04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 2751–2760

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2751–2760

पृष्ठ 2751

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वायुभक्षा जलाहाराः पर्णभक्षाश्च तापसाः ।

नानानियमयुक्ताश्च तथा स्थण्डिलशायिनः ॥ ४ ९ ॥

आसन् वै मुनयस्तत्र सरस्वत्याः समीपतः ।

शोभयन्तः सरिच्छ्रेष्ठां गङ्गामिव दिवौकसः ॥ ५० ॥

महाराज! सरस्वतीके उस निकटवर्ती तटपर सुप्रसिद्ध तपस्वी वालखिल्य, अश्मकुट्ट, दन्तोलूखली, प्रसंख्यान, हवा पीकर रहनेवाले, जलपानपर ही निर्वाह करनेवाले, पत्तोंका ही आहार करनेवाले, भाँति- भाँतिके नियमोंमें संलग्न तथा वेदीपर शयन करनेवाले तपस्वीमुनि विराजमान थे । वे सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीकी उसी प्रकार शोभा बढ़ा रहे थे, जैसे देवतालोग गंगाजीकी ॥ ४८- ५० ॥

शतशश्च समापेतुर्ऋषयः सत्रयाजिनः ।

तेऽवकाशं न ददृशुः सरस्वत्या महाव्रताः ॥ ५१ ॥

सत्रयागमें सम्मिलित हुए सैकड़ों महान् व्रतधारी ऋषि वहाँ आये थे; परंतु उन्होंने सरस्वतीके तटपर अपने रहनेके लिये स्थान नहीं देखा ॥ ५१ ॥

ततो यज्ञोपवीतैस्ते तत्तीर्थं निर्मिमाय वै ।

जुहुवुश्चाग्निहोत्रांश्च चक्रुश्च विविधाः क्रियाः ॥ ५२ ॥

तब उन्होंने यज्ञोपवीतसे उस तीर्थका निर्माण करके वहाँ अग्निहोत्रसम्बन्धी आहुतियाँ दीं और नाना प्रकारके कर्मोंका अनुष्ठान किया ॥ ५२ ॥

ततस्तमृषिसंघातं निराशं चिन्तयान्वितम् ।

दर्शयामास राजेन्द्र तेषामर्थे सरस्वती ॥ ५३ ॥

राजेन्द्र! उस समय उस ऋषिसमूहको निराश और चिन्तित जान सरस्वतीने उनकी अभीष्ट - सिद्धिके लिये उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया ॥ ५३ ॥

ततः कुञ्जान् बहून् कृत्वा संनिवृत्ता सरस्वती ।

ऋषीणां पुण्यतपसां कारुण्याज्जनमेजय ॥ ५४ ॥

जनमेजय! तत्पश्चात् बहुत- से कुंजोंका निर्माण करती हुई सरस्वती पीछे लौट पड़ीं; क्योंकि उन पुण्यतपस्वी ऋषियोंपर उनके हृदयमें करुणाका संचार हो आया था ॥ ५४ ॥

ततो निवृत्य राजेन्द्र तेषामर्थे सरस्वती ।

भूयः प्रतीच्यभिमुखी प्रसुस्राव सरिद्वरा ॥ ५५ ॥

राजेन्द्र! उनके लिये लौटकर सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती पुनः पश्चिमकी ओर मुड़कर बहने लगीं ॥ ५५ । |

अमोघागमनं कृत्वा तेषां भूयो व्रजाम्यहम् ।

इत्यद्भुतं महच्चक्रे तदा राजन् महानदी ॥ ५६ ॥

पृष्ठ 2752

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राजन्! उस महानदीने यह सोच लिया था कि मैं इन ऋषियोंके आगमनको सफल बनाकर पुनः पश्चिम मार्गसे ही लौट जाऊँगी। यह सोचकर ही उसने वह महान् अद्भुत कर्म किया ॥ ५६ ॥

एवं स कुञ्जो राजन् वै नैमिषीय इति स्मृतः ।

कुरुश्रेष्ठ कुरुक्षेत्रे कुरुष्व महतीं क्रियाम् ॥ ५७ ॥

नरेश्वर! इस प्रकार वह कुंज नैमिषीय नामसे प्रसिद्ध हुआ । कुरुश्रेष्ठ! तुम भी कुरुक्षेत्रमें महान् कर्म करो ॥ ५७ ॥

तत्र कुञ्जान् बहून् दृष्ट्वा निवृत्तां च सरस्वतीम् ।

बभूव विस्मयस्तत्र रामस्याथ महात्मनः ॥ ५८ ॥

वहाँ बहुत- से कुंजों तथा लौटी हुई सरस्वतीका दर्शन करके महात्मा बलरामजीको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ५८ ॥

उपस्पृश्य तु तत्रापि विधिवद् यदुनन्दनः ।

दत्त्वा दायान् द्विजातिभ्यो भाण्डानि विविधानि च ॥ ५ ९ ॥

भक्ष्यं भोज्यं च विविधं ब्राह्मणेभ्यः प्रदाय च ।

ततः प्रायाद् बलो राजन् पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥ ६० ॥

यदुनन्दन बलरामने वहाँ विधिपूर्वक स्नान और आचमन करके ब्राह्मणोंको धन और भाँति- भाँतिके बर्तन दान किये । राजन्! फिर उन्हें नाना प्रकारके भक्ष्य - भोज्य पदार्थ देकर द्विजातियोंद्वारा पूजित होते हुए बलरामजी वहाँसे चल दिये ॥ ५ ९-६० ॥

सरस्वतीतीर्थवरं नानाद्विजगणायुतम् ।

बदरेङ्गुदकाश्मर्यप्लक्षाश्वत्थविभीतकैः ॥ ६१ ॥

कङ्कोलैश्च पलाशैश्च करीरैः पीलुभिस्तथा ।

सरस्वतीतीर्थरुहैस्तरुभिर्विविधैस्तथा ॥ ६२ ॥

करूषकवरैश्चैव बिल्वैराम्रातकैस्तथा ।

अतिमुक्तकषण्डैश्च पारिजातैश्च शोभितम् ॥ ६३ ॥

कदलीवनभूयिष्ठं दृष्टिकान्तं मनोहरम् ।

वाय्वम्बुनफलपर्णादैर्दन्तोलूखलिकैरपि ॥ ६४ ॥

तथाश्मकुट्टैर्वानेयैर्मुनिभिर्बहुभिर्वृतम् ।

स्वाध्यायघोषसंघुष्टं मृगयूथशताकुलम् ॥ ६५ ॥

अहिंस्रैर्धर्मपरमैर्नृभिरत्यर्थसेवितम् ।

सप्तसारस्वतं तीर्थमाजगाम हलायुधः ॥ ६६ ॥

यत्र मङ्कणकः सिद्धस्तपस्तेपे महामुनिः ॥ ६७ ॥

तदनन्तर हलायुध बलदेवजी सप्तसारस्वत नामक तीर्थमें आये जो सरस्वतीके तीर्थोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं । वहाँ अनेकानेक ब्राह्मणोंके समुदाय निवास करते थे । वेर, इंगुद, काश्मर्य

पृष्ठ 2753

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( गम्भारी ), पाकर, पीपल, बहेड़े, कंकोल, पलाश, करीर, पीलु, करूष, बिल्व, अमड़ा, अतिमुक्त, पारिजात तथा सरस्वतीके तटपर उगे हुए अन्य नाना प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित वह तीर्थ देखनेमें कमनीय और मनको मोह लेनेवाला है । वहाँ केलेके बहुत - से बगीचे हैं । उस तीर्थमें वायु, जल, फल और पत्ते चबाकर रहनेवाले, दाँतोंसे ही ओखलीका काम लेनेवाले और पत्थरसे फोड़े हुए फल खानेवाले बहुतेरे वानप्रस्थ मुनि भरे हुए थे । वहाँ वेदोंके स्वाध्यायकी गम्भीर ध्वनि गूँज रही थी । मृगोंके सैकड़ों यूथ सब ओर फैले हुए थे । हिंसारहित धर्मपरायण मनुष्य उस तीर्थका अधिक सेवन करते थे । वहीं सिद्ध महामुनि मंकणकने बड़ी भारी तपस्या की थी ॥ ६१–६७ ॥ इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥

3. पत्थरसे फोड़े हुए फलका भोजन करनेवाले । २. दाँतसे ही ओखलीका काम लेनेवाले अर्थात् ओखलीमें कूटकर नहीं, दाँतोंसे ही चबाकर खानेवाले । ३. गिने हुए फल खानेवाले ।

पृष्ठ 2754

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अष्टात्रिंशोऽध्यायः सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, महिमा और मंकणक मुनिका चरित्र जनमेजय उवाच

सप्तसारस्वतं कस्मात् कश्च मङ्कणको मुनिः ।

कथंसिद्धः स भगवान् कश्चास्य नियमोऽभवत् ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा- विप्रवर! सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति किस हेतुसे हुई? पूजनीय मंकणक मुनि कौन थे? कैसे उन्हें सिद्धि प्राप्त हुई और उनका नियम क्या था? ॥ १ ॥

कस्य वंशे समुत्पन्नः किं चाधीतं द्विजोत्तम ।

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विधिवद् द्विजसत्तम ॥ २ ॥

द्विजश्रेष्ठ! वे किसके वंशमें उत्पन्न हुए थे और उन्होंने किस शास्त्रका अध्ययन किया था? यह सब मैं विधिपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

राजन् सप्त सरस्वत्यो याभिर्व्याप्तमिदं जगत् ।

आहूता बलवद्भिर्हि तत्र तत्र सरस्वती ॥ ३ ॥

वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! सरस्वती नामकी सात नदियाँ और हैं, जो इस सारे जगत्में फैली हुई हैं । तपोबलसम्पन्न महात्माओंने जहाँ -जहाँ सरस्वतीका आवाहन किया है, वहाँ -वहाँ वे गयी हैं ॥ ३ ॥

सुप्रभा काञ्चनाक्षी च विशाला च मनोरमा ।

सरस्वती चौघवती सुरेणुर्विमलोदका ॥ ४ ॥

उन सबके नाम इस प्रकार हैं- सुप्रभा, कांचनाक्षी, विशाला, मनोरमा, सरस्वती, ओघवती, सुरेणु और विमलोदका ॥ ४ ॥

पितामहस्य महतो वर्तमाने महामखे ।

वितते यज्ञवाटे च संसिद्धेषु द्विजातिषु ॥ ५ ॥

पुण्याहघोषैर्विमलैर्वेदानां निनदैस्तथा ।

देवेषु चैव व्यग्रेषु तस्मिन् यज्ञविधौ तदा ॥ ६ ॥

एक समयकी बात है, पुष्करतीर्थमें महात्मा ब्रह्माजीका एक महान् यज्ञ हो रहा था । उनकी विस्तृत यज्ञशालामें सिद्ध ब्राह्मण विराजमान थे । पुण्याहवाचनके निर्दोष घोष तथा वेदमन्त्रोंकी ध्वनिसे सारा यज्ञमण्डप गूँज रहा था और सम्पूर्ण देवता उस यज्ञ - कर्मके सम्पादनमें व्यस्त थे ॥ ५-६ ॥

पृष्ठ 2755

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तत्र चैव महाराज दीक्षिते प्रपितामहे ।

यजतस्तस्य सत्रेण सर्वकामसमृद्धिना ॥ ७ ॥

महाराज! साक्षात् ब्रह्माजीने उस यज्ञकी दीक्षा ली थी । उनके यज्ञ करते समय सबकी समस्त इच्छाएँ उस यज्ञद्वारा परिपूर्ण होती थीं ॥ ७ ॥

मनसा चिन्तिता ह्यर्था धर्मार्थकुशलैस्तदा ।

उपतिष्ठन्ति राजेन्द्र द्विजातींस्तत्र तत्र ह ॥ ८ ॥

राजेन्द्र! धर्म और अर्थमें कुशल मनुष्य मनमें जिन पदार्थोंका चिन्तन करते थे, वे उनके पास वहाँ तत्काल उपस्थित हो जाते थे ॥ ८ ॥

जगुश्च तत्र गन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।

वादित्राणि च दिव्यानि वादयामासुरञ्जसा ॥ ९ ॥

उस यज्ञमें गन्धर्व गीत गाते और अप्सराएँ नृत्य करती थीं । वहाँ दिव्य बाजे बजाये जा रहे थे ॥ ९ ॥

तस्य यज्ञस्य सम्पत्त्या तुतुषुर्देवता अपि ।

विस्मयं परमं जग्मुः किमु मानुषयोनयः ॥ १० ॥

उस यज्ञके वैभवसे देवता भी संतुष्ट थे और अत्यन्त आश्चर्यमें निमग्न हो रहे थे; फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? ॥ १० ॥

वर्तमाने तथा यज्ञे पुष्करस्थे पितामहे ।

अब्रुवन्नृषयो राजन्नायं यज्ञो महागुणः ॥ ११ ॥

न दृश्यते सरिच्छ्रेष्ठा यस्मादिह सरस्वती । राजन्! इस प्रकार जब पितामह ब्रह्मा पुष्करमें रहकर यज्ञ कर रहे थे, उस समय ऋषियोंने उनसे कहा- ' भगवन्! आपका यह यज्ञ अभी महान् गुणसे सम्पन्न नहीं है; क्योंकि यहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती नहीं दिखायी देती हैं' ॥ ११३ ॥

तच्छ्रुत्वा भगवान् प्रीतः सस्माराथ सरस्वतीम् ॥ १२ ॥

पितामहेन यजता आहूता पुष्करेषु वै । यह सुनकर भगवान् ब्रह्माने प्रसन्नतापूर्वक सरस्वती देवीकी आराधना करके पुष्करमें यज्ञ करते समय उनका आवाहन किया ॥ १२३ ॥

सुप्रभा नाम राजेन्द्र नाम्ना तत्र सरस्वती ॥ १३ ॥

तां दृष्ट्वा मुनयस्तुष्टास्त्वरायुक्तां सरस्वतीम् ।

पितामहं मानयन्तीं क्रतुं ते बहु मेनिरे ॥ १४ ॥

राजेन्द्र! तब वहाँ सरस्वती सुप्रभा नामसे प्रकट हुईं । बड़ी उतावलीके साथ आकर ब्रह्माजीका सम्मान करती हुई सरस्वतीका दर्शन करके ऋषिगण बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उस यज्ञको बहुत सम्मान दिया ॥ एवमेषा सरिच्छ्रेष्ठा पुष्करेषु सरस्वती ।

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पितामहार्थं सम्भूता तुष्ट्यर्थं च मनीषिणाम् ॥ १५ ॥

इस प्रकार सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती पुष्करतीर्थमें ब्रह्माजी तथा मनीषी महात्माओंके संतोषके लिये प्रकट हुईं ॥ १५ ॥

नैमिषे मुनयो राजन् समागम्य समासते ।

तत्र चित्राः कथा ह्यासन् वेदं प्रति जनेश्वर ॥ १६ ॥

राजन्! जनेश्वर! नैमिषारण्यमें बहुत -से मुनि आकर रहते थे । वहाँ वेदके विषयमें विचित्र कथा- वार्ता होती रहती थी ॥ १६ ॥

यत्र ते मुनयो ह्यासन् नानास्वाध्यायवेदिनः ।

ते समागम्य मुनयः सस्मरुर्वै सरस्वतीम् ॥ १७ ॥

जहाँ वे नाना प्रकारके स्वाध्यायोंका ज्ञान रखनेवाले मुनि रहते थे, वहीं उन्होंने परस्पर मिलकर सरस्वती देवीका स्मरण किया ॥ १७ ॥

सा तु ध्याता महाराज ऋषिभः सत्रयाजिभिः ।

समागतानां राजेन्द्र साहाय्यार्थं महात्मनाम् ॥ १८ ॥

आजगाम महाभागा तत्र पुण्या सरस्वती । महाराज! राजाधिराज! उन सत्रयाजी ( ज्ञानयज्ञ करनेवाले ) ऋषियोंके ध्यान लगानेपर महाभागा पुण्यसलिला सरस्वतीदेवी उन समागत महात्माओंकी सहायताके लिये वहाँ आयीं ॥ १८३ ॥

नैमिषे काञ्चनाक्षी तु मुनीनां सत्रयाजिनाम् ॥ १ ९ ॥ आगता सरितां श्रेष्ठा तत्र भारत पूजिता । भारत! नैमिषारण्यतीर्थमें उन सत्रयाजी मुनियोंके समक्ष आयी हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती कांचनाक्षी नामसे सम्मानित हुईं ॥ १ ९ ॥ गयस्य यजमानस्य गयेष्वेव महाक्रतुम् ॥ २० ॥

आहूता सरितां श्रेष्ठा गययज्ञे सरस्वती ।

विशालां तु गयस्याहुरृषयः संशितव्रताः ॥ २१ ॥

राजा गय गयदेशमें ही एक महान् यज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे । उनके यज्ञमें भी सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीका आवाहन किया गया था। कठोर व्रतका पालन करनेवाले महर्षि गयके यज्ञमें आयी हुई सरस्वतीको विशाला कहते हैं ॥ २०-२१ ॥

सरित् सा हिमवत्पार्श्वात् प्रस्रुता शीघ्रगामिनी ।

औद्दालकेस्तथा यज्ञे यजतस्तस्य भारत ॥ २२ ॥

भरतनन्दन! यज्ञपरायण उद्दालक ऋषिके यज्ञमें भी सरस्वतीका आवाहन किया गया ।

वे शीघ्रगामिनी सरस्वती हिमालयसे निकलकर उस यज्ञमें आयी थीं ॥

समेते सर्वतः स्फीते मुनीनां मण्डले तदा ।

उत्तरे कोसलाभागे पुण्ये राजन् महात्मना ॥ २३ ॥

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उद्दालकेन यजता पूर्वं ध्याता सरस्वती ।

आजगाम सरिच्छ्रेष्ठा तं देशं मुनिकारणात् ॥ २४ ॥

राजन्! उन दिनों समृद्धिशाली एवं पुण्यमय उत्तर कोसल प्रान्तमें सब ओरसे मुनिमण्डली एकत्र हुई थी । उसमें यज्ञ करते हुए महात्मा उद्दालकने पूर्वकालमें सरस्वती देवीका ध्यान किया । तब मुनिका कार्य सिद्ध करनेके लिये सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती उस देशमें आयीं ॥ २३-२४ ॥

पूज्यमाना मुनिगणैर्वल्कलाजिनसंवृतैः ।

मनोरमेति विख्याता सा हि तैर्मनसा कृता ॥ २५ ॥

वहाँ वल्कल और मृगचर्मधारी मुनियोंसे पूजित होनेवाली सरस्वतीका नाम हुआ मनोरमा; क्योंकि उन्होंने मनके द्वारा उनका चिन्तन किया था ॥ २५ ॥

सुरेणुऋषभे द्वीपे पुण्ये राजर्षिसेविते ।

कुरोश्च यजमानस्य कुरुक्षेत्रे महात्मनः ॥ २६ ॥

आजगाम महाभागा सरिच्छ्रेष्ठा सरस्वती । राजर्षियोंसे सेवित पुण्यमय ऋषभद्वीप तथा कुरुक्षेत्रमें जब महात्मा राजा कुरु यज्ञ कर रहे थे, उस समय सरिताओंमें श्रेष्ठ महाभागा सरस्वती वहाँ आयी थीं; उनका नाम हुआ सुरेणु ॥ २६ ॥

ओघवत्यपि राजेन्द्र वसिष्ठेन महात्मना ॥ २७ ॥

समाहूता कुरुक्षेत्रे दिव्यतोया सरस्वती ।

दक्षेण यजता चापि गङ्गाद्वारे सरस्वती ॥ २८ ॥

सुरेणुरिति विख्याता प्रस्रुता शीघ्रगामिनी । गंगाद्वारमें यज्ञ करते समय दक्षप्रजापतिने जब सरस्वतीका स्मरण किया था, उस समय भी शीघ्रगामिनी सरस्वती वहाँ बहती हुई सुरेणु नामसे ही विख्यात हुईं । राजेन्द्र! इसी प्रकार महात्मा वसिष्ठने भी कुरुक्षेत्रमें दिव्यसलिला सरस्वतीका आवाहन किया था, जो ओघवतीके नामसे प्रसिद्ध हुईं ॥ २७-२८३ ॥ विमलोदा भगवती ब्रह्मणा यजता पुनः ॥ २ ९ ॥ समाहूता ययौ तत्र पुण्ये हैमवते गिरौ । ब्रह्माजीने एक बार फिर पुण्यमय हिमालयपर्वतपर यज्ञ किया था । उस समय उनके आवाहन करनेपर भगवती सरस्वतीने विमलोदका नामसे प्रसिद्ध होकर वहाँ पदार्पण किया था ॥ २ ९ ॥ एकीभूतास्ततस्तास्तु तस्मिंस्तीर्थे समागताः ॥ ३० ॥

सप्तसारस्वतं तीर्थं ततस्तु प्रथितं भुवि । फिर ये सातों सरस्वतियाँ एकत्र होकर उस तीर्थमें आयी थीं, इसीलिये इस भूतलपर ‘ सप्तसारस्वततीर्थके नामसे उसकी प्रसिद्धि हुई' ॥ ३०३ ॥

पृष्ठ 2758

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इति सप्तसरस्वत्यो नामतः परिकीर्तिताः ॥ ३१ ॥

सप्तसारस्वतं चैव तीर्थं पुण्यं तथा स्मृतम् । इस प्रकार सात सरस्वती नदियोंका नामोल्लेखपूर्वक वर्णन किया गया है । इन्हींसे सप्तसारस्वत नामक परम पुण्यमय तीर्थका प्रादुर्भाव बताया गया है ॥ ३१३ ॥

शृणु मङ्कणकस्यापि कौमारब्रह्मचारिणः ॥ ३२ ॥

आपगामवगाढस्य राजन् प्रक्रीडितं महत् । राजन्! कुमारावस्थासे ही ब्रह्मचर्यव्रतका पालन तथा प्रतिदिन सरस्वती नदीमें स्नान करनेवाले मंकणक मुनिका महान् लीलामय चरित्र सुनो ॥ ३२३ ॥

दृष्ट्वा यदृच्छया तत्र स्त्रियमंभसि भारत ॥ ३३ ॥

जायन्तीं रुचिरापाङ्गीं दिग्वाससमनिन्दिताम् ।

सरस्वत्यां महाराज चस्कन्दे वीर्यमम्भसि ॥ ३४ ॥

भरतनन्दन! महाराज! एक समयकी बात है, कोई सुन्दर नेत्रोंवाली अनिन्द्य सुन्दरी रमणी सरस्वतीके जलमें नहा रही थी । दैवयोगसे मंकणक मुनिकी दृष्टि उसपर पड़ गयी और उनका वीर्य स्खलित होकर जलमें गिर पड़ा ॥ ३३-३४ ॥

तद् रेतः स तु जग्राह कलशे वै महातपाः ।

सप्तधा प्रविभागं तु कलशस्थं जगाम ह ॥ ३५ ॥

महातपस्वी मुनिने उस वीर्यको एक कलशमें ले लिया । कलशमें स्थित होनेपर वह वीर्य सात भागोंमें विभक्त हो गया ॥ ३५ ॥

तत्रर्षयः सप्त जाता जज्ञिरे मरुतां गणाः ।

वायुवेगो वायुबलो वायुहा वायुमण्डलः ॥ ३६ ॥

वायुज्वालो वायुरेता वायुचक्रश्च वीर्यवान् ।

एवमेते समुत्पन्ना मरुतां जनयिष्णवः ॥ ३७ ॥

उस कलशमें सात ऋषि उत्पन्न हुए, जो मूलभूत मरुद्गण थे । उनके नाम इस प्रकार हैं — वायुवेग, वायुबल, वायुहा, वायुमण्डल, वायुज्वाल, वायुरेता और शक्तिशाली वायुचक्र । ये उनचास मरुद्गणोंके जन्मदाता ' मरुत्' उत्पन्न हुए थे * ॥ ३६-३७ ॥

इदमत्यद्भुतं राजन् शृण्वाश्चर्यतरं भुवि ।

महर्षेश्चरितं यादृक् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ३८ ॥

राजन्! महर्षि मंकणकका यह तीनों लोकोंमें विख्यात अद्भुत चरित्र जैसा सुना गया है,

इसे तुम भी श्रवण करो । वह अत्यन्त आश्चर्यजनक है ॥ ३८ ॥

पुरा मङ्कणकः सिद्धः कुशाग्रेणेति नः श्रुतम् ।

क्षतः किल करे राजंस्तस्य शाकरसोऽस्रवत् ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 2759

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नरेश्वर! हमारे सुननेमें आया है कि पहले कभी सिद्ध मंकणक मुनिका हाथ किसी कुशके अग्रभागसे छिद गया था, उससे रक्तके स्थानपर शाकका रस चूने लगा था ॥ ३ ९ ॥

स वै शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टः प्रनृत्तवान् ।

ततस्तस्मिन् प्रनृत्ते वै स्थावरं जङ्गमं च यत् ॥ ४० ॥

प्रनृत्तमुभयं वीर तेजसा तस्य मोहितम् । वह शाकका रस देखकर मुनि हर्षके आवेशसे मतवाले हो नृत्य करने लगे । वीर! उनके नृत्यमें प्रवृत्त होते ही स्थावर और जंगम दोनों प्रकारके प्राणी उनके तेजसे मोहित होकर नाचने लगे ॥ ४० ॥

ब्रह्मादिभिः सुरै राजन्नृषिभिश्च तपोधनैः ॥ ४१ ॥

विज्ञप्तो वै महादेव ऋषेरर्थे नराधिप ।

नायं नृत्येद् यथा देव तथा त्वं कर्तुमर्हसि ॥ ४२ ॥

राजन्! नरेश्वर! तब ब्रह्मा आदि देवताओं तथा तपोधन महर्षियोंने ऋषिके विषयमें महादेवजीसे निवेदन किया- ' देव! आप ऐसा कोई उपाय करें, जिससे ये मुनि नृत्य न करें ॥ ४१-४२ ॥

ततो देवो मुनिं दृष्ट्वा हर्षाविष्टमतीव ह ।

सुराणां हितकामार्थं महादेवोऽभ्यभाषत ॥ ४३ ॥

मुनिको हर्षके आवेशसे अत्यन्त मतवाला हुआ देख महादेवजीने (ब्राह्मणका रूप धारण करके ) देवताओंके हितके लिये उनसे इस प्रकार कहा- ॥ ४३ ॥

भो भो ब्राह्मण धर्मज्ञ किमर्थं नृत्यते भवान् ।

हर्षस्थानं किमर्थं च तवेदमधिकं मुने ॥ ४४ ॥

तपस्विनो धर्मपथे स्थितस्य द्विजसत्तम । ' धर्मज्ञ ब्राह्मण! आप किसलिये नृत्य कर रहे हैं? मुने! आपके लिये अधिक हर्षका कौन - सा कारण उपस्थित हो गया है? द्विजश्रेष्ठ! आप तो तपस्वी हैं, सदा धर्मके मार्गपर स्थित रहते हैं, फिर आप क्यों हर्षसे उन्मत्त हो रहे हैं? ' ॥ ४४३ ॥

ऋषिरुवाच किं न पश्यसि मे ब्रह्मन् कराच्छाकरसं स्रुतम् ॥ ४५ ॥

यं दृष्ट्वा सम्प्रनृत्तो वै हर्षेण महता विभो ।

ऋषिने कहा— ब्रह्मन्! क्या आप नहीं देखते कि मेरे हाथसे शाकका रस चू रहा है ।

प्रभो! उसीको देखकर मैं महान् हर्षसे नाचने लगा हूँ ॥ ४५२ ॥

तं प्रहस्याब्रवीद् देवो मुनिं रागेण मोहितम् ॥ ४६ ॥

अहं न विस्मयं विप्र गच्छामीति प्रपश्य माम् ।

पृष्ठ 2760

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यह सुनकर महादेवजी ठठाकर हँस पड़े और उन आसक्तिसे मोहित हुए मुनिसे बोले -' विप्रवर! मुझे तो यह देखकर विस्मय नहीं हो रहा है । मेरी ओर देखो ' ॥ एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठं महादेवेन धीमता ॥ ४७ ॥

अङ्गुल्यग्रेण राजेन्द्र स्वङ्गुष्ठस्ताडितोऽभवत् ।

ततो भस्म क्षताद् राजन् निर्गतं हिमसंनिभम् ॥ ४८ ॥

राजेन्द्र! मुनिश्रेष्ठ मंकणकसे ऐसा कहकर बुद्धिमान् महादेवजीने अपनी अंगुलिके अग्रभागसे अँगूठेमें घाव कर दिया। उस घावसे बर्फके समान सफेद भस्म झड़ने लगा ॥ ४७-४८ ॥

तद् दृष्ट्वा व्रीडितो राजन् स मुनिः पादयोर्गतः ।

मेने देवं महादेवमिदं चोवाच विस्मितः ॥ ४ ९ ॥

राजन्! यह देखकर मुनि लजा गये और महादेवजीके चरणोंमें गिर पड़े । उन्होंने महादेवजीको पहचान लिया और विस्मित होकर कहा- ॥ ४ ९ ॥

नान्यं देवादहं मन्ये रुद्रात् परतरं महत् ।

सुरासुरस्य जगतो गतिस्त्वमसि शूलधृत् ॥ ५० ॥

‘ भगवन्! मैं रुद्रदेवके सिवा दूसरे किसी देवताको परम महान् नहीं मानता । आप ही देवताओं तथा असुरोंसहित सम्पूर्ण जगत्के आश्रयभूत त्रिशूलधारी महादेव हैं ॥ ५० ॥

त्वया सृष्टमिदं विश्वं वदन्तीह मनीषिणः ।

त्वामेव सर्वं व्रजति पुनरेव युगक्षये ॥ ५१ ॥

' मनीषी पुरुष कहते हैं कि आपने ही इस सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि की है । प्रलयके समय यह सारा जगत् आपमें ही विलीन हो जाता है ॥ ५१ ॥

देवैरपि न शक्यस्त्वं परिज्ञातुं कुतो मया ।

त्वयि सर्वे स्म दृश्यन्ते भावा ये जगति स्थिताः ॥ ५२ ॥

‘ सम्पूर्ण देवता भी आपको यथार्थरूपसे नहीं जान सकते, फिर मैं कैसे जान सकूँगा? संसारमें जो - जो पदार्थ स्थित हैं, वे सब आपमें देखे जाते हैं ॥ ५२ ॥

त्वामुपासन्त वरदं देवा ब्रह्मादयोऽनघ ।

सर्वस्त्वमसि देवानां कर्ता कारयिता च ह ॥ ५३ ॥

त्वत्प्रसादात् सुराः सर्वे मोदन्तीहाकुतोभयाः । ‘ अनघ! ब्रह्मा आदि देवता आप वरदायक प्रभुकी ही उपासना करते हैं । आप सर्वस्वरूप हैं । देवताओंके कर्ता और कारयिता भी आप ही हैं । आपके प्रसादसे ही सम्पूर्ण देवता यहाँ निर्भय हो आनन्दका अनुभव करते हैं ॥ ५३ ॥

(त्वं प्रभुः परमैश्वर्यादधिकं भासि शङ्कर ।

त्वयि ब्रह्मा च शक्रश्च लोकान् संधार्य तिष्ठतः ॥