श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1001–1010
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1001–1010
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यथा दिवं पूर्णवपुर्निशाकरः ॥ ३ ९ ॥ इससे राजा जनमेजयका सारा पाप नष्ट हो गया और वे प्रज्वलित अग्निके समान देदीप्यमान होने लगे । उन्हें सब प्रकारके श्रेय प्राप्त हो गये । जैसे पूर्ण चन्द्रमा आकाशमण्डलमें प्रवेश करता है, उसी प्रकार शत्रुसूदन जनमेजयने पुनः अपने राज्यमें प्रवेश किया ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि इन्द्रोतपारिक्षितीये द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें इन्द्रोत और पारिक्षितका संवादविषयक एक सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५२ ॥
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त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः मृतककी पुनर्जीवन -प्राप्तिके विषयमें एक ब्राह्मण बालकके जीवित होनेकी कथा; उसमें गीध और सियारकी बुद्धिमत्ता युधिष्ठिरउवाच
कच्चित् पितामहेनासीच्छ्रुतं वा दृष्टमेव च ।
कच्चिन्मर्त्यो मृतो राजन् पुनरुज्जीवितोऽभवत् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — ‘ पितामह! क्या आपने कभी यह भी देखा या सुना है कि कोई मनुष्य मरकर फिर जी उठा हो! ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
शृणु पार्थ यथावृत्तमितिहासं पुरातनम् ।
गृध्रजम्बुकसंवादं यो वृत्तो नैमिषे पुरा ॥ २ ॥।
- भीष्मजीने कहा –कुन्तीनन्दन! प्राचीनकालमें नैमिषारण्यक्षेत्रमें गीध और गीदड़का जो संवाद हुआ था, उसे सुनो, वह पूर्वघटित यथार्थ इतिहास है ॥ २ ॥
कस्यचिद् ब्राह्मणस्यासीद् दुःखलब्धः सुतो मृतः ।
बाल एव विशालाक्षो बालग्रहनिपीडितः ॥ ३ ॥
किसी ब्राह्मणको बड़े कष्टसे एक पुत्र प्राप्त हुआ था । वह बड़े- बड़े नेत्रोंवाला सुन्दर बालक बाल- ग्रहसे पीड़ित हो बाल्यावस्थामें ही चल बसा ॥
दुःखिताः केचिदादाय बालमप्राप्तयौवनम् ।
कुलसर्वस्वभूतं · वै रुदन्तः शोकविह्वलाः ॥ ४ ॥
जिसने युवावस्थामें अभी प्रवेश ही नहीं किया था तथा जो अपने कुलका सर्वस्व था, उस मरे हुए बालकको लेकर उसके कुछ दुखी बान्धव शोकसे व्याकुल हो फूट- फूटकर रोने लगे ॥ ४ ॥
बालं मृतं गृहीत्वाथ श्मशानाभिमुखाः स्थिताः ।
अङ्केनैव च संक्रम्य रुरुदुर्भृशदुःखिताः ॥ ५ ॥
उस मृत बालकको गोदमें लेकर वे श्मशानकी ओर चले । वहाँ पहुँचकर खड़े हो गये और अत्यन्त दुखी होकर रोने लगे ॥ ५ ॥
शोचन्तस्तस्य पूर्वोक्तान् भाषितांश्चासकृत् पुनः ।
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तं बालं भूतले क्षिप्य प्रतिगन्तुं न शक्नुयुः ॥ ६ ॥
वे उसकी पहलेकी बातोंको बारंबार याद करके शोकमग्न हो जाते थे; इसलिये उसे श्मशानभूमिमें डालकर लौट जानेमें असमर्थ हो रहे थे ॥ ६ ॥
तेषां रुदितशब्देन गृध्रोऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत् ।
एकात्मजमिमं लोके त्यक्त्वा गच्छत मा चिरम् ॥ ७ ॥
इह पुंसां सहस्राणि स्त्रीसहस्राणि चैव ह ।
समानीतानि कालेन हित्वा वै यान्ति बान्धवाः ॥ ८ ॥
उनके रोनेके शब्दसे आकृष्ट होकर एक गीध वहाँ आया और इस प्रकार कहने लगा —' मनुष्यो! इस जगत्में अपने इस इकलौते पुत्रको यहाँ छोड़कर लौट जाओ, देर मत करो । यहाँ हजारों स्त्री - पुरुष कालके द्वारा लाये जा चुके हैं और उन सबको उनके भाई-बन्धु छोड़कर चले जाते हैं ॥ ७-८ ॥
सम्पश्यत जगत् सर्वं सुखदुःखैरधिष्ठितम् ।
संयोगो विप्रयोगश्च पर्यायेणोपलभ्यते ॥ ९ ॥
'देखो, यह सम्पूर्ण जगत् ही सुख और दुःखसे व्याप्त है, यहाँ सबको बारी - बारीसे संयोग और वियोग प्राप्त होते रहते हैं ॥ ९ ॥
गृहीत्वा ये च गच्छन्ति ये न यान्ति च तान् मृतान् ।
तेऽप्यायुषः प्रमाणेन स्वेन गच्छन्ति जन्तवः ॥ १० ॥
' जो लोग अपने मृतक सम्बन्धियोंको लेकर श्मशानमें जाते हैं, और जो नहीं जाते हैं, वे सभी जीव- जन्तु अपनी आयु पूरी होनेपर इस संसारसे चल बसते हैं ॥ १० ॥
अलं स्थित्वा श्मशानेऽस्मिन् गृध्रगोमायुसंकुले ।
कङ्कालबहुले रौद्रे सर्वप्राणिभयङ्करे ॥ ११ ॥
' गीधों और गीदड़ोंसे भरे हुए इस भयंकर श्मशानमें सब ओर असंख्य नरकंकाल पड़े हैं । यह स्थान सभी प्राणियोंके लिये भयदायक है । यहाँ तुम्हें नहीं ठहरना चाहिये; ठहरनेसे कोई लाभ भी नहीं है ॥ ११ ॥ '
न पुनर्जीवितः कश्चित् कालधर्ममुपागतः ।
प्रियो वा यदि वा द्वेष्यः प्राणिनां गतिरीदृशी ॥ १२ ॥
' अपना प्रिय हो या द्वेषपात्र । कोई भी कालधर्ममें ( मृत्यु ) को पाकर कभी पुनः जीवित नहीं हुआ है । समस्त प्राणियोंकी ऐसी ही गति है ॥ १२ ॥
सर्वेण खलु मर्तव्यं मर्त्यलोके प्रसूयता ।
कृतान्तविहिते मार्गे मृतं को जीवयिष्यति ॥ १३ ॥
‘जिसने इस मर्त्यलोकमें जन्म लिया है, उसे एक न एक दिन अवश्य मरना होगा ।
कालद्वारा निर्मित पथपर मरकर गये हुए प्राणीको कौन जीवित कर सकेगा ॥ १३ ॥
कर्मान्तविरते लोके अस्तं गच्छति भास्करे ।
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गम्यतां स्वमधिष्ठानं सुतस्नेहं विसृज्य वै ॥ १४ ॥
‘ सूर्य अस्ताचलको जा रहे हैं, जगत्के सब लोग दैनिक कार्य समाप्त करके अब उससे विरत हो रहे हैं । तुमलोग भी अब अपने पुत्रका स्नेह छोड़कर घर लौट जाओ ' ॥ १४ ॥
ततो गृध्रवचः श्रुत्वा प्राक्रोशन्तस्तदा नृप ।
बान्धवास्तेऽभ्यगच्छन्त पुत्रमुत्सृज्य भूतले ॥ १५ ॥
नरेश्वर! तब गीधकी बात सुनकर वे बन्धु बान्धव जोर- जोरसे रोते हुए अपने पुत्रको भूतलपर छोड़कर घरकी ओर लौटने लगे ॥ १५ ॥
विनिश्चित्याथ च तदा विक्रोशन्तस्ततस्ततः ।
मृतमित्येव गच्छन्तो निराशास्तस्य दर्शने ॥ १६ ॥
वे इधर- उधर रो - गाकर इसी निश्चयपर पहुँचे कि अब तो यह बालक मर ही गया; अतः उसके दर्शनसे निराश हो वहाँसे जानेके लिये तैयार हो गये ॥ १६ ॥
निश्चितार्थाश्च ते सर्वे संत्यजन्तः स्वमात्मजम् ।
निराशा जीविते तस्य मार्गमावृत्य धिष्ठिताः ॥ १७ ॥
जब उन्हें यह निश्चित हो गया कि अब यह नहीं जी सकेगा, तो उसके जीवनसे निराश हो वे सब लोग अपने बच्चेको छोड़कर जानेके लिये रास्तेपर आकर खड़े हुए ॥ १७ ॥
ध्वांक्षपक्षसवर्णस्तु बिलान्निःसृत्य जम्बुकः ।
गच्छमानान् स्म तानाह निर्घृणाः खलु मानुषाः ॥ १८ ॥
इतनेहीमें कौएकी पाँखके समान काले रंगका एक गीदड़ अपनी माँद ( घूरी ) से निकलकर उन लौटते हुए बान्धवोंसे कहा- ' मनुष्यो! तुम बड़े निर्दय हो! ॥ १८ ॥
आदित्योऽयं स्थितो मूढाः स्नेहं कुरुत मा भयम् ।
बहुरूपो मुहूर्तश्च जीवेदपि कदाचन ॥ १ ९ ॥
‘ अरे मूर्खो! अभी तो सूर्यास्त भी नहीं हुआ है; अतः डरो मत। बच्चेको लाड़ - प्यार कर लो । अनेक प्रकारका मुहूर्त आता रहता है। सम्भव है किसी शुभ घड़ीमें यह बालक जी उठे ॥ १ ९ ॥
यूयं भूमौ विनिक्षिप्य पुत्रस्नेहविनाकृताः ।
श्मशाने सुतमुत्सृज्य कस्माद् गच्छत निर्घृणाः ॥ २० ॥
' तुम लोग कैसे निर्दयी हो? पुत्रस्नेहका त्याग करके इस नन्हेसे बालकको श्मशान- भूमिमें लाकर डाल दिया। अरे! अपने बेटेको इस मरघटमें छोड़कर क्यों जा रहे हो? ॥ २० ॥
न वोऽस्त्यस्मिन् सुते स्नेहो बाले मधुरभाषिणि ।
यस्य भाषितमात्रेण प्रसादमधिगच्छत ॥ २१ ॥
‘जान पड़ता है ' इस मधुर भाषी छोटे - से बालकपर तुम्हारा तनिक भी स्नेह नहीं है । यह वही बालक है, जिसकी मीठी - मीठी बातें सुनते ही तुम्हारा हृदय हर्षसे खिल उठता
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था ॥ २१ ॥
ते पश्यत सुतस्नेहो यादृशः पशुपक्षिणाम् ।
न तेषां धारयित्वा तान् कश्चिदस्ति फलागमः ॥ २२ ॥
चतुष्पात्पक्षिकीटानां प्राणिनां स्नेहसङ्गिनाम् ।
परलोकगतिस्थानां मुनियज्ञक्रिया इव ॥ २३ ॥
'पशु और पक्षियोंका भी अपने बच्चेपर जैसा स्नेह होता है, उसे तुम देखो । यद्यपि स्नेहमें आसक्त उन पशु - पक्षी- कीट आदि प्राणियोंको अपने बच्चोंके पालन - पोषण करनेपर भी परलोकमें उनसे उस प्रकार कोई फल नहीं मिलता जैसे कि परलोककी गतिमें स्थित हुए मुनियोंको यज्ञादि क्रियासे मिलता है ॥ २२-२३ ॥
तेषां पुत्राभिरामाणामिहलोके परत्र च ।
गुणो दृश्यते कश्चित् प्रजाः संधारयन्ति च ॥ २४ ॥
' क्योंकि उनके पुत्रोंमें स्नेह रखनेवाले पशु आदि के लिये इहलोक और परलोकमें संतानोंके लालन - पालनसे कोई लाभ नहीं दिखायी देता तो भी वे अपने - अपने बच्चोंकी रक्षा करते रहते हैं ॥ २४ ॥
अपश्यतां प्रियान् पुत्रांस्तेषां शोको न तिष्ठति । न च पुष्णन्ति संवृद्धास्ते मातापितरौ क्वचित् ॥ २५ ॥ ' - यद्यपि उनके बच्चे बड़े हो जानेपर अपने माँ- बापका पालन-पोषणप नहीं करते हैं तो
भी अपने प्यारे बच्चोंको न देखनेपर उनका शोक काबूमें नहीं रहता ॥
मानुषाणां कुतः स्नेहो येषां शोको भविष्यति ।
इमं कुलकरं पुत्रं त्यक्त्वा क्व नु गमिष्यथ ॥ २६ ॥
' परंतु मनुष्योंमें इतना स्नेह ही कहाँ है, जो उन्हें अपने बच्चोंके लिये शोक होगा । अरे!
यह तुम्हारा वंशधर बालक है । इसे छोड़कर तुम कहाँ जाओगे ॥ २६ ॥
चिरं मुञ्चत बाष्पं च चिरं स्नेहेन पश्यत ।
एवंविधानि हीष्टानि दुस्त्यजानि विशेषतः ॥ २७ ॥
‘ इस अपने लाड़लेके लिये देरतक आँसू बहाओ और दीर्घ कालतक स्नेहभरी दृष्टिसे इसकी ओर देखो, क्योंकि ऐसी प्यारी-प्यारी संतानोंको छोड़कर जाना अत्यन्त कठिन है ॥ २७ ॥
क्षीणस्यार्थाभियुक्तस्य श्मशानाभिमुखस्य च ।
बान्धवा यत्र तिष्ठन्ति तत्रान्यो नाधितिष्ठति ॥ २८ ॥
' जो शरीरसे क्षीण हुआ हो, जिसपर कोई आर्थिक अभियोग लगाया गया हो तथा जो
श्मशानकी ओर जा रहा हो, ऐसे अवसरोंपर उसके भाई- बन्धु ही उसके साथ खड़े होते हैं ।
दूसरा कोई वहाँ साथ नहीं देता ॥ २८ ॥
सर्वस्य दयिताः प्राणाः सर्वः स्नेहं च विन्दति ।
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तिर्यग्योनिष्वपि सतां स्नेहं पश्यत यादृशम् ॥ २ ९ ॥ ‘ सबको अपने - अपने प्राण प्यारे होते हैं और सभी दूसरोंसे स्नेह पाते हैं । पशु- पक्षीकी योनिमें भी जो प्राणी रहते हैं, उनका अपनी संतानोंपर कैसा प्रेम है, इसे देखो ॥ २ ९ ॥
त्यक्त्वा कथं गच्छथेमं पद्मलोलायताक्षिकम् ।
यथा नवोद्वाहकृतं स्नानमाल्यविभूषितम् ॥ ३० ॥
इस बालककी कमल - जैसी चंचल एवं विशाल आँखे कितनी सुन्दर हैं । इसका शरीर स्नान एवं पुष्पमाला आदिसे विभूषित नया- नया विवाह करके आये दुल्हे जैसा है । ऐसे मनोहर बालकको छोड़कर जानेके लिये तुम्हारे पैर कैसे उठ रहे हैं? ' ॥ ३० ॥
जम्बुकस्य वचः श्रुत्वा कृपणं परिदेवतः ।
न्यवर्तन्त तदा सर्वे शवार्थं ते स्म मानुषाः ॥ ३१ ॥
करुणाजनक विलाप करते हुए उस सियारकी यह बात सुनकर वे सभी मनुष्य उस मृत बालकके शरीरकी देख -रेखके लिये पुनः लौट आये ॥ ३१ ॥
गृध्रउवाच
अहो बत नृशंसेन जम्बुकेनाल्पमेधसा ।
क्षुद्रेणोक्ता हीनसत्त्वा मानुषाः किं निवर्तथ ॥ ३२ ॥
तब गीधने कहा — अहो! उस मन्दबुद्धि एवं क्रूर स्व भाववाले क्षुद्र गीदड़की बातोंमें आकर तुम लौटे कैसे आते हो? मनुष्यो! तुम बड़े धैर्यहीन हो ॥ ३२ ॥
पञ्चेन्द्रियपरित्यक्तं शुष्कं काष्ठत्वमागतम् ।
कस्माच्छोचथ तिष्ठन्तमात्मानं किं न शोचथ ॥ ३३ ॥
इस बच्चेका शरीर पाँचों इन्द्रियोंसे परित्यक्त होकर सूखे काठके समान तुम्हारे सामने पड़ा है । तुम इसके लिये क्यों शोक करते हो? एक दिन तुम्हारी भी यही दशा होगी, फिर अपने लिये क्यों नहीं शोक करते? ॥ ३३ ॥
तपः कुरुत वै तीव्रं मुच्यध्वं येन किल्बिषात् ।
तपसा लभ्यते सर्वं विलापः किं करिष्यति ॥ ३४ ॥
अब तुमलोग तीव्र तपस्या करो, जिससे समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाओगे । तपस्यासे
सब कुछ मिल सकता है । तुम्हारा यह विलाप क्या करेगा? ॥ ३४ ॥
अनिष्टानि च भाग्यानि जातानि सह मूर्तिना ।
येन गच्छति बालोऽयं दत्त्वा शोकमनन्तकम् ॥ ३५ ॥
भाग्य शरीरके साथ ही प्रकट होता है और उसका अनिष्ट फल भी सामने आता ही है, जिससे यह बालक तुम्हें अनन्त शोक देकर जा रहा है ॥ ३५ ॥
धनं गावः सुवर्णं च मणिरत्नमथापि च ।
अपत्यं च तपोमूलं तपोयोगाच्च लभ्यते ॥ ३६ ॥
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धन, गाय, सोना, मणि, रत्न, और पुत्र- इन सबका मूल कारण तप ही है । तपस्याके योगसे ही इनकी उपलब्धि होती है ॥ ३६ ॥
यथाकृता च भूतेषु प्राप्यते सुखदुःदुःखिता ।
गृहीत्वा जायते जन्तुर्दुःखानि च सुखानि च ॥ ३७ ॥
जीव अपने पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार दुःख- सुखको लेकर ही जन्म ग्रहण करता है ।
सभी प्राणियोंमें सुख और दुःखका भोग कर्मानुसार ही प्राप्त होता है ॥
न कर्मणा पितुः पुत्रः पिता वा पुत्रकर्मणा ।
मार्गेणान्येन गच्छन्ति बद्धाः सुकृतदुष्कृतैः ॥ ३८ ॥
पिताके कर्मसे पुत्रका और पुत्रके कर्मसे पिताका कोई सम्बन्ध नहीं है । अपने - अपने पाप- पुण्यके बन्धनमें बँधे हुए जीव कर्मानुसार विभिन्न मार्गसे जाते हैं ॥ ३८ ॥
धर्मं चरत यत्नेन न चाधर्मे मनः कृथाः ।
वर्तध्वं च यथाकालं दैवतेषु द्विजेषु च ॥ ३ ९ ॥
तुमलोग यत्नपूर्वक धर्मका आचरण करो और अधर्ममें कभी मन न लगाओ । देवताओं तथा ब्राह्मणोंकी सेवामें यथासमय तत्पर रहो ॥ ३ ९ ॥
शोकं त्यजत दैन्यं च सुतस्नेहान्निवर्तत ।
त्यज्यतामयमाकाशे ततः शीघ्रं निवर्तत ॥ ४० ॥
शोक और दीनताको छोड़ो तथा पुत्रस्नेहसे मनको हटा लो । इस बालकको इसी सूने स्थानमें छोड़ दो और शीघ्र लौट जाओ ॥ ४० ॥
यत् करोति शुभं कर्म तथा कर्म सुदारुणम् ।
तत् कर्तेव समश्नाति बान्धवानां किमत्र ह ॥ ४१ ॥
प्राणी जो शुभ या अशुभ कर्म करता है, उसका फल भी करनेवाला ही भोगता है ।
इसमें भाई- बन्धुओंका क्या है? ॥ ४१ ॥
इह त्यक्त्वा न तिष्ठन्ति बान्धवा बान्धवं प्रियम् ।
स्नेहमुत्सृज्य गच्छन्ति बाष्पपूर्णाविलेक्षणाः ॥ ४२ ॥
बन्धु - बान्धव लोग यहाँ अपने प्रिय बन्धुओंका परित्याग करके ठहरते नहीं हैं । सारा स्नेह छोड़कर आँखोंमें आँसू भरे यहाँसे चल देते हैं ॥ ४२ ॥
प्राज्ञो वा यदि वा मूर्खः सधनो निर्धनोऽपि वा ।
सर्वः कालवशं याति शुभाशुभसमन्वितः ॥ ४३ ॥
विद्वान् हो या मूर्ख, धनवान् हो या निर्धन, सभी अपने शुभ या अशुभ कर्मोंके साथ कालके अधीन हो जाते हैं ॥ ४३ ॥
किं करिष्यथ शोचित्वा मृतं किमनुशोचथ ।
सर्वस्य हि प्रभुः कालो धर्मतः समदर्शनः ॥ ४४ ॥
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अच्छा, यह तो बताओ, तुम शोक करके क्या कर लोगे? क्या इसे जिला दोगे? फिर इस मृतकके लिये क्यों शोक करते हो? काल ही सबका शासक और स्वामी है, जो धर्मतः सबके ऊपर समान दृष्टि रखता है ॥ ४४ ॥
यौवनस्थांश्च बालांश्च वृद्धान् गर्भगतानपि ।
सर्वानाविशते मृत्युरेवंभूतमिदं जगत् ॥ ४५ ॥
यह कराल काल युवा, बालक, वृद्ध और गर्भस्थ शिशु- सबमें प्रवेश करता है । इस संसारकी ऐसी ही दशा है ॥ ४५ ॥
जम्बुक उवाच
अहो मन्दीकृतः स्नेहो गृध्रेणेहाल्पबुद्धिना ।
पुत्रस्नेहाभिभूतानां युष्माकं शोचतां भृशम् ॥ ४६ ॥
इसपर गीदड़ने कहा— अहो! क्या इस मन्दबुद्धि गीधने तुम्हारे स्नेहको शिथिल कर दिया? तुम तो पुत्रस्नेहसे अभिभूत होकर उसके लिये बड़ा शोक कर रहे थे ॥ ४६ ॥
समैः सम्यक्प्रयुक्तैश्च वचनैः प्रत्ययोत्तरैः ।
यद् गच्छति जनश्चायं स्नेहमुत्सृज्य दुस्त्यजम् ॥ ४७ ॥
गीधके अच्छी युक्तियोंसे मुक्त न्यायसंगत और विश्वासोत्पादक प्रतीत होनेवाले वचनोंसे प्रभावित हो ये सब लोग जो दुस्त्यज स्नेहका परित्याग करके चले जा रहे हैं, यह कितने आश्चर्यकी बात है! ॥ ४७ ॥
अहो पुत्रवियोगेन मृतशून्योपसेवनात् ।
क्रोशतां सुभृशं दुःखं विवत्सानां गवामिव ॥ ४८ ॥
अद्य शोकं विजानामि मानुषाणां महीतले ।
स्नेहं हि कारणं कृत्वा ममाप्यश्रूण्यथापतन् ॥ ४ ९ ॥
अहो! पुत्रके वियोगसे पीड़ित हो मृतकोंके इस शून्य स्थानमें आकर अत्यन्त दुःखसे रोने- बिलखनेवाले इन भूतलवासी मनुष्योंके हृदयमें बछड़ोंसे रहित हुई गायोंकी भाँति कितना शोक होता है? इसका अनुभव मुझे आज हुआ है; क्योंकि इनके स्नेहको निमित्त बनाकर मेरी आँखोंसे भी आँसू बहने लगे हैं ॥
यत्नो हि सततं कार्यस्ततो दैवेन सिद्ध्यति ।
दैवं पुरुषकारश्च कृतान्तेनोपपद्यते ॥ ५० ॥
अपने अभीष्टकी सिद्धिके लिये सदा प्रयत्न करते रहना चाहिये, तब दैवयोगसे उसकी सिद्धि होती है । दैव और पुरुषार्थ- दोनों कालसे ही सम्पन्न होते हैं ॥ ५० ॥
अनिर्वेदः सदा कार्यों निर्वेदाद्धि कुतः सुखम् ।
प्रयत्नात् प्राप्यते ह्यर्थः कस्माद् गच्छथ निर्दयम् ॥ ५१ ॥
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खेद और शिथिलताको कभी अपने मनमें स्थान नहीं देना चाहिये । खेद होनेपर कहाँसे सुख प्राप्त हो सकता है । प्रयत्नसे ही अभिलषित अर्थकी प्राप्ति होती है; अतः तुमलोग इस बालककी रक्षाका प्रयत्न छोड़कर निर्दयतापूर्वक कहाँ चले जा रहे हो? ॥ ५१ ॥
आत्ममांसोपवृत्तं च शरीरार्धमयीं तनुम् ।
पितॄणां वंशकर्तारं वने त्यक्त्वा क्व यास्यथ ॥ ५२ ॥
यह बालक तुम्हारे अपने ही रक्त- मांसका बना हुआ है, आधे शरीरके समान है और पितरोंके वंशकी वृद्धि करनेवाला है, इसे वनमें छोड़कर तुम कहाँ जाओगे? ॥ ५२ ॥
अथवास्तंगते सूर्ये संध्याकाल उपस्थिते ।
ततो नेष्यथ वा पुत्रमिहस्था वा भविष्यथ ॥ ५३ ॥
अच्छा, इतना ही करो कि जबतक सूर्य अस्त न हो और संध्याकाल उपस्थित न हो जाय, तबतक यहाँ रुके रहो; फिर अपने इस पुत्रको साथ ले जाना अथवा यहीं बैठे रहना ॥ ५३ ॥
गृध्रउवाच
अद्य वर्षसहस्रं मे साग्रं जातस्य मानुषाः ।
न च पश्यामि जीवन्तं मृतं स्त्रीपुंनपुंसकम् ॥ ५४ ॥
गीधने कहा- मनुष्यो! मुझे जन्म लिये आज एक हजार वर्षसे अधिक हो गये; परंतु मैंने कभी किसी स्त्री-पुरुष या नपुंसकको मरनेके बाद फिर जीवित होते नहीं देखा ॥ ५४ ॥
मृता गर्भेषु जायन्ते जातमात्रा म्रियन्ति च ।
चङ्क्रमन्तो म्रियन्ते च यौवनस्थास्तथा परे ॥ ५५ ॥
कुछ लोग गर्भोंमें ही मरकर जन्म लेते हैं, कुछ जन्म लेते ही मर जाते हैं, कुछ चलने-फिरने लायक होकर मरते हैं और कुछ लोग भरी जवानीमें ही चल बसते हैं ॥ ५५ ॥
अनित्यानीह भाग्यानि चतुष्पात्पक्षिणामपि ।
जङ्गमानां नगानां वाप्यायुरग्रेऽवतिष्ठते ॥ ५६ ॥
इस संसारमें पशुओं और पक्षियोंके भी भाग्यफल अनित्य हैं । स्थावरों और जंगमोंके जीवन में भी आयुकी ही प्रधानता है ॥ ५६ ॥
इष्टदारवियुक्ताश्च पुत्रशोकान्वितास्तथा ।
दह्यमानाः स्म शोकेन गृहं गच्छन्ति नित्यशः ॥ ५७ ॥
प्रिय पत्नीके वियोग और पुत्रशोकसे संतप्त हो कितने ही प्राणी प्रतिदिन शोककी आगमें जलते हुए इस मरघटसे अपने घरको लौटते हैं ॥ ५७ ॥
अनिष्टानां सहस्राणि तथेष्टानां शतानि च ।
उत्सृज्येह प्रयाता वै बान्धवा भृशदुःखिताः ॥ ५८ ॥
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कितने ही भाई- बन्धु अत्यन्त दुखी हो यहाँ हजारों अप्रिय त था सैकड़ों प्रिय व्यक्तियोंको छोड़कर चले गये हैं ॥ ५८ ॥
त्यज्यतामेष निस्तेजाः शून्यः काष्ठत्वमागतः ।
अन्यदेहविषक्तं हि शावं काष्ठत्वमागतम् ॥ ५ ९ ॥
त्यक्तजीवस्य चैवास्य कस्माद्धित्वा न गच्छत ।
निरर्थको ह्ययं स्नेहो निष्फलश्च परिश्रमः ॥ ६० ॥
यह मृत बालक तेजोहीन होकर थोथे काठके समान हो गया है । इसे छोड़ दो । इसका जीव दूसरे शरीरमें आसक्त है । इस निष्प्राण बालकका यह शव काठके समान हो गया है तुमलोग इसे छोड़कर चले क्यों नहीं जाते? तुम्हारा यह स्नेह निरर्थक है और इस परिश्रमका भी कोई फल नहीं है ॥ ५ ९ -६० ॥
चक्षुर्भ्यां न च कर्णाभ्यां संशृणोति समीक्षते ।
कस्मादेनं समुत्सृज्य न गृहान् गच्छताशु वै ॥ ६१ ॥
यह न तो आँखोंसे देखता है और न कानोंसे कुछ सुनता ही है । फिर इसे त्यागकर तुमलोग जल्दी अपने घर क्यों नहीं चले जाते ॥ ६१ ॥
मोक्षधर्माश्रितैर्वाक्यैर्हेतुमद्भिः सुनिष्ठुरैः ।
मयोक्ता गच्छत क्षिप्रं स्वं स्वमेव निवेशनम् ॥ ६२ ॥
मेरी ये बातें बड़ी निष्ठुर जान पड़ती हैं; परंतु हेतुगर्भित और मोक्ष - धर्मसे सम्बन्ध रखनेवाली हैं; अतः इन्हें मानकर मेरे कहनेसे तुमलोग शीघ्र अपने - अपने घर पधारो ॥ ६२ ॥
प्रज्ञाविज्ञानयुक्तेन बुद्धिसंज्ञाप्रदायिना ।
वचनं श्राविता नूनं मानुषाः संनिवर्तत ।
शोको द्विगुणतां याति दृष्ट्वा स्मृत्वा च चेष्टितम् ॥ ६३ ॥
मनुष्यो! मैं बुद्धि और विज्ञानसे युक्त तथा दूसरोंको भी ज्ञान प्रदान करनेवाला हूँ । मैंने तुम्हें विवेक उत्पन्न करनेवाली बहुत -सी बातें सुनायी हैं। अब तुमलोग लौट जाओ । अपने मरे हुए स्वजनका शव देखकर तथा उसकी चेष्टाओंको स्मरण करके दूना शोक होता है ॥ ६३ ॥
इत्येतद् वचनं श्रुत्वा संनिवृत्तास्तु मानुषाः ।
अपश्यत् तं तदा सुप्तं द्रुतमागत्य जम्बुकः ॥ ६४ ॥
गीधकी यह बात सुनकर वे सब मनुष्य घरकी ओर लौट पड़े । तब सियारने तुरंत आकर उस सोते हुए बालकको देखा ॥ ६४ ॥
जम्बुक उवाच इमं कनकवर्णाभं भूषणैः समलंकृतम् ।