श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 1731–1740

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1731–1740

पृष्ठ 1731

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1731 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

त्रयोविंशोऽध्यायः सहदेवके द्वारा दुःशासनकी पराजय संजय उवाच

सहदेवं तथा क्रुद्धं दहन्तं तव वाहिनीम् ।

दुःशासनो महाराज भ्राता भ्रातरमभ्ययात् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं - महाराज! सहदेव क्रोधमें भरकर आपकी विशाल सेनाको दग्ध करने लगे । उस समय भाई दुःशासनने अपने उस भ्राताका सामना किया ॥ १ ॥

तौ समेतौ महायुद्धे दृष्ट्वा तत्र महारथाः ।

सिंहनादरवांश्चक्रुर्वासांस्यादुधुवुश्च ह ॥ २ ॥

उस महायुद्धमें उन दोनों भाइयोंको एकत्र हुआ देख वहाँ खड़े हुए महारथी योद्धा सिंहनाद करने और वस्त्र हिलाने लगे ॥ २ ॥

ततो भारत क्रुद्धेन तव पुत्रेण धन्विना ।

पाण्डुपुत्रस्त्रिभिर्बाणैर्वक्षस्यभिहतो बली ॥ ३ ॥

भारत! उस समय कुपित हुए आपके धनुर्धर पुत्रने अपने तीन बाणोंद्वारा बलवान् पाण्डुपुत्र सहदेवकी छातीमें गहरा आघात किया ॥ ३ ॥

सहदेवस्ततो राजन् नाराचेन तवात्मजम् ।

विद्ध्वा विव्याध सप्तत्या सारथिं च त्रिभिः शरैः ॥ ४ ॥

राजन्! तब सहदेवने आपके पुत्रको एक नाराचसे घायल करके पुनः सत्तर बाणोंसे बींध डाला । तत्पश्चात् उनके सारथिको भी तीन बाण मारे ॥ ४ ॥

दुःशासनस्ततश्चापं छित्त्वा राजन् महाहवे ।

सहदेवं त्रिसप्तत्या बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥ ५ ॥

राजन्! उस महासमरमें दुःशासनने सहदेवका धनुष काटकर उनकी दोनों भुजाओं और छातीमें तिहत्तर बाण मारे ॥ ५ ॥

सहदेवस्तु संक्रुद्धः खड्गं गृह्य महाहवे ।

आविध्य प्रासृजत् तूर्णं तव पुत्ररथं प्रति ॥ ६ ॥

तब सहदेवने अत्यन्त कुपित होकर उस महासमरमें तलवार उठा ली और उसे घुमाकर तुरंत ही आपके पुत्रके रथकी ओर फेंका ॥ ६ ॥

समार्गणगुणं चापं छित्त्वा तस्य महानसिः ।

निपपात ततो भूमौ च्युतः सर्प इवाम्बरात् ॥ ७ ॥

उनकी वह लंबी तलवार दुःशासनके धनुष, बाण और प्रत्यंचाको काटकर आकाशसे भ्रष्ट हुए सर्पकी भाँति वहाँ पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1732

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1732 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथान्यद् धनुरादाय सहदेवः प्रतापवान् ।

दुःशासनाय चिक्षेप बाणमन्तकरं ततः ॥ ८ ॥

तदनन्तर प्रतापी सहदेवने दूसरा धनुष लेकर दुःशासनपर एक विनाशकारी बाणका प्रहार किया ॥ ८ ॥

तमापतन्तं विशिखं यमदण्डोपमत्विषम् ।

खड्गेन शितधारेण द्विधा चिच्छेद कौरवः ॥ ९ ॥

यमदण्डके समान प्रकाशित होनेवाले उस बाणको आते देख कुरुवंशी दुःशासनने तीखी धारवाले खड्गसे उसके दो टुकड़े कर डाले ॥ ९ ॥

ततस्तं निशितं खड्गमाविध्य युधि सत्वरः ।

धनुश्चान्यत् समादाय शरं जग्राह वीर्यवान् ॥ १० ॥

तत्पश्चात् दुःशासनने युद्धस्थलमें तुरंत ही तीखी तलवार घुमाकर सहदेवपर दे मारी; फिर उस पराक्रमी वीरने दूसरा धनुष लेकर उसपर बाणका संधान किया ॥

तमापतन्तं सहसा निस्त्रिंशं निशितैः शरैः ।

पातयामास समरे सहदेवो हसन्निव ॥ ११ ॥

सहदेवने हँसते हुए- से सहसा अपनी ओर आती हुई उस तलवारको तीखे बाणोंसे समरभूमिमें गिरा दिया ॥ ११ ॥

ततो बाणांश्चतुःषष्टिं तव पुत्रो महारणे ।

सहदेवरथं तूर्णं प्रेषयामास भारत ॥ १२ ॥

भारत! इतनेहीमें आपके पुत्रने उस महासमरमें सहदेवपर तुरंत ही चौंसठ बाण चलाये ॥ १२ ॥

तान् शरान् समरे राजन् वेगेनापततो बहून् ।

एकैकं पञ्चभिर्बाणैः सहदेवो न्यकृन्तत ॥ १३ ॥

राजन्! सहदेवने रणभूमिमें वेगसे आते हुए उन बहुसंख्यक बाणोंमेंसे प्रत्येकको पाँच-पाँच बाण मारकर काट गिराया ॥ १३ ॥

संनिवार्य महाबाणांस्तव पुत्रेण प्रेषितान् ।

अथास्मै सुबहून् बाणान् प्रेषयामास संयुगे ॥ १४ ॥

इस प्रकार आपके पुत्रके चलाये हुए उन महाबाणोंका निवारण करके युद्धस्थलमें सहदेवने उसके ऊपर भी बहुत - से बाण छोड़े ॥ १४ ॥

तान् बाणांस्तव पुत्रोऽपि छित्त्वैकैकं त्रिभिः शरैः ।

ननाद सुमहानादं दारयाणो वसुन्धराम् ॥ १५ ॥

आपके पुत्रने भी सहदेवके उन बाणोंमेंसे प्रत्येकको तीन- तीन बाणोंसे काटकर पृथ्वीको विदीर्ण - सी करते हुए बड़े जोरसे गर्जना की ॥ १५ ॥

ततो दुःशासनो राजन् विद्ध्वा पाण्डुसुतं रणे ।

पृष्ठ 1733

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1733 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सारथिं नवभिर्बाणैर्माद्रेयस्य समार्पयत् ॥ १६ ॥

राजन्! इसके बाद दुःशासनने रणभुमिमें पाण्डुकुमार सहदेवको घायल करके उन माद्रीकुमारके सारथिको भी नौ बाण मारे ॥ १६ ॥

ततः क्रुद्धो महाराज सहदेवः प्रतापवान् ।

समाधत्त शरं घोरं मृत्युकालान्तकोपमम् ॥ १७ ॥

महाराज! इससे कुपित होकर प्रतापी सहदेवने अपने धनुषपर मृत्यु, काल और यमराजके समान भयंकर बाण रखा ॥

विकृष्य बलवच्चापं तव पुत्राय सोऽसृजत् ।

स तं निर्भिद्य वेगेन भित्त्वा च कवचं महत् ॥ १८ ॥

प्राविशद् धरणीं राजन् वल्मीकमिव पन्नगः ।

ततः सम्मुमुहे राजंस्तव पुत्रो महारथः ॥ १ ९ ॥

फिर उस धनुषको बलपूर्वक खींचकर उसने आपके पुत्रपर वह बाण छोड़ दिया । राजन्! वह बाण दुःशासनको तथा उसके विशाल कवचको भी वेगपूर्वक विदीर्ण करके बाँबीमें घुसनेवाले सर्पके समान धरतीमें समा गया। महाराज! इससे आपका महारथी पुत्र मूर्च्छित हो गया ॥ १८-१९ ॥

मूढं चैनं समालोक्य सारथिस्त्वरितो रथम् ।

अपोवाह भृशं त्रस्तो वध्यमानः शितैः शरैः ॥ २० ॥

उसे मूर्च्छित देख उसका सारथि तीखे बाणोंकी मार खाकर अत्यन्त भयभीत हो तुरंत ही रथको रणभूमिसे दूर हटा ले गया ॥ २० ॥

पराजित्य रणे तं तु कौरव्यं पाण्डुनन्दनः ।

दुर्योधनबलं दृष्ट्वा प्रममाथ समन्ततः ॥ २१ ॥

कुरुवंशी दुःशासनको रणभूमिमें पराजित करके पाण्डुनन्दन सहदेवने दुर्योधनकी सेनाको वहाँ उपस्थित देख उसे सब ओरसे मथ डाला ॥ २१ ॥

पिपीलिकपुटं राजन् यथा मृद्नन्नरो रुषा ।

तथा सा कौरवी सेना मृदिता तेन भारत ॥ २२ ॥

भरतवंशी नरेश! जैसे मनुष्य रोषमें आकर चींटियोंके दलको मसल डालता है, उसी प्रकार सहदेवने उस कौरव सेनाको धूलमें मिला दिया ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि सहदेवदुःशासनयुद्धे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें सहदेव और दुःशासनका युद्धविषयक तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३ ॥

पृष्ठ 1734

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1734 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चतुर्विंशोऽध्यायः नकुल और कर्णका घोर युद्ध तथा कर्णके द्वारा नकुलकी पराजय और पांचाल - सेनाका संहार संजय उवाच

नकुलं रभसं युद्धे द्रावयन्तं वरूथिनीम् ।

कर्णो वैकर्तनो राजन् वारयामास वै रुषा ॥ १ ॥

संजय कहते हैं - राजन्! युद्धस्थलमें कौरव- सेनाको खदेड़ते हुए वेगशाली वीर नकुलको वैकर्तन कर्णने रोषपूर्वक रोका ॥ १ ॥

नकुलस्तु ततः कर्णं प्रहसन्निदमब्रवीत् ।

चिरस्य बत दृष्टोऽहं दैवतैः सौम्यचक्षुषा ॥ २

पश्य मां त्वं रणे पाप चक्षुर्विषयमागतम् ।

त्वं हि मूलमनर्थानां वैरस्य कलहस्य च ॥ ३ ॥

त्वद्दोषात् कुरवः क्षीणाः समासाद्य परस्परम् ।

त्वामद्य समरे हत्वा कृतकृत्योऽस्मि विज्वरः ॥ ४ ॥

तब नकुलने कर्णसे हँसते हुए इस प्रकार कहा - ' आज दीर्घकालके पश्चात् देवताओंने मुझे सौम्य दृष्टिसे देखा है; यह बड़े हर्षकी बात है । पापी कर्ण! मैं रणभूमिमें तेरी आँखोंके सामने आ गया हूँ । तू अच्छी तरह मुझे देख ले । तू ही इन सारे अनर्थोंकी तथा वैर एवं कलहकी जड़ है । तेरे ही दोषसे कौरव आपसमें लड़ - भिड़कर क्षीण हो गये । आज मैं तुझे समरभूमिमें मारकर कृतकृत्य एवं निश्चिन्त हो जाऊँगा' ॥ २–४ ॥

एवमुक्तः प्रत्युवाच नकुलं सूतनन्दनः ।

सदृशं राजपुत्रस्य धन्विनश्च विशेषतः ॥ ५ ॥

प्रहरस्व च मे वीर पश्यामस्तव पौरुषम् ।

कर्म कृत्वा रणे शूर ततः कत्थितुमर्हसि ॥ ६ ॥

नकुलके ऐसा कहनेपर सूतनन्दन कर्णने उनसे कहा - ' वीर! तुम एक राजपुत्रके विशेषतः धनुर्धर योद्धाके योग्य कार्य करते हुए मुझपर प्रहार करो । हम तुम्हारा पुरुषार्थ देखेंगे। शूर! पहले रणभूमिमें पराक्रम प्रकट करके फिर उसके विषयमें तुम्हें बढ़ - बढ़कर बातें बनानी चाहिये ॥ ५-६ ॥

अनुक्त्वा समरे तात शूरा युध्यन्ति शक्तितः ।

प्रयुध्यस्व मया शक्त्या हनिष्ये दर्पमेव ते ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1735

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1735 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

‘ तात! शूरवीर समरांगणमें बातें न बनाकर अपनी शक्तिके अनुसार युद्ध करते हैं । तुम

पूरी शक्ति लगाकर मेरे साथ युद्ध करो । मैं तुम्हारा घमंड चूर कर दूँगा' ॥ ७ ॥

इत्युक्त्वा प्राहरत् तूर्णं पाण्डुपुत्राय सूतजः ।

विव्याध चैनं समरे त्रिसप्तत्या शिलीमुखैः ॥ ८ ॥

ऐसा कहकर सूतपुत्र कर्णने पाण्डुकुमार नकुलपर तुरंत ही प्रहार किया । उन्हें युद्धस्थलमें तिहत्तर बाणोंसे बींध डाला ॥ ८ ॥

नकुलस्तु ततो विद्धः सूतपुत्रेण भारत ।

अशीत्याशीविषप्रख्यैः सूतपुत्रमविध्यत ॥ ९ ॥

भारत! सूतपुत्रके द्वारा घायल होकर नकुलने उसे भी विषधर सर्पोंके समान अस्सी बाणों से क्षत -विक्षत कर दिया ॥ ९ ॥

तस्य कर्णो धनुश्छित्त्वा स्वर्णपुङ्खैः शिलाशितैः ।

त्रिंशता परमेष्वासः शरैः पाण्डवमार्दयत् ॥ १० ॥

तब महाधनुर्धर कर्णने शिलापर तेज किये हुए स्वर्णमय पंखवाले बाणोंसे नकुलके धनुषको काटकर उन्हें तीस बाणोंसे पीड़ित कर दिया ॥ १० ॥

ते तस्य कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे ।

आशीविषा यथा नागा भित्त्वा गां सलिलं पपुः ॥ ११ ॥

जैसे विषधर नाग धरती फोड़कर जल पी लेते हैं, उसी प्रकार उन बाणोंने नकुलका कवच छिन्न - भिन्न करके युद्धस्थलमें उनका रक्त पी लिया ॥ ११ ॥

अथान्यद्धनुरादाय हेमपृष्ठं दुरासदम् ।

कर्णं विव्याध सप्तत्या सारथिं च त्रिभिः शरैः ॥ १२ ॥

तत्पश्चात् नकुलने सोनेकी पीठवाला दूसरा दुर्जय धनुष हाथमें लेकर कर्णको सत्तर और उसके सारथिको तीन बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १२ ॥

ततः क्रुद्धो महाराज नकुलः परवीरहा ।

क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन कर्णस्य धनुराच्छिनत् ॥ १३ ॥

महाराज! इसके बाद शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले नकुलने कुपित होकर एक अत्यन्त तीखे क्षुरप्रसे कर्णका धनुष काट दिया ॥ १३ ॥

अथैनं छिन्नधन्वानं सायकानां शतैस्त्रिभिः ।

आजघ्ने प्रहसन् वीरः सर्वलोकमहारथम् ॥ १४ ॥

धनुष कट जानेपर सम्पूर्ण लोकोंके विख्यात महारथी कर्णको वीर नकुलने हँसते -हँसते तीन सौ बाण मारे ॥ १४ ॥

कर्णमभ्यर्दितं दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रेण मारिष ।

विस्मयं परमं जग्मू रथिनः सह दैवतैः ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1736

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1736 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मान्यवर! पाण्डुपुत्र नकुलके द्वारा कर्णको इस तरह पीड़ित हुआ देख देवताओंसहित सम्पूर्ण रथियोंको महान् आश्चर्य हुआ ॥ १५ ॥

अथान्यद् धनुरादाय कर्णो वैकर्तनस्तदा ।

नकुलं पञ्चभिर्बाणैर्जत्रुदेशे समार्पयत् ॥ १६ ॥

तब वैकर्तन कर्णने दूसरा धनुष लेकर नकुलके गलेकी हँसलीपर पाँच बाण मारे ॥ १६ ॥

तत्रस्थैरथ तैर्बाणैर्माद्रीपुत्रो व्यरोचत स्वरश्मिभिरिवादित्यो भुवने विसृजन् प्रभाम् ॥ १७ ॥

वहाँ धँसे हुए उन बाणोंसे माद्रीकुमार नकुल उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे सम्पूर्ण जगत्में प्रभा बिखेरनेवाले भगवान् सूर्य अपनी किरणोंसे प्रकाशित होते हैं ॥ १७ ॥

नकुलस्तु ततः कर्णं विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः ।

अथास्य धनुषः कोटिं पुनश्चिच्छेद मारिष ॥ १८ ॥

माननीय नरेश! तदनन्तर नकुलने कर्णको सात बाणोंसे घायल करके उसके धनुषका एक कोना पुनः काट डाला ॥ १८ ॥

सोऽन्यत् कार्मुकमादाय समरे वेगवत्तरम् ।

नकुलस्य ततो बाणैः सर्वतोऽवारयद् दिशः ॥ १ ९ ॥

तब कर्णने समरांगणमें दूसरा अत्यन्त वेगशाली धनुष लेकर नकुलके चारों ओर सम्पूर्ण दिशाओंको बाणोंसे आच्छादित कर दिया ॥ १ ९ ॥

संछाद्यमानः सहसा कर्णचापच्युतैः शरैः ।

चिच्छेद स शरांस्तूर्णं शरैरेव महारथः ॥ २० ॥

कर्णके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा सहसा आच्छादित होते हुए महारथी नकुलने तुरंत ही उसके बाणोंको अपने बाणोंद्वारा ही काट गिराया ॥ २० ॥

ततो बाणमयं जालं विततं व्योम्नि दृश्यते ।

खद्योतानामिव व्रातैः सम्पतद्भिर्यथा नभः ॥ २१ ॥

तत्पश्चात् आकाशमें बाणोंका जाल-सा बिछा हुआ दिखायी देने लगा, मानो वहाँ जुगनुओंके समूह उड़ रहे हों ॥ २१ ॥

तैर्विमुक्तैः शरशतैश्छादितं गगनं तदा ।

शलभानां यथा व्रातैस्तद्वदासीद् विशाम्पते ॥ २२ ॥

प्रजानाथ! उस समय धनुषसे छूटे हुए सौ - सौ बाणोंद्वारा आच्छादित हुआ आकाश पतंगोंके समूहसे भरा हुआ -सा प्रतीत होता था ॥ २२ ॥

ते शरा हेमविकृताः सम्पतन्तो मुहुर्मुहुः ।

श्रेणीकृता व्यकाशन्त क्रौञ्चाः श्रेणीकृता इव ॥ २३ ॥

पृष्ठ 1737

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1737 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

बारंबार गिरते हुए वे सुवर्णभूषित बाण श्रेणिवद्ध होकर ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो बहुत - से क्रौंचपक्षी एक पंक्तिमें होकर उड़ रहे हों ॥ २३ ॥

बाणजालावृते व्योम्नि च्छादिते च दिवाकरे ।

न स्म सम्पतते भूम्यां किंचिदप्यन्तरिक्षगम् ॥ २४ ॥

बाणोंके जालसे आकाश और सूर्यके ढक जानेपर अन्तरिक्षकी कोई भी वस्तु उस समय पृथ्वीपर नहीं गिरती थी ॥ २४ ॥

निरुद्धे तत्र मार्गे च शरसंघैः समन्ततः ।

व्यरोचेतां महात्मानौ कालसूर्याविवोदितौ ॥ २५ ॥

बाणोंके समूहसे वहाँ सब ओरका मार्ग अवरुद्ध हो जानेपर वे दोनों महामनस्वी वीर नकुल और कर्ण प्रलयकालमें उदित हुए दो सूचके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २५ ॥

कर्णचापच्युतैर्बाणैर्वध्यमानास्तु सोमकाः ।

अवालीयन्त राजेन्द्र वेदनार्ता भृशार्दिताः ॥ २६ ॥

राजेन्द्र! कर्णके धनुषसे छूटे हुए बाणोंकी मार खाकर सोमक- योद्धा वेदनासे कराह उठे और अत्यन्त पीड़ित हो इधर- उधर छिपने लगे ॥ २६ ॥

नकुलस्य तथा बाणैर्हन्यमाना चमूस्तव ।

व्यशीर्यत दिशो राजन् वातनुन्ना इवाम्बुदाः ॥ २७ ॥

राजन्! नकुलके बाणोंसे मारी जाती हुई आपकी सेना भी हवासे उड़ाये गये बादलोंके समान सम्पूर्ण दिशाओंमें बिखर गयी ॥ २७ ॥

ते सेने हन्यमाने तु ताभ्यां दिव्यैर्महाशरैः ।

शरपातमपाक्रम्य तस्थतुः प्रेक्षिके तदा ॥ २८ ॥

उन दोनोंके दिव्य महाबाणोंद्वारा आहत होती हुई दोनों सेनाएँ उस समय उनके बाणोंके गिरनेके स्थानसे दूर हटकर खड़ी हो गयीं और दर्शक बनकर तमाशा देखने लगीं ॥ २८ ॥

प्रोत्सारितजने तस्मिन् कर्णपाण्डवयोः शरैः ।

अविध्येतां महात्मानावन्योन्यं शरवृष्टिभिः ॥ २ ९ ॥

कर्ण और नकुलके बाणोंद्वारा जब सब लोग वहाँसे दूर हटा दिये गये, तब वे दोनों महामनस्वी वीर अपने बाणोंकी वर्षासे एक-दूसरेको चोट पहुँचाने लगे ॥ २ ९ ॥

विदर्शयन्तौ दिव्यानि शस्त्राणि रणमूर्धनि ।

छादयन्तौ च सहसा परस्परवधैषिणौ ॥ ३० ॥

युद्धके मुहाने पर वे दोनों दिव्य अस्त्र- शस्त्रोंका प्रदर्शन करते हुए एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छासे सहसा बाणोंद्वारा आच्छादित करने लगे ॥ ३० ॥

नकुलेन शरा मुक्ताः कङ्कबर्हिणवाससः ।

सूतपुत्रमवच्छाद्य व्यतिष्ठन्त यथाम्बरे ॥ ३१ ॥

तथैव सूतपुत्रेण प्रेषिताः परमाहवे ।

पृष्ठ 1738

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1738 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पाण्डुपुत्रमवच्छाद्य व्यतिष्ठन्ताम्बरे शराः ॥ ३२ ॥

नकुलके बाणोंमें कंक और मयूरके पंख लगे हुए थे । वे उनके धनुषसे छूटकर सूतपुत्रको आच्छादित करके जिस प्रकार आकाशमें स्थित होते थे, उसी प्रकार उस महासमरमें सूतपुत्रके चलाये हुए बाण पाण्डुकुमार नकुलको आच्छादित करके आकाशमें छा जाते थे ॥ ३१-३२ ॥

शरवेश्मप्रविष्टौ तौ ददृशाते न कैश्चन ।

सूर्याचन्द्रमसौ राजञ्छाद्यमानौ घनैरिव ॥ ३३ ॥

राजन्! जैसे मेघोंद्वारा ढक जानेपर सूर्य और चन्द्रमा दिखायी नहीं देते, उसी प्रकार बाणनिर्मित भवनमें प्रविष्ट हुए उन दोनों वीरोंपर किसीकी दृष्टि नहीं पड़ती थी ॥ ३३ ॥

ततः क्रुद्धो रणे कर्णः कृत्वा घोरतरं वपुः ।

पाण्डवं छादयामास समन्ताच्छरवृष्टिभिः ॥ ३४ ॥

तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए कर्णने रणभूमिमें अत्यन्त भयंकर स्वरूप प्रकट करके चारों ओरसे बाणोंकी वर्षाद्वारा पाण्डुपुत्र नकुलको ढक दिया ॥ ३४ ॥

सोऽतिच्छन्नो महाराज सूतपुत्रेण पाण्डवः ।

न चकार व्यथां राजन् भास्करो जलदैर्यथा ॥ ३५ ॥

महाराज! सूतपुत्रके द्वारा अत्यन्त आच्छन्न कर दिये जानेपर भी बादलोंसे ढके हुए सूर्यके समान नकुलने अपने मनमें तनिक भी व्यथाका अनुभव नहीं किया ॥ ३५ ॥

ततः प्रहस्याधिरथिः शरजालानि मारिष ।

प्रेषयामास समरे शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ३६ ॥

मान्यवर! तत्पश्चात् सूतपुत्रने बड़े जोरसे हँसकर पुनः समरांगणमें बाणोंके जाल बिछा दिये । उसने सैकड़ों और हजारों बाण चलाये ॥ ३६ ॥

एकच्छायमभूत् सर्वं तस्य बाणैर्महात्मनः ।

अभ्रच्छायेव संजज्ञे सम्पतद्भिः शरोत्तमैः ॥ ३७ ॥

उस महामनस्वी वीरके गिरते हुए उत्तम बाणोंसे घिर जानेके कारण वहाँ सब कुछ एकमात्र अन्धकारमें निमग्न हो गया । ठीक उसी तरह जैसे बादलोंकी घोर घटा घिर आनेपर सब ओर अँधेरा छा जाता है ॥ ३७ ॥

ततः कर्णो महाराज धनुश्छित्त्वा महात्मनः ।

सारथिं पातयामास रथनीडाद्धसन्निव ॥ ३८ ॥

महाराज! तदनन्तर हँसते हुए-से कर्णने महामना नकुलका धनुष काटकर उनके सारथिको रथकी बैठकसे मार गिराया ॥ ३८ ॥

ततोऽश्वांश्चतुरश्चास्य चतुर्भिर्निशितैः शरैः ।

यमस्य भवनं तूर्णं प्रेषयामास भारत ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 1739

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1739 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भारत! फिर चार तीखे बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको भी तुरंत ही यमराजके घर भेज दिया ॥ ३ ९ ॥

अथास्य तं रथं दिव्यं तिलशो व्यधमच्छरैः ।

पताकां चक्ररक्षांश्च गदां खड्गं च मारिष ॥ ४० ॥

शतचन्द्रं च तच्चर्म सर्वोपकरणानि च । मान्यवर! इसके बाद उसने अपने बाणोंद्वारा नकुलके उस दिव्य रथको तिल- तिल करके काट दिया और पताका, चक्ररक्षकों, गदा एवं खड्गको भी छिन्न-भिन्न कर दिया । साथ ही सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे सुशोभित उनकी ढाल तथा अन्य सब उपकरणोंको भी उसने नष्ट कर दिया ॥ ४० ॥

हताश्वो विरथश्चैव विवर्मा च विशाम्पते ॥ ४१ ॥

अवतीर्य रथात्तूर्णं परिघं गृह्य धिष्ठितः । प्रजापालक नरेश! घोड़े, रथ और कवचके नष्ट हो जानेपर नकुल तुरंत उस रथसे उतरकर हाथमें परिघ लिये खड़े हो गये ॥ ४१३ ॥

तमुद्यतं महाघोरं परिघं तस्य सूतजः ॥ ४२ ॥

व्यहनत् सायकै राजन् सुतीक्ष्णैर्भारसाधनैः । राजन्! उनके उठे हुए उस महाभयंकर परिघको सूतपुत्रने अत्यन्त तीखे तथा दुष्कर कार्यको सिद्ध करनेवाले बाणोंद्वारा काट डाला ॥ ४२ ॥

व्यायुधं चैनमालक्ष्य शरैः संनतपर्वभिः ॥ ४३ ॥

आर्पयद् बहुभिः कर्णो न चैनं समपीडयत् । उन्हें अस्त्र- शस्त्रोंसे हीन देखकर कर्णने झुकी हुई गाँठवाले बहुसंख्यक बाणोंद्वारा और भी घायल कर दिया; परंतु उन्हें घातक पीड़ा नहीं दी ॥ ४३३३ ॥

स हन्यमानः समरे कृतास्त्रेण बलीयसा ॥ ४४ ॥

प्राद्रवत् सहसा राजन् नकुलो व्याकुलेन्द्रियः । अत्यन्त बलवान् तथा अस्त्रविद्याके विद्वान् कर्णके द्वारा समरांगणमें आहत हो सहसा नकुल भाग चले । उस समय उनकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो रही थीं ॥ ४४ ॥

तमभिद्रुत्य राधेयः प्रहसन् वै पुनः पुनः ॥ ४५ ॥

सज्यमस्य धनुः कण्ठे व्यवासृजत भारत । भारत! राधापुत्र कर्णने बारंबार हँसते हुए उनका पीछा करके उनके गलेमें प्रत्यंचासहित अपना धनुष डाल दिया ॥ ४५ ॥

ततः स शुशुभे राजन् कण्ठासक्तमहाधनुः ॥ ४६ ॥

परिवेषमनुप्राप्तो यथा स्याद् व्योम्नि चन्द्रमाः ।

यथैव चासितो मेघः शक्रचापेन शोभितः ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 1740

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 1740 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

राजन्! कण्ठमें पड़े हुए उस महाधनुषसे युक्त नकुल ऐसी शोभा पाने लगे, मानो आकाशमें चन्द्रमापर घेरा पड़ गया हो अथवा कोई श्याम मेघ इन्द्रधनुषसे सुशोभित हो रहा हो ॥ ४६-४७ ॥

तमब्रवीत्ततः कर्णो व्यर्थं व्याहृतवानसि ।

वदेदानीं पुनर्हृष्टो वध्यमानः पुनः पुनः ॥ ४८ ॥

मा योत्सीः कुरुभिः सार्धं बलवद्भिश्च पाण्डव ।

सदृशैस्तात युध्यस्व व्रीडां मा कुरु पाण्डव ॥ ४ ९ ॥

गृहं वा गच्छ माद्रेय यत्र वा कृष्णफाल्गुनौ ।

एवमुक्त्वा महाराज व्यसर्जयत तं तदा ॥ ५० ॥

उस समय कर्णने नकुलसे कहा –' पाण्डुकुमार! तुमने व्यर्थ ही बढ़ -चढ़कर बातें बनायी थीं । अब इस समय बारंबार मेरे बाणोंकी मार खाकर पुनः उसी हर्षके साथ तुम वैसी ही बातें करो तो सही । बलवान् कौरव- योद्धाओंके साथ आजसे युद्ध न करना । तात! जो तुम्हारे समान हों, उन्हींके साथ युद्ध किया करो । माद्रीकुमार! लज्जित न होओ । इच्छा हो तो घर चले जाओ अथवा जहाँ श्रीकृष्ण और अर्जुन हों, वहीं भाग जाओ । ' महाराज! ऐसा कहकर उस समय कर्णने नकुलको छोड़ दिया ॥ ४८–५० ॥

वधप्राप्तं तु तं शूरो नाहनद् धर्मवित्तदा ।

स्मृत्वा कुन्त्या वचो राजंस्तत एनं व्यसर्जयत् ॥ ५१ ॥

राजन्! यद्यपि नकुल वधके योग्य अवस्थामें आ पहुँचे थे, तो भी कुन्तीको दिये हुए वचनको याद करके धर्मज्ञ वीर कर्णने उस समय उन्हें मारा नहीं, जीवित छोड़ दिया ॥ ५१ ॥

विसृष्टः पाण्डवो राजन् सूतपुत्रेण धन्विना ।

व्रीडन्निव जगामाथ युधिष्ठिररथं प्रति ॥ ५२ ॥

नरेश्वर! धनुर्धर सूतपुत्रके छोड़ देनेपर पाण्डुकुमार नकुल लजाते हुए - से वहाँसे युधिष्ठिरके रथके पास चले गये ॥ ५२ ॥

आरुरोह रथं चापि सूतपुत्रप्रतापितः ।

निःश्वसन् दुःखसंतप्तः कुम्भस्थ इव पन्नगः ॥ ५३ ॥

सूतपुत्रके द्वारा सताये हुए नकुल दुःखसे संतप्त हो घड़ेमें बंद किये हुए सर्पके समान दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए युधिष्ठिरके रथपर चढ़ गये ॥ ५३ ॥

तं विजित्याथ कर्णोऽपि पञ्चालांस्त्वरितो ययौ ।

रथेनातिपताकेन चन्द्रवर्णहयेन च ॥ ५४ ॥

इस प्रकार नकुलको पराजित करके कर्ण भी चन्द्रमाके समान श्वेत रंगवाले घोड़ों और ऊँची पताकाओंसे युक्त रथके द्वारा तुरंत ही पांचालोंकी ओर चला गया ॥ ५४ ॥

तत्राक्रन्दो महानासीत् पाण्डवानां विशाम्पते ।