04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1481–1490
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1481–1490
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निपतेयुः सपत्नेषु विक्रमत्स्वपि भारत । ‘ भारत! मैं जैसा - जैसा चाहूँगा, वैसा ही रूप धारण करके मेरे बाण शत्रुओंके पराक्रम करनेपर भी उनपर पड़ेंगे ॥ ४१३ ॥
यथेष्टमश्मवर्षेण प्रवर्षिष्ये रणे स्थितः ॥ ४२ ॥
अयोमुखैश्च विहगैर्द्रावयिष्ये महारथान् ।
परश्वधांश्च निशितानुत्स्रक्ष्येऽहमसंशयम् ॥ ४३ ॥
' मैं युद्धमें स्थित होकर अपनी इच्छाके अनुसार पत्थरोंकी वर्षा करूँगा, लोहेकी चोंचवाले पक्षियोंद्वारा बड़े - बड़े महारथियोंको भगा दूँगा तथा शत्रुओंपर तेज धारवाले फरसे भी बरसाऊँगा; इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ ४२-४३ ॥
सोऽहं नारायणास्त्रेण महता शत्रुतापनः ।
शत्रून् विध्वंसयिष्यामि कदर्थीकृत्य पाण्डवान् ॥ ४४ ॥
‘ इस प्रकार शत्रुओंको संताप देनेवाला मैं महान् नारायणास्त्रका प्रयोग करके पाण्डवोंको पीड़ा देता हुआ अपने समस्त शत्रुओंका विध्वंस कर डालूँगा ॥ ४४ ॥
मित्रब्रह्मगुरुद्रोही जाल्मकः सुविगर्हितः ।
पाञ्चालापसदश्चाद्य न मे जीवन् विमोक्ष्यते ॥ ४५ ॥
‘ मित्र, ब्राह्मण तथा गुरुसे द्रोह करनेवाला अत्यन्त निन्दित वह पांचालकुलकलंक पामर धृष्टद्युम्न भी आज मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकेगा ' ॥ ४५ ॥
तच्छ्रुत्वा द्रोणपुत्रस्य पर्यवर्तत वाहिनी ।
ततः सर्वे महाशङ्खान् दध्मुः पुरुषसत्तमाः ॥ ४६ ॥
द्रोणपुत्र अश्वत्थामाकी वह बात सुनकर कौरवोंकी सेना लौट आयी । फिर तो सभी पुरुषश्रेष्ठ वीर बड़े -बड़े शंख बजाने लगे ॥ ४६ ॥
भेरीश्चाभ्यहनन् हृष्टा डिण्डिमांश्च सहस्रशः ।
तथा ननाद वसुधा खुरनेमिप्रपीडिता ॥ ४७ ॥
स शब्दस्तुमुलः खं द्यां पृथिवीं च व्यनादयत् । सबने प्रसन्न होकर रणभेरियाँ बजायीं, सहस्रों डंके पीटे, घोड़ोंकी टापों और रथोंके पहियोंसे पीड़ित हुई रणभूमि मानो आर्तनाद करने लगी । वह तुमुल ध्वनि आकाश, अन्तरिक्ष और भूतलको गुँजाने लगी ॥ तं शब्दं पाण्डवाः श्रुत्वा पर्जन्यनिनदोपमम् ॥ ४८ ॥
समेत्य रथिनां श्रेष्ठाः सहिताश्चाप्यमन्त्रयन् । मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान उस तुमुलनादको सुनकर श्रेष्ठ पाण्डव महारथी एकत्र होकर गुप्त मन्त्रणा करने लगे ॥ ४८ ॥
तथोक्त्वा द्रोणपुत्रस्तु वार्युपस्पृश्य भारत ॥ ४ ९ ॥ प्रादुश्चकार तद् दिव्यमस्त्रं नारायणं तदा ॥ ५० ॥
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भारत! द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने पूर्वोक्त बात कहकर जलसे आचमन करके उस समय उस दिव्य नारायणास्त्रको प्रकट किया ॥ ४ ९ -५० ॥ इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि अश्वत्थामक्रोधे पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें अश्वत्थामाका क्रोधविषयक एक सौ पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९५ ॥
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षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः कौरव - सेनाका सिंहनाद सुनकर युधिष्ठिरका अर्जुनसे कारण पूछना और अर्जुनके द्वारा अश्वत्थामाके क्रोध एवं गुरुहत्याके भीषण परिणामका वर्णन संजय उवाच
प्रादुर्भूते ततस्तस्मिन्नस्त्रे नारायणे प्रभो ।
प्रावात् सपृषतो वायुरनभ्रे स्तनयित्नुमान् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — प्रभो! तदनन्तर उस नारायणास्त्रके प्रकट होनेपर जलकी बूँदोंके
साथ प्रचण्ड वायु चलने लगी । बिना बादलोंके ही आकाशमें मेघोंकी गर्जना होने लगी ॥
चचाल पृथिवी चापि चुक्षुभे च महोदधिः ।
प्रतिस्रोतः प्रवृत्ताश्च गन्तुं तत्र समुद्रगाः ॥ २ ॥
पृथ्वी काँप उठी, समुद्रमें ज्वार आ गया और समुद्रमें मिलनेवाली बड़ी -बड़ी नदियाँ अपने प्रवाहकी प्रतिकूल दिशामें बहने लगीं ॥ २ ॥
शिखराणि व्यशीर्यन्त गिरीणां तत्र भारत ।
अपसव्यं मृगाश्चैव पाण्डुसेनां प्रचक्रिरे ॥ ३ ॥
भारत! पर्वतोंके शिखर टूट- टूटकर गिरने लगे । हरिणोंके झुंड पाण्डव -सेनाको अपने दायें करके चले गये ॥
तमसा चावकीर्यन्त सूर्यश्च कलुषोऽभवत् ।
सम्पतन्ति च भूतानि क्रव्यादानि प्रहृष्टवत् ॥ ४ ॥
सम्पूर्ण दिशाओंमें अन्धकार छा गया, सूर्य मलिन हो गये और मांसभोजी जीव- जन्तु प्रसन्न - से होकर दौड़ लगाने लगे ॥ ४ ॥
देवदानवगन्धर्वास्त्रस्तास्त्वासन् विशाम्पते ।
कथंकथाभवत् तीव्रा दृष्ट्वा तद् व्याकुलं महत् ॥ ५ ॥
प्रजानाथ! वह महान् उत्पात देखकर देवता, दानव और गन्धर्व भी त्रस्त हो उठे तथा सब लोगोंमें यह तीव्र गतिसे चर्चा होने लगी कि ' अब क्या करना चाहिये ' ॥ ५ ॥
व्यथिताः सर्वराजानस्त्रस्ताश्चासन् विशाम्पते ।
तद् दृष्ट्वा घोररूपं वै द्रौणेरस्त्रं भयावहम् ॥ ६ ॥
महाराज! अश्वत्थामाके उस घोर एवं भयंकर अस्त्रको देखकर समस्त भूपाल व्यथित एवं भयभीत हो गये ॥ ६ ॥
धृतराष्ट्रउवाच
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निवर्तितेषु सैन्येषु द्रोणपुत्रेण संयुगे भृशं शोकाभितप्तेन पितुर्वधममृष्यता ॥ ७ ॥
कुरूनापततो दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नस्य रक्षणे ।
को मन्त्रः पाण्डवेष्वासीत् तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ८ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा – संजय! अपने पिताके वधको सहन न कर सकनेवाला अत्यन्त शोकसंतप्त द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके साथ जब सारी सेनाएँ युद्धस्थलमें लौट आयीं, तब कौरवोंको आते देख पाण्डवदलमें धृष्टद्युम्नकी रक्षाके लिये क्या विचार हुआ, वह मुझे बताओ ॥ संजय उवाच
प्रागेव विद्रुतान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् युधिष्ठिरः ।
पुनश्च तुमुलं शब्दं श्रुत्वार्जुनमथाब्रवीत् ॥ ९ ॥
संजयने कहा- राजन्! राजा युधिष्ठिरने पहले तो आपके सैनिकोंको भागते देखा था ।
फिर उन्होंने वह भयंकर शब्द सुनकर अर्जुनसे कहा ॥ ९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
आचार्ये निहते द्रोणे धृष्टद्युम्नेन संयुगे ।
निहते वज्रहस्तेन यथा वृत्रे महासुरे ॥ १० ॥
नाशंसन्तो जयं युद्धे दीनात्मानो धनंजय ।
आत्मत्राणे मतिं कृत्वा प्राद्रवन् कुरवो रणात् ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर बोले- धनंजय! पूर्वकालमें जैसे वज्रधारी इन्द्रने महान् असुर वृत्रासुरको मार डाला था, उसी प्रकार युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नद्वारा आचार्य द्रोणके मारे जानेपर युद्धमें अपनी विजयसे निराश हो दीनचित्त कौरव आत्मरक्षाका विचार करके रणभूमिसे भागे जा रहे थे ॥
केचिद् भ्रान्तै रथैस्तूर्णं निहतैः पार्ष्णियन्तृभिः ।
विपताकध्वजच्छत्रैः पार्थिवाः शीर्णकूबरैः ॥ १२ ॥
भग्ननीडैराकुलाश्वैः प्रारुग्णाश्च विशेषतः ।
भग्नाक्षयुगचक्रैश्च व्याकृष्यन्त समन्ततः ॥ १३ ॥
जिनके पार्श्वरक्षक और सारथि मारे गये थे, ध्वजा, पताका और छत्र नष्ट हो गये थे, कूबर टूटकर बिखर गये थे, बैठनेके स्थान चौपट हो चुके थे तथा धुरे, जूए और पहिये भी टूट - फूट गये थे, वैसे रथ भी व्याकुल घोड़ोंसे आकृष्ट हो वहाँ चक्कर लगा रहे थे और उनके द्वारा कुछ विशेष घायल हुए नरेश चारों ओर खिंचे चले जा रहे थे ॥ १२-१३ ॥
भीताः पादैर्हयान् केचित् त्वरयन्तः स्वयं रथान् ।
रथान् विशीर्णानुत्सृज्य पद्भिः केचिच्च विद्रुताः ॥ १४ ॥
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कुछ लोग भयभीत हो घोड़ोंको पैरोंसे मार- मारकर स्वयं ही जल्दी - जल्दी रथ हाँक रहे थे और कुछ लोग टूटे हुए रथोंको छोड़कर पैदल ही भागने लगे थे ॥ १४ ॥
हयपृष्ठगताश्चान्ये कृष्यन्तेऽर्धच्युतासनाः ।
गजस्कन्धेषु संस्यूता नाराचैश्चलितासनाः ॥ १५ ॥
शरार्तैर्विद्रुतैर्नागैर्हताः केचिद् दिशो दश । कितने ही योद्धा घोड़ोंकी पीठपर बैठे, परंतु उनका आधा आसन खिसक गया और उसी अवस्थामें घोड़ोंके साथ खिंचे चले गये । कुछ लोग नाराचोंकी मार खाकर अपने आसनसे भ्रष्ट हो हाथियोंके कंधोंसे चिपक गये थे और उसी अवस्थामें बाणोंसे पीड़ित हो भागते हुए हाथी उन्हें दसों दिशाओंमें लिये जाते थे ॥ १५३ ॥
विशस्त्रकवचाश्चान्ये वाहनेभ्यः क्षितिं गताः ॥ १६ ॥
संछिन्ना नेमिभिश्चैव मृदिताश्च हयद्विपैः । कुछ लोगोंके अस्त्र- शस्त्र और कवच कट गये और वे अपने वाहनोंसे पृथ्वीपर गिर पड़े । उस दशामें रथके पहियोंकी नेमिसे दबकर उनके शरीरके टुकड़े -टुकड़े हो गये और कितने ही घोड़ों तथा हाथियोंसे कुचल गये ॥ १६३ ॥
क्रोशन्तस्तात पुत्रेति पलायन्ते परे भयात् ॥ १७ ॥
नाभिजानन्ति चान्योन्यं कश्मलाभिहतौजसः । दूसरे बहुत - से योद्धा ' हा तात! हा पुत्र! ' की रट लगाते हुए भयभीत होकर भाग रहे थे । मोहसे बल और उत्साह नष्ट हो जानेके कारण वे ऐसे अचेत हो रहे थे कि एक- दूसरेको पहचान भी नहीं पाते थे ॥ १७३ ॥
पुत्रान् पितॄन् सखीन् भ्रातॄन् समारोप्य दृढक्षतान् ॥ १८ ॥
जलेन क्लेदयन्त्यन्ये विमुच्य कवचान्यपि । कितने ही सैनिक अधिक चोट खाये हुए अपने पुत्र, पिता, मित्र और भाइयोंको रथपर चढ़ाकर तथा उनके कवच खोलकर उनके घावोंको जलसे भिगो रहे थे ॥ १८६ ॥
अवस्थां तादृशीं प्राप्य हते द्रोणे द्रुतं बलम् ॥ १ ९ ॥ पुनरावर्तितं केन यदि जानासि शंस मे । आचार्य द्रोणके मारे जानेपर वैसी दुरवस्थामें पड़कर जो सेना भाग गयी थी, उसे फिर किसने लौटाया है? यदि तुम जानते हो तो मुझे बताओ ॥ १ ९ ३ ॥ हयानां द्वेषतां शब्दः कुञ्जराणां च बृंहताम् ॥ २० ॥
रथनेमिस्वनैश्चात्र विमिश्रः श्रूयते महान् । रथके पहियोंकी घर्घराहटसे मिला हुआ हिनहिनाते हुए घोड़ों और गर्जते हुए गजराजोंका महान् शब्द सुनायी पड़ता है ॥ २० ॥
एते शब्दा भृशं तीव्राः प्रवृत्ताः कुरुसागरे ॥ २१ ॥
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मुहुर्मुहुरुदीर्यन्ते कम्पयन्त्यपि मामकान् । कौरव- सेनारूपी समुद्रमें यह कोलाहल अत्यन्त तीव्र वेगसे होने लगा है और बारंबार बढ़ता जा रहा है, जो मेरे सैनिकोंको कम्पित किये देता है ॥ २१ ॥
य एष तुमुलः शब्दः श्रूयते लोमहर्षणः ॥ २२ ॥
सेन्द्रानप्येष लोकांस्त्रीन् ग्रसेदिति मतिर्मम । यह जो महाभयंकर रोमांचकारी शब्द सुनायी देता है, यह इन्द्रसहित तीनों लोकोंको ग्रस लेगा, ऐसा मुझे जान पड़ता है ॥ २२३ ॥
मन्ये वज्रधरस्यैष निनादो भैरवस्वनः ॥ २३ ॥
द्रोणे हते कौरवार्थं व्यक्तमभ्येति वासवः । मैं समझता हूँ, यह भयंकर शब्द वज्रधारी इन्द्रकी गर्जना है । द्रोणाचार्यके मारे जानेपर कौरवोंकी सहायताके लिये साक्षात् इन्द्र आ रहे हैं, यह स्पष्ट जान पड़ता है ॥ प्रहृष्टरोमकूपाश्च संविग्ना रथपुङ्गवाः ॥ २४ ॥
धनंजय गुरुं श्रुत्वा तत्र नादं सुभीषणम् । धनंजय! यह अत्यन्त भीषण और भारी सिंहनाद सुनकर हमारे श्रेष्ठ रथी भी उद्विग्न हो उठे हैं और इनके रोंगटे खड़े हो गये हैं ॥ २४ ॥
क एष कौरवान् दीर्णानवस्थाप्य महारथः ॥ २५ ॥
निवर्तयति युद्धार्थं मृधे देवेश्वरो यथा । देवराज इन्द्रके समान यह कौन महारथी भागे हुए कौरवोंको खड़ा करके उन्हें पुनः युद्धके लिये रणभूमिमें लौटा रहा है? ॥ २५३ ॥
अर्जुनउवाच उद्यम्यात्मानमुग्राय कर्मणे वीर्यमास्थिताः ॥ २६ ॥
धमन्ति कौरवाः शङ्खान् यस्य वीर्यं समाश्रिताः ।
यत्र ते संशयो राजन् न्यस्तशस्त्रे गुरौ हते ॥ २७ ॥
धार्तराष्ट्रानवस्थाप्य क एष नदतीति हि ।
ह्रीमन्तं तं महाबाहुं मत्तद्विरदगामिनम् ॥ २८ ॥
(इन्द्रविष्णुसमं वीर्ये कोपेऽन्तकमिव स्थितम् । बृहस्पतिसमं बुद्ध्या नीतिमन्तं महारथम् ॥ ) आख्यास्याम्युग्रकर्माणं कुरूणामभयंकरम् । अर्जुनने कहा- राजन्! जिसके विषयमें आपको यह संदेह होता है कि शस्त्रोंका परित्याग कर देनेवाले गुरुदेव द्रोणाचार्यके मारे जानेपर यह कौन वीर कौरव- सैनिकोंको दृढ़तापूर्वक स्थापित करके सिंहनाद कर रहा है तथा जिसके बल और पराक्रमका आश्रय लेकर पराक्रमी कौरव अपनेको भयंकर कर्म करनेके लिये उद्यत करके शंखध्वनि कर रहे
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हैं; जो महाबाहु मतवाले हाथीके समान मस्तानी चालसे चलनेवाला और लज्जाशील है, जो बलमें इन्द्र और विष्णुके समान, क्रोधमें यमराजके सदृश तथा बुद्धिमें बृहस्पतिके तुल्य है, जो नीतिमान्, महारथी, उग्र कर्म करनेमें समर्थ तथा कौरवोंको अभयदान देनेवाला है, उस वीरका परिचय देता हूँ, सुनिये ॥ २६–२८३ ॥ यस्मिञ्जाते ददौ द्रोणो गवां दशशतं धनम् ॥ २ ९ ॥ ब्राह्मणेभ्यो महार्हेभ्यः सोऽश्वत्थामैष गर्जति । जिसके जन्म लेनेपर आचार्य द्रोणने परम सुयोग्य ब्राह्मणोंको एक सहस्र गौएँ दान की थीं, वही अश्वत्थामा यह गर्जना कर रहा है ॥ २ ९ ३ ॥ जातमात्रेण वीरेण येनोच्चैःश्रवसा यथा ॥ ३० ॥
हेषता कम्पिता भूमिर्लोकाश्च सकलास्त्रयः ।
तच्छ्रुत्वान्तर्हितं भूतं नाम तस्याकरोत् तदा ॥ ३१ ॥
अश्वत्थामेति सोऽद्यैष शूरो नदति पाण्डव । पाण्डुनन्दन! जिस वीरने जन्म लेते ही उच्चैःपैःश्रवा अश्वके समान हिनहिनाकर पृथ्वी तथा तीनों लोकोंको कम्पित कर दिया था और उस शब्दको सुनकर किसी अदृश्य प्राणीने उस समय उसका नाम ' अश्वत्थामा' रख दिया था, यह वही शूरवीर अश्वत्थामा सिंहनाद कर रहा है ॥ ३०-३१३ ॥ यो ह्यनाथ इवाक्रम्य पार्षतेन हतस्तथा ॥ ३२ ॥
कर्मणा सुनृशंसेन तस्य नाथो व्यवस्थितः । द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने जिनपर आक्रमण करके अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्मके द्वारा जिन्हें अनाथके समान मार डाला था, उन्हींका यह रक्षक या सहायक उठ खड़ा हुआ है ॥ ३२३ || गुरुं मे यत्र पाञ्चाल्यः केशपक्षे परामृशत् ॥ ३३ ॥
तन्न जातु क्षमेद् द्रौणिर्जानन् पौरुषमात्मनः । पांचालराजकुमारने जो मेरे गुरुदेवका केश पकड़कर खींचा था, उसे अपने पुरुषार्थको जाननेवाला अश्वत्थामा कभी क्षमा नहीं कर सकता ॥ ३३३ ॥
उपचीर्णो गुरुर्मिथ्या भवता राज्यकारणात् ॥ ३४ ॥
धर्मज्ञेन सता नाम सोऽधर्मः सुमहान् कृतः । आपने धर्मज्ञ होते हुए भी राज्यके लोभसे झूठ बोलकर जो अपने गुरुको धोखा दिया, वह महान् पाप किया है ॥ ३४ ॥
चिरं स्थास्यति चाकीर्तिस्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ ३५ ॥
रामे वालिवधाद् यद्वदेवं द्रोणे निपातिते ।
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अतः छिपकर वालीका वध करनेके कारण जैसे श्रीरामचन्द्रजीको अपयश मिला, उसी प्रकार झूठ बोलकर द्रोणाचार्यको मरवा देनेके कारण चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें आपकी अकीर्ति चिरस्थायिनी हो जायगी ॥ ३५३ ॥
सर्वधर्मोपपन्नोऽयं स मे शिष्यश्च पाण्डवः ॥ ३६ ॥
नायं वदति मिथ्येति प्रत्ययं कृतवांस्त्वयि । आचार्यने यह समझकर आपपर विश्वास किया था कि पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर सब
धर्मोंके ज्ञाता और मेरे शिष्य हैं । ये कभी झूठ नहीं बोलते हैं ॥ ३६३ ॥
स सत्यकञ्चुकं नाम प्रविष्टेन ततोऽनृतम् ॥ ३७ ॥
आचार्य उक्तो भवता हतः कुञ्जर इत्युत । परंतु आपने सत्यका चोला पहनकर आचार्यसे झूठे ही कह दिया कि ' अश्वत्थामा मारा गया । ' उसी नामका हाथी मारा गया था, इसलिये आपने उसकी आड़ लेकर झूठ कहा ॥ ३७ ॥
ततः शस्त्रं समुत्सृज्य निर्ममो गतचेतनः ॥ ३८ ॥
आसीत् सुविह्वलो राजन् यथा दृष्टस्त्वया विभुः । फिर वे हथियार डालकर अपने प्राणोंकी ममतासे रहित हो अचेत हो गये । राजन्! उस समय शक्तिशाली होनेपर भी वे कितने व्याकुल हो गये थे, यह आपने प्रत्यक्ष देखा था ॥ ३८३ ॥
स तु शोकसमाविष्टो विमुखः पुत्रवत्सलः ॥ ३ ९ ॥ शाश्वतं धर्ममुत्सृज्य गुरुः शस्त्रेण घातितः । पुत्रवत्सल गुरुदेव बेटेके शोकमें मग्न होकर युद्धसे विमुख हो गये थे। उस अवस्थामें आपने सनातनधर्मकी अवहेलना करके उन्हें शस्त्रसे मरवा डाला ॥ ३ ९ ॥ न्यस्तशस्त्रमधर्मेण घातयित्वा गुरुं भवान् ॥ ४० ॥
रक्षत्विदानीं सामात्यो यदि शक्तोऽसि पार्षतम् ।
ग्रस्तमाचार्यपुत्रेण क्रुद्धेन हतबन्धुना ॥ ४१ ॥
जिसके पिता मारे गये हैं, वह आचार्यपुत्र अश्वत्थामा आज कुपित होकर धृष्टद्युम्नको कालका ग्रास बनाना चाहता है । अस्त्र त्यागकर निहत्थे हुए गुरुदेवको अधर्मपूर्वक मरवाकर अब आप मन्त्रियों सहित उसके सामने जाइये और यदि शक्ति हो तो धृष्टद्युम्नकी रक्षा कीजिये ॥ ४१-४१ ॥ सर्वे वयं परित्रातुं न शक्ष्यामोऽद्य पार्षतम् ।
सौहार्दं सर्वभूतेषु यः करोत्यतिमानुषः ।
सोऽद्य केशग्रहं श्रुत्वा पितुर्धक्ष्यति नो रणे ॥ ४२ ॥
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आज हम सब लोग मिलकर भी धृष्टद्युम्नको नहीं बचा सकेंगे । जो अश्वत्थामा अतिमानव ( अलौकिक पुरुष ) है और समस्त प्राणियोंके प्रति मैत्रीका भाव रखता है, वही आज अपने पिताके केश पकड़े जानेकी बात सुनकर समरांगणमें हम सब लोगोंको जलाकर भस्म कर देगा ॥ ४२ ॥
विक्रोशमाने हि मयि भृशमाचार्यगृद्धिनि ।
अपाकीर्य स्वयं धर्मं शिष्येण निहतो गुरुः ॥ ४३ ॥
मैं आचार्यके प्राणोंकी रक्षा चाहता हुआ बारंबार पुकारता ही रह गया, परंतु स्वयं शिष्य होकर भी धृष्टद्युम्नने धर्मको लात मारकर अपने गुरुकी हत्या कर डाली ॥ ४३ ॥
यदा गतं वयो भूयः शिष्टमल्पतरं च नः ।
तस्येदानीं विकारोऽयमधर्मोऽयं कृतो महान् ॥ ४४ ॥
अब हमलोगोंकी आयुका अधिकांश भाग बीत चुका है और बहुत थोड़ा ही शेष रह गया है । इसीसे इस समय हमारा मस्तिष्क खराब हो गया और हमलोगोंने यह महान् पाप कर डाला है ॥ ४४ ॥
पितेव नित्यं सौहार्दात् पितेव हि च धर्मतः ।
सोऽल्पकालस्य राज्यस्य कारणाद् घातितो गुरुः ॥ ४५ ॥
जो सदा पिताकी भाँति हमलोगोंपर स्नेह रखते और हमारा हित चाहते थे, धर्मदृष्टिसे भी जो हमारे पिताके ही तुल्य थे, उन्हीं गुरुदेवको हमने इस क्षणभंगुर राज्यके लिये मरवा दिया ॥ ४५ ॥
धृतराष्ट्रेण भीष्माय द्रोणाय च विशाम्पते ।
विसृष्टा पृथिवी सर्वा सह पुत्रैश्च तत्परैः ॥ ४६ ॥
प्रजानाथ! धृतराष्ट्रने भीष्म और द्रोणको उनकी सेवामें रहनेवाले अपने पुत्रोंके साथ ही इस सारी पृथ्वीका राज्य सौंप दिया था ॥ ४६ ॥
सम्प्राप्य तादृशीं वृत्तिं सत्कृतः सततं परैः ।
अवृणीत सदा पुत्रान् मामेवाभ्यधिकं गुरुः ॥ ४७ ॥
हमारे शत्रु सदा आचार्यका सत्कार किया करते थे । उनके द्वारा वैसी उत्तम जीविका- वृत्ति पाकर भी आचार्य सदा मुझे ही अपने पुत्रसे बढ़कर मानते रहे हैं ॥ ४७ ॥
अवेक्षमाणस्त्वां मां च न्यस्तास्त्रश्चाहवे हतः ।
न त्वेनं युध्यमानं वै हन्यादपि शतक्रतुः ॥ ४८ ॥
उन्होंने आपको और मुझको देखकर युद्धमें हथियार डाल दिया और मारे गये । यदि वे युद्ध करते होते तो साक्षात् इन्द्र भी उन्हें मार नहीं सकते थे ॥ ४८ ॥
तस्याचार्यस्य वृद्धस्य द्रोहो नित्योपकारिणः ।
कृत्वे ह्यनार्यैरस्माभी राज्यार्थे लुब्धबुद्धिभिः ॥ ४ ९ ॥
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हमारी बुद्धि लोभसे ग्रस्त है, हम नीचोंने राज्यके लिये सदा उपकार करनेवाले बूढ़े आचार्यके साथ द्रोह किया है ॥
अहो बत महत् पापं कृतं कर्म`सुदारुणम् ।
यद् राज्यसुखलोभेन द्रोणोऽयं साधु घातितः ॥ ५० ॥
ओह! हमने यह अत्यन्त भयंकर महान् पापकर्म कर डाला है, जो कि राज्य -सुखके लोभमें पड़कर इन आचार्य द्रोणकी पूर्णतः हत्या करा दी ॥ ५० ॥
पुत्रान् भ्रातॄन् पितॄन् दाराञ्जीवितं चैव वासविः ।
त्यजेत् सर्वं मम प्रेम्णा जानात्येवं हि मे गुरुः ॥ ५१ ॥
मेरे गुरुदेव ऐसा समझते थे कि अर्जुन मेरे प्रेमवश आवश्यकता हो तो अपने पिता, पुत्र, भाई, स्त्री तथा प्राण - सबका त्याग कर सकता है ॥ ५१ ॥
स मया राज्यकामेन हन्यमानो ह्युपेक्षितः ।
तस्मादर्वाक्शिरा राजन् प्राप्तोऽस्मि नरकं प्रभो ॥ ५२ ॥
किंतु मैंने राज्यके लोभमें पड़कर उनके मारे जानेकी उपेक्षा कर दी । राजन्! प्रभो! इस पापके कारण अब मैं नीचे सिर करके नरकमें डाला जाऊँगा ॥ ५२ ॥
ब्राह्मणं वृद्धमाचार्यं न्यस्तशस्त्रं महामुनिम् ।
घातयित्वाद्य राज्यार्थे मृतं श्रेयो न जीवितम् ॥ ५३ ॥
एक तो वे ब्राह्मण, दूसरे वृद्ध और तीसरे अपने आचार्य थे । इसके सिवा उन्होंने हथियार नीचे डाल दिया था और महान् मुनिवृत्तिका आश्रय लेकर बैठे हुए थे । इस अवस्थामें राज्यके लिये उनकी हत्या कराकर मैं जीनेकी अपेक्षा मर जाना ही अच्छा समझता हूँ ॥ ५३ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि अर्जुनवाक्ये षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक एक सौ छानबेवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९६ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५४ श्लोक हैं । )