श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 1831–1840

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1831–1840

पृष्ठ 1831

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हयानां च स्तना राजंस्तदाप्रभृति नाभवन् ॥ १०६ ॥

पीडितानां बलवता रुद्रेणाद्भुतकर्मणा । राजन्! आपका कल्याण हो । तभीसे बैलोंके दो खुर हो गये और तभीसे अद्भुत कर्म करनेवाले बलवान् रुद्रके द्वारा पीड़ित हुए घोड़ोंके स्तन नहीं उगे ॥ १०६३ ॥

अथाधिज्यं धनुः कृत्वा शर्वः संधाय तं शरम् ॥ १०७ ॥

युक्त्वा पाशुपतास्त्रेण त्रिपुरं समचिन्तयत । तदनन्तर भगवान् रुद्रने धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसके ऊपर पूर्वोक्त बाणको रखा और उसे पाशुपतास्त्रसे संयुक्त करके तीनों पुरोंके एकत्र होनेका चिन्तन किया ॥ १०७३ ॥

तस्मिन् स्थिते महाराज रुद्रे विधृतकार्मुके ॥ १०८ ॥

पुराणि तानि कालेन जग्मुरेवैकतां तदा । महाराज! इस प्रकार जब रुद्रदेव धनुष चढ़ाकर खड़े हो गये, उसी समय कालकी प्रेरणासे वे तीनों पुर मिलकर एक हो गये ॥ १०८६३ ॥

एकीभावं गते चैव त्रिपुरत्वमुपागते ॥ १० ९ ॥ बभूव तुमुलो हर्षो देवतानां महात्मनाम् । जब तीनों एक होकर त्रिपुर- भावको प्राप्त हुए, तब महामनस्वी देवताओंको बड़ा हर्ष हुआ ॥ १० ९ ॥ ततो देवगणाः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः ॥ ११० ॥

जयेति वाचो मुमुचुः संस्तुवन्तो महेश्वरम् । उस समय समस्त देवता, महर्षि और सिद्धगण महेश्वरकी स्तुति करते हुए उनकी जय-जयकार करने लगे ॥ ११० ॥

ततोऽग्रतः प्रादुरभूत् त्रिपुरं निघ्नतोऽसुरान् ॥ १११ ॥

अनिर्देश्योग्रवपुषो देवस्यासह्यतेजसः । तब असुरोंका संहार करते हुए अवर्णनीय भयंकर रूपवाले असह्य तेजस्वी महादेवजीके सामने वह तीनों पुरोंका समुदाय सहसा प्रकट हो गया ॥ १११३ ॥

स तद् विकृष्य भगवान् दिव्यं लोकेश्वरो धनुः ॥ ११२ ॥

त्रैलोक्यसारं तमिषं मुमोच त्रिपुरं प्रति । फिर तो सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् रुद्रने अपने उस दिव्य धनुषको खींचकर उसपर रखे हुए त्रिलोकीके सारभूत उस बाणको त्रिपुरपर छोड़ दिया ॥ ११२३ ॥

उत्सृष्टे वै महाभाग तस्मिन्निषुवरे तदा ॥ ११३ ॥

महानार्तस्वरो ह्यासीत् पुराणां पततां भुवि ।

तान् सोऽसुरगणान् दग्ध्वा प्राक्षिपत् पश्चिमार्णवे ॥ ११४ ॥

पृष्ठ 1832

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महाभाग! उस समय उस श्रेष्ठ बाणके छूटते ही भूतलपर गिरते हुए उन तीनों पुरोंका महान् आर्तनाद प्रकट हुआ । भगवान्‌ने उन असुरोंको भस्म करके पश्चिम समुद्रमें डाल दिया ॥ ११३-११४ ॥

एवं तु त्रिपुरं दग्धं दानवाश्चाप्यशेषतः ।

महेश्वरेण क्रुद्धेन त्रैलोक्यस्य हितैषिणा ॥ ११५ ॥

इस प्रकार तीनों लोकोंका हित चाहनेवाले महेश्वरने कुपित होकर उन तीनों पुरों तथा उनमें निवास करनेवाले दानवोंको दग्ध कर दिया ॥ ११५ ॥

स चात्मक्रोधजो वह्निर्हाहेत्युक्त्वा निवारितः ।

मा कार्षीर्भस्मसाल्लोकानिति त्र्यक्षोऽब्रवीच्च तम् ॥ ११६ ॥

उनके अपने क्रोधसे जो अग्नि प्रकट हुई थी, उसे भगवान् त्रिलोचनने ' हा- हा' कहकर रोक दिया और उससे कहा- ' तू सम्पूर्ण जगत्को भस्म न कर' ॥ ११६ ॥

ततः प्रकृतिमापन्ना देवा लोकास्त्वथर्षयः ।

तुष्टुवुर्वाग्भिरग्रयाभिः स्थाणुमप्रतिमौजसम् ॥ ११७ ॥

तब समस्त देवता, महर्षि तथा तीनों लोकोंके प्राणी स्वस्थ हो गये । सबने श्रेष्ठ वचनोंद्वारा अप्रतिम शक्तिशाली महादेवजीका स्तवन किया ॥ ११७ तेऽनुज्ञाता भगवता जग्मुः सर्वे यथागतम् कृतकामाः प्रयत्नेन प्रजापतिमुखाः सुराः ॥ ११८ ॥

फिर भगवान्की आज्ञा लेकर अपने प्रयत्नसे पूर्णकाम हुए प्रजापति आदि सम्पूर्ण देवता जैसे आये थे, वैसे चले गये ॥ ११८ ॥

एवं स भगवान् देवो लोकस्रष्टा महेश्वरः ।

देवासुरगणाध्यक्षो लोकानां विदधे शिवम् ॥ ११ ९ ॥

इस प्रकार देवताओं तथा असुरोंके भी अध्यक्ष जगत्स्रष्टा भगवान् महेश्वर देवने तीनों लोकोंका कल्याण किया था ॥ ११ ९ ॥

यथैव भगवान् ब्रह्मा लोकधाता पितामहः ।

सारथ्यमकरोत्तत्र रुद्रस्य परमोऽव्ययः ॥ १२० ॥

तथा भवानपि क्षिप्रं रुद्रस्येव पितामहः ।

संयच्छतु हयानस्य राधेयस्य महात्मनः ॥ १२१ ॥

वहाँ विश्वविधाता सर्वोत्कृष्ट अविनाशी पितामह भगवान् ब्रह्माने जिस प्रकार रुद्रका सारथि - कर्म किया था तथा जिस प्रकार उन पितामहने रुद्रदेवके घोड़ोंकी बागडोर सँभाली थी, उसी प्रकार आप भी शीघ्र ही इस महामनस्वी राधापुत्र कर्णके घोड़ोंको काबूमें कीजिये ॥ १२०-१२१ ॥

त्वं हि कृष्णाच्च कर्णाच्च फाल्गुनाच्च विशेषतः ।

विशिष्टो राजशार्दूल नास्ति तत्र विचारणा ॥ १२२ ॥

पृष्ठ 1833

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नृपश्रेष्ठ! आप श्रीकृष्णसे, कर्णसे और अर्जुनसे भी श्रेष्ठ हैं, इसमें कोई अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ १२२ ॥

युद्धे ह्ययं रुद्रकल्पस्त्वं च ब्रह्मसमो नये ।

तस्माच्छक्तो भवाञ्जेतुं मच्छत्रूंस्तानिवासुरान् ॥ १२३ ॥

यह कर्ण युद्धक्षेत्रमें रुद्रके समान है और आप भी नीतिमें ब्रह्माजीके तुल्य हैं; अतः आप उन असुरोंकी भाँति मेरे शत्रुओंको जीतनेमें समर्थ हैं ॥ १२३ ॥

यथा शल्याद्य कर्णोऽयं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् ।

प्रमथ्य हन्यात् कौन्तेयं तथा शीघ्रं विधीयताम् ॥ १२४ ॥

शल्य! आप शीघ्र ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे यह कर्ण उस श्वेतवाहन अर्जुनको, जिसके सारथि श्रीकृष्ण हैं, मथकर मार डाले ॥ १२४ ॥

त्वयि मद्रेश राज्याशा जीविताशा तथैव च ।

विजयश्च तथैवाद्य कर्णसाचिव्यकारितः ॥ १२५ ॥

मद्रराज! आपपर ही मेरी राज्यप्राप्तिविषयक अभिलाषा और जीवनकी आशा निर्भर है । आपके द्वारा कर्णका सारथिकर्म सम्पादित होनेपर जो आज विजय मिलनेवाली है, उसकी सफलता भी आपपर ही निर्भर है ॥ १२५ ॥

त्वयि कर्णश्च राज्यं च वयं चैव प्रतिष्ठिताः ।

विजयश्चैव संग्रामे संयच्छाद्य हयोत्तमान् ॥ १२६ ॥

आपपर ही कर्ण, राज्य, हम और हमारी विजय प्रतिष्ठित हैं । इसलिये आज संग्राममें आप इन उत्तम घोड़ोंको अपने वशमें कीजिये ॥ १२६ ॥

इमं चाप्यपरं भूय इतिहासं निबोध मे ।

पितुर्मम सकाशे यद् ब्राह्मणः प्राह धर्मवित् ॥ १२७ ॥

राजन्! आप मुझसे फिर यह दूसरा इतिहास भी सुनिये, जिसे एक धर्मज्ञ ब्राह्मणने मेरे पिताके समीप कहा था ॥ १२७ ॥

श्रुत्वा चैतद् वचश्चित्रं हेतुकार्यार्थसंहितम् ।

कुरु शल्य विनिश्चित्य माभूदत्र विचारणा ॥ १२८ ॥

शल्य! कारण और कार्यसे युक्त इस विचित्र ऐतिहासिक वार्ताको सुनकर आप अच्छी तरह सोच - विचार लेनेके पश्चात् मेरा कार्य करें, इस विषयमें आपके मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये ॥ १२८ ॥

भार्गवाणां कुले जातो जमदग्निर्महायशाः ।

तस्य रामेति विख्यातः पुत्रस्तेजोगुणान्वितः ॥ १२ ९ ॥

भर्णववंशमें महायशस्वी महर्षि जमदग्नि प्रकट हुए थे, जिनके तेजस्वी और गुणवान् पुत्र परशुरामके नामसे विख्यात हैं ॥ १२ ९ ॥ स तीव्रं तप आस्थाय प्रसादयितवान् भवम् ।

पृष्ठ 1834

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अस्त्रहेतोः प्रसन्नात्मा नियतः संयतेन्द्रियः ॥ १३० ॥

उन्होंने अस्त्र -प्राप्तिके लिये मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए प्रसन्न हृदयसे भारी तपस्या करके भगवान् शंकरको प्रसन्न किया ॥ १३० ॥

तस्य तुष्टो महादेवो भक्त्या च प्रशमेन च ।

हृद्गतं चास्य विज्ञाय दर्शयामास शङ्करः ॥ १३१ ॥

( प्रत्यक्षेण महादेवः स्वां तनुं सर्वशङ्करः । ) उनकी भक्ति और मनः संयमसे संतुष्ट हो सबका कल्याण करनेवाले महादेवजीने उनके मनोगत भावको जानकर उन्हें अपने दिव्य शरीरका प्रत्यक्ष दर्शन कराया ॥ १३१ ॥

महेश्वर उवाच

राम तुष्टोऽस्मि भद्रं ते विदितं मे तवेप्सितम् ।

कुरुष्व पूतमात्मानं सर्वमेतदवाप्स्यसि ॥ १३२ ॥

महादेवजी बोले - राम! तुम्हारा कल्याण हो । मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम क्या चाहते हो, यह मुझे विदित है । अपने हृदयको शुद्ध करो । तुम्हें यह सब कुछ प्राप्त हो जायगा ॥ १३२ ॥

दास्यामि ते तदास्त्राणि यदा पूतो भविष्यसि ।

अपात्रमसमर्थं च दहन्त्यस्त्राणि भार्गव ॥ १३३ ॥

जब तुम पवित्र हो जाओगे, तब तुम्हें अपने अस्त्र दूँगा, भृगुनन्दन! अपात्र और असमर्थ पुरुषको तो ये अस्त्र जलाकर भस्म कर डालते हैं ॥ १३३ ॥

इत्युक्तो जामदग्न्यस्तु देवदेवेन शूलिना ।

प्रत्युवाच महात्मानं शिरसावनतः प्रभुम् ॥ १३४ ॥

त्रिशूलधारी देवाधिदेव महादेवजीके ऐसा कहनेपर जमदग्निनन्दन परशुरामने उन महात्मा भगवान् शिवको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा ॥ १३४ ॥

यदा जानाति देवेशः पात्रं मामस्त्रधारणे ।

तदा शुश्रूषवेऽस्त्राणि भवान् मे दातुमर्हति ॥ १३५ ॥

‘ यदि आप देवेश्वर प्रभु मुझे अस्त्रधारणका पात्र समझें तभी मुझ सेवकको दिव्यास्त्र प्रदान करें ' ॥ १३५ ॥

दुर्योधन उवाच

ततः स तपसा चैव दमेन नियमेन च ।

पूजोपहारबलिभिर्होममन्त्रपुरस्कृतैः ॥ १३६ ॥

आराधयितवान् शर्वं बहून् वर्षगणांस्तदा ।

पृष्ठ 1835

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दुर्योधन कहता हैं - तदनन्तर परशुरामने बहुत वर्षोंतक तपस्या, इन्द्रिय- संयम, मनोनिग्रह, पूजा, उपहार, भेंट, अर्पण, होम और मन्त्र जप आदि साधनोंद्वारा भगवान् शिवकी आराधना की ॥ १३६३ ॥

प्रसन्नश्च महादेवो भार्गवस्य महात्मनः ॥ १३७ ॥

अब्रवीत् तस्य बहुशो गुणान् देव्याः समीपतः ।

भक्तिमानेष सततं मयि रामो दृढव्रतः ॥ १३८ ॥

इससे महादेवजी महात्मा परशुरामपर प्रसन्न हो गये और उन्होंने पार्वती देवीके समीप उनके गुणोंका बारंबार वर्णन किया- 'ये दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले परशुराम मेरे प्रति सदा भक्तिभाव रखते हैं ' ॥ १३७-१३८ ॥

एवं तस्य गुणान् प्रीतो बहुशोऽकथयत् प्रभुः ।

देवतानां पितॄणां च समक्षमरिसूदन ॥ १३ ९ ॥

शत्रुसूदन! इसी प्रकार प्रसन्न हुए भगवान् शिवने देवताओं और पितरोंके समक्ष भी बारंबार प्रसन्नतापूर्वक उनके गुणोंका वर्णन किया ॥ १३ ९ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु दैत्या ह्यासन् महाबलाः ।

तैस्तदा दर्पमोहाद्यैरबाध्यन्त दिवौकसः । १४० ॥

इन्हीं दिनोंकी बात है, दैत्यलोग महान् बलसे सम्पन्न हो गये थे । वे दर्प और मोह आदिके वशीभूत हो उस समय देवताओंको सताने लगे ॥ १४० ॥

ततः सम्भूय विबुधास्तान् हन्तुं कृतनिश्चयाः ।

चक्रुः शत्रुवधे यत्नं न शेकुर्जेतुमेव तान् ॥ १४१ ॥

तब सम्पूर्ण देवताओंने एकत्र हो उन्हें मारनेका निश्चय करके शत्रुओंके वधके लिये यत्न किया; परंतु वे उन्हें जीत न सके ॥ १४१ ॥

अभिगम्य ततो देवा महेश्वरमुमापतिम् ।

प्रासादयंस्तदा भक्त्या जहि शत्रुगणानिति ॥ १४२ ॥

तत्पश्चात् देवताओंने उमावल्लभ महेश्वरके समीप जाकर भक्तिपूर्वक उन्हें प्रसन्न किया और कहा — ' प्रभो! हमारे शत्रुओंका संहार कीजिये' ॥ १४२ ॥

प्रतिज्ञाय ततो देवो देवतानां रिपुक्षयम् ।

रामं भार्गवमाहूय सोऽभ्यभाषत शङ्करः ॥ १४३ ॥

तब कल्याणकारी महादेवजीने देवताओंके समक्ष उनके शत्रुओंका संहार करनेकी प्रतिज्ञा करके भृगुनन्दन परशुरामको बुलाकर इस प्रकार कहा— ॥ १४३ ॥

रिपून् भार्गव देवानां जहि सर्वान् समागतान् ।

लोकानां हितकामार्थं मत्प्रीत्यर्थं तथैव च ॥ १४४ ॥

‘ भार्गव! तुम तीनों लोकोंके हितकी इच्छासे तथा मेरी प्रसन्नताके लिये देवताओंके समस्त समागत शत्रुओंका वध करो' ॥ १४४ ॥

पृष्ठ 1836

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एवमुक्तः प्रत्युवाच त्र्यम्बकं वरदं प्रभुम् । उनके ऐसा कहनेपर परशुरामने वरदायक भगवान् त्रिलोचनको इस प्रकार उत्तर दिया ॥ १४४३ ॥

राम उवाच का शक्तिर्मम देवेश अकृतास्त्रस्य संयुगे ॥ १४५ ॥

निहन्तुं दानवान् सर्वान् कृतास्त्रान् युद्धदुर्मदान् । परशुराम बोले – देवेश्वर! मैं तो अस्त्रविद्याका ज्ञाता नहीं हूँ । फिर युद्धस्थलमें अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा रणदुर्मद समस्त दानवोंका वध करनेके लिये मुझमें क्या शक्ति है? ॥ १४५३ ॥

महेश्वर उवाच गच्छ त्वं मदनुज्ञातो निहनिष्यसि शात्रवान् ॥ १४६ ॥

विजित्य च रिपून् सर्वान् गुणान् प्राप्यसि पुष्कलान् ।

महेश्वरने कहा – राम! तुम मेरी आज्ञासे जाओ । निश्चय ही देवशत्रुओंका संहार करोगे ।

उन समस्त वैरियोंपर विजय पाकर प्रचुर गुण प्राप्त कर लोगे ॥ १४६३ ॥

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं प्रतिगृह्य च सर्वशः ॥ १४७ ॥

रामः कृतस्वस्त्ययनः प्रययौ दानवान् प्रति ।

अब्रवीद् देवशत्रूंस्तान् महादर्पबलान्वितान् ॥ १४८ ॥

उनकी यह बात सुनकर उसे सब प्रकारसे शिरोधार्य करके परशुराम स्वस्तिवाचन आदि मंगलकृत्य करनेके पश्चात् दानवोंका सामना करनेके लिये गये और महान् दर्प एवं बलसे सम्पन्न उन देवशत्रुओंसे इस प्रकार बोले- ॥ १४७-१४८ ॥

मम युद्धं प्रयच्छध्वं दैत्या युद्धमदोत्कटाः ।

प्रेषितो देवदेवेन वो निजेतुं महासुराः ॥ १४ ९ ॥

‘ युद्धके मदसे उन्मत्त रहनेवाले दैत्यो! मुझे युद्ध प्रदान करो । महान् असुरगण! मुझे देवाधिदेव महादेवजीने तुम्हें परास्त करनेके लिये भेजा है ' ॥ १४ ९ ॥

इत्युक्ता भार्गवेणाथ दैत्या युद्धं प्रचक्रमुः ।

स तान् निहत्य समरे दैत्यान् भार्गवनन्दनः ॥ १५० ॥

वज्राशनिसमस्पर्शेः प्रहारैरेव भार्गवः ।

स दानवैः क्षततनुर्जामदग्न्यो द्विजोत्तमः ॥ १५१ ॥

भृगुवंशी परशुरामके ऐसा कहनेपर दैत्य उनके साथ युद्ध करने लगे । भार्गवनन्दन रामने समरांगणमें वज्र और विद्युत् के समान स्पर्शवाले प्रहारोंद्वारा उन दैत्योंका वध कर डाला। साथ ही उन द्विजश्रेष्ठ जमदग्निकुमारके शरीरको भी दानवोंने क्षत -विक्षत कर डाला ॥ १५०-१५१ ॥

पृष्ठ 1837

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संस्पृष्टःस्थाणुना सद्यो निर्व्रणः समजायत ।

प्रीतश्च भगवान् देवः कर्मणा तेन तस्य वै ॥ १५२ ॥

परंतु महादेवजीके हाथोंका स्पर्श पाकर परशुरामजीके सारे घाव तत्काल दूर हो गये ।

परशुरामके उस शत्रुविजयरूपी कर्मसे भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए ॥ १५२ ॥

वरान् प्रादाद् बहुविधान् भार्गवाय महात्मने ।

उक्तश्च देवदेवेन प्रीतियुक्तेन शूलिना ॥ १५३ ॥

उन देवाधिदेव त्रिशूलधारी भगवान् शिवने बड़ी प्रसन्नताके साथ महात्मा भार्गवको नाना प्रकारके वर प्रदान किये ॥ १५३ ॥

निपातात्तव शस्त्राणां शरीरे याभवद् रुजा ।

तया ते मानुषं कर्म व्यपोढं भृगुनन्दन ॥ १५४ ॥

गृहाणास्त्राणि दिव्यानि मत्सकाशाद् यथेप्सितम् । उन्होंने कहा—‘ भृगुनन्दन! दैत्योंके अस्त्र- शस्त्रोंके आघातसे तुम्हारे शरीरमें जो चोट पहुँची है, उससे तुम्हारा मानवोचित कर्म नष्ट हो गया ( अब तुम देवताओंके ही समान हो गये ); अतः मुझसे अपनी इच्छाके अनुसार दिव्यास्त्र ग्रहण करो' ॥ १५४३ ॥

दुर्योधन उवाच ततोऽस्त्राणि समस्तानि वरांश्च मनसेप्सितान् ॥ १५५ ॥

लब्ध्वा बहुविधान् रामः प्रणम्य शिरसा भवम् ।

अनुज्ञां प्राप्य देवेशाज्जगाम स महातपाः ॥ १५६ ॥

दुर्योधन कहता है - राजन्! तब रामने भगवान् शिवसे समस्त दिव्यास्त्र और नाना प्रकारके मनोवांछित वर पाकर उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया । फिर वे महातपस्वी परशुराम देवेश्वर शिवसे आज्ञा लेकर चले गये ॥ १५५-१५६ ॥

एवमेतत् पुरावृत्तं तदा कथितवानृषिः ।

भार्गवोऽपि ददौ दिव्यं धनुर्वेदं महात्मने ॥ १५७ ॥

कर्णाय पुरुषव्याघ्र सुप्रीतेनान्तरात्मना । राजन्! इस प्रकार यह पुरातन वृत्तान्त उस समय ऋषिने मेरे पिताजीसे कहा था । पुरुषसिंह! भृगुनन्दन परशुरामने भी अत्यन्त प्रसन्न हृदयसे महामना कर्णको दिव्य धनुर्वेद प्रदान किया है ॥ १५७३ ॥

वृजिनं हि भवेत् किंचिद् यदि कर्णस्य पार्थिव ॥ १५८ ॥

नास्मै ह्यस्त्राणि दिव्यानि प्रादास्यद् भृगुनन्दनः । भूपाल! यदि कर्णमें कोई पाप या दोष होता तो भृगुनन्दन परशुराम इसे दिव्यास्त्र न देते ॥ १५८३ ॥

नापि सूतकुले जातं कर्णं मन्ये कथंचन ॥ १५ ९ ॥

पृष्ठ 1838

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देवपुत्रमहं मन्ये क्षत्रियाणां कुलोद्भवम् ।

विसृष्टमवबोधार्थं कुलस्येति मतिर्मम ॥ १६० ॥

राजन्! मैं किसी तरह इस बातपर विश्वास नहीं करता कि कर्ण सूतकुलमें उत्पन्न हुआ है । मैं इसे क्षत्रियकुलमें उत्पन्न देवपुत्र मानता हूँ। मेरा तो यह विश्वास है कि इसकी माताने अपने गुप्त रहस्यको छिपानेके लिये तथा इसे अन्य कुलका बालक विख्यात करनेके लिये ही सूतकुलमें छोड़ दिया होगा ॥ १५ ९ -१६० ॥

सर्वथा न ह्ययं शल्य कर्णः सूतकुलोद्भवः ।

सकुण्डलं सकवचं दीर्घबाहुं महारथम् ॥ १६१ ॥

कथमादित्यसदृशं मृगी व्याघ्रं जनिष्यति । शल्य! मैं सर्वथा इस बातपर विश्वास करता हूँ कि इस कर्णका जन्म सूतकुलमें नहीं हुआ है । इस महाबाहु महारथी और सूर्यके समान तेजस्वी कुण्डल- कवचविभूषित पुत्रको सूतजातिकी स्त्री कैसे पैदा कर सकती है? क्या कोई हरिणी अपने पेटसे बाघको जन्म दे सकी है? ॥ १६१ ॥

यथा ह्यस्य भुजौ पीनौ नागराजकरोपमौ ॥ १६२ ॥

वक्षः पश्य विशालं च सर्वशत्रुनिबर्हणम् ।

न त्वेष प्राकृतः कश्चित् कर्णो वैकर्तनो वृषः ।

महात्मा ह्येष राजेन्द्र रामशिष्यः प्रतापवान् ॥ १६३ ॥

राजेन्द्र! गजराजके शुण्डदण्डके समान जैसी इसकी मोटी भुजाएँ हैं तथा समस्त शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ जैसा इसका विशाल वक्षःस्थल है, उससे सूचित होता है कि परशुरामजीका यह प्रतापी शिष्य महामनस्वी धर्मात्मा वैकर्तन कर्ण कोई प्राकृत पुरुष नहीं है ॥ १६२-१६३ ॥ इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि त्रिपुरवधोपाख्याने चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें त्रिपुरवधोपाख्यानविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ श्लोक मिलाकर कुल १७०३ श्लोक हैं)

पृष्ठ 1839

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पञ्चत्रिंशोऽध्यायः शल्य और दुर्योधनका वार्तालाप, कर्णका सारथि होनेके लिये शल्यकी स्वीकृति दुर्योधन उवाच

एवं स भगवान् देवः सर्वलोकपितामहः ।

सारथ्यमकरोत् तत्र ब्रह्मा रुद्रोऽभवद् रथी ॥ १ ॥

दुर्योधन बोला- राजन्! इस प्रकार सर्वलोक- पितामह भगवान् ब्रह्माने वहाँ सारथिका कार्य किया और रथी हुए रुद्र ॥ १ ॥

रथिनोऽभ्यधिको वीर कर्तव्यो रथसारथिः ।

तस्मात्त्वं पुरुषव्याघ्र नियच्छ तुरगान् युधि ॥ २ ॥

वीर! रथका सारथि तो उसीको बनाना चाहिये जो रथीसे भी बढ़कर हो । अतः पुरुषसिंह! आप युद्धमें कर्णके घोड़ोंको काबूमें रखिये ॥ २ ॥

यथा देवगणैस्तत्र वृतो यत्नात् पितामहः ।

तथास्माभिर्भवान् यत्नात् कर्णादभ्यधिको वृतः ॥ ३ ॥

जैसे देवताओंने वहाँ यत्नपूर्वक ब्रह्माजीका वरण किया था, उसी प्रकार हमलोगोंने विशेष चेष्टा करके कर्णसे भी अधिक बलवान् आपका सारथि- कर्मके लिये वरण किया ॥ ३ ॥

यथा देवैर्महाराज ईश्वरादधिको वृतः ।

तथा भवानपि क्षिप्रं रुद्रस्येव पितामहः ॥ ४ ॥

नियच्छ तुरगान् युद्धे राधेयस्य महाद्युते । महाराज! जैसे देवताओंने महादेवजीसे भी बड़े ब्रह्माजीको उनका सारथि चुना था, उसी प्रकार हमने भी आपको चुना है । अतः महातेजस्वी नरेश! आप युद्धमें राधापुत्र कर्णके घोड़ोंका नियन्त्रण कीजिये ॥ ४३ ॥

शल्य उवाच मयाप्येतन्नरश्रेष्ठ बहुशोऽमरसिंहयोः ॥ ५ ॥

कथ्यमानं श्रुतं दिव्यमाख्यानमतिमानुषम् ।

यथा च चक्रे सारथ्यं भवस्य प्रपितामहः ॥ ६ ॥

यथासुराश्च निहता इषुणैकेन भारत ।

पृष्ठ 1840

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शल्यने कहा — भारत! नरश्रेष्ठ! मैंने भी देवश्रेष्ठ ब्रह्मा और महादेवजीके इस अलौकिक एवं दिव्य उपाख्यानको विद्वानोंके मुखसे सुना है कि किस प्रकार प्रपितामह ब्रह्माजीने महादेवजीका सारथि-कर्म किया था और कैसे एक ही बाणसे समस्त असुर मारे गये ॥ कृष्णस्य चापि विदितं सर्वमेतत् पुरा ह्यभूत् ॥ ७ ॥

यथा पितामहो जज्ञे भगवान् सारथिस्तदा । भगवान् ब्रह्मा उस समय जिस प्रकार महादेवजीके सारथि हुए थे, यह सारा पुरातन वृत्तान्त श्रीकृष्णको भी विदित ही होगा ॥ ७३ ॥

अनागतमतिक्रान्तं वेद कृष्णोऽपि तत्त्वतः ॥ ८ ॥

एतदर्थं विदित्वापि सारथ्यमुपजग्मिवान् ।

स्वयंभूरिव रुद्रस्य कृष्णः पार्थस्य भारत ॥ ९ ॥

क्योंकि श्रीकृष्ण भी भूत और भविष्यको यथार्थरूपसे जानते हैं । भारत! इस विषयको अच्छी तरह जानकर ही रुद्रके सारथि ब्रह्माजीके समान श्रीकृष्ण पार्थके सारथि बने हुए हैं ॥ ८ -९ ॥

यदि हन्याच्च कौन्तेयं सूतपुत्रः कथंचन ।

दृष्ट्वा पार्थं हि निहतं स्वयं योत्स्यति केशवः ॥ १० ॥

शङ्खचक्रगदापाणिर्धक्ष्यते तव वाहिनीम् । यदि सूतपुत्र कर्ण किसी प्रकार कुन्तीकुमार अर्जुनको मार डालेगा तो अर्जुनको मारा गया देख श्रीकृष्ण स्वयं ही युद्ध करेंगे । उनके हाथमें शंख, चक्र और गदा होगी । वे तुम्हारी सेनाको जलाकर भस्म कर देंगे ॥ १० ॥

न चापि तस्य क्रुद्धस्य वार्ष्णेयस्य महात्मनः ॥ ११ ॥

स्थास्यते प्रत्यनीकेषु कश्चिदत्र नृपस्तव । महात्मा श्रीकृष्ण कुपित होकर जब हथियार उठायेंगे, उस समय तुम्हारे पक्षका कोई भी नरेश उनके सामने ठहर नहीं सकेगा ॥ ११३ ॥

संजय उवाच तं तथा भाषमाणं तु मद्रराजमरिंदमः ॥ १२ ॥

प्रत्युवाच महाबाहुरदीनात्मा सुतस्तव । संजय कहते हैं — राजन्! मद्रराज शल्यको ऐसी बातें करते देख आपके शत्रुदमन पुत्र महाबाहु दुर्योधनने मनमें तनिक भी दीनता न लाकर उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ १२३ || मावमंस्था महाबाहो कर्णं वैकर्तनं रणे ॥ १३ ॥

सर्वशस्त्रभृतां श्रेष्ठं सर्वशास्त्रार्थपारगम् ।