श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 2771–2780

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2771–2780

पृष्ठ 2771

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2771 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

उनके ऐसा कहनेपर गाधिने सम्पूर्ण प्रजाओंसे कहा - ' मेरा पुत्र सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करनेवाला होगा ( अतः तुम्हें भयभीत नहीं होना चाहिये ) ' ॥ १५ ॥

इत्युक्त्वा तु ततो गाधिर्विश्वामित्रं निवेश्य च ।

जगाम त्रिदिवं राजन् विश्वामित्रोऽभवनृपः ॥ १६ ॥

राजन्! यों कहकर राजा गाधि विश्वामित्रको राजसिंहासनपर बिठाकर स्वर्गलोकको चले गये । तत्पश्चात् विश्वामित्र राजा हुए ॥ १६ ॥

न स शक्नोति पृथिवीं यत्नवानपि रक्षितुम् ।

ततः शुश्राव राजा स राक्षसेभ्यो महाभयम् ॥ १७ ॥

वे प्रयत्नशील होनेपर भी सम्पूर्ण भूमण्डलकी रक्षा नहीं कर पाते थे । एक दिन राजा विश्वामित्रने सुना कि ‘ प्रजाको राक्षसोंसे महान् भय प्राप्त हुआ है ' ॥ १७ ॥

निर्ययौ नगराच्चापि चतुरङ्गबलान्वितः ।

स गत्वा दूरमध्वानं वसिष्ठाश्रममभ्ययात् ॥ १८ ॥

तब वे चतुरंगिणी सेना लेकर नगरसे निकल पड़े और दूरतकका रास्ता तय करके वसिष्ठके आश्रमके पास जा पहुँचे ॥ १८ ॥

तस्य ते सैनिका राजंश्चक्रुस्तत्रानयात् बहून् ।

ततस्तु भगवान् विप्रो वसिष्ठोऽऽश्रममभ्ययात् ॥ १ ९ ॥

राजन्! उनके उन सैनिकोंने वहाँ बहुत से अन्याय एवं अत्याचार किये । तदनन्तर पूज्य ब्रह्मर्षि वसिष्ठ कहींसे अपने आश्रमपर आये ॥ १ ९ ॥

ददृशेऽथ ततः सर्वं भज्यमानं महावनम् ।

तस्य क्रुद्धो महाराज वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥ २० ॥

आकर उन्होंने देखा कि वह सारा विशाल वन उजाड़ होता जा रहा है । महाराज! यह देखकर मुनिवर वसिष्ठ राजा विश्वामित्रपर कुपित हो उठे ॥ २० ॥

सृजस्व शबरान् घोरानिति स्वां गामुवाच ह ।

तथोक्ता सासृजद् धेनुः पुरुषान् घोरदर्शनान् ॥ २१ ॥

फिर उन्होंने अपनी गौ नन्दिनीसे कहा - ' तुम भयंकर भील जातिके सैनिकोंकी सृष्टि करो ' । उनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर उनकी होमधेनुने ऐसे पुरुषोंको उत्पन्न किया, जो देखनेमें बड़े भयानक थे ॥ २१ ॥

ते तु तद्बलमासाद्य बभञ्जुः सर्वतोदिशम् ।

तच्छ्रुत्वा विद्रुतं सैन्यं विश्वामित्रस्तु गाधिजः ॥ २२ ॥

तपः परं मन्यमानस्तपस्येव मनो दधे । उन्होंने विश्वामित्रकी सेनापर आक्रमण करके उनके सैनिकोंको सम्पूर्ण दिशाओंमें मार भगाया । गाधिनन्दन विश्वामित्रने जब यह सुना कि मेरी सेना भाग गयी तो तपको ही अधिक प्रबल मानकर तपस्यामें ही मन लगाया ॥ २२३ ॥

पृष्ठ 2772

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2772 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सोऽस्मिंस्तीर्थवरे राजन् सरस्वत्याः समाहितः ॥ २३ ॥

नियमैश्चोपवासैश्च कर्षयन् देहमात्मनः । राजन्! उन्होंने सरस्वतीके उस श्रेष्ठ तीर्थमें चित्तको एकाग्र करके नियमों और उपवासोंके द्वारा अपने शरीरको सुखाना आरम्भ किया ॥ २३ ॥

जलाहारो वायुभक्षः पर्णाहारश्च सोऽभवत् ॥ २४ ॥

तथा स्थण्डिलशायी च ये चान्ये नियमाः पृथक् । वे कभी जल पीकर रहते, कभी वायुको ही आहार बनाते और कभी पत्ते चबाकर रहते थे । सदा भूमिकी वेदी बनाकर उसपर सोते और तपस्यासम्बन्धी जो अन्य सारे नियम हैं, उनका भी पृथक् - पृथक् पालन करते थे ॥ २४३ ॥

असकृत्तस्य देवास्तु व्रतविघ्नं प्रचक्रिरे ॥ २५ ॥

न चास्य नियमाद् बुद्धिरपयाति महात्मनः । देवताओंने उनके व्रतमें बारंबार विघ्न डाला; परंतु उन महात्माकी बुद्धि कभी नियमसे विचलित नहीं होती थी ॥ २५३ ॥

ततः परेण यत्नेन तप्त्वा बहुविधं तपः ॥ २६ ॥

तेजसा भास्कराकारो गाधिजः समपद्यत । तदनन्तर महान् प्रयत्नके द्वारा नाना प्रकारकी तपस्या करके गाधिनन्दन विश्वामित्र अपने तेजसे सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे ॥ २६३ ॥

तपसा तु तथा युक्तं विश्वामित्रं पितामहः ॥ २७ ॥

अमन्यत महातेजा वरदो वरमस्य तत् । विश्वामित्रको ऐसी तपस्या से युक्त देख महातेजस्वी एवं वरदायक ब्रह्माजीने उन्हें वर देनेका विचार किया ॥ २७ ॥

स तु वव्रे वरं राजन् स्यामहं ब्राह्मणस्त्विति ॥ २८ ॥

तथेति चाब्रवीद् ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः । राजन्! तब उन्होंने यह वर माँगा कि ' मैं ब्राह्मण हो जाऊँ। ' सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीने उन्हें ‘ तथास्तु ' कहकर वह वर दे दिया ॥ २८३ ॥

स लब्ध्वा तपसोग्रेण ब्राह्मणत्वं महायशाः ॥ २ ९ ॥ विचचार महीं कृत्स्नां कृतकामः सुरोपमः । उस उग्र तपस्याके द्वारा ब्राह्मणत्व पाकर सफलमनोरथ हुए महायशस्वी विश्वामित्र देवताके समान समस्त भूमण्डलमें विचरने लगे ॥ २ ९ ३ ॥ तस्मिंस्तीर्थवरे रामः प्रदाय विविधं वसु ॥ ३० ॥

पयस्विनीस्तथा धेनूर्यानानि शयनानि च ।

अथ वस्त्राण्यलङ्कारं भक्ष्यं पेयं च शोभनम् ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 2773

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2773 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अददान्मुदितो राजन् पूजयित्वा द्विजोत्तमान् ।

ययौ राजंस्ततो रामो बकस्याश्रममन्तिकात् ।

यत्र तेपे तपस्तीव्रं दाल्भ्यो बक इति श्रुतिः ॥ ३२ ॥

राजन्! बलरामजीने उस श्रेष्ठ तीर्थमें उत्तम ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें दूध देनेवाली गौएँ, वाहन, शय्या, वस्त्र अलंकार तथा खाने - पीनेके सुन्दर पदार्थ प्रसन्नतापूर्वक दिये । फिर वहाँसे वे बकके आश्रमके निकट गये, जहाँ दल्भपुत्र बकने तीव्र तपस्या की थी ॥ ३०– ३२ ॥ इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४० ॥

पृष्ठ 2774

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2774 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकचत्वारिंशोऽध्यायः अवाकीर्ण और यायात तीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दाल्भ्यकी कथा और ययातिके यज्ञका वर्णन वैशम्पायन उवाच

ब्रह्मयोनेरवाकीर्णं जगाम यदुनन्दनः ।

यत्र दाल्भ्यो बको राजन्नाश्रमस्थो महातपाः ॥ १ ॥

जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं वैचित्रवीर्यिणः ।

तपसा घोररूपेण कर्षयन् देहमात्मनः ॥ २ ॥

क्रोधेन महताऽऽविष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् । वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी ' अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था ॥ १-२ ॥ पुरा हि नैमिषीयाणां सत्रे द्वादशवार्षिके ॥ ३ ॥

वृत्ते विश्वजितोऽन्ते वै पञ्चालानृषयोऽगमन् ।

तत्रेश्वरमयाचन्त दक्षिणार्थं मनस्विनः ॥ ४ ॥

पूर्वकालमें नैमिषारण्यनिवासी ऋषियोंने बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाले एक सत्रका आरम्भ किया था । जब वह पूरा हो गया, तब वे सब ऋषि विश्वजित् नामक यज्ञके अन्तमें पांचाल देशमें गये । वहाँ जाकर उन मनस्वी मुनियोंने उस देशके राजासे दक्षिणाके लिये धनकी याचना की ॥ ( तत्र ते लेभिरे राजन् पञ्चालेभ्यो महर्षयः )

बलान्वितान् वत्सतरान् निर्व्याधीनेकविंशतिम् ।

तानब्रवीद् बको दाल्भ्यो विभजध्वं पशूनिति ॥ ५ ॥

पशूनेतानहं त्यक्त्वा भिक्षिष्ये राजसत्तमम् । राजन्! वहाँ महर्षियोंने पांचालोंसे इक्कीस बलवान् और नीरोग बछड़े प्राप्त किये । तब उनमेंसे दल्भपुत्र बकने अन्य सब ऋषियोंसे कहा – ' आपलोग इन पशुओंको बाँट लें । मैं इन्हें छोड़कर किसी श्रेष्ठ राजासे दूसरे पशु माँग लूँगा' ॥ ५३ ॥

एवमुक्त्वा ततो राजन्नृषीन् सर्वान् प्रतापवान् ॥ ६ ॥

जगाम धृतराष्ट्रस्य भवनं ब्राह्मणोत्तमः ।

पृष्ठ 2775

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2775 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नरेश्वर! उन सब ऋषियोंसे ऐसा कहकर वे प्रतापी उत्तम ब्राह्मण राजा धृतराष्ट्रके घरपर गये ॥ ६३ ॥

स समीपगतो भूत्वा धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ॥ ७ ॥

अयाचत पशून् दाल्भ्यः स चैनं रुषितोऽब्रवीत् ।

यदृच्छया मृता दृष्ट्वा गास्तदा नृपसत्तमः ॥ ८ ॥

एतान् पशून् नय क्षिप्रं ब्रह्मबन्धो यदीच्छसि । निकट जाकर दल्भ्यने कौरवनरेश धृतराष्ट्रसे पशुओंकी याचना की । यह सुनकर नृपश्रेष्ठ धृतराष्ट्र कुपित हो उठे । उनके यहाँ कुछ गौएँ दैवेच्छासे मर गयी थीं । उन्हींको लक्ष्य करके राजाने क्रोधपूर्वक कहा– 'ब्रह्मबन्धो! यदि पशु चाहते हो तो इन मरे हुए पशुओंको ही शीघ्र ले जाओ ' ॥ ७-८३ ॥ ऋषिस्तथा वचः श्रुत्वा चिन्तयामास धर्मवित् ॥ ९ ॥

अहो बत नृशंसं वै वाक्यमुक्तोऽस्मि संसदि । उनकी वैसी बात सुनकर धर्मज्ञ ऋषिने चिन्तामग्न होकर सोचा- ' अहो! बड़े खेदकी बात है कि इस राजाने भरी सभामें मुझसे ऐसा कठोर वचन कहा है' ॥ ९ ३ ॥ चिन्तयित्वा मुहूर्तेन रोषाविष्टो द्विजोत्तमः ॥ १० ॥

मतिं चक्रे विनाशाय धृतराष्ट्रस्य भूपतेः । दो घड़ीतक इस प्रकार चिन्ता करके रोषमें भरे हुए द्विजश्रेष्ठ दाल्भ्यने राजा धृतराष्ट्रके विनाशका विचार किया ॥ १०३ ॥

स तूत्कृत्य मृतानां वै मांसानि मुनिसत्तमः ॥ ११ ॥

जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं नरपतेः पुरा । वे मुनिश्रेष्ठ उन मृत पशुओंके ही मांस काट- काटकर उनके द्वारा राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रकी ही आहुति देने लगे ॥ ११३ ॥

अवाकीर्णे सरस्वत्यास्तीर्थे प्रज्वाल्य पावकम् ॥ १२ ॥

बको दाल्भ्यो महाराज नियमं परमं स्थितः ।

स तैरेव जुहावास्य राष्ट्रं मांसैर्महातपाः ॥ १३ ॥

महाराज! सरस्वतीके अवाकीर्णतीर्थमें अग्नि प्रज्वलित करके महातपस्वी दल्भपुत्र बक उत्तम नियमका आश्रय ले उन मृत पशुओंके मांसोंद्वारा ही उनके राष्ट्रका हवन करने लगे ॥ १२-१३ ॥

तस्मिंस्तु विधिवत् सत्रे सम्प्रवृत्ते सुदारुणे ।

अक्षीयत ततो राष्ट्रं धृतराष्ट्रस्य पार्थिव ॥ १४ ॥

राजन्! वह भयंकर यज्ञ जब विधिपूर्वक आरम्भ हुआ, तबसे धृतराष्ट्रका राष्ट्र क्षीण होने लगा ॥ १४ ॥

पृष्ठ 2776

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2776 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

ततः प्रक्षीयमाणं तद् राज्यं तस्य महीपतेः ।

छिद्यमानं यथानन्तं वनं परशुना विभो ॥ १५ ॥

बभूवापद्गतं तच्च व्यवकीर्णमचेतनम् । प्रभो! जैसे बड़ा भारी वन कुल्हाड़ीसे काटा जा रहा हो, उसी प्रकार उस राजाका राज्य क्षीण होता हुआ भारी आफतमें फँस गया, वह संकटग्रस्त होकर अचेत हो गया ॥ १५३ ॥

दृष्ट्वा तथावकीर्णं तु राष्ट्रं स मनुजाधिपः ॥ १६ ॥

बभूव दुर्मना राजंश्चिन्तयामास च प्रभुः ।

मोक्षार्थमकरोद् यत्नं ब्राह्मणैः सहितः पुरा ॥ १७ ॥

राजन्! अपने राष्ट्रको इस प्रकार संकटमग्न हुआ देख वे नरेश मन- ही - मन बहुत दुःखी हुए और गहरी चिन्तामें डूब गये । फिर ब्राह्मणोंके साथ अपने देशको संकटसे बचानेका प्रयत्न करने लगे ॥ १६-१७ ॥

न च श्रेयोऽध्यगच्छत्तु क्षीयते राष्ट्रमेव च ।

यदा स पार्थिवः खिन्नस्ते च विप्रास्तदानघ ॥ १८ ॥

अनघ! जब किसी प्रकार भी वे भूपाल अपने राष्ट्रका कल्याण- साधन न कर सके और वह दिन -प्रतिदिन क्षीण होता ही चला गया, तब राजा और उन ब्राह्मणोंको बड़ा खेद हुआ ॥ १८ ॥

यदा चापि न शक्नोति राष्ट्रं मोक्षयितुं नृप ।

अथ वै प्राश्निकांस्तत्र पप्रच्छ जनमेजय ॥ १ ९ ॥

नरेश्वर जनमेजय! जब धृतराष्ट्र अपने राष्ट्रको उस विपत्तिसे छुटकारा दिलानेमें समर्थ न हो सके, तब उन्होंने प्राश्निकों (प्रश्न पूछनेपर भूत, वर्तमान और भविष्यकी बातें बतानेवालों ) को बुलाकर उनसे इसका कारण पूछा ॥ १ ९ ॥

ततो वै प्राश्निकाः प्राहुः पशोर्विप्रकृतस्त्वया ।

मांसैरभिजुहोतीदं तव राष्ट्रं मुनिर्बकः ॥ २० ॥

तब उन प्राश्निकोंने कहा-' आपने पशुके लिये याचना करनेवाले बक मुनिका तिरस्कार किया है; इसलिये वे मृत पशुओंके मांसोंद्वारा आपके इस राष्ट्रका विनाश करनेकी इच्छासे होम कर रहे हैं ॥ २० ॥

तेन ते हूयमानस्य राष्ट्रस्यास्य क्षयो महान् 1 तस्यैतत् तपसः कर्म येन तेऽद्य लयो महान् ॥ २१ ॥

‘ उनके द्वारा आपके राष्ट्रकी आहुति दी जा रही है; इसलिये इसका महान् विनाश हो रहा है। यह सब उनकी तपस्याका प्रभाव है, जिससे आपके इस देशका इस समय महान् विलय होने लगा है ॥ २१ ॥

अपां कुञ्जे सरस्वत्यास्तं प्रसादय पार्थिव ।

सरस्वतीं ततो गत्वा स राजा बकमब्रवीत् ॥ २२ ॥

पृष्ठ 2777

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2777 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

' भूपाल! सरस्वतीके कुंजमें जलके समीप वे मुनि विराजमान हैं, आप उन्हें प्रसन्न कीजिये । ' तब राजाने सरस्वतीके तटपर जाकर बक मुनिसे इस प्रकार कहा ॥ २२ ॥

निपत्य शिरसा भूमौ प्राञ्जलिर्भरतर्षभ ।

प्रसादये त्वां भगवन्नपराधं क्षमस्व मे ॥ २३ ॥

मम दीनस्य लुब्धस्य मौर्व्येण हतचेतसः ।

त्वं गतिस्त्वं च मे नाथः प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ २४ ॥

भरतश्रेष्ठ! वे पृथ्वीपर माथा टेक हाथ जोड़कर बोले— ' भगवन्! मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ । आप मुझ दीन, लोभी और मूर्खतासे हतबुद्धि हुए अपराधीके अपराधको क्षमा कर दें । आप ही मेरी गति हैं । आप ही मेरे रक्षक हैं । आप मुझपर अवश्य कृपा करें' ॥ २३-२४ ॥

तं तथा विलपन्तं तु शोकोपहतचेतसम् ।

दृष्ट्वा तस्य कृपा जज्ञे राष्ट्रं तस्य व्यमोचयत् ॥ २५ ॥

राजा धृतराष्ट्रको इस प्रकार शोकसे अचेत होकर विलाप करते देख उनके मनमें दया आ गयी और उन्होंने राजाके राज्यको संकटसे मुक्त कर दिया ॥ २५ ॥

ऋषिः प्रसन्नस्तस्याभूत् संरम्भं च विहाय सः ।

मोक्षार्थं तस्य राज्यस्य जुहाव पुनराहुतिम् ॥ २६ ॥

ऋषि क्रोध छोड़कर राजापर प्रसन्न हुए और पुनः उनके राज्यको संकटसे बचानेके लिये आहुति देने लगे ॥

मोक्षयित्वा ततो राष्ट्रं प्रतिगृह्य पशून् बहून् ।

हृष्टात्मा नैमिषारण्यं जगाम पुनरेव सः ॥ २७ ॥

इस प्रकार राज्यको विपत्तिसे छुड़ाकर राजासे बहुत -से पशु ले प्रसन्नचित्त हुए महर्षि दाल्भ्य पुनः नैमिषारण्यको ही चले गये ॥ २७ ॥

धृतराष्ट्रोऽपि धर्मात्मा स्वस्थचेता महामनाः ।

स्वमेव नगरं राजन् प्रतिपेदे महर्द्धिमत् ॥ २८ ॥

राजन्! फिर महामनस्वी धर्मात्मा धृतराष्ट्र भी स्वस्थचित्त हो अपने समृद्धिशाली नगरको ही लौट आये ॥

तत्र तीर्थे महाराज बृहस्पतिरुदारधीः ।

असुराणामभावाय भवाय च दिवौकसाम् ॥ २ ९ ॥

मांसैरभिजुहावेष्टिमक्षीयन्त ततोऽसुराः ।

दैवतैरपि सम्भग्ना जितकाशिभिराहवे ॥ ३० ॥

महाराज! उसी तीर्थमें उदारबुद्धि बृहस्पतिजीने असुरोंके विनाश और देवताओंकी उन्नतिके लिये मांसोंद्वारा आभिचारिक यज्ञका अनुष्ठान किया था । इससे वे असुर क्षीण हो गये और युद्धमें विजयसे सुशोभित होनेवाले देवताओंने उन्हें मार भगाया ॥ २ ९ -३० ॥

पृष्ठ 2778

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2778 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तत्रापि विधिवद् दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशाः ।

वाजिनः कुञ्जरांश्चैव रथांश्चाश्वतरीयुतान् ॥ ३१ ॥

रत्नानि च महार्हाणि धनं धान्यं च पुष्कलम् ।

ययौ तीर्थं महाबाहुर्यायातं पृथिवीपते ॥ ३२ ॥

पृथ्वीनाथ! महायशस्वी महाबाहु बलरामजी उस तीर्थमें भी ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक हाथी, घोड़े, खच्चरियोंसे जुते हुए रथ, बहुमूल्य रत्न तथा प्रचुर धन- धान्यका दान करके वहाँसे यायात तीर्थमें गये ॥ ३१-३२ ॥

तत्र यज्ञे ययातेश्च महाराज सरस्वती ।

सर्पिः पयश्च सुस्राव नाहुषस्य महात्मनः ॥ ३३ ॥

महाराज! वहाँ पूर्वकालमें नहुषनन्दन महात्मा ययातिने यज्ञ किया था, जिसमें सरस्वतीने उनके लिये दूध और घीका स्रोत बहाया था ॥ ३३ ॥

तत्रेष्ट्वा पुरुषव्याघ्रो ययातिः पृथिवीपतिः ।

अक्रामदूर्ध्वं मुदितो लेभे लोकांश्च पुष्कलान् ॥ ३४ ॥

पुरुषसिंह भूपाल ययाति वहाँ यज्ञ करके प्रसन्नतापूर्वक ऊर्ध्वलोकमें चले गये और वहाँ उन्हें बहुत- से पुण्यलोक प्राप्त हुए ॥ ३४ ॥

पुनस्तत्र च राज्ञस्तु ययातेर्यजतः प्रभोः ।

औदार्यं परमं कृत्वा भक्तिं चात्मनि शाश्वतीम् ॥ ३५ ॥

ददौ कामान् ब्राह्मणेभ्यो यान् यान् यो मनसेच्छति । शक्तिशाली राजा ययाति जब वहाँ यज्ञ कर रहे थे, उस समय उनकी उत्कृष्ट उदारताको दृष्टिमें रखकर और अपने प्रति उनकी सनातन भक्ति देख सरस्वतीने उस यज्ञमें आये हुए ब्राह्मणोंको, जिसने अपने मनसे जिन -जिन भोगोंको चाहा, वे सभी मनोवांछित भोग प्रदान किये ॥ ३५ ॥

यो यत्र स्थित एवेह आहूतो यज्ञसंस्तरे ॥ ३६ ॥

तस्य तस्य सरिच्छ्रेष्ठा गृहादिशयनादिकम् ।

षड्रसं भोजनं चैव दानं नानाविधं तथा ॥ ३७ ॥

राजाके यज्ञमण्डपमें बुलाकर आया हुआ जो ब्राह्मण जहाँ कहीं ठहर गया, वहीं उसके लिये सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीने पृथक् - पृथक् गृह, शय्या, आसन, षड्स भोजन तथा नाना प्रकारके दानकी व्यवस्था की ॥ ३६-३७ ॥

ते मन्यमाना राज्ञस्तु सम्प्रदानमनुत्तमम् ।

राजानं तुष्टुवुः प्रीता दत्त्वा चैवाशिषः शुभाः ॥ ३८ ॥

उन ब्राह्मणोंने यह समझकर कि राजाने ही वह उत्तम दान दिया है, अत्यन्त प्रसन्न होकर राजा ययातिको शुभाशीर्वाद दे उनकी भूरि- भूरि प्रशंसा की ॥ ३८ ॥

तत्र देवाः सगन्धर्वाः प्रीता यज्ञस्य सम्पदा ।

पृष्ठ 2779

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2779 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

विस्मिता मानुषाश्चासन् दृष्ट्वा तां यज्ञसम्पदम् ॥ ३ ९ ॥ उस यज्ञकी सम्पत्तिसे देवता और गन्धर्व भी बड़े प्रसन्न हुए थे । मनुष्योंको तो वह यज्ञ-वैभव देखकर महान् आश्चर्य हुआ था ॥ ३ ९ ॥ ततस्तालकेतुर्महाधर्मकेतु- र्महात्मा कृतात्मा महादाननित्यः । वसिष्ठापवाहं महाभीमवेगं धृतात्मा जितात्मा समभ्याजगाम ॥ ४० ॥

तदनन्तर महान् धर्म ही जिनकी ध्वजा है और जिनकी पताकापर ताड़का चिह्न सुशोभित है, वे महात्मा, कृतात्मा, धृतात्मा तथा जितात्मा बलरामजी, जो प्रतिदिन बड़े-बड़े दान किया करते थे, वहाँसे वसिष्ठापवाह नामक तीर्थमें गये, जहाँ सरस्वतीका वेग बड़ा भयंकर है ॥ ४० || इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने एकचत्वारिंशोऽध्याय ॥ ४१ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ४० श्लोक हैं । )

पृष्ठ 2780

महाभारत — खण्ड ४, पृष्ठ 2780 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्विचत्वारिंशोऽध्यायः वसिष्ठापवाह तीर्थकी उत्पत्तिके प्रसंगमें विश्वामित्रका क्रोध और वसिष्ठजीकी सहनशीलता जनमेजय उवाच

वसिष्ठस्यापवाहोऽसौ भीमवेगः कथं नु सः ।

किमर्थं च सरिच्छ्रोष्ठा तमृषिं प्रत्यवाहयत् ॥ १ ॥

कथमस्याभवद् वैरं कारणं किं च तत् प्रभो ।

शंस पृष्टो महाप्राज्ञ न हि तृप्यामि ते वचः ॥ २ ॥

जनमेजयने पूछा — प्रभो! वसिष्ठापवाह तीर्थमें सरस्वतीके जलका भयंकर वेग कैसे हुआ? सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीने उन महर्षिको किस लिये बहाया? उनके साथ उसका वैर कैसे हुआ? उस वैरका कारण क्या है? महामते! मैंने जो पूछा है, वह बताइये । मैं आपके वचनोंको सुनते - सुनते तृप्त नहीं होता हूँ ॥ वैशम्पायन उवाच

विश्वामित्रस्य विप्रर्षेर्वसिष्ठस्य च भारत ।

भृशं वैरमभूद् राजंस्तपःस्पर्धाकृतं महत् ॥ ३ ॥

वैशम्पायनजीने कहा— भारत! तपस्यामें होड़ लग जानेके कारण विश्वामित्र तथा ब्रह्मर्षि वसिष्ठमें बड़ा भारी वैर हो गया था ॥ ३ ॥

आश्रमो वै वसिष्ठस्य स्थाणुतीर्थेऽभवन्महान् ।

पूर्वतः पार्श्वतश्चासीद् विश्वामित्रस्य धीमतः ॥ ४ ॥

सरस्वतीके स्थाणुतीर्थमें पूर्वतटपर वसिष्ठका बहुत बड़ा आश्रम था और पश्चिमतटपर बुद्धिमान् विश्वामित्र मुनिका आश्रम बना हुआ था ॥ ४ ॥

यत्र स्थाणुर्महाराज तप्तवान् परमं तपः ।

तत्रास्य कर्म तद् घोरं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ५ ॥

महाराज! जहाँ भगवान् स्थाणुने बड़ी भारी तपस्या की थी, वहाँ मनीषी पुरुष उनके घोर तपका वर्णन करते हैं ॥ ५ ॥

यत्रेष्ट्वा भगवान् स्थाणुः पूजयित्वा सरस्वतीम् ।

स्थापयामास तत् तीर्थं स्थाणुतीर्थमिति प्रभो ॥ ६ ॥

प्रभो! जहाँ भगवान् स्थाणु ( शिव) -ने सरस्वतीका पूजन और यज्ञ करके तीर्थकी स्थापना की थी, वहाँ वह तीर्थ स्थाणुतीर्थके नामसे विख्यात हुआ ॥ ६ ॥

तत्र तीर्थे सुराः स्कन्दमभ्यषिञ्चन्नराधिप ।