श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 901–910
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 901–910
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तदनन्तर वे दोनों वीर एक- दूसरेपर पृथक् - पृथक् सीधे जानेवाले बाणोंका प्रहार करने लगे । राधानन्दन कर्ण मृदुतापूर्वक बाण चलाता था और पाण्डुनन्दन भीमसेन कठोरतापूर्वक ॥ ३ ९ ॥
(दृष्ट्वा कर्णं च पार्थेन बाधितं बहुभिः शरैः ।
दुर्योधनो महाराज दुःशलं प्रत्यभाषत ॥
कर्णं कृच्छ्रगतं पश्य शीघ्रं यानं प्रयच्छ ह । महाराज! कुन्तीपुत्र भीमसेनके द्वारा कर्णको बहुसंख्यक बाणोंसे पीड़ित हुआ देख दुर्योधनने दुःशलसे कहा - ' दुःशल! देखो, कर्ण संकटमें पड़ा है । तुम शीघ्र उसके लिये रथ प्रस्तुत करो' । एवमुक्तस्ततो राज्ञा दुःशलः समुपाद्रवत् । दुःशलस्य रथं कर्णश्चारुरोह महारथः । तौ पार्थः सहसा गत्वा विव्याध दशभिः शरैः । पुनश्च कर्णं विव्याध दुःशलस्य शिरोऽहरत् ॥ ) राजाके ऐसा कहनेपर दुःशल कर्णके पास दौड़ा गया; फिर महारथी कर्ण दुःशलके रथपर आरूढ़ हो गया । इसी समय भीमसेनने सहसा जाकर दस बाणोंसे उन दोनोंको घायल कर दिया । तत्पश्चात् पुनः कर्णपर आघात किया और दुःशलका सिर काट लिया । इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि भीमप्रवेशे कर्णपराजये एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२ ९ ॥ इसप्रकारश्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें भीमसेनका प्रवेश और कर्णकी पराजयविषयक एक सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ९ ॥ ( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३३ श्लोक मिलाकर कुल ४२ श्लोक हैं )
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त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः दुर्योधनका द्रोणाचार्यको उपालम्भ देना, द्रोणाचार्यका उसे द्यूतका परिणाम दिखाकर युद्धके लिये वापस भेजना और उसके साथ युधामन्यु तथा उत्तमौजाका युद्ध संजय उवाच
तस्मिन् विलुलिते सैन्ये सैन्धवायार्जुने गते ।
सात्वते भीमसेने च पुत्रस्ते द्रोणमभ्ययात् ॥ १ ॥
त्वरन्नेकरथेनैव बहुकृत्यं विचिन्तयन् । संजय कहते हैं - महाराज! इस प्रकार जब वह सेना विचलित होकर भाग चली, अर्जुन सिंधुराजके वधके लिये आगे बढ़ गये और उनके पीछे सात्यकि तथा भीमसेन भी वहाँ जा पहुँचे, तब आपका पुत्र दुर्योधन बड़ी उतावलीके साथ एकमात्र रथद्वारा बहुत - से आवश्यक कार्योंके सम्बन्धमें सोचता- विचारता हुआ द्रोणाचार्यके पास गया ॥ १३ ॥
स रथस्तव पुत्रस्य त्वरया परया युतः ॥ २ ॥
तूर्णमभ्यद्रवद् द्रोणं मनोमारुतवेगवान् । आपके पुत्रका वह रथ मन और वायुके समान वेगशाली था । वह बड़ी तेजीके साथ तत्काल द्रोणाचार्यके पास जा पहुँचा ॥ २३ ॥
उवाच चैनं पुत्रस्ते संरम्भाद् रक्तलोचनः ॥ ३ ॥
ससम्भ्रममिदं वाक्यमब्रवीत् कुरुनन्दनः । उस समय आपका पुत्र कुरुनन्दन दुर्योधन क्रोधसे लाल आँखें करके घबराहटके स्वरमें द्रोणाचार्यसे इस प्रकार बोला – ॥ ३३ ॥
अर्जुनो भीमसेनश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ ४ ॥
विजित्य सर्वसैन्यानि सुमहान्ति महारथाः ।
सम्प्राप्ताः सिन्धुराजस्य समीपमनिवारिताः ॥ ५ ॥
‘ आचार्य! अर्जुन, भीमसेन और अपराजित वीर सात्यकि- ये तीनों महारथी मेरी
सम्पूर्ण एवं विशाल सेनाओंको पराजित करके सिंधुराज जयद्रथके समीप पहुँच गये हैं ।
उन्हें कोई रोक नहीं सका है ॥ ४-५ ॥
व्यायच्छन्ति च तत्रापि सर्व एवापराजिताः ।
यदि तावद् रणे पार्थो व्यतिक्रान्तो महारथः ॥ ६ ॥
कथं सात्यकिभीमाभ्यां व्यतिक्रान्तोऽसि मानद ।
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‘ वहाँ भी वे सब - के - सब अपराजित होकर मेरी सेनापर प्रहार कर रहे हैं । मान लिया, महारथी अर्जुन रणभूमिमें ( अधिक शक्तिशाली होनेके कारण ) आपको लाँघकर आगे बढ़ गये हैं; परंतु दूसरोंको मान देनेवाले गुरुदेव! सात्यकि और भीमसेनने किस तरह आपका लंघन किया है? ॥ ६३ ॥
आश्चर्यभूतं लोकेऽस्मिन् समुद्रस्येव शोषणम् ॥ ७ ॥
निर्जयस्तव विप्राग्रय सात्वतेनार्जुनेन च ।
तथैव भीमसेनेन लोकः संवदते भृशम् ॥ ८ ॥
‘ विप्रवर! सात्यकि, भीमसेन तथा अर्जुनके द्वारा आपकी पराजय समुद्रको सुखा देनेके समान इस संसारमें एक आश्चर्यभरी घटना है । लोग बड़े जोरसे इस बातकी चर्चा कर रहे हैं ॥ ७-८ ॥
कथं द्रोणो जितः संख्ये धनुर्वेदस्य पारगः ।
इत्येवं ब्रुवते योधा अश्रद्धेयमिदं तव ॥ ९ ॥
‘ सारे योद्धा यह कह रहे हैं कि धनुर्वेदके पारंगत आचार्य द्रोण कैसे युद्धमें पराजित हो गये । आपका यह हारना लोगोंके लिये अविश्वसनीय हो गया है ॥ ९ ॥
नाश एव तु मे नूनं मन्दभाग्यस्य संयुगे ।
यत्र त्वां पुरुषव्याघ्रं व्यतिक्रान्तास्त्रयो रथाः ॥ १० ॥
‘ वास्तवमें मेरा भाग्य ही खोटा है । ये तीनों महारथी जहाँ आप जैसे पुरुषसिंह वीरको लाँघकर आगे बढ़ गये हैं, उस युद्धमें मेरा विनाश ही अवश्यम्भावी है ॥
एवं गते तु कृत्येऽस्मिन् ब्रूहि यत् ते विवक्षितम् ।
यद् गतं गतमेवेदं शेषं चिन्तय मानद ॥ ११ ॥
' ऐसी परिस्थितिमें जो कर्तव्य है, उसके सम्बन्धमें आपकी क्या राय है, यह बताइये । मानद! जो हो गया सो तो हो ही गया । अब जो शेष कार्य है, उसका विचार कीजिये ॥ ११ ॥
यत् कृत्यं सिन्धुराजस्य प्राप्तकालमनन्तरम् ।
तत् संविधीयतां क्षिप्रं साधु संचिन्त्य नो द्विज ॥ १२ ॥
‘ब्रह्मन्! इस समय सिंधुराजकी रक्षाके लिये तुरंत करनेयोग्य जो कार्य हमारे सामने प्राप्त है, उसे अच्छी तरह सोच- विचारकर शीघ्र सम्पन्न कीजिये ' ॥ १२ ॥
द्रोणउवाच
चिन्त्यं बहुविधं तात यत् कृत्यं तच्छृणुष्व मे ।
त्रयो हि समतिक्रान्ताः पाण्डवानां महारथाः ॥ १३ ॥
यावत् तेषां भयं पश्चात् तावदेषां पुरःसरम् ।
तद् गरीयस्तरं मन्ये यत्र कृष्णधनंजयौ ॥ १४ ॥
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द्रोणाचार्यने कहा – तात! सोचने - विचारनेको तो बहुत कुछ है, किंतु इस समय जो कर्तव्य प्राप्त है वह मुझसे सुनो । पाण्डवपक्षके तीन महारथी हमारी सेनाको लाँघकर आगे बढ़ गये हैं । पीछे उनका जितना भय है, उतना ही आगे भी है। परंतु जहाँ अर्जुन और श्रीकृष्ण हैं वहीं मेरी समझमें अधिक भयकी आशंका है ॥ १३-१४ ॥
सा पुरस्ताच्च पश्चाच्च गृहीता भारती चमूः ।
तत्र कृत्यमहं मन्ये सैन्धवस्याभिरक्षणम् ॥ १५ ॥
इस समय कौरव - सेना आगे और पीछेसे भी शत्रुओंके आक्रमणका शिकार हो रही है । इस परिस्थितिमें मैं सबसे आवश्यक कार्य यही मानता हूँ कि सिंधुराज जयद्रथकी रक्षा की जाय ॥ १५ ॥
स नो रक्ष्यतमस्तात क्रुद्धाद् भीतो धनंजयात् ।
गतौ च सैन्धवं भीमौ युयुधानवृकोदरौ ॥ १६ ॥
तात! जयद्रथ कुपित हुए अर्जुनसे डरा हुआ है । अतः वह हमारे लिये सबसे रक्षणीय है । भयंकर वीर सात्यकि और भीमसेन भी जयद्रथको ही लक्ष्य करके गये हैं ॥ १६ ॥
सम्प्राप्तं तदिदं द्यूतं यत् तच्छकुनिबुद्धिजम् ।
न सभायां जयो वृत्तो नापि तत्र पराजयः ॥ १७ ॥
इह नो ग्लहमानानामद्य तावज्जयाजयौ । शकुनिकी बुद्धिमें जो जूआ खेलनेकी बात पैदा हुई थी, वह वास्तवमें आज इस रूपमें सफल हो रही है । उस दिन सभामें किसी पक्षकी जीत या हार नहीं हुई थी । आज यहाँ जो हमलोग प्राणोंकी बाजी लगाकर जूआ खेल रहे हैं, इसीमें वास्तविक हार- जीत होनेवाली है ॥ १७३ ॥
यान् स्म तान् ग्लहते घोरान् शकुनिः कुरुसंसदि ॥ १८ ॥
अक्षान् स मन्यमानः प्राक् शरास्ते हि दुरासदाः । शकुनि कौरवसभामें पहले जिन भयंकर पासोंको हाथमें लेकर जूएका खेल खेलता था, उन्हें वह तो पासे ही समझता था, परंतु वास्तवमें वे दुर्धर्ष बाण थे ॥ १८३ ॥
यत्र ते बहवस्तात कौरवेया व्यवस्थिताः ॥ १ ९ ॥
सेनां दुरोदरं विद्धि शरानक्षान् विशाम्पते ।
ग्लहं च सैन्धवं राजंस्तत्र द्यूतस्य निश्चयः ॥ २० ॥
तात! ( असली जूआ तो वहाँ हो रहा है ) जहाँ तुम्हारे बहुत - से कौरवयोद्धा खड़े हैं । इस सेनाको ही तुम जुआरी समझो । प्रजानाथ! बाणोंको ही पासे मान लो। राजन्! सिंधुराज जयद्रथको ही बाजी या दाँव समझो । उसीपर जूएकी हार-जीतका फैसला होगा ॥ १ ९ -२० ॥
सैन्धवे तु महद् द्यूतं समासक्तं परैः सह ।
अत्र सर्वे महाराज त्यक्त्वा जीवितमात्मनः ॥ २१ ॥
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सैन्धवस्य रणे रक्षां विधिवत् कर्तुमर्हथ ।
तत्र नो ग्लहमानानां ध्रुवौ जयपराजयौ ॥ २२ ॥
महाराज! सिंधुराजके ही जीवनकी बाजी लगाकर शत्रुओंके साथ हमारी भारी द्यूतक्रीड़ा चल रही है । यहाँ तुम सब लोग अपने जीवनका मोह छोड़कर रणभूमिमें विधिपूर्वक जयद्रथकी रक्षा करो। निश्चय ही उसीपर हम द्यूतक्रीड़ा करनेवालोंकी असली हार- जीत निर्भर है ॥ २१-२२ ॥
यत्र ते परमेष्वासा यत्ता रक्षन्ति सैन्धवम् ।
तत्र गच्छ स्वयं शीघ्रं तांश्च रक्षत्व रक्षिणः ॥ २३ ॥
राजन्! जहाँ वे महाधनुर्धर योद्धा सावधान होकर सिंधुराजकी रक्षा करने लगे हैं, वहीं तुम स्वयं ही शीघ्र चले जाओ और सिंधुराजके उन रक्षकोंकी रक्षा करो ॥ २३ ॥
इहैव त्वहमासिष्ये प्रेषयिष्यामि चापरान् ।
निरोत्स्यामि च पञ्चालान् सहितान् पाण्डुसृञ्जयैः ॥ २४ ॥
मैं तो यहीं रहूँगा और तुम्हारे पास दूसरे- दूसरे रक्षकोंको भेजता रहूँगा । साथ ही पाण्डवों तथा सृजयोंसहित आये हुए पांचालोंको व्यूहके भीतर जानेसे रोकूँगा ॥ २४ ॥
ततो दुर्योधनोऽगच्छत् तूर्णमाचार्यशासनात् ।
उद्यम्यात्मानमुग्राय कर्मणे`सपदानुगः ॥ २५ ॥
तदनन्तर आचार्यकी आज्ञासे दुर्योधन अपने - आपको उग्र कर्म करनेके लिये तैयार करके अपने अनुचरोंके साथ शीघ्र वहाँसे चला गया ॥ २५ ॥
चक्ररक्षौ तु पाञ्चाल्यौ युधामन्यूत्तमौजसौ ।
बाह्येन सेनामभ्येत्य जग्मतुः सव्यसाचिनम् ॥ २६ ॥
अर्जुनके चक्ररक्षक पांचालराजकुमार युधामन्यु और उत्तमौजा सेनाके बाहरी भागसे होकर सव्यसाची अर्जुनके समीप जाने लगे ॥ २६ ॥
यौ तु पूर्वं महाराज वारितौ कृतवर्मणा ।
प्रविष्टे त्वर्जुने राजंस्तव सैन्यं युयुत्सया ॥ २७ ॥
महाराज! जब अर्जुन युद्धकी इच्छासे आपकी सेनाके भीतर घुसे थे, उस समय ( ये दोनों भीमके साथ ही थे, किंतु) कृतवर्माने उन दोनोंको पहले रोक दिया था ॥ २७ ॥
पार्श्वे भित्त्वा चमूं वीरौ प्रविष्टौ तव वाहिनीम् ।
पार्श्वेन सैन्यमायान्तौ कुरुराजो ददर्श ह ॥ २८ ॥
अब वे दोनों वीर पार्श्वभागसे आपकी सेनाका भेदन करके उसके भीतर घुस गये ।
पार्श्वभागसे सेनाके भीतर आते हुए उन दोनों वीरोंको कुरुराज दुर्योधनने देखा ॥ २८ ॥
ताभ्यां दुर्योधनः सार्धमकरोत् संख्यमुत्तमम् ।
त्वरितस्त्वरमाणाभ्यां भ्रातृभ्यां भारतो बली ॥ २ ९ ॥
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तब उस बलवान् भरतवंशी वीर दुर्योधनने तुरंत आगे बढ़कर बड़ी उतावलीके साथ आते हुए उन दोनों भाइयोंके साथ भारी युद्ध छेड़ दिया ॥ २ ९ ॥
तावेनमभ्यद्रवतामुभावुद्यतकार्मुकौ ।
महारथसमाख्यातौ क्षत्रियप्रवरौ युधि ॥ ३० ॥
वे दोनों क्षत्रियशिरोमणि विख्यात महारथी वीर थे । उन दोनोंने युद्धस्थलमें धनुष उठाकर दुर्योधनपर धावा बोल दिया ॥ ३० ॥
तमविध्यद युधामन्युस्त्रिंशता कङ्कपत्रिभिः ।
विंशत्या सारथिं चास्य चतुर्भिश्चतुरो हयान् ॥ ३१ ॥
युधामन्युने कंकपत्रयुक्त तीस बाणोंद्वारा दुर्योधनको घायल कर दिया । फिर बीस बाणोंसे उसके सारथिको और चारसे चारों घोड़ोंको बींध डाला ॥ ३१ ॥
दुर्योधनो युधामन्योर्ध्वजमेकेषुणाच्छिनत् ।
एकेन कार्मुकं चास्य चकर्त तनयस्तव ॥ ३२ ॥
तब आपके पुत्र दुर्योधनने एक बाणसे युधामन्युकी ध्वजा काट डाली और एकसे उसके धनुषके दो टुकड़े कर दिये ॥ ३२ ॥
सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपाहरत् ।
ततोऽविध्यच्छरैस्तीक्ष्णैश्चतुर्भिश्चतुरो हयान् ॥ ३३ ॥
इतना ही नहीं, एक भल्ल मारकर उसने युधामन्युके सारथिको भी रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया । फिर चार तीखे बाणोंद्वारा उसके चारों घोड़ोंको भी घायल कर दिया ॥
युधामन्युश्च संक्रुद्धः शरांस्त्रिंशतमाहवे ।
व्यसृजत् तव पुत्रस्य त्वरमाणः स्तनान्तरे ॥ ३४ ॥
इससे युधामन्यु भी कुपित हो उठा । उसने युद्धस्थलमें बड़ी उतावलीके साथ आपके पुत्रकी छातीमें तीस बाण मारे ॥ ३४ ॥
तथोत्तमौजाः संक्रुद्धः शरैर्हेमविभूषितैः ।
अविध्यत् सारथिं चास्य प्राहिणोद् यमसादनम् ॥ ३५ ॥
इसी प्रकार उत्तमौजाने भी अत्यन्त कुपित हो अपने सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा उसके सारथिको गहरी चोट पहुँचायी और उसे यमलोक भेज दिया ॥ ३५ ॥
दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र पाञ्चाल्यस्योत्तमौजसः ।
जघान चतुरोऽस्याश्वानुभौ तौ पार्ष्णिसारथी ॥ ३६ ॥
राजेन्द्र! तब दुर्योधनने भी पांचालराज उत्तमौजाके चारों घोड़ों और दोनों पार्श्वरक्षकोंको सारथिसहित मार डाला ॥ ३६ ॥
उत्तमौजा हताश्वस्तु हतसूतश्च संयुगे ।
आरुरोह रथं भ्रातुर्युधामन्योरभित्वरन् ॥ ३७ ॥
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युद्धमें घोड़ों और सारथिके मारे जानेपर उत्तमौजा शीघ्रतापूर्वक अपने भाई युधामन्युके रथपर जा चढ़ा ॥
स रथं प्राप्य तं भ्रातुर्दुर्योधनहयान् शरैः ।
बहुभिस्ताडयामास ते हताः प्रापतन् भुवि ॥ ३८ ॥
भाईके रथपर बैठकर उत्तमौजाने अपने बहुसंख्यक बाणोंद्वारा दुर्योधनके घोड़ोंपर इतना प्रहार किया कि वे प्राणशून्य होकर धरतीपर गिर पड़े ॥ ३८ ॥
हयेषु पतितेष्वस्य चिच्छेद परमेषुणा ।
युधामन्युर्धनुः शीघ्रं शरावापं च संयुगे ॥ ३ ९ ॥
घोड़ोंके धराशायी हो जानेपर युधामन्युने उस युद्धस्थलमें उत्तम बाणका प्रहार करके दुर्योधनके धनुष और तरकसको भी शीघ्रतापूर्वक काट गिराया ॥ ३ ९ ॥
हताश्वसूतात् स रथादवतीर्य नराधिपः ।
गदामादाय ते पुत्रः पाञ्चाल्यावभ्यधावत ॥ ४० ॥
घोड़े और सारथिके मारे जानेपर आपका पुत्र राजा दुर्योधन रथसे उतर पड़ा और गदा हाथमें लेकर पांचाल देशके उन दोनों वीरोंकी ओर दौड़ा ॥ ४० ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य क्रुद्धं कुरुपतिं तदा ।
अवप्लुतौ रथोपस्थाद् युधामन्यूत्तमौजसौ ॥ ४१ ॥
उस समय क्रोधमें भरे हुए कुरुराज दुर्योधनको अपनी ओर आते देख दोनों भाई युधामन्यु और उत्तमौजा रथके पिछले भागसे नीचे कूद गये ॥ ४१ ॥
ततः स हेमचित्रं तं गदया स्यन्दनं गदी ।
संक्रुद्धः पोथयामास साश्वसूतध्वजं नृप ॥ ४२ ॥
नरेश्वर! तदनन्तर अत्यन्त कुपित हुए गदाधारी दुर्योधनने घोड़े, सारथि और ध्वजसहित उस सुवर्णजटित सुन्दर रथको गदाके आघातसे चूर- चूर कर दिया ॥ ४२ ॥
भङ्क्त्वा रथं स पुत्रस्ते हताश्वो हतसारथिः ।
मद्रराजरथं तूर्णमारुरोह परंतपः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार उस रथको तोड़-फोड़कर घोड़ों और सारथिसे हीन हुआ शत्रुसंतापी दुर्योधन शीघ्र ही मद्रराज शल्यके रथपर जा चढ़ा ॥ ४३ ॥
पञ्चालानां ततो मुख्यौ राजपुत्रौ महारथौ ।
रथावन्यौ समारुह्य बीभत्सुमभिजग्मतुः ॥ ४४ ॥
तत्पश्चात् पांचाल- सेनाके वे दोनों प्रधान महारथी राजकुमार युधामन्यु और उत्तमौजा दूसरे दो रथोंपर आरूढ़ होकर अर्जुनके समीप चले गये ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि दुर्योधनयुद्धे त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३० ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें दुर्योधनका युद्धविषयक एक सौतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३० ॥
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एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः भीमसेनके द्वारा कर्णकी पराजय संजय उवाच
वर्तमाने महाराज संग्रामे लोमहर्षणे ।
व्याकुलेषु च सर्वेषु पीड्यमानेषु सर्वशः ॥ १ ॥
राधेयो भीममानर्च्छद् युद्धाय भरतर्षभ ।
यथा नागो वने नागं मत्तो मत्तमभिद्रवन् ॥ २ ॥
संजय कहते हैं- भरतश्रेष्ठ महाराज! इस प्रकार रोमांचकारी संग्राम छिड़ जानेपर जब सारी सेनाएँ सब ओरसे पीड़ित और व्याकुल हो गयीं तब राधानन्दन कर्ण युद्धके लिये पुनः भीमसेनके सामने आया । ठीक उसी तरह, जैसे वनमें एक मतवाला हाथी दूसरे मदोन्मत्त हाथीपर आक्रमण करता है ॥ १-२ ॥ धृतराष्ट्रउवाच
यौ तौ कर्णश्च भीमश्च सम्प्रयुद्धौ महाबलौ ।
अर्जुनस्य रथोपान्ते कीदृशः सोऽभवद् रणः ॥ ३ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा – संजय! महाबली कर्ण और भीमसेनने अर्जुनके रथके निकट जाकर जो बड़े वेगसे युद्ध किया, उनका वह संग्राम कैसा हुआ? ॥ ३ ॥
पूर्वं हि निर्जितः कर्णो भीमसेनेन संयुगे ।
कथं भूयः स राधेयो भीममागान्महारथः ॥ ४ ॥
भीमसेनने युद्धमें जब राधानन्दन महारथी कर्णको पहले ही जीत लिया था, तब वह पुनः उनका सामना करनेके लिये कैसे आया? ॥ ४ ॥
भीमो वा सूततनयं प्रत्युद्यातः कथं रणे ।
महारथं समाख्यातं पृथिव्यां प्रवरं रथम् ॥ ५ ॥
अथवा भीमसेन भूमण्डलके श्रेष्ठ एवं विख्यात महारथी सूतपुत्र कर्णसे समरांगणमें युद्ध करनेके लिये कैसे आगे बढ़े? ॥ ५ ॥
भीष्मद्रोणावतिक्रम्य धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
नान्यतो भयमादत्त विना कर्णान्महारथात् ॥ ६ ॥
भीष्म और द्रोणसे पार पाकर धर्मराज युधिष्ठिरको अब महारथी कर्णके सिवा दूसरे किसीसे भय नहीं रह गया है ॥ ६ ॥
भयाद् यस्य महाबाहोर्न शेते बहुलाः समाः । चिन्तयन् नित्यशो वीर्यं राधेयस्य महात्मनः ।
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तं कथं सूतपुत्रं तु भीमोऽयोधयताहवे ॥ ७ ॥
पहले जिस महाबाहु महामना राधानन्दन कर्णके बल पराक्रमका नित्य चिन्तन करते हुए राजा युधिष्ठिर भयके मारे बहुत वर्षोंतक नींद नहीं लेते थे, उसी सूतपुत्र कर्णके साथ भीमसेनने समरभूमिमें किस तरह युद्ध किया? ॥ ७ ॥
ब्रह्मण्यं वीर्यसम्पन्नं समरेष्वनिवर्तिनम् ।
कथं कर्णं युधां श्रेष्ठं योधयामास पाण्डवः ॥ ८ ॥
जो ब्राह्मणभक्त, पराक्रमसम्पन्न और समरभूमिमें कभी पीछे न हटनेवाला है, योद्धाओंमें श्रेष्ठ उस कर्णके साथ भीमसेनने किस प्रकार युद्ध किया? ॥ ८ ॥
यौ तौ समीयतुर्वीरौ वैकर्तनवृकोदरौ ।
कथं तावत्र युध्येतां महाबलपराक्रमौ ॥ ९ ॥
जो वीर पहले आपसमें भिड़ चुके थे, वे ही महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न कर्ण और भीमसेन यहाँ पुन: कैसे युद्धमें प्रवृत्त हुए? ॥ ९ ॥
भ्रातृत्वं दर्शितं पूर्वं घृणी चापि स सूतजः ।
कथं भीमेन युयुधे कुन्त्या वाक्यमनुस्मरन् ॥ १० ॥
पहले तो सूतपुत्र कर्णने अर्जुनके सिवा अन्य पाण्डवोंके प्रति बन्धुत्व दिखाया था और वह दयालु भी है ही, तथापि कुन्तीके वचनोंको बारंबार स्मरण करते हुए भी उसने भीमसेनके साथ कैसे युद्ध किया? ॥ १० ॥
भीमो वा सूतपुत्रेण स्मरन् वैरं पुरा कृतम् ।
अयुध्यत कथं शूरः कर्णेन सह संयुगे ॥ ११ ॥
अथवा शूरवीर भीमसेनने पहलेके किये हुए वैरका स्मरण करके सूतपुत्र कर्णके साथ उस रणक्षेत्रमें किस प्रकार युद्ध किया? ॥ ११ ॥
आशास्ते च सदा सूत पुत्रो दुर्योधनो मम ।
कर्णो जेष्यति संग्रामे समस्तान् पाण्डवानिति ॥ १२ ॥
संजय! मेरा बेटा दुर्योधन सदा यही आशा करता है कि कर्ण संग्राममें समस्त पाण्डवोंको जीत लेगा ॥ १२ ॥
जयाशा यत्र पुत्रस्य मम मन्दस्य संयुगे ।
स कथं भीमकर्माणं भीमसेनमयोधयत् ॥ १३ ॥
युद्धस्थलमें जिसके ऊपर मेरे मूर्ख पुत्रकी विजयकी आशा लगी हुई है, उस कर्णने भयंकर कर्म करनेवाले भीमसेनके साथ किस प्रकार युद्ध किया? ॥ १३ ॥
यं समासाद्य पुत्रैर्मे कृतं वैरं महारथैः ।
तं सूततनयं तात कथं भीमो ह्ययोधयत् ॥ १४ ॥
तात! जिसका आश्रय लेकर मेरे पुत्रोंने महारथी पाण्डवोंके साथ वैर ठाना है, उस सूतपुत्र कर्णके साथ भीमसेनने किस प्रकार युद्ध किया? ॥ १४ ॥