३१ ॥

उस समय सम्पूर्ण शास्त्र भी उसके इस संकटको टालनेमें समर्थ नहीं होते । वह सेवकोंपर कुपित होता और सगे - सम्बन्धियोंके दोष देखने लगता है ॥ ३१ ॥

तं तदा मन्युरेवैति स भूयः सम्प्रमुह्यति ।

स मोहवशमापन्नः क्रूरं कर्म निषेवते ॥ ३२ ॥

निर्धन अवस्थामें मनुष्यको केवल क्रोध आता है, जिससे वह पुनः मोहाच्छन्न हो जाता —विवेकशक्ति खो बैठता है । मोहके वशीभूत होकर वह क्रूरतापूर्ण कर्म करने लगता है ॥ ३२ ॥

पापकर्मतया चैव संकरं तेन पुष्यति ।

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संकरो नरकायैव सा काष्ठा पापकर्मणाम् ॥ ३३ ॥

इस प्रकार पापकर्मोंमें प्रवृत्त होनेके कारण वह वर्णसंकर संतानोंका पोषक होता है और वर्णसंकर केवल नरककी ही प्राप्ति कराता है । पापियोंकी यही अन्तिम गति ॥ ३३ ॥

न चेत् प्रबुध्यते कृष्ण नरकायैव गच्छति ।

तस्य प्रबोधः प्रज्ञैव प्रज्ञाचक्षुस्तरिष्यति ॥ ३४ ॥

श्रीकृष्ण! यदि उसे फिरसे कर्तव्यका बोध नहीं होता, तो वह नरककी दिशामें ही बढ़ता जाता है । कर्तव्यका बोध करानेवाली प्रज्ञा ही है । जिसे प्रज्ञारूपी नेत्र प्राप्त हैं, वह निश्चय ही संकटसे पार हो जायगा ॥ ३४ ॥

प्रज्ञालाभे हि पुरुषः शास्त्राण्येवान्ववेक्षते ।

शास्त्रनिष्ठः पुनर्धर्मं तस्य ह्रीरङ्गमुत्तमम् ॥ ३५ ॥

ह्रीमान् हि पापं प्रद्वेष्टि तस्य श्रीरभिवर्धते ।

श्रीमान् स यावत् भवति तावद् भवति पूरुषः ॥ ३६ ॥

प्रज्ञाकी प्राप्ति होनेपर पुरुष केवल शास्त्रवचनोंपर ही दृष्टि रखता है । शास्त्रमें निष्ठा होनेपर वह पुनः धर्म करता है । धर्मका उत्तम अंग है लज्जा, जो धर्मके साथ ही आ जाती है । लज्जाशील मनुष्य पापसे द्वेष रखकर उससे दूर हो जाता है । अतः उसकी धन - सम्पत्ति बढ़ने लगती है । जो जितना ही श्रीसम्पन्न है, वह उतना ही पुरुष माना जाता है ॥ ३५-३६ ॥

धर्मनित्यः प्रशान्तात्मा कार्ययोगवहः सदा ।

नाधर्मे कुरुते बुद्धिं न च पापे प्रवर्तते ॥ ३७ ॥

सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाला पुरुष शान्तचित्त होकर नित्य - निरन्तर सत्कर्मोंमें लगा रहता है । वह कभी अधर्ममें मन नहीं लगाता और न पापमें ही प्रवृत्त होता है ॥ ३७ ॥

अह्रीको वा विमूढो वा नैव स्त्री न पुनः पुमान् ।

नास्याधिकारो धर्मेऽस्ति यथा शूद्रस्तथैव सः ॥ ३८ ॥

जो निर्लज्ज अथवा मूर्ख है, वह न तो स्त्री है और न पुरुष ही है । उसका धर्म - कर्ममें

अधिकार नहीं है । वह शूद्रके समान है ॥ ३८ ॥

ह्रीमानवति देवांश्च पितॄनात्मानमेव च ।

तेनामृतत्वं व्रजति सा काष्ठा पुण्यकर्मणाम् ॥ ३ ९ ॥

लज्जाशील पुरुष देवताओंकी, पितरोंकी तथा अपनी भी रक्षा करता है । इससे वह

अमृतत्वको प्राप्त होता है । वही पुण्यात्मा पुरुषोंकी परम गति है ॥ ३ ९ ॥

तदिदं मयि ते दृष्टं प्रत्यक्षं मधुसूदन ।

यथा राज्यात् परिभ्रष्टो वसामि वसतीरिमाः ॥ ४० ॥

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मधुसूदन! यह सब आपने मुझमें प्रत्यक्ष देखा है कि मैं किस प्रकार राज्यसे भ्रष्ट हुआ और कितने कष्टके साथ इन दिनों रह रहा हूँ ॥ ४० ॥

ते वयं न श्रियं हातुमलं न्यायेन केनचित् ।

अत्र नो यतमानानां वधश्चेदपि साधु तत् ॥ ४१ ॥

अतः हमलोग किसी भी न्यायसे अपनी पैतृक सम्पत्तिका परित्याग करनेयोग्य नहीं हैं । इसके लिये प्रयत्न करते हुए यदि हमलोगोंका वध हो जाय तो वह भी अच्छा ही है ॥ ४१ ॥

तत्र नः प्रथमः कल्पो यद् वयं ते च माधव ।

प्रशान्ताः समभूताश्च श्रियं तामश्नुवीमहि ॥ ४२ ॥

माधव! इस विषयमें हमारा पहला ध्येय यही है कि हम और कौरव आपसमें संधि करके शान्तभावसे रहकर उस सम्पत्तिका समानरूपसे उपभोग करें ॥ ४२ ॥

तत्रैषा परमा काष्ठा रौद्रकर्मक्षयोदया ।

यद् वयं कौरवान् हत्वा तानि राष्ट्राण्यवाप्नुमः ॥ ४३ ॥

दूसरा पक्ष यह है कि हम कौरवोंको मारकर सारा राज्य अपने अधिकारमें कर लें; परंतु यह भयंकर क्रूरतापूर्ण कर्मकी पराकाष्ठा होगी ( क्योंकि इस दशामें कितने ही निरपराध मनुष्योंका संहार करनेके पश्चात् हमारी विजय होगी ) ॥ ४३ ॥

ये पुनः स्युरसम्बद्धा अनार्याः कृष्ण शत्रवः ।

तेषामप्यवधः कार्यः किं पुनर्ये स्युरीदृशाः ॥ ४४ ॥

श्रीकृष्ण! जिनका अपने साथ कोई सम्बन्ध न हो तथा जो सर्वथा नीच एवं शत्रुभाव रखनेवाले हों, उनका भी वध करना उचित नहीं है । फिर जो सगे - सम्बन्धी, श्रेष्ठ और सुहृद् हैं, ऐसे लोगोंका वध कैसे उचित हो सकता है? ॥ ४४ ॥

ज्ञातयश्चैव भूयिष्ठाः सहाया गुरवश्च नः ।

तेषां वधोऽतिपापीयान् किं नो युद्धेऽस्ति शोभनम् ॥ ४५ ॥

हमारे विरोधियोंमें अधिकांश हमारे भाई-बन्धु, सहायक और गुरुजन हैं । उनका वध तो बहुत बड़ा पाप है । युद्धमें अच्छी बात क्या है? (कुछ नहीं) ॥

पापः क्षत्रियधर्मोऽयं वयं च क्षत्रबन्धवः ।

स नः स्वधर्मोऽधर्मो वा वृत्तिरन्या विगर्हिता ॥ ४६ ॥

क्षत्रियोंका यह ( युद्धरूप ) धर्म पापरूप ही है । हम भी क्षत्रिय ही हैं, अतः वह हमारा स्वधर्म पाप होनेपर भी हमें तो करना ही होगा, क्योंकि उसे छोड़कर दूसरी किसी वृत्तिको अपनाना भी निन्दाकी बात होगी ॥ ४६ ॥

शूद्रः करोति शुश्रूषां वैश्या वै पण्यजीविकाः ।

वयं वधेन जीवामः कपालं ब्राह्मणैर्वृतम् ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 548

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शूद्र सेवाका कार्य करता है, वैश्य व्यापारसे जीविका चलाते हैं, हम क्षत्रिय युद्धमें दूसरोंका वध करके जीवन- निर्वाह करते हैं और ब्राह्मणोंने अपनी जीविकाके लिये भिक्षापात्र चुन लिया है ॥ ४७ ॥

क्षत्रियः क्षत्रियं हन्ति मत्स्यो मत्स्येन जीवति ।

श्वाश्वानं हन्ति दाशार्ह पश्य धर्मो यथागतः ॥ ४८ ॥

क्षत्रिय क्षत्रियको मारता है, मछली मछलीको खाकर जीती है और कुत्ता कुत्तेको काटता है । दशार्हनन्दन! देखिये; यही परम्परासे चला आनेवाला धर्म है ॥ ४८ ॥

युद्धे कृष्ण कलिर्नित्यं प्राणाः सीदन्ति संयुगे ।

बलं तु नीतिमाधाय युध्ये जयपराजयौ ॥ ४ ९ ॥

श्रीकृष्ण! युद्धमें सदा कलह ही होता है और उसीके कारण प्राणोंका नाश होता है । मैं तो नीतिबलका ही आश्रय लेकर युद्ध करूँगा। फिर ईश्वरकी इच्छाके अनुसार जय हो या पराजय ॥ ४ ९ ॥

नात्मच्छन्देन भूतानां जीवितं मरणं तथा ।

नाप्यकाले सुखं प्राप्यं दुःखं वापि यदूत्तम ॥ ५० ॥

प्राणियोंके जीवन और मरण अपनी इच्छाके अनुसार नहीं होते हैं ( यही दशा जय और पराजयकी भी है ) । यदुश्रेष्ठ! किसीको सुख अथवा दुःखकी प्राप्ति भी असमयमें नहीं होती ॥ ५० ॥

एको ह्यपि बहून् हन्ति घ्नन्त्येकं बहवोऽप्युत ।

शूरं कापुरुषो हन्ति अयशस्वी यशस्विनम् ॥ ५१ ॥

युद्धमें एक योद्धा भी बहुत- से सैनिकोंका संहार कर डालता है तथा बहुत - से योद्धा मिलकर भी किसी एकको ही मार पाते हैं । कभी कायर शूरवीरको मार देता है और अयशस्वी पुरुष यशस्वी वीरको पराजित कर देता है ॥ ५१ ॥

जयो नैवोभयोर्दृष्टो नोभयोश्च पराजयः ।

तथैवापचयो दृष्टो व्यपयाने क्षयव्ययौ ॥ ५२ ॥

न तो कहीं दोनों पक्षोंकी विजय होती देखी गयी है और न दोनोंकी पराजय ही दृष्टिगोचर हुई है । हाँ, दोनोंके धन- वैभवका नाश अवश्य देखा गया है । यदि कोई पक्ष पीठ दिखाकर भाग जाय, तो उसे भी धन और जन दोनोंकी हानि उठानी पड़ती है ॥ ५२ ॥

सर्वथा वृजिनं युद्धं को घ्नन् न प्रतिहन्यते ।

हतस्य च हृषीकेश समौ जयपराजयौ ॥ ५३ ॥

इससे सिद्ध होता है कि युद्ध सर्वथा पापरूप ही है । दूसरोंको मारनेवाला कौन ऐसा पुरुष है, जो बदलेमें स्वयं भी मारा न जाता हो? हृषीकेश! जो युद्धमें मारा गया, उसके लिये तो विजय और पराजय दोनों समान हैं ॥ ५३ ॥

पराजयश्च मरणान्मन्ये नैव विशिष्यते ।

पृष्ठ 549

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यस्य स्याद् विजयः कृष्ण तस्याप्यपचयो ध्रुवम् ॥ ५४ ॥

श्रीकृष्ण! मैं तो ऐसा मानता हूँ कि पराजय मृत्युसे अच्छी वस्तु नहीं है । जिसकी विजय होती है, उसे भी निश्चय ही धन- जनकी भारी हानि उठानी पड़ती है ॥ ५४ ॥

अन्ततो दयितं घ्नन्ति केचिदप्यपरे जनाः ।

तस्याङ्ग बलहीनस्य पुत्रान् भ्रातॄनपश्यतः ॥ ५५ ॥

निर्वेदो जीविते कृष्ण सर्वतश्चोपजायते । युद्ध समाप्त होनेतक कितने ही विपक्षी सैनिक विजयी योद्धाके अनेक प्रियजनोंको मार डालते हैं। जो विजय पाता है, वह भी ( कुटुम्ब और धनसम्बन्धी ) बलसे शून्य हो जाता है और कृष्ण! जब वह युद्धमें मारे गये अपने पुत्रों और भाइयोंको नहीं देखता है, तो वह सब ओरसे विरक्त हो जाता है; उसे अपने जीवनसे भी वैराग्य हो जाता है ॥ ५५३ ॥

ये ह्येव धीरा ह्रीमन्त आर्याः करुणवेदिनः ॥ ५६ ॥

त एव युद्धे हन्यन्ते यवीयान् मुच्यते जनः ।

हत्वाप्यनुशयो नित्यं परानपि जनार्दन ॥ ५७ ॥

जो लोग धीर- वीर, लज्जाशील, श्रेष्ठ और दयालु हैं, वे ही प्रायः युद्धमें मारे जाते हैं और अधम श्रेणीके मनुष्य जीवित बच जाते हैं । जनार्दन! शत्रुओंको मारनेपर भी उनके लिये सदा मनमें पश्चात्ताप बना रहता है ॥ ५६-५७ ॥

अनुबन्धश्च पापोऽत्र शेषश्चाप्यवशिष्यते ।

शेषो हि बलमासाद्य न शेषमनुशेषयेत् ॥ ५८ ॥

सर्वोच्छेदे च यतते वैरस्यान्तविधित्सया । भागे हुए शत्रुका पीछा करना अनुबन्ध कहलाता है, यह भी पापपूर्ण कार्य है । मारे जानेवाले शत्रुओंमेंसे कोई- कोई बचा रह जाता है । वह अवशिष्ट शत्रु शक्तिका संचय करके विजेताके पक्षमें जो लोग बचे हैं, उनमें से किसीको जीवित नहीं छोड़ना चाहता । वह शत्रुका अन्त कर डालनेकी इच्छासे विरोधी दलको सम्पूर्णरूपसे नष्ट कर देनेका प्रयत्न करता है ॥ ५८३ ॥

जयो वैरं प्रसृजति दुःखमास्ते पराजितः ॥ ५ ९ ॥ सुखं प्रशान्तः स्वपिति हित्वा जयपराजयौ । विजयकी प्राप्ति भी चिरस्थायी शत्रुताकी सृष्टि करती है। पराजित पक्ष बड़े दुःखसे समय बिताता है । जो किसीसे शत्रुता न रखकर शान्तिका आश्रय लेता है, वह जय-पराजयकी चिन्ता छोड़कर सुखसे सोता है ॥ ५ ९ ३ ॥ जातवैरश्च पुरुषो दुःखं स्वपिति नित्यदा ॥ ६० ॥

अनिवृत्तेन मनसा ससर्प इव वेश्मनि । किसीसे वैर बाँधनेवाला पुरुष सर्पयुक्त गृहमें रहनेवालेकी भाँति उद्विग्नचित्त होकर सदा दुःखकी नींद सोता है ॥ ६०३ ॥

पृष्ठ 550

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उत्सादयति यः सर्वं यशसा स विमुच्यते ॥ ६१ ॥

अकीर्तिं सर्वभूतेषु शाश्वतीं सोऽधिगच्छति । जो शत्रुके कुलमें आबालवृद्ध सभी पुरुषोंका उच्छेद कर डालता है, वह वीरोचित यशसे वंचित हो जाता है । वह समस्त प्राणियोंमें सदा बनी रहनेवाली अपकीर्ति ( निन्दा )-का-भागी होता है ॥ ६१३ ॥

न हि वैराणि शाम्यन्ति दीर्घकालधृतान्यपि ॥ ६२ ॥

आख्यातारश्च विद्यन्ते पुमांश्चेद् विद्यते कुले । दीर्घकालतक मनमें दबाये रखनेपर भी वैरकी आग सर्वथा बुझ नहीं पाती; क्योंकि यदि कोई उस कुलमें विद्यमान है, तो उससे पूर्वघटित वैर बढ़ानेवाली घटनाओंको बतानेवाले बहुत - से लोग मिल जाते हैं ॥ न चापि वैरं वैरेण केशव व्युपशाम्यति ॥ ६३ ॥

हविषाग्निर्यथा कृष्ण भूय एवाभिवर्धते । केशव! जैसे घी डालनेपर आग बुझनेके बजाय और अधिक प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार वैर करनेसे वैरकी आग शान्त नहीं होती, अधिकाधिक बढ़ती ही जाती ॥ ६३३ ॥

अतोऽन्यथा नास्ति शान्तिर्नित्यमन्तरमन्ततः ॥ ६४ ॥

अन्तरं लिप्समानानामयं दोषो निरन्तरः । ( क्योंकि दोनों पक्षोंमें सदा कोई-न- कोई छिद्र मिलनेकी सम्भावना रहती है ) इसलिये दोनों पक्षोंमेंसे एकका सर्वथा नाश हुए बिना पूर्णतः शान्ति नहीं प्राप्त होती है । जो लोग छिद्र ढूँढ़ते रहते हैं, उनके सामने यह दोष निरन्तर प्रस्तुत रहता है ॥ ६४ ॥

पौरुषे यो हि बलवानाधिर्हृदयबाधनः ।

तस्य त्यागेन वा शान्तिर्मरणेनापि वा भवेत् ॥ ६५ ॥

यदि अपनेमें पुरुषार्थ है, तो पूर्ववैरको याद करके जो हृदयको पीड़ा देनेवाली प्रबल चिन्ता सदा बनी रहती है, उसे वैराग्यपूर्वक त्याग देनेसे ही शान्ति मिल सकती है; अथवा मर जानेसे ही उस चिन्ताका निवारण हो सकता है ॥

अथवा मूलघातेन द्विषतां मधुसूदन ।

फलनिर्वृत्तिरिद्धा स्यात् तन्नृशंसतरं भवेत् ॥ ६६ ॥

अथवा शत्रुओंको समूल नष्ट कर देनेसे ही अभीष्ट फलकी सिद्धि हो सकती है । परंतु मधुसूदन! यह बड़ी क्रूरताका कार्य होगा ॥ ६६ ॥

या तु त्यागेन शान्तिः स्यात् तदृते वध एव सः ।

संशयाच्च समुच्छेदाद् द्विषतामात्मनस्तथा ॥ ६७ ॥

राज्यको त्याग देनेसे उसके बिना जो शान्ति मिलती है, वह भी वधके ही समान है । क्योंकि उस दशामें शत्रुओंसे सदा यह संदेह बना रहता है कि ये अवसर देखकर प्रहार करेंगे