श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 2741–2750

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2741–2750

पृष्ठ 2741

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स एवमभिनिश्चित्य तस्मिन् कूपे महातपाः ।

ददर्श वीरुधं तत्र लम्बमानां यदृच्छया ॥ ३२ ॥

इस प्रकार विचार करते- करते महातपस्वी त्रितने उस कुएँमें एक लता देखी, जो दैवयोगसे वहाँ फैली हुई थी ॥ ३२ ॥

पांसुग्रस्ते ततः कूपे विचिन्त्य सलिलं मुनिः ।

अग्नीन् संकल्पयामास होतॄनात्मानमेव च ॥ ३३ ॥

मुनिने उस बालूभरे कूपमें जलकी भावना करके उसीमें संकल्पद्वारा अग्निकी स्थापना की और होता आदिके स्थानपर अपने - आपको ही प्रतिष्ठित किया ॥ ३३ ॥

ततस्तां वीरुधं सोमं संकल्प्य सुमहातपाः ।

ऋचो यजूंषि सामानि मनसा चिन्तयन् मुनिः ॥ ३४ ॥

ग्रावाणः शर्कराः कृत्वा प्रचक्रेऽभिषवं नृप ।

आज्यं च सलिलं चक्रे भागांश्च त्रिदिवौकसाम् ॥ ३५ ॥

सोमस्याभिषवं कृत्वा चकार विपुलं ध्वनिम् । तत्पश्चात् उन महातपस्वी त्रितने उस फैली हुई लतामें सोमकी भावना करके मन-ही-मन ऋग्, यजु और सामका चिन्तन किया । नरेश्वर! इसके बाद कंकड़ या बालू--कणोंमें सिल और लोढ़ेकी भावना करके उसपर पीसकर लतासे सोमरस निकाला । फिर जलमें घीका संकल्प करके उन्होंने देवताओंके भाग नियत किये और सोमरस तैयार करके उसकी आहुति देते हुए वेद- मन्त्रोंकी गम्भीर ध्वनि की ॥ ३४-३५३ ॥ स चाविशद् दिवं राजन् पुनः शब्दस्त्रितस्य वै ॥ ३६ ॥

समवाप्य च तं यज्ञं यथोक्तं ब्रह्मवादिभिः । राजन्! ब्रह्मवादियोंने जैसा बताया है, उसके अनुसार ही उस यज्ञका सम्पादन करके की हुई त्रितकी वह वेदध्वनि स्वर्गलोकतक गूँज उठी ॥ ३६ ॥

वर्तमाने महायज्ञे त्रितस्य सुमहात्मनः ॥ ३७ ॥

आविग्नं त्रिदिवं सर्वं कारणं च न बुद्धयते । महात्मा त्रितका वह महान् यज्ञ जब चालू हुआ, उस समय सारा स्वर्गलोक उद्विग्न हो उठा, परंतु किसीको इसका कोई कारण नहीं जान पड़ा ॥ ३७ ॥

ततः सुतुमुलं शब्दं शुश्रावाथ बृहस्पतिः ॥ ३८ ॥

श्रुत्वा चैवाब्रवीत् सर्वान् देवान् देवपुरोहितः ।

त्रितस्य वर्तते यज्ञस्तत्र गच्छामहे सुराः ॥ ३ ९ ॥

तब देवपुरोहित बृहस्पतिजीने वेदमन्त्रोंके उस तुमुलनादको सुनकर देवताओंसे कहा ——देवगण! त्रित मुनिका यज्ञ हो रहा है, वहाँ हमलोगोंको चलना चाहिये ॥ स हि क्रुद्धः सृजेदन्यान् देवानपि महातपाः ।

पृष्ठ 2742

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‘ वे महान् तपस्वी हैं । यदि हम नहीं चलेंगे तो वे कुपित होकर दूसरे देवताओंकी सृष्टि कर लेंगे ' ॥ तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सहिताः सर्वदेवताः ॥ ४० ॥

प्रययुस्तत्र यत्रासौ त्रितयज्ञः प्रवर्तते । बृहस्पतिजीका यह वचन सुनकर सब देवता एक साथ हो उस स्थानपर गये, जहाँ त्रितमुनिका यज्ञ हो रहा था ॥ ते तत्र गत्वा विबुधास्तं कूपं यत्र स त्रितः ॥ ४१ ॥

ददृशुस्तं महात्मानं दीक्षितं यज्ञकर्मसु ।

दृष्ट्वा चैनं महात्मानं श्रिया परमया युतम् ॥ ४२ ॥

ऊचुश्चैनं महाभागं प्राप्ता भागार्थिनो वयम् । वहाँ पहुँचकर देवताओंने उस कूपको देखा, जिसमें त्रित मौजूद थे । साथ ही उन्होंने यज्ञमें दीक्षित हुए महात्मा त्रितमुनिका भी दर्शन किया । वे बड़े तेजस्वी दिखायी दे रहे थे । उन महाभाग मुनिका दर्शन करके देवताओंने उनसे कहा - ' हमलोग यज्ञमें अपना भाग लेनेके लिये आये हैं ' ॥ ४१-४२ ॥ अथाब्रवीदृषिर्देवान् पश्यध्वं मा दिवौकसः ॥ ४३ ॥

अस्मिन् प्रतिभये कूपे निमग्नं नष्टचेतसम् । उस समय महर्षिने उनसे कहा – ' देवताओ! देखो, मैं किस दशामें पड़ा हूँ । इस भयानक कूपमें गिरकर अपनी सुध- बुध खो बैठा हूँ ' ॥ ४३३ ॥

ततस्त्रितो महाराज भागांस्तेषां यथाविधि ॥ ४४ ॥

मन्त्रयुक्तान् समददत् ते च प्रीतास्तदाभवन् । महाराज! तदनन्तर त्रितने देवताओंको विधिपूर्वक मन्त्रोच्चारण करते उनके भाग समर्पित किये । इससे वे उस समय बड़े प्रसन्न हुए ॥ ४४३ ॥

ततो यथाविधि प्राप्तान् भागान् प्राप्य दिवौकसः ॥ ४५ ॥

प्रीतात्मानो ददुस्तस्मै वरान् यान् मनसेच्छति । विधिपूर्वक प्राप्त हुए उन भागोंको ग्रहण करके प्रसन्नचित्त हुए देवताओंने उन्हें मनोवांछित वर प्रदान किया ॥ ४५३ ॥

स तु वव्रे वरं देवांस्त्रातुमर्हथ मामितः ॥ ४६ ॥

यश्चेहोपस्पृशेत् कूपे स सोमपगतिं लभेत् । मुनिने देवताओंसे वर माँगते हुए कहा- ' मुझे इस कूपसे आपलोग बचावें तथा जो मनुष्य इसमें आचमन करे, उसे यज्ञमें सोमपान करनेवालोंकी गति प्राप्त हो ' ॥ ४६३ ॥

तत्र चोर्मिमती राजन्नुत्पपात सरस्वती ॥ ४७ ॥

तयोत्क्षिप्तः समुत्तस्थौ पूजयंस्त्रिदिवौकसः ।

पृष्ठ 2743

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राजन्! मुनिके इतना कहते ही कुएँमें तरंगमालाओंसे सुशोभित सरस्वती लहरा उठी । उसने अपने जलके वेगसे मुनिको ऊपर उठा दिया और वे बाहर निकल आये । फिर उन्होंने देवताओंका पूजन किया ॥ ४७३ ॥

तथेति चोक्त्वा विबुधा जग्मू राजन् यथागताः ॥ ४८ ॥

त्रितश्चाभ्यागमत् प्रीतः स्वमेव निलयं तदा । नरेश्वर! मुनिके माँगे हुए वरके विषयमें ' तथास्तु' कहकर सब देवता जैसे आये थे, वैसे ही चले गये । फिर त्रित भी प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको ही लौट गये ॥ ४८३ ॥

क्रुद्धस्तु स समासाद्य तावृषी भ्रातरौ तदा ॥ ४ ९ ॥

उवाच परुषं वाक्यं शशाप च महातपाः ।

पशुलुब्धौ युवां यस्मान्मामुत्सृज्य प्रधावितौ ॥ ५० ॥

तस्माद् वृकाकृती रौद्रौ दंष्ट्रिणावभितश्चरौ ।

भवितारौ मया शप्तौ पापेनानेन कर्मणा ॥ ५१ ॥

प्रसवश्चैव युवयोर्गोलाङ्गूलर्क्षवानराः । उन महातपस्वीने कुपित हो अपने उन दोनों ऋषि भाइयोंके पास पहुँचकर कठोर वाणीमें शाप देते हुए कहा –' तुम दोनों पशुओंके लोभमें फँसकर मुझे छोड़कर भाग आये । इसलिये इसी पापकर्मके कारण मेरे शापसे तुम दोनों भाई महाभयंकर भेड़ियेका शरीर धारण करके दाँढ़ोंसे युक्त हो इधर-उधर भटकते फिरोगे । तुम दोनोंकी संतानके रूपमें गोलांगूल, रीछ और वानर आदि पशुओंकी उत्पत्ति होगी' ॥ ४ ९ –५१३ ॥ इत्युक्तेन तदा तेन क्षणादेव विशाम्पते ॥ ५२ ॥

तथाभूतावदृश्येतां वचनात् सत्यवादिनः । प्रजानाथ! उनके इतना कहते ही वे दोनों भाई उस सत्यवादीके वचनसे उसी क्षण भेड़ियेकी शकलमें दिखायी देने लगे ॥ ५२ ॥

तत्राप्यमितविक्रान्तः स्पृष्ट्वा तोयं हलायुधः ॥ ५३ ॥

दत्त्वा च विविधान् दायान् पूजयित्वा च वै द्विजान् । अमित पराक्रमी बलरामजीने उस तीर्थमें भी जलका स्पर्श किया और ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें नाना प्रकारके धन प्रदान किये ॥ ५३ ॥

उदपानं च तं वीक्ष्य प्रशस्य च पुनः पुनः ॥ ५४ ॥

नदीगतमदीनात्मा प्राप्तो विनशनं तदा ॥ ५५ ॥

उदार चित्तवाले बलरामजी सरस्वती नदीके अन्तर्गत उदपानतीर्थका दर्शन करके उसकी बारंबार स्तुति- प्रशंसा करते हुए वहाँसे विनशनतीर्थमें चले गये ॥ इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां त्रिताख्याने षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 2744

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इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्रा त्रितका उपाख्यानविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ || ३६ //

पृष्ठ 2745

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सप्तत्रिंशोऽध्यायः विनशन, सुभूमिक, गन्धर्व, गर्गस्रोत, शंख, द्वैतवन तथा नैमिषेय आदि तीर्थोंमें होते हुए बलभद्रजीका सप्त सारस्वततीर्थमें प्रवेश वैशम्पायन उवाच

ततो विनशनं राजन् जगामाथ हलायुधः ।

शूद्राभीरान् प्रति द्वेषाद् यत्र नष्टा सरस्वती ॥ १ ॥

तस्मात् तु ऋषयो नित्यं प्राहुर्विनशनेति च । वैशम्पायनजी कहते हैं -राजन्! उदपानतीर्थसे चलकर हलधारी बलराम विनशनतीर्थमें आये, जहाँ ( दुष्कर्मपरायण) शूद्रों और आभीरोंके प्रति द्वेष होनेसे सरस्वती

नदी विनष्ट ( अदृश्य ) हो गयी है । इसीलिये ऋषिगण उसे सदा विनशनतीर्थ कहते हैं ॥ १३

|| तत्राप्युपस्पृश्य बलः सरस्वत्यां महाबलः ॥ २ ॥

सुभूमिकं ततोऽगच्छत् सरस्वत्यास्तटे वरे । महाबली बलराम वहाँ भी सरस्वतीमें आचमन और स्नान करके उसके सुन्दर तटपर स्थित हुए ‘ सुभूमिक' तीर्थमें गये ॥ २३ ॥

तत्र चाप्सरसः शुभ्रा नित्यकालमतन्द्रिताः ॥ ३ ॥

क्रीडाभिर्विमलाभिश्च क्रीडन्ति विमलाननाः । उस तीर्थमें गौरवर्ण तथा निर्मल मुखवाली सुन्दरी अप्सराएँ आलस्य त्यागकर सदा नाना प्रकारकी विमल क्रीडाओंद्वारा मनोरंजन करती हैं ॥ ३३ ॥

तत्र देवाः सगन्धर्वा मासि मासि जनेश्वर ॥ ४ ॥

अभिगच्छन्ति तत् तीर्थं पुण्यं ब्राह्मणसेवितम् । जनेश्वर! वहाँ उस ब्राह्मणसेवित पुण्यतीर्थमें गन्धर्वोंसहित देवता भी प्रतिमास आया करते हैं ॥ ४३ ॥

तत्रादृश्यन्त गन्धर्वास्तथैवाप्सरसां गणाः ॥ ५ ॥

समेत्य सहिता राजन् यथाप्राप्तं यथासुखम् । राजन्! गन्धर्वगण और अप्सराएँ एक साथ मिलकर वहाँ आती और सुखपूर्वक विचरण करती दिखायी देती हैं ॥ ५३ ॥

तत्र मोदन्ति देवाश्च पितरश्च सवीरुधः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 2746

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पुण्यैः पुष्पैः सदा दिव्यैः कीर्यमाणाः पुनः पुनः । वहाँ देवता और पितर लता- वेलोंके साथ आमोदित होते हैं, उनके ऊपर सदा पवित्र एवं दिव्य पुष्पोंकी वर्षा बारंबार होती रहती है ॥ ६३ ॥

आक्रीडभूमिः सा राजंस्तासामप्सरसां शुभा ॥ ७ ॥

सुभूमिकेति विख्याता सरस्वत्यास्तटे वरे । राजन्! सरस्वतीके सुन्दर तटपर वह उन अप्सराओंकी मंगलमयी क्रीडाभूमि है, इसलिये वह स्थान सुभूमिक नामसे विख्यात है ॥ ७३ ॥

तत्र स्नात्वा च दत्त्वा च वसु विप्राय माधवः ॥ ८ ॥

श्रुत्वा गीतं च तद् दिव्यं वादित्राणां च निःस्वनम् ।

छायाश्च विपुला दृष्ट्वा देवगन्धर्वरक्षसाम् ॥ ९ ॥

गन्धर्वाणां ततस्तीर्थमागच्छद् रोहिणीसुतः । बलरामजीने वहाँ स्नान करके ब्राह्मणोंको धन दान किया और दिव्य गीत एवं दिव्य वाद्योंकी ध्वनि सुनकर देवताओं, गन्धर्वों तथा राक्षसोंकी बहुत- सी मूर्तियोंका दर्शन किया । तत्पश्चात् रोहिणीनन्दन बलराम गन्धर्वतीर्थमें गये ॥ ८ - ९ ॥ विश्वावसुमुखास्तत्र गन्धर्वास्तपसान्विताः ॥ १० ॥

नृत्यवादित्रगीतं च कुर्वन्ति सुमनोरमम् । वहाँ तपस्यामें लगे हुए विश्वावसु आदि गन्धर्व अत्यन्त मनोरम नृत्य, वाद्य और गीतका आयोजन करते रहते हैं ॥ १०३ ॥

तत्र दत्त्वा हलधरो विप्रेभ्यो विविधं वसु ॥ ११ ॥

अजाविकं गोखरोष्ट्रं सुवर्णं रजतं तथा ।

भोजयित्वा द्विजान् कामैः संतर्प्य च महाधनैः ॥ १२ ॥

प्रययौ सहितो विप्रैः स्तूयमानश्च माधवः । हलधरने वहाँ भी ब्राह्मणोंको भेड़, बकरी, गाय, गदहा, ऊँट और सोना-चाँदी आदि नाना प्रकारके धन देकर उन्हें इच्छानुसार भोजन कराया तथा प्रचुर धनसे संतुष्ट करके ब्राह्मणोंके साथ ही वहाँसे प्रस्थान किया । उस समय ब्राह्मण लोग बलरामजीकी बड़ी स्तुति करते थे ॥ ११-१२३ ॥ तस्माद् गन्धर्वतीर्थाच्च महाबाहुररिंदमः ॥ १३ ॥

गर्गस्रोतो महातीर्थमाजगामैककुण्डली । उस गन्धर्वतीर्थसे चलकर एक कानमें कुण्डल धारण करनेवाले शत्रुदमन महाबाहु बलराम गर्गस्रोत नामक महातीर्थमें आये ॥ १३३ ॥

तत्र गर्गेण वृद्धेन तपसा भावितात्मना ॥ १४ ॥

कालज्ञानगतिश्चैव ज्योतिषां च व्यतिक्रमः ।

पृष्ठ 2747

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उत्पाता दारुणाश्चैव शुभाश्च जनमेजय ॥ १५ ॥

सरस्वत्याः शुभे तीर्थे विदिता वै महात्मना ।

तस्य नाम्ना च तत् तीर्थं गर्गस्रोत इति स्मृतम् ॥ १६ ॥

जनमेजय! वहाँ तपस्यासे पवित्र अन्तःकरणवाले महात्मा वृद्ध गर्गने सरस्वतीके उस शुभ तीर्थमें कालका ज्ञान, कालकी गति, ग्रहों और नक्षत्रोंके उलट - फेर, दारुण उत्पात तथा शुभ लक्षण– इन सभी बातोंकी जानकारी प्राप्त कर ली थी । उन्हींके नामसे वह तीर्थ गर्गस्रोत कहलाता है ॥ १४–१६ ॥

तत्र गर्गं महाभागमृषयः सुव्रता नृप ।

उपासांचक्रिरे नित्यं कालज्ञानं प्रति प्रभो ॥ १७ ॥

सामर्थ्यशाली नरेश्वर! वहाँ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषियोंने कालज्ञानके लिये सदा महाभाग गर्गमुनिकी उपासना ( सेवा ) की थी ॥ १७ ॥

तत्र गत्वा महाराज बलः श्वेतानुलेपनः ।

विधिवद्धि धनं दत्त्वा मुनीनां भावितात्मनाम् ॥ १८ ॥

उच्चावचांस्तथा भक्ष्यान् विप्रेभ्यो विप्रदाय सः ।

नीलवासास्तदागच्छच्छङ्खतीर्थं महायशाः ॥ १ ९ ॥

महाराज! वहाँ जाकर श्वेतचन्दनचर्चित, नीलाम्बरधारी महायशस्वी बलरामजी विशुद्ध अन्त करणवाले महर्षियोंको विधिपूर्वक धन देकर ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके भक्ष्य - भोज्य पदार्थ समर्पित करके वहाँसे शंखतीर्थमें चले गये ॥ १८-१९ ॥

तत्रापश्यन्महाशङ्खं महामेरुमिवोच्छ्रितम् ।

श्वेतपर्वतसंकाशमृषिसंघैर्निषेवितम् ॥ २० ॥

सरस्वत्यास्तटे जातं नगं तालध्वजो बली । वहाँ तालचिह्नित ध्वजावाले बलवान् बलरामने महाशंख नामक एक वृक्ष देखा, जो महान् मेरुपर्वतके समान ऊँचा और श्वेताचलके समान उज्ज्वल था । उसके नीचे ऋषियोंके समूह निवास करते थे । वह वृक्ष सरस्वतीके तटपर ही उत्पन्न हुआ था ॥ २०१३ ॥

यक्षा विद्याधराश्चैव राक्षसाश्चामितौजसः ॥ २१ ॥

पिशाचाश्चामितबला यत्र सिद्धाः सहस्रशः । उस वृक्षके आस - पास यक्ष, विद्याधर, अमित तेजस्वी राक्षस, अनन्त बलशाली पिशाच तथा सिद्धगण सहस्रोंकी संख्यामें निवास करते थे ॥ २१३ ॥

ते सर्वे ह्यशनं त्यक्त्वा फलं तस्य वनस्पतेः ॥ २२ ॥

व्रतैश्च नियमैश्चैव काले काले स्म भुञ्जते । वे सब - के - सब अन्न छोड़कर व्रत और नियमोंका पालन करते हुए समय - समयपर उस वृक्षका ही फल खाया करते थे ॥ २२ ॥

प्राप्तैश्च नियमैस्तैस्तैर्विचरन्तः पृथक् पृथक् ॥ २३ ॥

पृष्ठ 2748

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अदृश्यमाना मनुजैर्व्यचरन् पुरुषर्षभ ।

एवं ख्यातो नरव्याघ्र लोकेऽस्मिन् स वनस्पतिः ॥ २४ ॥

पुरुषश्रेष्ठ! वे उन स्वीकृत नियमोंके अनुसार पृथक्- पृथक् विचरते हुए मनुष्योंसे अदृश्य रहकर घूमते थे । नरव्याघ्र! इस प्रकार वह वनस्पति इस विश्वमें विख्यात था ॥ २३-२४ ॥

ततस्तीर्थं सरस्वत्याः पावनं लोकविश्रुतम् ।

तस्मिंश्च यदुशार्दूलो दत्त्वा तीर्थे पयस्विनीः ॥ २५ ॥

ताम्रायसानि भाण्डानि वस्त्राणि विविधानि च ।

पूजयित्वा द्विजांश्चैव पूजितश्च तपोधनैः ॥ २६ ॥

वह वृक्ष सरस्वतीका लोकविख्यात पावन तीर्थ है । यदुश्रेष्ठ बलराम उस तीर्थमें दूध देनेवाली गौओंका दान करके ताँबे और लोहेके बर्तन तथा नाना प्रकारके वस्त्र भी ब्राह्मणोंको दिये । ब्राह्मणोंका पूजन करके वे स्वयं भी तपस्वी मुनियोंद्वारा पूजित हुए ॥ २५-२६ ॥

पुण्यं द्वैतवनं राजन्नाजगाम हलायुधः ।

तत्र गत्वा मुनीन् दृष्ट्वा नानावेषधरान् बलः ॥ २७ ॥

आप्लुत्य सलिले चापि पूजयामास वै द्विजान् । राजन्! वहाँसे हलधर बलभद्रजी पवित्र द्वैतवनमें आये और वहाँके नाना वेशधारी मुनियोंका दर्शन करके जलमें गोता लगाकर उन्होंने ब्राह्मणोंका पूजन किया ॥ तथैव दत्त्वा विप्रेभ्यः परिभोगान् सुपुष्कलान् ॥ २८ ॥

ततः प्रायाद् बलो राजन् दक्षिणेन सरस्वतीम् । राजन्! इसी प्रकार विप्रवृन्दको प्रचुर भोगसामग्री अर्पित करके फिर बलरामजी सरस्वतीके दक्षिण तटपर होकर यात्रा करने लगे ॥ २८३ ॥

गत्वा चैवं महाबाहुर्नातिदूरे महायशाः ॥ २ ९ ॥

धर्मात्मा नागधन्वानं तीर्थमागमदच्युतः ।

यत्र पन्नगराजस्य वासुकेः संनिवेशनम् ॥ ३० ॥

महाद्युतेर्महाराज बहुभिः पन्नगैर्वृतम् ।

ऋषीणां हि सहस्राणि तत्र नित्यं चतुर्दश ॥ ३१ ॥

महाराज! इस प्रकार थोड़ी ही दूर जाकर महाबाहु, महायशस्वी धर्मात्मा भगवान् बलराम नागधन्वा नामक तीर्थमें पहुँच गये, जहाँ महातेजस्वी नागराज वासुकिका बहुसंख्यक सर्पोंसे घिरा हुआ निवासस्थान है । वहाँ सदा चौदह हजार ऋषि निवास करते हैं ॥ २ ९ –३१ ॥

यत्र देवाः समागम्य वासुकिं पन्नगोत्तमम् ।

सर्वपन्नगराजानमभ्यषिञ्चन् यथाविधि ॥ ३२ ॥

पृष्ठ 2749

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वहीं देवताओंने आकर सर्पोंमें श्रेष्ठ वासुकिको समस्त सर्पोंके राजाके पदपर विधिपूर्वक अभिषिक्त किया था ३२ ॥

पन्नगेभ्यो भयं तत्र विद्यते न स्म पौरव ।

तत्रापि विधिवद् दत्त्वा विप्रेभ्यो रत्नसंचयान् ॥ ३३ ॥

प्रायात् प्राचीं दिशं तत्र तत्र तीर्थान्यनेकशः ।

सहस्रशतसंख्यानि प्रथितानि पदे पदे ॥ ३४ ॥

पौरव! वहाँ किसीको सर्पोसे भय नहीं होता । उस तीर्थमें भी बलरामजी ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक ढेर- के - ढेर रत्न देकर पूर्वदिशाकी ओर चल दिये, जहाँ पग- पगपर अनेक

प्रकारके प्रसिद्ध तीर्थ प्रकट हुए हैं । उनकी संख्या लगभग एक लाख है ॥ ३३-३४ ॥

आप्लुत्य तत्र तीर्थेषु यथोक्तं तत्र चर्षिभिः ।

कृत्वोपवासनियमं दत्त्वा दानानि सर्वशः ॥ ३५ ॥

अभिवाद्य मुनींस्तान् वै तत्र तीर्थनिवासिनः ।

उद्दिष्टमार्गः प्रययौ यत्र भूयः सरस्वती ॥ ३६ ॥

प्राङ्मुखं वै निववृते वृष्टिर्वातहता यथा । उन तीर्थोंमें स्नान करके उन्होंने ऋषियोंके बताये अनुसार व्रत -उपवास आदि नियमोंका पालन किया । फिर सब प्रकारके दान करके तीर्थनिवासी मुनियोंको मस्तक नवाकर उनके बताये हुए मार्गसे वे पुनः उस स्थानकी ओर चल दिये, जहाँ सरस्वती हवाकी मारी हुई वर्षाके समान पुनः पूर्वदिशाकी ओर लौट पड़ी हैं ॥ ऋषीणां नैमिषेयाणामवेक्षार्थं महात्मनाम् ॥ ३७ ॥

निवृत्तां तां सरिच्छ्रेष्ठां तत्र दृष्ट्वा तु लाङ्गली ।

बभूव' विस्मितो राजन् बलः श्वेतानुलेपनः ॥ ३८ ॥

राजन्! नैमिषारण्यनिवासी महात्मा मुनियोंके दर्शनके लिये पूर्वदिशाकी ओर लौटी हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीका दर्शन करके श्वेत- चन्दनचर्चित हलधारी बलराम आश्चर्यचकित हो उठे ॥ ३७-३८ ॥ जनमेजय उवाच

कस्मात् सरस्वती ब्रह्मन् निवृत्ता प्राङ्मुखीभवत् ।

व्याख्यातमेतदिच्छामि सर्वमध्वर्युसत्तम ॥ ३ ९ ॥

कस्मिंश्चित् कारणे तत्र विस्मितो यदुनन्दनः ।

निवृत्ता हेतुना केन कथमेव सरिद्वरा ॥ ४० ॥

जनमेजयने पूछा— यजुर्वेदके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ विप्रवर! मैं आपके मुँहसे यह सुनना चाहता हूँ कि सरस्वती नदी किस कारणसे पीछे लौटकर पूर्वाभिमुख बहने लगी? क्या

पृष्ठ 2750

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कारण था कि वहाँ यदुनन्दन बलरामजीको भी आश्चर्य हुआ? सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती किस कारणसे और किस प्रकार पूर्वदिशाकी ओर लौटी थीं? ॥ वैशम्पायन उवाच

पूर्वं कृतयुगे राजन् नैमिषेयास्तपस्विनः ।

वर्तमाने सुविपुले सत्रे द्वादशवार्षिके ॥ ४१ ॥

ऋषयो बहवो राजंस्तत् सत्रमभिपेदिरे । वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! पूर्वकालके सत्ययुगकी बात है वहाँ बारह वर्षोंमें पूर्ण होनेवाले एक महान् यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ किया गया था । उस सत्रमें नैमिषारण्यनिवासी तपस्वी मुनि तथा अन्य बहुतसे ऋषि पधारे थे ॥ ४१३ ॥

उषित्वा च महाभागास्तस्मिन् सत्रे यथाविधि ॥ ४२ ॥

निवृत्ते नैमिषेये वै सत्रे द्वादशवार्षिके ।

आजग्मुरृयस्तत्र बहवस्तीर्थकारणात् ॥ ४३ ॥

नैमिषारण्यवासियोंके उस द्वादशवर्षीय यज्ञमें वे महाभाग ऋषि दीर्घकालतक रहे । जब वह यज्ञ समाप्त हो गया तब बहुत- से महर्षि तीर्थसेवनके लिये वहाँ आये ॥

ऋषीणां बहुलत्वात्तु सरस्वत्या विशाम्पते ।

तीर्थानि नगरायन्ते कूले वै दक्षिणे तदा ॥ ४४ ॥

प्रजानाथ! ऋषियोंकी संख्या अधिक होनेके कारण सरस्वतीके दक्षिण तटपर जितने तीर्थ थे, वे सभी नगरोंके समान प्रतीत होने लगे ॥ ४४ ॥

समन्तपञ्चकं यावत्तावत्ते द्विजसत्तमाः ।

तीर्थलोभान्नरव्याघ्र नद्यास्तीरं समाश्रिताः ॥ ४५ ॥

पुरुषसिंह! तीर्थसेवनके लोभसे वे ब्रह्मर्षिगण समन्तपंचक तीर्थतक सरस्वती नदीके तटपर ठहर गये ॥

तां तत्र तेषां तु मुनीनां भावितात्मनाम् ।

स्वाध्यायेनातिमहता बभूवुः पूरिता दिशः ॥ ४६ ॥

वहाँ होम करते हुए पवित्रात्मा मुनियोंके अत्यन्त गम्भीर स्वरसे किये जानेवाले स्वाध्यायके शब्दसे सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठी थीं ॥ ४६ ॥

अग्निहोत्रैस्ततस्तेषां क्रियमाणैर्महात्मनाम् ।

अशोभत सरिच्छ्रेष्ठा दीप्यमानैः समन्ततः ॥ ४७ ॥

चारों ओर प्रकाशित हुए उन महात्माओंद्वारा किये जानेवाले यज्ञसे सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ४७ ॥

वालखिल्या महाराज अश्मकुट्टाश्च तापसाः ।

दन्तोलूखलिनश्चान्ये प्रसंख्यानास्तथा परे ॥ ४८ ॥