04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 541–550
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 541–550
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उत्थायावश्यकार्यार्थं ययौ स्नानगृहं नृपः ॥ ७ ॥
बहुमूल्य एवं उत्तम शय्यापर सुखपूर्वक सोकर जगे हुए राजा युधिष्ठिर वहाँसे उठकर आवश्यक कार्यके लिये स्नान करने गये ॥ ७ ॥
ततः शुक्लाम्बराः स्नातास्तरुणाः शतमष्ट च ।
स्नापकाः काञ्चनैः कुम्भैः पूर्णैः समुपतस्थिरे ॥ ८ ॥
वहाँ स्नान करके श्वेत वस्त्र धारण किये हुए एक सौ आठ युवक सोनेके घड़ोंमें जल भरकर उन्हें नहलानेके लिये उपस्थित हुए ॥ ८ ॥
भद्रासने सूपविष्टः परिधायाम्बरं लघु ।
सस्नौ चन्दनसंयुक्तैः पानीयैरभिमन्त्रितैः ॥ ९ ॥
उस समय एक हलका वस्त्र पहनकर राजा युधिष्ठिर भद्रासन ( चौकी ) -पर बैठ गये और चन्दनयुक्त मन्त्रपूत जलसे स्नान करने लगे ॥ ९ ॥
उत्सादितः कषायेण बलवद्भिः सुशिक्षितैः ।
आप्लुतः साधिवासेन जलेन स सुगन्धिना ॥ १० ॥
सबसे पहले बलवान् तथा सुशिक्षित पुरुषोंने सर्वौषधि आदिद्वारा तैयार किये हुए उबटनसे उनके शरीरको अच्छी तरह मला, फिर उन्होंने अधिवासित एवं सुगन्धित जलसे स्नान किया ॥ १० ॥
राजहंसनिभं प्राप्य उष्णीषं शिथिलार्पितम् ।
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जलक्षयनिमित्तं वै वेष्टयामास मूर्धनि ॥ ११ ॥
तत्पश्चात् राजहंसके समान सफेद ढीलीढाली पगड़ी लेकर माथेका जल सुखानेके लिये उसे मस्तकपर लपेट लिया ॥ ११ ॥
हरिणा चन्दनेनाङ्गमुपलिप्य महाभुजः ।
स्रग्वी चाक्लिष्टवसनः प्राङ्मुखः प्राञ्जलिः स्थितः ॥ १२ ॥
फिर वे महाबाहु युधिष्ठिर अपने सारे अंगोंमें हरिचन्दनका अनुलेपन करके नूतन वस्त्र और पुष्पमाला धारण किये हाथ जोड़े पूर्वाभिमुख होकर बैठ गये ॥ १२ ॥
जजाप जप्यं कौन्तेयः सतां मार्गमनुष्ठितः ।
तत्राग्निशरणं दीप्तं प्रविवेश विनीतवत् ॥ १३ ॥
सत्पुरुषोंके मार्गपर चलनेवाले कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने जपनेयोग्य गायत्री मन्त्रका जप किया और प्रज्वलित अग्निसे प्रकाशित अग्निशालामें विनीतभावसे प्रवेश किया ॥ १३ ॥
समिद्भिः सपवित्राभिरग्निमाहुतिभिस्तथा ।
मन्त्रपूताभिरर्चित्वा निश्चक्राम गृहात् ततः ॥ १४ ॥
वहाँ पवित्री ( कुशके दो पत्तों ) - सहित समिधाओं तथा मन्त्रपूत आहुतियोंसे अग्निदेवकी पूजा करके वे उस अग्निहोत्रगृहसे बाहर निकले ॥ १४ ॥
द्वितीयां पुरुषव्याघ्रः कक्ष्यां निर्गम्य पार्थिवः ।
ततो वेदविदो वृद्धानपश्यद् ब्राह्मणर्षभान् ॥ १५ ॥
फिर शिविरकी दूसरी ड्योढ़ी पार करके पुरुषसिंह राजा युधिष्ठिरने वेदवेत्ता वृद्ध ब्राह्मण - शिरोमणियोंको देखा ॥ १५ ॥
दान्तान् वेदव्रतस्नातान् स्नातानवभृथेषु च ।
सहस्रानुचरान् सौरान् सहस्रं चाष्ट चापरान् ॥ १६ ॥
वे सब- के - सब जितेन्द्रिय, वेदाध्ययनके व्रतमें निष्णात, यज्ञान्तस्नानसे पवित्र तथा सूर्यदेवके उपासक थे । वे संख्यामें एक हजार आठ थे और उनके साथ एक सहस्र अनुचर थे ॥ १६ ॥
अक्षतैः सुमनोभिश्च वाचयित्वा महाभुजः ।
तान् द्विजान् मधुसर्पिर्भ्यां फलैः श्रेष्ठैः सुमङ्गलैः ॥ १७ ॥
प्रादात् काञ्चनमेकैकं निष्कं विप्राय पाण्डवः । तब महाबाहु पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने अक्षत- फूल देकर उन ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया और उनमेंसे प्रत्येक ब्राह्मणको मधु, घी एवं श्रेष्ठ मांगलिक फलोंके साथ एक- एक स्वर्णमुद्रा प्रदान की ॥ १७३ ॥
अलंकृतं चाश्वशतं वासांसीष्टाश्च दक्षिणाः ॥ १८ ॥
तथा गाः कपिला दोग्ध्रीः सवत्साः पाण्डुनन्दनः ।
हेमशृङ्गा रौप्यखुरा दत्त्वा चक्रे प्रदक्षिणम् ॥ १ ९ ॥
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इसके सिवा उन पाण्डुनन्दनने ब्राह्मणोंको सजे- सजाये सौ घोड़े, उत्तम वस्त्र, इच्छानुसार दक्षिणा और बछड़ोंसहित दूध देनेवाली बहुत- सी कपिला गौएँ दीं । उन गौओंके सींगोंमें सोने और खुरोंमें चाँदी मढ़े हुए थे । उन सबको देकर युधिष्ठिरने उन ( गौओं एवं ब्राह्मणों ) की परिक्रमा की ॥ १८-१९ ॥ स्वस्तिकान् वर्धमानांश्च नन्द्यावर्तांश्च काञ्चनान् 1 माल्यं च जलकुम्भांश्च ज्वलितं च हुताशनम् ॥ २० ॥
पूर्णान्यक्षतपात्राणि रुचकं रोचनास्तथा ।
स्वलंकृताः शुभाः कन्या दधिसर्पिर्मधूदकम् ॥ २१ ॥
मङ्गल्यान् पक्षिणश्चैव यच्चान्यदपि पूजितम् ।
दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च कौन्तेयो बाह्यां कक्ष्यां ततोऽगमत् ॥ २२ ॥
तत्पश्चात् सोनेके बने हुए स्वस्तिक, सिकोरे, बन्द मुँहवाले अर्घपात्र, माला, जलसे भरे हुए कलश, प्रज्वलित अग्नि, अक्षतसे भरे हुए पूर्णपात्र, बिजौरा नीबू, गोरोचन, आभूषणोंसे विभूषित सुन्दरी कन्याएँ, दही, घी, मधु, जल, मांगलिक पक्षी तथा अन्यान्य भी जो प्रशस्त वस्तुएँ हैं, उन सबको देखकर और उनमेंसे कुछका स्पर्श करके कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने बाहरी ड्योढ़ीमें प्रवेश किया ॥ २०-२२ ॥ ततस्तस्यां महाबाहोस्तिष्ठतः परिचारकाः सौवर्णं सर्वतोभद्रं मुक्तावैदूर्यमण्डितम् ॥ २३ ॥
परार्ध्यास्तरणास्तीर्ण सोत्तरच्छदमृद्धिमत् ।
विश्वकर्मकृतं दिव्यमुपजह्रुर्वरासनम् ॥ २४ ॥
उस ड्योढ़ीमें खड़े हुए महाबाहु युधिष्ठिरके सेवकोंने उनके लिये सोनेका बना हुआ एक सर्वतोभद्र नामक श्रेष्ठ आसन दिया, जिसमें मुक्ता और वैदूर्यमणि जड़ी हुई थी । उसपर बहुमूल्य बिछौना बिछा हुआ था । उसके ऊपर सुन्दर चादर बिछायी गयी थी । वह दिव्य एवं समृद्धिशाली सिंहासन साक्षात् विश्वकर्माका बनाया हुआ था ॥ २३-२४ ॥
तत्र तस्योपविष्टस्य भूषणानि महात्मनः ।
उपाजहुर्महार्हाणि प्रेष्याः शुभ्राणि सर्वशः ॥ २५ ॥
वहाँ बैठे हुए महात्मा राजा युधिष्ठिरको उनके सेवकोंने सब प्रकारके उज्ज्वल एवं बहुमूल्य आभूषण भेंट किये ॥ २५ ॥
मुक्ताभरणवेषस्य कौन्तेयस्य महात्मनः ।
रूपमासीन्महाराज द्विषतां शोकवर्धनम् ॥ २६ ॥
महाराज! मुक्तामय आभूषणोंसे विभूषित वेशवाले महात्मा कुन्तीनन्दनका स्वरूप उस समय शत्रुओंका शोक बढ़ा रहा था ॥ २६ ॥
चामरैश्चन्द्ररश्म्याभैर्हेमदण्डैः सुशोभनैः ।
दोधूयमानैः शुशुभे विद्युद्भिरिव तोयदः ॥ २७ ॥
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चन्द्रमाकी किरणोंके समान श्वेत तथा सुवर्णमय दण्डवाले सुन्दर शोभाशाली अनेक चँवर डुलाये जा रहे थे । उनसे राजा युधिष्ठिरकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे बिजलियोंसे मेघ सुशोभित होता है ॥ २७ ॥
संस्तूयमानः सूतैश्च वन्द्यमानश्च वन्दिभिः ।
उपगीयमानो गन्धर्वैरास्ते स्म कुरुनन्दनः ॥ २८ ॥
उस समय सूतगण स्तुति करते थे, वन्दीजन वन्दना कर रहे थे और गन्धर्वगण उनके सुयशके गीत गाते थे । इन सबसे घिरे हुए युधिष्ठिर वहाँ सिंहासनपर विराजमान थे ॥ २८ ॥
ततो मुहूर्तादासीत् तु स्यन्दनानां स्वनो महान् ।
नेमिघोषश्च रथिनां खुरघोषश्च वाजिनाम् ॥ २ ९ ॥
तदनन्तर दो ही घड़ीमें रथोंका महान् शब्द गूँज उठा । रथियोंके रथोंके पहियोंकी घरघराहट और घोड़ोंकी टापोंके शब्द सुनायी देने लगे ॥ २ ९ ॥
ह्रादेन गजघण्टानां शङ्खानां निनदेन च ।
नराणां पदशब्दैश्च कम्पतीव स्म मेदिनी ॥ ३० ॥
हाथियोंके घंटोंकी घनघनाहट, शंखोंकी ध्वनि तथा पैदल चलनेवाले मनुष्योंके पैरोंकी धमकसे यह पृथ्वी काँपती- सी जान पड़ती थी ॥ ३० ॥
ततः शुद्धान्तमासाद्य जानुभ्यां भूतले स्थितः ।
शिरसा वन्दनीयं तमभिवाद्य जनेश्वरम् ॥ ३१ ॥
कुण्डली बद्धनिस्त्रिंशः संनद्धकवचो युवा ।
अभिप्रणम्य शिरसा द्वाःस्थो धर्मात्मजाय वै ॥ ३२ ॥
न्यवेदयद्धृषीकेशमुपयान्तं महात्मने । इसी समय कानोंमें कुण्डल पहने, कमरमें तलवार बाँधे और वक्षःस्थलपर कवच धारण किये एक तरुण द्वारपालने उस ड्योढ़ीके भीतर प्रवेश करके धरतीपर दोनों घुटने टेक दिये और वन्दनीय महाराज युधिष्ठिरको मस्तक नवाकर प्रणाम किया । इस प्रकार सिरसे प्रणाम करके उसने धर्मपुत्र महात्मा युधिष्ठिरको यह सूचना दी कि भगवान् श्रीकृष्ण पधार रहे हैं ॥ ३१-३२ ॥ सोऽब्रवीत् पुरुषव्याघ्रः स्वागतेनैव माधवम् ॥ ३३ ॥
अर्घ्यं चैवासनं चास्मै दीयतां परमार्चितम् । तब पुरुषसिंह युधिष्ठिरने द्वारपालसे कहा –' तुम माधवको स्वागतपूर्वक ले आओ और उन्हें अर्घ्य तथा परम उत्तम आसन अर्पित करो ' ॥ ३३३ ॥
ततः प्रवेश्य वार्ष्णेयमुपवेश्य वरासने ।
पूजयामास विधिवद् धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ३४ ॥
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तब द्वारपालने भगवान् श्रीकृष्णको भीतर ले आकर एक श्रेष्ठ आसनपर बैठा दिया ।
तत्पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिरने स्वयं ही विधिपूर्वक उनका पूजन किया ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि युधिष्ठिरसज्जतायां द्वयशीतितमोऽध्यायः ॥ ८२ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें युधिष्ठिरके सुसज्जित होनेसे सम्बन्ध रखनेवाला बयासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ८२ ॥
OF FUTE
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त्र्यशीतितमोऽध्यायः अर्जुनकी प्रतिज्ञाको सफल बनानेके लिये युधिष्ठिरकी श्रीकृष्णसे प्रार्थना और श्रीकृष्णका उन्हें आश्वासन देना संजय उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा प्रतिनन्द्य जनार्दनम् ।
उवाच परमप्रीतः कौन्तेयो देवकीसुतम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! तदनन्तर कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिरने अत्यन्त प्रसन्न हो देवकीनन्दन जनार्दनका अभिनन्दन करके पूछा— ॥ १ ॥
सुखेन रजनी व्युष्टा कच्चित् ते मधुसूदन ।
कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रसन्नानि तवाच्युत ॥ २ ॥
‘ मधुसूदन! क्या आपकी रात सुखपूर्वक बीती है? अच्युत! क्या आपकी सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियाँ प्रसन्न हैं? ' ॥ २ ॥
वासुदेवोऽपि तद्युक्तं पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरम् ।
ततश्च प्रकृतीः क्षत्ता न्यवेदयदुपस्थिताः ॥ ३ ॥
तब भगवान् श्रीकृष्णने भी उनसे समयोचित प्रश्न किये । तत्पश्चात् सेवकने आकर सूचना दी कि मन्त्री, सेनापति आदि उपस्थित हैं ॥ ३ ॥
अनुज्ञातश्च राज्ञा स प्रावेशयत तं जनम् ।
विराटं भीमसेनं च धृष्टद्युम्नं च सात्यकिम् ॥ ४ ॥
चेदिपं धृष्टकेतुं च द्रुपदं च महारथम् ।
शिखण्डिनं यमौ चैव चेकितानं सकेकयम् ॥ ५ ॥
युयुत्सुं चैव कौरव्यं पाञ्चाल्यं चोत्तमौजसम् ।
युधामन्युं सुबाहुं च द्रौपदेयांश्च सर्वशः ॥ ६ ॥
उस समय महाराजकी अनुमति पाकर विराट, भीमसेन, धृष्टद्युम्न, सात्यकि, चेदिराज धृष्टकेतु, महारथी द्रुपद, शिखण्डी, नकुल, सहदेव, चेकितान, केकयराजकुमार, कुरुवंशी युयुत्सु, पांचालवीर उत्तमौजा, युधामन्यु, सुबाहु तथा द्रौपदीके पाँचों पुत्र - इन सब लोगोंको द्वारपाल भीतर ले आया ॥ ४–६ ॥
एते चान्ये च बहवः क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभम् ।
उपतस्थुर्महात्मानं विविशुश्चासने शुभे ॥ ७ ॥
ये तथा और भी बहुत - से क्षत्रियशिरोमणि महात्मा युधिष्ठिरकी सेवामें उपस्थित हुए और सुन्दर आसनपर बैठे ॥ ७ ॥
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एकस्मिन्नासने वीरावुपविष्टौ महाबलौ ।
कृष्णश्च युयुधानश्च महात्मानौ महाद्युती ॥ ८ ॥
महाबली और महातेजस्वी महात्मा श्रीकृष्ण और सात्यकि ये दोनों वीर एक ही आसनपर बैठे थे ॥ ८ ॥
ततो युधिष्ठिरस्तेषां शृण्वतां मधुसूदनम् ।
अब्रवीत् पुण्डरीकाक्षमाभाष्य मधुरं वचः ॥ ९ ॥
तब युधिष्ठिरने उन सब लोगोंके सुनते हुए कमलनयन भगवान् मधुसूदनको सम्बोधित करके मधुर वाणीमें कहा— ॥ ९ ॥
एकं त्वां वयमाश्रित्य सहस्राक्षमिवामराः ।
प्रार्थयामो जयं युद्धे शाश्वतानि सुखानि च ॥ १० ॥
' प्रभो! जैसे देवता इन्द्रका आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार हमलोग एकमात्र आपका सहारा लेकर युद्धमें विजय और शाश्वत सुख पाना चाहते हैं ॥ १० ॥
त्वं हि राज्यविनाशं च द्विषद्भिश्च निराक्रियाम् ।
क्लेशांश्च विविधान् कृष्ण सर्वांस्तानपि वेद नः ॥ ११ ॥
' श्रीकृष्ण! शत्रुओंने जो हमारे राज्यका नाश करके हमारा तिरस्कार किया और भाँति-भाँतिके क्लेश दिये, उन सबको आप अच्छी तरह जानते हैं ॥ ११ ॥
त्वयि सर्वेश सर्वेषामस्माकं भक्तवत्सल ।
सुखमायत्तमत्यर्थं यात्रा च मधुसूदन ॥ १२ ॥
‘ भक्तवत्सल सर्वेश्वर! मधुसूदन! हम सब लोगोंका सुख और जीवन - निर्वाह पूर्णरूपसे आपके ही अधीन है ॥ १२ ॥
स तथा कुरु वार्ष्णेय यथा त्वयि मनो मम ।
अर्जुनस्य यथा सत्या प्रतिज्ञा स्याच्चिकीर्षिता ॥ १३ ॥
‘ वार्ष्णेय! हमारा मन आपमें ही लगा हुआ है। अतः आप ऐसा करें, जिससे अर्जुनकी अभीष्ट प्रतिज्ञा सत्य होकर रहे ॥ १३ ॥
स भवांस्तारयत्वस्माद् दुःखामर्षमहार्णवात् ।
पारं तितीर्षतामद्य प्लवो नो भव माधव ॥ १४ ॥
‘ माधव! आज इस दुःख और अमर्षके महासागरसे पार होनेकी इच्छावाले हम सब
लोगोंके लिये आप नौका बन जाइये । आप ही इस संकटसे हमारा उद्धार कीजिये ॥ १४ ॥
न हि तत् कुरुते संख्ये रथी रिपुवधोद्यतः ।
यथा वै कुरुते कृष्ण सारथिर्यत्नमास्थितः ॥ १५ ॥
‘ श्रीकृष्ण! संग्राममें शत्रुवधके लिये उद्यत हुआ रथी भी वैसा कार्य नहीं कर पाता, जैसा कि प्रयत्नशील सारथि कर दिखाता है ॥ १५ ॥
यथैव सर्वास्वापत्सु पासि वृष्णीन् जनार्दन ।
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तथैवास्मान् महाबाहो वृजिनात् त्रातुमर्हसि ॥ १६ ॥
' महाबाहु जनार्दन! जैसे आप वृष्णिवंशियोंको सम्पूर्ण आपत्तियोंसे बचाते हैं, उसी प्रकार हमारी भी इस संकटसे रक्षा कीजिये ॥ १६ ॥
त्वमगाधेऽप्लवे मग्नान् पाण्डवान् कुरुसागरे ।
समुद्धर प्लवो भूत्वा शङ्खचक्रगदाधर ॥ १७ ॥
‘ शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले परमेश्वर! नौकारहित अगाध कौरव - सागरमें निमग्न पाण्डवोंका आप स्वयं ही नौका बनकर उद्धार कीजिये ॥ १७ ॥
नमस्ते देवदेवेश सनातन विशातन ।
विष्णो जिष्णो हरे कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम ॥ १८ ॥
‘ शत्रुनाशक! सनातन देवदेवेश्वर! विष्णो! जिष्णो! हरे! कृष्ण! वैकुण्ठ! पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है ॥ १८ ॥
नारदस्त्वां समाचख्यौ पुराणमृषिसत्तमम् ।
वरदं शार्ङ्गिणं श्रेष्ठं तत् सत्यं कुरु माधव ॥ १ ९ ॥
‘ माधव! देवर्षि नारदने बताया है कि आप शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले, सर्वोत्तम वरदायक, पुरातन ऋषिश्रेष्ठ नारायण हैं, उनकी वह बात सत्य कर दिखाइये ॥ १ ९ ॥
इत्युक्तः पुण्डरीकाक्षो धर्मराजेन संसदि ।
तोयमेघस्वनो वाग्मी प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् ॥ २० ॥
उस राजसभामें धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर उत्तम वक्ता कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने सजल मेघके समान गम्भीर वाणीमें उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया ॥ २० ॥
वासुदेव उवाच
सामरेष्वपि लोकेषु सर्वेषु न तथाविधः ।
शरासनधरः कश्चिद् यथा पार्थो धनञ्जयः ॥ २१ ॥
श्रीकृष्ण बोले— राजन्! देवताओंसहित सम्पूर्ण लोकोंमें कोई भी वैसा धनुर्धर नहीं है, जैसे आपके भाई कुन्तीकुमार धनंजय हैं ॥ २१ ॥
वीर्यवानस्त्रसम्पन्नः पराक्रान्तो महाबलः ।
युद्धशौण्डः सदामर्षी तेजसा परमो नृणाम् ॥ २२ ॥
वे शक्तिशाली, अस्त्रज्ञानसम्पन्न, पराक्रमी, महाबली, युद्धकुशल, सदा अमर्षशील और मनुष्योंमें परम तेजस्वी हैं ॥ २२ ॥
स युवा वृषभस्कन्धो दीर्घबाहुर्महाबलः ।
सिंहर्षभगतिः श्रीमान् द्विषतस्ते हनिष्यति ॥ २३ ॥
अर्जुनके कंधे वृषभके समान सुपुष्ट हैं, भुजाएँ बड़ी- बड़ी हैं, उनकी चाल भी श्रेष्ठ सिंहके सदृश है, वे महान् बलवान् युवक और श्रीसम्पन्न हैं, अतः आपके शत्रुओंको अवश्य
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मार डालेंगे ॥ २३ ॥
अहं च तत् करिष्यामि यथा कुन्तीसुतोऽर्जुनः ।
धार्तराष्ट्रस्य सैन्यानि धक्ष्यत्यग्निरिवेन्धनम् ॥ २४ ॥
मैं भी वही करूँगा, जिससे कुन्तीपुत्र अर्जुन दुर्योधनकी सारी सेनाओंको उसी प्रकार जला डालेंगे, जैसे आग ईंधनको जलाती है ॥ २४ ॥
अद्य तं पापकर्माणं क्षुद्रं सौभद्रघातिनम् ।
अपुनर्दर्शनं मार्गमिषुभिः क्षेप्स्यतेऽर्जुनः ॥ २५ ॥
आज सुभद्राकुमार अभिमन्युकी हत्या करनेवाले उस नीच पापी जयद्रथको अर्जुन अपने बाणोंद्वारा उस मार्गपर डाल देंगे, जहाँ जानेपर उस जीवका पुनः इस लोकमें दर्शन नहीं होता ॥ २५ । |
तस्याद्य गृध्राः श्येनाश्च चण्डगोमायवस्तथा ।
भक्षयिष्यन्ति मांसानि ये चान्ये पुरुषादकाः ॥ २६ ॥
आज गीध, बाज, क्रोधमें भरे हुए गीदड़ तथा अन्य नरभक्षी जीव- जन्तु जयद्रथका मांस खायेंगे ॥ २६ ॥
यद्यस्य देवा गोप्तारः सेन्द्राः सर्वे तथाप्यसौ ।
राजधानीं यमस्याद्य हतः प्राप्स्यति संकुले ॥ २७ ॥
यदि इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी उसकी रक्षाके लिये आ जायँ तथापि वह आज संग्राममें मारा जाकर यमराजकी राजधानीमें अवश्य जा पहुँचेगा ॥ २७ ॥
निहत्य सैन्धवं जिष्णुरद्य त्वामुपयास्यति ।
विशोको विज्वरो राजन् भव भूतिपुरस्कृतः ॥ २८ ॥
राजन्! आज विजयशील अर्जुन जयद्रथको मारकर ही आपके पास आयेंगे, आप ऐश्वर्यसे सम्पन्न रहकर शोक और चिन्ताको त्याग दीजिये ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि श्रीकृष्णवाक्ये त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ८३ ॥
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चतुरशीतितमोऽध्यायः युधिष्ठिरका अर्जुनको आशीर्वाद, अर्जुनका स्वप्न सुनकर समस्त सुहृदोंकी प्रसन्नता, सात्यकि और श्रीकृष्णके साथ रथपर बैठकर अर्जुनकी रणयात्रा तथा अर्जुनके कहनेसे सात्यकिका युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये जाना संजय उवाच
तथा तु वदतां तेषां प्रादुरासीद् धनंजयः ।
दिदृक्षुर्भरतश्रेष्ठं राजानं ससुहृद्गणम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं - राजन्! इस प्रकार उन लोगोंमें बातचीत हो ही रही थी कि सुहृदोंसहित भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरका दर्शन करनेकी इच्छासे अर्जुन वहाँ आ गये ॥ १ ॥
तं निविष्टं शुभां कक्ष्यामभिवन्द्याग्रतः स्थितम् ।
तमुत्थायार्जुनं प्रेम्णा सस्वजे पाण्डवर्षभः ॥ २ ॥
उस सुन्दर ड्योढ़ीमें प्रवेश करके राजाको प्रणाम करनेके पश्चात् उनके सामने खड़े हुए अर्जुनको पाण्डव - श्रेष्ठ युधिष्ठिरने उठकर प्रेमपूर्वक हृदयसे लगा लिया ॥
मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय परिष्वज्य च बाहुना ।
आशिषः परमाः प्रोच्य स्मयमानोऽभ्यभाषत ॥ ३ ॥
उनका मस्तक सूँघकर और एक बाँहसे उनका आलिंगन करके उन्हें उत्तम आशीर्वाद देते हुए राजाने मुसकराकर कहा— ॥ ३ ॥
व्यक्तमर्जुन संग्रामे ध्रुवस्ते विजयो महान् ।
यादृग्रूपा च ते च्छाया प्रसन्नश्च जनार्दनः ॥ ४ ॥
‘ अर्जुन! आज संग्राममें तुम्हें निश्चय ही महान् विजय प्राप्त होगी, यह बात स्पष्टरूपसे दृष्टिगोचर हो रही है; क्योंकि इसीके अनुरूप तुम्हारे मुखकी कान्ति है और भगवान् श्रीकृष्ण भी प्रसन्न हैं ' ॥ ४ ॥
तमब्रवीत् ततो जिष्णुर्महदाश्चर्यमुत्तमम् ।
दृष्टवानस्मि भद्रं ते केशवस्य प्रसादजम् ॥ ५ ॥
' तब विजयशील अर्जुनने उनसे कहा- राजन्! आपका कल्याण हो । आज मैंने बहुत उत्तम और आश्चर्यजनक स्वप्न देखा है । भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे ही वैसा स्वप्न प्रकट हुआ था ' ॥ ५ ॥
ततस्तत् कथयामास यथा दृष्टं धनंजयः ।
आश्वासनार्थं सुहृदां त्र्यम्बकेण समागमम् ॥ ६ ॥