04.Mahabharata Volume 4 — पृष्ठ 891–900
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 891–900
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परंतु द्रोणाचार्य पुनः पलक मारते- मारते अपने रथपर बैठे दिखायी देते थे । उस समय आपके योद्धा विस्मयसे आँखें फाड़ - फाड़कर यह दृश्य देख रहे थे ॥ २२ ॥
तस्मिन् क्षणे तस्य यन्ता तूर्णमश्वानचोदयत् ।
भीमसेनस्य कौरव्य तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २३ ॥
कुरुनन्दन! इसी समय भीमसेनका सारथि तुरंत ही घोड़ोंको हाँककर वहाँ ले आया ।
वह एक अद्भुत - सी बात थी ॥ २३ ॥
ततः स्वरथमास्थाय भीमसेनो महाबलः ।
अभ्यद्रवत वेगेन तव पुत्रस्य वाहिनीम् ॥ २४ ॥
तत्पश्चात् महाबली भीमसेन पुनः अपने रथपर आरूढ़ हो आपके पुत्रकी सेनापर वेगपूर्वक टूट पड़े ॥ २४ ॥
स मृद्नन् क्षत्रियानाजौ वातो वृक्षानिवोद्धतः ।
आगच्छ्द् दारयन् सेनां सिन्धुवेगो नगानिव ॥ २५ ॥
जैसे उठी हुई आँधी वृक्षोंको उखाड़ फेंकती है और सिंधुका वेग पर्वतोंको विदीर्ण कर देता है, उसी प्रकार युद्धस्थलमें क्षत्रियोंको रौंदते और कौरव सेनाको विदीर्ण करते हुए भीमसेन आगे बढ़ गये ॥ २५ ॥
भोजानीकं समासाद्य हार्दिक्येनाभिरक्षितम् ।
प्रमथ्य तरसा वीरस्तदप्यतिबलोऽभ्ययात् ॥ २६ ॥
फिर अत्यन्त बलशाली वीर भीमसेन कृतवर्माद्वारा सुरक्षित भोजवंशियोंकी सेनाके पास जा पहुँचे और उसे वेगपूर्वक मथकर आगे चले गये ॥ २६ ॥
संत्रासयन्ननीकानि तलशब्देन पाण्डवः ।
अजयत् सर्वसैन्यानि शार्दूल इव गोवृषान् ॥ २७ ॥
जैसे सिंह गाय - बैलोंको जीत लेता है, उसी प्रकार पाण्डुनन्दन भीमने ताली बजाकर शत्रुसेनाओंको संत्रस्त करते हुए समस्त सैनिकोंपर विजय पा ली ॥ २७ ॥
भोजानीकमतिक्रम्य दरदानां च वाहिनीम् ।
तथा म्लेच्छगणानन्यान् बहून् युद्धविशारदान् ॥ २८ ॥
सात्यकिं चैव सम्प्रेक्ष्य युध्यमानं महारथम् ।
रथेन यत्तः कौन्तेयो वेगेन प्रययौ तदा ॥ २ ९ ॥
उस समय कुन्तीकुमार भीमसेन भोजवंशियोंकी सेनाको लाँघकर दरदोंकी विशाल वाहिनीको पार कर गये तथा बहुत से युद्धविशारद म्लेच्छोंको परास्त करके महारथी सात्यकिको शत्रुओंके साथ युद्ध करते देख सावधान हो रथके द्वारा वेगपूर्वक आगे बढ़े ॥ २८-२९ ॥
भीमसेनो महाराज द्रष्टुकामो धनंजयम् ।
अतीत्य समरे योधांस्तावकान् पाण्डुनन्दनः ॥ ३० ॥
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महाराज! अर्जुनको देखनेकी इच्छा लिये पाण्डुनन्दन भीमसेन समरांगणमें आपके योद्धाओंको लाँघते हुए वहाँ पहुँचे थे ॥ ३० ॥
सोऽपश्यदर्जुनं तत्र युध्यमानं महारथम् ।
सैन्धवस्य वधार्थं हि पराक्रान्तं पराक्रमी ॥ ३१ ॥
पराक्रमी भीमने वहाँ सिंधुराजके वधके लिये पराक्रम करते हुए युद्धतत्पर महारथी अर्जुनको देखा ॥ ३१ ॥
दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्रश्चक्रोश महतो रवान् ।
प्रावृट्कले महाराज नर्दन्निव बलाहकः ॥ ३२ ॥
महाराज! उन्हें देखते ही पुरुषसिंह भीमने वर्षाकालमें गरजते हुए मेघके समान बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ३२ ॥
तं तस्य निनदं घोरं पार्थः शुश्राव नर्दतः ।
वासुदेवश्च कौरव्य भीमसेनस्य संयुगे ॥ ३३ ॥
कुरुनन्दन! गरजते हुए भीमसेनके उस भयंकर सिंहनादको युद्धस्थलमें कुन्तीकुमार अर्जुन तथा भगवान् श्रीकृष्णने सुना ॥ ३३ ॥
तौ श्रुत्वा युगपद् वीरौ निनदं तस्य शुष्मिणः ।
पुनः पुनः प्राणदतां दिदृक्षन्तौ वृकोदरम् ॥ ३४ ॥
उस महाबली वीरके सिंहनादको एक ही साथ सुनकर उन दोनों वीरोंने भीमसेनको देखनेकी इच्छा प्रकट करते हुए बारंबार गर्जना की ॥ ३४ ॥
ततः पार्थो महानादं मुञ्चन् वै माधवश्च ह ।
अभ्ययातां महाराज नर्दन्तौ गोवृषाविव ॥ ३५ ॥
महाराज! गरजते हुए दो साँड़ोंके समान अर्जुन और श्रीकृष्ण महान् सिंहनाद करते हुए आगे बढ़ने लगे ॥ ३५ ॥
भीमसेनरवं श्रुत्वा फाल्गुनस्य च धन्विनः ।
अप्रीयत महाराज धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ३६ ॥
नरेश्वर! भीमसेन तथा धनुर्धर अर्जुनकी गर्जना सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न हुए ॥ ३६ ॥
विशोकश्चाभवद् राजा श्रुत्वा तं निनदं तयोः ।
धनंजयस्य समरे जयमाशास्तवान् विभुः ॥ ३७ ॥
उन दोनोंका सिंहनाद सुनकर राजाका शोक दूर हो गया। वे शक्तिशाली नरेश समरभूमिमें अर्जुनकी विजयके लिये शुभ कामना करने लगे ॥ ३७ ॥
तथा तु नर्दमाने वै भीमसेने मदोत्कटे ।
स्मितं कृत्वा महाबाहुर्धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ३८ ॥
हृद्गतं मनसा प्राह ध्यात्वा धर्मभृतां वरः ।
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मदोन्मत्त भीमसेनके बारंबार गर्जना करनेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्मपुत्र महाबाहु युधिष्ठिर मुसकराकर मन- ही- मन कुछ सोचते हुए अपने हृदयकी बात इस प्रकार कहने लगे ॥ ३८३ ॥
दत्ता भीम त्वया संवित् कृतं गुरुवचस्तथा ॥ ३ ९ ॥
न हि तेषां जयो युद्धे येषां द्वेष्टासि पाण्डव ।
दिष्ट्या जीवति संग्रामे सव्यसाची धनंजयः ॥ ४० ॥
' भीम! तुमने सूचना दे दी और गुरुजनकी आज्ञाका पालन कर दिया । पाण्डुनन्दन! जिनके शत्रु तुम हो, उन्हें युद्धमें विजय नहीं प्राप्त हो सकती । सौभाग्यकी बात है कि संग्रामभूमिमें सव्यसाची अर्जुन जीवित है ॥ ३ ९ -४० ॥
दिष्ट्या च कुशली वीरः सात्यकिः सत्यविक्रमः ।
दिष्ट्या शृणोमि गर्जन्तौ वासुदेवधनंजयौ ॥ ४१ ॥
‘ यह भी आनन्दकी बात है कि सत्यपराक्रमी वीर सात्यकि सकुशल हैं । मैं सौभाग्यवश इस समय भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनकी गर्जना सुन रहा हूँ ॥ ४१ ॥
येन शक्रं रणे जित्वा तर्पितो हव्यवाहनः ।
सहन्ता द्विषतां संख्ये दिष्ट्या जीवति फाल्गुनः ॥ ४२ ॥
‘ जिसने रणक्षेत्रमें इन्द्रको जीतकर अग्निदेवको तृप्त किया था, वह शत्रुहन्ता अर्जुन मेरे सौभाग्यसे युद्धस्थलमें जीवित है ॥ ४२ ॥
यस्य बाहुबलं सर्वे वयमाश्रित्य जीविताः ।
स हन्ता रिपुसैन्यानां दिष्ट्या जीवति फाल्गुनः ॥ ४३ ॥
‘ जिसके बाहुबलका भरोसा करके हम सब लोग जीवन धारण करते हैं, शत्रुसेनाओंका संहार करनेवाला वह अर्जुन हमारे सौभाग्यसे जीवित है ॥ ४३ ॥
निवातकवचा येन देवैरपि सुदुर्जयाः ।
निर्जिता धुनुषैकेन दिष्ट्या पार्थः स जीवति ॥ ४४ ॥
‘ जिसने देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्जय निवातकवच नामक दानवोंको एकमात्र धनुषकी सहायतासे जीत लिया था, वह कुन्तीकुमार अर्जुन हमारे भाग्यसे जीवित है ॥ ४४ ॥
कौरवान् सहितान् सर्वान् गोग्रहार्थे समागतान् ।
योऽजयन्मत्स्यनगरे दिष्ट्या पार्थः स जीवति ॥ ४५ ॥
‘ विराटकी गौओंका अपहरण करनेके लिये एक साथ आये हुए समस्त कौरवोंको जिसने मत्स्य देशकी राजधानीके समीप पराजित किया था, वह पार्थ जीवित है, यह सौभाग्यकी बात है ॥ ४५ ॥
कालकेयसहस्राणि चतुर्दश महारणे ।
योऽवधीद् भुजवीर्येण दिष्ट्या पार्थः स जीवति ॥ ४६ ॥
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‘ जिसने महासमरमें अपने बाहुबलसे चौदह हजार कालकेय नामक दैत्योंका वध किया था, वह अर्जुन हमारे भाग्यसे जीवित है ॥ ४६ ॥
गन्धर्वराजं बलिनं दुर्योधनकृते च वै ।
जितवान् योऽस्त्रवीर्येण दिष्ट्या पार्थः स जीवति ॥ ४७ ॥
‘जिसने अपने अस्त्र- बलसे दुर्योधनके लिये बलवान् गन्धर्वराज चित्रसेनको परास्त किया था, वह पार्थ सौभाग्यवश जीवित है ॥ ४७ ॥
किरीटमाली बलवान् श्वेताश्वः कृष्णसारथिः ।
मम प्रियश्च सततं दिष्ट्या पार्थः स जीवति ॥ ४८ ॥
‘जिसके मस्तकपर किरीट शोभा पाता है, जिसके रथमें श्वेत घोड़े जोते जाते हैं, भगवान् श्रीकृष्ण जिसके सारथि हैं तथा जो सदा ही मुझे प्रिय लगता है, वह बलवान् अर्जुन अभी जीवित है, यह सौभाग्यकी बात है ॥ ४८ ॥
पुत्रशोकाभिसंतप्तश्चिकीर्षन् कर्म दुष्करम् ।
जयद्रथवधान्वेषी प्रतिज्ञां कृतवान् हि यः ॥ ४ ९ ॥
कच्चित् स सैन्धवं संख्ये हनिष्यति धनंजयः ।
कच्चित् तीर्णप्रतिज्ञं हि वासुदेवेन रक्षितम् ॥ ५० ॥
अनस्तमित आदित्ये समेष्याम्यहमर्जुनम् । ' जिसने पुत्रशोकसे संतप्त हो दुष्कर कर्म करनेकी इच्छा रखकर जयद्रथके वधकी अभिलाषासे भारी प्रतिज्ञा कर ली है, वह अर्जुन क्या आज युद्धमें सिंधुराजको मार डालेगा? क्या सूर्यास्त होनेसे पहले ही प्रतिज्ञा पूर्ण करके लौटे हुए, भगवान् श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित अर्जुनसे मैं मिल सकूँगा? ॥ ४ ९-५०३ ॥ कच्चित् सैन्धवको राजा दुर्योधनहिते रतः ॥ ५१ ॥
नन्दयिष्यत्यमित्रान् हि फाल्गुनेन निपातितः । ' क्या दुर्योधनके हितमें तत्पर रहनेवाला राजा जयद्रथ अर्जुनके हाथसे मारा जाकर शत्रुपक्षको आनन्दित करेगा? ॥ ५१३ ॥
कच्चिद् दुर्योधनो राजा फाल्गुनेन निपातितम् ॥ ५२ ॥
दृष्ट्वा सैन्धवकं संख्ये शममस्मासु धास्यति । ' क्या युद्धमें सिंधुराजको अर्जुनके हाथसे मारा गया देखकर राजा दुर्योधन हमारे साथ संधि कर लेगा? ॥ ५२३ ॥
दृष्ट्वा विनिहतान् भ्रातृन् भीमसेनेन संयुगे ॥ ५३ ॥
कच्चिद् दुर्योधनो मन्दः शममस्मासु धास्यति । ' क्या मूर्ख दुर्योधन संग्राम भूमिमें भीमसेनके हाथसे अपने भाइयोंका वध होता देखकर हमारे साथ संधि कर लेगा? ॥ ५३३ ॥
दृष्ट्वा चान्यान् महायोधान् पातितान् धरणीतले ।
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कच्चिद् दुर्योधनो मन्दः पश्चात्तापं गमिष्यति ॥ ५४ ॥
' अन्यान्य बड़े - बड़े योद्धाओंको भी धराशायी किये गये देखकर क्या मन्दबुद्धि दुर्योधनको पश्चात्ताप होगा? ॥
कच्चिद् भीष्मेण नो वैरं शममेकेन यास्यति ।
शेषस्य रक्षणार्थं च संधास्यति सुयोधनः ॥ ५५ ॥
'क्या एकमात्र भीष्मकी मृत्युसे हमलोगोंका वैर शान्त हो जायगा? क्या शेष वीरोंकी रक्षाके लिये दुर्योधन हमारे साथ संधि कर लेगा? ' ॥ ५५ ॥
एवं बहुविधं तस्य राज्ञश्चिन्तयतस्तदा ।
कृपयाभिपरीतस्य घोरं युद्धमवर्तत ॥ ५६ ॥
इस प्रकार राजा युधिष्ठिर जब दयासे द्रवित होकर भाँति- भाँतिकी बातें सोच रहे थे, उस समय दूसरी ओर घोर युद्ध हो रहा था ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि भीमसेनप्रवेशे युधिष्ठिरहर्षे अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें भीमसेनका कौरव सेनामें प्रवेश तथा युधिष्ठिरका हर्षविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १२८ ॥
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एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः भीमसेन और कर्णका युद्ध तथा कर्णकी पराजय धृतराष्ट्रउवाच
निनदन्तं तथा तं तु भीमसेनं महाबलम् ।
मेघस्तनितनिर्घोषं के वीराः पर्यवारयन् ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा- संजय! इस प्रकार मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर स्वरसे सिंहनाद करते हुए महाबली भीमसेनको किन वीरोंने रोका? ॥ १ ॥
न हि पश्याम्यहं तं वै त्रिषु लोकेषु कंचन ।
क्रुद्धस्य भीमसेनस्य यस्तिष्ठेदग्रतो रणे ॥ २ ॥
मैं तो तीनों लोकोंमें किसीको ऐसा नहीं देखता, जो क्रोधमें भरे हुए भीमसेनके सामने युद्धस्थलमें खड़ा हो सके ॥ २ ॥
गदां युयुत्समानस्य कालस्येवेह संजय ।
न हि पश्याम्यहं युद्धे यस्तिष्ठेदग्रतः पुमान् ॥ ३ ॥
संजय! मुझे ऐसा कोई वीर पुरुष नहीं दिखायी देता, जो कालके समान गदा उठाकर युद्धकी इच्छा रखनेवाले भीमसेनके सामने समरभूमिमें ठहर सके ॥ ३ ॥
रथं रथेन यो हन्यात् कुञ्जरं कुञ्जरेण च ।
कस्तस्य समरे स्थाता साक्षादपि पुरंदरः ॥ ४ ॥
जो रथसे रथको और हाथीसे हाथीको मार सकता है, उस वीर पुरुषके सामने साक्षात् इन्द्र ही क्यों न हो, कौन युद्धके लिये खड़ा होगा? ॥ ४ ॥
क्रुद्धस्य भीमसेनस्य मम पुत्रान् जिघांसतः ।
दुर्योधनहिते युक्ताः समतिष्ठन्त केऽग्रतः ॥ ५ ॥
क्रोधमें भरकर मेरे पुत्रोंका वध करनेकी इच्छावाले भीमसेनके आगे दुर्योधनके हितमें तत्पर रहनेवाले कौन - कौन योद्धा खड़े हो सके? ॥ ५ ॥
भीमसेनदवाग्नेस्तु मम पुत्रांस्तृणोपमान् ।
प्रधक्षतो रणमुखे केऽतिष्ठन्नग्रतो नराः ॥ ६ ॥
भीमसेन दावानलके समान हैं और मेरे पुत्र तिनकोंके समान । उन्हें जला डालनेकी इच्छावाले भीमसेनके सामने युद्धके मुहानेपर कौन- कौन - से वीर खड़े हुए? ॥ ६ ॥
काल्यमानांस्तु पुत्रान् मे दृष्ट्वा भीमेन संयुगे ।
कालेनेव प्रजाः सर्वाः के भीमं पर्यवारयन् ॥ ७ ॥
जैसे काल समस्त प्रजाको अपना ग्रास बना लेता है, उसी प्रकार युद्धस्थलमें भीमसेनके द्वारा मेरे पुत्रोंको कालके गालमें जाते देख किन वीरोंने आगे बढ़कर भीमसेनको
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रोका? ॥ ७ ॥
न मेऽर्जुनाद् भयं तादृक् कृष्णान्नापि च सात्वतात् ।
हुतभुग्जन्मनो नैव यादृग्भीमाद् भयं मम ॥ ८ ॥
मुझे भीमसेनसे जैसा भय लगता है, वैसा न तो अर्जुनसे और न श्रीकृष्णसे, न सात्यकिसे और न धृष्टद्युम्नसे ही लगता है ॥ ८ ॥
भीमवह्नेः प्रदीप्तस्य मम पुत्रान् दिधक्षतः ।
के शूराः पर्यवर्तन्त तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ९ ॥
संजय! मेरे पुत्रोंको दग्ध करनेकी इच्छासे प्रज्वलित हुए भीमरूपी अग्निदेवके सामने कौन- कौन शूरवीर डटे रह सके, यह मुझे बताओ ॥ ९ ॥
संजय उवाच
तथा तु नर्दमानं तं भीमसेनं महाबलम् ।
तुमुलेनैव शब्देन कर्णोऽप्यभ्यद्रवद् बली ॥ १० ॥
संजयने कहा— राजन्! इस प्रकार गरजते हुए महाबली भीमसेनपर बलवान् कर्णने भयंकर सिंहनादके साथ आक्रमण किया ॥ १० ॥
व्याक्षिपन् सुमहच्चापमतिमात्रममर्षणः ।
कर्णः सुयुद्धमाकाङ्क्षन् दर्शयिष्यन् बलं मृधे ॥ ११ ॥
रुरोध मार्गं भीमस्य वातस्येव महीरुहः । अत्यन्त अमर्षशील कर्णने रणभूमिमें अपना बल दिखानेके लिये अपने विशाल धनुषको खींचते और युद्धकी अभिलाषा रखते हुए, जैसे वृक्ष वायुका मार्ग रोकता है, उसी प्रकार भीमसेनका मार्ग अवरुद्ध कर दिया ॥ ११३ ॥
भीमोऽपि दृष्ट्वा सावेगं पुरो वैकर्तनं स्थितम् ॥ १२ ॥
चुकोप बलवद्वीरश्चिक्षेपास्य शिलाशितान् । वीर भीमसेन भी अपने सामने कर्णको खड़ा देख अत्यन्त कुपित हो उठे और तुरंत ही उसके ऊपर सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए बाण बलपूर्वक छोड़ने लगे ॥ १२३ ॥
तान् प्रत्यगृह्णात् कर्णोऽपि प्रतीपं प्रापयच्छरान् ॥ १३ ॥
कर्णने भी उन बाणोंको ग्रहण किया और उनके विपरीत बहुत - से बाण चलाये ॥ १३ ॥
ततस्तु सर्वयोधानां यततां प्रेक्षतां तदा ।
प्रावेपन्निव गात्राणि कर्णभीमसमागमे ॥ १४ ॥
उस समय कर्ण और भीमसेनके संघर्षमें विजयके लिये प्रयत्नशील होकर देखनेवाले सम्पूर्ण योद्धाओंके शरीर काँपने से लगे ॥ १४ ॥
"रथिनां सादिनां चैव तयोः श्रुत्वा तलस्वनम् ।
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भीमसेनस्य निनदं श्रुत्वा घोरं रणाजिरे ॥ १५ ॥
उन दोनोंके ताल ठोकनेकी आवाज सुनकर तथा समरांगणमें भीमसेनकी घोर गर्जना सुनकर रथियों और घुड़सवारोंके भी शरीर थर- थर काँपने लगे ॥ १५ ॥
खं च भूमिं च संरुद्धां मेनिरे क्षत्रियर्षभाः ।
पुनर्घोरण नादेन पाण्डवस्य महात्मनः ॥ १६ ॥
वहाँ आये हुए क्षत्रियशिरोमणि योद्धा महामना पाण्डुनन्दन भीमसेनके बारंबार होनेवाले घोर सिंहनादसे आकाश और पृथ्वीको व्याप्त मानने लगे ॥ १६ ॥
समरे सर्वयोधानां धनूंष्यभ्यपतन् क्षितौ ।
शस्त्राणि न्यपतन् दोर्भ्यः केषांचिच्चासवोऽद्रवन् ॥ १७ ॥
उस समरांगणमें प्रायः सम्पूर्ण योद्धाओंके धनुष तथा अन्य अस्त्र - शस्त्र हाथोंसे छूटकर
पृथ्वीपर गिर पड़े । कितनोंके तो प्राण ही निकल गये ॥ १७ ॥
वित्रस्तानि च सर्वाणि शकृन्मूत्रं प्रसुस्रुवुः ।
वाहनानि च सर्वाणि बभूवुर्विमनांसि च ॥ १८ ॥
प्रादुरासन् निमित्तानि घोराणि सुबहून्युत ।
गृध्रकङ्कबलैश्चासीदन्तरिक्षं समावृतम् ॥ १ ९ ॥
तस्मिन् सुतुमुले राजन् कर्णभीमसमागमे । सारी सेनाके समस्त वाहन संत्रस्त होकर मल- मूत्र त्यागने लगे । उनका मन उदास हो गया । बहुत - से भयंकर अपशकुन प्रकट होने लगे । राजन्! कर्ण और भीमके उस भयंकर युद्धमें आकाश गीधों, कौवों और कंकोंसे छा गया ॥ १८-१९ ३ ॥ ततः कर्णस्तु विंशत्या शराणां भीममार्दयत् ॥ २० ॥
विव्याध चास्य त्वरितः सूतं पञ्चभिराशुगैः । तदनन्तर कर्णने बीस बाणोंसे भीमसेनको गहरी चोट पहुँचायी । फिर तुरंत ही उनके सारथिको पाँच बाणोंसे बींध डाला ॥ २० ॥
प्रहस्य भीमसेनोऽपि कर्णं प्रत्याद्रवद् रणे ॥ २१ ॥
सायकानां चतुःषष्ट्या क्षिप्रकारी महायशाः । तब शीघ्रता करनेवाले महायशस्वी भीमसेनने भी हँसकर चौंसठ बाणोंद्वारा रणभूमिमें कर्णपर आक्रमण किया ॥ २१३ ॥
तस्य कर्णो महेष्वासः सायकांश्चतुरोऽक्षिपत् ॥ २२ ॥
असम्प्राप्तांश्च तान् भीमः सायकैर्नतपर्वभिः ।
चिच्छेद बहुधा राजन् दर्शयन् पाणिलाघवम् ॥ २३ ॥
राजन्! फिर महाधनुर्धर कर्णने चार बाण चलाये । परंतु भीमसेनने अपने हाथकी फुर्ती दिखाते हुए झुकी हुई गाँठवाले अनेक बाणोंद्वारा अपने पास आनेके पहले ही कर्णके बाणोंके टुकड़े - टुकड़े कर दिये ॥ २२-२३ ॥
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तं कर्णश्छादयामास शरव्रातैरनेकशः ।
संछाद्यमानः कर्णेन बहुधा पाण्डुनन्दनः ॥ २४ ॥
चिच्छेद चापं कर्णस्य मुष्टिदेशे महारथः ।
विव्याध चैनं बहुभिः सायकैर्नतपर्वभिः ॥ २५ ॥
तब कर्णने अनेकों बार बाणसमूहोंकी वर्षा करके भीमसेनको आच्छादित कर दिया । कर्णके द्वारा बारंबार अच्छादित होते हुए पाण्डुनन्दन महारथी भीमने कर्णके धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट दिया और झुकी हुई गाँठवाले बहुत- से बाणोंद्वारा उसे घायल कर दिया ॥ २४-२५ । |
अथान्यद्धनुरादाय सज्यं कृत्वा च सूतजः ।
विव्याध समरे भीमं भीमकर्मा महारथः ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् भयंकर कर्म करनेवाले महारथी सूतपुत्र कर्णने दूसरा धनुष लेकर उसपर प्रत्यंचा चढ़ायी और समरभूमिमें भीमसेनको घायल कर दिया ॥ २६ ॥
तस्य भीमो भृशं क्रुद्धस्त्रीन् शरान् नतपर्वणः ।
निचखानोरसि क्रुद्धः सूतपुत्रस्य वेगतः ॥ २७ ॥
तब भीमसेनको बड़ा क्रोध हुआ । उन्होंने वेगपूर्वक सूतपुत्रकी छातीमें झुकी हुई गाँठवाले तीन बाण धँसा दिये ॥
तैः कर्णोऽराजत शरैरुरोर्मध्यगतैस्तदा ।
महीधर इवोदग्रस्त्रिशृङ्गो भरतर्षभ ॥ २८ ॥
भरतश्रेष्ठ! ठीक छातीके बीचमें गड़े हुए उन बाणोंद्वारा कर्ण तीन शिखरोंवाले ऊँचे पर्वतके समान सुशोभित हुआ ॥ २८ ॥
सुस्राव चास्य रुधिरं विद्धस्य परमेषुभिः ।
धातुप्रस्यन्दिनः शैलाद् यथा गैरिकधातवः ॥ २ ९ ॥
उन उत्तम बाणोंसे बिंधे हुए कर्णकी छातीसे बहुत रक्त गिरने लगा, मानो धातुकी धाराएँ बहानेवाले पर्वतसे गैरिक धातु ( गेरु) प्रवाहित हो रहा हो ॥ २९ ॥
किंचिद विचलितः कर्णः सुप्रहाराभिपीडितः ।
आकर्णपूर्णमाकृष्य भीमं विव्याध सायकैः ॥ ३० ॥
उस गहरे प्रहारसे पीड़ित हो कर्ण कुछ विचलित हो उठा । फिर धनुषको कानतक खींचकर उसने अनेक बाणोंद्वारा भीमसेनको बींध डाला ॥ ३० ॥
चिक्षेप च पुनर्बाणान् शतशोऽथ सहस्रशः ।
स शरैरर्दितस्तेन कर्णेन दृढधन्विना ।
धनुर्ज्यामच्छिनत् तूर्णं भीमस्तस्य क्षुरेण ह ॥ ३१ ॥
तत्पश्चात् उनपर पुनः सैकड़ों और हजारों बाणोंका प्रहार किया । सुदृढ़ धनुर्धर कर्णके बाणोंसे पीड़ित हो भीमसेनने एक क्षुरके द्वारा तुरंत ही उसके धनुषकी प्रत्यंचा काट दी ॥
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सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत् ।
वाहांश्च चतुरस्तस्य व्यसूंश्चक्रे महारथः ॥ ३२ ॥
साथ ही उसके सारथिको एक भल्लसे मारकर रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया । इतना ही नहीं, महारथी भीमने उसके चारों घोड़ोंके भी प्राण ले लिये ॥ ३२ ॥
हताश्वात् तु रथात् कर्णः समाप्लुत्य विशाम्पते ।
स्यन्दनं वृषसेनस्य तूर्णमापुप्लुवे भयात् ॥ ३३ ॥
प्रजानाथ! उस समय कर्ण भयके मारे उस अश्वहीन रथसे कूदकर तुरंत ही वृषसेनके रथपर जा बैठा ॥ ३३ ॥
निर्जित्य तु रणे कर्णं भीमसेनः प्रतापवान् ।
ननाद बलवान् नादं पर्जन्यनिनदोपमम् ॥ ३४ ॥
इस प्रकार बलवान् एवं प्रतापी भीमसेनने रणभूमिमें कर्णको पराजित करके मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर स्वरसे सिंहनाद किया ॥ ३४ ॥
तस्य तं निनदं श्रुत्वा प्रहृष्टोऽभूद् युधिष्ठिरः ।
कर्णं पराजितं मत्वा भीमसेनेन संयुगे ॥ ३५ ॥
भीमसेनका वह महान् सिंहनाद सुनकर उनके द्वारा युद्धमें कर्णको पराजित हुआ जान राजा युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न हुए ॥ ३५ ॥
समन्ताच्छङ्खनिनदं पाण्डुसेनाकरोत् तदा ।
शत्रुसेनाध्वनिं श्रुत्वा तावका ह्यनदन् भृशम ॥ ३६ ॥
उस समय पाण्डव- सेना सब ओर शंखनाद करने लगी । शत्रुसेनाकी शंखध्वनि सुनकर आपके सैनिक भी जोर - जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ३६ ॥
स शङ्खबाणनिनदैर्हर्षाद् राजा स्ववाहिनीम् ।
चक्रे युधिष्ठिरः संख्ये हर्षनादैश्च संकुलाम् ॥ ३७ ॥
राजा युधिष्ठिरने युद्धस्थलमें हर्षके कारण अपनी सेनाको शंख और बाणोंकी ध्वनि तथा हर्षनादसे व्याप्त कर दिया ॥ ३७ ॥
गाण्डीवं व्याक्षिपत् पार्थः कृष्णोऽप्यब्जमवादयत् ।
तमन्तर्धाय निनदं भीमस्य नदतो ध्वनिः ।
अश्रूयत तदा राजन् सर्वसैन्येषु दारुणः ॥ ३८ ॥
इसी समय अर्जुनने गाण्डीव धनुषकी टंकार की और भगवान् श्रीकृष्णने पांचजन्य शंख बजाया । परंतु उसकी ध्वनिको तिरोहित करके गरजते हुए भीमसेनका भयंकर सिंहनाद सम्पूर्ण सेनाओंमें सुनायी देने लगा ॥ ३८ ॥
ततो व्यायच्छतामस्त्रैः पृथक् पृथगजिह्मगैः ।
मृदुपूर्वं तु राधेयो दृढपूर्वं तु पाण्डवः ॥ ३ ९ ॥