04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 461–470

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 461–470

पृष्ठ 461

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कश्यपके इस आदेशसे योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामने जितनी दूर बाण फेंका जा सकता है, समुद्रको उतनी ही दूर पीछे हटाकर ब्राह्मणकी आज्ञाका पालन करते हुए उत्तम पर्वत गिरिश्रेष्ठ महेन्द्रपर निवास किया ॥ २२३ ॥

एवं गुणशतैर्युक्तो भृगूणां कीर्तिवर्धनः ॥ २३ ॥

जामदग्न्यो ह्यतियशा मरिष्यति महाद्युतिः । इस प्रकार भृगुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले महायशस्वी, महातेजस्वी और सैकड़ों गुणोंसे सम्पन्न जमदग्निनन्दन परशुराम भी एक न एक दिन मरेंगे ही ॥ २३ ॥

त्वया चतुर्भद्रतरः पुत्रात् पुण्यतरस्तव ॥ २४ ॥

अयज्वानमदाक्षिण्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः । सृजय! चारों कल्याणकारी गुणोंमें वे तुमसे श्रेष्ठ और तुम्हारे पुत्रसे अधिक पुण्यात्मा हैं । अतः तुम यज्ञानुष्ठान और दान- दक्षिणासे रहित अपने पुत्रके लिये शोक न करो ॥ २४३ ||

एते चतुर्भद्रतरास्त्वया भद्रशताधिकाः ।

मृता नरवरश्रेष्ठ मरिष्यन्ति च सृञ्जय ॥ २५ ॥

नरश्रेष्ठ सृजय! अबतक जिन लोगोंका वर्णन किया गया है, ये चतुर्विध कल्याणकारी गुणोंमें तो तुमसे बढ़कर थे ही, तुम्हारी अपेक्षा उनमें सैकड़ों मंगलकारी गुण अधिक भी थे; तथापि वे मर गये और जो विद्यमान हैं, वे भी मरेंगे ही ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयो- पाख्यानविषयक सत्तरवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥

पृष्ठ 462

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एकसप्ततितमोऽध्यायः नारदजीका सृजयके पुत्रको जीवित करना और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अन्तर्धान होना व्यास उवाच

पुण्यमाख्यानमायुष्यं श्रुत्वा षोडशराजकम् ।

अव्याहरन्नरपतिस्तूष्णीमासीत् स सृञ्जयः ॥ १ ॥

व्यासजी कहते हैं - राजन्! इन सोलह राजाओंका पवित्र एवं आयुकी वृद्धि करनेवाला उपाख्यान सुनकर राजा संजय कुछ भी नहीं बोलते हुए मौन रह गये ॥ १ ॥

तमब्रवीत् तथाऽऽसीनं नारदो भगवानृषिः ।

श्रुतं कीर्तयतो मह्यं गृहीतं ते महाद्युते ॥ २ ॥

उन्हें इस प्रकार चुपचाप बैठे देख भगवान् नारदमुनिने उनसे पूछा - ' महातेजस्वी नरेश! मैंने जो कुछ कहा है, उसे तुमने सुना और समझा है न? ' ॥ २ ॥

आहोस्विदन्ततो नष्टं श्राद्धं शूद्रीपताविव ।

स एवमुक्तः प्रत्याह प्राञ्जलिः सृञ्जयस्तदा ॥ ३ ॥

' अथवा ऐसा तो नहीं हुआ कि जैसे शूद्रजातिकी स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मणको दिया हुआ श्राद्धका दान नष्ट ( निष्फल ) हो जाता है, उसी प्रकार मेरा यह सारा कहना अन्ततोगत्वा व्यर्थ हो गया हो । ' उनके इस प्रकार पूछनेपर उस समय सृजयने हाथ जोड़कर उत्तर दिया- ॥ ३ ॥

एतच्छ्रुत्वा महाबाहो धन्यमाख्यानमुत्तमम् ।

राजर्षीणां पुराणानां यज्वनां दक्षिणावताम् ॥ ४ ॥

विस्मयेन हृते शोके तमसीवार्कतेजसा ।

विपाप्मास्म्यव्यथोपेतो ब्रूहि किं करवाण्यहम् ॥ ५ ॥

‘ महाबाहु महर्षे! यज्ञ करने और दक्षिणा देनेवाले प्राचीन राजर्षियोंका यह परम उत्तम सराहनीय उपाख्यान सुनकर मुझे ऐसा विस्मय हुआ है कि उसने मेरा सारा शोक हर लिया है । ठीक उसी तरह, जैसे सूर्यका तेज सारा अन्धकार हर लेता है । अब मैं पाप ( दुःख ) और

व्यथासे शून्य हो गया हूँ । बताइये, आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ' ॥ ४-५ ॥

नारद उवाच

दिष्ट्यापहृतशोकस्त्वं वृणीष्वेह यदिच्छसि ।

तत् तत् प्रपत्स्यसे सर्वं न मृषावादिनो वयम् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 463

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नारदजीने कहा— राजन्! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा शोक दूर हो गया । अब तुम्हारी जो इच्छा हो, यहाँ मुझसे माँग लो । तुम्हारी वह सारी अभिलषित वस्तु तुम्हें प्राप्त हो जायगी । हमलोग झूठ नहीं बोलते हैं ॥ ६ ॥

सृञ्जय उवाच

एतेनैव प्रतीतोऽहं प्रसन्नो यद्भवान् मम ।

प्रसन्नो यस्य भगवान् न तस्यास्तीह दुर्लभम् ॥ ७ ॥

सृजने कहा- मुने! आप मुझपर प्रसन्न हैं, इतनेसे ही मैं पूर्ण संतुष्ट हूँ । जिसपर आप प्रसन्न हों, उसे इस जगत् में कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ७ ॥

नारद उवाच

मृतं ददानि ते पुत्रं दस्युभिर्निहतं वृथा ।

उद्धृत्य नरकात् कष्टात् पशुवत् प्रोक्षितं यथा ॥ ८ ॥

नारदजीने कहा — राजन्! लुटेरोंने तुम्हारे पुत्रको प्रोक्षित पशुकी भाँति व्यर्थ ही मार डाला है । तुम्हारे उस मरे हुए पुत्रको मैं कष्टप्रद नरकसे निकालकर तुम्हें पुनः वापस दे रहा हूँ ॥ ८ ॥

व्यासउवाच

प्रादुरासीत् ततः पुत्रः सृञ्जयस्याद्भुतप्रभः ।

प्रसन्नेनर्षिणा दत्तः कुबेरतनयोपमः ॥ ९ ॥

व्यासजी कहते हैं - युधिष्ठिर! नारदजीके इतना कहते ही सृजयका अद्भुत कान्तिमान् पुत्र वहाँ प्रकट हो गया । उसे ऋषिने प्रसन्न होकर राजाको दिया था । वह देखनेमें कुबेरके पुत्रके समान जान पड़ता था ॥ ९ ॥

ततः संगम्य पुत्रेण प्रीतिमानभवन्नृपः ।

ईजे च क्रतुभिः पुण्यैः समाप्तवरदक्षिणैः ॥ १० ॥

अपने उस पुत्रसे मिलकर राजा सृजयको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त पुण्यमय यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का यजन किया ॥ १० ॥

अकृतार्थश्च भीतश्च न च सान्नाहिको हतः ।

अयज्वा त्वनपत्यश्च ततोऽसौ जीवितः पुनः ॥ ११ ॥

सृजयका पुत्र कवच बाँधकर युद्धमें लड़ता हुआ नहीं मारा गया था । उसे अकृतार्थ और भयभीत अवस्थामें अपने प्राणोंका त्याग करना पड़ा था । वह यज्ञकर्मसे रहित और संतानहीन भी था । इसलिये नारदजीने पुनः उसे जीवित कर दिया था ॥ ११ ॥

शूरो वीरः कृतार्थश्च प्रताप्यारीन् सहस्रशः ।

अभिमन्युर्गतो वीरः पृतनाभिमुखो हतः ॥ १२ ॥

पृष्ठ 464

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परंतु शूरवीर अभिमन्यु तो कृतार्थ हो चुका है । वह वीर शत्रुसेनाके सम्मुख युद्धतत्पर हो सहस्रों वैरियोंको संतप्त करके मारा गया और स्वर्गलोकमें जा पहुँचा है ॥

ब्रह्मचर्येण यान् कांश्चित् प्रज्ञया च श्रुतेन च ।

इष्टैश्च क्रतुभिर्यान्ति तांस्ते पुत्रोऽक्षयान् गतः ॥ १३ ॥

पुण्यात्मा पुरुष ब्रह्मचर्यपालन, उत्तम ज्ञान, वेदशास्त्रोंके स्वाध्याय तथा यज्ञोंके अनुष्ठानसे जिन किन्हीं लोकोंमें जाते हैं, उन्हीं अक्षय लोकोंमें तुम्हारा पुत्र अभिमन्यु भी गया है ॥ १३ ॥

विद्वांसः कर्मभिः पुण्यैः स्वर्गमीहन्ति नित्यशः ।

न तु स्वर्गादयं लोकः काम्यते स्वर्गवासिभिः ॥ १४ ॥

विद्वान् पुरुष पुण्यकर्मोंद्वारा सदा स्वर्गलोकमें जानेकी इच्छा करते हैं; परंतु स्वर्गवासी पुरुष स्वर्गसे इस लोकमें आनेकी कामना नहीं करते हैं ॥ १४ ॥

तस्मात् स्वर्गगतं पुत्रमर्जुनस्य हतं रणे ।

न चेहानयितुं शक्यं किंचिदप्राप्यमीहितम् ॥ १५ ॥

अर्जुनका पुत्र युद्धमें मारे जानेके कारण स्वर्गलोकमें गया हुआ है । अतः उसे यहाँ नहीं लाया जा सकता । कोई अप्राप्य वस्तु केवल इच्छा करनेमात्रसे नहीं सुलभ हो सकती ॥ १५ ॥

यां योगिनो ध्यानविविक्तदर्शनाः प्रयान्ति यां चोत्तमयज्विनो जनाः । तपोभिरिद्धैरनुयान्ति यां तथा तामक्षयां ते तनयो गतो गतिम् ॥ १६ ॥

जिन्होंने ध्यानके द्वारा पवित्र ज्ञानमयी दृष्टि प्राप्त कर ली है, वे योगी निष्कामभावसे उत्तम यज्ञ करनेवाले पुरुष तथा अपनी उज्ज्वल तपस्याओंद्वारा तपस्वी मुनि जिस अक्षय गतिको पाते हैं, तुम्हारे पुत्रने भी वही गति प्राप्त की है ॥ १६ ॥

अन्तात् पुनर्भावगतो विराजते राजेव वीरो ह्यमृतात्मरश्मिभिः । तामैन्दवीमात्मतनुं द्विजोचितां गतोऽभिमन्युर्न स शोकमर्हति ॥ १७ ॥

वीर अभिमन्यु मृत्युके पश्चात् पुनः पूर्वभावको प्राप्त होकर चन्द्रमासे उत्पन्न अपने द्विजोचित शरीरमें प्रतिष्ठित हो अपनी अमृतमयी किरणोंसे राजा सोमके समान प्रकाशित हो रहा है । अतः उसके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ॥ १७ ॥

एवं ज्ञात्वा स्थिरो भूत्वा जह्यरीन् धैर्यमाप्नुहि ।

जीवन्त एव नः शोच्या न तु स्वर्गगतोऽनघ ॥ १८ ॥

पृष्ठ 465

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राजन्! ऐसा जानकर सुस्थिर हो धैर्यका आश्रय लो और उत्साहपूर्वक शत्रुओंका वध करो । अनघ! हमें इस संसारमें जीवित पुरुषोंके लिये ही शोक करना चाहिये । जो स्वर्गमें चला गया है, उसके लिये शोक करना उचित नहीं है ॥ १८ ॥

शोचतो हि महाराज अघमेवाभिवर्धते ।

तस्माच्छोकं परित्यज्य श्रेयसे प्रयतेद् बुधः ॥ १ ९ ॥

प्रहर्षमभिमानं च सुखप्राप्तिं च चिन्तयन् । महाराज! शोक करनेसे केवल दुःख ही बढ़ता है। अतः विद्वान् पुरुष उत्कृष्ट हर्ष, अतिशय सम्मान और सुख प्राप्तिका चिन्तन करते हुए शोकका परित्याग करके अपने कल्याणके लिये ही प्रयत्न करे ॥ १ ९ ॥ एतद् बुद्ध्वा बुधाः शोकं न शोकः शोक उच्यते ॥ २० ॥

यही सब सोच- समझकर ज्ञानवान् पुरुष शोक नहीं करते हैं । शोकको शोक नहीं कहते हैं ( उसका अनुभव करनेवाला मन ही शोकरूप होता है ) ॥ २० ॥

एवं विद्वान् समुत्तिष्ठ प्रयतो भव मा शुचः ।

श्रुतस्ते सम्भवो मृत्योस्तपांस्यनुपमानि च ॥ २१ ॥

राजन्! ऐसा जानकर तुम युद्धके लिये उठो । मन और इन्द्रियोंको संयममें रखो तथा शोक न करो । तुमने मृत्युकी उत्पत्ति और उसकी अनुपम तपस्याका वृत्तान्त सुन लिया है ॥ २१ ॥

सर्वभूतसमत्वं च चञ्चलाश्च विभूतयः ।

सृञ्जयस्य तु तं पुत्रं मृतं संजीवितं पुनः ॥ २२ ॥

मृत्यु सम्पूर्ण प्राणियोंको समभावसे प्राप्त होती है और धन- ऐश्वर्य चंचल है — यह बात भी जान ली है । सृजयका पुत्र मरा और पुनः जीवित हुआ, यह कथा भी तुमने सुन ही ली है ॥ २२ ॥

एवं विद्वान् महाराज मा शुचः साधयाम्यहम् ।

एतावदुक्त्वा भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ २३ ।

महाराज! यह सब तुम जानते हो । अतः शोक न करो । अब मैं अपनी साधनामें लग रहा हूँ। ऐसा कहकर भगवान् व्यास वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ २३ ॥

वागीशाने भगवति व्यासे व्यभ्रनभःप्रभे ।

गते मतिमतां श्रेष्ठे समाश्वास्य युधिष्ठिरम् ॥ २४ ॥

पूर्वेषां पार्थिवेन्द्राणां महेन्द्रप्रतिमौजसाम् ।

न्यायाधिगतवित्तानां तां श्रुत्वा यज्ञसम्पदम् ॥ २५ ॥

सम्पूज्य मनसा विद्वान् विशोकोऽभूद् युधिष्ठिरः ।

पुनश्चाचिन्तयद् दीनः किंस्विद् वक्ष्ये धनंजयम् ॥ २६ ॥

पृष्ठ 466

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बिना बादलके आकाशकी- सी कान्तिवाले, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ वागीश्वर भगवान् व्यास जब युधिष्ठिरको आश्वासन देकर चले गये, तब देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी और न्यायसे धन प्राप्त करनेवाले प्राचीन राजाओंके उस यज्ञ- वैभवकी कथा सुनकर विद्वान् युधिष्ठिर मन- ही- मन उनके प्रति आदरकी भावना करते हुए शोकसे रहित हो गये । तदनन्तर फिर दीनभावसे यह सोचने लगे कि अर्जुनसे मैं क्या कहूँगा ॥ २४–२६ ॥ इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये एकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारतद्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७१ ॥

पृष्ठ 467

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(प्रतिज्ञापर्व) द्विसप्ततितमोऽध्यायः अभिमन्युकी मृत्युके कारण अर्जुनका विषाद और क्रोध (धृतराष्ट्रउवाच

अथ संशप्तकैः सार्धं युध्यमाने धनंजये ।

अभिमन्यौ हते चापि बाले बलवतां वरे ॥

महर्षिसत्तमे याते युधिष्ठिरपुरोगमाः ।

पाण्डवाः किमथाकार्षुः शोकेन हतचेतसः ॥

कथं संशप्तकेभ्यो वा निवृत्तो वानरध्वजः ।

केन वा कथितः तस्य प्रशान्तः सुतपावकः ॥

एतन्मे शंस तत्त्वेन सर्वमेवेह संजय । ) धृतराष्ट्रने पूछा – संजय! जब अर्जुन संशप्तकोंके साथ युद्ध कर रहे थे, जब बलवानोंमें श्रेष्ठ बालक अभिमन्यु मारा गया और जब महर्षियोंमें श्रेष्ठ व्यास ( युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर ) चले गये, तब शोकसे व्याकुल चित्तवाले युधिष्ठिर और अन्य पाण्डवोंने क्या किया? कपिध्वज अर्जुन संशप्तकोंकी ओरसे कैसे लौटे तथा किसने उनसे कहा कि तुम्हारा अग्निके समान तेजस्वी पुत्र सदाके लिये शान्त हो गया । इन सब बातोंको तुम यथार्थरूपसे मुझे बताओ। संजय उवाच

तस्मिन्नहनि निर्वृत्ते घोरे प्राणभृतां क्षये ।

आदित्येऽस्तं गते श्रीमान् संध्याकाल उपस्थिते ॥ १ ॥

व्यपयातेषु वासाय सर्वेषु भरतर्षभ ।

हत्वा संशप्तकव्रातान् दिव्यैरस्त्रैः कपिध्वजः ॥ २ ॥

प्रायात् स शिबिरं जिष्णुर्जैत्रमास्थाय तं रथम् ।

गच्छन्नेव च गोविन्दं साश्रुकण्ठोऽभ्यभाषत ॥ ३ ॥

संजय बोले- भरतश्रेष्ठ! प्राणधारियोंका संहार करनेवाले उस भयंकर दिनके बीत जानेपर जब सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये और संध्याकाल उपस्थित हुआ, उस समय समस्त सैनिक जब शिविरमें विश्रामके लिये चल दिये, तब विजयशील श्रीमान् कपिध्वज अर्जुन अपने दिव्यास्त्रोंद्वारा संशप्तकसमूहोंका वध करके अपने उस विजयी रथपर बैठे हुए

पृष्ठ 468

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शिविरकी ओर चले । चलते- चलते ही वे अश्रुगद्गदकण्ठ हो भगवान् गोविन्दसे इस प्रकार बोले – ॥ १–३ ॥

किं नु मे हृदयं त्रस्तं वाक् च सज्जति केशव ।

स्पन्दन्ति चाप्यनिष्टानि गात्रं सीदति चाप्युत ॥ ४ ॥

‘ केशव! न जाने क्यों आज मेरा हृदय धड़क रहा है, वाणी लड़खड़ा रही है, अनिष्ट-सूचक बायें अंग फड़क रहे हैं और शरीर शिथिल होता जा रहा है ॥ ४ ॥

अनिष्टं चैव मे श्लिष्टं हृदयान्नापसर्पति ।

भुवि ये दिक्षु चात्युग्रा उत्पातास्त्रासयन्ति माम् ॥ ५ ॥

‘ मेरे हृदयमें अनिष्टकी चिन्ता घुसी हुई है, जो किसी प्रकार वहाँसे निकलती ही नहीं है । पृथ्वीपर तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें होनेवाले भयंकर उत्पात मुझे डरा रहे हैं ॥ ५ ॥

बहुप्रकारा दृश्यन्ते सर्व एवाघशंसिनः ।

अपि स्वस्ति भवेद् राज्ञः सामात्यस्य गुरोर्मम ॥ ६ ॥

‘ ये उत्पात अनेक प्रकारके दिखायी देते हैं और सब- के - सब भारी अमंगलकी सूचना दे रहे हैं । क्या मेरे पूज्य भ्राता राजा युधिष्ठिर अपने मन्त्रियोंसहित सकुशल होंगे? ' ॥ ६ ॥

वासुदेव उवाच

व्यक्तं शिवं तव भ्रातुः सामात्यस्य भविष्यति ।

मा शुचः किञ्चिदेवान्यत् तत्रानिष्टं भविष्यति ॥ ७ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण बोले- अर्जुन! शोक न करो । मुझे स्पष्ट जान पड़ता है कि मन्त्रियोंसहित तुम्हारे भाईका कल्याण ही होगा । इस अपशकुनके अनुसार कोई दूसरा ही

पृष्ठ 469

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अनिष्ट हुआ होगा ॥ ७ ॥

संजय उवाच

ततः संध्यामुपास्यैव वीरौ वीरावसादने ।

कथयन्तौ रणे वृत्तं प्रयातौ रथमास्थितौ ॥ ८ ॥

संजय कहते हैं— राजन्! तदनन्तर वे दोनों वीर उस वीरसंहारक रणभूमिमें संध्या- वन्दन करके पुनः रथपर बैठकर युद्धसम्बन्धी बातें करते हुए आगे बढ़े ॥ ८ ॥

ततः स्वशिबिरं प्राप्तौ हतानन्दं हतत्विषम् ।

वासुदेवोऽर्जुनश्चैव कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ ९ ॥

फिर श्रीकृष्ण और अर्जुन जो अत्यन्त दुष्कर कर्म करके आ रहे थे, अपने शिविरके निकट आ पहुँचे । उस समय वह शिविर आनन्दशून्य और श्रीहीन दिखायी देता था ॥ ९ ॥

ध्वस्ताकारं समालक्ष्य शिबिरं परवीरहा ।

बीभत्सुरब्रवीत् कृष्णमस्वस्थहृदयस्ततः ॥ १० ॥

अपनी छावनीको विध्वस्त हुई - सी देखकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनका हृदय चिन्तित हो उठा । अतः वे भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले- ॥ १० ॥

दन्ति नाद्य तूर्याणि मङ्गल्यानि जनार्दन ।

मिश्रा दुन्दुभिनिर्घोषैः शङ्खाश्चाडम्बरैः सह ॥ ११ ॥

‘ जनार्दन! आज इस शिविरमें मांगलिक बाजे नहीं बज रहे हैं। दुन्दुभिनाद तथा तुरहीके शब्दोंके साथ मिली हुई शंखध्वनि भी नहीं सुनायी देती है ॥ ११ ॥

वीणा नैवाद्य वाद्यन्ते शम्यातालस्वनैः सह ।

मङ्गल्यानि च गीतानि न गायन्ति पठन्ति च ॥ १२ ॥

स्तुतियुक्तानि रम्याणि ममानीकेषु बन्दिनः । 'ढाक और करतारकी ध्वनिके साथ आज वीणा भी नहीं बज रही है । मेरी सेनाओंमें वन्दीजन न तो मंगलगीत गा रहे हैं और न स्तुतियुक्त मनोहर श्लोकोंका ही पाठ करते हैं ॥ १२३ ॥

योधाश्चापि हि मां दृष्ट्वा निवर्तन्ते ह्यधोमुखाः ॥ १३ ॥

कर्माणि च यथापूर्वं कृत्वा नाभिवदन्ति माम् ।

अपि स्वस्ति भवेदद्य भ्रातृभ्यो मम माधव ॥ १४ ॥

' मेरे सैनिक मुझे देखकर नीचे मुख किये लौट जाते हैं । पहलेकी भाँति अभिवादन करके मुझसे युद्धका समाचार नहीं बता रहे हैं । माधव! क्या आज मेरे भाई सकुशल होंगे? ' ॥ १३-१४ ॥

न हि शुद्ध्यति मे भावो दृष्ट्वा स्वजनमाकुलम् ।

अपि पाञ्चालराजस्य विराटस्य च मानद ॥ १५ ॥

पृष्ठ 470

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सर्वेषां चैव योधानां सामग्रयं स्यान्ममाच्युत । ' आज इन स्वजनोंको व्याकुल देखकर मेरे हृदयकी आशंका नहीं दूर होती है । दूसरोंको मान देनेवाले अच्युत श्रीकृष्ण! राजा द्रुपद, विराट तथा मेरे अन्य सब योद्धाओंका समुदाय तो सकुशल होगा न? ॥ १५३ ॥

न च मामद्य सौभद्रः प्रहृष्टो भ्रातृभिः सह ।

रणादायान्तुमुचितं प्रत्युद्याति हसन्निव ॥ १६ ॥

‘ आज प्रतिदिनकी भाँति सुभद्राकुमार अभिमन्यु अपने भाइयोंके साथ हर्षमें भरकर हँसता हुआ - सा युद्धसे लौटते हुए मेरी उचित अगवानी करने नहीं आ रहा है ( इसका क्या कारण है? ) ' ॥ १६ ॥

संजय उवाच

एवं संकथयन्तौ तौ प्रविष्टौ शिबिरं स्वकम् ।

ददृशाते भृशास्वस्थान् पाण्डवान् नष्टचेतसः ॥ १७ ॥

संजय कहते हैं— राजन्! इस प्रकार बातें करते हुए उन दोनोंने शिविरमें पहुँचकर देखा कि पाण्डव अत्यन्त व्याकुल और हतोत्साह हो रहे हैं ॥ १७ ॥

दृष्ट्वा भ्रातॄंश्च पुत्रांश्च विमना वानरध्वजः ।

अपश्यंश्चैव सौभद्रमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १८ ॥

भाइयों तथा पुत्रोंको इस अवस्थामें देख और सुभद्राकुमार अभिमन्युको वहाँ न पाकर कपिध्वज अर्जुनका मन अत्यन्त उदास हो गया तथा वे इस प्रकार बोले – ॥ १८ ॥

मुखवर्णोऽप्रसन्नो वः सर्वेषामेव लक्ष्यते ।

न चाभिमन्युं पश्यामि न च मां प्रतिनन्दथ ॥ १ ९ ॥

‘ आज आप सभी लोगोंके मुखकी कान्ति अप्रसन्न दिखायी दे रही है, इधर मैं अभिमन्युको नहीं देख पाता हूँ और आपलोग भी मुझसे प्रसन्नतापूर्वक वार्तालाप नहीं कर रहे हैं ॥ १ ९ ॥

मया श्रुतश्च द्रोणेन चक्रव्यूहो विनिर्मितः ।

न च वस्तस्य भेत्तास्ति विना सौभद्रमर्भकम् ॥ २० ॥

' मैंने सुना है कि आचार्य द्रोणने चक्रव्यूहकी रचना की थी । आपलोगोंमेंसे बालक अभिमन्युके सिवा दूसरा कोई उस व्यूहका भेदन नहीं कर सकता था ॥ २० ॥

न चोपदिष्टस्तस्यासीन्मयानीकाद् विनिर्गमः ।

कच्चिन्न बालो युष्माभिः परानीकं प्रवेशितः ॥ २१ ॥

‘ परंतु मैंने उसे उस व्यूहसे निकलनेका ढंग अभी नहीं बताया था । कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि आपलोगोंने उस बालकको शत्रुके व्यूहमें भेज दिया हो? ॥ २१ ॥

भित्त्वानीकं महेष्वासः परेषां बहुशो युधि ।