04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1651–1660
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1651–1660
पृष्ठ 1651
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कर्णेन विहिता वीर गुप्ता वीरैर्महारथैः ॥ २३ ॥
‘ वीर पार्थ! देखो, इस समय युद्धस्थलमें धृतराष्ट्रपुत्रोंकी सेना कैसी स्थितिमें है? कर्णने वीर महारथियोंद्वारा इसे किस प्रकार सुरक्षित कर दिया है? ॥ २३ ॥
हतवीरतमा ह्येषा धार्तराष्ट्री महाचमूः ।
फल्गुशेषा महाबाहो तृणैस्तुल्या मता मम ॥ २४ ॥
‘ महाबाहो! कौरवोंकी इस विशाल सेनाके प्रमुख वीर तो मारे जा चुके हैं । अब इसके तुच्छ सैनिक ही शेष रह गये हैं । इस समय तो यह मुझे तिनकोंके समान जान पड़ती है ॥ २४ ॥
एको ह्यत्र महेष्वासः सूतपुत्रो विराजते ।
सदेवासुरगन्धर्वैः सकिन्नरमहोरगैः ॥ २५ ॥
चराचरैस्त्रिभिर्लोकैर्योऽजय्यो रथिनां वरः ।
तं हत्वाद्य महाबाहो विजयस्तव फाल्गुन ॥ २६ ॥
उद्धृतश्च भवेच्छल्यो मम द्वादशवार्षिकः ।
एवं ज्ञात्वा महाबाहो व्यूहं व्यूह यथेच्छसि ॥ २७ ॥
' इस सेनामें एकमात्र महाधनुर्धर सूतपुत्र कर्ण विराजमान है, जो रथियोंमें श्रेष्ठ है तथा जिसे देवता, असुर, गन्धर्व, किन्नर, बड़े - बड़े नाग एवं चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंके लोग मिलकर भी नहीं जीत सकते । महाबाहु फाल्गुन! आज उसी कर्णको मारकर तुम्हारी
विजय होगी और मेरे हृदयमें बारह वर्षोंसे जो सेल कसक रहा है, वह निकल जायगा ।
महाबाहो! ऐसा जानकर तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसे व्यूहकी रचना करो ' ॥ २५–२७ ॥
भ्रातुरेतद् वचः श्रुत्वा पाण्डवः श्वेतवाहनः ।
अर्धचन्द्रेण व्यूहेन प्रत्यव्यूहत तां चमूम् ॥ २८ ॥
भाईकी यह बात सुनकर श्वेतवाहन पाण्डुपुत्र अर्जुनने इस कौरव सेनाके मुकाबलेमें अपनी सेनाके अर्द्धचन्द्राकार व्यूहकी रचना की ॥ २८ ॥
वामपार्श्वे तु तस्याथ भीमसेनो व्यवस्थितः ।
दक्षिणे च महेष्वासो धृष्टद्युम्नो व्यवस्थितः ॥ २९ ॥
मध्ये व्यूहस्य राजा तु पाण्डवश्च धनंजयः ।
नकुलः सहदेवश्च धर्मराजस्य पृष्ठतः ॥ ३० ॥
उस व्यूहके वाम पार्श्वमें भीमसेन और दाहिने पार्श्वमें महाधनुर्धर धृष्टद्युम्न खड़े हुए । उसके मध्यभागमें राजा युधिष्ठिर और पाण्डुपुत्र धनंजय खड़े थे । धर्मराजके पृष्ठभागमें नकुल और सहदेव थे ॥ २ ९ -३० ॥
चक्ररक्षौ तु पाञ्चाल्यौ युधामन्यूत्तमौजसौ ।
नार्जुनं जहतुर्युद्धे पाल्यमानौ किरीटिना ॥ ३१ ॥
पृष्ठ 1652
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पांचाल महारथी युधामन्यु और उत्तमौजा अर्जुनके चक्ररक्षक थे । किरीटधारी अर्जुनसे सुरक्षित होकर उन दोनोंने युद्धमें कभी उनका साथ नहीं छोड़ा ॥ ३१ ॥
शेषा नृपतयो वीराः स्थिता व्यूहस्य दंशिताः ।
यथाभागं यथोत्साहं यथायत्नं च भारत ॥ ३२ ॥
भारत! शेष वीर नरेश कवच धारण करके व्यूहके विभिन्न भागोंमें अपने उत्साह और प्रयत्नके अनुसार खड़े हुए थे ॥ ३२ ॥
एवमेतन्महाव्यूहं व्यूह्य भारत पाण्डवाः ।
तावकाश्च महेष्वासा युद्धायैव मनो वधुः ॥ ३३ ॥
भरतनन्दन! इस प्रकार इस महाव्यूहकी रचना करके पाण्डवों तथा आपके महाधनुर्धरोंने युद्धमें ही मन लगाया ॥ ३३ ॥
दृष्ट्वा व्यूढां तव चमूं सूतपुत्रेण संयुगे ।
निहतान् पाण्डवान् मेने धार्तराष्ट्रः सबान्धवः ॥ ३४ ॥
युद्धस्थलमें सूतपुत्र कर्णके द्वारा व्यूह- रचनापूर्वक खड़ी की गयी आपकी सेनाको देखकर भाइयोंसहित दुर्योधनने यह मान लिया कि ' अब तो पाण्डव मारे गये ' ॥
तथैव पाण्डवीं सेनां व्यूढां दृष्ट्वा युधिष्ठिरः ।
धार्तराष्ट्रान् हतान् मेने सकर्णान् वै जनाधिपः ॥ ३५ ॥
उसी प्रकार पाण्डव - सेनाका व्यूह देखकर राजा युधिष्ठिरने भी कर्णसहित आपके सभी पुत्रोंको मारा गया ही समझ लिया ॥ ३५ ॥
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकदुन्दुभिः ।
डिण्डिमाश्चाप्यहन्यन्त झर्झराश्च समन्ततः ॥ ३६ ॥
सेनयोरुभयो राजन् प्रावाद्यन्त महास्वनाः ।
सिंहनादश्च संजज्ञे शूराणां जयगृद्धिनाम् ॥ ३७ ॥
राजन्! तदनन्तर दोनों सेनाओंमें चारों ओर महान् शब्द करनेवाले शंख, भेरी, पणव, आनक, दुन्दुभि और झाँझ आदि बाजे बज उठे । नगाड़े पीटे जाने लगे । साथ ही विजयकी अभिलाषा रखनेवाले शूरवीरोंका सिंहनाद भी होने लगा ॥ ३६-३७ ॥
हयद्वेषितशब्दाश्च वारणानां च बृंहताम् ।
रथनेमिस्वनाश्चोग्राः सम्बभूवुर्जनाधिप ॥ ३८ ॥
जनेश्वर! घोड़ोंके हींसने, हाथियोंके चिग्घाड़ने तथा रथके पहियोंके घरघरानेके भयंकर शब्द प्रकट होने लगे ॥ ३८ ॥
न द्रोणव्यसनं कश्चिज्जानीते तत्र भारत ।
दृष्ट्वा कर्णं महेष्वासं मुखे व्यूहस्य दंशितम् ॥ ३ ९ ॥
भारत! व्यूहके मुख्य द्वारपर कवच धारण किये महाधनुर्धर कर्णको खड़ा देख कोई भी सैनिक द्रोणाचार्यके मारे जानेके दुःखका अनुभव न कर सका ॥
पृष्ठ 1653
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उभे सैन्ये महाराज प्रहृष्टनरसंकुले ।
योद्धुकामे स्थिते राजन् हन्तुमन्योन्यमोजसा ॥ ४० ॥
महाराज! वे दोनों सेनाएँ हर्षोत्फुल्ल मनुष्योंसे भरी थीं। राजन्! वे बलपूर्वक परस्पर चोट करने और जूझनेकी इच्छासे मैदानमें आकर खड़ी हो गयीं ॥ ४० ॥
तत्र यत्तौ सुसंरब्धौ दृष्ट्वान्योन्यं व्यवस्थितौ ।
अनीकमध्ये राजेन्द्र चेरतुः कर्णपाण्डवौ ॥ ४१ ॥
राजेन्द्र! वहाँ रोषमें भरकर सावधानीके साथ खड़े हुए कर्ण और पाण्डव अपनी-अपनी सेनामें विचरने लगे ॥ ४१ ॥
नृत्यमाने च ते सेने समेयातां परस्परम् ।
तयोः पक्षप्रपक्षेभ्यो निर्जग्मुस्ते युयुत्सवः ॥ ४२ ॥
वे दोनों सेनाएँ परस्पर नृत्य करती हुई- सी भिड़ गयीं । युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले वीर उन दोनों व्यूहोंके पक्ष और प्रपक्षसे निकलने लगे ॥ ४२ ॥
ततः प्रववृते युद्धं नरवारणवाजिनाम् ।
रथानां च महाराज अन्योन्यमभिनिघ्नताम् ॥ ४३ ॥
महाराज! तदनन्तर एक- दूसरेपर आघात करनेवाले मनुष्य, हाथी, घोड़ों और रथोंका वह महान् युद्ध आरम्भ हो गया ॥ ४३ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि व्यूहनिर्माणे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें व्यूहनिर्माणविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
पृष्ठ 1654
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्वादशोऽध्यायः दोनों सेनाओंका घोर युद्ध और भीमसेनके द्वारा क्षेमधूर्तिका वध संजय उवाच
ते सेनेऽन्योन्यमासाद्य प्रहृष्टाश्वनरद्विपे ।
बृहत्यौ सम्प्रजहाते देवासुरसमप्रभे ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — राजन्! उन दोनों सेनाओंके हाथी, घोड़े और मनुष्य बहुत प्रसन्न थे । देवताओं तथा असुरोंके समान प्रकाशित होनेवाली वे दोनों विशाल सेनाएँ परस्पर भिड़कर अस्त्र- शस्त्रोंका प्रहार करने लगीं ॥
ततो नररथाश्वेभाः पत्तयश्चोग्रविक्रमाः ।
सम्प्रहारान् भृशं चक्रुर्देहपाप्मासुनाशनान् ॥ २ ॥
तत्पश्चात् भयंकर पराक्रमी रथी, हाथीसवार, घुड़सवार और पैदल सैनिक शरीर, प्राण और पापोंका विनाश करनेवाले घोर प्रहार बड़े जोर- जोरसे करने लगे ॥
पूर्णचन्द्रार्कपद्मानां कान्तिभिर्गन्धतः समैः ।
उत्तमाङ्गैर्नृसिंहानां नृसिंहास्तस्तरुर्महीम् ॥ ३ ॥
मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी वीरोंने विपक्षी पुरुषसिंहोंके मस्तकोंको काट-काटकर उनके द्वारा धरतीको पाटने लगे । उनके वे मस्तक पूर्ण चन्द्रमा और सूर्यके समान कान्तिमान् तथा कमलोंके समान सुगन्धित थे ॥
अर्धचन्द्रैस्तथा भल्लैः क्षुरप्रैरसिपट्टिशैः ।
परश्वधैश्चाप्यकृन्तन्नुत्तमाङ्गानि युध्यताम् ॥ ४ ॥
अर्द्धचन्द्र, भल्ल, क्षुरप्र, खड्ग, पट्टिश और फरसोंद्वारा वे योद्धाओंके मस्तक काटने लगे ॥ ४ ॥
व्यायतायतबाहूनां व्यायतायतबाहुभिः ।
बाहवः पातिता रेजुर्धरण्यां सायुधाङ्गदाः ॥ ५ ॥
हृष्ट- पुष्ट और लंबी भुजाओंवाले वीरोंने, हृष्ट- पुष्ट और लंबी बाँहोंवाले योद्धाओंकी बाँहें पृथ्वीपर काट गिरायीं । वे भुजाएँ आयुधों और अंगदोंसहित शोभा पा रही थीं ॥ ५ ॥
तैः स्फुरद्भिर्मही भाति रक्ताङ्गुलितलैस्तथा ।
गरुडप्रहितैरुग्रैः पञ्चास्यैरुरगैरिव ॥ ६ ॥
जिनके तलवे और अंगुलियाँ लाल रंगकी थीं, उन तड़पती हुई भुजाओंसे रणभूमिकी वैसी ही शोभा हो रही थी, मानो वहाँ गरुड़के गिराये हुए भयंकर पंचमुख सर्प छटपटा रहे
पृष्ठ 1655
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
हों ॥ ६ ॥
द्विरदस्यन्दनाश्वेभ्यः पेतुर्वीरा द्विषद्धताः ।
विमानेभ्यो यथा क्षीणे पुण्ये स्वर्गसदस्तथा ॥ ७ ॥
शत्रुओंद्वारा मारे गये वीर हाथी, रथ और घोड़ोंसे उसी प्रकार गिर रहे थे, जैसे स्वर्गवासी जीव पुण्य क्षीण होनेपर वहाँके विमानोंसे नीचे गिर पड़ते हैं ॥ ७ ॥
गदाभिरन्ये गुर्वीभिः परिघैर्मुसलैरपि ।
पोथिताः शतशः पेतुर्वीरा वीरतरै रणे ॥ ८ ॥
अन्य सैकड़ों वीर बड़े - बड़े वीरोंद्वारा भारी गदाओं, परिघों और मुसलोंसे कुचले जाकर रणभूमिमें गिर रहे थे ॥ ८ ॥
रथा रथैर्विमथिता मत्ता मत्तैर्द्विपा द्विपैः ।
सादिनः सादिभिश्चैव तस्मिन् परमसंकुले ॥ ९ ॥
उस भारी घमासान युद्धमें रथोंने रथोंको मथ डाला, मतवाले हाथियोंने मदमत्त गजराजोंको धराशायी कर दिया और घुड़सवारोंने घुड़सवारोंको कुचल डाला ॥
रथैर्नरा रथा नागैरश्वारोहाश्च पत्तिभिः ।
अश्वारोहैः पदाताश्च निहता युधि शेरते ॥ १० ॥
रथियोंद्वारा मारे गये पैदल मनुष्य, हाथियोंद्वारा कुचले गये रथ और रथी, पैदलोंद्वारा मारे गये घुड़सवार और घुड़सवारोंद्वारा कालके गालमें भेजे गये पैदल सिपाही उस युद्धभूमिमें सो रहे थे ॥ १० ॥
रथाश्वपत्तयो नागै रथाश्वेभाश्च पत्तिभिः ।
रथपत्तिद्विपाश्चाश्वे रथैश्चापि नरद्विपाः ॥ ११ ॥
गजों और गजारोहियोंने रथियों, घुड़सवारों और पैदलोंको मार गिराया, पैदलोंने रथियों, घुड़सवारों और हाथीसवारोंको धराशायी कर दिया, घुड़सवारोंने रथियों, पैदलों और गजारोहियोंको मार डाला तथा रथियोंने भी पैदल मनुष्यों और गजारोहियोंको मार गिराया ॥ ११ ॥
रथाश्वेभनराणां तु नराश्वेभरथैः कृतम् ।
पाणिपादैश्च शस्त्रैश्च रथैश्च कदनं महत् ॥ १२ ॥
पैदल, घुड़सवार, हाथीसवार तथा रथियोंने रथियों, घुड़सवारों, हाथीसवारों और पैदलोंका हाथों, पैरों, अस्त्र - शस्त्रों एवं रथोंद्वारा महान् संहार कर डाला ॥ १२ ॥
तथा तस्मिन् बले शूरैर्वध्यमाने हतेऽपि च ।
अस्मानभ्याययुः पार्था वृकोदरपुरोगमाः ॥ १३ ॥
इस प्रकार जब शूरवीरोंद्वारा वह सेना मारी जाने लगी और मारी गयी, तब कुन्तीके पुत्रोंने भीमसेनको आगे रखकर हमलोगोंपर आक्रमण किया ॥ १३ ॥
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः ।
पृष्ठ 1656
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सात्यकिश्चेकितानश्च द्राविडैः सैनिकैः सह ॥ १४ ॥
वृता व्यूहेन महता पाण्ड्याश्चोलाः सकेरलाः । धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, द्रौपदीके पुत्र, प्रभद्रक, सात्यकि, चेकितान, द्राविड सैनिकोंसहित महान् व्यूहसे घिरे हुए पाण्ड्य, चोल तथा केरल योद्धाओंने धावा किया ॥ व्यूढोरस्का दीर्घभुजाः प्रांशवः पृथुलोचनाः ॥ १५ ॥
आपीडिनो रक्तदन्ता मत्तमातङ्गविक्रमाः । इन सबकी छाती चौड़ी और भुजाएँ तथा आँखें बड़ी थीं । वे सब- के - सब ऊँचे कदके थे । उन्होंने भाँति- भाँतिके शिरोभूषण एवं हार धारण किये थे । उनके दाँत लाल थे और वे मतवाले हाथीके समान पराक्रमी थे ॥ नानाविरागवसना गन्धचूर्णावचूर्णिताः ॥ १६ ॥
बद्धासयः पाशहस्ता वारणप्रतिवारणाः । उन्होंने अनेक प्रकारके रंगीन वस्त्र पहन रखे थे और अपने अंगोंमें सुगन्धित चूर्ण लगा रखा था । उनकी कमरमें तलवार बँधी थी, वे हाथमें पाश लिये हुए थे और हाथियोंको भी रोक देनेकी शक्ति रखते थे ॥ १६३ ॥
समानमृत्यवो राजन् नात्यजन्त परस्परम् ॥ १७ ॥
कलापिनश्चापहस्ता दीर्घकेशाः प्रियंवदाः ।
पत्तयः सादिनश्चान्ये घोररूपपराक्रमाः ॥ १८ ॥
राजन्! वे सभी सैनिक समानरूपसे मृत्युको वरण करनेकी प्रतिज्ञा करके एक-दूसरेका साथ नहीं छोड़ते थे । वे मस्तकपर मोरपंख धारण किये हुए थे । उनके हाथोंमें धनुष शोभा पाता था । उनके केश बहुत बड़े थे और वे प्रिय वचन बोलते थे । अन्यान्य पैदल और घुड़सवार भी बड़े भयंकर पराक्रमी थे ॥ १७-१८ ॥
अथापरे पुनः शूराश्चेदिपञ्चालकेकयाः ।
कारूषाः कोसलाः काञ्च्या मागधाश्चापि दुद्रुवुः ॥ १ ९ ॥
तदनन्तर पुनः दूसरे शूरवीर चेदि, पांचाल, केकय, कारूष, कोसल, कांचीनिवासी और मागध सैनिक भी हमी लोगोंपर चढ़ आये ॥ १ ९ ॥
तेषां रथाश्वनागाश्च प्रवराश्चोग्रपत्तयः ।
नानावाद्यधरैर्हृष्टा नृत्यन्ति च हसन्ति च ॥ २० ॥
उनके रथ, घोड़े और हाथी उत्तम कोटिके थे । पैदल सैनिक भी बड़े भयंकर थे । वे नाना प्रकारके बाजे बजाने - वालोंके साथ हर्षमें भरकर नाचते- कूदते और हँसते थे ॥
तस्य सैन्यस्य महतो महामात्रवरैर्वृतः ।
मध्ये वृकोदरोऽभ्यायात् त्वदीयान् नागधूर्गतः ॥ २१ ॥
उस विशाल सेनाके मध्यभागमें हाथीकी पीठपर बड़े - बड़े महावतोंसे घिरकर बैठे हुए भीमसेन आपके सैनिकोंकी ओर बढ़े आ रहे थे ॥ २१ ॥
पृष्ठ 1657
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
स नागप्रवरोऽत्युग्रो विधिवत् कल्पितो बभौ ।
उदयाद्रयग्रयभवनं यथाभ्युदितभास्करम् ॥ २२ ॥
उस अत्यन्त भयंकर गजराजको विधिपूर्वक सजाया गया था, वह सूर्योदयसे युक्त उदयाचलके उच्चतम शिखरके समान सुशोभित होता था ॥ २२ ॥
तस्यायसं वर्म वरं वररत्नविभूषितम् ।
ताराव्याप्तस्य नभसः शारदस्य समत्विषम् ॥ २३ ॥
उसका लोहेका बना हुआ उत्तम कवच श्रेष्ठ रत्नोंसे विभूषित होकर ताराओंसे भरे हुए शरत्कालीन आकाशके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ २३ ॥
स तोमरव्यग्रकरश्चारुमौलिः स्वलंकृतः ।
शरन्मध्यंदिनार्काभस्तेजसा व्यदहद् रिपून् ॥ २४ ॥
उस समय सुन्दर मुकुट और आभूषणोंसे विभूषित हो हाथमें तोमर लेकर शरत्कालके मध्याह्न सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले भीमसेन अपने तेजसे शत्रुओंको दग्ध करने लगे ॥ २४ ॥
तं दृष्ट्वा द्विरदं दूरात् क्षेमधूर्तिर्द्विपस्थितः ।
आह्वयन्नभिदुद्राव प्रमनाः प्रमनस्तरम् ॥ २५ ॥
उनके उस हाथीको दूरसे ही देखकर हाथीपर ही बैठे हुए महामना क्षेमधूर्तिने महामनस्वी भीमसेनको ललकारते हुए उनपर धावा किया ॥ २५ ॥
तयोः समभवद् युद्धं द्विपयोरुग्ररूपयोः ।
यदृच्छया द्रुमवतोर्महापर्वतयोरिव ॥ २६ ॥
जैसे वृक्षोंसे भरे हुए दो महान् पर्वत दैवेच्छासे परस्पर टकरा रहे हों, उसी प्रकार उन भयानक रूपधारी दोनों गजराजोंमें भारी युद्ध छिड़ गया ॥ २६ ॥
संसक्तनागौ तौ वीरौ तोमरैरितरेतरम् ।
बलवत् सूर्यरश्म्याभैर्भित्त्वान्योन्यं विनेदतुः ॥ २७ ॥
जिनके हाथी एक - दूसरेसे उलझे हुए थे, वे दोनों वीर क्षेमधूर्ति और भीमसेन सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले तोमरोंद्वारा एक- दूसरेको बलपूर्वक विदीर्ण करते हुए जोर-जोरसे गर्जने लगे ॥ २७ ॥
व्यपसृत्य तु नागाभ्यां मण्डलानि विचेरतुः ।
प्रगृह्य चोभौ धनुषी जघ्नतुर्वै परस्परम् ॥ २८ ॥
फिर हाथियोंद्वारा ही पीछे हटकर वे दोनों मण्डलाकार विचरने और धनुष लेकर एक-दूसरेपर बाणोंका प्रहार करने लगे ॥ २८ ॥
क्ष्वेडितास्फोटितरवैर्बाणशब्देस्तु सर्वतः ।
तौ जनं हर्षयन्तौ च सिंहनादं प्रचक्रतुः ॥ २ ९ ॥
पृष्ठ 1658
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वे गर्जने, ताल ठोंकने और बाणोंके शब्दसे चारों ओरके योद्धाओंको हर्ष प्रदान करते हुए सिंहनाद कर रहे थे ॥
समुद्यतकराभ्यां तौ द्विपाभ्यां कृतिनावुभौ ।
वातोद्धूतपताकाभ्यां युयुधाते महाबलौ ॥ ३० ॥
वे दोनों महाबली और विद्वान् योद्धा उन सूँड़ उठाये हुए दोनों हाथियोंद्वारा युद्ध कर रहे थे । उस समय उन हाथियोंके ऊपर लगी हुई पताकाएँ हवाके वेगसे फहरा रही थीं ॥ ३० ॥
तावन्योन्यस्य धनुषी छित्त्वान्योन्यं विनेदतुः ।
शक्तितोमरवर्षेण प्रावृण्मेघाविवाम्बुभिः ॥ ३१ ॥
जैसे वर्षाकालके दो मेघ पानी बरसा रहे हों, उसी प्रकार शक्ति और तोमरोंकी वर्षासे एक- दूसरेके धनुषको काटकर वे दोनों ही परस्पर गर्जन - तर्जन करने लगे ॥ ३१ ॥
क्षेमधूर्तिस्तदा भीमं तोमरेण स्तनान्तरे ।
निर्बिभेदातिवेगेन षड्भिश्चाप्यपरैर्नदन् ॥ ३२ ॥
उस समय क्षेमधूर्तिने भीमसेनकी छातीमें बड़े वेगसे एक तोमर धँसा दिया । फिर गर्जना करते हुए उसने उन्हें छः तोमर और मारे ॥ ३२ ॥
स भीमसेनः शुशुभे तोमरै रङ्गमाश्रितैः ।
क्रोधदीप्तवपुर्मेधैः सप्तसप्तिरिवांशुमान् ॥ ३३ ॥
अपने शरीरमें धँसे हुए उन तोमरोंद्वारा क्रोधसे उद्दीप्त शरीरवाले भीमसेन मेघोंद्वारा सात घोड़ोंवाले सूर्यके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ३३ ॥
ततो भास्करवर्णाभमञ्जोगतिमयस्मयम् ।
ससर्ज तोमरं भीमः प्रत्यमित्राय यत्नवान् ॥ ३४ ॥
तब भीमसेनने सूर्यके समान प्रकाशमान तथा सीधी गतिसे जानेवाले एक लोहमय तोमरको अपने शत्रुपर प्रयत्नपूर्वक छोड़ा ॥ ३४ ॥
ततः कुलूताधिपतिश्चापमानम्य सायकैः ।
दशभिस्तोमरं भित्त्वा षष्ट्या विव्याध पाण्डवम् ॥ ३५ ॥
यह देख कुलूतदेशके राजा क्षेमधूर्तिने अपने धनुषको नवाकर दस सायकोंसे उस तोमरको काट डाला और साठ बाण मारकर भीमसेनको भी घायल कर दिया ॥ ३५ ॥
अथ कार्मुकमादाय भीमो जलदनिःस्वनम् ।
रिपोरभ्यर्दयन्नागमुन्नदन् पाण्डवः शरैः ॥ ३६ ॥
तत्पश्चात् गर्जते हुए पाण्डुपुत्र भीमसेनने मेघ गर्जनाके समान गम्भीर घोष करनेवाले धनुषको लेकर अपने बाणोंद्वारा शत्रुके हाथीको पीड़ित कर दिया ॥ ३६ ॥
स शरौघार्दितो नागो भीमसेनेन संयुगे ।
गृह्यमाणोऽपि नातिष्ठद् वातोद्धूत इवाम्बुदः ॥ ३७ ॥
पृष्ठ 1659
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
युद्धस्थलमें भीमसेनके बाणसमूहोंसे पीड़ित हुआ वह गजराज हवाके उड़ाये हुए बादलोंके समान रोकनेपर भी वहाँ रुक न सका ॥ ३७ ॥
तमभ्यधावद् द्विरदं भीमो भीमस्य नागराट् ।
महावातेरितं मेघं वातोद्धूत इवाम्बुदः ॥ ३८ ॥
जैसे आँधीके उड़ाये हुए मेघके पीछे वायुप्रेरित दूसरा मेघ जा रहा हो, उसी प्रकार भीमसेनका भयंकर गजराज क्षेमधूर्तिके उस हाथीका पीछा करने लगा ॥ ३८ ॥
संनिवार्यात्मनो नागं क्षेमधूर्तिः प्रतापवान् ।
विव्याधाभिद्रुतं बाणैर्भीमसेनस्य कुञ्जरम् ॥ ३ ९ ॥
उस समय प्रतापी क्षेमधूर्तिने अपने हाथीको किसी प्रकार रोककर सामने आते हुए भीमसेनके हाथीको बाणोंसे बींध डाला ॥ ३ ९ ॥
ततः साधुविसृष्टेन क्षुरेणानतपर्वणा ।
छित्त्वा शरासनं शत्रोर्नागमामित्रमार्दयत् ॥ ४० ॥
इसके बाद अच्छी तरह छोड़े हुए झुकी हुई गाँठवाले क्षुर नामक बाणसे भीमसेनने शत्रुके धनुषको काटकर उसके हाथीको पुनः अच्छी तरह पीड़ित किया ॥ ४० ॥
ततः क्रुद्धो रणे भीमं क्षेमधूर्तिः पराभिनत् ।
जघान चास्य द्विरदं नाराचैः सर्वमर्मसु ॥ ४१ ॥
तब क्षेमधूर्तिने कुपित हो रणभूमिमें भीमसेनको गहरी चोट पहुँचायी और अनेक नाराचोंद्वारा उनके हाथीके सम्पूर्ण मर्मस्थानोंमें आघात किया ॥ ४१ ॥
स पपात महानागो भीमसेनस्य भारत ।
पुरा नागस्य पतनादवप्लुत्य स्थितो महीम् ॥ ४२ ॥
भारत! इससे भीमसेनका महान् गजराज पृथ्वीपर गिर पड़ा । उसके गिरनेसे पहले ही भीमसेन कूदकर भूमिपर खड़े हो गये ॥ ४२ ॥
तस्य भीमोऽपि द्विरदं गदया समपोथयत् ।
तस्मात् प्रमथितान्नागात् क्षेमधूर्तिमवप्लुतम् ॥ ४३ ॥
उद्यतायुधमायान्तं गदयाहन् वृकोदरः ।
स पपात हतः सासिर्व्यसुस्तमभितो द्विपम् ॥ ४४ ॥
तदनन्तर भीमने भी अपनी गदासे क्षेमधूर्तिके हाथीको मार डाला । फिर जब उस मरे हुए हाथीसे कूदकर क्षेमधूर्ति तलवार उठाये सामने आने लगा, उस समय भीमसेनने उसपर भी गदासे प्रहार किया । गदाकी चोट खाकर उसके प्राणपखेरू उड़ गये और वह तलवार लिये हुए अपने हाथीके पास ही गिर पड़ा ॥ ४३-४४ ॥ वज्रप्रभग्नमचलं सिंहो वज्रहतो यथा ।
तं हतं नृपतिं दृष्ट्वा कुलूतानां यशस्करम् ।
प्राद्रवद् व्यथिता सेना त्वदीया भरतर्षभ ॥ ४५ ॥
पृष्ठ 1660
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भरतश्रेष्ठ! जैसे वज्रके आघातसे टूट- फूटकर गिरे हुए पर्वतके समीप वज्रका मारा हुआ सिंह गिरा हो, उसी प्रकार उस हाथीके समीप क्षेमधूर्ति धराशायी हो रहे थे । कुलूतोंका यश बढ़ानेवाले राजा क्षेमधूर्तिको मारा गया देख आपकी सेना व्यथित होकर भागने लगी ॥ ४५ ॥
Milia इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि क्षेमधूर्तिवधे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें क्षेमधूर्तिका वधविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥