04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1841–1850
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1841–1850
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‘ महाबाहो! तुम रणक्षेत्रमें वैकर्तन कर्णका अपमान न करो । वह सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंके अर्थका पारंगत विद्वान् है ॥ १३३ ॥
यस्य ज्यातलनिर्घोषं श्रुत्वा भयकरं महत् ॥ १४ ॥
पाण्डवेयानि सैन्यानि विद्रवन्ति दिशो दश । ' यह वही वीर है जिसकी प्रत्यंचाकी अत्यन्त भयानक टंकार सुनकर पाण्डव- सेना दसों दिशाओंमें भागने लगती है ॥ १४३ ॥
प्रत्यक्षं ते महाबाहो यथा रात्रौ घटोत्कचः ॥ १५ ॥
मायाशतानि कुर्वाणो हतो मायापुरस्कृतः । ' महाबाहो! यह तो तुमने अपनी आँखों देखा था कि किस प्रकार उस दिन रातमें सैकड़ों मायाओंका प्रयोग करनेवाला मायावी घटोत्कच कर्णके हाथसे मारा गया ॥ १५३ || न चातिष्ठत बीभत्सुः प्रत्यनीके कथंचन ॥ १६ ॥
एतांश्च दिवसान् सर्वान् भयेन महता वृतः । ‘ इन सारे दिनोंमें महान् भयसे घिरे हुए अर्जुन किसी तरह भी कर्णके सामने खड़े न हो सके थे ॥ १६३ ॥
भीमसेनश्च बलवान् धनुष्कोट्याभिचोदितः ॥ १७ ॥
उक्तश्च संज्ञया राजन् मूढ औदरिको यथा । ‘ राजन्! बलवान् भीमसेनको भी इसने अपने धनुषकी कोटिसे दबाकर युद्धके लिये प्रेरित किया था और उन्हें मूर्ख, पेटू आदि नामोंसे पुकारा था ॥ १७३ ॥
माद्रीपुत्रौ तथा शूरौ येन जित्वा महारणे ॥ १८ ॥
कमप्यर्थं पुरस्कृत्य न हतौ युधि मारिष । ‘ मान्यवर! इसने महासमरमें शूरवीर नकुल सहदेवको भी परास्त करके किसी विशेष प्रयोजनको सामने रखकर उन दोनोंको युद्धमें मार नहीं डाला ॥ येन वृष्णिप्रवीरस्तु सात्यकिः सात्वतां वरः ॥ १ ९ ॥ निर्जित्य समरे शूरो विरथश्च बलात् कृतः । ‘ इसने वृष्णिवंशके प्रमुख वीर सात्वतशिरोमणि शूरवीर सात्यकिको समरांगणमें परास्त करके उन्हें बलपूर्वक रथहीन कर दिया था ॥ १ ९ ३ ॥ सूञ्जयाश्चेतरे सर्वे धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ॥ २० ॥
असकृन्निर्जिताः संख्ये स्मयमानेन संयुगे । ' इसके सिवा धृष्टद्युम्न आदि समस्त सृजयोको भी इसने युद्धस्थलमें हँसते - हँसते अनेक बार परास्त किया है ॥ २० ॥
तं कथं पाण्डवा युद्धे विजेष्यन्ति महारथम् ॥ २१ ॥
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यो हन्यात् समरे क्रुद्धो वज्रहस्तं पुरंदरम् । ‘ जो कुपित होनेपर वज्रधारी इन्द्रको भी समरभूमिमें मार डालनेकी शक्ति रखता है, उस महारथी वीर कर्णको पाण्डवलोग युद्धमें कैसे जीत लेंगे? ॥ २१३ ॥
त्वं च सर्वास्त्रविद् वीरः सर्वविद्यास्त्रपारगः ॥ २२ ॥
बाहुवीर्येण ते तुल्यः पृथिव्यां नास्ति कश्चन । ‘ आप भी सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, समस्त विद्याओं तथा अस्त्रोंके पारंगत विद्वान् एवं वीर हैं । इस भूतलपर बाहुबलके द्वारा आपकी समानता करनेवाला कोई नहीं है ॥ २२ ॥
त्वं शल्यभूतः शत्रूणामविषह्यः पराक्रमे ॥ २३ ॥
ततस्त्वमुच्यसे राजन् शल्य इत्यरिसूदन । ‘ शत्रुसूदन नरेश! आप पराक्रम प्रकट करते समय शत्रुओंके लिये असह्य हो उठते हैं, उनके लिये आप शल्यभूत ( कण्टकस्वरूप ) हैं; इसीलिये आपको शल्य कहा जाता है ॥ २३३ ॥
तव बाहुबलं प्राप्य न शेकुः सर्वसात्वताः ॥ २४ ॥
तव बाहुबलाद् राजन् किं नु कृष्णो बलाधिकः । ‘ राजन्! आपके बाहुबलको सामने पाकर सम्पूर्ण सात्वतवंशी क्षत्रिय कभी युद्धमें टिक सके हैं । क्या आपके बाहुबलसे श्रीकृष्णका बल अधिक है? ॥ २४ ॥
यथा हि कृष्णेन बलं धार्यं वै फाल्गुने हते ॥ २५ ॥
तथा कर्णात्ययीभावे त्वया धार्यं महद् बलम् । ' जैसे अर्जुनके मारे जानेपर श्रीकृष्ण पाण्डव- सेनाकी रक्षा करेंगे, उसी प्रकार यदि कर्ण मारा गया तो आपको मेरी विशाल वाहिनीका संरक्षण करना होगा ॥ किमर्थं समरे सैन्यं वासुदेवो न्यवारयत् ॥ २६ ॥
किमर्थं च भवान् सैन्यं न हनिष्यति मारिष । ‘ मान्यवर! वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण क्यों कौरव सेनाका निवारण करेंगे और क्यों आप पाण्डव- सेनाका वध नहीं करेंगे? ॥ २६ ॥
त्वत्कृते पदवीं गन्तुमिच्छेयं युधि मारिष ।
सोदराणां च वीराणां सर्वेषां च महीक्षिताम् ॥ २७ ॥
‘ माननीय नरेश! मैं तो आपके ही भरोसे युद्धमें मारे गये अपने वीर भाइयों तथा समस्त राजाओंके ( ऋणसे मुक्त होनेके लिये उन्हींके ) पथपर चलनेकी इच्छा करता हूँ' ॥ २७३ ॥
शल्य उवाच
यन्मां ब्रवीषि गान्धारे अग्रे सैन्यस्य मानद ।
विशिष्टं देवकीपुत्रात् प्रीतिमानस्म्यहं त्वयि ॥ २८ ॥
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शल्यने कहा — मानद! गान्धारीनन्दन! तुम सम्पूर्ण सेनाके आगे जो मुझे देवकीपुत्र श्रीकृष्णसे बढ़कर बता रहे हो, इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ २८ ॥
एष सारथ्यमातिष्ठे राधेयस्य यशस्विनः ।
युध्यतः पाण्डवाग्रयेण यथा त्वं वीर मन्यसे ॥ २ ९ ॥
वीर! मैं यशस्वी राधापुत्र कर्णका पाण्डवशिरोमणि अर्जुनके साथ युद्ध करते समय सारथ्य करूँगा जैसा कि तुम चाहते हो ॥ २ ९ ॥
समयश्च हि मे वीर कश्चिद् वैकर्तनं प्रति ।
उत्सृजेयं यथाश्रद्धमहं वाचोऽस्य संनिधौ ॥ ३० ॥
वीरवर! परंतु वैकर्तन कर्णको मेरी एक शर्तका पालन करना होगा । मैं इसके समीप जो जीमें आयेगा, वैसी बातें करूँगा ॥ ३० ॥
संजय उवाच
तथेति राजन् पुत्रस्ते सह कर्णेन मारिष ।
अब्रवीन्मद्रराजानं सर्वक्षत्रस्य संनिधौ ॥ ३१ ॥
संजय कहते हैं - माननीय नरेश! तब समस्त क्षत्रियोंके समीप कर्णसहित आपके पुत्रने मद्रराज शल्यसे कहा- ' बहुत अच्छा, आपकी शर्त स्वीकार है ' ॥ ३१ ॥
सारथ्यस्याभ्युपगमाच्छल्येनाश्वासितस्तदा ।
दुर्योधनस्तदा हृष्टः कर्णं तमभिषस्वजे ॥ ३२ ॥
सारथ्य स्वीकार करके जब शल्यने आश्वासन दिया, तब राजा दुर्योधनने बड़े हर्षके साथ कर्णको हृदयसे लगा लिया ॥ ३२ ॥
अब्रवीच्च पुनः कर्णं स्तूयमानः सुतस्तव ।
जहि पार्थान् रणे सर्वान् महेन्द्रो दानवानिव ॥ ३३ ॥
तत्पश्चात् वन्दीजनोंद्वारा अपनी स्तुति सुनते हुए आपके पुत्रने कर्णसे फिर कहा —'वीर! तुम रणक्षेत्रमें कुन्तीके समस्त पुत्रोंको उसी प्रकार मार डालो, जैसे देवराज इन्द्र दानवोंका संहार करते हैं ' ॥ ३३ ॥
स शल्येनाभ्युपगते हयानां संनियच्छने ।
कर्णो हृष्टमना भूयो दुर्योधनमभाषत ॥ ३४ ॥
शल्यके द्वारा अश्वोंका नियन्त्रण स्वीकार कर लिये जानेपर कर्ण प्रसन्नचित्त हो पुनः दुर्योधनसे बोला— ॥ ३४ ॥
नातिहृष्टमना ह्येष मद्रराजोऽभिभाषते ।
राजन् मधुरया वाचा पुनरेनं ब्रवीहि वै ॥ ३५ ॥
‘ राजन्! ये मद्रराज शल्य अधिक प्रसन्न होकर बात नहीं कर रहे हैं; अतः तुम मधुर वाणीद्वारा इन्हें फिरसे समझाते हुए कुछ कहो ' ॥ ३५ ॥
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ततो राजा महाप्राज्ञः सर्वास्त्रकुशलो बली ।
दुर्योधनोऽब्रवीच्छल्यं मद्रराजं महीपतिम् ॥ ३६ ॥
पूरयन्निव घोषेण मेघगम्भीरया गिरा । तब सम्पूर्ण अस्त्रोंके संचालनमें कुशल, परम बुद्धिमान् एवं बलवान् राजा दुर्योधनने मद्रदेशके राजा पृथ्वीपति शल्यको सम्बोधित करके अपने स्वरसे वहाँके प्रदेशको गुँजाते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीद्वारा इस प्रकार कहा— ॥ ३६३ ॥
शल्य कर्णोऽर्जुनेनाद्य योद्धव्यमिति मन्यते ॥ ३७ ॥
तस्य त्वं पुरुषव्याघ्र नियच्छ तुरगान् युधि । ‘ शल्य! आज कर्ण अर्जुनके साथ युद्ध करनेकी इच्छा रखता है। पुरुषसिंह! आप रणस्थलमें इसके घोड़ोंको काबूमें रखें ॥ ३७ ॥
कर्णो हत्वेतरान् सर्वान् फाल्गुनं हन्तुमिच्छति ॥ ३८ ॥
तस्याभीषुग्रहे राजन् प्रयाचे त्वां पुनः पुनः । ' कर्ण अन्य सब शत्रुवीरोंका संहार करके अर्जुनका वध करना चाहता है। राजन्! आपसे उसके घोड़ोंकी बागडोर सँभालनेके लिये मैं बारंबार याचना करता हूँ ॥ ३८३ ॥
पार्थस्य सचिवः कृष्णो यथा भीषुग्रहो वरः ।
तथा त्वमपि राधेयं सर्वतः परिपालय ॥ ३ ९ ॥
‘ जैसे श्रीकृष्ण अर्जुनके श्रेष्ठ सचिव तथा सारथि हैं, उसी प्रकार आप भी राधापुत्र कर्णकी सर्वथा रक्षा कीजिये ' ॥ ३ ९ ॥ संजय उवाच
ततः शल्यः परिष्वज्य सुतं ते वाक्यमब्रवीत् ।
दुर्योधनममित्रघ्नं प्रीतो मद्राधिपस्तदा ॥ ४० ॥
संजय कहते हैं - महाराज! तब मद्रराज शल्यने प्रसन्न हो आपके पुत्र शत्रुसूदन दुर्योधनको हृदयसे लगाकर कहा ॥ ४० ॥
शल्य उवाच
एवं चेन्मन्यसे राजन् गान्धारे प्रियदर्शन ।
तस्मात् ते यत् प्रियं किंचित् तत् सर्वं करवाण्यहम् ॥ ४१ ॥
शल्य बोले — गान्धारीनन्दन! प्रियदर्शन नरेश! यदि तुम ऐसा समझते हो तो तुम्हारा जो कुछ प्रिय कार्य है, वह सब मैं करूँगा ॥ ४१ ॥
यत्रास्मि भरतश्रेष्ठ योग्यः कर्मणि कर्हिचित् ।
तत्र सर्वात्मना युक्तो वक्ष्ये कार्यधुरं तव ॥ ४२ ॥
भरतश्रेष्ठ! मैं जहाँ कहीं कभी भी जिस कर्मके योग्य होऊँ वहाँ उस कर्ममें तुम्हारे द्वारा नियुक्त कर दिये जानेपर मैं सम्पूर्ण हृदयसे उस कार्यभारको वहन करूँगा ॥ ४२ ॥
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यत्तु कर्णमहं ब्रूयां हितकामः प्रियाप्रिये ।
मम तत् क्षमतां सर्वं भवान् कर्णश्च सर्वशः ॥ ४३ ॥
परंतु मैं हितकी इच्छा रखते हुए कर्णसे जो भी प्रिय अथवा अप्रिय वचन कहूँ, वह सब तुम और कर्ण सर्वथा क्षमा करो ॥ ४३ ॥
कर्णउवाच
ईशानस्य यथा ब्रह्मा यथा पार्थस्य केशवः ।
तथा नित्यं हिते युक्तो मद्रराज भवस्व नः ॥ ४४ ॥
कर्णने कहा –मद्रराज! जैसे ब्रह्मा महादेवजीके और श्रीकृष्ण अर्जुनके हितमें सदा तत्पर रहते हैं, उसी प्रकार आप भी निरन्तर हमारे हितसाधनमें संलग्न रहें ॥ शल्य उवाच
आत्मनिन्दाऽऽत्मपूजा च परनिन्दा परस्तवः ।
अनाचरितमार्याणां वृत्तमेतच्चतुर्विधम् ॥ ४५ ॥
शल्य बोले — अपनी निन्दा और प्रशंसा, परायी निन्दा और परायी स्तुति– ये चार प्रकारके बर्ताव श्रेष्ठ पुरुषोंने कभी नहीं किये हैं ॥ ४५ ॥
यत् तु विद्वन् प्रवक्ष्यामि प्रत्ययार्थमहं तव ।
आत्मनः स्तवसंयुक्तं तन्निबोध यथातथम् ॥ ४६ ॥
परंतु विद्वन्! मैं तुम्हें विश्वास दिलानेके लिये जो अपनी प्रशंसासे भरी बात कहता हूँ, उसे तु यथार्थरूपसे सुनो ॥ ४६ ॥
अहं शक्रस्य सारथ्ये योग्यो मातलिवत् प्रभो ।
अप्रमादात् प्रयोगाच्च ज्ञानविद्याचिकित्सनैः ॥ ४७ ॥
प्रभो! मैं सावधानी, अश्वसंचालन, ज्ञान, विद्या तथा चिकित्सा आदि सद्गुणोंकी दृष्टिसे इन्द्रके सारथि - कर्ममें नियुक्त मातलिके समान सुयोग्य हूँ ॥ ४७ ॥
ततः पार्थेन संग्रामे युध्यमानस्य तेऽनघ ।
वाहयिष्यामि तुरगान् विज्वरो भव सूतज ॥ ४८ ॥
निष्पाप सूतपुत्र कर्ण! जब तुम युद्धस्थलमें अर्जुनके साथ युद्ध करोगे, तब मैं तुम्हारे
घोड़े अवश्य हाँकूँगा । तुम निश्चिन्त रहो ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि शल्यसारथ्यस्वीकारे पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें शल्यके सारथिकर्मको स्वीकार करनेसे सम्बन्ध रखनेवाला पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
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षट्त्रिंशोऽध्यायः कर्णका युद्धके लिये प्रस्थान और शल्यसे उसकी बातचीत दुर्योधन उवाच
अयं ते कर्ण सारथ्यं मद्रराजः करिष्यति ।
कृष्णादभ्यधिको यन्ता देवेशस्येव मातलिः ॥ १ ॥
दुर्योधन बोला— कर्ण! ये मद्रराज शल्य तुम्हारा सारथ्यकर्म करेंगे । देवराज इन्द्रके सारथि मातलिके समान ये श्रीकृष्णसे भी श्रेष्ठ रथसंचालक हैं ॥ १ ॥
यथा हरिहयैर्युक्तं संगृह्णाति स मातलिः ।
शल्यस्तथा तवाद्यायं संयन्ता रथवाजिनाम् ॥ २ ॥
जैसे मातलि इन्द्रके घोड़ोंसे जुते हुए रथकी बागडोर सँभालते हैं, उसी प्रकार ये तुम्हारे रथके घोड़ोंको काबूमें रखेंगे ॥ २
योधे त्वयि रथस्थे च मद्रराजे च सारथौ ।
रथश्रेष्ठो ध्रुवं संख्ये पार्थानभिभविष्यति ॥ ३ ॥
जब तुम योद्धा बनकर रथपर बैठोगे और मद्रराज शल्य सारथिके रूपमें प्रतिष्ठित होंगे, उस समय वह श्रेष्ठ रथ निश्चय ही युद्धस्थलमें कुन्तीपुत्रोंको पराजित कर देगा ॥ ३ ॥
संजय उवाच
ततो दुर्योधनो भूयो मद्रराजं तरस्विनम् ।
उवाच राजन् संग्रामेऽध्युषिते पर्युपस्थिते ॥। ४ ॥
संजय कहते हैं — राजन्! तदनन्तर दुर्योधनने प्रातःकाल युद्ध उपस्थित होनेपर पुनः वेगशाली मद्रराज शल्यसे कहा- ॥ ४ ॥
कर्णस्य यच्छ संग्रामे मद्रराज हयोत्तमान् ।
त्वयाभिगुप्तो राधेयो विजेष्यति धनंजयम् ॥ ५ ॥
‘ मद्रराज! आप संग्राममें कर्णके इन उत्तम घोड़ोंको वशमें कीजिये । आपसे सुरक्षित होकर राधापुत्र कर्ण निश्चय ही अर्जुनको जीत लेगा ' ॥ ५ ॥
इत्युक्तो रथमास्थाय तथेति प्राह भारत ।
शल्येऽभ्युपगते कर्णः सारथिं सुमनाब्रवीत् ॥ ६ ॥
त्वं सूत स्यन्दनं मह्यं कल्पयेत्यसकृत् त्वरन् ।
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भारत! दुर्योधनके ऐसा कहनेपर शल्यने रथका स्पर्श करके कहा - ' तथास्तु । ' जब शल्यने सारथि होना पूर्णरूपसे स्वीकार कर लिया, तब कर्णने प्रसन्नचित्त होकर बारंबार अपने पूर्व सारथिसे शीघ्रतापूर्वक कहा - ' सूत! तुम मेरा रथ सजाकर तैयार करो ' ॥ ६३ || ततो जैत्रं रथवरं गन्धर्वनगरोपमम् ॥ ७ ॥
विधिवत् कल्पितं भद्रं जयेत्युक्त्वा न्यवेदयत् । तब सारथिने गन्धर्वनगरके समान विशाल, विजयशील श्रेष्ठ और मंगलकारक रथको विधिपूर्वक सुसज्जित करके सूचित किया — ' स्वामिन्! आपकी जय हो! रथ तैयार है ' ॥ ७ || तं रथं रथिनां श्रेष्ठः कर्णोऽभ्यर्च्य यथाविधि ॥ ८ ॥
सम्पादितं ब्रह्मविदा पूर्वमेव पुरोधसा ।
कृत्वा प्रदक्षिणं यत्नादुपस्थाय च भास्करम् ॥ ९ ॥
समीपस्थं मद्रराजमारोह त्वमथाब्रवीत् । रथियोंमें श्रेष्ठ कर्णने वेदज्ञ पुरोहितद्वारा पहले से ही जिसका मांगलिक कृत्य सम्पन्न कर दिया गया था, उस रथकी विधिपूर्वक पूजा और प्रदक्षिणा की । तत्पश्चात् सूर्यदेवका प्रयत्नपूर्वक उपस्थान करके पास ही खड़े हुए मद्रराजसे कहा — ' पहले आप रथपर बैठिये ' ॥ ८ - ९ ३ ॥ ततः कर्णस्य दुर्धर्षं स्यन्दनप्रवरं महत् ॥ १० ॥
आरुरोह महातेजाः शल्यः सिंह इवाचलम् । तदनन्तर जैसे सिंह पर्वतपर चढ़ता है, उसी प्रकार महातेजस्वी शल्य कर्णके दुर्जय, विशाल एवं श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हुए ॥ १०३ ॥
ततः शल्याश्रितं दृष्ट्वा कर्णः स्वं रथमुत्तमम् ॥ ११ ॥
अध्यतिष्ठद् यथाम्भोदं विद्युत्वन्तं दिवाकरः । कर्ण अपने उत्तम रथको सारथि शल्यसे सनाथ हुआ देख स्वयं भी उसपर आरूढ़ हुआ, मानो सूर्यदेव बिजलियोंसे युक्त मेघपर प्रतिष्ठित हुए हों ॥ ११३ ॥
तावेकरथमारूढावादित्याग्निसमत्विषौ ॥ १२ ॥
अभ्राजेतां यथा मेघं सूर्याग्नी सहितौ दिवि । जैसे आकाशमें किसी महान् मेघखण्डपर एक साथ बैठे हुए सूर्य और अग्नि प्रकाशित हो रहे हों, उसी प्रकार सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी कर्ण और शल्य उस एक ही रथपर आरूढ़ हो बड़ी शोभा पाने लगे ॥ १२३ ॥
संस्तूयमानौ तौ वीरौ तदास्तां द्युतिमत्तमौ ॥ १३ ॥
ऋत्विक्सदस्यैरिन्द्राग्नी स्तूयमानाविवाध्वरे ।
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उस समय उन दोनों परम तेजस्वी वीरोंकी उसी प्रकार स्तुति होने लगी, जैसे यज्ञमण्डपमें ऋत्विजों और सदस्योंद्वारा इन्द्र और अग्नि देवताका स्तवन किया जाता है ॥ १३३ ॥
स शल्यसंगृहीताश्वे रथे कर्णः स्थितो बभौ ॥ १४ ॥
धनुर्विस्फारयन् घोरं परिवेषीव भास्करः । शल्यने घोड़ोंकी बागडोर हाथमें ले ली । उस रथपर बैठा हुआ कर्ण अपने भयंकर धनुषको फैलाकर उसी प्रकार सुशोभित हो रहा था, मानो सूर्यमण्डलपर घेरा पड़ा हो ॥ १४ ॥
आस्थितः स रथश्रेष्ठं कर्णः शरगभस्तिमान् ॥ १५ ॥
प्रबभौ पुरुषव्याघ्रो मन्दरस्थ इवांशुमान् । उस श्रेष्ठ रथपर चढ़ा हुआ पुरुषसिंह कर्ण अपनी बाणमयी किरणोंसे युक्त हो मन्दराचलके शिखरपर देदीप्यमान होनेवाले सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ १५३ ॥
तं रथस्थं महाबाहुं युद्धायामिततेजसम् ॥ १६ ॥
दुर्योधनस्तु राधेयमिदं वचनमब्रवीत् ।
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अकृतं द्रोणभीष्माभ्यां दुष्करं कर्म संयुगे ॥ १७ ॥
कुरुष्वाधिरथे वीर मिषतां सर्वधन्विनाम् । युद्धके लिये रथपर बैठे हुए अमिततेजस्वी महाबाहु राधापुत्र कर्णसे दुर्योधनने इस प्रकार कहा— ' वीर! अधिरथकुमार! युद्धस्थलमें द्रोणाचार्य और भीष्म भी जिसे न कर सके, वही दुष्कर कर्म तुम सम्पूर्ण धनुर्धरोंके देखते - देखते कर डालो ॥ १६-१७३ ॥ मनोगतं मम ह्यासीद् भीष्मद्रोणौ महारथौ ॥ १८ ॥
अर्जुनं भीमसेनं च निहन्ताराविति ध्रुवम् । ‘ मेरे मनमें यह विश्वास था कि ' महारथी भीष्म और द्रोणाचार्य अर्जुन और भीमसेनको अवश्य ही मार डालेंगे ॥ १८३ ॥
ताभ्यां यदकृतं वीर वीरकर्म महामृधे ॥ १ ९ ॥ तत् कर्म कुरु राधेय वज्रपाणिरिवापरः । ‘ वीर राधापुत्र! वे दोनों जिसे न कर सके, वही वीरोचित कर्म आज महासमरमें दूसरे वज्रधारी इन्द्रके समान तुम निश्चय ही पूर्ण करो ॥ १ ९ ३ ॥ गृहाण धर्मराजं वा जहि वा त्वं धनंजयम् ॥ २० ॥
भीमसेनं च राधेय माद्रीपुत्रौ यमावपि । ‘ राधानन्दन! या तो तुम धर्मराज युधिष्ठिरको कैद कर लो या अर्जुन, भीमसेन तथा माद्रीकुमार नकुल- सहदेवको मार डालो ॥ २० ॥
जयश्च तेऽस्तु भद्रं ते प्रयाहि पुरुषर्षभ ॥ २१ ॥
पाण्डुपुत्रस्य सैन्यानि कुरु सर्वाणि भस्मसात् । 'पुरुषप्रवर! तुम्हारी जय हो । कल्याण हो। अब तुम जाओ और पाण्डुपुत्रकी सारी सेनाओंको भस्म करो ' ॥ ततस्तूर्यसहस्राणि भेरीणामयुतानि च ॥ २२ ॥
वाद्यमानान्यराजन्त मेघशब्दो यथा दिवि । तदनन्तर सहस्रों तूर्य और कई सहस्र रणभेरियाँ बज उठीं, जो आकाशमें मेघोंकी गर्जनाके समान प्रतीत हो रही थीं ॥ २२ ॥
प्रतिगृह्य तु तद् वाक्यं रथस्थो रथसत्तमः ॥ २३ ॥
अभ्यभाषत राधेयः शल्यं युद्धविशारदम् ।
चोदयाश्वान् महाबाहो यावद्धन्मि धनंजयम् ॥ २४ ॥
भीमसेनं यमौ चोभौ राजानं च युधिष्ठिरम् । रथपर बैठे हुए रथियोंमें श्रेष्ठ राधापुत्र कर्णने दुर्योधनके उस आदेशको शिरोधार्य करके युद्धकुशल राजा शल्यसे कहा - 'महाबाहो! मेरे घोड़ोंको बढ़ाइये, जिससे कि मैं अर्जुन, भीमसेन, दोनों भाई नकुल- सहदेव तथा राजा युधिष्ठिरका वध कर सकूँ ॥ २३-२४३ ॥
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अद्य पश्यतु मे शल्य बाहुवीर्यं धनंजयः ॥ २५ ॥
अत्यतः कङ्कपत्राणां सहस्राणि शतानि च । ‘ शल्य! आज सैकड़ों और सहस्रों कंकपत्रयुक्त बाणोंकी वर्षा करते हुए मुझ कर्णके बाहुबलको अर्जुन देखें ॥ २५ ॥
अद्य क्षेप्स्याम्यहं शल्य शरान् परमतेजनान् ॥ २६ ॥
पाण्डवानां विनाशाय दुर्योधनजयाय च । ‘ शल्य! आज मैं पाण्डवोंके विनाश और दुर्योधनकी विजयके लिये अत्यन्त तीखे बाण चलाऊँगा ' ॥ २६३ ॥
शल्य उवाच सूतपुत्र कथं नु त्वं पाण्डवानवमन्यसे ॥ २७ ॥
सर्वास्त्रज्ञान् महेष्वासान् सर्वानेव महाबलान् ।
अनिवर्तिनो महाभागानजय्यान् सत्यविक्रमान् ॥ २८ ॥
शल्यने कहा— सूतपुत्र! तुम पाण्डवोंकी अवहेलना कैसे करते हो । वे सब - के - सब तो सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, महाधनुर्धर, महाबलवान्, युद्धसे पीछे न हटनेवाले, अजेय तथा सत्यपराक्रमी हैं ॥ २७-२८ ॥
अपि संतनयेयुर्ये भयं साक्षाच्छतक्रतोः ।
यदा श्रोष्यसि निर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः ॥ २ ९ ॥
राधेय गाण्डिवस्याजौ तदा नैवं वदिष्यसि । वे साक्षात् इन्द्रके मनमें भी भय उत्पन्न कर सकते हैं । राधापुत्र! जब तुम युद्धस्थलमें वज्रकी गड़गड़ाहटके समान गाण्डीव धनुषका गम्भीर घोष सुनोगे, तब ऐसी बातें नहीं कहोगे ॥ २ ९ ३ ॥ यदा द्रक्ष्यसि भीमेन कुञ्जरानीकमाहवे ॥ ३० ॥
विशीर्णदन्तं निहतं तदा नैवं वदिष्यसि । जब तुम देखोगे कि भीमसेनने संग्रामभूमिमें गजराजोंकी सेनाके दाँत तोड़ - तोड़कर उसका संहार कर डाला है, तब तुम इस प्रकार नहीं बोल सकोगे ॥ ३०३ ॥
यदा द्रक्ष्यसि संग्रामे धर्मपुत्रं यमौ तथा ॥ ३१ ॥
शितैः पृषत्कैः कुर्वाणानभ्रच्छायामिवाम्बरे ।
अस्यतः क्षिण्वतश्चारींल्लघुहस्तान् दुरासदान् ।
पार्थिवानपि चान्यांस्त्वं तदा नैवं वदिष्यसि ॥ ३२ ॥
जब तुम्हें यह दिखायी देगा कि संग्राममें धर्मपुत्र युधिष्ठिर, नकुल सहदेव तथा अन्यान्य दुर्जय भूपाल बड़ी शीघ्रताके साथ हाथ चला रहे हैं, अपने तीखे बाणोंद्वारा आकाशमें