श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 881–890

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 881–890

पृष्ठ 881

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आहत्य दुन्दुभिं भीमः शङ्ख प्रध्माप्य चासकृत् ।

विनद्य सिंहनादेन ज्यां विकर्षन् पुनः पुनः ॥ २८ ॥

भीमसेनने बारंबार डंका पीटा और अनेक बार शंख बजाकर बारंबार धनुषकी प्रत्यंचा खींचते हुए सिंहके दहाड़नेके समान भयंकर गर्जना की ॥ २८ ॥

तेन शब्देन वीराणां पातयित्वा मनांस्युत ।

दर्शयन् घोरमात्मानममित्रान् सहसाभ्ययात् ॥ २ ९ ॥

उस तुमुल शब्दके द्वारा बड़े - बड़े वीरोंके दिल दहलाकर अपना भयंकर रूप दिखाते हुए उन्होंने सहसा शत्रुओंपर धावा बोल दिया ॥ २ ९ ॥

तमूहुर्जवना दान्ता विरुवन्तो हयोत्तमाः ।

विशोकेनाभिसम्पन्ना मनोमारुतरंहसः ॥ ३० ॥

उस समय विशोक नामक सारथिके द्वारा संचालित होनेवाले, मन और वायुके समान वेगशाली तीव्रगामी और सुशिक्षित सुन्दर घोड़े हर्षसूचक शब्द करते हुए उनका भार वहन करते थे ॥ ३० ॥

आरुजन् विरुजन् पार्थो ज्यां विकर्षंश्च पाणिना ।

सम्प्रकर्षन विमर्षश्च सेनाग्रं समलोडयत् ॥ ३१ ॥

कुन्तीकुमार भीम अपने हाथसे धनुषकी डोरी खींचकर चढ़ाते, उसे भलीभाँति कानतक खींचते, बाणोंकी वर्षा करते तथा शत्रुओंको घायल करके उनके अंग - भंग करते हुए सेनाके अग्रभागको मथे डालते थे ॥ ३१ ॥

तं प्रयान्तं महाबाहुं पञ्चालाः सहसोमकाः ।

पृष्ठतोऽनुययुः शूरा मघवन्तमिवामराः ॥ ३२ ॥

इस प्रकार यात्रा करते हुए महाबाहु भीमसेनके पीछे पांचाल और सोमक वीर भी चले, मानो देवगण देवराज इन्द्रका अनुसरण कर रहे हों ॥ ३२ ॥

तं समेत्य महाराज तावकाः पर्यवारयन् ।

दुःशलश्चित्रसेनश्च कुण्डभेदी विविंशतिः ॥ ३३ ॥

दुर्मुखो दुःसहश्चैव विकर्णश्च शलस्तथा ।

विन्दानुविन्दौ सुमुखो दीर्घबाहुः सुदर्शनः ॥ ३४ ॥

वृन्दारकः सुहस्तश्च सुषेणो दीर्घलोचनः ।

अभयो रौद्रकर्मा च सुवर्मा दुर्विमोचनः ॥ ३५ ॥

शोभन्तो रथिनां श्रेष्ठाः सहसैन्यपदानुगाः ।

संयत्ताः समरे वीरा भीमसेनमुपाद्रवन् ॥ ३६ ॥

महाराज! उस समय आपके पुत्रोंने भीमसेनका सामना करके उन्हें रोका । दुःशल, चित्रसेन, कुण्डभेदी, विविंशति, दुर्मुख, दुःसह, विवर्ण, शल, विन्द,

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अनुविन्द, सुमुख, दीर्घबाहु, सुदर्शन, वृन्दारक, सुहस्त सुषेण, दीर्घलोचन, अभय, रौद्रकर्मा, सुवर्मा और दुर्विमोचन – इन शोभाशाली रथिश्रेष्ठ वीरोंने अपने सैनिकों और सेवकोंके साथ सावधान एवं प्रयत्नशील होकर समरांगणमें भीमसेनपर धावा किया ॥ ३३-३६ ॥ तैः समन्ताद् वृतः शूरैः समरेषु महारथः ।

तान् समीक्ष्य तु कौन्तेयो भीमसेनः पराक्रमी ।

अभ्यवर्तत वेगेन सिंहः क्षुद्रमृगानिव ॥ ३७ ॥

उन शूरवीरोंके द्वारा समरभूमिमें महारथी भीम सब ओरसे घिर गये थे । उन सबको सामने देखकर पराक्रमशाली कुन्तीकुमार भीमसेन उसी प्रकार वेगसे आगे बढ़े, जैसे सिंह क्षुद्र मृगोंकी ओर बढ़ता है ॥ ३७ ॥

ते महास्त्राणि दिव्यानि तत्र वीरा अदर्शयन् ।

छादयन्तः शरैर्भीमं मेघाः सूर्यमिवोदितम् ॥ ३८ ॥

परंतु जैसे बादल उगे हुए सूर्यको ढक लेता है, उसी प्रकार वे वीरगण अपने बाणोंद्वारा भीमसेनको आच्छादित करते हुए वहाँ बड़े -बड़े दिव्यास्त्रोंका प्रदर्शन करने लगे ॥ ३८ ॥

स तानतीत्य वेगेन द्रोणानीकमुपाद्रवत् ।

अग्रतश्च गजानीकं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ३ ९ ॥

किंतु भीमसेन अपने वेगसे उन सबको लाँघकर द्रोणाचार्यकी सेनापर टूट पड़े और सामने खड़ी हुई गजसेनाको अपने बाणोंकी वर्षासे आच्छादित करने लगे ॥ ३ ९ ॥

सोऽचिरेणैव कालेन तद् गजानीकमाशुगैः ।

दिशः सर्वाः समभ्यस्य व्यधमत् पवनात्मजः ॥ ४० ॥

पवनपुत्र भीमने सम्पूर्ण दिशाओंमें बारंबार बाणोंकी वर्षा करके उनके द्वारा थोड़े ही समयमें उस गजसेनाको मार भगाया ॥ ४० ॥

त्रासिताः शरभस्येव गर्जितेन वने मृगाः ।

प्राद्रवन् द्विरदाः सर्वे नदन्तो भैरवान् रवान् ॥ ४१ ॥

जैसे शरभकी गर्जनासे भयभीत हो वनके सारे मृग भाग जाते हैं, उसी प्रकार भीमसेनसे डरे हुए समस्त गजराज भैरव स्वरसे आर्तनाद करते हुए भाग निकले ॥

पुनश्चातीव वेगेन द्रोणानीकमुपाद्रवत् ।

तमवारयदाचार्यो वेलोद्वृत्तमिवार्णवम् ॥ ४२ ॥

फिर उन्होंने बड़े वेगसे द्रोणाचार्यकी सेनापर चढ़ाई की । उस समय उत्ताल तरंगोंके साथ उठे हुए महासागरको जैसे तटकी भूमि रोक देती है, उसी प्रकार

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द्रोणाचार्यने भीमसेनको रोका ॥ ४२ ॥

ललाटेऽताडयच्चैनं नाराचेन स्मयन्निव ।

ऊर्ध्वरश्मिरिवादित्यो विबभौ तेन पाण्डवः ॥ ४३ ॥

द्रोणने मुसकराते हुए - से नाराच चलाकर भीमसेनके ललाटमें चोट पहुँचायी । उस नाराचसे पाण्डुपुत्र भीमसेन ऊपर उठी किरणोंवाले सूर्यके समान सुशोभित होने लगे ॥ ४३ ॥

स मन्यमानस्त्वाचार्यो ममायं फाल्गुनो यथा ।

भीमः करिष्यते पूजामित्युवाच वृकोदरम् ॥ ४४ ॥

द्रोणाचार्य यह समझकर कि यह भीम भी अर्जुनके समान मेरी पूजा करेगा, उनसे इस प्रकार बोले—– ॥ ४४ ॥

भीमसेन न ते शक्या प्रवेष्टुमरिवाहिनी ।

मामनिर्जित्य समरे शत्रुमद्य महाबल ॥ ४५ ॥

‘ महाबली भीमसेन! तुम समरभूमिमें आज मुझ शत्रुको पराजित किये बिना इस शत्रुसेनामें प्रवेश नहीं कर सकोगे ॥ ४५ ॥

यदि ते सोऽनुजः कृष्णः प्रविष्टोऽनुमते मम ।

अनीकं न तु शक्यं मे प्रवेष्टुमिह वै त्वया ॥ ४६ ॥

‘ तुम्हारे छोटे भाई अर्जुन मेरी अनुमतिसे इस सेनाके भीतर घुस गये हैं । यदि इच्छा हो तो उसी तरह तुम भी जा सकते हो; अन्यथा मेरे इस सैन्यव्यूहमें प्रवेश नहीं करने पाओगे ' ॥ ४६ ॥

अथ भीमस्तु तच्छ्रुत्वा गुरोर्वाक्यमपेतभीः ।

क्रुद्धः प्रोवाच वै द्रोणं रक्तताम्रेक्षणस्त्वरन् ॥ ४७ ॥

गुरुका यह वचन सुनकर भीमसेनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये, वे बड़ी उतावलीके साथ द्रोणाचार्यसे निर्भय होकर बोले ॥ ४७ ॥

तवार्जुनो नानुमते ब्रह्मबन्धो रणाजिरम् ।

प्रविष्टः स हि दुर्धर्षः शक्रस्यापि विशेद् बलम् ॥ ४८ ॥

‘ ब्रह्मबन्धो! अर्जुन तुम्हारी अनुमति से इस समरांगणमें नहीं प्रविष्ट हुए हैं । वे तो दुर्जय हैं । देवराज इन्द्रकी सेनामें भी घुस सकते हैं ॥ ४८ ॥

तेन वै परमां पूजां कुर्वता मानितो ह्यसि ।

नार्जुनोऽहं घृणी द्रोण भीमसेनोऽस्मि ते रिपुः ॥ ४ ९ ॥

' उन्होंने तुम्हारी बड़ी पूजा करके निश्चय ही तुम्हें सम्मान दिया है, परंतु

द्रोण! मैं दयालु अर्जुन नहीं हूँ । मैं तो तुम्हारा शत्रु भीमसेन हूँ ॥ ४ ९ ॥

पिता नस्त्वं गुरुर्बन्धुस्तथा पुत्रास्तु ते वयम् ।

इति मन्यामहे सर्वे भवन्तं प्रणताः स्थिताः ॥ ५० ॥

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' तुम हमारे पिता, गुरु और बन्धु हो और हम तुम्हारे पुत्रके तुल्य हैं । हम सब लोग यही मानते हैं और सदा तुम्हारे सामने प्रणतभावसे खड़े होते हैं ॥ ५० ॥

अद्य तद्विपरीतं ते वदतोऽस्मासु दृश्यते ।

यदि त्वं शत्रुमात्मानं मन्यसे तत्तथास्त्विह ॥ ५१ ॥

एष ते सदृशं शत्रोः कर्म भीमः करोम्यहम् । ‘ परंतु आज तुम्हारे मुँहसे जो बात निकल रही है, उससे हमलोगोंपर तुम्हारा विपरीत भाव लक्षित होता है । यदि तुम अपने- आपको शत्रु मानते हो तो ऐसा ही सही । यह मैं भीमसेन तुम्हारे शत्रुके अनुरूप कर्म कर रहा हूँ' ॥ ५१३ ॥

अथोद्भ्राम्य गदां भीमः कालदण्डमिवान्तकः ॥ ५२ ॥

द्रोणाय व्यसृजद् राजन् स रथादवपुप्लुवे । राजन्! ऐसा कहकर भीमसेनने गदा उठा ली, मानो यमराजने कालदण्ड हाथमें ले लिया हो । उन्होंने उस गदाको घुमाकर द्रोणाचार्यपर दे मारा, किंतु द्रोणाचार्य शीघ्र ही रथसे कूद पड़े ॥ ५२३ ॥

साश्वसूतध्वजं यानं द्रोणस्यापोथयत् तदा ॥ ५३ ॥

प्रामृद्नाच्च बहून् योधान् वायुर्वृक्षानिवौजसा । जैसे हवा अपने वेगसे वृक्षोंको उखाड़ फेंकती है, उसी प्रकार उस गदाने उस समय घोड़े, सारथि और ध्वजसहित द्रोणाचार्यके रथको चूर- चूर कर दिया और बहुत - से योद्धाओंको भी धूलमें मिला दिया ॥ ५३३ ॥

तं पुनः परिवव्रुस्ते तव पुत्रा रथोत्तमम् ॥ ५४ ॥

अन्यं तु रथमास्थाय द्रोणः प्रहरतां वरः ।

व्यूहद्वारं समासाद्य युद्धाय समुपस्थितः ॥ ५५ ॥

उस समय उस श्रेष्ठ महारथी वीरको आपके पुत्रोंने पुनः आकर चारों ओरसे घेर लिया । योद्धाओंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य दूसरे रथपर बैठकर व्यूहके द्वारपर आ पहुँचे और युद्धके लिये उद्यत हो गये ॥ ५४-५५ ॥

ततः क्रुद्धो महाराज भीमसेनः पराक्रमी ।

अग्रतः स्यन्दनानीकं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ५६ ॥

महाराज! तब क्रोधमें भरे हुए पराक्रमी भीमसेनने सामने खड़ी हुई रथसेनापर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥

ते वध्यमानाः समरे तव पुत्रा महारथाः ।

भीमं भीमबला युद्धे योधयन्ति जयैषिणः ॥ ५७ ॥

युद्धस्थलमें भयंकर बलशाली विजयाभिलाषी आपके महारथी पुत्र बाणोंकी मार खाकर भी समरांगणमें भीमसेनके साथ युद्ध करते रहे ॥ ५७ ॥

ततो दुःशासनः क्रुद्धो रथशक्तिं समाक्षिपत् ।

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सर्वपारसवीं तीक्ष्णां जिघांसुः पाण्डुनन्दनम् ॥ ५८ ॥

उस समय कुपित हुए दुःशासनने पाण्डुनन्दन भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे उनके ऊपर एक तीखी रथशक्ति चलायी, जो सम्पूर्णतः लोहेकी बनी हुई थी ॥ ५८ ॥

आपतन्तीं महाशक्तिं तव पुत्रप्रणोदिताम् ।

द्विधा चिच्छेद तां भीमस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ५ ९ ॥

आपके पुत्रकी चलायी हुई उस महाशक्तिको अपने ऊपर आती देख

भीमसेनने उसके दो टुकड़े कर दिये । वह एक अद्भुत - सी बात हुई ॥ ५ ९ ॥

अथान्यैर्विशिखैस्तीक्ष्णैः संक्रुद्धः कुण्डभेदिनम् ।

सुषेणं दीर्घनेत्रं च त्रिभिस्त्रीनवधीद् बली ॥ ६० ॥

फिर अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए बलवान् भीमने दूसरे तीन तीखे बाणोंद्वारा कुण्डभेदी, सुषेण तथा दीर्घलोचन ( दीर्घरोमा) –इन तीनोंको मार डाला ( जो आपके पुत्र थे ) ॥ ६० ॥

ततो वृन्दारकं वीरं कुरूणां कीर्तिवर्धनम् ।

पुत्राणां तव वीराणां युध्यतामवधीत् पुनः ॥ ६१ ॥

तत्पश्चात् आपके ( अन्य) वीर पुत्रोंके युद्ध करते रहनेपर भी उन्होंने पुनः कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले वीर वृन्दारकका वध कर दिया ॥ ६१ ॥

अभयं रौद्रकर्माणं दुर्विमोचनमेव च ।

त्रिभिस्त्रीनवधीद् भीमः पुनरेव सुतांस्तव ॥ ६२ ॥

इसके बाद भीमने पुनः तीन बाण मारकर अभय, रौद्रकर्मा तथा दुर्विमोचन ( दुर्विरोचन) – आपके इन तीन पुत्रोंको भी मार गिराया ॥ ६२ ॥

वध्यमाना महाराज पुत्रास्तव बलीयसा ।

भीमं प्रहरतां श्रेष्ठं समन्तात् पर्यवारयन् ॥ ६३ ॥

महाराज! अत्यन्त बलवान् भीमसेनके बाणोंसे घायल होते हुए आपके पुत्रोंने योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीमसेनको फिर चारों ओरसे घेर लिया ॥ ६३ ॥

ते शरैर्भीमकर्माणं ववर्षुः पाण्डवं युधि ।

मेघा इवातपापाये धाराभिर्धरणीधरम् ॥ ६४ ॥

जैसे वर्षा -ऋतुमें मेघ पर्वतपर जलधाराओंकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार वे आपके पुत्र युद्धस्थलमें भयंकर कर्म करनेवाले पाण्डुपुत्र भीमसेनपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥

स तद् बाणमयं वर्षमश्मवर्षमिवाचलः ।

प्रतीच्छन् पाण्डुदायादो न प्राव्यथत शत्रुहा ॥ ६५ ॥

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जैसे पत्थरोंकी वर्षा ग्रहण करते हुए पर्वतको कोई पीड़ा नहीं होती, उसी प्रकार शत्रुसूदन पाण्डुपुत्र भीमसेन उस बाण- वर्षाको सहन करते हुए भी व्यथित नहीं हुए ॥

विन्दानुविन्दौ सहितौ सुवर्माणं च ते सुतम् ।

प्रहसन्नेव कौन्तेयः शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥ ६६ ॥

कुन्तीनन्दन भीमने हँसते हुए ही अपने बाणोंद्वारा एक साथ आये हुए दोनों भाई विन्द और अनुविन्दको तथा आपके पुत्र सुवर्माको भी यमलोक पहुँचा दिया ॥

ततः सुदर्शनं वीरं पुत्रं ते भरतर्षभ ।

विव्याध समरे तूर्णं स पपात ममार च ॥ ६७ ॥

भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर उन्होंने समरभूमिमें आपके वीर पुत्र सुदर्शन ( उर्णनाभ ) को घायल कर दिया । इससे वह तुरंत ही गिरा और मर गया ॥ ६७ ॥

सोऽचिरेणैव कालेन तद्रथानीकमाशुगैः ।

दिशः सर्वाः समालोक्य व्यधमत् पाण्डुनन्दनः ॥ ६८ ॥

इस प्रकार पाण्डुनन्दन भीमसेनने सम्पूर्ण दिशाओंमें दृष्टिपात करके अपने बाणोंद्वारा थोड़े ही समयमें उस रथसेनाको नष्ट कर दिया ॥ ६८ ॥

ततो वै रथघोषेण गर्जितेन मृगा इव ।

भज्यमानाश्च समरे तव पुत्रा विशाम्पते ॥ ६ ९ ॥

प्रजानाथ! तदनन्तर भीमसेनके रथकी घरघराहट और गर्जनासे समरांगणमें मृगोंके समान भयभीत हुए आपके पुत्रोंका उत्साह भंग हो गया ॥ ६ ९ ॥

प्राद्रवन् सहसा सर्वे भीमसेनभयार्दिताः ।

अनुयायाच्च कौन्तेयः पुत्राणां ते महद् बलम् ॥ ७० ॥

वे सब - के - सब भीमसेनके भयसे पीड़ित हो सहसा भाग खड़े हुए । कुन्तीकुमार भीमसेनने आपके पुत्रोंकी विशाल सेनाका दूरतक पीछा किया ॥ ७० ॥

विव्याध समरे राजन् कौरवेयान् समन्ततः ।

वध्यमाना महाराज भीमसेनेन तावकाः ॥ ७१ ॥

त्यक्त्वा भीमं रणाज्जग्मुश्चोदयन्तो हयोत्तमान् । राजन्! उन्होंने रणक्षेत्रमें सब ओर कौरवोंको घायल किया । महाराज! भीमसेनके द्वारा मारे जाते हुए आपके सभी पुत्र उन्हें छोड़कर अपने उत्तम घोड़ोंको हाँकते हुए रणभूमिसे दूर चले गये ॥ ७१३ ॥

तांस्तु निर्जित्य समरे भीमसेनो महाबलः ॥ ७२ ॥

सिंहनादरवं चक्रे बाहुशब्दं च पाण्डवः ।

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उन सबको संग्राममें पराजित करके महाबली पाण्डुपुत्र भीमसेनने अपनी भुजाओंपर ताल ठोकी और सिंहके समान गर्जना की ॥ ७२१३३ ॥

तलशब्दं च सुमहत् कृत्वा भीमो महाबलः ॥ ७३ ॥

भीषयित्वा रथानीकं हत्वा योधान् वरान् वरान् ।

व्यतीत्य रथिनश्चापि द्रोणानीकमुपाद्रवत् ॥ ७४ ॥

बड़े जोरसे ताली बजाकर महाबली भीमने रथसेनाको डरा दिया और श्रेष्ठ-श्रेष्ठ योद्धाओंको चुन-चुनकर मारा । फिर समस्त रथियोंको लाँघकर द्रोणाचार्यकी सेनापर धावा बोल दिया ॥ ७३-७४ ॥ इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि भीमसेनप्रवेशे भीमपराक्रमे सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें भीमसेनका प्रवेश और भयंकर पराक्रमविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥

* अनलो गौर्हिरण्यं च दूर्वागोरोचनामृतम् । अक्षतं दधि चेत्यष्टौ मङ्गलानि प्रचक्षते ॥ - अग्नि, गौ, सुवर्ण, दूर्वा, गोरोचन, अमृत ( घी ), अक्षत और दही – इन आठ वस्तुओंको मांगलिक कहते हैं ।

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अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः भीमसेनका द्रोणाचार्य और अन्य कौरव योद्धाओंको पराजित करते हुए द्रोणाचार्यके रथको आठ बार फेंक देना तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनके समीप पहुँचकर गर्जना करना तथा युधिष्ठिरका प्रसन्न होकर अनेक प्रकारकी बातें सोचना संजय उवाच

समुत्तीर्णं रथानीकं पाण्डवं विहसन् रणे ।

विवारयिषुराचार्यः शरवर्षैरवाकिरत् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं - महाराज! रथसेनाको पार करके आये हुए पाण्डुनन्दन भीमसेनको युद्धमें रोकनेकी इच्छासे आचार्य द्रोणने हँसते-हँसते उनपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १ ॥

पिबन्निव शरौघांस्तान् द्रोणचापपरिच्युतान् ।

सोऽभ्यद्रवत सोदर्यान् मोहयन् बलमायया ॥ २ ॥

द्रोणाचार्यके धनुषसे छूटे हुए उन बाणोंको पीते हुए- से भीमसेन अपने बलकी मायासे समस्त कौरव बन्धुओंको मोहित करते हुए उनपर टूट पड़े ॥ २ ॥

तं मृधे वेगमास्थाय नृपाः परमधन्विनः ।

चोदितास्तव पुत्रैश्च सर्वतः पर्यवारयन् ॥ ३ ॥

उस समय आपके पुत्रोंद्वारा प्रेरित हुए बहुत- से महाधनुर्धर नरेशोंने महान् वेगका आश्रय ले युद्धस्थलमें भीमसेनको सब ओरसे घेर लिया ॥ ३ ॥

स तैस्तु संवृतो भीमः प्रहसन्निव भारत ।

उद्यच्छन् स गदां तेभ्यः सुघोरां सिंहवन्नदन् ।

अवासृजच्च वेगेन शत्रुपक्षविनाशिनीम् ॥ ४ ॥

भरतनन्दन! उनसे घिरे हुए भीमने हँसते हुए- से अपनी अत्यन्त भयंकर गदा ऊपर उठायी और सिंहनाद करते हुए उन्होंने शत्रुपक्षका विनाश करनेवाली उस गदाको बड़े वेगसे उन राजाओंपर दे मारा ॥ ४ ॥

इन्द्राशनिरिवेन्द्रेण प्रविद्धा संहतात्मना ।

प्रामथ्नात् सा महाराज सैनिकांस्तव संयुगे ॥ ५ ॥

महाराज! सुस्थिरचित्तवाले इन्द्र जिस प्रकार अपने वज्रका प्रयोग करते हैं, उसी तरह भीमसेनद्वारा चलायी हुई उस गदाने युद्धस्थलमें आपके सैनिकोंका कचूमर निकाल

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दिया ॥ ५ ॥

घोषेण महता राजन् पूरयन्तीव मेदिनीम् ।

ज्वलन्ती तेजसा भीमा त्रासयामास ते सुतान् ॥ ६ ॥

राजन्! तेजसे प्रज्वलित होनेवाली उस भयंकर गदाने अपने महान् घोषसे इस पृथ्वीको परिपूर्ण करके आपके पुत्रोंको भयभीत कर दिया ॥ ६ ॥

तां पतन्तीं महावेगां दृष्ट्वा तेजोऽभिसंवृताम् ।

प्राद्रवंस्तावकाः सर्वे नदन्तो भैरवान् रवान् ॥ ७ ॥

उस महावेगशालिनी तेजस्विनी गदाको गिरती देख आपके समस्त सैनिक घोर स्वरमें आर्तनाद करते हुए वहाँसे भाग गये ॥ ७ ॥

तं च शब्दमसह्यं वै तस्याः संलक्ष्य मारिष ।

प्रापतन्मनुजास्तत्र रथेभ्यो रथिनस्तदा ॥ ८ ।

माननीय नरेश! उस गदाके असह्य शब्दको सुनकर उस समय कितने ही रथी मानव अपने रथोंसे नीचे गिर पड़े ॥ ८ ॥

हन्यमाना भीमेन गदाहस्तेन तावकाः ।

प्राद्रवन्त रणे भीता व्याघ्रघ्राता मृगा इव ॥ ९ ॥

रणभूमिमें गदाधारी भीमके द्वारा मारे जानेवाले आपके सैनिक व्याघ्रोंके सूँघे हुए मृगोंके समान भयभीत होकर भाग निकले ॥ ९ ॥

स तान् विद्राव्य कौन्तेयः संख्येऽमित्रान् दुरासदान् ।

सुपर्ण इव वेगेन पक्षिराडत्यगाच्चमूम् ॥ १० ॥

कुन्तीकुमार भीमसेन युद्धस्थलमें उन दुर्जय शत्रुओंको भगाकर पक्षिराज गरुडके समान वेगसे उस सेनाको लाँघ गये ॥ १० ॥

तथा तु विप्रकुर्वाणं रथयूथपयूथपम् ।

भारद्वाजो महाराज भीमसेनं समभ्ययात् ॥ ११ ॥

महाराज! रथयूथपतियोंके भी यूथपति भीमसेनको इस प्रकार सेनाका संहार करते देख द्रोणाचार्य उनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ ११ ॥

भीमं तु समरे द्रोणो वारयित्वा शरोर्मिभिः ।

अकरोत् सहसा नादं पाण्डूनां भयमादधत् ॥ १२ ॥

उस समरांगणमें अपने बाणरूपी तरंगोंसे भीमसेनको रोककर आचार्य द्रोणने पाण्डवोंके मनमें भय उत्पन्न करते हुए सहसा सिंहनाद किया ॥ १२ ॥

तद् युद्धमासीत् सुमहद् घोरं देवासुरोपमम् ।

द्रोणस्य च महाराज भीमस्य च महात्मनः ॥ १३ ॥

महाराज! द्रोणाचार्य तथा महामनस्वी भीमसेनका वह महान् युद्ध देवासुर- संग्रामके समान भयंकर था ॥ १३ ॥

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यदा तु विशिखैस्तीक्ष्णैर्द्रोणचापविनिःसृतैः ।

वध्यन्ते समरे वीराः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १४ ॥

ततो रथादवप्लुत्य वेगमास्थाय पाण्डवः ।

निमील्य नयने राजन् पदातिर्द्रोणमभ्ययात् ॥ १५ ॥

अंसे शिरो भीमसेनः करौ कृत्वोरसि स्थिरौ ।

वेगमास्थाय बलवान् मनोऽनिलगरुत्मताम् ॥ १६ ॥

राजन्! जब इस प्रकार द्रोणाचार्यके धनुषसे छूटे हुए पैने बाणोंद्वारा समरांगणमें सैकड़ों और हजारों वीर मारे जाने लगे, तब बलवान् पाण्डुनन्दन भीम वेगपूर्वक रथसे कूद पड़े तथा दोनों नेत्र मूँदकर सिरको कंधेपर सिकोड़कर दोनों हाथोंको छातीपर सुस्थिर करके मन, वायु तथा गरुडके समान वेगका आश्रय ले पैदल ही द्रोणाचार्यकी ओर दौड़े ॥

यथा हि गोवृषो वर्षं प्रतिगृह्णाति लीलया ।

तथा भीमो नरव्याघ्रः शरवर्षं समग्रहीत् ॥ १७ ॥

जैसे साँड़ लीलापूर्वक वर्षाका वेग अपने शरीरपर ग्रहण करता है, उसी प्रकार पुरुषसिंह भीमसेनने आचार्यकी उस बाण- वर्षाको अपने शरीरपर ग्रहण किया ॥ १७ ॥

स वध्यमानः समरे रथं द्रोणस्य मारिष ।

ईषायां पाणिना गृह्य प्रचिक्षेप महाबलः ॥ १८ ॥

आर्य! समरांगणमें बाणोंसे आहत होते हुए महाबली भीमने द्रोणाचार्यके रथके ईषादण्डको हाथसे पकड़कर समूचे रथको दूर फेंक दिया ॥ १८ ॥

द्रोणस्तु सत्वरो राजन् क्षिप्तो भीमेन संयुगे ।

रथमन्यं समारुह्य व्यूहद्वारं ययौ पुनः ॥ १ ९ ॥

राजन्! उस युद्धस्थलमें भीमसेनद्वारा फेंके गये आचार्य द्रोण तुरंत ही दूसरे रथपर आरूढ़ हो पुनः व्यूहके द्वारपर जा पहुँचे ॥ १ ९ ॥

तमायान्तं तथा दृष्ट्वा भग्नोत्साहं गुरुं तदा ।

गत्वा वेगात् पुनर्भीमो धुरं गुह्य रथस्य तु ॥ २० ॥

तमप्यतिरथं भीमश्चिक्षेप भृशरोषितः ।

एवमष्टौ रथाः क्षिप्ता भीमसेनेन लीलया ॥ २१ ॥

उस समय गुरु द्रोणका उत्साह भंग हो गया था । उन्हें उस अवस्थामें आते देख भीमने पुनः वेगपूर्वक आगे बढ़कर उनके रथकी धुरी पकड़ ली और अत्यन्त रोषमें भरकर उन अतिरथी वीर द्रोणको भी पुनः रथके साथ ही फेंक दिया । इस प्रकार भीमसेनने खेल- सा करते हुए आठ रथ फेंके ॥ २०-२१ ॥

व्यदृश्यत निमेषेण पुनः स्वरथमास्थितः ।

दृश्यते तावकैर्योधैर्विस्मयोत्फुल्ललोचनैः ॥ २२ ॥