श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 2761–2770
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2761–2770
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‘ शंकर! आप सबके प्रभु हैं । अपने उत्कृष्ट ऐश्वर्यसे आपकी अधिक शोभा हो रही है । ब्रह्मा और इन्द्र सम्पूर्ण लोकोंको धारण करके आपमें ही स्थित हैं ।
त्वन्मूलं च जगत् सर्वं त्वदन्तं हि महेश्वर ।
त्वया हि वितता लोकाः सप्तेमे सर्वसम्भव ॥
‘ महेश्वर! सम्पूर्ण जगत्के मूलकारण आप ही हैं । इसका अन्त भी आपमें ही होता है । सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत परमेश्वर! ये सातों लोक आपसे ही उत्पन्न होकर ब्रह्माण्डमें फैले हुए हैं ।
सर्वथा सर्वभूतेश त्वामेवार्चन्ति देवताः ।
त्वन्मयं हि जगत् सर्वं भूतं स्थावरजङ्गमम् ॥
‘ सर्वभूतेश्वर! देवता सब प्रकारसे आपकी ही पूजा- अर्चा करते हैं। सम्पूर्ण विश्व तथा चराचर भूतोंके उपादान कारण भी आप ही हैं ।
स्वर्गं च परमं स्थानं नृणामभ्युदयार्थिनाम् ।
ददासि कर्मिणां कर्म भावयन् ध्यानयोगतः ॥
'आप ही अभ्युदयकी इच्छा रखनेवाले सत्कर्मपरायण मनुष्योंको ध्यानयोगसे उनके कर्मोंका विचार करके उत्तम पद - स्वर्गलोक प्रदान करते हैं ।
न वृथास्ति महादेव प्रसादस्ते महेश्वर ।
यस्मात् त्वयोपकरणात् करोमि कमलेक्षण ॥
प्रपद्ये शरणं शम्भुं सर्वदा सर्वतः स्थितम् । ) ‘ महादेव! महेश्वर! कमलनयन! आपका कृपाप्रसाद कभी व्यर्थ नहीं होता! आपकी दी हुई सामग्रीसे ही मैं कार्य कर पाता हूँ, अतः सर्वदा सब ओर स्थित हुए सर्वव्यापी आप भगवान् शंकरकी मैं शरणमें आता हूँ। ' एवं स्तुत्वा महादेवं स ऋषिः प्रणतोऽभवत् ॥ ५४ ॥
यदिदं चापलं देव कृतमेतत् स्मयादिकम् ।
ततः प्रसादयामि त्वां तपो मे न क्षरेदिति ॥ ५५ ॥
इस प्रकार महादेवजीकी स्तुति करके वे महर्षि नतमस्तक हो गये और इस प्रकार बोले –' देव! मैंने जो यह अहंकार आदि प्रकट करनेकी चपलता की है, उसके लिये क्षमा माँगते हुए आपसे प्रसन्न होनेकी मैं प्रार्थना करता हूँ। मेरी तपस्या नष्ट न हो ' ॥ ५४-५५ ॥
ततो देवः प्रीतमनास्तमृषिं पुनरब्रवीत् ।
तपस्ते वर्धतां विप्र मत्प्रसादात् सहस्रधा ॥ ५६ ॥
आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वया सार्धमहं सदा ।
सप्तसारस्वते चास्मिन् यो मामर्चिष्यते नरः ॥ ५७ ॥
न तस्य दुर्लभं किञ्चिद् भवितेह परत्र वा ।
सारस्वतं च ते लोकं गमिष्यन्ति न संशयः ॥ ५८ ॥
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यह सुनकर महादेवजीका मन प्रसन्न हो गया । वे उन महर्षिसे पुनः बोले — ‘ विप्रवर! मेरे प्रसादसे तुम्हारी तपस्या सहस्रगुनी बढ़ जाय । मैं इस आश्रममें सदा तुम्हारे साथ निवास करूँगा । जो इस सप्तसारस्वततीर्थमें मेरी पूजा करेगा, उसके लिये इहलोक या परलोकमें कुछ भी दुर्लभ न होगा । वे सारस्वत लोकमें जायँगे - इसमें संशय नहीं है ' ॥ ५६–५८ ॥
एतन्मङ्कणकस्यापि चरितं भूरितेजसः ।
स हि पुत्रः सुकन्यायामुत्पन्नो मातरिश्वना ॥ ५ ९ ॥
यह महातेजस्वी मंकणक मुनिका चरित्र बताया गया है । वे वायुके औरस पुत्र थे ।
वायुदेवताने सुकन्याके गर्भसे उन्हें उत्पन्न किया था ॥ ५ ९ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्यानेऽष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५३ श्लोक मिलाकर कुल ६४३ श्लोक हैं। ) इन्हीं ऋषियोंकी तपस्यासे कल्पान्तरमें दितिके गर्भसे उनचास मरुद्गणोंका आविर्भाव हुआ । ये ही दितिके उदरमें एक गर्भके रूपमें प्रकट हुए, फिर इन्द्रके वज्रसे कटकर उनचास अमर शरीरोंके रूपमें उत्पन्न हुए– ऐसा समझना चाहिये ।
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एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः औशनस एवं कपालमोचनतीर्थकी माहात्म्यकथा तथा रुषंगुके आश्रम पृथूदकतीर्थकी महिमा वैशम्पायन उवाच
उषित्वा तत्र रामस्तु सम्पूज्याश्रमवासिनः ।
तथा मङ्कणके प्रीतिं शुभां चक्रे हलायुधः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! उस सप्तसारस्वत - तीर्थमें रहकर हलधर बलरामजीने आश्रमवासी ऋषियोंका पूजन किया और मंकणक मुनिपर अपनी उत्तम प्रीतिका परिचय दिया ॥ १ ॥
दत्त्वा दानं द्विजातिभ्यो रजनीं तामुपोष्य च ।
पूजितो मुनिसङ्घैश्च प्रातरुत्थाय लाङ्गली ॥ २ ॥
अनुज्ञाप्य मुनीन् सर्वान् स्पृष्ट्वा तोयं च भारत ।
प्रययौ त्वरितो रामस्तीर्थहेतोर्महाबलः ॥ ३ ॥
भरतनन्दन! वहाँ ब्राह्मणोंको दान दे उस रात्रिमें निवास करनेके पश्चात् प्रातःकाल उठकर मुनिमण्डलीसे सम्मानित हो महाबली लांगलधारी बलरामने पुनः तीर्थके जलमें स्नान किया और सम्पूर्ण ऋषि-मुनियोंकी आज्ञा ले अन्य तीर्थोंमें जानेके लिये वहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कर दिया ॥ २-३ ॥
ततस्त्वौशनसं तीर्थमाजगाम हलायुधः ।
कपालमोचनं नाम यत्र मुक्तो महामुनिः ॥ ४ ॥
महता शिरसा राजन् ग्रस्तजङ्घो महोदरः ।
राक्षसस्य महाराज रामक्षिप्तस्य वै पुरा ॥ ५ ॥
तदनन्तर हलधारी बलराम औशनसतीर्थमें आये, जिसका दूसरा नाम कपालमोचनतीर्थ भी है । महाराज! पूर्वकालमें भगवान् श्रीरामने एक राक्षसको मारकर उसे दूर फेंक दिया था । उसका विशाल सिर महामुनि महोदरकी जाँघमें चिपक गया था । वे महामुनि इस तीर्थमें स्नान करनेपर उस कपालसे मुक्त हुए थे ॥ ४-५ ॥
तत्र पूर्वं तपस्तप्तं काव्येन सुमहात्मना ।
यत्रास्य नीतिरखिला प्रादुर्भूता महात्मनः ॥ ६ ॥
महात्मा शुक्राचार्यने वहीं पहले तप किया था, जिससे उनके हृदयमें सम्पूर्ण नीति-विद्या स्फुरित हुई थी ॥ ६ ॥
यत्रस्थश्चिन्तयामास दैत्यदानवविग्रहम् ।
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तत् प्राप्य च बलो राजंस्तीर्थप्रवरमुत्तमम् ॥ ७ ॥
विधिवद् वै ददौ वित्तं ब्राह्मणानां महात्मनाम् । वहीं रहकर उन्होंने दैत्यों अथवा दानवोंके युद्धके विषयमें विचार किया था । राजन्! उस श्रेष्ठ तीर्थमें पहुँचकर बलरामजीने महात्मा ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक धनका दान दिया था ॥ ७३ ॥
जनमेजय उवाच कपालमोचनं ब्रह्मन् कथं यत्र महामुनिः ॥ ८ ॥
मुक्तः कथं चास्य शिरो लग्नं केन च हेतुना । जनमेजयने पूछा — ब्रह्मन्! उस तीर्थका नाम कपालमोचन कैसे हुआ, जहाँ महामुनि महोदरको छुटकारा मिला था? उनकी जाँघमें वह सिर कैसे और किस कारणसे चिपक गया था? ॥ ८३ ॥
वैशम्पायन उवाच पुरा'वै दण्डकारण्ये राघवेण महात्मना ॥ ९ ॥
वसता राजशार्दूल राक्षसान् शमयिष्यता ।
जनस्थाने शिरश्छिन्नं राक्षसस्य दुरात्मनः ॥ १० ॥
क्षुरेण शितधारेण उत्पपात महावने ।
महोदरस्य तल्लग्नं जंघायां वै यदृच्छया ॥ ११ ॥
वने विचरतो राजन्नस्थि भित्त्वास्फुरत् तदा । वैशम्पायनजीने कहा – नृपश्रेष्ठ! पूर्वकालकी बात है, रघुकुलतिलक महात्मा श्रीरामचन्द्रजीने दण्डकारण्यमें रहते समय जब राक्षसोंके संहारका विचार किया, तब तीखी धारवाले धुरसे जनस्थानमें उस दुरात्मा राक्षसका मस्तक काट दिया । वह कटा हुआ मस्तक उस महान् वनमें ऊपरको उछला और दैवयोगसे वनमें विचरते हुए महोदर मुनिकी जाँघमें जा लगा । नरेश्वर! उस समय उनकी हड्डी छेदकर वह भीतरतक घुस गया ॥ ९ – ११ ३ ॥ स तेन लग्नेन तदा द्विजातिर्न शशाक ह ॥ १२ ॥
अभिगन्तुं महाप्राज्ञस्तीर्थान्यायतनानि च । उस मस्तकके चिपक जानेसे वे महाबुद्धिमान् ब्राह्मण किसी तीर्थ या देवालयमें सुगमतापूर्वक आ -जा नहीं सकते थे ॥ १२३ ॥
स पूतिना विस्रवता वेदनार्तो महामुनिः ॥ १३ ॥
जगाम सर्वतीर्थानि पृथिव्यां चेति नः श्रुतम् । उस मस्तकसे दुर्गन्धयुक्त पीब बहती रहती थी और महामुनि महोदर वेदनासे पीड़ित हो गये थे । हमने सुना है कि मुनिने किसी तरह भूमण्डलके सभी तीर्थोंकी यात्रा की ॥ स गत्वा सरितः सर्वाः समुद्रांश्च महातपाः ॥ १४ ॥
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कथयामास तत् सर्वमृषीणां भावितात्मनाम् ।
आप्लुत्य सर्वतीर्थेषु न च मोक्षमवाप्तवान् ॥ १५ ॥
उन महातपस्वी महर्षिने सम्पूर्ण सरिताओं और समुद्रोंकी यात्रा करके वहाँ रहनेवाले पवित्रात्मा मुनियोंसे वह सब वृत्तान्त कह सुनाया। सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करके भी वे उस कपालसे छुटकारा न पा सके ॥ १४-१५ ॥
स तु शुश्राव विप्रेन्द्र मुनीनां वचनं महत् ।
सरस्वत्यास्तीर्थवरं ख्यातमौशनसं तदा ॥ १६ ॥
सर्वपापप्रशमनं सिद्धिक्षेत्रमनुत्तमम् । विप्रवर! उन्होंने मुनियोंके मुखसे यह महत्त्वपूर्ण बात सुनी कि ' सरस्वतीका श्रेष्ठ तीर्थ जो औशनस नामसे विख्यात है, सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला तथा परम उत्तम सिद्धिक्षेत्र है' ॥ १६३ ॥
स तु गत्वा ततस्तत्र तीर्थमौशनसं द्विजः ॥ १७ ॥
तत औशनसे तीर्थे तस्योपस्पृशतस्तदा ।
तच्छिरश्चरणं मुक्त्वा पपातान्तर्जले तदा ॥ १८ ॥
तदनन्तर वे ब्रह्मर्षि वहाँ औशनसतीर्थमें गये और उसके जलसे आचमन एवं स्नान किया । उसी समय वह कपाल उनके चरण ( जाँघ) - को छोड़कर पानीके भीतर गिर पड़ा ॥ १७-१८ ॥
विमुक्तस्तेन शिरसा परं सुखमवाप ह ।
स चाप्यन्तर्जले मूर्धा जगामादर्शनं विभो ॥ १ ९ ॥
प्रभो! उस मस्तक या कपालसे मुक्त होनेपर महोदर मुनिको बड़ा सुख मिला । साथ ही वह मस्तक भी (जो उनकी जाँघसे छूटकर गिरा था ) पानीके भीतर अदृश्य हो गया ॥ १ ९ ॥
ततः स विशिरा राजन् पूतात्मा वीतकल्मषः ।
आजगामाश्रमं प्रीतः कृतकृत्यो महोदरः ॥ २० ॥
राजन्! उस कपालसे मुक्त हो निष्पाप एवं पवित्र अन्तःकरणवाले महोदर मुनि कृतकृत्य हो प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रमपर लौट आये ॥ २० ॥
सोऽथ गत्वाऽऽश्रमं पुण्यं विप्रमुक्तो महातपाः ।
कथयामास तत् सर्वमृषीणां भावितात्मनाम् ॥ २१ ॥
संकटसे मुक्त हुए उन महातपस्वी मुनिने अपने पवित्र आश्रमपर जाकर वहाँ रहनेवाले पवित्रात्मा ऋषियोंसे अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥ २१ ॥
ते श्रुत्वा वचनं तस्य ततस्तीर्थस्य मानद ।
कपालमोचनमिति नाम चक्रुः समागताः ॥ २२ ॥
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मानद! तदनन्तर वहाँ आये हुए महर्षियोंने महोदर मुनिकी बात सुनकर उस तीर्थका नाम कपालमोचन रख दिया ॥ २२ ॥
स चापि तीर्थप्रवरं पुनर्गत्वा महानृषिः ।
पीत्वा पयः सुविपुलं सिद्धिमायात् तदा मुनिः ॥ २३ ॥
इसके बाद महर्षि महोदर पुनः उस श्रेष्ठ तीर्थमें गये और वहाँका प्रचुर जल पीकर उत्तम सिद्धिको प्राप्त हुए ॥
तत्र दत्त्वा बहून् दायान् विप्रान् सम्पूज्य माधवः ।
जगाम वृष्णिप्रवरो रुषङ्गोराश्रमं तदा ॥ २४ ॥
वृष्णिवंशावतंस बलरामजीने वहाँ ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें बहुत धनका दान किया । इसके बाद वे रुषंगु मुनिके आश्रमपर गये ॥ २४ ॥
यत्र तप्तं तपो घोरमार्ष्टिषेणेन भारत ।
ब्राह्मण्यं लब्धवांस्तत्र विश्वामित्रो महामुनिः ॥ २५ ॥
भरतनन्दन! वहीं आर्ष्टिश्तो मुनिने घोर तपस्या की थी और वहीं महामुनि विश्वामित्रने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया थ ॥ २५ ॥
सर्वकामसमृद्धं च तदाश्रमपदं महत् ।
मुनिभिर्ब्राह्मणैश्चैव सेवितं सर्वदा विभो ॥ २६ ॥
प्रभो! वह महान् आश्रम सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुओंसे सम्पन्न है । वहँ बहुत - से मुनि और ब्राह्मण सदा निवास करते हैं ॥ २६ ॥
ततो हलधरः श्रीमान् ब्राह्मणैः परिवारितः ।
जगाम तत्र राजेन्द्र रुषङ्गुस्तनुमत्यजत् ॥ २७ ॥
राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रीमान् हलधर ब्राह्मणोंसे घिरकर उस स्थानपर गये, जहाँ रुषंगुने अपना शरीर छोड़ा थ ॥
रुषगुर्ब्राह्मणो वृद्धस्तपोनित्यश्च भारत ।
देहन्यासे कृतमना विचिन्त्य बहुधा तदा ॥ २८ ॥
ततः सर्वानुपादाय तनयान् वै महातपाः ।
रुषङ्गुरब्रवीत् तत्र नयध्वं मां पृथूदकम् ॥ २ ९ ॥
भारत! बूढ़े ब्राह्मण रुषंगु सदा तपस्यामें संल्गन रहते थे । एक समय उन महातपस्वी रुषंगु मुनिने शरीर त्याग देनेका विचार करके बहुत कुछ सोचकर अपने सभी पुत्रोंको बुलाया और उनसे कहा — ' मुझे पृथूदक तीर्थमें ले चलो' ॥ २८-२९ ॥
विज्ञायातीतवयसं रुषगुं ते तपोधनाः ।
तं च तीर्थमुपानिन्युः सरस्वत्यास्तपोधनम् ॥ ३० ॥
उन तपस्वी पुत्रोंने तपोधन रुषंगुको अत्यन्त वृद्ध जानकर उन्हें सरस्वतीके उस उत्तम तीर्थमें पहुँचा दिया ॥ ३० ॥
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स तैः पुत्रैस्तदा धीमानानीतो वै सरस्वतीम् ।
पुण्यां तीर्थशतोपेतां विप्रसङ्घैर्निषेविताम् ॥ ३१ ॥
स तत्र विधिना राजन्नाप्लुत्य सुमहातपाः ।
ज्ञात्वा तीर्थगुणांश्चैव प्राहेदमृषिसत्तमः ॥ ३२ ॥
सुप्रीतः पुरुषव्याघ्र सर्वान् पुत्रानुपासतः । राजन्! नरव्याघ्र! वे पुत्र जब उन बुद्धिमान् मुनिको ब्राह्मणसमूहोंसे सेवित तथा सैकड़ों तीर्थोंसे सुशोभित पुण्यसलिला सरस्वतीके तटपर ले आये, तब वे महातपस्वी महर्षि वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके तीर्थके गुणोंको जानकर अपने पास बैठे हुए सभी पुत्रोंसे प्रसन्नतापूर्वक बोले – ॥ सरस्वत्युत्तरे तीरे यस्त्यजेदात्मनस्तनुम् ॥ ३३ ॥
पृथूदके जप्यपरो नैनं श्वोमरणं तपेत् । 'जो सरस्वतीके उत्तर तटपर पृथूदकतीर्थमें जप करते हुए अपने शरीरका परित्याग करता है, उसे भविष्यमें पुनः मृत्युका कष्ट नहीं भोगना पड़ता' ॥ ३३३ ॥
तत्राप्लुत्य स धर्मात्मा उपस्पृश्य हलायुधः ॥ ३४ ॥
दत्त्वा चैव बहून् दायान् विप्राणां विप्रवत्सलः । धर्मात्मा विप्रवत्सल हलधर बलरामजीने उस तीर्थमें स्नान करके ब्राह्मणोंको बहुत धनका दान किया ॥ ३४ ॥
ससर्ज यत्र भगवाँल्लोकाँल्लोकपितामहः ॥ ३५ ॥
यत्रार्ष्टिषेणः कौरव्य ब्राह्मण्यं संशितव्रतः ।
तपसा महता राजन् प्राप्तवानृषिसत्तमः ॥ ३६ ॥
सिन्धुद्वीपश्च राजर्षिर्देवापिश्च महातपाः ।
ब्रह्मण्यं लब्धवान् यत्र विश्वामित्रस्तथा मुनिः ॥ ३७ ॥
महातपस्वी भगवानुग्रतेजा महायशाः ।
तत्राजगाम बलवान् बलभद्रः प्रतापवान् ॥ ३८ ॥
कुरुवंशी नरेश! तत्पश्चात् बलवान् एवं प्रतापी बलभद्रजी उस तीर्थमें आ गये, जहाँ लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने सृष्टि की थी, जहाँ कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनिश्रेष्ठ आर्ष्टिषेणने बड़ी भारी तपस्या करके ब्राह्मणत्व पाया था तथा जहाँ राजर्षि सिन्धुद्वीप, महान् तपस्वी देवापि और महायशस्वी, उग्रतेजस्वी एवं महातपस्वी भगवान् विश्वामित्र मुनिने भी ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था ॥ ३५-३८ ॥ इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्यान एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३ ९ ॥
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इसप्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ९ ॥
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चत्वारिंशोऽध्यायः आर्ष्टिषेण एवं विश्वामित्रकी तपस्या तथा वरप्राप्ति जनमेजय उवाच
कथमार्ष्टिषेणो भगवान् विपुलं तप्तवांस्तपः ।
सिन्धुद्वीपः कथं चापि ब्राह्मण्यं लब्धवांस्तदा ॥ १ ॥
देवापिश्च कथं ब्रह्मन् विश्वामित्रश्च सत्तम ।
तन्ममाचक्ष्व भगवन् परं कौतूहलं हि मे ॥ २ ॥
जनमेजयने पूछा- ब्रह्मन्! मुनिश्रेष्ठ! आर्ष्टिषेणने वहाँ किस प्रकार बड़ी भारी तपस्या की थी तथा सिन्धुद्वीप, देवापि और विश्वामित्रजीने किस तरह ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था? भगवन्! यह सब मुझे बताइये । इसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी भारी उत्सुकता है ॥ १-२ ॥ वैशम्पायनउवाच
पुरा कृतयुगे राजन्नार्ष्टिषेणो द्विजोत्तमः ।
वसन् गुरुकुले नित्यं नित्यमध्ययने रतः ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! प्राचीन कालके सत्ययुगकी बात है, द्विजश्रेष्ठ आर्ष्टिषेण सदा गुरुकुलमें निवास करते हुए निरन्तर वेद - शास्त्रोंके अध्ययनमें लगे रहते थे ॥ ३ ॥
तस्य राजन् गुरुकुले वसतो नित्यमेव च ।
समाप्तिं नागमद् विद्या नापि वेदा विशाम्पते ॥ ४ ॥
प्रजानाथ! नरेश्वर! गुरुकुलमें सर्वदा रहते हुए भी न तो उनकी विद्या समाप्त हुई और न वे सम्पूर्ण वेद ही पढ़ सके ॥ ४ ॥
स निर्विण्णस्ततो राजंस्तपस्तेपे महातपाः ।
ततो वै तपसा तेन प्राप्य वेदाननुत्तमान् ॥ ५ ॥
स विद्वान् वेदयुक्तश्च सिद्धश्चाप्यृषिसत्तमः ।
तत्र तीर्थे वरान् प्रादात् त्रीनेव सुमहातपाः ॥ ६ ॥
नरेश्वर! इससे महातपस्वी आर्ष्टिषेण खिन्न एवं विरक्त हो उठे, फिर उन्होंने सरस्वतीके उसी तीर्थमें जाकर बड़ी भारी तपस्या की । उस तपके प्रभावसे उत्तम वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके वे ऋषिश्रेष्ठ विद्वान् वेदज्ञ और सिद्ध हो गये । तदनन्तर उन महातपस्वीने उस तीर्थको तीन वर प्रदान किये— ॥ ५-६ ॥ अस्मिंस्तीर्थे महानद्या अद्यप्रभृति मानवः ।
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आप्लुतो वाजिमेधस्य फलं प्राप्स्यति पुष्कलम् ॥ ७ ॥
अद्यप्रभृति नैवात्र भयं व्यालाद् भविष्यति ।
अपि चाल्पेन कालेन फलं प्राप्स्यति पुष्कलम् ॥ ८ ॥
‘ आजसे जो मनुष्य महानदी सरस्वतीके इस तीर्थमें स्नान करेगा, उसे अश्वमेध - यज्ञका सम्पूर्ण फल प्राप्त होगा। आजसे इस तीर्थमें किसीको सर्पसे भय नहीं होगा । थोड़े समयतक ही इस तीर्थके सेवनसे मनुष्यको बहुत अधिक फल प्राप्त होगा' ॥ ७-८ ॥
एवमुक्त्वा महातेजा जगाम त्रिदिवं मुनिः ।
एवं सिद्धः स भगवानार्ष्टिषेणः प्रतापवान् ॥ ९ ॥
ऐसा कहकर वे महातेजस्वी मुनि स्वर्गलोकको चले गये । इस प्रकार पूजनीय एवं प्रतापी आर्ष्टिषेण ऋषि उस तीर्थमें सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं ॥ ९ ॥
तस्मिन्नेव तदा तीर्थे सिन्धुद्वीपः प्रतापवान् ।
देवापिश्च महाराज ब्राह्मण्यं प्रापतुर्महत् ॥ १० ॥
महाराज! उन्हीं दिनों उसी तीर्थमें प्रतापी सिन्धुद्वीप तथा देवापिने वहाँ तप करके महान् ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था ॥ १० ॥
तथा च कौशिकस्तात तपोनित्यो जितेन्द्रियः ।
तपसा वै सुतप्तेन ब्राह्मणत्वमवाप्तवान् ॥ ११ ॥
तात! कुशिकवंशी विश्वामित्र भी वहीं निरन्तर इन्द्रिय - संयमपूर्वक तपस्या करते थे । उस भारी तपस्याके प्रभावसे उन्हें ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति हुई ॥ ११ ॥
गाधिर्नाम महानासीत् क्षत्रियः प्रथितो भुवि ।
तस्य पुत्रोऽभवद् राजन् विश्वामित्रः प्रतापवान् ॥ १२ ॥
राजन्! पहले इस भूतलपर गाधिनामसे विख्यात महान् क्षत्रिय राजा राज्य करते थे ।
प्रतापी विश्वामित्र उन्हींके पुत्र थे ॥ १२ ॥
स राजा कौशिकस्तात महायोग्यभवत् किल ।
स पुत्रमभिषिच्याथ विश्वामित्रं महातपाः ॥ १३ ॥
देहन्यासे मनश्चक्रे तमूचुः प्रणताः प्रजाः ।
न गन्तव्यं महाप्राज्ञ त्राहि चास्मान् महाभयात् ॥ १४ ॥
तात! लोग कहते हैं कि कुशिकवंशी राजा गाधि महान् योगी और बड़े भारी तपस्वी थे । उन्होंने अपने पुत्र विश्वामित्रको राज्यपर अभिषिक्त करके शरीरको त्याग देनेका विचार किया । तब सारी प्रजा उनसे नतमस्तक होकर बोली- ' महाबुद्धिमान् नरेश! आप कहीं न जायँ, यहीं रहकर हमारी इस जगत्के महान् भयसे रक्षा करते रहें ' ॥ १३-१४ ॥
एवमुक्तः प्रत्युवाच ततो गाधिः प्रजास्ततः ।
विश्वस्य जगतो गोप्ता भविष्यति सुतो मम ॥ १५ ॥