05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1011–1020
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1011–1020
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गृध्रवाक्यात् कथं पुत्रं त्यजध्वं पितृपिण्डदम् ॥ ६५ ॥
सियार बोला — बन्धुओ! देखो तो सही, इस बालकका रंग कैसा सोनेके समान चमक रहा है । आभूषणोंसे भूषित होकर यह कैसी शोभा पाता है । पितरोंको पिण्ड प्रदान करनेवाले अपने इस पुत्रको तुम गीधकी बातोंमें आकर कैसे छोड़ रहे हो? ॥ ६५ ॥
न स्नेहस्य च विच्छेदो विलापरुदितस्य च ।
मृतस्यास्य परित्यागात् तापो वै भविता ध्रुवम् ॥ ६६ ॥
इस मृत बालकको छोड़कर जानेसे न तो तुम्हारे स्नेहमें कमी आयेगी और न तुम्हारा रोना - धोना एवं विलाप ही बंद होगा । उलटे तुम्हारा संताप और बढ़ जायगा, यह निश्चित है ॥ ६६ ॥
श्रूयते शम्बुके शूद्रे हते ब्राह्मणदारकः ।
जीवितो धर्ममासाद्य रामात् सत्यपराक्रमात् ॥ ६७ ॥
सुना जाता है कि सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीसे शम्बूक नामक शूद्रके मारे जानेपर उस धर्मके प्रभावसे एक मरा हुआ ब्राह्मण बालक जीवित हो उठा था ॥
तथा श्वेतस्य राजर्षेर्बालो दृष्टान्तमागतः ।
श्वेतेन धर्मनिष्ठेन मृतः संजीवितः पुनः ॥ ६८ ॥
इसीप्रकार राजर्षि श्वेतका भी बालक मर गया था, परंतु धर्मनिष्ठ श्वेतने उसे पुनः जीवित कर दिया था ॥
तथा कश्चिल्लभेत् सिद्धो मुनिर्वा देवतापि वा ।
कृपणानामनुक्रोशं कुर्याद् वो रुदतामिह ॥ ६ ९ ॥
इसी प्रकार सम्भव है कोई सिद्ध मुनि या देवता मिल जायँ और यहाँ रोते हुए तुम दीन-दुखियोंपर दया कर दें ॥ ६ ९ ॥ इत्युक्तास्ते न्यवर्तन्त शोकार्ताः पुत्रवत्सलाः ।
अङ्के शिरः समाधाय रुरुदुर्बहुविस्तरम् ।
तेषां रुदितशब्देन गृध्रोऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत् ॥ ७० ॥
सियारके ऐसा कहनेपर वे पुत्रवत्सल बान्धव शोकसे पीड़ित हो लौट पड़े और बालकका मस्तक अपनी गोदमें रखकर जोर-जोरसे रोने लगे । उनके रोनेकी आवाज सुनकर गीध पास आ गया और इस प्रकार बोला ॥ ७० ॥
गृध्रउवाच
अश्रुपातपरिक्लिन्नः पाणिस्पर्शप्रपीडितः ।
धर्मराजप्रयोगाच्च दीर्घनिद्रां प्रवेशितः ॥ ७१ ॥
गीधने कहा — तुमलोगोंके आँसू बहानेसे जिसका शरीर गीला हो गया है और जो तुम्हारे हाथोंसे बार - बार दबाया गया है, ऐसा यह बालक धर्मराजकी आज्ञासे चिरनिद्रामें
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प्रविष्ट हो गया है ॥ ७१ ॥
तपसापि हि संयुक्ता धनवन्तो महाधियः ।
सर्वे मृत्युवशं यान्ति तदिदं प्रेतपत्तनम् ॥ ७२ ॥
बड़े - बड़े तपस्वी, धनवान् और महा बुद्धिमान् सभी यहाँ मृत्युके अधीन हो जाते हैं । यह प्रेतोंका नगर है ॥
बालवृद्धसहस्राणि सदा संत्यज्य बान्धवाः ।
दिनानि चैव रात्रीश्च दुःखं तिष्ठन्ति भूतले ॥ ७३ ॥
यहाँ लोगोंके भाई बन्धु सदा सहस्रों बालकों और वृद्धोंको त्यागकर दिन - रात दुखी रहते हैं ॥ ७३ ॥
अलं निर्बन्धमागत्य शोकस्य परिधारणे ।
अप्रत्ययं कुतो ह्यस्य पुनरद्येह जीवितम् ॥ ७४ ॥
दुराग्रहवश बारंबार लौटकर शोकका बोझ धारण करनेसे कोई लाभ नहीं है । अब इसके जीनेका कोई भरोसा नहीं है। भला, आज यहाँ इसका पुनर्जीवन कैसे हो सकता है? ॥ ७४ ॥
मृतस्योत्सृष्टदेहस्य पुनर्देहो न विद्यते ।
नैव मूर्तिप्रदानेन जम्बुकस्य शतैरपि ॥ ७५ ॥
शक्यं जीवयितुं ह्येष बालो वर्षशतैरपि । जो व्यक्ति एक बार इस देहसे नाता तोड़कर मर जाता है, उसके लिये फिर इस शरीरमें लौटना सम्भव नहीं है सैकड़ों सियार अपना शरीर बलिदान कर दें तो भी सैकड़ों वर्षोंमें इस बालकको जिलाया नहीं जा सकता ॥ ७५३ ॥
अथ रुद्रः कुमारो वा ब्रह्मा वा विष्णुरेव च ॥ ७६ ॥
वरमस्मै प्रयच्छेयुस्ततो जीवेदयं शिशुः । यदि भगवान् शिव, कुमार कार्तिकेय, ब्रह्माजी और भगवान् विष्णु इसे वर दें तो यह बालक जी सकता है ॥ ७६३ ॥
नैव बाष्पविमोक्षेण न वा श्वासकृते न च ॥ ७७ ॥
न दीर्घरुदितेनायं पुनर्जीवं गमिष्यति । न तो आँसू बहानेसे, न लंबी- लंबी सांस खींचनेसे और न दीर्घकालतक रोनेसे ही यह फिर जी सकेगा ॥ ७७ ॥
अहं च क्रोष्टुकश्चैव यूयं ये चास्य बान्धवाः ॥ ७८ ॥
धर्माधर्मौ गृहीत्वेह सर्वे वर्तामहेऽध्वनि । मैं, यह सियार और तुम सब लोग जो इसके भाई बन्धु हो — ये सभी धर्म और अधर्मको लेकर यहाँ अपनी - अपनी राहपर चल रहे हैं ॥ ७८३ ॥
अप्रियं परुषं चापि परद्रोहं परस्त्रियम् ॥ ७९ ॥
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अधर्ममनृतं चैव दूरात् प्राज्ञो विवर्जयेत् । बुद्धिमान् पुरुषको अप्रिय आचरण, कठोर वचन दूसरोंके साथ द्रोह, परायी स्त्री, अधर्म और असत्य - भाषणका दूरसे ही परित्याग कर देना चाहिये ॥ ७ ९ ३ ॥ धर्मं सत्यं श्रुतं न्याय्यं महतीं प्राणिनां दयाम् ॥ ८० ॥
अजिह्मत्वमशाठ्यं च यत्नतः परिमार्गत । तुम सब लोग धर्म, सत्य, शास्त्रज्ञान, न्यायपूर्ण बर्ताव समस्त प्राणियोंपर बड़ी भारी दया, कुटिलताका अभाव तथा शठताका त्याग— इन्हीं सद्गुणोंका यत्नपूर्वक अनुसरण करे ॥ ८० ॥
मातरं पितरं वापि बान्धवान् सुहृदस्तथा ॥ ८१ ॥
जीवतो ये न पश्यन्ति तेषां धर्मविपर्ययः । जो लोग जीवित माता-पिता, सुहृदों और भाई-बन्धुओंकी देखभाल नहीं करते हैं, उनके धर्मकी हानि होती है ॥ ८१३ ॥
यो न पश्यति चक्षुर्भ्यां नेङ्गते च कथञ्चन ॥ ८२ ॥
तस्य निष्ठावसानान्ते रुदन्तः किं करिष्यथ । जो न आँखोंसे देखता है, न शरीरसे कोई चेष्टा ही करता है, उसके जीवनका अन्त हो जानेपर अब तुमलोग रोकर क्या करोगे ॥ ८२ ॥
इत्युक्तास्ते सुतं त्यक्त्वा भूमौ शोकपरिप्लुताः ।
दह्यमानाः सुतस्नेहात् प्रययुर्बान्धवा गृहम् ॥ ८३ ॥
गीधके ऐसा कहनेपर वे शोकमें डूबे हुए भाई-बन्धु अपने उस पुत्रको धरतीपर सुलाकर उसके स्नेहसे दग्ध होते हुए अपने घरकी ओर लौटे ॥ ८३ ॥
जम्बुक उवाच
दारुणो मर्त्यलोकोऽयं सर्वप्राणिविनाशनः ।
इष्टबन्धुवियोगश्च तथेहाल्पं च जीवितम् ॥ ८४ ॥
तब सियारने कहा — यह मर्त्यलोक अत्यन्त दुःखद है । यहाँ समस्त प्राणियोंका नाश ही होता है । प्रिय बन्धुजनोंके वियोगका कष्ट भी प्राप्त होता रहता है । यहाँका जीवन बहुत थोड़ा है ॥ ८४ ॥
बह्वलीकमसत्यं चाप्यतिवादाप्रियंवदम् ।
इमं प्रेक्ष्य पुनर्भावं दुःखशोकविवर्धनम् ॥ ८५ ॥
न मे मानुषलोकोऽयं मुहूर्तमपि रोचते ।
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इस संसारमें सब कुछ असत्य एवं बहुत अरुचिकर है । यहाँ अनाप- शनाप बकनेवाले तो बहुत हैं, परंतु प्रिय वचन बोलनेवाले विरले ही हैं। यहाँ का भाव दुःख और शोककी वृद्धि करनेवाला है । इसे देखकर मुझे यह मनुष्यलोक दो घड़ी भी अच्छा नहीं लगता ॥ ८५ || अहो धिग् गृध्रवाक्येन यथैवाबुद्धयस्तथा ॥ ८६ ॥
कथं गच्छत निःस्नेहाः सुतस्नेहं विसृज्य च । अहो! धिक्कार है । तुमलोग गीधकी बातोंमें आकर मूर्खोके समान पुत्रस्नेहसे रहित हुए प्रेमशून्य होकर कैसे घरको लौटे जा रहे हो? ॥ ८६३ ॥
प्रदीप्ताः पुत्रशोकेन संनिवर्तत मानुषाः ॥ ८७ ॥
श्रुत्वा गृध्रस्य वचनं पापस्येहाकृतात्मनः । मनुष्यो! यह गीध तो बड़ा पापी और अपवित्र हृदयवाला है । इसकी बात सुनकर तुमलोग पुत्रशोकसे जलते हुए भी क्यों लौटे जा रहे हो? ॥ ८७ ॥
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ॥ ८८ ॥
सुखदुःखावृते लोके नेहास्त्येकमनन्तरम् । सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख आता है । सुख और दुःखसे घिरे हुए इस जगत्में निरन्तर ( सुख या दुःख ) अकेला नहीं बना रहता है ॥ ८८३ ॥
इमं क्षितितले त्यक्त्वा बालं रूपसमन्वितम् ॥ ८ ९ ॥
कुलशोभाकरं मूढाः पुत्रं त्यक्त्वा क्व यास्यथ ।
रूपयौवनसम्पन्नं द्योतमानमिव श्रिया ॥ ९ ० ॥
यह सुन्दर बालक तुम्हारे कुलकी शोभा बढ़ानेवाला है । यह रूप और यौवनसे सम्पन्न है तथा अपनी कान्तिसे प्रकाशित हो रहा है । मूर्खो! इस पुत्रको पृथ्वीपर डालकर तुम कहाँ जाओगे? ॥ ८ ९- ९ ० ॥
जीवन्तमेव पश्यामि मनसा नात्र संशयः ।
विनाशो नास्य न हि वै सुखं प्राप्स्यथ मानुषाः ॥ ९ १ ॥
मनुष्यो! मैं तो अपने मनसे इस बालकको जीवित ही देख रहा हूँ, इसमें संशय नहीं है ।
इसका नाश नहीं होगा, तुम्हें अवश्य ही सुख मिलेगा ॥ ९ १ ॥
पुत्रशोकाभितप्तानां मृतानामद्य वः क्षमम् ।
सुखसम्भावनं कृत्वा धारयित्वा सुखं स्वयम् ।
त्यक्त्वा गमिष्यथ क्वाद्य समुत्सृज्याल्पबुद्धिवत् ॥ ९ २ ॥
पुत्रशोकसे संतप्त होकर तुमलोग स्वयं ही मृतक- तुल्य हो रहे हो; अतः तुम्हारे लिये इस तरह लौट जाना उचित नहीं है । इस बालकसे सुखकी सम्भावना करके सुख पानेकी सुदृढ़ आशा धारण कर तुम सब लोग अल्पबुद्धि मनुष्यके समान स्वयं ही इसे त्यागकर अब कहाँ जाओगे? ॥ ९ २ ॥
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भीष्म उवाच
तथा धर्मविरोधेन प्रियमिथ्याभिधायिना ।
श्मशानवासिना नित्यं रात्रिं मृगयता नृप ॥ ९ ३ ॥
ततो मध्यस्थतां नीता वचनैरमृतोपमैः ।
जम्बुकेन स्वकार्यार्थं बान्धवास्तस्य धिष्ठिताः ॥ ९ ४ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! वह सियार सदा श्मशान भूमिमें ही निवास करता था और अपना काम बनानेके लिये रात्रिकालकी प्रतीक्षा कर रहा था; अतः उसने धर्मविरोधी, मिथ्या तथा अमृततुल्य वचन कहकर उस बालकके बन्धु - बान्धवोंको बीचमें ही अटका दिया । वे न जा पाते थे और न रह पाते थे, अन्तमें उन्हें ठहर जाना पड़ा ॥ ९ ३ - ९ ४ ॥ गृध्रउवाच
अयं प्रेतसमाकीर्णो यक्षराक्षससेवितः ।
दारुणः काननोद्देशः कौशिकैरभिनादितः ॥ ९ ५ ॥
तब गीधने कहा- मनुष्यो! यह वन्य प्रदेश प्रेतोंसे भरा हुआ है । इसमें बहुत - से यक्ष और राक्षस निवास करते हैं तथा कितने ही उल्लू हू- हू की आवाज कर रहे हैं; अतः यह स्थान बड़ा भयंकर है ॥ ९ ५ ॥
भीमः सुघोरश्च तथा नीलमेघसमप्रभः ।
अस्मिन् शवं परित्यज्य प्रेतकार्याण्युपासत ॥ ९ ६ ॥
यह अत्यन्त घोर, भयानक तथा नीलमेघके समान काला अन्धकारपूर्ण है । इस मुर्देको यहीं छोड़कर तुमलोग प्रेतकर्म करो ॥ ९ ६ ॥
भानुर्यावत् प्रयात्यस्तं यावच्च विमला दिशः ।
तावदेनं परित्यज्य प्रेतकार्याण्युपासत ॥ ९ ७ ॥
जबतक सूर्य डूब नहीं जाते हैं और जबतक दिशाएँ निर्मल हैं, तभीतक इसे यहाँ छोड़कर तुमलोग इसके प्रेतकार्यमें लग जाओ ॥ ९ ७ ॥
नदन्ति परुषं श्येनाः शिवाः क्रोशन्ति दारुणम् ।
मृगेन्द्राः प्रतिनन्दन्ति रविरस्तं च गच्छति ॥ ९ ८ ॥
इस वनमें बाज अपनी कठोर बोली बोलते हैं, सियार भयंकर आवाजमें हुआँ- हुआँ कर रहे हैं, सिंह दहाड़ रहे हैं और सूर्य अस्ताचलको जा रहे हैं ॥ ९ ८ ॥
चिताधूमेन नीलेन संरज्यन्ते च पादपाः ।
श्मशाने च निराहाराः प्रतिनर्दन्ति देहिनः ॥ ९९ ॥
चिताके काले धुएँसे यहाँके सारे वृक्ष उसी रंगमें रंग गये हैं । श्मशानभूमिमें यहाँके निराहार प्राणी ( प्रेत - पिशाच आदि) गरज रहे हैं ॥ ९९ ॥
सर्वे विकृतदेहाश्चाप्यस्मिन् देशे सुदारुणे ।
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युष्मान् प्रधर्षयिष्यन्ति विकृता मांसभोजिनः ॥ १०० ॥
इस भयंकर प्रदेशमें रहनेवाले सभी प्राणी विकराल शरीरके हैं । ये सबके सब मांस
खानेवाले और विकृत अंगवाले हैं । वे तुमलोगोंको धर दबायेंगे ॥ १०० ॥
क्रूरश्चायं वनोद्देशो भयमद्य भविष्यति ।
त्यज्यतां काष्ठभूतोऽयं मृष्यतां जाम्बुकं वचः ॥ १०१ ॥
जंगलका यह भाग क्रूर प्राणियोंसे भरा हुआ है । अब तुम्हें यहाँ बहुत बड़े भयका सामना करना पड़ेगा । यह बालक तो अब काठके समान निष्प्राण हो गया है । इसे छोड़ो और सियारकी बातोंके लोभमें न पड़ो ॥ १०१ ॥
यदि जम्बुकवाक्यानि निष्फलान्यनृतानि च ।
श्रोष्यथ भ्रष्टविज्ञानास्ततः सर्वे विनङ्क्ष्यथ ॥ १०२ ॥
यदि तुमलोग विवेकभ्रष्ट होकर सियारकी झूठी और निष्फल बातें सुनते रहोगे तो सबके सब नष्ट हो जाओगे ॥ १०२ ॥
जम्बुक उवाच
स्थीयतां नेह भेतव्यं यावत् तपति भास्करः ।
तावदस्मिन् सुते स्नेहादनिर्वेदेन वर्तत ॥ १०३ ॥
स्वैरं रुदन्तो विश्रब्धाश्चिरं स्नेहेन पश्यत । (दारुणेऽस्मिन् वनोद्देशे भयं वो न भविष्यति । अयं सौम्यो वनोद्देशः पितॄणां निधनाकरः ॥ ) स्थीयतां यावदादित्यः किं च क्रव्यादभाषितैः ॥ १०४ ॥
सियार बोला – ठहरो, ठहरो । जबतक यहाँ सूर्यका प्रकाश है, तबतक तुम्हें बिल्कुल नहीं डरना चाहिये । उस समयतक इस बालकपर स्नेह करके इसके प्रति ममतापूर्ण बर्ताव करो । निर्भय होकर दीर्घकालतक इसे स्नेहदृष्टिसे देखो और जी भरकर रो लो । यद्यपि यह वन्यप्रदेश भयंकर है तो भी यहाँ तुम्हें कोई भय नहीं होगा; क्योंकि यह भू- भाग पितरोंका निवास- स्थान होनेके कारण श्मशान होता हुआ भी सौम्य है । जबतक सूर्य दिखायी देते हैं, तबतक यहीं ठहरो । इस मांसभक्षी गीधके कहनेसे क्या होगा? ॥
यदि गृध्रस्य वाक्यानि तीव्राणि रभसानि च ।
गृह्णीत मोहितात्मानः सुतो वो न भविष्यति ॥ १०५ ॥
यदि तुम मोहितचित्त होकर इस गीधकी घोर एवं घबराहटमें डालनेवाली बातोंमें आ जाओगे तो इस बालकसे हाथ धो बैठोगे ॥ १०५ ॥
भीष्म उवाच
गृध्रोऽस्तमित्याह गतो गतो नेति च जम्बुकः ।
मृतस्य तं परिजनमूचतुस्तौ क्षुधान्वितौ ॥ १०६ ॥
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भीष्मजी कहते हैं - राजन्! वे गीध और गीदड़ दोनों ही भूखे थे और अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये मृतकके बन्धु- बान्धवोंसे बातें करते थे । गीध कहता था कि सूर्य अस्त हो गये और सियार कहता था नहीं ॥
स्वकार्यबद्धकक्षौ तौ राजन् गृध्रोऽथ जम्बुकः ।
क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ शास्त्रमालम्ब्य जल्पतः ॥ १०७ ॥
राजन्! गीध और गीदड़ अपना - अपना काम बनानेके लिये कमर कसे हुए थे । दोनोंको ही भूख और प्यास सता रही थी और दोनों ही शास्त्रका आधार लेकर बात करते थे ॥ १०७ ॥
तयोर्विज्ञानविदुषोर्द्वयोर्मृगपतत्रिणोः ।
वाक्यैरमृतकल्पैस्तैः प्रतिष्ठन्ति व्रजन्ति च ॥ १०८ ॥
उनमें से एक पशु था और दूसरा पक्षी । दोनों ही ज्ञानकी बातें जानते थे । उन दोनोंके अमृतरूपी वचनोंसे प्रभावित हो वे मृतकके सम्बन्धी कभी ठहर जाते और कभी आगे बढ़ते थे ॥ १०८ ॥
शोकदैन्यसमाविष्टा रुदन्तस्तस्थिरे तदा ।
स्वकार्यकुशलाभ्यां ते सम्भ्राम्यन्ते ह नैपुणात् ॥ १० ९ ॥
शोक और दीनतासे आविष्ट होकर वे उस समय रोते हुए वहाँ खड़े ही रह गये । अपना-अपना कार्य सिद्ध करनेमें कुशल गीध और गीदड़ने चालाकीसे उन्हें चक्करमें डाल रक्खा था ॥ १० ९ ॥
तथा तयोर्विवदतोर्विज्ञानविदुषोर्द्वयोः ।
बान्धवानां स्थितानां चाप्युपातिष्ठत शङ्करः ॥ ११० ॥
देव्या प्रणोदितो देवः कारुण्यार्द्रीकृतेक्षणः ।
ततस्तानाह मनुजान् वरदोऽस्मीति शङ्करः ॥ १११ ॥
ज्ञान - विज्ञानकी बातें जाननेवाले उन दोनों जन्तुओंमें इस प्रकार वाद - विवाद चल रहा था और मृतकके भाई- बन्धु वहीं खड़े थे । इतनेहीमें भगवती श्रीपार्वतीदेवीकी प्रेरणासे भगवान् शंकर उनके सामने प्रकट हो गये । उस समय उनके नेत्र करुणारससे आर्द्र हो रहे थे । वरदायक भगवान् शिवने उन मनुष्योंसे कहा- ' मैं तुम्हें वर दे रहा हूँ' ॥ ११०-१११ ॥
ते प्रत्यूचुरिदं वाक्यं दुःखिताः प्रणताः स्थिताः ।
एकपुत्रविहीनानां सर्वेषां जीवितार्थिनाम् ॥ ११२ ॥
पुत्रस्य नो जीवदानाज्जीवितं दातुमर्हसि । तब वे दुखी मनुष्य भगवान्को प्रणाम करके खड़े हो गये और इस प्रकार बोले —‘प्रभो! इस इकलौते पुत्रसे हीन होकर हम मृतकतुल्य हो रहे हैं । आप हमारे इस पुत्रको जीवित करके हम समस्त जीवनार्थियोंको जीवनदान देनेकी कृपा करें ' ॥ ११२ ॥
एवमुक्तः स भगवान् वारिपूर्णेन चक्षुषा ॥ ११३ ॥
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जीवितं स्म कुमाराय प्रादाद् वर्षशतानि वै । उन्होंने जब नेत्रोंमें आँसू भरकर भगवान् शंकरसे इस प्रकार प्रार्थना की, तब उन्होंने उस बालकको जीवित कर दिया और उसे सौ वर्षोंकी आयु प्रदान की ॥ ११३ ॥
तथा गोमायुगृध्राभ्यां प्राददत् क्षुद्विनाशनम् ॥ ११४ ॥
वरं पिनाकी भगवान् सर्वभूतहिते रतः । इतना ही नहीं, सर्वभूतहितकारी पिनाकपाणि भगवान् शिवने गीध और गीदड़को भी उनकी भूख मिट जानेका वरदान दे दिया ॥ ११४३ ॥
ततः प्रणम्य ते देवं प्रायो हर्षसमन्विताः ॥ ११५ ॥
कृतकृत्याः सुखं हृष्टाः प्रातिष्ठन्त तदा विभो । राजन्! तब वे सब लोग हर्षसे उल्लसित एवं कृतकार्य हो महादेवजीको प्रणाम करके सुख और प्रसन्नताके साथ वहाँसे चले गये ॥ ११५३ ॥
अनिर्वेदेन दीर्घेण निश्चयेन ध्रुवेण च ॥ ११६ ॥
देवदेवप्रसादाच्च क्षिप्रं फलमवाप्यते । यदि मनुष्य उकताहटमें न पड़कर दृढ़ एवं प्रबल निश्चयके साथ प्रयत्न करता रहे तो देवाधिदेव भगवान् शिवके प्रसादसे शीघ्र ही मनोवांछित फल पा लेता है ॥ ११६३ ॥
पश्य दैवस्य संयोगं बान्धवानां च निश्चयम् ॥ ११७ ॥
कृपणानां तु रुदतां कृतमश्रुप्रमार्जनम् ।
पश्य चाल्पेन कालेन निश्चयान्वेषणेन च ॥ ११८ ॥
देखो, दैवका संयोग और उन बन्धु बान्धवोंका दृढ़ निश्चय; जिससे दीनतापूर्वक रोते हुए उन मनुष्योंका आँसू थोड़े ही समयमें पोंछा गया । यह उनके निश्चयपूर्वक किये हुए अनुसंधान एवं प्रयत्नका फल है ॥ ११७-११८ ॥
प्रसादं शङ्करात् प्राप्य दुःखिताः सुखमाप्नुवन् ।
ते विस्मिताः प्रहृष्टाश्च पुत्रसंजीवनात् पुनः ॥ ११ ९ ॥
भगवान् शंकरकी कृपासे उन दुखी मनुष्योंने सुख प्राप्त कर लिया । पुत्रके पूनर्जीवनसे वे आश्चर्यचकित एवं प्रसन्न हो उठे ॥ ११ ९ ॥
बभूवुर्भरतश्रेष्ठ प्रसादाच्छङ्करस्य वै ।
ततस्ते त्वरिता राजंस्त्यक्त्वा शोकं शिशूद्भवम् ॥ १२० ॥
विविशुः पुत्रमादाय नगरं हृष्टमानसाः । राजन्! भरतश्रेष्ठ! भगवान् शंकरकी कृपासे वे सब लोग तुरंत ही पुत्रशोक त्यागकर प्रसन्नचित्त हो पुत्रको साथ ले अपने नगरको चले गये ॥ १२०३ ॥
एषा बुद्धिः समस्तानां चातुर्वर्ण्ये निदर्शिता ॥ १२१ ॥
धर्मार्थमोक्षसंयुक्तमितिहासमिमं शुभम् ।
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श्रुत्वा मनुष्यः सततमिहामुत्र च मोदते ॥ १२२ ॥
चारों वर्णोंमें उत्पन्न हुए सभी लोगोंके लिये यह बुद्धि प्रदर्शित की गयी है । धर्म, अर्थ और मोक्षसे युक्त इस शुभ इतिहासको सदा सुननेसे मनुष्य इहलोक और परलोकमें आनन्दका अनुभव करता है ॥ १२१-१२२ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि गृध्रगोमायुसंवादे कुमारसंजीवने त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें गीदड़-गोमायुका संवाद एवं मरे हुए बालकका पुनर्जीवनविषयक एक सौ तिरपनवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १५३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १२३ श्लोक हैं )
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चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः नारदजीका सेमल वृक्षसे प्रशंसापूर्वक प्रश्न युधिष्ठिर उवाच
बलिनः प्रत्यमित्रस्य नित्यमासन्नवर्तिनः ।
उपकारापकाराभ्यां समर्थस्योद्यतस्य च ॥ १ ॥
मोहाद् विकत्थनामात्रैरसारोऽल्पबलो लघुः ।
वाग्भिरप्रतिरूपाभिरभिद्रुह्य पितामह ॥ २ ॥
आत्मनो बलमास्थाय कथं वर्तेत मानवः ।
आगच्छतोऽतिक्रुद्धस्य तस्योद्धरणकाम्यया ॥ ३ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! जो बलवान्, नित्य निकटवर्ती, उपकार और अपकार करनेमें समर्थ तथा नित्य उद्योगशील है, ऐसे शत्रुके साथ यदि कोई अल्प बलवान्, असार एवं सभी बातोंमें छोटी हैसियत रखनेवाला मनुष्य मोहवश शेखी बघारते हुए अयोग्य बातें कहकर वैर बाँध ले और वह बलवान् शत्रु अत्यन्त कुपित हो उस दुर्बल मनुष्यको उखाड़ फेंकनेके लिये आक्रमण कर दे, तब वह आक्रान्त मनुष्य अपने ही बलका भरोसा करके उस आक्रमणकारीके साथ कैसा बर्ताव करे? ( जिससे उसकी रक्षा हो सके ) ॥ १–३ ॥ भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
संवादं भरतश्रेष्ठ शाल्मलेः पवनस्य च ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा- भरतश्रेष्ठ! इस विषयमें विज्ञ पुरुष वायु और सेमलवृक्षके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ४ ॥
हिमवन्तं समासाद्य महानासीद् वनस्पतिः ।
वर्षपूगाभिसंवृद्धः शाखी स्कन्धी पलाशवान् ॥ ५ ॥
हिमालय पर्वतपर एक बहुत बड़ा वनस्पति था, जो बहुत वर्षोंसे बढ़कर प्रबल हो गया था । वह स्कन्ध, शाखा और पत्तोंसे खूब हरा - भरा था ॥ ५ ॥
तत्र स्म मत्तमातङ्गा घर्मार्ताः श्रमकर्शिताः ।
विश्राम्यन्ति महाबाहो तथान्या मृगजातयः ॥ ६ ॥
महाबाहो! उसके नीचे बहुत- से मतवाले हाथी तथा दूसरे दूसरे पशु धूपसे पीड़ित और परिश्रमसे थकित होकर विश्राम करते थे ॥ ६ ॥
नल्वमात्रपरीणाहो घनच्छायो वनस्पतिः ।
सारिकाशुकसंजुष्टः पुष्पवान् फलवानपि ॥ ७ ॥