04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 1851–1860

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1851–1860

पृष्ठ 1851

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मेघोंकी छायाके समान छाया कर रहे हैं, निरन्तर बाण- वर्षा करते और शत्रुओंका संहार किये डालते हैं, तब तुम ऐसी बातें मुँहसे न निकाल सकोगे ॥ ३१-३२ ॥ संजय उवाच

अनादृत्य तु तद् वाक्यं मद्रराजेन भाषितम् ।

याहीत्येवाब्रवीत् कर्णो मद्रराजं तरस्विनम् ॥ ३३ ॥

संजय कहते हैं - राजन्! मद्रराजकी कही हुई उस बातकी उपेक्षा करके कर्णने उन वेगशाली मद्रनरेशसे कहा – ' चलिये, चलिये ' ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि शल्यसंवादे षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें शल्यसंवादविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३६ ॥

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पृष्ठ 1852

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सप्तत्रिंशोऽध्यायः कौरव - सेनामें अपशकुन, कर्णकी आत्मप्रशंसा, शल्यके द्वारा उसका उपहास और अर्जुनके बल पराक्रमका वर्णन संजय उवाच

दृष्ट्वा कर्णं महेष्वासं युयुत्सुं समवस्थितम् ।

चुक्रुशुः कुरवः सर्वे हृष्टरूपाः समन्ततः ॥ १ ॥

संजय कहते हैं - महाराज! जब महाधनुर्धर कर्ण युद्धकी इच्छासे समरांगणमें डटकर खड़ा हो गया, तब समस्त कौरव बड़े हर्षमें भरकर सब ओर कोलाहल करने लगे ॥

ततो दुन्दुभिनिर्घोषैर्भेरीणां निनदेन च ।

बाणशब्दैश्च विविधैर्गर्जितैश्च तरस्विनाम् ॥ २ ॥

निर्ययुस्तावका युद्धे मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् । तदनन्तर आपके पक्षके समस्त वीर दुन्दुभि और भेरियोंकी ध्वनि, बाणोंकी सनसनाहट और वेगशाली वीरोंकी विविध गर्जनाओंके साथ युद्धके लिये निकल पड़े । उनके मनमें यह निश्चय था कि अब मौत ही हमें युद्धसे निवृत्त कर सकेगी ॥ २३ ॥

प्रयाते तु ततः कर्णे योधेषु मुदितेषु च ॥ ३ ॥

चचाल पृथिवी राजन् ववाश च सुविस्तरम् । राजन्! कर्ण और कौरव योद्धाओंके प्रसन्नतापूर्वक प्रस्थान करनेपर धरती डोलने और बड़े जोर- जोरसे अव्यक्त शब्द करने लगी ॥ ३३ ॥

निःसरन्तो व्यदृश्यन्त सूर्यात् सप्त महाग्रहाः ॥ ४ ॥

उल्कापाताश्च संजज्ञुर्दिशां दाहास्तथैव च ।

शुष्काशन्यश्च सम्पेतुर्वयुर्वाताश्च भैरवाः ॥ ५ ॥

उस समय सूर्यमण्डलसे सात बड़े - बड़े ग्रह निकलते दिखायी दिये, उल्कापात होने लगे, दिशाओंमें आग सी जल उठी, बिना वर्षाके ही बिजलियाँ गिरने लगीं और भयानक आँधी चलने लगी ॥ ४-५ ॥

मृगपक्षिगणाश्चैव पृतनां बहुशस्तव ।

अपसव्यं तदा चक्रुर्वेदयन्तो महाभयम् ॥ ६ ॥

बहुतेरे मृग और पक्षी महान् भयकी सूचना देते हुए अनेक बार आपकी सेनाको दाहिने करके चले गये ॥ ६ ॥

प्रस्थितस्य च कर्णस्य निपेतुस्तुरगा भुवि ।

अस्थिवर्षं च पतितमन्तरिक्षाद् भयानकम् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1853

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कर्णके प्रस्थान करते ही उसके घोड़े पृथ्वीपर गिर पड़े और आकाशसे हड्डियोंकी भयंकर वर्षा होने लगी ॥ ७ ॥

जज्वलुश्चैव शस्त्राणि ध्वजाश्चैव चकम्पिरे ।

अश्रूणि च व्यमुञ्चन्त वाहनानि विशाम्पते ॥ ८ ॥

प्रजानाथ! कौरवोंके शस्त्र जल उठे, ध्वज हिलने लगे और वाहन आँसू बहाने लगे ॥ ८ ॥

एते चान्ये च बहव उत्पातास्तत्र दारुणाः ।

समत्पेतुर्विनाशाय कौरवाणां सुदारुणाः ॥ ९ ॥

ये तथा और भी बहुत - से भयंकर उत्पात वहाँ प्रकट हुए, जो कौरवोंके विनाशकी सूचना दे रहे थे ॥ ९ ॥

न च तान् गणयामासुः सर्वे देवेन मोहिताः ।

प्रस्थितं सूतपुत्रं च जयेत्यूचुर्नराधिपाः ।

निर्जितान् पाण्डवांश्चैव मेनिरे तत्र कौरवाः ॥ १० ॥

परंतु दैवसे मोहित होनेके कारण उन सबने उन उत्पातोंको कुछ गिना ही नहीं । सूतपुत्रके प्रस्थान करनेपर सब राजा उसकी जय-जयकार बोलने लगे । कौरवोंको यह विश्वास हो गया कि अब पाण्डव परास्त हो जायँगे ॥ १० ॥

ततो रथस्थः परवीरहन्ता भीष्मद्रोणावस्तवीर्यौ समीक्ष्य । समुज्ज्वलद्भास्करपावकाभो वैकर्तनोऽसौ रथकुञ्जरो नृप ॥ ११ ॥

स शल्यमाभाष्य जगाद वाक्यं पार्थस्य कर्मातिशयं विचिन्त्य । मानेन दर्पेण विदह्यमानः क्रोधेन दीप्यन्निव निःश्वसंश्च ॥ १२ ॥

नरेश्वर! तदनन्तर प्रकाशमान सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी, शत्रुवीरोंका संहार करनेमें समर्थ एवं रथपर बैठा हुआ रथिश्रेष्ठ कर्ण यह देखकर कि भीष्म और द्रोणाचार्यके पराक्रमका लोप हो गया, अर्जुनके अलौकिक कर्मका चिन्तन करके अभिमान और दर्पसे दग्ध हो उठा तथा क्रोधसे चलता हुआ- सा लंबी - लंबी साँस खींचने लगा । उस समय उसने शल्यको सम्बोधित करके कहा- ॥ ११-१२ ॥ नाहं महेन्द्रादपि वज्रपाणेः

क्रुद्धाद् बिभेम्यायुधवान् रथस्थः ।

दृष्ट्वा हि भीष्मप्रमुखाञ्शयाना- नतीव मां ह्यस्थिरता जहाति ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1854

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‘ राजन्! मैं हाथमें आयुध लेकर रथपर बैठा रहूँ, उस अवस्थामें यदि वज्र धारण करनेवाले इन्द्र भी कुपित होकर आ जायँ तो उनसे भी मुझे भय न होगा । भीष्म आदि महारथियोंको रणभूमिमें सदाके लिये सोया हुआ देखकर भी अस्थिरता ( घबराहट ) मुझसे दूर ही रहती है ॥ महेन्द्रविष्णुप्रतिमावनिन्दितौ

रथाश्वनागप्रवरप्रमाथिनौ ।

अवध्यकल्पौ निहतौ यदा परै- स्ततो न मेऽप्यस्ति रणेऽद्य साध्वसम् ॥ १४ ॥

' भीष्म और द्रोणाचार्य देवराज इन्द्र और विष्णुके समान पराक्रमी, सबके द्वारा प्रशंसित, रथों, घोड़ों और गजराजोंको भी मथ डालनेवाले तथा अवध्य तुल्य थे, जब उन्हें भी शत्रुओंने मार डाला, तब मेरी क्या गिनती है? यह सोचकर भी आज मुझे रणभूमिमें कोई भय नहीं हो रहा है ॥ १४ ॥

समीक्ष्य संख्येऽतिबलान् नराधिपान् ससूतमातङ्गरथान् परैर्हतान् । कथं न सर्वानहितान् रणेऽवधीद् महास्त्रविद् ब्राह्मणपुङ्गवो गुरुः ॥ १५ ॥

‘ युद्धस्थलमें अत्यन्त बलवान् नरेशोंको सारथि, रथ और हाथियोंसहित शत्रुओंद्वारा मारा गया देखकर भी महान् अस्त्रवेत्ता ब्राह्मणशिरोमणि आचार्य द्रोणने रणभूमिमें समस्त शत्रुओंका वध क्यों नहीं कर डाला? ॥ स संस्मरन् द्रोणमहं महाहवे ब्रवीमि सत्यं कुरवो निबोधत । न वा मदन्यः प्रसहेद् रणेऽर्जुनं समागतं मृत्युमिवोग्ररूपिणम् ॥ १६ ॥

‘ अतः महासमरमें मारे गये द्रोणाचार्यका स्मरण करके मैं सत्य कहता हूँ, कौरवो! तुमलोग ध्यान देकर सुनो । मेरे सिवा दूसरा कोई रणभूमिमें अर्जुनका वेग नहीं सह सकता । वे सामने आये हुए भयानक रूपधारी मृत्युके समान हैं ॥ १६ ॥

शिक्षाप्रमादश्च बलं धृतिश्च महास्त्राणि च संनतिश्च । स चेदगान्मृत्युवशं महात्मा सर्वानन्यानातुरानद्य मन्ये ॥ १७ ॥

‘ शिक्षा, सावधानी, बल, धैर्य, महान् अस्त्र और विनय - ये सभी सद्गुण द्रोणाचार्यमें विद्यमान थे । वे महात्मा द्रोण भी यदि मृत्युके वशमें पड़ गये तो अन्य सब लोगोंको भी मैं मरणासन्न ही समझता हूँ ॥ १७ ॥

पृष्ठ 1855

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नेह ध्रुवं किंचिदपि प्रचिन्तयन् विद्यां लोके कर्मणो नित्ययोगात् । सूर्योदये को हि विमुक्तसंशयो भावं कुर्वीताद्य गुरौ निपातिते ॥ १८ ॥

'बहुत सोचनेपर भी मैं कर्म-सम्बन्धकी अनित्यताके कारण इस लोकमें किसी भी वस्तुको नित्य नहीं मानता । जब आचार्य द्रोण भी मार दिये गये, तब कौन संदेहरहित होकर आगामी सूर्योदयतक जीवित रहनेका दृढ़ विश्वास कर सकता है? ॥ १८ ॥

न नूनमस्त्राणि बलं पराक्रमः क्रियाः सुनीतं परमायुधानि वा । अलं मनुष्यस्य सुखाय वर्तितुं तथा हि युद्धे निहतः परैर्गुरुः ॥ १ ९ ॥ ‘ निश्चय ही अस्त्र, बल, पराक्रम, क्रिया, अच्छी नीति अथवा उत्तम आयुध आदि किसी मनुष्यको सुख पहुँचानेके लिये पर्याप्त नहीं हैं; क्योंकि इन सब साधनोंके होते हुए भी आचार्यको शत्रुओंने युद्धमें मार डाला है ॥ १ ९ ॥ हुताशनादित्यसमानतेजसं पराक्रमे विष्णुपुरन्दरोपमम् । नये बृहस्पत्युशनोः सदा समं न चैनमस्त्रं तदुपास्त दुःसहम् ॥ २० ॥

‘ अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी, विष्णु और इन्द्रके समान पराक्रमी तथा सदा बृहस्पति और शुक्राचार्यके समान नीतिमान् इन गुरुदेवको बचानेके लिये इनके दुःसह अस्त्र आदि पास न आ सके अर्थात् उनकी रक्षा नहीं कर सके ॥ २० ॥

सम्प्राक्रुष्टे रुदितस्त्रीकुमारे पराभूते पौरुषे धार्तराष्ट्रे । मया कृत्यमिति जानामि शल्य प्रयाहि तस्माद् द्विषतामनीकम् ॥ २१ ॥

‘ शल्य! ( द्रोणाचार्यके मारे जानेपर) जब सब ओर त्राहि-त्राहिकी पुकार हो रही है, स्त्रियाँ और बच्चे बिलख - बिलखकर रो रहे हैं तथा दुर्योधनका पुरुषार्थ दब गया है, ऐसे समयमें दुर्योधनको मेरी सहायताकी विशेष आवश्यकता है । मैं अपने इस कर्तव्यको अच्छी तरह समझता हूँ । इसलिये तुम शत्रुओंकी सेनाकी ओर चलो ॥ २१ ॥

यत्र राजा पाण्डवः सत्यसंधो व्यवस्थितो भीमसेनार्जुनौ च । वासुदेवः सात्यकिः सृञ्जयाश्च यमौ च कस्तान् विषहेन्मदन्यः ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1856

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'जहाँ सत्यप्रतिज्ञ पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर खड़े हैं, जहाँ भीमसेन, अर्जुन, वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण, सात्यकि, संजय वीर तथा नकुल और सहदेव डटे हुए हैं, वहाँ मेरे सिवा दूसरा कौन उन वीरोंका वेग सह सकता है? ॥ २२ ॥

तस्मात् क्षिप्रं मद्रपते प्रयाहि रणे पञ्चालान् पाण्डवान् सृञ्जयांश्च । तान् वा हनिष्यामि समेत्य संख्ये यास्यामि वा द्रोणपथा यमाय ॥ २३ ॥

‘ इसलिये मद्रराज! तुम शीघ्र ही रणभूमिमें पांचाल, पाण्डव तथा सृजय वीरोंकी ओर रथ ले चलो । आज युद्धस्थलमें उन सबके साथ भिड़कर या तो उन्हें ही मार डालूँगा या स्वयं ही द्रोणाचार्यके मार्गसे यमलोक चला जाऊँगा ॥ २३ ॥

न त्वेवाहं न गमिष्यामि मध्ये तेषां शूराणामिति मां शल्य विद्धि । मित्रद्रोहो मर्षणीयो न मेऽयं त्यक्त्वा प्राणाननुयास्यामि द्रोणम् ॥ २४ ॥

‘ शल्य! मैं उन शूरवीरोंके बीचमें नहीं जाऊँगा, ऐसा मुझे न समझो; क्योंकि संग्रामसे पीछे हटनेपर मित्रद्रोह होगा और यह मित्रद्रोह मेरे लिये असह्य है । इसलिये मैं प्राणोंका परित्याग करके द्रोणाचार्यका ही अनुसरण करूँगा ॥ २४ ॥

प्राज्ञस्य मूढस्य च जीवितान्ते नास्ति प्रमोक्षोऽन्तकसत्कृतस्य । अतो विद्वन्नभियास्यामि पार्थान् दिष्टं न शक्यं व्यतिवर्तितुं वै ॥ २५ ॥

'विद्वान् हो या मूर्ख, आयुकी समाप्ति होनेपर सभीका यमराजके द्वारा यथायोग्य सत्कार होता है । उससे किसीको छुटकारा नहीं मिलता । अतः विद्वन्! मैं कुन्तीके पुत्रोंपर अवश्य चढ़ाई करूंगा । निश्चय ही दैवके विधानको कोई पलट नहीं सकता ॥ २५ ॥

कल्याणवृत्तः सततं हि राजा वैचित्रवीर्यस्य सुतो ममासीत् । तस्यार्थसिद्ध्यर्थमहं त्यजामि प्रियान् भोगान् दुस्त्यजं जीवितं च ॥ २६ ॥

' धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन सदा ही मेरे कल्याण-साधनमें तत्पर रहा है; अतः आज उसके मनोरथकी सिद्धिके लिये मैं अपने प्रिय भोगोंको और जिसे त्यागना अत्यन्त कठिन है, उस जीवनको भी त्याग दूँगा ॥ २६ ॥

वैयाघ्रचर्माणमकूजनाक्षं हैमत्रिकोषं रजतत्रिवेणुम् ।

पृष्ठ 1857

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रथप्रबर्ह तुरगप्रबर्हे- र्युक्तं प्रादान्मह्यमिमं हि रामः ॥ २७ ॥

' गुरुवर परशुरामजीने मुझे यह व्याघ्रचर्मसे आच्छादित और उत्तम अश्वोंसे जुता हुआ श्रेष्ठ रथ प्रदान किया है । इसमें तीन सुवर्णमय कोष और रजतमय त्रिवेणु सुशोभित हैं । इसके धुरों और पहियोंसे कोई आवाज नहीं निकलती है ॥ २७ ॥

धनूंषि चित्राणि निरीक्ष्य शल्य ध्वजान् गदाः सायकांश्चोग्ररूपान् । असिं च दीप्तं परमायुधं च शङ्खं च शुभ्रं स्वनवन्तमुग्रम् ॥ २८ ॥

‘ शल्य! तत्पश्चात् उन्होंने भलीभाँति इस रथका निरीक्षण करके बहुत - से विचित्र धनुष, भयंकर बाण, ध्वज, गदा, खड्ग, चमचमाते हुए उत्तम आयुध तथा गम्भीर ध्वनिसे युक्त भयंकर श्वेत शंख भी दिये थे ॥ २८ ॥

पताकिनं वज्रनिपातनिःस्वनं सिताश्वयुक्तं शुभतूणशोभितम् । इमं समास्थाय रथं रथर्षभं रणे हनिष्याम्यहमर्जुनं बलात् ॥ २ ९ ॥ ‘ यह रथ सब रथोंसे उत्तम है । इसमें पताकाएँ फहरा रही हैं, सफेद घोड़े जुते हुए हैं और सुन्दर तरकस इसकी शोभा बढ़ाते हैं । चलते समय इस रथकी धमकसे वज्रपातके समान शब्द होता है। मैं इस रथपर बैठकर रणभूमिमें अर्जुनको बलपूर्वक मार डालूँगा ॥ २ ९ ॥ तं चेन्मृत्युः सर्वहरोऽभिरक्षेत् सदाप्रमत्तः समरे पाण्डुपुत्रम् । तं वा हनिष्यामि रणे समेत्य यास्यामि वा भीष्ममुखो यमाय ॥ ३० ॥

‘ यदि सबका संहार करनेवाली मृत्यु सदा सावधान रहकर समरांगणमें पाण्डुपुत्र अर्जुनकी रक्षा करे तो रणक्षेत्रमें उससे भी भिड़कर या तो मैं उसे ही मार डालूँगा या स्वयं ही भीष्मके सम्मुख यमलोकको चला जाऊँगा ॥ ३० ॥

यमवरुणकुबेरवासवा वा यदि युगपत्सगणा महाहवे । जुगुपिषव इहैत्य पाण्डवं किमु बहुना सह तैर्जयामि तम् ॥ ३१ ॥

‘ अधिक कहनेसे क्या लाभ? यदि इस महासमरमें अपने गणोंसहित यम, वरुण, कुबेर और इन्द्र भी एक साथ आकर यहाँ पाण्डुपुत्र अर्जुनकी रक्षा करना चाहें तो मैं उन सबके

पृष्ठ 1858

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साथ ही उन्हें जीत लूँगा' ॥ ३१ ॥

संजय उवाच इति रणरभसस्य कत्थत- स्तदुत निशम्य वचः स मद्रराट् । अवहसदवमन्य वीर्यवान् प्रतिषिषिधे च जगाद चोत्तरम् ॥ ३२ ॥

संजय कहते हैं — राजन्! पराक्रमी मद्रराज शल्य युद्धके उत्साहमें भरकर बढ़ - बढ़कर

बातें बनानेवाले कर्णके उस कथनको सुनकर उसकी अवहेलना करके उपहास करने लगे ।

उन्होंने फिर ऐसी बातें कहनेसे कर्णको रोका और इस प्रकार उत्तर दिया ॥ ३२ ॥

शल्य उवाच विरम विरम कर्ण कत्थना- दतिरभसोऽप्यतिवाचमुक्तवान् । क्व च हि नरवरो धनंजयः क्व पुनरहो पुरुषाधमो भवान् ॥ ३३ ॥

शल्यने कहा — कर्ण! बस, अब बढ़ - बढ़कर बातें बनाना बंद करो, बंद करो । तुम अधिक जोशमें आकर अपनी शक्तिसे बहुत बड़ी बात कह गये । भला, कहाँ नरश्रेष्ठ अर्जुन और कहाँ मनुष्योंमें अधम तुम? ॥ ३३ ॥

पृष्ठ 1859

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यदुसदनमुपेन्द्रपालितं त्रिदशमिवामरराजरक्षितम् । प्रसभमतिविलोड्य को हरेत् पुरुषवरावरजामृतेऽर्जुनात् ॥ ३४ ॥

बताओ तो सही, अर्जुनके सिवा दूसरा कौन ऐसा वीर है, जो साक्षात् विष्णु भगवान्से सुरक्षित यदुवंशियोंकी पुरीको, जिसकी उपमा देवराज इन्द्रद्वारा पालित देवनगरी अमरावतीसे दी जाती है, बलपूर्वक मथकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णकी छोटी बहिन सुभद्राका अपहरण कर सके ॥ त्रिभुवनविभुमीश्वरेश्वरं क इह पुमान् भवमाह्वयेद् युधि । मृगवधकलहे ऋतेऽर्जुनात् सुरपतिवीर्यसमप्रभावतः ॥ ३५ ॥

देवराज इन्द्रके समान बल और प्रभाव रखनेवाले अर्जुनको छोड़कर इस संसारमें दूसरा कौन ऐसा वीर पुरुष है, जो एक वन्य पशुको मारनेके विषयमें उठे हुए विवादके

पृष्ठ 1860

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अवसरपर ईश्वरोंके भी ईश्वर त्रिलोकीनाथ भगवान् शंकरको भी युद्धके लिये ललकार सके ॥ ३५ ॥

असुरसुरमहोरगान् नरान् गरुडपिशाचसयक्षराक्षसान् । इषुभिरजयदग्निगौरवात् स्वभिलषितं च हविर्ददौ जयः ॥ ३६ ॥

अर्जुनने अग्निदेवका गौरव मानकर गरुड़, पिशाच, यक्ष, राक्षस, देवता, असुर, बड़े-बड़े नाग तथा मनुष्योंको भी बाणोंद्वारा परास्त कर दिया और अग्निको अभीष्ट हविष्य प्रदान किया था ॥ ३६ ॥

स्मरसि ननु यदा परैर्हृतः स च धृतराष्ट्रसुतोऽपि मोक्षितः । दिनकरसदृशैः शरोत्तमैर्युधा कुरुषु बहून् विनिहत्य तानरीन् ॥ ३७ ॥

कर्ण! याद है वह घटना, जब कि कुरुजांगल प्रदेशमें घोषयात्राके समय ग्रन्धर्वोंने शत्रु बनकर दुर्योधनका अपहरण कर लिया था, उस समय इन्हीं अर्जुनने सूर्यकिरणोंके समान तेजस्वी उत्तमोत्तम बाणोंद्वारा उन बहुसंख्यक शत्रुओंको मारकर धृतराष्ट्रपुत्रको बन्धनसे मुक्त किया था ॥ ३७ ॥

प्रथममपि पलायिते त्वयि प्रियकलहा धृतराष्ट्रसूनवः । स्मरसि ननु यदा प्रमोचिताः खचरगणानवजित्य पाण्डवैः ॥ ३८ ॥

उस युद्धमें तुम सबसे पहले भाग गये थे । उस समय पाण्डवोंने गन्धर्वोंको पराजित करके कलहप्रिय धृतराष्ट्रपुत्रोंको कैदसे छुड़ाया था । क्या ये सब बातें तुम्हें याद हैं? ॥ ३८ ॥

समुदितबलवाहनाः पुनः पुरुषवरेण जिताः स्थ गोग्रहे । सगुरुगुरुसुताः सभीष्मकाः किमु न जितः स तदा त्वयार्जुनः ॥ ३ ९ ॥ विराटनगरमें गोहरणके समय पुरुषश्रेष्ठ अर्जुनने विशाल बल- वाहनसे सम्पन्न तुम सब लोगोंको द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और भीष्मके सहित परास्त कर दिया था । उस समय तुमने अर्जुनको क्यों नहीं जीत लिया? ॥ ३ ९ ॥ इदमपरमुपस्थितं पुन- स्तव निधनाय सुयुद्धमद्य वै ।