श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 1901–1910
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1901–1910
पृष्ठ 1901
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
'रथके मार्गोंपर विचरनेमें कुशल, शक्तिशाली, समरांगणमें सदा महान् भार वहन करनेवाले, संसारके समस्त धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ, प्रमुख वीर अर्जुनका आज युद्धस्थलमें मैं डटकर सामना करूँगा ॥ २२ ॥
अद्याहवे यस्य न तुल्यमन्यं मन्ये मनुष्यं धनुराददानम् ॥ २३ ॥
सर्वामिमां यः पृथिवीं विजिग्ये तेन प्रयोद्धास्मि समेत्य संख्ये । ' युद्धमें जिनके समान धनुर्धर मैं दूसरे किसी मनुष्यको नहीं मानता, जिन्होंने इस सारी पृथ्वीपर विजय पायी है, आज समरांगणमें उन्हींसे भिड़कर मैं बलपूर्वक युद्ध करूँगा ॥ २३३ ॥
यः सर्वभूतानि सदैवतानि प्रस्थेऽजयत् खाण्डवे सव्यसाची ॥ २४ ॥
को जीवितं रक्षमाणो हि तेन युयुत्सेद् वै मानुषो मामृतेऽन्यः । ‘जिन सव्यसाची अर्जुनने खाण्डववनमें देवताओं सहित समस्त प्राणियोंको जीत लिया था, उनके साथ मेरे सिवा दूसरा कौन मनुष्य, जो अपने जीवनकी रक्षा करना चाहता हो, युद्धकी इच्छा करेगा ॥ २४३ ॥
मानी कृतास्त्रः कृतहस्तयोगो दिव्यास्त्रविच्छ्वेतहयः प्रमाथी ॥ २५ ॥
तस्याहमद्यातिरथस्य काया- च्छिरो हरिष्यामि शितैः पृषत्कैः । ‘श्वेतवाहन अर्जुन मानी, अस्त्रवेत्ता, सिद्धहस्त, दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता और शत्रुओंको मथ डालनेवाले हैं । आज मैं अपने पैने बाणोंद्वारा उन्हीं अतिरथी वीर अर्जुनका मस्तक धड़से काट लूँगा ॥ २५३ ॥
योत्स्याम्येनं शल्य धनंजयं वै मृत्युं पुरस्कृत्य रणे जयं वा ॥ २६ ॥
अन्यो हि न ह्येकरथेन मर्त्यो युध्येत यः पाण्डवमिन्द्रकल्पम् । ‘ शल्य! मैं रणभूमिमें मृत्यु अथवा विजयको सामने रखकर इन धनंजयके साथ युद्ध करूँगा। मेरे सिवा दूसरा कोई मनुष्य ऐसा नहीं है जो इन्द्रके समान पराक्रमी पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ एकमात्र रथके द्वारा युद्ध कर सके ॥ २६३ ॥
तस्याहवे पौरुषं पाण्डवस्य
पृष्ठ 1902
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ब्रूयां हृष्टः समितौ क्षत्रियाणाम् ॥ २७ ॥
किं त्वं मूर्खः प्रसभं मूढचेता ममावोचः पौरुषं फाल्गुनस्य । ' मैं इस युद्धस्थलमें क्षत्रियोंके समाजमें बड़े हर्ष और उल्लासके साथ पाण्डुपुत्र अर्जुनके उत्साहका वर्णन कर सकता हूँ । तुम्हारे मनमें तो मूढ़ता भरी हुई है । तुम मूर्ख हो । फिर तुमने मुझसे अर्जुनके पुरुषार्थका हठपूर्वक वर्णन क्यों किया है? ॥ २७ ॥
अप्रियो यः पुरुषो निष्ठुरो हि क्षुद्रः क्षेप्ता क्षमिणश्चाक्षमावान् ॥ २८ ॥
हन्यामहं तादृशानां शतानि क्षमाम्यहं क्षमया कालयोगात् । 'जो अप्रिय, निष्ठुर, क्षुद्र हृदय और क्षमाशून्य मनुष्य क्षमाशील पुरुषोंकी निन्दा करता है; ऐसे सौ - सौ मनुष्योंका मैं वध कर सकता हूँ; परंतु कालयोगसे क्षमाभावद्वारा मैं यह सब कुछ सह लेता हूँ ॥ २८३ ॥
अवोचस्त्वं पाण्डवार्थेऽप्रियाणि प्रधर्षयन् मां मूढवत् पापकर्मन् ॥ २ ९ ॥ मय्यार्जवे जिह्ममतिर्हतस्त्वं मित्रद्रोही साप्तपदं हि मैत्रम् । ‘ ओ पापी! मूर्खके समान तुमने पाण्डुपुत्र अर्जुनके लिये मेरा तिरस्कार करते हुए मेरे प्रति अप्रिय वचन सुनाये हैं । मेरे प्रति सरलताका व्यवहार करना तुम्हारे लिये उचित था; परंतु तुम्हारी बुद्धिमें कुटिलता भरी हुई है, अतः तुम मित्रद्रोही होनेके कारण अपने पापसे ही मारे गये । किसीके साथ सात पग चल देने मात्रसे ही मैत्री सम्पन्न हो जाती है ( किंतु तुम्हारे मनमें उस मैत्रीका उदय नहीं हुआ ) ॥ २ ९ ३ ॥ कालस्त्वयं प्रत्युपयाति दारुणो दुर्योधनो युद्धमुपागमद् यत् ॥ ३० ॥
अस्यार्थसिद्धिं त्वभिकाङ्क्षमाण- स्तन्मन्यसे यत्र नैकान्त्यमस्ति । ‘ यह बड़ा भयंकर समय सामने आ रहा है । राजा दुर्योधन रणभूमिमें आ पहुँचा है । मैं उसके मनोरथकी सिद्धि चाहता हूँ; किंतु तुम्हारा मन उधर लगा हुआ है, जिससे उसके कार्यकी सिद्धि होनेकी कोई सम्भावना नहीं है ॥ ३०३ ॥
मित्रं मिन्देर्नन्दतेः प्रीयतेर्वा संत्रायतेर्मिनुतेर्मोदतेर्वा ॥ ३१ ॥
ब्रवीमि ते सर्वमिदं ममास्ति तच्चापि सर्वं मम वेत्ति राजा ।
पृष्ठ 1903
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
‘ मिद, नन्द, प्री, त्रा, मि अथवा मुद् धातुओंसे निपातनद्वारा मित्र शब्दकी सिद्धि होती है। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ— इन सभी धातुओंका पूरा- पूरा अर्थ मुझमें मौजूद है । राजा दुर्योधन इन सब बातोंको अच्छी तरह जानते हैं ॥ ३१ ॥
शत्रुः शदेः शासतेर्वा श्यतेर्वा शृणातेर्वा श्वसतेः सीदतेर्वा ॥ ३२ ॥
उपसर्गाद् बहुधा सूदतेश्च प्रायेण सर्वं त्वयि तच्च मह्यम् । ‘ शद्, शास्, शो, शृ, श्वस् अथवा षद् तथा नाना प्रकारके उपसर्गोंसे युक्त सूद धातुसे भी शत्रु शब्दकी सिद्धि होती है । मेरे प्रति इन सभी धातुओंका सारा तात्पर्य तुममें संघटित होता है ॥ ३२ ॥
दुर्योधनार्थे तव च प्रियार्थं यशोऽर्थमात्मार्थमपीश्वरार्थम् ॥ ३३ ॥
तस्मादहं पाण्डववासुदेवौ योत्स्ये यत्नात् कर्म तत् पश्य मेऽद्य । ' अतः मैं दुर्योधनका हित, तुम्हारा प्रिय, अपने लिये यश और प्रसन्नताकी प्राप्ति तथा परमेश्वरकी प्रीतिका सम्पादन करनेके लिये पाण्डुपुत्र अर्जुन और श्रीकृष्णके साथ
प्रयत्नपूर्वक युद्ध करूँगा । आज मेरे इस कर्मको तुम देखो ॥ ३३ ॥
अस्त्राणि पश्याद्य ममोत्तमानि ब्राह्माणि दिव्यान्यथ मानुषाणि ॥ ३४ ॥
आसादयिष्याम्यहमुग्रवीर्यं द्विपो द्विपं मत्तमिवातिमत्तः । ‘ आज मेरे उत्तम ब्रह्मास्त्र, दिव्यास्त्र और मानुषास्त्रोंकी देखो । मैं इनके द्वारा भयंकर पराक्रमी अर्जुनके साथ उसी प्रकार युद्ध करूँगा, जैसे कोई अत्यन्त मतवाला हाथी दूसरे मतवाले हाथीके साथ भिड़ जाता है ॥ ३४ ॥
अस्त्रं ब्राह्मं मनसा युध्यजेयं क्षेप्स्ये पार्थायाप्रमेयं जयाय । तेनापि मे नैव मुच्येत युद्धे न चेत् पतेद् विषमे मेऽद्य चक्रम् ॥ ३५ ॥
' मैं युद्धमें अजेय तथा असीम शक्तिशाली ब्रह्मास्त्रका मन- ही - मन स्मरण करके अपनी विजयके लिये अर्जुनपर प्रहार करूँगा । यदि मेरे रथका पहिया किसी विषम स्थानमें न फँस जाय तो उस अस्त्रसे अर्जुन रणभूमिमें जीवित नहीं छूट सकते ॥ ३५ ॥
वैवस्वताद् दण्डहस्तावरुणाद् वापि पाशिनः ।
पृष्ठ 1904
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
सगदाद् वा धनपतेः सवज्राद् वापि वासवात् ॥ ३६ ॥
अन्यस्मादपि कस्माच्चिदमित्रादाततायिनः ।
इति शल्य विजानीहि यथा नाहं बिभेम्यतः ॥
तस्मान्न मे भयं पार्थान्नापि चैव जनार्दनात् ॥ ३७ ॥
सह युद्धं हि मे ताभ्यां साम्पराये भविष्यति । ' शल्य! मैं दण्डधारी सूर्यपुत्र यमराजसे, पाशधारी वरुणसे, गदा हाथमें लिये हुए कुबेरसे, वज्रधारी इन्द्रसे अथवा दूसरे किसी आततायी शत्रुसे भी कभी नहीं डरता । इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो । इसीलिये मुझे अर्जुन और श्रीकृष्णसे भी कोई भय नहीं है । उन दोनोंके साथ रणक्षेत्रमें मेरा युद्ध अवश्य होगा ॥ ३६-३७३ ॥ कदाचित् विजयस्याहमस्त्रहेतोरटन्नृप ॥ ३८ ॥
अज्ञानाद्धि क्षिपन् बाणान् घोररूपान् भयानकान् ।
होमधेन्वा वत्समस्य प्रमत्त इषुणाहनम् ॥ ३ ९ ॥
‘ नरेश्वर! एक समयकी बात है, मैं शस्त्रोंके अभ्यासके लिये विजय नामक एक ब्राह्मणके आश्रमके आसपास विचरण कर रहा था। उस समय घोर एवं भयंकर बाण चलाते हुए मैंने अनजानमें ही असावधानीके कारण उस ब्राह्मणकी होमधेनुके बछड़ेको एक बाणसे मार डाला ॥ ३८-३९ ॥
चरन्तं विजने शल्य ततोऽनुव्याजहार माम् ।
यस्मात् त्वया प्रमत्तेन होमधेन्वा हतः सुतः ॥ ४० ॥
श्वभ्रे ते पततां चक्रमिति मां ब्राह्मणोऽब्रवीत् ।
युध्यमानस्य संग्रामे प्राप्तस्यैकायनं भयम् ॥ ४१ ॥
‘ शल्य! तब उस ब्राह्मणने एकान्तमें घूमते हुए मुझसे आकर कहा -' तुमने प्रमादवश मेरी होमधेनुके बछड़ेको मार डाला है । इसलिये तुम जिस समय रणक्षेत्रमें युद्ध करते - करते अत्यन्त भयको प्राप्त होओ उसी समय तुम्हारे रथका पहिया गड्ढेमें गिर जाय ' ॥
तस्माद् बिभेमि बलवद् ब्राह्मणव्याहृतादहम् ।
एते हि सोमराजान ईश्वराः सुखदुःखयोः ॥ ४२ ॥
पृष्ठ 1905
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Milea ‘ ब्राह्मणके उस शापसे मुझे अधिक भय हो रहा है । ये ब्राह्मण, जिनके राजा चन्द्रमा हैं, अपने शाप या वरदानद्वारा दूसरोंको दुःख एवं सुख देनेमें समर्थ हैं ॥
अदां तस्मै गोसहस्रं बलीवर्गांश्च षट्शतान् ।
प्रसादं न लभे शल्य ब्राह्मणान्मद्रकेश्वर ॥ ४३ ॥
‘ मद्रराज शल्य! मैं ब्राह्मणको एक हजार गौएँ और छः सौ बैल दे रहा था; परंतु उससे उसका कृपाप्रसाद न प्राप्त कर सका ॥ ४३ ॥
ईषादन्तान् सप्तशतान् दासीदासशतानि च ।
ददतो द्विजमुख्यो मे प्रसादं न चकार सः ॥ ४४ ॥
‘ हलदण्डके समान दाँतोंवाले सात सौ हाथी और सैकड़ों दास-दासियोंके देनेपर भी उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने मुझपर कृपा नहीं की ॥ ४४ ॥
कृष्णानां श्वेतवत्सानां सहस्राणि चतुर्दश ।
आहरं न लभे तस्मात् प्रसादं द्विजसत्तमात् ॥ ४५ ॥
‘ श्वेत बछड़ेवाली चौदह हजार काली गौएँ मैं उसे देनेके लिये ले आया तो भी उस श्रेष्ठ ब्राह्मणसे अनुग्रह न पा सका ॥ ४५ ॥
पृष्ठ 1906
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ऋद्धं गृहं सर्वकामैर्यच्च मे वसु किंचन ।
तत् सर्वमस्मै सत्कृत्य प्रयच्छामि न चेच्छति ॥ ४६ ॥
‘ मैं सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न समृद्धिशाली घर और जो कुछ भी धन मेरे पास था, वह सब उस ब्राह्मणको सत्कारपूर्वक देने लगा; परंतु उसने कुछ भी लेनेकी इच्छा नहीं की ॥ ४६ ॥
ततोऽब्रवीन्मां याचन्तमपराधं प्रयत्नतः ।
व्याहृतं यन्मया सूत तत् तथा न तदन्यथा ॥ ४७ ॥
‘उस समय मैं प्रयत्नपूर्वक अपने अपराधके लिये क्षमायाचना करने लगा । तब ब्राह्मणने कहा — ‘ सूत! मैंने जो कह दिया, वह वैसा ही होकर रहेगा । वह पलट नहीं सकता ॥ ४७ ॥
अनृतोक्तं प्रजां हन्यात् ततः पापमवाप्नुयाम् ।
तस्माद् धर्माभिरक्षार्थं नानृतं वक्तुमुत्सहे ॥ ४८ ॥
‘ असत्य भाषण प्रजाका नाश कर देता है, अतः मैं झूठ बोलनेसे पापका भागी होऊँगा; इसीलिये धर्मकी रक्षाके उद्देश्यसे मैं मिथ्या भाषण नहीं कर सकता ॥ ४८ ॥
मा त्वं ब्रह्मगतिं हिंस्याः प्रायश्चित्तं कृतं त्वया ।
मद्वाक्यं नानृतं लोके कश्चित् कुर्यात् समाप्नुहि ॥ ४ ९ ॥
' तुम ( लोभ देकर) ब्राह्मणकी उत्तम गतिका विनाश न करो । तुमने पश्चात्ताप और दानद्वारा उस वत्सवधका प्रायश्चित्त कर लिया । जगत्में कोई भी मेरे कहे हुए वचनको मिथ्या नहीं कर सकता; इसलिये मेरा शाप तुझे प्राप्त होगा ही ' ॥ ४ ९ ॥
इत्येतत्ते मया प्रोक्तं क्षिप्तेनापि सुहृत्तया ।
जानामि त्वां विक्षिपन्तं जोषमास्स्वोत्तरं शृणु ॥ ५० ॥
‘ मद्रराज! यद्यपि तुमने मुझपर आक्षेप किये हैं, तथापि सुहृद् होनेके नाते मैंने तुमसे ये सारी बातें कह दी हैं । मैं जानता हूँ, तुम अब भी निन्दा करनेसे बाज न आओगे, तो भी कहता हूँ कि चुप होकर बैठो और अबसे जो कुछ कहूँ, उसे सुनो ' ॥ ५० ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ४२ ॥
3 - मिद् आदि धातुओंका अर्थ क्रमशः स्नेह, आनन्द, प्रीणन ( तृप्त करना ), प्राण ( रक्षा ), सस्नेह दर्शन और आमोद है । २ - शद् आदि धातुओंका अर्थ क्रमशः इस प्रकार है - शातन ( काटना या छेदना ), शासन करना, तनूकरण ( क्षीण कर देना ), हिंसा करना, अवसादन (शिथिल करना ) और निषूदन ( वध) ।
पृष्ठ 1907
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः कर्णका आत्मप्रशंसापूर्वक शल्यको फटकारना संजय उवाच
ततः पुनर्महाराज मद्रराजमरिंदमः ।
अभ्यभाषत राधेयः संनिवार्योत्तरं वचः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं - महाराज! तदनन्तर शत्रुओंका दमन करनेवाले राधापुत्र कर्णने शल्यको रोककर पुनः उनसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
यत् त्वं निदर्शनार्थं मां शल्य जल्पितवानसि ।
नाहं शक्यस्त्वया वाचा बिभीषयितुमाहवे ॥ २ ॥
' शल्य! तुमने दृष्टान्तके लिये मेरे प्रति जो वाग्जाल फैलाया है उसके उत्तरमें निवेदन है कि तुम इस युद्धस्थलमें मुझे अपनी बातोंसे नहीं डरा सकते ॥ २ ॥
यदि मां देवताः सर्वा योधयेयुः सवासवाः ।
तथापि मे भयं न स्यात् किमु पार्थात् सकेशवात् ॥ ३ ॥
‘ यदि इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता मुझसे युद्ध करने लगें तो भी मुझे उनसे कोई भय नहीं होगा। फिर श्रीकृष्णसहित अर्जुनसे क्या भय हो सकता है ॥ ३ ॥
नाहं भीषयितुं शक्यो वाङ्मात्रेण कथंचन ।
अन्यं जानीहि यः शक्यस्त्वया भीषयितुं रणे ॥ ४ ॥
' मुझे केवल बातोंसे किसी प्रकार भी डराया नहीं जा सकता, जिसे तुम रणभूमिमें डरा सको, ऐसे किसी दूसरे ही पुरुषका पता लगाओ ॥ ४ ॥
नीचस्य बलमेतावत् पारुष्यं यत्त्वमात्थ माम् ।
अशक्तो मद्गुणान् वक्तुं वल्गसे बहु दुर्मते ॥ ५ ॥
‘ तुमने मेरे प्रति जो कटु वचन कहा है, इतना ही नीच पुरुषका बल है । दुर्बुद्धे! तुम मेरे गुणोंका वर्णन करनेमें असमर्थ होकर बहुत- सी ऊटपटांग बातें बकते जा रहे हो ॥ ५ ॥
न हि कर्णः समुद्भूतो भयार्थमिह मद्रक ।
विक्रमार्थमहं जातो यशोऽर्थं च तथाऽऽत्मनः ॥ ६ ॥
‘ मद्रनिवासी शल्य! कर्ण इस संसारमें भयभीत होनेके लिये नहीं पैदा हुआ है । मैं तो पराक्रम प्रकट करने और अपने यशको फैलानेके लिये ही उत्पन्न हुआ हूँ ॥ ६ ॥
सखिभावेन सौहार्दान्मित्रभावेन चैव हि ।
कारणैस्त्रिभिरेतैस्त्वं शल्य जीवसि साम्प्रतम् ॥ ७ ॥
‘ शल्य! एक तो तुम सारथि बनकर मेरे सखा हो गये हो, दूसरे सौहार्दवश मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया है और तीसरे मित्र दुर्योधनकी अभीष्टसिद्धिका मेरे मनमें विचार है — इन्हीं
पृष्ठ 1908
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तीन कारणोंसे तुम अबतक जीवित हो ॥ ७ ॥
राज्ञश्च धार्तराष्ट्रस्य कार्यं सुमहदुद्यतम् ।
मयि तच्चाहितं शल्य तेन जीवसि मे क्षणम् ॥ ८ ॥
‘ राजा दुर्योधनका महान् कार्य उपस्थित हुआ है और उसका सारा भार मुझपर रखा गया है । शल्य! इसीलिये तुम क्षणभर भी जीवित हो ॥ ८ ॥
कृतश्च समयः पूर्वं क्षन्तव्यं विप्रियं तव ।
ऋते शल्यसहस्रेण विजयेयमहं परान् ।
मित्रद्रोहस्तु पापीयानिति जीवसि साम्प्रतम् ॥ ९ ॥
‘ इसके सिवा, मैंने पहले ही यह शर्त कर दी है कि तुम्हारे अप्रिय वचनोंको क्षमा करूँगा । वैसे तो हजारों शल्य न रहें तो भी मैं शत्रुओं पर विजय पा सकता हूँ; परंतु मित्रद्रोह महान् पाप है, इसीलिये तुम अबतक जीवित हो ' ॥ इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥
OF FUTE
पृष्ठ 1909
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः कर्णके द्वारा मद्र आदि बाहीक देशवासियोंकी निन्दा शल्य उवाच
ननु प्रलापाः कर्णेते यान् ब्रवीषि परान् प्रति ।
ऋते कर्णसहस्रेण शक्या जेतुं परे युधि ॥ १ ॥
शल्य बोले- कर्ण! तुम दूसरोंके प्रति जो आक्षेप करते हो, ये तुम्हारे प्रलापमात्र हैं । तुम- जैसे हजारों कर्ण न रहें तो भी युद्धस्थलमें शत्रुओंपर विजय पायी जा सकती है ॥ १ ॥
संजय उवाच
तथा ब्रुवन्तं परुषं कर्णो मद्राधिपं तदा ।
परुषं द्विगुणं भूयः प्रोवाचाप्रियदर्शनम् ॥ २ ॥
संजय कहते हैं — राजन्! ऐसी कठोर बात बोलते हुए मद्रराज शल्यसे कर्णने पुनः दूनी कठोरता लिये अप्रिय वचन कहना आरम्भ किया ॥ २ ॥
कर्णउवाच
इदं तु ते त्वमेकाग्रः शृणु मद्रजनाधिप ।
संनिधौ धृतराष्ट्रस्य प्रोच्यमानं मया श्रुतम् ॥ ३ ॥
कर्ण बोला- मद्रनरेश! तुम एकाग्रचित्त होकर मेरी ये बातें सुनो । राजा धृतराष्ट्रके समीप कही जाती हुई इन सब बातोंको मैंने सुना था ॥ ३ ॥
देशांश्च विविधांश्चित्रान् पूर्ववृत्तांश्च पार्थिवान् ।
ब्राह्मणाः कथयन्ति स्म धृतराष्ट्रनिवेशने ॥ ४ ॥
एक दिन महाराज धृतराष्ट्रके घरमें बहुत - से ब्राह्मण आ - आकर नाना प्रकारके विचित्र देशों तथा पूर्ववर्ती भूपालोंके वृत्तान्त सुना रहे थे ॥ ४ ॥
तत्र वृद्धः पुरावृत्ताः कथाः कश्चिद् द्विजोत्तमः ।
वाहीकदेशं मद्रांश्च कुत्सयन् वाक्यमब्रवीत् ॥ ५ ॥
वहीं किसी वृद्ध एवं श्रेष्ठ ब्राह्मणने बाहीक और मद्रदेशकी निन्दा करते हुए वहाँकी पूर्वघटित बातें कही थीं— ॥ ५ ॥
बहिष्कृता हिमवता गङ्गया च बहिष्कृताः ।
सरस्वत्या यमुनया कुरुक्षेत्रेण चापि ये ॥ ६ ॥
पञ्चानां सिन्धुषष्ठानां नदीनां येऽन्तराश्रिताः ।
तान् धर्मबाह्यानशुचीन् वाहीकानपि वर्जयेत् ॥ ७ ॥
पृष्ठ 1910
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
‘ जो प्रदेश हिमालय, गंगा, सरस्वती, यमुना और कुरुक्षेत्रकी सीमासे बाहर हैं तथा जो सतलज, व्यास, रावी, चिनाव और झेलम-इन पाँचों एवं छठी सिंधु नदीके बीचमें स्थित हैं, उन्हें बाहीक कहते हैं । वे धर्मबाह्य और अपवित्र हैं । उन्हें त्याग देना चाहिये ॥
गोवर्धनो नाम वटः सुभद्रं नाम चत्वरम् ।
एतद् राजकुलद्वारमाकुमारात् स्मराम्यहम् ॥ ८ ॥
‘ गोवर्धन नामक वटवृक्ष और सुभद्र नामक चबूतरा – ये दोनों वहाँके राजभवनके द्वारपर स्थित हैं, जिन्हें मैं बचपनसे ही भूल नहीं पाता हूँ ॥ ८ ॥
कार्येणात्यर्थगूढेन वाहीकेपूषितं मया ।
तत एषां समाचारः संवासाद् विदितो मम ॥ ९ ॥
' मैं अत्यन्त गुप्त कार्यवश कुछ दिनोंतक बाहीक देशमें रहा था । इससे वहाँके निवासियोंके सम्पर्कमें आकर मैंने उनके आचार- व्यवहारकी बहुत - सी बातें जान ली थीं ॥ ९ ॥
शाकलं नाम नगरमापगा नाम निम्नगा ।
जर्तिका नाम वाहीकास्तेषां वृत्तं सुनिन्दितम् ॥ १० ॥
‘ वहाँ शाकल नामक एक नगर और आपगा नामकी एक नदी है, जहाँ जर्तिक नामवाले
बाहीक निवास करते हैं । उनका चरित्र अत्यन्त निन्दित है ॥ १० ॥
धाना गौड्यासवं पीत्वा गोमांसं लशुनैः सह ।
अपूपमांसवाट्यानामाशिनः शीलवर्जिताः ॥ ११ ॥
' वे भुने हुए जौ और लहसुनके साथ गोमांस खाते और गुड़से बनी हुई मदिरा पीकर मतवाले बने रहते हैं । पुआ, मांस और वाटी खानेवाले बाहीकदेशके लोग शील और आचारसे शून्य हैं ॥ ११ ॥
गायन्त्यथ च नृत्यन्ति स्त्रियो मत्ता विवाससः ।
नगरागारवप्रेषु बहिर्माल्यानुलेपनाः ॥ १२ ॥
‘ वहाँकी स्त्रियाँ बाहर दिखायी देनेवाली माला और अंगराग धारण करके मतवाली तथा नंगी होकर नगर एवं घरोंकी चहारदिवारियोंके पास गाती और नाचती हैं ॥ १२ ॥
मत्तावगीतैर्विविधैः खरोष्ट्रनिनदोपमैः ।
अनावृता मैथुने ताः कामचाराश्च सर्वशः ॥ १३ ॥
' वे गदहोंके रेंकने और ऊँटोंके बलबलानेकी - सी आवाजसे मतवालेपनमें ही भाँति-भाँतिके गीत गाती हैं और मैथुनकालमें भी परदेके भीतर नहीं रहती हैं । वे सब - की - सब सर्वथा स्वेच्छाचारिणी होती हैं ॥ १३ ॥
आहुरन्योन्यसूक्तानि प्रब्रुवाणा मदोत्कटाः ।
हे ते हे हतेत्येवं स्वामिभर्तृहतेति च ॥ १४ ॥
आक्रोशन्त्यः प्रनृत्यन्ति व्रात्या पर्वस्वसंयताः ।