श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 1861–1870
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1861–1870
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यदि न रिपुभयात् पलायसे समरगतोऽद्य हतोऽसि सूतज ॥ ४० ॥
सूतपुत्र! अब आज तुम्हारे वधके लिये पुनः यह दूसरा उत्तम युद्ध उपस्थित हुआ है । यदि तुम शत्रुके भयसे भाग नहीं गये तो समरांगणमें पहुँचकर अवश्य मारे जाओगे ॥ ४० ॥
संजय उवाच इति बहु परुषं प्रभाषति प्रमनसि मद्रपतौ रिपुस्तवम् । भृशमभिरुषितः परंतपः कुरुपृतनापतिराह मद्रपम् ॥ ४१ ॥
संजयने कहा — राजन्! जब महामना मद्रराज शल्य इस प्रकार शत्रुकी प्रशंसासे सम्बन्ध रखनेवाली बहुत- सी कड़वी बातें सुनाने लगे, तब कौरव सेनापति शत्रुसंतापी कर्ण अत्यन्त क्रोधसे जल उठा और शल्यसे बोला ॥ ४१ ॥
कर्णउवाच भवतु भवतु किं विकत्थसे ननु मम तस्य हि युद्धमुद्यतम् । यदि स जयति मामिहाहवे तत इदमस्तु सुकत्थितं तव ॥ ४२ ॥
कर्णने कहा- रहने दो, रहने दो । क्यों बहुत बड़बड़ा रहे हो । अब तो मेरा और उनका युद्ध उपस्थित हो ही गया है । यदि अर्जुन यहाँ युद्धमें मुझे परास्त कर दें, तब तुम्हारा यह बढ़ - बढ़कर बातें करना ठीक और अच्छा समझा जायगा ॥ ४२ ॥
संजय उवाच
एवमस्त्विति मद्रेश उक्त्वा नोत्तरमुक्तवान् ।
याहि शल्येति चाप्येनं कर्णः प्राह युयुत्सया ॥ ४३ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! तब मद्रराज शल्य ' एवमस्तु ' कहकर चुप हो गये । उन्होंने कर्णकी उस बातका कोई उत्तर नहीं दिया । तब कर्णने युद्धकी इच्छासे उनसे कहा -' शल्य! रथ आगे ले चलो ' ॥ ४३ ॥
स रथः प्रययौ शत्रून् श्वेताश्वः शल्यसारथिः ।
निघ्नन्नमित्रान् समरे तमो घ्नन् सविता यथा ॥ ४४ ॥
तत्पश्चात् शल्य जिसके सारथि थे और जिसमें श्वेत घोड़े जुते हुए थे, वह विशाल रथ अन्धकारका विनाश करनेवाले सूर्यदेवके समान शत्रुओंका संहार करता हुआ आगे
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बढ़ा ॥ ४४ ॥
ततः प्रायात् प्रीतिमान् वै रथेन वैयाघ्रेण श्वेतयुजाथ कर्णः । स चालोक्य ध्वजिनीं पाण्डवानां धनंजयं त्वरया पर्यपृच्छत् ॥ ४५ ॥
तदनन्तर व्याघ्रचर्मसे आच्छादित और श्वेत अश्वोंसे युक्त उस रथके द्वारा कर्ण बड़ी प्रसन्नताके साथ प्रस्थित हुआ । उसने सामने ही पाण्डवोंकी सेनाको खड़ी देख बड़ी उतावलीके साथ धनंजयका पता पूछा ॥ ४५ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे सप्तत्रिंशोऽध्याय ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
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अष्टात्रिंशोऽध्यायः कर्णके द्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुनका पता बतानेवालेको नाना प्रकारकी भोगसामग्री और इच्छानुसार धन देनेकी घोषणा संजय उवाच
प्रयाणे च ततः कर्णो हर्षयन् वाहिनीं तव ।
एकैकं समरे दृष्ट्वा पाण्डवान् पर्यमृच्छत ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — राजन्! प्रस्थानकालमें आपकी सेनाका हर्ष बढ़ाता हुआ कर्ण समरांगणमें पाण्डव - सैनिकोंको देखकर प्रत्येकसे पूछने और कहने लगा- ॥ १ ॥
यो मामद्य महात्मानं दर्शयेच्छ्वेतवाहनम् ।
तस्मै दद्यामभिप्रेतं धनं यन्मनसेच्छति ॥ २ ॥
'जो आज मुझे महात्मा श्वेतवाहन अर्जुनको दिखा देगा, उसे मैं उसका अभीष्ट धन, जिसे वह मनसे लेना चाहे, दे दूँगा ॥ २ ॥
न चेत् तदभिमन्येत तस्मै दद्यामहं पुनः ।
शकटं रत्नसम्पूर्णं यो मे ब्रूबाद् धनंजयम् ॥३ ॥
‘ यदि उतने धनसे वह संतुष्ट न होगा तो मैं उसे और धन दूँगा। जो मुझे अर्जुनका पता बता देगा, उसे मैं रत्नोंसे भरा हुआ छकड़ा दूँगा ॥ ३ ॥
न चेत्तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ।
शतं दद्यां गवां तस्मै नैत्यिकं कांस्यदोहनम् ॥ ४ ॥
‘ यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उस धनको पर्याप्त न माने तो मैं उसे प्रतिदिन दूध देनेवाली सौ गौएँ और कांसका दुग्धपात्र प्रदान करूँगा ॥ ४ ॥
शतं ग्रामवरांश्चैव दद्यामर्जुनदर्शिने ।
तथा तस्मै पुनर्दद्यां श्वेतमश्वतरीरथम् ॥ ५ ॥
युक्तमञ्जनकेशीभिर्यो मे ब्रूयाद् धनंजयम् । ‘ इतना ही नहीं, मैं अर्जुनको दिखा देनेवाले व्यक्तिके लिये सौ बड़े - बड़े गाँव दूँगा तथा जो अर्जुनका पता बता देगा उसे खच्चरियोंसे जुता हुआ एकश्वेत रथ भी भेंट करूँगा; जिसमें काले केशवाली युवतियाँ बैठी होंगी ॥ ५३ ॥
न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ॥ ६ ॥
अन्यं वास्मै पुनर्दद्यां सौवर्णं हस्तिषड्गवम् ।
तथाप्यस्मै पुनर्दद्यां स्त्रीणां शतमलंकृतम् ॥ ७ ॥
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श्यामानां निष्ककण्ठीनां गीतवाद्यविपश्चिताम् । ‘ यदि अर्जुनका पता बतानेवाला पुरुष उस धनको पूरा न समझे तो उसे दूसरा सोनेका बना हुआ रथ प्रदान करूंगा जिसमें हाथीके समान हृष्ट - पुष्ट छ: बैल जुते होंगे । साथ ही उसे वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सौ ऐसी स्त्रियाँ दूँगा, जो श्यामा ( सोलह वर्षकी अवस्थावाली ), सुवर्णमय कण्ठहारसे अलंकृत तथा गाने- बजानेकी कलामें विदुषी होंगी ॥ ६-७ ॥ न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ॥ ८ ॥
तस्मै दद्यां शतं नागान् शतं ग्रामान् शतं रथान् ।
सुवर्णस्य च मुख्यस्य हयाग्रयेणां शतं शतान् ॥ ९ ॥
ऋद्ध्या गुणैः सुदान्तांश्च धुर्यवाहान् सुशिक्षितान् । ‘ अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष यदि उसे भी पूरा न समझे तो मैं उसे सौ हाथी, सौ गाँव, पक्के सोनेके बने हुए सौ रथ तथा दस हजार अच्छे घोड़े भी दूँगा । वे घोड़े हृष्ट - पुष्ट, गुणवान्, विनीत, सुशिक्षित तथा रथका भार वहन करनेमें समर्थ होंगे ॥ ८- ९ ३ ॥ तथा सुवर्णशृङ्गीणां गोधेनूनां चतुःशतम् ॥ १० ॥
दद्यां तस्मै सवत्सानां यो मे ब्रूयाद् धनंजयम् । 'जो मुझे अर्जुनका पता बता देगा, उसे मैं चार सौ सवत्सा दुधारू गौएँ दूँगा, जिनके सींगोंमें सोने मढ़े होंगे ॥ १०३ ॥
न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ॥ ११ ॥
अन्यदस्मै वरं दद्यां श्वेतान् पञ्चशतान् हयान् ।
हेमभाण्डपरिछन्नान् सुमृष्टमणिभूषणान् ॥ १२ ॥
‘ यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उस धनको पूर्ण नहीं समझेगा तो उसे और भी उत्तम धन, श्वेत रंगके पाँच सौ घोड़े दूँगा, जो सोनेके साज-न- बाजसे सुसज्जित तथा विशुद्ध मणियोंके आभूषणोंसे विभूषित होंगे ॥ ११-१२ ॥
सुदान्तानपि चैवाहं दद्यामष्टादशापरान् ।
रथं च शुभ्रं सौवर्णं दद्यां तस्मै स्वलंकृतम् ॥ १३ ॥
युक्तं परमकाम्बोजैर्यो मे ब्रूयाद् धनंजयम् । ‘ इनके सिवा अठारह और भी घोड़े दूँगा, जो अच्छी तरह रथमें सधे हुए होंगे । जो मुझे अर्जुनका पता बता देगा उसे मैं परम उज्ज्वल और अलंकारोंसे सजाया हुआ एक सुवर्णमय रथ दूँगा, जिसमें अच्छी नस्लके काबुली घोड़े जुते होंगे ॥ १३३ ॥
न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ॥ १४ ॥
अन्यदस्मै वरं दद्यां कुञ्जराणां शतानि षट् ।
काञ्चनैर्विविधैर्भाण्डैराच्छन्नान हेममालिनः ॥ १५ ॥
उत्पन्नानपरान्तेषु विनीतान हस्तिशिक्षकैः ।
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‘ यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उसे भी पूरा न समझे तो उसे मैं और भी श्रेष्ठ धन दूँगा । नाना प्रकारके सुवर्णमय आभूषणोंसे सुशोभित तथा सोनेकी मालाओंसे अलंकृत छः सौ ऐसे हाथी प्रदान करूंगा जो भारतवर्षकी पश्चिमी सीमाके जंगलोंमें उत्पन्न हुए हैं और जिन्हें गजशिक्षकोंने अच्छी तरह सुशिक्षित कर लिया है ॥ न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ॥ १६ ॥
अन्यदस्मै वरं दद्यां वैश्यग्रामांश्चतुर्दश ।
सुस्फीतान् धनसंयुक्तान् प्रत्यासन्नवनोदकान् ।
अकुतोभयान् सुसम्पन्नान् राजभोज्यांश्चतुर्दश ॥ १७ ॥
‘ यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उसे भी पूरा न समझे तो मैं उसे दूसरा श्रेष्ठ धन प्रदान करूँगा । जिनमें वैश्य निवास करते हों ऐसे चौदह समृद्धिशाली और धनसम्पन्न ग्राम दूँगा जिनके आसपास जंगल और जलकी सुविधा होगी और जहाँ किसी प्रकारका भय नहीं होगा । वे चौदहों गाँव अधिक सम्पन्न तथा राजोचित भोगोंसे परिपूर्ण होंगे ॥ १६-१७ ॥
दासीनां निष्ककण्ठीनां मागधीनां शतं तथा ।
प्रत्यग्रवयसां दद्यां यो मे ब्रूयाद् धनंजयम् ॥ १८ ॥
'जो मुझे अर्जुनका पता बता देगा, उसे मैं सोनेके कण्ठहारोंसे विभूषित मगधदेशकी सौ नवयुवती दासियाँ दूँगा ॥ १८ ॥
न चेत् तदभिमन्येत पुरुषोऽर्जुनदर्शिवान् ।
अन्यं तस्मै वरं दद्यां यमसौ कामयेत् स्वयम् ॥ १ ९ ॥
‘ यदि अर्जुनको दिखानेवाला पुरुष उसे भी पर्याप्त न समझे तो मैं उसे दूसरा वर प्रदान करूँगा, जिसकी वह स्वयं इच्छा करे ॥ १ ९ ॥
पुत्रदारान् विहारांश्च यदन्यद् वित्तमस्ति मे ।
तच्च तस्मै पुनर्दद्यां यद् यच्च मनसेच्छति ॥ २० ॥
'स्त्री, पुत्र, विहारस्थान तथा दूसरा भी जो कुछ धन - वैभव मेरे पास है, उसमेंसे जिस-जिस वस्तुको वह अपने मनसे चाहेगा, वह सब कुछ मैं उसे दे डालूँगा ॥ २० ॥
हत्वा च सहितौ कृष्णौ तयोर्वित्तानि सर्वशः ।
तस्मै दद्यामहं यो मे प्रब्रूयात् केशवार्जुनौ । २१ ॥
'जो मुझे श्रीकृष्ण और अर्जुनका पता बता देगा, उसे मैं उन दोनोंको मारकर उनका सारा धन - वैभव दे दूँगा' ॥ २१ ॥
एता वाचः सुबहुशः कर्ण उच्चारयन् युधि ।
दध्मौ सागरसम्भूतं सुस्वरं शङ्खमुत्तमम् ॥ २२ ॥
इन सब बातोंको बारंबार कहते हुए कर्णने युद्धस्थलमें समुद्रसे उत्पन्न हुए अपने उत्तम शंखको उच्च स्वरसे बजाया ॥ २२ ॥
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ता वाचः सूतपुत्रस्य तथा युक्ता निशम्य तु ।
दुर्योधनो महाराज संहृष्टः सानुगोऽभवत् ॥ २३ ॥
महाराज! सूतपुत्रकी कही हुई उस अवसरके अनुरूप उन बातोंको सुनकर दुर्योधन अपने सेवकोंसहित बड़ा प्रसन्न हुआ ॥ २३ ॥
ततो दुन्दुभिनिर्घोषो मृदङ्गानां च सर्वशः ।
सिंहनादः सवादित्रः कुञ्जराणां च निःस्वनः ॥ २४ ॥
फिर तो सब ओर दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनि होने लगी, मृदंग बजने लगे, वाद्योंकी ध्वनिके साथ - साथ वीरोंका सिंहनाद तथा हाथियोंके चिग्घाड़नेका शब्द वहाँ गूँज उठा ॥ २४ ॥
प्रादुरासीत् तदा राजन् सैन्येषु पुरुषर्षभ ।
योधानां सम्प्रहृष्टानां तथा समभवत् स्वनः ॥ २५ ॥
पुरुषप्रवर नरेश! उस समय सभी सेनाओंमें हर्ष और उत्साहसे भरे हुए योद्धाओंका गम्भीर गर्जन होने लगा ॥ २५ ॥
तथा प्रहृष्टे सैन्ये तु प्लवमानं महारथम् ।
विकत्थमानं च तदा राधेयमरिकर्षणम् ।
मद्रराजः प्रहस्येदं वचनं प्रत्यभाषत ॥ २६ ॥
इस प्रकार हर्षसे उल्लसित हुई सेनामें जाते और बढ़ - बढ़कर बातें बनाते हुए शत्रुसूदन राधापुत्र महारथी कर्णसे मद्रराज शल्यने हँसकर इस प्रकार कहा ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णावलेपे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्णका अभिमानविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥
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एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः शल्यका कर्णके प्रति अतन्त आक्षेपपूर्ण वचन कहना शल्य उवाच
मा सूतपुत्र दानेन सौवर्णं हस्तिषड्गवम् ।
प्रयच्छ पुरुषायाद्य द्रक्ष्यसि त्वं धनंजयम् ॥ १ ॥
शल्य बोले – सूतपुत्र! तुम किसी पुरुषको हाथीके समान हृष्ट- पुष्ट छः बैलोंसे जुता
हुआ सोनेका रथ न दो । आज अवश्य ही अर्जुनको देखोगे ॥ १ ॥
बाल्यादिह त्वं त्यजसि वसु वैश्रवणो यथा ।
अयत्नेनैव राधेय द्रष्टास्यद्य धनंजयम् ॥ २ ॥
राधापुत्र! तुम मूर्खतासे ही यहाँ कुबेरके समान धन लुटा रहे हो, आज अर्जुनको तो तुम बिना यत्न किये ही देख लोगे ॥ २ ॥
परान् सृजसि यद् वित्तं किंचित्त्वं बहु मूढवत् ।
अपात्रदाने ये दोषास्तान् मोहान्नावबुध्यसे ॥ ३ ॥
मूढ़ पुरुषोंके समान तुम अपना बहुत कुछ धन जो दूसरोंको दे रहे हो, इससे जान पड़ता है कि अपात्रको धनका दान देनेसे जो दोष पैदा होते हैं, उन्हें मोहवश तुम नहीं समझ रहे हो ॥ ३ ॥
यत् त्वं प्रेरयसे वित्तं बहु तेन खलु त्वया ।
शक्यं बहुविधैर्यज्ञैर्यष्टुं सूत यजस्व तैः ॥ ४ ॥
सूत! तुम जो बहुत धन देनेकी यहाँ घोषणा कर रहे हो, निश्चय ही उसके द्वारा नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान कर सकते हो; अतः तुम उन धन- वैभवोंद्वारा यज्ञोंका ही अनुष्ठान करो ॥ ४ ॥
यच्च प्रार्थयसे हन्तुं कृष्णौ मोहाद् वृथैव तत् ।
न हि शुश्रुम सम्मर्दे क्रोष्ट्रा सिंहौ निपातितौ ॥ ५ ॥
और जो तुम मोहवश श्रीकृष्ण तथा अर्जुनको मारना चाहते हो, वह मनसूबा तो व्यर्थ ही है; क्योंकि हमने यह बात कभी नहीं सुनी है कि किसी गीदड़ने युद्धमें दो सिंहोंको मार गिराया हो ॥ ५ ॥
अप्रार्थितं प्रार्थयसे सुहृदो न हि सन्ति ते ।
ये त्वां न वारयन्त्याशु प्रपतन्तं हुताशने ॥ ६ ॥
तुम ऐसी चीज चाहते हो, जिसकी अबतक किसीने इच्छा नहीं की थी । जान पड़ता है तुम्हारे कोई सुहृद् नहीं हैं, जो शीघ्र ही आकर तुम्हें चलती आगमें गिरनेसे रोक नहीं रहे हैं ॥ ६ ॥
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कार्याकार्यं न जानीषे कालपक्वोऽस्यसंशयम् ।
बह्वबद्धमकर्णीयं को हि ब्रूयाज्जिजीविषुः ॥ ७ ॥
तुम्हें कर्तव्य और अकर्तव्यका कुछ भी ज्ञान नहीं है । निःसंदेह तुम्हें कालने पका दिया है । ( अतः तुम पके हुए फलके समान गिरनेवाले ही हो ); अन्यथा जो जीवित रहना चाहता है, ऐसा कौन पुरुष ऐसी बहुत - सी न सुननेयोग्य ऊटपटांग बातें कह सकता है? ॥ ७ ॥
समुद्रतरणं दोर्भ्यां कण्ठे बद्ध्वा यथा शिलाम् ।
गिर्यग्राद् वा निपतनं तादृक् तव चिकीर्षितम् ॥ ८ ॥
जैसे कोई गलेमें पत्थर बाँधकर दोनों हाथोंसे समुद्र पार करना चाहे अथवा पहाड़की चोटीसे पृथ्वीपर कूदनेकी इच्छा करे, ऐसी ही तुम्हारी सारी चेष्टा और अभिलाषा है ॥ ८ ॥
सहितः सर्वयोधैस्त्वं व्यूढानीकैः सुरक्षितः ।
धनंजयेन युध्यस्व श्रेयश्चेत् प्राप्तुमिच्छसि ॥ ९ ॥
यदि तुम कल्याण प्राप्त करना चाहते हो तो व्यूहरचनापूर्वक खड़े हुए समस्त सैनिकोंके साथ सुरक्षित रहकर अर्जुनसे युद्ध करो ॥ ९ ॥
हितार्थं धार्तराष्ट्रस्य ब्रवीमि त्वां न हिंसया ।
श्रद्धस्वैवं मया प्रोक्तं यदि तेऽस्ति जिजीविषा ॥ १० ॥
दुर्योधनके हितके लिये ही मैं ऐसा कह रहा हूँ, हिंसाभावसे नहीं । यदि तुम्हें जीनेकी इच्छा है तो मेरे इस कथनपर विश्वास करो ॥ १० ॥
कर्णउवाच
स्वबाहुवीर्यमाश्रित्य प्रार्थयाम्यर्जुनं रणे ।
त्वं तु मित्रमुखः शत्रुर्मां भीषयितुमिच्छसि ॥ ११ ॥
कर्ण बोला— शल्य! मैं अपने बाहुबलका भरोसा करके रणक्षेत्रमें अर्जुनको पाना चाहता हूँ; परंतु तुम तो मुँहसे मित्र बने हुए वास्तवमें शत्रु हो, जो मुझे यहाँ डराना चाहते हो ॥ ११ ॥
न मामस्मादभिप्रायात् कश्चिदद्य निवर्तयेत् ।
अपीन्द्रो वज्रमुद्यम्य किमु मर्त्यः कथंचन ॥ १२ ॥
परंतु मुझे इस अभिप्रायसे आज कोई भी पीछे नहीं लौटा सकता । वज्र उठाये हुए इन्द्र भी मुझे किसी तरह इस निश्चयसे डिगा नहीं सकते, फिर मनुष्यकी तो बात ही क्या है? ॥ १२ ॥
संजय उवाच
इति कर्णस्य वाक्यान्ते शल्यः प्राहोत्तरं वचः ।
चुकोपयिषुरत्यर्थं कर्णं मद्रेश्वरः पुनः ॥ १३ ॥
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संजय कहते हैं— राजन्! कर्णकी यह बात समाप्त होते ही मद्रराज शल्य उसे अत्यन्त कुपित करनेकी इच्छासे पुनः इस प्रकार उत्तर देने लगे – ॥ १३ ॥
यदा वै त्वां फाल्गुनवेगयुक्ता
ज्याचोदिता हस्तवता विसृष्टाः ।
अन्वेतारः कङ्कपत्राः सिताग्रा- स्तदा तप्स्यस्यर्जुनस्यानुयोगात् ॥ १४ ॥
‘ कर्ण! अर्जुनके वेगसे युक्त हो उनकी प्रत्यंचासे प्रेरित और सुशिक्षित हाथोंसे छोड़े हुए तीखी धारवाले कंकपत्रविभूषित बाण जब तुम्हारे शरीरमें घुसने लगेंगे, तब जो तुम अर्जुनको पूछते फिरते हो, इसके लिये पश्चात्ताप करोगे ॥ १४ ॥
यदा दिव्यं धनुरादाय पार्थः
प्रतापयन् पृतनां सव्यसाची ।
त्वां मर्दयिष्यन्निशितैः पृषत्कै- स्तदा पश्चात् तप्स्यसे सूतपुत्र ॥ १५ ॥
'सूतपुत्र! जब सव्यसाची कुन्तीकुमार अर्जुन अपने हाथमें दिव्य धनुष लेकर शत्रुसेनाको तपाते हुए पैने बाणोंद्वारा तुम्हें रौंदने लगेंगे, तब तुम्हें अपने कियेपर पछतावा होगा ॥ बालश्चन्द्रं मातुरङ्के शयानो यथा कश्चित् प्रार्थयतेऽपहर्तुम् । तद्वन्मोहाद् द्योतमानं रथस्थं सम्प्रार्थयस्यर्जुनं जेतुमद्य ॥ १६ ॥
‘ जैसे अपनी माँकी गोदमें सोया हुआ कोई बालक चन्द्रमाको पकड़ लाना चाहता हो, उसी प्रकार तुम भी रथपर बैठे हुए तेजस्वी अर्जुनको आज मोहवश परास्त करना चाहते हो ॥ १६ ॥
त्रिशूलमाश्रित्य सुतीक्ष्णधारं सर्वाणि गात्राणि विघर्षसि त्वम् । सुतीक्ष्णधारोपमकर्मणा त्वं युयुत्ससे योऽर्जुनेनाद्य कर्ण ॥ १७ ॥
‘ कर्ण! अर्जुनका पराक्रम अत्यन्त तीखी धारवाले त्रिशूलके समान है । उन्हीं अर्जुनके साथ आज जो तुम युद्ध करना चाहते हो, वह दूसरे शब्दोंमें यों है कि तुम पैनी धारवाले त्रिशूलको लेकर उसीसे अपने सारे अंगोंको रगड़ना या खुजलाना चाहते हो ॥ १७ ॥
क्रुद्धं सिंहं केसरिणं बृहन्तं बालो मूढः क्षुद्रमृगस्तरस्वी । समाह्वयेत् तद्वदेतत् तवाद्य
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समाह्वानं सूतपुत्रार्जुनस्य ॥ १८ ॥
‘ सूतपुत्र! जैसे बालक, मूढ़ और वेगसे चौकड़ी भरनेवाला क्षुद्र मृग क्रोधमें भरे हुए विशालकाय, केसरयुक्त सिंहको ललकारे, तुम्हारा आज यह अर्जुनका युद्धके लिये आह्वान करना भी वैसा ही है ॥ १८ ॥
मा सूतपुत्राह्वय राजपुत्रं महावीर्यं केसरिणं यथैव । वने शृगालः पिशितेन तृप्तो मा पार्थमासाद्य विनङ्क्ष्यसि त्वम् ॥ १ ९ ॥ ‘सूतपुत्र! तुम महापराक्रमी राजकुमार अर्जुनका आह्वान न करो । जैसे वनमें मांस-भक्षणसे तृप्त हुआ गीदड़ महाबली सिंहके पास जाकर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार तुम भी अर्जुनसे भिड़कर विनाशके गर्तमें न गिरो ॥
ईषादन्तं महानागं प्रभिन्नकरटामुखम् ।
शशको ह्वयसे युद्धे कर्ण पार्थं धनंजयम् ॥ २० ॥
‘ कर्ण! जैसे कोई खरगोश ईषादण्डके समान दाँतोंवाले महान् मदस्रावी गजराजको अपने साथ युद्धके लिये बुलाता हो, उसी प्रकार तुम भी कुन्तीपुत्र धनंजयका रणक्षेत्रमें आह्वान करते हो ॥ २० ॥
बिलस्थं कृष्णसर्पं त्वं बाल्यात् काष्ठेन विध्यसि ।
महाविषं पूर्णकोपं यत् पार्थं योद्धुमिच्छसि ॥ २१ ॥
‘ तुम यदि पूर्णतः क्रोधमें भरे हुए अर्जुनके साथ जूझना चाहते हो तो मूर्खतावश बिलमें बैठे हुए महाविषैले काले सर्पको किसी काठकी छड़ीसे बींध रहे हो ॥ २१ ॥
सिंहं केसरिणं क्रुद्धमतिक्रम्याभिनर्दसे ।
शृगाल इव मूढस्त्वं नृसिंहं कर्ण पाण्डवम् ॥ २२ ॥
‘ कर्ण! तुम मूर्ख हो; जैसे गीदड़ क्रोधमें भरे हुए केसरी सिंहका अनादर करके गर्जना करे, उसी प्रकार तुम भी मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी और क्रोधमें भरे हुए पाण्डुकुमार अर्जुनका लंघन करके गरज रहे हो ॥ २२ ॥
सुपर्णं पतगश्रेष्ठं वैनतेयं तरस्विनम् ।
भोगीवाह्वयसे पाते कर्ण पार्थं धनंजयम् ॥ २३ ॥
‘ कर्ण! जैसे कोई सर्प अपने पतनके लिये ही पक्षियोंमें श्रेष्ठ वेगशाली विनतानन्दन गरुडका आह्वान करता है, उसी प्रकार तुम भी अपने विनाशके लिये ही कुन्तीकुमार अर्जुनको ललकार रहे हो ॥ २३ ॥
सर्वाम्भसां निधिं भीमं मूर्तिमन्तं झषायुतम् ।
चन्द्रोदये विवर्धन्तमप्लवः संस्तितीर्षसि ॥ २४ ॥