श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1021–1030
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1021–1030
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उस वृक्षकी लंबाई चार सौ हाथकी थी । छाया बड़ी सघन थी । उसपर तोते और
मैनाओंके समूह बसेरा लेते थे । वह वृक्ष फल और फूल दोनोंसे ही भरा था ॥ ७ ॥
सार्थिका वणिजश्चापि तापसाश्च वनौकसः ।
वसन्ति तत्र मार्गस्थाः सुरम्ये नगसत्तमे ॥ ८ ॥
दल बाँधकर यात्रा करनेवाले वणिक्, वनवासी तपस्वी तथा दूसरे राहगीर भी उस रमणीय एवं श्रेष्ठ वृक्षके नीचे निवास किया करते थे ॥ ८ ॥
तस्य ता विपुलाः शाखा दृष्ट्वा स्कन्धं च सर्वशः ।
अभिगम्याब्रवीदेनं नारदो भरतर्षभ ॥ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस वृक्षकी बड़ी- बड़ी शाखाओं तथा मोटे तनोंको देखकर देवर्षि नारद उसके पास गये और इस प्रकार बोले— ॥ ९ ॥
अहो नु रमणीयस्त्वमहो चासि मनोहरः ।
प्रीयामहे त्वया नित्यं तरुप्रवर शाल्मले ॥ १० ॥
अहो! शाल्मले! तुम बड़े रमणीय और मनोहर हो। तरुप्रवर! तुमसे हमें सदा प्रसन्नता प्राप्त होती है ॥ १० ॥
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मरे हुए ब्राह्मण -बालकपर तथा गीध एवं गीदड़पर शङ्करजीकी कृपा
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सदैव शकुनास्तात मृगाश्चाथ तथा गजाः ।
वसन्ति तव संहृष्टा मनोहर मनोहराः ॥ ११ ॥
‘ तात! मनोहर वृक्षराज! तुम्हारी शाखाओंपर सदा ही बहुत-से पक्षी तथा नीचे अनेकानेक मृग एवं हाथी प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं ॥ ११ ॥
तव शाखा महाशाख स्कन्धांश्च विपुलांस्तथा ।
न वै प्रभग्नान् पश्यामि मारुतेन कथंचन ॥ १२ ॥
‘ महान् शाखाओंसे सुशोभित वनस्पते! मैं देखता हूँ कि तुम्हारी शाखाओं और मोटे तनोंको वायुदेव भी किसी तरह तोड़ नहीं सके हैं ॥ १२ ॥
किं नुनु ते पवनस्तात प्रीतिमानथवा सुहृत् ।
त्वां रक्षति सदा येन वनेऽत्र पवनो ध्रुवम् ॥ १३ ॥
‘ तात! क्या पवनदेव तुमसे किसी कारणवश विशेष प्रसन्न रहते हैं अथवा वे तुम्हारे सुहृद् हैं, जिससे इस वनमें सदा तुम्हारी निश्चितरूपसे रक्षा करते हैं ॥
भगवान् पवनः स्थानाद् वृक्षानुच्चावचानपि ।
पर्वतानां च शिखराण्याचालयति वेगवान् ॥ १४ ॥
‘ भगवान् वायु इतने वेगशाली हैं कि छोटे - बड़े वृक्षोंको कौन कहे, पर्वतोंके शिखरोंको भी अपने स्थानसे हिला देते हैं ॥ १४ ॥
शोषयत्येव पातालं बहन् गन्धवहः शुचिः ।
सरांसि सरितश्चैव सागरांश्च तथैव च ॥ १५ ॥
‘ गन्धवाही पवित्र पवन पाताल, सरोवर, सरिताओं और समुद्रोंको भी सुखा सकता है ॥ १५ ॥
संरक्षति त्वां पवनः सखित्वेन न संशयः ।
तस्मात् त्व बहुशाखोऽपि पर्णवान् पुष्पवानपि ॥ १६ ॥
‘ इसमें संदेह नहीं कि वायुदेव तुम्हें अपना मित्र माननेके कारण ही तुम्हारी रक्षा करते हैं; इसीलिये तुम अनेक शाखाओंसे सम्पन्न तथा पत्ते और पुष्पोंसे हरे - भरे हो ॥ १६ ॥
इदं च रमणीयं ते प्रतिभाति वनस्पते ।
यदिमे विहगास्तात रमन्ते मुदितास्त्वयि ॥ १७ ॥
‘तात वनस्पते! तुम्हारे पास यह बड़ा ही रमणीय दृश्य जान पड़ता है कि ये पक्षी तुम्हारी शाखाओंपर बड़े प्रसन्न रहकर रमण कर रहे हैं ॥ १७ ॥
एषां पृथक् समस्तानां श्रूयते मधुरस्वरः ।
पुष्पसम्मोदने काले वाशतां सुमनोहरम् ॥ १८ ॥
' वसन्त ऋतुमें अत्यन्त मनोरम बोली बोलनेवाले इन पक्षियोंका अलग - अलग तथा सबका एक साथ बड़ा मधुर स्वर सुनायी पड़ता है ॥ १८ ॥
तथेमे गर्जिता नागाः स्वयूथकुलशोभिताः ।
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घर्मार्तास्वां समासाद्य सुखं विन्दन्ति शाल्मले ॥ १ ९ ॥ ‘ शाल्मले! अपने यूथकुलसे सुशोभित ये गर्जना करते हुए गजराज धूपसे पीड़ित हो तुम्हारे पास आकर सुख पाते हैं ॥ १ ९ ॥
तथैव मृगजातीभिरन्याभिरभिशोभसे ।
तथा सर्वाधिवासैश्च शोभसे मेरुवद्रुम ॥ २० ॥
' वृक्षप्रवर! इसी प्रकार दूसरी- दूसरी जातिके पशु भी तुम्हारी शोभा बढ़ा रहे हैं । तुम सबके निवास- स्थान होनेके कारण मेरुपर्वतके समान सुशोभित होते हो ॥ २० ॥
ब्राह्मणैश्च तपःसिद्धैस्तापसैः श्रमणैस्तथा ।
त्रिविष्टपसमं मन्ये तवायतनमेव हि ॥ २१ ॥
‘ तपस्यासे शुद्ध हुए तापसों, ब्राह्मणों तथा श्रमणोंसे संयुक्त हो तुम्हारा यह स्थान मुझे स्वर्गके समान जान पड़ता है ' ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि पवनशाल्मलिसंवादे चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें वायु और शाल्मलिसंवादके प्रसंगमें एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५४ ॥
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पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः नारदजीका सेमल- वृक्षको उसका अहंकार देखकर फटकारना नारद उवाच
बन्धुत्वादथवा सख्याच्छाल्मले नात्र संशयः ।
पालयत्येव सततं भीमः सर्वत्रगोऽनिलः ॥ १ ॥
नारदजीने कहा — शाल्मले! इसमें संहाय नहीं कि तुम्हें अपना बन्धु अथवा मित्र माननेके कारण ही सर्वत्रगामी भयानक वायुदेव सदा तुम्हारी रक्षा करते हैं ॥ १ ॥
न्यग्भावं परमं वायोः शाल्मले त्वमुपागतः ।
तवाहमस्मीति सदा येन रक्षति मारुतः ॥ २ ॥
शाल्मले! मालूम होता है, तुम वायुके सामने अत्यन्त विनम्र होकर कहते हो कि ' मैं तो आपका ही हूँ ' इसीसे वह सदा तुम्हारी रक्षा करता है ॥ २ ॥
न तं पश्याम्यहं वृक्षं पर्वतं वेश्म चेदृशम् ।
यं न वायुबलाद् भग्नं पृथिव्यामिति मे मतिः ॥ ३ ॥
मैं इस भूतलपर ऐसे किसी वृक्ष, पर्वत या घरको नहीं देखता, जो वायुके बलसे भग्न न हो जाय । मेरा यही विश्वास है कि वायुदेव सबको तोड़कर गिरा सकते हैं ॥ ३ ॥
त्वं पुनः कारणैर्नूनं रक्ष्यसे शाल्मले यथा ।
वायुना सपरीवारस्तेन तिष्ठस्यसंशयम् ॥ ४ ॥
शाल्मले! कुछ ऐसे कारण अवश्य हैं, जिनसे प्रेरित होकर वायुदेव निश्चितरूपसे
सपरिवार तुम्हारी रक्षा करते हैं । निस्संदेह इसीसे यों ही खड़े रहते हो ॥
शाल्मलिरुवाच
न मे वायुः सखा ब्रह्मन् न बन्धुर्न च मे सुहृत् ।
परमेष्ठी तथा नैव येन रक्षति वानिलः ॥ ५ ॥
सेमलने कहा — ब्रह्मन्! वायु न तो मेरा मित्र है, न बन्धु है, न सुहृद् ही है । वह ब्रह्मा भी नहीं है, जो मेरी रक्षा करेगा ॥ ५ ॥
मम तेजो बलं भीमं वायोरपि हि नारद ।
कलामष्टादशीं प्राणैर्न मे प्राप्नोति मारुतः ॥ ६ ॥
नारद! मेरा तेज और बल वायुसे भी भयंकर है । वायु अपनी प्राणशक्तिके द्वारा मेरी अठारहवीं कलाको भी नहीं पा सकता ॥ ६ ॥
आगच्छन् परुषो वायुर्मया विष्टम्भितो बलात् ।
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भञ्जन् द्रुमान् पर्वतांश्च यच्चान्यदपि किंचन ॥ ७ ॥
जिस समय वायुदेवता वृक्ष, पर्वत तथा दूसरी वस्तुओंको तोड़ता- फोड़ता हुआ मेरे पास पहुँचता है, उस समय मैं बलसे उसकी गतिको रोक देता हूँ ॥ ७ ॥
स मया बहुशो भग्नः प्रभञ्जन् वै प्रभञ्जनः ।
तस्मान्न बिभ्ये देवर्षे क्रुद्धादपि समीरणात् ॥ ८ ॥
देवर्षे! इस प्रकार मैंने तोड़ - फोड़ करनेवाले वायुकी गतिको अनेक बार रोक दिया है; अतः वह कुपित हो जाय तो भी मुझे उससे भय नहीं है ॥ ८ ॥
नारद उवाच
शाल्मले विपरीतं ते दर्शनं नात्र संशयः ।
न हि वायोर्बलेनास्ति भूतं तुल्यबलं क्वचित् ॥ ९ ॥
नारदजीने कहा- शाल्मले! इस विषयमें तुम्हारी दृष्टि विपरीत है - समझ उलटी हो गयी है, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि वायुके बलके समान किसी भी प्राणीका बल नहीं है ॥ ९ ॥
इन्द्रो यमो वैश्रवणो वरुणश्च जलेश्वरः ।
नैतेऽपि तुल्या मरुतः किं पुनस्त्वं वनस्पते ॥ १० ॥
वनस्पते! इन्द्र, यम, कुबेर तथा जलके स्वामी वरुण- ये भी वायुके तुल्य बलशाली नहीं हैं; फिर तुम जैसे साधारण वृक्षकी तो बात ही क्या है? ॥ १० ॥
यच्च किंचिदिह प्राणी चेष्टते शाल्मले भुवि ।
सर्वत्र भगवान् वायुश्चेष्टाप्राणकरः प्रभुः ॥ ११ ॥
शाल्मले! प्राणी इस पृथ्वीपर जो कुछ भी चेष्टा करता है, उस चेष्टाकी शक्ति तथा जीवन देनेवाले सर्वत्र सामर्थ्यशाली भगवान् वायु ही हैं ॥ ११ ॥
एष चेष्टयते सम्यक् प्राणिनः सम्यगायतः ।
असम्यगायतो भूयश्चेष्टते विकृतं नृषु ॥ १२ ॥
ये जब शरीरमें ठीक ढंगसे प्राण आदिके रूपमें विस्तारको प्राप्त होते हैं, तब समस्त प्राणियोंको चेष्टाशील बनाते हैं और जब ये ठीक ढंगसे काम नहीं करते हैं, तब प्राणियोंके शरीरमें विकृति आने लगती है ॥ १२ ॥
स त्वमेवंविधं वायुं सर्वसत्त्वभृतां वरम् ।
न पूजयसि पूज्यं तं किमन्यद् बुद्धिलाघवात् ॥ १३ ॥
इस प्रकार समस्त बलवानोंमें श्रेष्ठ एवं पूजनीय वायुदेवकी जो तुम पूजा नहीं करते हो, यह तुम्हारी बुद्धिकी लघुताके सिवा और क्या है ॥ १३ ॥
असारश्चापि दुर्मेधाः केवलं बहु भाषसे ।
क्रोधादिभिरवच्छन्नो मिथ्या वदसि शाल्मले ॥ १४ ॥
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शाल्मले! तुम सारहीन और दुर्बुद्धि हो, केवल बहुत बातें बनाते हो तथा क्रोध आदि दुर्गुणोंसे प्रेरित होकर झूठ बोलते हो ॥ १४ ॥
मम रोषः समुत्पन्नस्त्वय्येवं सम्प्रभाषति ।
ब्रवीम्येष स्वयं वायोस्तव दुर्भाषितं बहु ॥ १५ ॥
तुम्हारे इस तरह बातचीत करनेसे मेरे मनमें रोष उत्पन्न हुआ है; अतः मैं स्वयं वायुके सामने तुम्हारे इन दुर्वचनोंको सुनाऊँगा ॥ १५ ॥
चन्दनैः स्यन्दनैः शालैः सरलैर्देवदारुभिः ।
वेतसैर्धन्वनैश्चापि ये चान्ये बलवत्तराः ॥ १६ ॥
तैश्चापि नैवं दुर्बुद्धे क्षिप्तो वायुः कृतात्मभिः ।
तेऽपि जानन्ति वायोश्च बलमात्मन एव च ॥ १७ ॥
तस्मात् तं वै नमस्यन्ति श्वसनं तरुसत्तमाः । चन्दन, स्यन्दन ( तिनिश), शाल, सरल, देवदारु, वेतस ( बेत ), धामिन तथा अन्य जो बलवान् वृक्ष हैं, उन जितात्मा वृक्षोंने भी कभी इस प्रकार वायु- देवपर आक्षेप नहीं किया है । दुर्बुद्धे! वे भी अपने और वायुके बलको अच्छी तरह जानते हैं; इसीलिये वे श्रेष्ठ वृक्ष वायुदेवके सामने मस्तक झुका देते हैं ॥ १६-१७३ ॥
त्वं तु मोहान्न जानीषे वायोर्बलमनन्तकम् ।
एवं तस्माद् गमिष्यामि सकाशं मातरिश्वनः ॥ १८ ॥
तुम तो मोहवश वायुके अनन्त बलको कुछ समझते ही नहीं हो; अतः अब मैं यहाँसे सीधे वायुदेवके ही पास जाऊँगा ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि पवनशाल्मलिसंवादे पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें पवन-शाल्मलिसंवादविषयक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५५ ॥
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षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः नारदजीकी बात सुनकर वायुका सेमलको धमकाना और सेमलका वायुको तिरस्कृत करके विचारमग्न होना भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा तु राजेन्द्र शाल्मलिं ब्रह्मवित्तमः ।
नारदः पवने सर्वं शाल्मलेर्वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजेन्द्र! सेमलसे ऐसा कहकर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजीने वायुदेवके पास आकर उसकी सब बातें कह सुनायीं ॥ १ ॥
नारद उवाच
हिमवत्पृष्ठजः कश्चिच्छाल्मलिः परिवारवान् ।
बृहन्मूलो बृहच्छायः स त्वां वायोऽवमन्यते ॥ २ ॥
नारदजीने कहा- वायुदेव! हिमालयके पृष्ठभागपर एक सेमलका वृक्ष है, जो बहुत
बड़े परिवारके साथ है । उसकी छाया विशाल और घनी है और जड़ें बहुत दूरतक फैली हैं ।
वह तुम्हारा अपमान करता है ॥ २ ॥
बहुव्याक्षेपयुक्तानि त्वामाह वचनानि सः ।
न युक्तानि मया वायो तानि वक्तुं तवाग्रतः ॥ ३ ॥
उसने तुम्हारे प्रति बहुत से ऐसे आक्षेपयुक्त वचन कहे हैं, जिन्हें तुम्हारे सामने मुझे कहना उचित नहीं है ॥ ३ ॥
जानामि त्वामहं वायो सर्वप्राणभृतां वरम् ।
वरिष्ठं च गरिष्ठं च क्रोधे वैवस्वतं यथा ॥ ४ ॥
पवनदेव! मैं तुम्हें जानता हूँ । तुम समस्त प्राण- धारियोंमें श्रेष्ठ, महान् एवं गौरवशाली हो तथा क्रोधमें वैवस्वत यमके समान हो ॥ ४ ॥
भीष्म उवाच
एतत् तु वचनं श्रुत्वा नारदस्य समीरणः ।
शाल्मलिं तमुपागम्य क्रुद्धो वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! नारदजीकी यह बात सुनकर वायुदेवने शाल्मलिके पास जा कुपित होकर कहा ॥ ५ ॥
वायुरुवाच शाल्मले नारदो गच्छंस्त्वयोक्तो मद्विगर्हणम् ।
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अहं वायुः प्रभावं ते दर्शयाम्यात्मनो बलम् ॥ ६ ॥
वायु बोले- सेमल! तुमने इधरसे जाते हुए नारदजीसे मेरी निन्दा की है । मैं वायु हूँ । तुम्हें अपना बल और प्रभाव दिखाता हूँ ॥ ६ ॥
अहं त्वामभिजानामि विदितश्चासि मे द्रुम ।
पितामहः प्रजासर्गे त्वयि विश्रान्तवान् प्रभुः ॥ ७ ॥
वृक्ष! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम्हारे विषयमें मुझे सब कुछ ज्ञात है । भगवान् ब्रह्माजीने प्रजाकी सृष्टि करते समय तुम्हारी छायामें विश्राम किया था ॥ ७ ॥
तस्य विश्रमणादेष प्रसादो मत्कृतस्तव ।
रक्ष्यसे तेन दुर्बुद्धे नात्मवीर्याद् द्रुमाधम ॥ ८ ॥
दुर्बुद्धे! उनके विश्राम करनेसे ही मैंने तुमपर यह कृपा की थी, इसीसे तुम्हारी रक्षा हो रही है । द्रुमाधम! तुम अपने बलसे नहीं बचे हुए हो ॥ ८ ॥
यन्मां त्वमवजानीषे यथान्यं प्राकृतं तथा ।
दर्शयाम्येष चात्मानं यथा मां नावमन्यसे ॥ ९ ॥
परंतु तुम अन्य प्राकृतिक मनुष्यकी भाँति जो मेरा अपमान कर रहे हो, इससे कुपित होकर मैं अपना वह स्वरूप दिखाऊँगा, जिससे तुम फिर मेरा अपमान नहीं करोगे ॥ ९ ॥
भीष्म उवाच
एवमुक्तस्ततः प्राह शाल्मलिः प्रहसन्निव ।
पवन त्वं च मे क्रुद्धो दर्शयात्मानमात्मना ॥ १० ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! पवनदेवके ऐसा कहनेपर सेमलने हँसते हुए - से कहा -' पवन! तुम कुपित होकर स्वयं ही अपनी सारी शक्ति दिखाओ ॥ १० ॥
मयि वै त्यज्यतां क्रोधः किं मे क्रुद्धः करिष्यसि ।
न ते बिभेमि पवन यद्यपि त्वं स्वयं प्रभुः ॥ ११ ॥
‘ मेरे ऊपर अपना क्रोध उतारो । तुम कुपित होकर मेरा क्या कर लोगे । पवन! यद्यपि तुम स्वयं बड़े प्रभावशाली हो; फिर भी मैं तुमसे डरता नहीं हूँ ॥ ११ ॥
बलाधिकोऽहं त्वत्तश्च न भीः कार्या मया तव ।
येतु बुद्धया हि बलिनस्ते भवन्ति बलीयसः ॥ १२ ॥
प्राणमात्रबला ये वै नैव ते बलिनो मताः । ‘ मैं बलमें तुमसे बहुत बढ़ - चढ़कर हूँ; अतः मुझे तुमसे भय नहीं मानना चाहिये । जो बुद्धिके बली होते हैं, वे ही बलिष्ठ माने जाते हैं । जिनमें केवल शारीरिक बल होता है, वे वास्तवमें बलवान् नहीं समझे जाते' ॥ १२३ ॥
इत्येवमुक्तः पवनः श्व इत्येवाब्रवीद् वचः ॥ १३ ॥
दर्शयिष्यामि ते तेजस्ततो रात्रिरुपागमत् ।
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सेमलके ऐसा कहनेपर वायुने कहा – ' अच्छा, कल मैं तुम्हें अपना पराक्रम दिखाऊँगा । ' इतनेमें ही रात आ गयी ॥ १३३ ॥
अथ निश्चित्य मनसा शाल्मलिर्वातकारितम् ॥ १४ ॥
पश्यमानस्तदाऽऽत्मानमसमं मातरिश्वना । उस समय सेमलने वायुके द्वारा जो कुछ किया जानेवाला था, उसपर मन- ही - मन विचार करके तथा अपने आपको वायुके समान बलवान् न देखकर सोचा- ॥ १४३ ॥
नारदे यन्मया प्रोक्तं वचनं प्रति तन्मृषा ॥ १५ ॥
असमर्थो ह्यहं वायोर्बलेन बलवान् हि सः । ‘ अहो! मैंने नारदजीसे जो बातें कही थीं, वे सब झूठी थीं । मैं वायुका सामना करनेमें असमर्थ हूँ; क्योंकि वे बलमें मुझसे बढ़े हुए हैं ॥ १५३ ॥
मारुतो बलवान् नित्यं यथा वै नारदोऽब्रवीत् ॥ १६ ॥
अहं तु दुर्बलो ऽन्येभ्यो वृक्षेभ्यो नात्र संशयः ।
किं तु बुद्ध्या समो नास्ति मया कश्चिद् वनस्पतिः ॥ १७ ॥
‘ जैसा कि नारदजीने कहा था, वायुदेव नित्य बलवान् हैं । मैं तो दूसरे वृक्षोंसे भी दुर्बल हूँ, इसमें संशय नहीं है; परंतु बुद्धिमें कोई भी वृक्ष मेरे समान नहीं है ॥ १६-१७ ॥
तदहं बुद्धिमास्थाय भयं मोक्ष्ये समीरणात् ।
यदि तां बुद्धिमास्थाय तिष्ठेयुः पर्णिनो वने ॥ १८ ॥
अरिष्टाः स्युः सदा कुद्धात् पवनान्नात्र संशयः । ' मैं बुद्धिका आश्रय लेकर वायुके भयसे छुटकारा पाऊँगा । यदि वनमें रहनेवाले दूसरे वृक्ष भी उसी बुद्धिका सहारा लेकर रहें तो निःसंदेह कुपित वायुसे उनका कोई अनिष्ट नहीं होगा ॥ १८३ ॥
ते तु बाला न जानन्ति यथा वै तान् समीरणः ।
समीरयति संक्रुद्धो यथा जानाम्यहं तथा ॥ १ ९ ॥
‘ परंतु वे मूर्ख हैं; अतः वायुदेव जिस प्रकार कुपित होकर उन्हें दबाते हैं, उसका उन्हें ज्ञान नहीं है । मैं यह सब अच्छी तरह जानता हूँ' ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि पवनशाल्मलिसंवादे षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें पवन-शाल्मलि- संवादविषयक एक सौ छप्पनवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १५६ ॥