03.Mahabharata Volume 3 — पृष्ठ 551–560

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 551–560

पृष्ठ 551

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और धन - सम्पत्तिसे वंचित होनेके कारण अपने विनाशकी सम्भावना भी रहती ही है ॥ ६७ ॥

न च त्यक्तुं तदिच्छामो न चेच्छामः कुलक्षयम् ।

अत्र या प्रणिपातेन शान्तिः सैव गरीयसी ॥ ६८ ॥

अतः हमलोग न तो राज्य त्यागना चाहते हैं और न कुलके विनाशकी ही इच्छा रखते हैं । यदि नम्रता दिखानेसे भी शान्ति हो जाय तो वही सबसे बढ़कर है ॥

सर्वथा यतमानानामयुद्धमभिकाङ्क्षताम् ।

सान्त्वे प्रतिहते युद्धं प्रसिद्धं नापराक्रमः ॥ ६ ९ ॥

यद्यपि हम युद्धकी इच्छा न रखकर साम, दान और भेद सभी उपायोंसे राज्यकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न कर रहे हैं, तथापि यदि हमारी सामनीति असफल हुई तो युद्ध ही हमारा प्रधान कर्तव्य होगा, हम पराक्रम छोड़कर बैठ नहीं सकते ॥ ६ ९ ॥

प्रतिघातेन सान्त्वस्य दारुणं सम्प्रवर्तते ।

तच्छुनामिव सम्पाते पण्डितैरुपलक्षितम् ॥ ७० ॥

जब शान्तिके प्रयत्नोंमें बाधा आती है, तब भयंकर युद्ध स्वतः आरम्भ हो जाता है ।

पण्डितोंने इस युद्धकी उपमा कुत्तोंके कलहसे दी है ॥ ७० ॥

लाङ्गूलचालनं क्ष्वेडा प्रतिवाचो विवर्तनम् ।

दन्तदर्शनमारावस्ततो युद्धं प्रवर्तते ॥ ७१ ॥

कुत्ते पहले पूँछ हिलाते हैं, फिर गुर्राते और गर्जते हैं । तत्पश्चात् एक- दूसरेके निकट पहुँचते हैं । फिर दाँत दिखाना और भूकना आरम्भ करते हैं। तत्पश्चात् उनमें युद्ध होने लगता है ॥ ७१ ॥

तत्र यो बलवान् कृष्ण जित्वा सोऽत्ति तदामिषम् ।

एवमेव मनुष्येषु विशेषो नास्ति कश्चन ॥ ७२ ॥

श्रीकृष्ण! उनमें जो बलवान् होता है, वही उस मांसको खाता है, जिसके लिये कि

उनमें लड़ाई हुई थी । यही दशा मनुष्योंकी है । इनमें कोई विशेषता नहीं है * ॥ ७२ ॥

सर्वथा त्वेतदुचितं दुर्बलेषु बलीयसाम् ।

अनादरोऽविरोधश्च प्रणिपाती हि दुर्बलः ॥ ७३ ॥

यह सर्वथा उचित है कि बलवानोंकी दुर्बलोंके प्रति आदरबुद्धि न हो । वे उसका विरोध भी नहीं करते । दुर्बल वही है, जो सदा झुकनेके लिये तैयार रहे ॥ ७३ ॥

पिता राजा च वृद्धश्च सर्वथा मानमर्हति ।

तस्मान्मान्यश्च पूज्यश्च धृतराष्ट्रो जनार्दन ॥ ७४ ॥

जनार्दन! पिता, राजा और वृद्ध सर्वथा समादरके ही योग्य हैं । अतः धृतराष्ट्र हमारे लिये सदा माननीय एवं पूजनीय हैं ॥ ७४ ॥

पुत्रस्नेहश्च बलवान् धृतराष्ट्रस्य माधव ।

पृष्ठ 552

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स पुत्रवशमापन्नः प्रणिपातं प्रहास्यति ॥ ७५ ॥

माधव! धृतराष्ट्रमें अपने पुत्रके प्रति प्रबल आसक्ति है । वे पुत्रके वशमें होनेके कारण कभी झुकना नहीं स्वीकार करेंगे ॥ ७५ ॥

तत्र किं मन्यसे कृष्ण प्राप्तकालमनन्तरम् ।

कथमर्थाच्च धर्माच्च न हीयेमहि माधव ॥ ७६ ॥

माधव श्रीकृष्ण! ऐसे समयमें आप क्या उचित समझते हैं? हम कैसा बर्ताव करें, जिससे हमें अर्थ और धर्मसे भी वंचित न होना पड़े? ॥ ७६ ॥

ईदृशेऽत्यर्थकृच्छ्रेऽस्मिन् कमन्यं मधुसूदन ।

उपसम्प्रष्टुमर्हामि त्वामृते पुरुषोत्तम ॥ ७७ ॥

पुरुषोत्तम मधुसूदन! ऐसे महान् संकटके समय हम आपको छोड़कर और किससे सलाह ले सकते हैं ॥

प्रियश्च प्रियकामश्च गतिज्ञः सर्वकर्मणाम् ।

को हि कृष्णास्ति नस्त्वादृक् सर्वनिश्चयवित् सुहृत् ॥ ७८ ॥

श्रीकृष्ण! आपके समान हमारा प्रिय, हितैषी, समस्त कर्मोंके परिणामको जाननेवाला और सभी बातोंमें एक निश्चित सिद्धान्त रखनेवाला सुहृद् कौन है? ॥ ७८ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः प्रत्युवाच धर्मराजं जनार्दनः ।

उभयोरेव वामर्थे यास्यामि कुरुसंसदम् ॥ ७९ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने उनसे कहा– ' राजन्! मैं दोनों पक्षोंके हितके लिये कौरवोंकी सभामें जाऊँगा ॥ ७ ९ ॥

शमं तत्र लभेयं चेद् युष्मदर्थमहापयन् ।

पुण्यं मे सुमहद् राजंश्चरितं स्यान्महाफलम् ॥ ८० ॥

‘ वहाँ जाकर आपके लाभमें किसी प्रकारकी बाधा न पहुँचाते हुए यदि मैं दोनों पक्षोंमें संधि करा सका, तो समझँगा कि मेरे द्वारा यह महान् फलदायक एवं बहुत बड़ा पुण्यकर्म सम्पन्न हो गया ॥ ८० ॥

मोचयेयं मृत्युपाशात् संरब्धान् कुरुसृजयान् ।

पाण्डवान् धार्तराष्ट्रांश्च सर्वां च पृथिवीमिमाम् ॥ ८१ ॥

‘ ऐसा होनेपर एक- दूसरेके प्रति रोषमें भरे हुए इन कौरवों, सृजयों, पाण्डवों और धृतराष्ट्रपुत्रोंको तथा इस सारी पृथ्वीको भी मानो मैं मौतके फंदेसे छुड़ा लूँगा' ॥ ८१ ॥

युधिष्ठिर उवाच न ममैतन्मतं कृष्ण यत् त्वं यायाः कुरून् प्रति ।

पृष्ठ 553

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सुयोधनः सूक्तमपि न करिष्यति ते वचः ॥ ८२ ॥

युधिष्ठिर बोले – श्रीकृष्ण! मेरा यह विचार नहीं है कि आप कौरवोंके यहाँ जायँ; क्योंकि आपकी कही हुई अच्छी बातोंको भी दुर्योधन नहीं मानेगा ॥ ८२ ॥

समेतं पार्थिवं क्षत्रं दुर्योधनवशानुगम् ।

तेषां मध्यावतरणं तव कृष्ण न रोचये ॥ ८३ ॥

इसके सिवा इस समय दुर्योधनके वशमें रहनेवाले भूमण्डलके सभी क्षत्रिय वहाँ एकत्र हुए हैं । उनके बीचमें आपका जाना मुझे अच्छा नहीं लगता ॥ ८३ ॥

न हि नः प्रीणयेद् द्रव्यं न देवत्वं कुतः सुखम् ।

न च सर्वामरैश्वर्यं तव द्रोहेण माधव ॥। ८४ ॥

माधव! यदि दुर्योधनने द्रोहवश आपके साथ कोई अनुचित बर्ताव किया, तो धन, सुख, देवत्व तथा सम्पूर्ण देवताओंका ऐश्वर्य भी हमें प्रसन्न नहीं कर सकेगा ॥ ८४ ॥

श्रीभगवानुवाच

जानाम्येतां महाराज धार्तराष्ट्रस्य पापताम् ।

अवाच्यास्तु भविष्यामः सर्वलोके महीक्षिताम् ॥ ८५ ॥

श्रीभगवान्ने कहा — महाराज! धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन कितना पापाचारी है, यह मैं जानता हूँ, तथापि वहाँ जाकर संधिके लिये प्रयत्न करनेपर हम सब लोग सम्पूर्ण जगत्के राजाओंकी दृष्टिमें निन्दाके पात्र न होंगे ॥ ८५ ॥

न चापि मम पर्याप्ताः सहिताः सर्वपार्थिवाः ।

क्रुद्धस्य संयुगे स्थातुं सिंहस्येवेतरे मृगाः ॥ ८६ ॥

( मेरे तिरस्कारके भयसे भी आप चिन्तित न हों, क्योंकि) जैसे क्रोधमें भरे हुए सिंहके सामने दूसरे पशु नहीं ठहर सकते हैं, उसी प्रकार यदि मैं कोप करूँ, तो संसारके सारे भूपाल मिलकर भी युद्धमें मेरे सामने खड़े नहीं हो सकते हैं ॥ ८६ ॥

अथ चेत् ते प्रवर्तन्ते मयि किञ्चिदसाम्प्रतम् ।

निर्दहेयं कुरून् सर्वानिति मे धीयते मतिः ॥ ८७ ॥

यदि वेमेरे साथ थोड़ा--सा भी अनुचित बर्ताव करेंगे, तो मैं उन समस्त कौरवोंको जलाकर भस्म कर डालूँगा; यह मेरा निश्चित विचार है ॥ ८७ ॥

न जातु गमनं पार्थ भवेत् तत्र निरर्थकम् ।

अर्थप्राप्तिः कदाचित् स्यादन्ततो वाप्यवाच्यता ॥ ८८ ॥

अतः कुन्तीनन्दन! मेरा वहाँ जाना कदापि निरर्थक नहीं होगा । सम्भव है, वहाँ अपने अभीष्ट अर्थकी सिद्धि हो जाय और यदि काम न बना, तो भी हम निन्दासे तो बच ही जायँगे ॥ ८८ ॥

युधिष्ठिर उवाच

पृष्ठ 554

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यत् तुभ्यं रोचते कृष्ण स्वस्ति प्राप्नुहि कौरवान् ।

कृतार्थं स्वस्तिमन्तं त्वां द्रक्ष्यामि पुनरागतम् ॥ ८९ ॥

युधिष्ठिर बोले – श्रीकृष्ण! आपकी जैसी रुचि हो, वही कीजिये । आपका कल्याण हो । आप प्रसन्नतापूर्वक कौरवोंके पास जाइये । आशा है, मैं पुनः आपको अपने कार्यमें सफल होकर यहाँ सकुशल लौटा हुआ देखूँगा ॥ ८९ ॥

विष्वक्सेन कुरून् गत्वा भरताञ्छमय प्रभो ।

यथा सर्वे सुमनसः सह स्याम सुचेतसः ॥ ९ ० ॥

विष्वक्सेन प्रभो! आप कुरुदेशमें जाकर भरत- वंशियोंको शान्त कीजिये, जिससे हम सब लोग शुद्ध हृदयसे प्रसन्नचित्त होकर एक साथ रह सकें ॥ ९ ० ॥

भ्राता चासि सखा चासि बीभत्सोर्मम च प्रियः ।

सौहृदेनाविशङ्क्योऽसि स्वस्ति प्राप्नुहि भूतये ॥ ९ १ ॥

आप हमलोगोंके भाई और मित्र हैं । अर्जुनके तथा मेरे भी प्रीतिभाजन हैं । आपके सौहार्दके विषयमें हमारे मनमें कोई शंका नहीं है । अतः आप उभय पक्षोंकी भलाईके लिये

वहाँ जाइये । आपका कल्याण हो ॥ ९ १ ॥

अस्मान् वेत्थ परान् वेत्थ वेत्थार्थान् वेत्थ भाषितुम् ।

यद् यदस्मद्धितं कृष्ण तत् तद् वाच्यः सुयोधनः ॥ ९ २ ॥

श्रीकृष्ण! आप हमको जानते हैं, कौरवोंको भी जानते हैं, हम दोनोंके स्वार्थोंसे भी आप अपरिचित नहीं हैं और बातचीत कैसे करनी चाहिये, यह भी आपको अच्छी तरह ज्ञात है । अतः जिस - जिस बातसे हमारा हित हो, वह सब आप दुर्योधनको बतावें ॥ ९ २ ॥

यद् यद् धर्मेण संयुक्तमुपपद्येद्धितं वचः ।

तत् तत् केशव भाषेथाः सान्त्वं वा यदि वेतरत् ॥ ९ ३ ॥

केशव! जो - जो बात धर्मसंगत, युक्तियुक्त और हितकर हो, वह सब कोमल हो या कठोर, आप अवश्य कहें ॥ ९ ३ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि युधिष्ठिरकृतकृष्णप्रेरणे द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णको प्रेरणाविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥

[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५३ श्लोक मिलाकर कुल ९ ८३ श्लोक हैं । ] * कुत्तोंके दुम हिलानेके समान राजाओंका ध्वज- कम्पन है, उनके गुर्रानेकी जगह उनका सिंहनाद है । कुत्ते जो एक- दूसरेको देखकर गर्जते हैं, उसी प्रकार दो विरोधी क्षत्रिय एक- दूसरेके प्रति उत्तर- प्रत्युत्तरके रूपमें आक्षेपजनक बातें कहते हैं । एक- दूसरेके निकट जाना दोनोंमें समानरूपसे होता है। राजालोग क्रोधमें आकर जो दाँतोंसे होठ चबाते हैं, यही

पृष्ठ 555

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कुत्तोंके समान उनका दाँत दिखाना है । विकट गर्जन- तर्जन भूकना है और युद्ध करना ही कुत्तोंके समान लड़ना है । राज्यकी प्राप्ति ही वह मांसका टुकड़ा है, जिसके लिये उनमें लड़ाई होती है ।

पृष्ठ 556

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त्रिसप्ततितमोऽध्यायः श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको युद्धके लिये प्रोत्साहन देना श्रीभगवानुवाच

संजयस्य श्रुतं वाक्यं भवतश्च श्रुतं मया ।

सर्वं जानाम्यभिप्रायं तेषां च भवतश्च यः ॥ १ ॥

श्रीभगवान् बोले – राजन्! मैंने संजयकी और आपकी भी बातें सुनी हैं । कौरवोंका क्या अभिप्राय है, वह सब मैं जानता हूँ और आपका जो विचार है, उससे भी मैं अपरिचित नहीं हूँ ॥ १ ॥

तव धर्माश्रिता बुद्धिस्तेषां वैराश्रया मतिः ।

यदयुद्धेन लभ्येत तत् ते बहुमतं भवेत् ॥ २ ॥

आपकी बुद्धि धर्ममें स्थित है और उनकी बुद्धिने शत्रुताका आश्रय ले रखा है । आप तो बिना युद्ध किये जो कुछ मिल जाय, उसीको बहुत समझेंगे ॥ २ ॥

न चैवं नैष्ठिकं कर्म क्षत्रियस्य विशाम्पते ।

आहुराश्रमिणः सर्वे न भैक्षं क्षत्रियश्चरेत् ॥ ३ ॥

परंतु महाराज! यह क्षत्रियका नैष्ठिक ( स्वाभाविक ) कर्म नहीं है । सभी आश्रमोंके श्रेष्ठ पुरुषोंका यह कथन है कि क्षत्रियको भीख नहीं माँगनी चाहिये ॥ ३ ॥

यो वधो वा संग्रामे धात्राऽऽदिष्टः सनातनः ।

स्वधर्मः क्षत्रियस्यैष कार्पण्यं न प्रशस्यते ॥ ४ ॥

उसके लिये विधाताने यही सनातन कर्तव्य बताया है कि वह संग्राममें विजय प्राप्त करे अथवा वहीं प्राण दे दे । यही क्षत्रियका स्वधर्म है । दीनता अथवा कायरता उसके लिये प्रशंसाकी वस्तु नहीं है ॥ ४ ॥

न हि कार्पण्यमास्थाय शक्या वृत्तिर्युधिष्ठिर ।

विक्रमस्व महाबाहो जहि शत्रून् परंतप ॥ ५ ॥

महाबाहु युधिष्ठिर! दीनताका आश्रय लेनेसे क्षत्रियकी जीविका नहीं चल सकती । शत्रुओंको संताप देनेवाले महाराज! अब पराक्रम दिखाइये और शत्रुओंका संहार कीजिये ॥ ५ ॥

अतिगृद्धाः कृतस्नेहा दीर्घकालं सहोषिताः ।

कृतमित्राः कृतबला धार्तराष्ट्राः परंतप ॥ ६ ॥

परंतप! धृतराष्ट्रके पुत्र बड़े लोभी हैं । इधर उन्होंने बहुत - से मित्र - राजाओंका संग्रह कर

लिया है और उनके साथ दीर्घकालतक रहकर अपने प्रति उनका स्नेह भी बढ़ा लिया है ।

(शिक्षा और अभ्यास आदिके द्वारा भी ) उन्होंने विशेष शक्तिका संचय कर लिया है ॥ ६ ॥

पृष्ठ 557

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न पर्यायोऽस्ति यत् साम्यं त्वयि कुर्युर्विशाम्पते ।

बलवत्तां हि मन्यन्ते भीष्मद्रोणकृपादिभिः ॥ ७ ॥

अतः प्रजानाथ! ऐसा कोई उपाय नहीं है, जिससे ( वे आपको आधा राज्य देकर ) आपके प्रति समता ( सन्धि ) स्थापित करें । भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदि उनके पक्षमें हैं, इसलिये वे अपनेको आपसे अधिक बलवान् समझते हैं ॥ ७ ॥

यावच्च मार्दवेनैतान् राजन्नुपचरिष्यसि ।

तावदेते हरिष्यन्ति तव राज्यमरिंदम ॥ ८ ॥

अतः शत्रुदमन राजन्! जबतक आप इनके साथ नर्मीका बर्ताव करेंगे, तबतक ये आपके राज्यका अपहरण करनेकी ही चेष्टा करेंगे ॥ ८ ॥

नानुक्रोशान्न कार्पण्यान्न च धर्मार्थकारणात् ।

अलं कर्तुं धार्तराष्ट्रास्तव काममरिंदम ॥ ९ ॥

शत्रुमर्दन नरेश! आप यह न समझें कि धृतराष्ट्रके पुत्र आपपर कृपा करके या अपनेको दीन - दुर्बल मानकर अथवा धर्म एवं अर्थकी ओर दृष्टि रखकर आपका मनोरथ पूर्ण कर देंगे ॥ ९ ॥

एतदेव निमित्तं ते पाण्डवास्तु यथा त्वयि ।

नान्वतप्यन्त कौपीनं तावत् कृत्वापि दुष्करम् ॥ १० ॥

पाण्डुनन्दन! कौरवोंके सन्धि न करनेका सबसे बड़ा कारण या प्रमाण तो यही है कि उन्होंने आपको कौपीन धारण कराकर तथा उतने दीर्घकालतकके लिये वनवासका दुष्कर कष्ट देकर भी कभी इसके लिये पश्चात्ताप नहीं किया ॥ १० ॥

पितामहस्य द्रोणस्य विदुरस्य च धीमतः ।

ब्राह्मणानां च साधूनां राज्ञश्च नगरस्य च ॥ ११ ॥

पश्यतां कुरुमुख्यानां सर्वेषामेव तत्त्वतः ।

दानशीलं मृदुं दान्तं धर्मशीलमनुव्रतम् ॥ १२ ॥

यत् त्वामुपधिना राजन् द्यूते वञ्चितवांस्तदा ।

न चापत्रपते तेन नृशंसः स्वेन कर्मणा ॥ १३ ॥

राजन्! आप दानशील, कोमलस्वभाव, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले, स्वभावतः धर्मपरायण तथा सबके हैं, तो भी क्रूर दुर्योधनने उस समय पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, बुद्धिमान् विदुर, साधु, ब्राह्मण, राजा धृतराष्ट्र, नगरनिवासी जनसमुदाय तथा कुरुकुलके सभी श्रेष्ठ पुरुषोंके देखते - देखते आपको जूएमें छलसे ठग लिया और अपने उस कुकृत्यके लिये वह अबतक लज्जाका अनुभव नहीं करता है ॥ ११–१३ ॥

तथाशीलसमाचारे राजन् मा प्रणयं कृथाः ।

वध्यास्ते सर्वलोकस्य किं पुनस्तव भारत ॥ १४ ॥

पृष्ठ 558

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राजन्! ऐसे कुटिलस्वभाव और खोटे आचरणवाले दुर्योधनके प्रति आप प्रेम न दिखावें । भारत! धृतराष्ट्रके वे पुत्र तो सभी लोगोंके वध्य हैं; फिर आप उनका वध करें, इसके लिये तो कहना ही क्या है? ॥ १४ ॥

वाग्भिस्त्वप्रतिरूपाभिरतुदत् त्वां सहानुजम् ।

श्लाघमानः प्रहृष्टः सन् भ्रातृभिः सह भाषते ॥ १५ ॥

एतावत् पाण्डवानां हि नास्ति किंचिदिह स्वकम् ।

नामधेयं च गोत्रं च तदप्येषां न शिष्यते ॥ १६ ॥

(क्या आप वह दिन भूल गये, जब कि ) दुर्योधनने भाइयोंसहित आपको अपने अनुचित वचनोंद्वारा मार्मिक पीड़ा पहुँचायी थी । वह अत्यन्त हर्षसे फूलकर अपनी मिथ्या प्रशंसा करता हुआ अपने भाइयोंके साथ कहता था- ' अब पाण्डवोंके पास इस संसारमें ‘ अपनी' कहनेके लिये इतनी- सी भी कोई वस्तु नहीं रह गयी है । केवल नाम और गोत्र बचा है, परंतु वह भी शेष नहीं रहेगा' ॥ १५-१६ ॥

कालेन महता चैषां भविष्यति पराभवः ।

प्रकृतिं ते भजिष्यन्ति नष्टप्रकृतयो मयि ॥ १७ ॥

‘ दीर्घकालके पश्चात् इनकी भारी पराजय होगी । इनकी स्वाभाविक शूरता- वीरता आदि नष्ट हो जायगी और ये मेरे पास ही प्राणत्याग करेंगे ' ॥ १७ ॥

दुःशासनेन पापेन तदा द्यूते प्रवर्तिते ।

अनाथवत् तदा देवी द्रौपदी सुदुरात्मना ॥ १८ ॥

आकृष्य केशे रुदती सभायां राजसंसदि ।

भीष्मद्रोणप्रमुखतो गौरिति व्याहृता मुहुः ॥ १ ९ ॥

उन दिनों जब जूएका खेल चल रहा था, अत्यन्त दुरात्मा पापी दुःशासन अनाथकी भाँति रोती- कलपती हुई महारानी द्रौपदीको उनके केश पकड़कर राजसभामें घसीट लाया और भीष्म तथा द्रोणाचार्य आदिके समक्ष उसने उनका उपहास करते हुए बारंबार उसे ' गाय ' कहकर पुकारा ॥ १८-१९ ॥

भवता वारिताः सर्वे भ्रातरो भीमविक्रमाः ।

धर्मपाशनिबद्धाश्च न किंचित् प्रतिपेदिरे ॥ २० ॥

यद्यपि आपके भाई भयंकर पराक्रम प्रकट करनेमें समर्थ थे, तथापि आपने इन्हें रोक दिया, इसलिये धर्मबन्धनमें बँधे होनेके कारण ये उस समय उस अन्यायका कुछ भी प्रतीकार न कर सके ॥ २० ॥

एताश्चान्याश्च परुषा वाचः स समुदीरयन् ।

श्लाघते ज्ञातिमध्ये स्म त्वयि प्रव्रजिते वनम् ॥ २१ ॥

जब आप वनकी ओर जाने लगे, उस समय भी वह बन्धु बान्धवोंके बीचमें ऊपर कही हुई तथा और भी बहुत - सी कठोर बातें कहकर अपनी प्रशंसा करता रहा ॥ २१ ॥

पृष्ठ 559

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ये तत्रासन् समानीतास्ते दृष्ट्वा त्वामनागसम् ।

अश्रुकण्ठा रुदन्तश्च सभायामासते तदा ॥ २२ ॥

जो लोग वहाँ बुलाये गये थे, वे सभी नरेश आपको निरपराध देखकर रोते और आँसू बहाते हुए रुँधे हुए कण्ठसे उस समय चुपचाप सभामें बैठे रहे ॥

न चैनमभ्यनन्दंस्ते राजानो ब्राह्मणैः सह ।

सर्वे दुर्योधनं तत्र निन्दन्ति स्म सभासदः ॥ २३ ॥

ब्राह्मणोंसहित उन राजाओंने वहाँ दुर्योधनकी प्रशंसा नहीं की । उस समय सभी सभासद् उसकी निन्दा ही कर रहे थे ॥ २३ ॥

कुलीनस्य च या निन्दा वधो वामित्रकर्शन ।

महागुणो वधो राजन् न तु निन्दा कुजीविका ॥ २४ ॥

शत्रुसूदन! कुलीन पुरुषकी निन्दा हो या वध - इनमेंसे वध ही उसके लिये अत्यन्त

गुणकारक है; निन्दा नहीं । निन्दा तो जीवनको घृणित बना देती है ॥

तदैव निहतो राजन् यदैव निरपत्रपः ।

निन्दितश्च महाराज पृथिव्यां सर्वराजभिः ॥ २५ ॥

महाराज! जब इस भूमण्डलके सभी राजाओंने निन्दा की, उसी समय उस निर्लज्ज दुर्योधनकी एक प्रकारसे मृत्यु हो गयी ॥ २५ ॥

ईषत् कार्यो वधस्तस्य यस्य चारित्रमीदृशम् ।

प्रस्कन्देन प्रतिस्तब्धश्छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ २६ ॥

जिसका चरित्र इतना गिरा हुआ है, उसका वध करना तो बहुत साधारण कार्य है । जिसकी जड़ कट गयी हो और जो गोल वेदीके आधारपर खड़ा हो, उस वृक्षकी भाँति दुर्योधनके भी धराशायी होनेमें अब अधिक विलम्ब नहीं है ॥ २६ ॥

वध्यः सर्प इवानार्यः सर्वलोकस्य दुर्मतिः ।

जह्येनं त्वममित्रघ्न मा राजन् विचिकित्सिथाः ॥ २७ ॥

खोटी बुद्धिवाला दुराचारी दुर्योधन दुष्ट सर्पकी भाँति सब लोगोंके लिये वध्य है । शत्रुओंका नाश करनेवाले महाराज! आप दुविधामें न पड़ें, इस दुष्टको अवश्य मार डालें ॥ २७ ॥

सर्वथा त्वत्क्षमं चैतद् रोचते च ममानघ ।

यत् त्वं पितरि भीष्मे च प्रणिपातं समाचरेः ॥ २८ ॥

निष्पाप नरेश! आप जो पितृतुल्य धृतराष्ट्र तथा पितामह भीष्मके प्रति प्रणाम एवं नम्रतापूर्ण बर्ताव करते हैं, वह सर्वथा आपके योग्य है । मैं भी इसे पसंद करता हूँ ॥ २८ ॥

अहं तु सर्वलोकस्य गत्वा छेत्स्यामि संशयम् ।

येषामस्ति द्विधाभावो राजन् दुर्योधनं प्रति ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 560

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राजन्! दुर्योधनके सम्बन्धमें जिन लोगोंका मन दुविधामें है— जो लोग उसके अच्छे या बुरे होनेका निर्णय नहीं कर सके हैं, उन सब लोगोंका संदेह मैं वहाँ जाकर दूर कर दूँगा ॥ २ ९ ॥

मध्ये राज्ञामहं तत्र प्रातिपौरुषिकान् गुणान् ।

तव संकीर्तयिष्यामि ये च तस्य व्यतिक्रमाः ॥ ३० ॥

मैं राजसभामें जुटे हुए भूपालोंकी मण्डलीमें आपके सर्वसाधारण गुणोंका वर्णन और दुर्योधनके दोषों तथा अपराधोंका उद्घाटन करूँगा ॥ ३० ॥

ब्रुवतस्तत्र मे वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् ।

निशम्य पार्थिवाः सर्वे नानाजनपदेश्वराः ॥ ३१ ॥

त्वयि सम्प्रतिपत्स्यन्ते धर्मात्मा सत्यवागिति ।

तस्मिंश्चाधिगमिष्यन्ति यथा लोभादवर्तत ॥ ३२ ॥

मेरे मुखसे धर्म और अर्थसे संयुक्त हितकर वचन सुनकर नाना जनपदोंके स्वामी समस्त भूपाल आपके विषयमें यह निश्चितरूपसे समझ लेंगे कि युधिष्ठिर धर्मात्मा तथा सत्यवादी हैं और दुर्योधनके सम्बन्धमें भी उन्हें यह निश्चय हो जायगा कि उसने लोभसे प्रेरित होकर ही सारा अनुचित बर्ताव किया है ॥ ३१-३२ ॥

गर्हयिष्यामि चैवैनं पौरजानपदेष्वपि ।

वृद्धबालानुपादाय चातुर्वर्ण्य समागते ॥ ३३ ।

मैं वहाँ आये हुए चारों वर्णोंके आबालवृद्ध जनसमुदायको अपनाकर उनके सामने तथा पुरवासियों और देशवासियोंके समक्ष भी इस दुर्योधनकी निन्दा करूँगा ॥ ३३ ॥

शमं वै याचमानस्त्वं नाधर्मं तत्र लप्स्यसे ।

कुरून् विगर्हयिष्यन्ति धृतराष्ट्रं च पार्थिवाः ॥ ३४ ॥

वहाँ शान्तिके लिये याचना करनेपर आप अधर्मके भी भागी न होंगे । सब राजा कौरवोंकी तथा धृतराष्ट्रकी ही निन्दा करेंगे ॥ ३४ ॥

तस्मिँल्लोकपरित्यक्ते किं कार्यमवशिष्यते ।

हते दुर्योधने राजन् यदन्यत् क्रियतामिति ॥ ३५ ॥

सब लोग दुर्योधनको अन्यायी समझकर त्याग देंगे और वह निन्दनीय होनेके कारण नष्टप्राय हो जायगा । उस दशामें आपका दूसरा कौन-सा कार्य शेष रह जाता है जिसे सम्पन्न किया जाय ॥ ३५ ॥

यात्वा चाहं कुरून् सर्वान् युष्मदर्थमहापयन् ।

यतिष्ये प्रशमं कर्तुं लक्षयिष्ये च चेष्टितम् ॥ ३६ ॥

वहाँ पहुँचकर आपके स्वार्थकी सिद्धिमें तनिक भी त्रुटि न आने देते हुए मैं समस्त कौरवोंसे सन्धिस्थापनके लिये प्रयत्न करूँगा और उनकी चेष्टाओंपर दृष्टि रखूँगा ॥ ३६ ॥

कौरवाणां प्रवृत्तिं च गत्वा युद्धाधिकारिकाम् ।