श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 1471–1480
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1471–1480
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अनघ! इस प्रकार तुम्हारे पिताके मारे जानेपर समस्त सैनिक भयसे पीड़ित होकर भाग चले हैं और हमलोग उत्साहशून्य होकर लौटे आ रहे हैं ॥ ६७ ॥
संजय उवाच
तच्छ्रुत्वा द्रोणपुत्रस्तु निधनं पितुराहवे ।
क्रोधमाहारयत् तीव्रं पदाहत इवोरगः ॥ ६८ ॥
संजय कहते हैं — राजन्! युद्धमें इस प्रकार पिताके मारे जानेका वृत्तान्त सुनकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा पैरोंसे ठुकराये हुए सर्पके समान अत्यन्त कुपित हो उठा ॥ ६८ ॥
ततः क्रुद्धो रणे द्रौणिर्भृशं जज्वाल मारिष ।
यथेन्धनं महत् प्राप्य प्राज्वलद्धव्यवाहनः ॥ ६ ९ ॥
माननीय नरेश! जैसे अग्निदेव सूखे काठकी बहुत बड़ी राशि पाकर प्रचण्डरूपसे प्रज्वलित हो उठते हैं, उसी प्रकार रणभूमिमें अश्वत्थामा अत्यन्त क्रोधसे जलने लगा ॥
तलं तलेन निष्पिष्य दन्तैर्दन्तानुपास्पृशत् ।
निःश्वसन्नुरगो यद्वल्लोहिताक्षोऽभवत् तदा ॥ ७० ॥
उसने हाथसे हाथ मलकर दाँतोंसे दाँत पीसे और फुफकारते हुए सर्पके समान वह लंबी साँसें खींचने लगा, उस समय उसकी आँखें लाल हो गयी थीं ॥ ७० ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वण्यश्वत्थामक्रोधे त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें अश्वत्थामाका क्रोधविषयक एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९३ ॥
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चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः धृतराष्ट्रका प्रश्न धृतराष्ट्रउवाच
अधर्मेण हतं श्रुत्वा धृष्टद्युम्नेन संजय ।
ब्राह्मणं पितरं वृद्धमश्वत्थामा किमब्रवीत् ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा — संजय! अपने बूढ़े पिता ब्राह्मण द्रोणाचार्यके धृष्टद्युम्नद्वारा अधर्मपूर्वक मारे जानेका समाचार सुनकर अश्वत्थामाने क्या कहा? ॥ १ ॥
मानवं वारुणाग्नेयं ब्राह्ममस्त्रं च वीर्यवान् ।
ऐन्द्रं नारायणं चैव यस्मिन् नित्यं प्रतिष्ठितम् ॥ २ ॥
तमधर्मेण धर्मिष्ठं धृष्टद्युम्नेन संयुगे ।
श्रुत्वा निहतमाचार्यं सोऽश्वत्थामा किमब्रवीत् ॥ ३ ॥
जिनमें मानव, वारुण, आग्नेय, ब्राह्म, ऐन्द्र और नारायण नामक अस्त्र सदा प्रतिष्ठित थे, उन धर्मात्मा आचार्यको धृष्टद्युम्नद्वारा अधर्मपूर्वक युद्धमें मारा गया सुनकर पराक्रमी अश्वत्थामाने क्या कहा? ॥ २-३ ॥
येन रामादवाप्येह धनुर्वेदं महात्मना ।
प्रोक्तान्यस्त्राणि दिव्यानि पुत्राय गुणकाङ्क्षिणा ॥ ४ ॥
गुणोंकी अभिलाषा रखनेवाले उन महात्मा द्रोणने इस लोकमें परशुरामजीसे धनुर्वेदकी शिक्षा पाकर वे समस्त दिव्यास्त्र अपने पुत्रको भी सिखाये थे ॥ ४ ॥
एकमेव हि लोकेऽस्मिन्नात्मनो गुणवत्तरम् ।
इच्छन्ति पुरुषाः पुत्रं लोके नान्यं कथंचन ॥ ५ ॥
मनुष्य इस जगत्में केवल पुत्रको ही अपनेसे भी अधिक गुणवान् बनाना चाहते हैं, दूसरेको किसी प्रकार भी नहीं ॥ ५ ॥
आचार्याणां भवन्त्येव रहस्यानि महात्मनाम् ।
तानि पुत्राय वा दद्युः शिष्यायानुगताय वा ॥ ६ ॥
महात्मा आचार्योंके पास बहुत - सी रहस्यकी बातें होती हैं, जिन्हें या तो वे अपने पुत्रको दे सकते हैं या अनुगत शिष्यको ॥ ६ ॥
स शिष्यः प्राप्य तत् सर्वं सविशेषं च संजय ।
शूरः शारद्वतीपुत्रः संख्ये द्रोणादनन्तरः ॥ ७ ॥
संजय! कृपीका शूरवीर पुत्र अश्वत्थामा शिष्यभावसे विशेष रहस्यसहित सारा धनुर्वेद अपने पिता द्रोणाचार्यसे प्राप्त करके युद्धस्थलमें उनके बाद वही उस योग्यताका रह गया है ॥ ७ ॥
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रामस्य तु समः शस्त्रे पुरंदरसमो युधि ।
कार्तवीर्यसमो वीर्ये बृहस्पतिसमो मतौ ॥ ८ ॥
महीधरसमः स्थैर्ये तेजसाग्निसमो युवा ।
समुद्र इव गाम्भीर्ये क्रोधे चाशीविषोपमः ॥ ९ ॥
स रथी प्रथमो लोके दृढधन्वा जितक्लमः ।
शीघ्रोऽनिल इवाक्रन्दे चरन् क्रुद्ध इवान्तकः ॥ १० ॥
शस्त्रविद्यामें परशुरामके समान, युद्धकलामें इन्द्रके समान, बल- पराक्रममें कृतवीर्यपुत्र अर्जुनके समान, बुद्धिमें बृहस्पतिके सदृश, स्थिरता एवं धैर्यमें पर्वतके तुल्य, तेजमें अग्निके समान, गम्भीरतामें समुद्रके सदृश और क्रोधमें विषधर सर्पके समान नवयुवक अश्वत्थामा संसारका प्रधान रथी और सुदृढ़ धनुर्धर है । उसने श्रम और थकावटको जीत लिया है । वह संग्राममें वायुके समान वेगपूर्वक विचरनेवाला तथा क्रोधमें भरे हुए यमराजके समान भयंकर है ॥ ८–१० ॥
अस्यता येन संग्रामे धरण्यभिनिपीडिता ।
यो न व्यथति संग्रामे वीरः सत्यपराक्रमः ॥ ११ ॥
वेदस्नातो व्रतस्नातो धनुर्वेदे च पारगः ।
महोदधिरिवाक्षोभ्यो रामो दाशरथिर्यथा ॥ १२ ॥
अश्वत्थामा जब रणभूमिमें बाणोंकी वर्षा करने लगता है, तब धरती भी अत्यन्त पीडित हो उठती है । वह सत्यपराक्रमी वीर संग्राममें कभी व्यथित नहीं होता है । वह वेदाध्ययन समाप्त करके स्नातक बन चुका है । ब्रह्मचर्यव्रतकी अवधि पूरी करके उसका भी स्नातक हो चुका है और धनुर्वेदका भी पारंगत विद्वान् है । महासागर तथा दशरथपुत्र श्रीरामके समान उसे कोई क्षुब्ध नहीं कर सकता ॥ ११-१२ ॥
तमधर्मेण धर्मिष्ठं धृष्टद्युम्नेन संयुगे ।
श्रुत्वा निहतमाचार्यमश्वत्थामा किमब्रवीत् ॥ १३ ॥
उसी अश्वत्थामाने अपने धर्मिष्ठ पिता आचार्य द्रोणको युद्धमें धृष्टद्युम्नके हाथसे अधर्मपूर्वक मारा गया सुनकर क्या कहा? ॥ १३ ॥
धृष्टद्युम्नस्य यो मृत्युः सृष्टस्तेन महात्मना ।
यथा द्रोणस्य पाञ्चाल्यो यज्ञसेनसुतोऽभवत् ॥ १४ ॥
(हमने सुन रखा है कि) जैसे द्रोणाचार्यका वध करनेके लिये पांचालदेशीय द्रुपदकुमारका जन्म हुआ था, उसी प्रकार महात्मा द्रोणने धृष्टद्युम्नकी मृत्युके लिये अश्वत्थामाको जन्म दिया था ॥ १४ ॥
तं नृशंसेन पापेन क्रूरेणादीर्घदर्शिना ।
श्रुत्वा निहतमाचार्यमश्वत्थामा किमब्रवीत् ॥ १५ ॥
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उस नृशंस, पापी, क्रूर और अदूरदर्शी धृष्टद्युम्नके हाथसे आचार्यका वध हुआ सुनकर अश्वत्थामाने क्या कहा? ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि धृतराष्ट्रप्रश्ने चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें धृतराष्ट्रप्रश्नविषयक एक सौचौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९४ ॥ PPP
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पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः अश्वत्थामाके क्रोधपूर्ण उद्गार और उसके द्वारा नारायणास्त्रका प्राकट्य संजय उवाच
छद्मना निहतं श्रुत्वा पितरं पापकर्मणा ।
बाष्पेणापूर्यत द्रौणी रोषेण च नरर्षभ ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— नरश्रेष्ठ! पापी धृष्टद्युम्नने मेरे पिताको छलसे मार डाला है, यह
सुनकर अश्वत्थामाके नेत्रोंमें आँसू भर आये । फिर वह रोषसे जल उठा ॥ १ ॥
तस्य क्रुद्धस्य राजेन्द्र वपुर्दीप्तमदृश्यत ।
अन्तकस्येव भूतानि जिहीर्षोः कालपर्यये ॥ २ ॥
राजेन्द्र! जैसे प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंके संहारकी इच्छावाले यमराजका तेजोमय शरीर प्रज्वलित हो उठता है, उसी प्रकार वहाँ देखा गया कि क्रोधसे भरे हुए अश्वत्थामाका शरीर तमतमा उठा है ॥ २ ॥
अश्रुपूर्णे ततो नेत्रे व्यपमृज्य पुनः पुनः ।
उवाच कोपान्निःश्वस्य दुर्योधनमिदं वचः ॥ ३ ॥
अपने आँसूभरे नेत्रोंको बारंबार पोंछकर क्रोधसे लंबी साँस खींचते हुए अश्वत्थामाने दुर्योधनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३ ॥
पिता मम यथा क्षुद्रैर्न्यस्तशस्त्रो निपातितः ।
धर्मध्वजवता पापं कृतं तद् विदितं मम ॥ ४ ॥
‘ राजन्! मेरे पिताने जिस प्रकार हथियार डाल दिया, जिस तरह उन नीचोंने उन्हें मार गिराया तथा धर्मका ढोंग रचनेवाले युधिष्ठिरने जो पाप किया है, वह सब मुझे मालूम हो गया ॥ ४ ॥
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अनार्यं सुनृशंसं च धर्मपुत्रस्य मे श्रुतम् ।
युद्धेष्वपि प्रवृत्तानां ध्रुवं जयपराजयौ ॥ ५ ॥
द्वयमेतद् भवेद् राजन् वधस्तत्र प्रशस्यते । ' धर्मपुत्र युधिष्ठिरका क्रूरतापूर्ण नीच कर्म मैंने सुन लिया । राजन्! जो लोग युद्धमें प्रवृत्त होते हैं, उन्हें विजय और पराजय अवश्य प्राप्त होती है । परंतु युद्धमें होनेवाले वधकी अधिक प्रशंसा की गयी है ॥ ५३ ॥
न्यायवृत्तो वधो यस्तु संग्रामे युध्यतो भवेत् ॥ ६ ॥
न स दुःखाय भवति तथा दृष्टो हि स द्विजैः । ' संग्राममें जूझते हुए वीरको यदि न्यायानुकूल वध प्राप्त हो जाय, तो वह दुःखका कारण नहीं होता; क्योंकि द्विजोंने युद्धके इस परिणामको देखा है ॥ ६३ ॥
गतः स वीरलोकाय पिता मम न संशयः ॥ ७ ॥
न शोच्यः पुरुषव्याघ्र यस्तदा निधनं गतः । ‘ पुरुषसिंह! इसमें संशय नहीं कि मेरे पिता वीरगतिको प्राप्त हुए हैं । उस समय वे मारे गये, इस बातको लेकर उनके लिये शोक करना उचित नहीं है ॥ यत् तु धर्मप्रवृत्तः सन् केशग्रहणमाप्तवान् ॥ ८ ॥
पश्यतां सर्वसैन्यानां तन्मे मर्माणि कृन्तति ।
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‘ परंतु धर्ममें तत्पर रहनेपर भी जो समस्त सैनिकोंके देखते - देखते उनका केश पकड़ा गया, वह अपमान ही मेरे मर्मस्थानोंको विदीर्ण किये देता है ॥ मयि जीवति यत् तातः केशग्रहमवाप्तवान् ॥ ९ ॥
कथमन्ये करिष्यन्ति पुत्रेभ्यः पुत्रिणः स्पृहाम् । ‘ मेरे जीते - जी यदि पिताको अपने केश पकड़े जानेका अपमानपूर्ण कष्ट उठाना पड़ा, तब दूसरे पुत्रवान् पुरुष किसलिये पुत्रोंकी अभिलाषा करेंगे? ॥ ९ ३ ॥ कामात् क्रोधादविज्ञानाद्धर्षाद् बाल्येन वा पुनः ॥ १० ॥
विधर्मकाणि कुर्वन्ति तथा परिभवन्ति च ।
तदिदं पार्षतेनेह महदाधर्मिकं कृतम् ॥ ११ ॥
अवज्ञाय च मां नूनं नृशंसेन दुरात्मना ।
तस्यानुबन्धं द्रष्टासौ धृष्टद्युम्नः सुदारुणम् ॥ १२ ॥
‘ लोग काम, क्रोध, अज्ञान, हर्ष अथवा बालोचित चपलताके कारण धर्मके विरुद्ध कार्य करते तथा श्रेष्ठ पुरुषोंका अपमान कर बैठते हैं । क्रूर एवं दुरात्मा द्रुपदपुत्रने निश्चय ही मेरी अवहेलना करके यह महान् पाप कर्म कर डाला है । अतः उस धृष्टद्युम्नको उस पापका अत्यन्त भयंकर परिणाम भोगना पड़ेगा ॥ १०–१२ ॥
अकार्यं परमं कृत्वा मिथ्यावादी च पाण्डवः ।
यो ह्यसौ छद्मनाऽऽचार्यं शस्त्रं संन्यासयत् तदा ॥ १३ ॥
तस्याद्य धर्मराजस्य भूमिः पास्यति शोणितम् । ‘ साथ ही मिथ्यावादी पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको भी यह अत्यन्त नीच कर्म करनेके कारण इसका दारुण परिणाम देखना पड़ेगा । जिसने छल करके आचार्यसे उस समय शस्त्र रखवा दिया था, उस धर्मराज युधिष्ठिरका रक्त आज यह पृथ्वी पीयेगी ॥ १३३ ॥
शपे सत्येन कौरव्य इष्टापूर्तेन चैव ह ॥ १४ ॥
अहत्वा सर्वपाञ्चालान् जीवेयं न कथंचन ।
सर्वोपायैर्यतिष्यामि पञ्चालानामहं वधे ॥ १५ ॥
‘ कुरुनन्दन! मैं अपने सत्य, इष्ट ( यज्ञ - यागादि ) और आपूर्त ( वापी-तड़ागनिर्माण आदि ) कर्मोंकी शपथ खाकर कहता हूँ कि समस्त पांचालोंका वध किये बिना किसी तरह जीवित नहीं रह सकूँगा । सभी उपायोंसे पांचालोंको मार डालनेका प्रयत्न करूँगा ॥ १४-१५ ॥
धृष्टद्युम्नं च समरे हन्ताहं पापकारिणम् ।
कर्मणा येन तेनेह मृदुना दारुणेन च ॥ १६ ॥
‘ समरभूमिमें पापाचारी धृष्टद्युम्नको मैं कोमल और कठोर जिस किसी भी कर्मके द्वारा अवश्य मार डालूँगा ॥
पञ्चालानां वधं कृत्वा शान्तिं लब्धास्मि कौरव ।
यदर्थं पुरुषव्याघ्र पुत्रानिच्छन्ति मानवाः ॥ १७ ॥
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प्रेत्य चेह च सम्प्राप्तास्त्रायन्ते महतो भयात् । ‘ कुरुनन्दन! पांचालोंका वध करके ही मैं शान्ति पा सकूँगा । पुरुषसिंह! मनुष्य इसीलिये पुत्रोंकी इच्छा करते हैं कि वे प्राप्त होनेपर इहलोक और परलोकमें भी महान् भयसे रक्षा करेंगे ॥ १७३ ॥
पित्रा तु मम सावस्था प्राप्ता निर्बन्धुना यथा ॥ १८ ॥
मयि शैलप्रतीकाशे पुत्रे शिष्ये च जीवति । 'मेरे पिताने मुझ पर्वत- सरीखे पुत्र और शिष्यके जीते- जी बन्धुहीनकी भाँति वह दुरवस्था प्राप्त की है ॥ धिङ्ममास्त्राणि दिव्यानि धिग् बाहू धिक् पराक्रमम् ॥ १ ९ ॥ यं स्म द्रोणः सुतं प्राप्य केशग्रहमवाप्तवान् । ‘ मेरे दिव्यास्त्रोंको धिक्कार है! मेरे इन दोनों भुजाओंको धिक्कार है! तथा मेरे पराक्रमको धिक्कार है!! जब कि मेरे जैसे पुत्रको पाकर आचार्य द्रोणने केशग्रहणका अपमान उठाया ॥ १ ९ ॥ स तथाहं करिष्यामि यथा भरतसत्तम ॥ २० ॥
परलोकगतस्यापि भविष्याम्यनृणः पितुः । ‘ भरतश्रेष्ठ! अब मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे परलोकमें गये हुए पिताके ऋणसे मुक्त हो सकूँ ॥ २० ॥
आर्येण हि न वक्तव्या कदाचित् स्तुतिरात्मनः ॥ २१ ॥
पितुर्वधममृष्यंस्तु वक्ष्याम्यद्येह पौरुषम् । ‘ यद्यपि श्रेष्ठ पुरुषको कभी अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिये, तथापि अपने पिताके वधको न सह सकनेके कारण आज मैं यहाँ अपने पुरुषार्थका वर्णन कर रहा हूँ ॥ २१३ ॥
अद्य पश्यन्तु मे वीर्यं पाण्डवाः सजनार्दनाः ॥ २२ ॥
मृद्नतः सर्वसैन्यानि युगान्तमिव कुर्वतः । ‘ आज मैं सारी सेनाओंको रौंदता हुआ प्रलय- कालका दृश्य उपस्थित करूँगा । अतः आज श्रीकृष्णसहित समस्त पाण्डव मेरा पराक्रम देखें ॥ २२ ॥
न हि देवा न गन्धर्वा नासुरा न च राक्षसाः ॥ २३ ॥
अद्य शक्ता रणे जेतुं रथस्थं मां नरर्षभाः । ‘ आज रणभूमिमें रथपर बैठे हुए मुझ अश्वत्थामाको न तो देवता, न गन्धर्व, न असुर, न राक्षस और न कोई श्रेष्ठ मानव वीर ही परास्त कर सकते हैं ॥ २३ ॥
मदन्यो नास्ति लोकेऽस्मिन्नर्जुनाद् वास्त्रवित् क्वचित् ॥ २४ ॥
अहं हि ज्वलतां मध्ये मयूखानामिवांशुमान् ।
प्रयोक्ता देवसृष्टानामस्त्राणां पृतनागतः ॥ २५ ॥
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‘ इस संसारमें मुझसे या अर्जुनसे बढ़कर दूसरा कोई अस्त्रवेत्ता कहीं नहीं है । आज मैं शत्रुकी सेनामें घुसकर प्रकाशमान अंशुधारियोंके बीच अंशुमाली सूर्यके समान तपता हुआ देवनिर्मित अस्त्रोंका प्रयोग करूँगा ॥
भृशमिष्वसनादद्य मत्प्रयुक्ता महाहवे ।
दर्शयन्तः शरा वीर्यं प्रमथिष्यन्ति पाण्डवान् ॥ २६ ॥
‘ आज महासमरमें धनुषसे मेरे द्वारा छोड़े हुए बाण मेरा महान् पराक्रम दिखाते हुए पाण्डवयोद्धाओंको मथ डालेंगे ॥ २६ ॥
अद्य सर्वा दिशो राजन् धाराभिरिव संकुलाः ।
आवृताः पत्रिभिस्तीक्ष्णैर्द्रष्टारो मामकैरिह ॥ २७ ॥
‘ राजन्! जैसे बरसती हुई जलधाराओंसे सम्पूर्ण दिशाएँ ढक जाती हैं, उसी प्रकार आज सब लोग मेरे तीखे बाणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित हुई देखेंगे ॥ विकिरन् शरजालानि सर्वतो भैरवस्वनान् शत्रून् निपातयिष्यामि महावात इव द्रुमान् ॥ २८ ॥
‘ जैसे आँधी वृक्षोंको गिरा देती है, उसी प्रकार मैं सब ओर बाणसमूहोंकी वर्षा करके भयंकर गर्जना करनेवाले शत्रुओंको मार गिराऊँगा ॥ २८ ॥
न हि जानाति बीभत्सुस्तदस्त्रं न जनार्दनः ।
न भीमसेनो न यमौ न च राजा युधिष्ठिरः ॥ २ ९ ॥
न पार्षतो दुरात्मासौ न शिखण्डी न सात्यकिः ।
यदिदं मयि कौरव्य सकल्पं सनिवर्तनम् ॥ ३० ॥
‘ आज मैं जिस अस्त्रका प्रयोग करूँगा, उसे न अर्जुन जानते हैं न श्रीकृष्ण, भीमसेन, नकुल- सहदेव और राजा युधिष्ठिरको भी उसका पता नहीं है । वह दुरात्मा धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और सात्यकि भी उसके ज्ञानसे शून्य हैं । कुरुनन्दन! वह तो प्रयोग और उपसंहारसहित केवल मेरे ही पास है ॥ २ ९ -३० ॥
नारायणाय मे पित्रा प्रणम्य विधिपूर्वकम् ।
उपहारः पुरा दत्तो ब्रह्मरूप उपस्थितः ॥ ३१ ॥
तं स्वयं प्रतिगृह्याथ भगवान् स वरं ददौ ।
वव्रे पिता मे परममस्त्रं नारायणं ततः ॥ ३२ ॥
' पूर्वकालकी बात है, मेरे पिताने भगवान् नारायणको प्रणाम करके उन्हें विधिपूर्वक वेदस्वरूप उपहार समर्पित किया ( वैदिक मन्त्रोंद्वारा उनकी स्तुति की) । भगवान्ने स्वयं उपस्थित होकर वह उपहार ग्रहण किया और पिताको वर दिया । मेरे पिताने वरके रूपमें उनसे सर्वोत्तम नारायणास्त्रकी याचना की ॥ ३१-३२ ॥
अथैनमब्रवीद् राजन् भगवान् देवसत्तमः ।
भविता त्वत्समो नान्यः कश्चिद् युधि नरः क्वचित् ॥ ३३ ॥
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न त्विदं सहसा ब्रह्मन् प्रयोक्तव्यं कथंचन ।
न ह्येतदस्त्रमन्यत्र वधाच्छत्रोर्निवर्तते ॥ ३४ ॥
‘ राजन्! तब देवश्रेष्ठ भगवान् नारायणने वह अस्त्र देकर उनसे इस प्रकार कहा –'ब्रह्मन्! अब युद्धमें तुम्हारी समानता करनेवाला दूसरा कोई मनुष्य कहीं नहीं रह जायगा, परंतु तुम्हें सहसा इसका प्रयोग किसी तरह नहीं करना चाहिये; क्योंकि यह अस्त्र शत्रुका वध किये बिना पीछे नहीं लौटता है ॥ ३३-३४ ॥
न चैतच्छक्यते ज्ञातुं कं न वध्येदिति प्रभो ।
अवध्यमपि हन्याद्धि तस्मान्नैतत् प्रयोजयेत् ॥ ३५ ॥
' प्रभो! यह नहीं जाना जा सकता कि यह अस्त्र किसको नहीं मारेगा । यह अवध्यका भी वध कर सकता है; अतः सहसा इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये ॥ ३५ ॥
अथ संख्ये रथस्यैव शस्त्राणां च विसर्जनम् ।
प्रयाचतां च शत्रूणां गमनं शरणस्य च ॥ ३६ ॥
एते प्रशमने योगा महास्त्रस्य परंतप ।
सर्वथा पीडितो हि स्यादवध्यान् पीडयन् रणे ॥ ३७ ॥
' शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोण! युद्धभूमिमें रथ छोड़कर उतर जाना, अपने अस्त्र-शस्त्र रख देना, अभयकी याचना करना और शत्रुकी शरण लेना - ये इस महान् अस्त्रको शान्त करनेके उपाय हैं । जो रणभूमिमें इस अस्त्रके द्वारा अवध्य मनुष्योंको पीड़ा देता है, वह स्वयं भी सब प्रकारसे पीड़ित हो सकता है ' ॥ ३६-३७ ॥
तज्जग्राह पिता मह्यमब्रवीच्चैव स प्रभुः ।
त्वं वधिष्यसि सर्वाणि शस्त्रवर्षाण्यनेकशः ॥ ३८ ॥
अनेनास्त्रेण संग्रामे तेजसा च ज्वलिष्यसि ।
एवमुक्त्वा स भगवान् दिवमाचक्रमे प्रभुः ॥ ३ ९ ॥
‘ तदनन्तर मेरे पिताने वह अस्त्र ग्रहण किया और उन पूज्य पिताने मुझे उसका उपदेश किया । ( पिताको अस्त्र देते समय भगवान्ने यह भी कहा था - ) ' ब्रह्मन्! तुम संग्राममें इस अस्त्रके द्वारा सम्पूर्ण शस्त्र- वर्षाओंको बारंबार नष्ट करोगे और स्वयं भी तेजसे प्रकाशित होते रहोगे । ' ऐसा कहकर भगवान् नारायण अपने दिव्य धामको चले गये ॥ ३८-३९ ॥
एतन्नारायणादस्त्रं तत् प्राप्तं पितृबन्धुना ।
तेनाहं पाण्डवांश्चैव पञ्चालान् मत्स्यकेकयान् ॥ ४० ॥
विद्रावयिष्यामि रणे शचीपतिरिवासुरान् । ‘ इस प्रकार पिताने भगवान् नारायणसे यह अस्त्र प्राप्त किया और उनसे मुझे इसकी प्राप्ति हुई है । उसी अस्त्रसे मैं रणभूमिमें पाण्डव, पांचाल, मत्स्य और केकय योद्धाओंको उसी प्रकार खदेडूंगा, जैसे शचीपति इन्द्रने असुरोंको मार भगाया था ॥ ४० ॥
यथा यथाहमिच्छेयं तथा भूत्वा शरा मम ॥ ४१ ॥