05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1061–1070
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1061–1070
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भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार तुम्हारे प्रश्नके अनुसार यहाँ नृशंस मनुष्यका परिचय दिया गया है । विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह सदा उससे बचकर रहे ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि नृशंसाख्याने चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६४ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमेंनृशंसका वर्णनविषयक एक सौचौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६४ ॥
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पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः नाना प्रकारके पापों और उनके प्रायश्चित्तोंका वर्णन भीष्म उवाच
हृतार्थो यक्ष्यमाणश्च सर्ववेदान्तगश्च यः ।
आचार्यपितृकार्यार्थं स्वाध्यायार्थमथापि च ॥ १ ॥
एते वै साधवो दृष्टा ब्राह्मणा धर्मभिक्षवः ।
निःस्वेभ्यो देयमेतेभ्यो दानं विद्या च भारत ॥ २ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! सम्पूर्ण वेदों और उपनिषदोंका पारंगत विद्वान् ब्राह्मण यदि यज्ञ करनेवाला हो तथा उसका धन चोर चुरा ले गये हों तो राजाका कर्तव्य है कि वह उसे आचार्यकी दक्षिणा देने, पितरोंका श्राद्ध करने तथा वेद - शास्त्रोंका स्वाध्याय करनेके लिये धन दे । भरतनन्दन! ये श्रेष्ठ ब्राह्मण प्रायः धर्मके लिये धनकी भिक्षा माँगते देखे गये हैं । इन्हें दान और विद्याध्ययनके लिये धन देना चाहिये ॥ १-२ ॥
अन्यत्र दक्षिणादानं देयं भरतसत्तम ।
अन्येभ्योऽपि बहिर्वेदि चाकृतान्नं विधीयते ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! इससे भिन्न परिस्थितिमें ब्राह्मणको केवल दक्षिणा देनी चाहिये और ब्राह्मणेतर मनुष्योंको भी यज्ञवेदीसे बाहर कच्चा अन्न देनेका विधान है ॥ ३ ॥
सर्वरत्नानि राजा हि यथार्हं प्रतिपादयेत् ।
ब्राह्मणा एव वेदाश्च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः ।
अन्योन्यं विभवाचारा यजन्ते गुणतः सदा ॥ ४ ॥
राजाको चाहिये कि वह ब्राह्मणोंको उनकी योग्यताके अनुसार सब प्रकारके रत्नोंका दान करे; क्योंकि ब्राह्मण ही वेद एवं बहुसंख्यक दक्षिणावाले यज्ञरूप हैं । अपनी सम्पत्तिके अनुसार समस्त कार्योंका आयोजन करनेवाले वे ब्राह्मण सदा आपसमें मिलकर गुणयुक्त यज्ञका अनुष्ठान करते हैं ॥ ४ ॥
यस्य त्रैवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये ।
अधिकं चापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति ॥ ५ ॥
जिस ब्राह्मणके पास अपने पालनीय कुटुम्बी -जनोंके भरण- पोषणके लिये तीन वर्षतक उपभोगमें आने लायक पर्याप्त धन हो अथवा उससे भी अधिक वैभव विद्यमान हो, वही सोमपानका अधिकारी है— उसे ही सोमयागका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ५ ॥
यज्ञश्चेत् प्रतिरुद्धः स्यादंशेनैकेन यज्वनः ।
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ब्राह्मणस्य विशेषेण धार्मिके सति राजनि ॥ ६ ॥
यो वैश्यः स्याद् बहुपशुर्हीनक्रतुरसोमपः ।
कुटुम्बात् तस्य तद् वित्तं यज्ञार्थं पार्थिवो हरेत् ॥ ७ ॥
यदि धर्मात्मा राजाके रहते हुए किसी यज्ञकर्ताका, विशेषतः ब्राह्मणका यज्ञ धनके बिना अधूरा रह जाय— उसके एक अंशकी पूर्ति शेष रह जाय तो राजाको चाहिये कि उसके राज्यमें जो बहुत पशुओं तथा वैभवसे सम्पन्न वैश्य हो, यदि वह यज्ञ तथा सोमयागसे रहित हो तो उसके कुटुम्बसे उस धनको यज्ञके लिये ले ले ॥ ६-७ ॥
आहरेदथ नो किञ्चित् कामं शूद्रस्य वेश्मनः ।
न हि यज्ञेषु शूद्रस्य किञ्चिदस्ति परिग्रहः ॥ ८ ॥
किंतु राजा अपनी इच्छाके अनुसार शूद्रके घरसे थोड़ा- सा भी धन न ले आवे; क्योंकि यज्ञोंमें शूद्रका किंचिन्मात्र भी अधिकार नहीं है ॥ ८ ॥
योऽनाहिताग्निः शतगुरयज्वा च सहस्रगुः ।
तयोरपि कुटुम्बाभ्यामाहरेदविचारयन् ॥ ९ ॥
जिस वैश्यके पास एक सौ गौएँ हों और वह अग्निहोत्र न करता हो, तथा जिसके पास एक हजार गौएँ हों और वह यज्ञ न करता हो, उन दोनोंके कुटुम्बोंसे राजा बिना विचारे ही धन उठा लावे ॥ ९ ॥
अदातृभ्यो हरेद् वित्तं विख्याप्य नृपतिः सदा ।
तथैवाचरतो धर्मो नृपतेः स्यादथाखिलः ॥ १० ॥
जो धन रहते हुए उसका दान न करते हों, ऐसे लोगोंके इस दोषको विख्यात करके राजा सदा धर्मके लिये उनका धन ले ले, ऐसा आचरण करनेवाले राजाको सम्पूर्ण धर्मकी प्राप्ति होती है ॥ १० ॥
तथैव शृणु मे भक्तं भक्तानि षडनश्नतः ।
अश्वस्तनविधानेन हर्तव्यं हीनकर्मणः ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर! इसी प्रकार मैं अन्नके विषयमें जो बात बता रहा हूँ, उसे सुनो । यदि ब्राह्मण अन्नाभावके कारण लगातार छः समयतक उपवास कर जाय तो उस अवस्थामें वह किसी निकृष्ट कर्म करनेवाले मनुष्यके घरसे उतने धनका अपहरण कर सकता है, जिससे उसके एक दिनका भोजन चल जाय और दूसरे दिनके लिये कुछ बाकी न रहे ॥ ११ ॥
खलात् क्षेत्रात् तथा रामाद् यतो वाप्युपपद्यते ।
आख्यातव्यं नृपस्यैतत् पृच्छतेऽपृच्छतेऽपि वा ॥ १२ ॥
खलिहानसे, खेतसे, बगीचेसे अथवा जहाँसे भी अन्न मिल सके, वहींसे वह भोजनमात्रके लिये अन्न उठा लावे और उसके बाद राजा पूछे या न पूछे उसके पास जाकर अपनी वह बात उसे कह दे ॥ १२ ॥
न तस्मै धारयेद् दण्डं राजा धर्मेण धर्मवित् ।
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क्षत्रियस्य तु बालिश्याद् ब्राह्मणः क्लिश्यते क्षुधा ॥ १३ ॥
उस दशामें धर्मज्ञ राजा धर्मके अनुसार उसे दण्ड न दे; क्योंकि क्षत्रिय राजाकी नादानीसे ही ब्राह्मणको भूखका कष्ट उठाना पड़ता है ॥ १३ ॥
श्रुतशीले समाज्ञाय वृत्तिमस्य प्रकल्पयेत् ।
अथैनं परिरक्षेत पिता पुत्रमिवौरसम् ॥ १४ ॥
राजा उसके शास्त्रज्ञान और स्वभावका परिचय प्राप्त करके उसके लिये उचित आजीविकाकी व्यवस्था करे और जैसे पिता अपने औरस पुत्रकी रक्षा करता है, उसी प्रकार वह उस ब्राह्मणकी रक्षा करे ॥ १४ ॥
इष्टिं वैश्वानरीं नित्यं निर्वपेदब्दपर्यये ।
अनुकल्पः परो धर्मो धर्मवादैस्तु केवलम् ॥ १५ ॥
प्रतिवर्ष किये जानेवाले आग्रयण आदि यज्ञ यदि न किये जा सके हों तो उनके बदले प्रतिदिन वैश्वानरी इष्टि समर्पित करे । मुख्य कर्मके स्थानमें जो गौण कार्य किया जाता है, उसका नाम अनुकल्प है, धर्मज्ञ पुरुषोंद्वारा बताया गया अनुकल्प भी परम धर्म ही है ॥ १५ ॥
विश्वैर्देवैश्च साध्यैश्च ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः ।
आपत्सु मरणाद् भीतैर्विधिः प्रतिनिधीकृतः ॥ १६ ॥
क्योंकि विश्वेदेव, साध्य, ब्राह्मण और महर्षि– इन सब लोगोंने मृत्युसे डरकर आपत्कालके विषयमें प्रत्येक विधिका प्रतिनिधि नियत कर दिया है ॥ १६ ॥
प्रभुः प्रथमकल्पस्य योऽनुकल्पे न वर्तते ।
न साम्परायिकं तस्य दुर्मतेर्विद्यते फलम् ॥ १७ ॥
जो मुख्य विधिके अनुसार कर्म करनेमें समर्थ होकर भी गौण विधिसे काम चलाता है, उस दुर्बुद्धि मनुष्यको पारलौकिक फलकी प्राप्ति नहीं होती ॥ १७ ॥
न ब्राह्मणो निवेदेत किंचिद् राजनि वेदवित् ।
स्ववीर्याद् राजवीर्याच्च स्ववीर्यं बलवत्तरम् ॥ १८ ॥
वेदज्ञ ब्राह्मणको चाहिये कि वह राजाके निकट अपनी आवश्यकता निवेदन न करे; क्योंकि ब्राह्मणकी अपनी शक्ति तथा राजाकी शक्तिमेंसे उसकी अपनी ही शक्ति प्रबल है ॥ १८ ॥
तस्माद् राज्ञः सदा तेजो दुःसहं ब्रह्मवादिनाम् ।
कर्ता शास्ता विधाता च ब्राह्मणो देव उच्यते ॥ १ ९ ॥
अतः ब्रह्मवादियोंका तेज राजाके लिये सदा दुःसह है। ब्राह्मण इस जगत्का कर्ता, शासक, धारण - पोषण करनेवाला और देवता कहलाता है ॥ १ ९ ॥
तस्मिन्नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कामीरयेद् गिरम् ।
क्षत्रियो बाहुवीर्येण तरेदापदमात्मनः ॥ २० ॥
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धनैर्वैश्यश्च शूद्रश्च मन्त्रैर्होमैश्च वै द्विजः । अतः उसके प्रति अमङ्गलसूचक बात न कहे । रूखे वचन न बोले । क्षत्रिय अपने बाहुबलसे, वैश्य और शूद्र धनके बलसे तथा ब्राह्मण मन्त्र एवं हवनकी शक्तिसे अपनी विपत्तिसे पार हो सकता है ॥ २० ॥
नैव कन्या न युवतिर्नामन्त्रज्ञो न बालिशः ॥ २१ ॥
परिवेष्टाग्निहोत्रस्य भवेन्नासंस्कृतस्तथा । न कन्या, न युवती, न मन्त्र न जाननेवाला, न मूर्ख और न संस्कारहीन पुरुष ही अग्निमें हवन करनेका अधिकारी है ॥ २१२३ ॥
नरकं निपतन्त्येते जुह्वानाः स च यस्य तत् ।
तस्माद् वैतानकुशलो होता स्याद् वेदपारगः ॥ २२ ॥
यदि ये हवन करते हैं तो स्वयं तो नरकमें पड़ते ही हैं, जिसका वह यज्ञ है, वह भी नरकमें गरिता है । अतः जो यज्ञकर्ममें कुशल और वेदोंका पारङ्गत विद्वान् हो, वही होता हो सकता है ॥ २२ ॥
प्राजापत्यमदत्त्वाश्वमग्न्याधेयस्य दक्षिणाम् ।
अनाहिताग्निरिति स प्रोच्यते धर्मदर्शिभिः ॥ २३ ॥
जो अग्निहोत्र आरम्भ करके प्रजापति देवताके लिये अश्वरूप दक्षिणाका दान नहीं करता, धर्मदर्शी पुरुष उसे अनाहिताग्नि कहते हैं ॥ २३ ॥
पुण्यानि यानि कुर्वीत श्रद्दधानो जितेन्द्रियः ।
अनाप्तदक्षिणैर्यज्ञैर्न यजेत कथञ्चन ॥ २४ ॥
मनुष्य जो भी पुण्यकर्म करे उसे श्रद्धापूर्वक और जितेन्द्रिय भावसे करे । पर्याप्त दक्षिणा दिये बिना किसी तरह यज्ञ न करे ॥ २४ ॥
प्रजाः पशूंश्च स्वर्गं च हन्ति यज्ञो ह्यदक्षिणः ।
इन्द्रियाणि यशः कीर्तिमायुश्चाप्यवकृन्तति ॥ २५ ॥
बिना दक्षिणाका यज्ञ प्रजा और पशुका नाश करता है; और स्वर्गकी प्राप्तिमें भी विघ्न डाल देता है। इतना ही नहीं वह इन्द्रिय, यश, कीर्ति तथा आयुको भी क्षीण करता है ॥ २५ ॥
उदक्यामासते ये च द्विजाः केचिदनग्नयः ।
होमं चाश्रोत्रियं येषां ते सर्वे पापकर्मिणः ॥ २६ ॥
जो ब्राह्मण रजस्वला स्त्रीके साथ समागम करते हैं, जिन्होंने घरमें अग्निकी स्थापना नहीं की है; तथा जो अवैदिक रीतिसे हवन करते हैं, वे सभी पापाचारी हैं ॥ २६ ॥
उदपानोदके ग्रामे ब्राह्मणो वृषलीपतिः ।
उषित्वा द्वादश समाः शूद्रकर्मैव गच्छति ॥ २७ ॥
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जिस गाँवमें एक ही कुएँका पानी सब लोग पीते हैं, वहाँ बारह वर्षोंतक निवास करनेसे तथा शूद्रजातिकी स्त्रीके साथ विवाह कर लेनेसे ब्राह्मण भी शूद्र हो जाता है ॥ २७ ॥
अभार्यां शयने बिभ्रच्छूद्रं वृद्धं च वै द्विजः ।
अब्राह्मणं मन्यमानस्तृणेष्वासीत पृष्ठतः ।
तथा संशुध्यते राजन् शृणु चात्र वचो मम ॥ २८ ॥
यदि ब्राह्मण अपनी पत्नीके सिवा दूसरी स्त्रीको शय्यापर बिठा ले अथवा बड़े - बूढ़े शूद्रको या ब्राह्मणेतर– क्षत्रिय या वैश्यको सम्मान देता हुआ ऊँचे आसनपर बैठाकर स्वयं चटाईपर बैठे तो वह ब्राह्मणत्वसे गिर जाता है। राजन्! उसकी शुद्धि जिस प्रकार होती है, वह मुझसे सुनो ॥ २८ ॥
यदेकरात्रेण करोति पापं निकृष्टवर्णं ब्राह्मणः सेवमानः । स्थानासनाभ्यां विहरन् व्रती स त्रिभिर्वर्षैः शमयेदात्मपापम् ॥ २ ९ ॥ यदि ब्राह्मण एक रात भी किसी नीच वर्णके मनुष्यकी सेवा करे अथवा उसके साथ एक जगह रहे या एक आसनपर बैठे तो इससे जो पाप लगता है, उसको वह तीन वर्षों तक व्रतका पालन करते हुए पृथ्वीपर विचरनेसे दूर कर सकता है ॥ २ ९ ॥ न नर्मयुक्तमनृतं हिनस्ति न स्त्रीषु राजन् न विवाहकाले । न गुर्वर्थं नात्मनो जीवितार्थे पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ॥ ३० ॥
राजन्! परिहासमें, स्त्रीके पास, विवाहके अवसर पर, गुरुके हितके लिये अथवा अपने प्राण बचानेके उद्देश्यसे बोला गया असत्य हानिकारक नहीं होता । इन पाँच अवसरोंपर असत्य बोलना पाप नहीं बताया गया है ॥ ३० ॥
श्रद्दधानः शुभां विद्यां हीनादपि समाप्नुयात् ।
सुवर्णमपि चामेध्यादाददीताविचारयन् ॥ ३१ ॥
नीच वर्णके पुरुषके पास भी उत्तम विद्या हो तो उसे श्रद्धापूर्वक ग्रहण करनी चाहिये और सोना अपवित्र स्थानमें भी पड़ा हो तो उसे बिना हिचकिचाहटके उठा लेना चाहिये ॥ ३१ ॥
स्त्रीरत्नं दुष्कुलाच्चापि विषादप्यमृतं पिबेत् ।
अदूष्या हि स्त्रियो रत्नमाप इत्येव धर्मतः ॥ ३२ ॥
नीच कुलसे भी उत्तम स्त्रीको ग्रहण कर ले, विषके स्थानसे भी अमृत मिले तो उसे पी ले; क्योंकि स्त्रियाँ, रत्न और जल - ये धर्मतः दूषणीय नहीं होते हैं ॥ ३२ ॥
गोब्राह्मणहितार्थं च वर्णानां संकरेषु च ।
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वैश्यो गृह्णीत शस्त्राणि परित्राणार्थमात्मनः ॥ ३३ ॥
गौ और ब्राह्मणोंका हित, वर्णसंकरताका निवारण तथा अपनी रक्षा करनेके लिये वैश्य भी हथियार उठा सकता है ॥ ३३ ॥
सुरापानं ब्रह्महत्या गुरुतल्पमथापि वा ।
अनिर्देश्यानि मन्यन्ते प्राणान्तमिति धारणा ॥ ३४ ॥
मदिरापान, ब्रह्महत्या तथा गुरुपत्नीगमन–इन महापापोंसे छूटनेके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं बताया गया है । किसी भी उपायसे अपने प्राणोंका अन्त कर देना ही उन पापोंका प्रायश्चित्त होगा, ऐसी विद्वानोंकी धारणा है ॥ ३४ ॥
सुवर्णहरणं स्तैन्यं विप्रस्वं चेति पातकम् ।
विहरन् मद्यपानाच्च अगम्यागमनादपि ॥ ३५ ॥
पतितैः सम्प्रयोगाच्च ब्राह्मणीयोनितस्तथा ।
अचिरेण महाराज पतितो वै भवत्युत ॥ ३६ ॥
सुवर्णकी चोरी, अन्य वस्तुओंकी चोरी तथा ब्राह्मणका धन छीन लेना – यह महान् पाप है । महाराज! मदिरापान और अगम्या स्त्रीके साथ गमन करनेसे, पतितोंके साथ सम्पर्क रखनेसे तथा ब्राह्मणेतर होकर ब्राह्मणीके साथ समागम करनेसे स्वेच्छाचारी पुरुष शीघ्र ही पतित हो जाता है ॥ ३५-३६ ॥
संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन् ।
याजनाध्यापनाद् यौनान्न तु यानासनाशनात् ॥ ३७ ॥
पतितके साथ रहनेसे, उसका यज्ञ करानेसे और उसे पढ़ानेसे मनुष्य एक वर्षमें पतित हो जाता है; परंतु उसकी संतानके साथ अपनी संतानका विवाह करनेसे, एक सवारी या एक आसन पर बैठनेसे तथा उसके साथमें भोजन करनेसे वह एक वर्षमें नहीं, किंतु तत्काल पतित हो जाता है ॥ ३७ ॥
एतानि हित्वातोऽन्यानि निर्देश्यानीति भारत ।
निर्देश्यानेन विधिना कालेनाव्यसनी भवेत् ॥ ३८ ॥
भरतनन्दन! उपर्युक्त पाप अनिर्देश्य ( प्रायश्चित्त - रहित ) कहे गये हैं । इन्हें छोड़कर और जितने पाप हैं, वे निर्देश्य हैं— शास्त्रमें उनका प्रायश्चित्त बताया गया है । उसके अनुसार प्रायश्चित्त करके पापका व्यसन छोड़ देना चाहिये ॥ ३८ ॥
अन्नं वीर्यं ग्रहीतव्यं प्रेतकर्मण्यपातिते ।
त्रिषु त्वेतेषु पूर्वेषु न कुर्वीत विचारणाम् ॥ ३ ९ ॥
पूर्वोक्त ( शराबी, ब्रह्महत्यारा और गुरुपत्नीगामी ) तीन पापियोंके मरनेपर उनकी दाहादिक क्रिया किये बिना ही कुटुम्बीजनोंको उनके अन्न और धनपर अधिकार कर लेना चाहिये । इसमें कुछ अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ३ ९ ॥ अमात्यान् वा गुरून् वापि जह्याद् धर्मेण धार्मिकः ।
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प्रायश्चित्तमकुर्वाणैर्नैतैरर्हति संविदम् ॥ ४० ॥
धार्मिक राजा अपने मन्त्री और गुरुजनोंको भी पतित हो जानेपर धर्मानुसार त्याग दे और जबतक ये अपने पापोंका प्रायश्चित्त न कर लें, तबतक इनके साथ बातचीत न करे ॥ ४० ॥
अधर्मकारी धर्मेण तपसा हन्ति किल्बिषम् ।
ब्रुवन् स्तेन इति स्तेनं तावत् प्राप्नोति किल्बिषम् ॥ ४१ ॥
पापाचारी मनुष्य यदि धर्माचरण और तपस्या करे तो अपने पापको नष्ट कर देता है । चोरको ‘ यह चोर है ' ऐसा कह देनेमात्रसे चोरके बराबर पापका भागी होना पड़ता है ॥ ४१ ॥
अस्तेनं स्तेन इत्युक्त्वा द्विगुणं पापमाप्नुयात् ।
त्रिभागं ब्रह्महत्यायाः कन्या प्राप्नोति दुष्यती ॥ ४२ ॥
जो चोर नहीं है, उसको चोर कह देनेसे मनुष्यको चोरसे दूना पाप लगता है । कुमारी कन्या यदि अपनी इच्छासे चरित्रभ्रष्ट हो जाय तो उसे ब्रह्महत्याका तीन चौथाई पाप भोगना पड़ता है ॥ ४२ ॥
यस्तु दूषयिता तस्याः शेषं प्राप्नोति पाप्मनः ।
ब्राह्मणानवगर्ह्येह स्पृष्ट्वा गुरुतरं भवेत् ॥ ४३ ॥
और जो उसे कलंकित करनेवाला पुरुष है, वह शेष एक चौथाई पापका भागी होता है । इस जगत्में ब्राह्मणोंको गाली देकर या उन्हें तिरस्कारपूर्वक धक्के देकर हटानेसे मनुष्यको बड़ा भारी पाप लगता है ॥ ४३ ॥
वर्षाणां हि शतं तावत् प्रतिष्ठां नाधिगच्छति ।
सहस्रं चैव वर्षाणां निपत्य नरकं वसेत् ॥ ४४ ॥
सौ वर्षोंतक तो उसे प्रेतकी भाँति भटकना पड़ता है, कहीं भी ठहरनेके लिये ठौर नहीं मिलता । फिर एक हजार वर्षोंतक उसे नरकमें गिरकर रहना पड़ता है ॥ ४४ ॥
तस्मान्नैवावगर्ह्येत नैव जातु निपातयेत् ।
शोणितं यावतः पांसून् संगृह्णीयाद् द्विजक्षतात् ॥ ४५ ॥
तावतीः स समा राजन् नरके प्रतिपद्यते । अतः न ब्राह्मणको गाली दे और न उसे कभी धरती पर गिरावे । राजन्! ब्राह्मणके शरीरमें घाव हो जानेपर उससे निकला हुआ रक्त धूलके जितने कणोंको भिगोता है, उसे चोट पहुँचानेवाला मनुष्य उतने ही वर्षोंतक नरकमें पड़ा रहता है ॥ ४५३ ॥
भ्रूणहाऽऽहवमध्ये तु शुद्ध्यते शस्त्रपाततः ॥ ४६ ॥
आत्मानं जुहुयादग्नौ समिद्धे तेन शुद्धयते ।
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गर्भके बच्चेकी हत्या करनेवाला यदि युद्धमें शस्त्रोंके आघातसे मर जाय तो उसकी शुद्धि हो जाती है अथवा प्रज्वलित अग्निमें कूदकर अपने आपको होम दे तो वह शुद्ध हो जाता है ॥ ४६३ ॥
सुरापो वारुणीमुष्णां पीत्वा पापाद् विमुच्यते ॥ ४७ ॥
तया स काये निर्दग्धे मृत्युं वा प्राप्य शुद्धयति ।
लोकांश्च लभते विप्रो नान्यथा लभते हि सः ॥ ४८ ॥
मदिरा पीनेवाला पुरुष यदि मदिराको खूब गरम करके पी ले तो पापसे छुटकारा पा जाता है, अथवा उससे शरीर जल जानेके कारण उसकी मृत्यु हो जाय तो वह शुद्ध हो जाता है । इस प्रकार शुद्ध हो जानेपर ही वह ब्राह्मण शुद्ध लोकोंको प्राप्त कर सकता है, अन्यथा नहीं ॥ ४७-४८ ॥
गुरुतल्पमधिष्ठाय दुरात्मा पापचेतनः ।
स्त्र्याकारां प्रतिमां लिंग्य मृत्युना सोऽभिशुद्धयति ॥ ४ ९ ॥
पापपूर्ण विचार रखनेवाला दुरात्मा पुरुष यदि गुरुपत्नी- गमनका पाप कर बैठे तो वह लोहेकी गरम की हुई नारी-प्रतिमाका आलिङ्गन करके प्राण दे देनेपर ही उस पापसे शुद्ध होता है ॥ ४ ९ ॥ अथवा शिश्नवृषणावादायाञ्जलिना स्वयम् ॥ ५० ॥
नैर्ऋतीं दिशमास्थाय निपतेत् स त्वजिह्मगः ।
ब्राह्मणार्थेऽपि वा प्राणान् संत्यजेत् तेन शुद्धयति ॥ ५१ ॥
अथवा अपने शिश्न और अण्डकोषको स्वयं ही काटकर अञ्जलिमें लेकर सीधे नैर्ऋत्य- दिशाकी ओर जाता हुआ गिर पड़े या ब्राह्मणके लिये प्राणोंका परित्याग कर दे तो शुद्ध हो जाता है ॥ ५०-५१ ॥
अश्वमेधेन वापीष्ट्वा अथवा गोसवेन वा ।
अग्निष्टोमेन वा सम्यगिह प्रेत्य च पूज्यते ॥ ५२ ॥
अथवा अश्वमेधयज्ञ, गोसव नामक यज्ञ या अग्निष्टोम यज्ञके द्वारा भलीभाँति यजन करके वह इहलोक तथा परलोकमें पूजित होता है ॥ ५२ ॥
तथैव द्वादशसमाः कपाली ब्रह्महा भवेत् ।
ब्रह्मचारी भवेन्नित्यं स्वकर्म ख्यापयन् मुनिः ॥ ५३ ॥
एवं वा तपसा युक्तो ब्रह्महा सवनी भवेत् । ब्रह्महत्या करनेवाला मनुष्य उस मरे हुए ब्राह्मणकी खोपड़ी लेकर अपना पापकर्म लोगोंको सुनाता रहे और बारह वर्षोंतक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए सबेरे, शाम तथा दोपहर तीनों समय स्नान करे । इस प्रकार वह तपस्यामें संलग्न रहे । इससे उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ ५३ ॥
एवं तु समभिज्ञातामात्रेयीं वा निपातयेत् ॥ ५४ ॥
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द्विगुणा ब्रह्महत्या वै आत्रेयीनिधने भवेत् । इसी तरह जो जान- बूझकर गर्भिणी स्त्रीकी हत्या करता है; उसे उस गर्भिणी - वधके कारण दो ब्रह्महत्याओंका पाप लगता है ॥ ५४३ ॥
सुरापो नियताहारो ब्रह्मचारी क्षितीशयः ॥ ५५ ॥
ऊर्ध्व त्रिभ्योऽपि वर्षेभ्यो यजेताग्निष्टुता परम् ।
ऋषभैकसहस्रं वा गा दत्त्वा शौचमाप्नुयात् ॥ ५६ ॥
मदिरा पीनेवाला मनुष्य मिताहारी और ब्रह्मचारी होकर पृथ्वीपर शयन करे । इस तरह तीन वर्षोंतक रहनेके बाद ' अग्निष्टोम ' यज्ञ करे। तत्पश्चात् एक हजार बैल या इतनी ही गौएँ ब्राह्मणों को दान दे तो वह शुद्ध हो जाता है ॥ ५५-५६ ॥
वैश्यं हत्वा तु वर्षे द्वे ऋषभैकशतं च गाः ।
शूद्रं हत्वाब्दमेवैकमृषभं च शतं च गाः ॥ ५७ ॥
यदि वैश्यकी हत्या कर दे तो दो वर्षोंतक पूर्वोक्त नियमसे रहनेके बाद एक सौ बैल और एक सौ गौओंका दान करे, तथा शूद्रकी हत्या कर देनेपर हत्यारेको एक वर्षतक पूर्वोक्त नियमसे रहकर एक बैल और सौ गौओंका दान करना चाहिये ॥ ५७ ॥
श्ववराहखरान् हत्वा शौद्रमेव व्रतं चरेत् ।
मार्जारचाषमण्डूकान् काकं व्यालं च मूषिकम् ॥ ५८ ॥
उक्तः पशुसमो दोषो राजन् प्राणिनिपातनात् । कुत्ते, सूअर और गदहोंकी हत्या करके मनुष्य शूद्रवध- सम्बधी व्रतका ही आचरण करे । राजन्! बिल्ली, नीलकण्ठ, मेढक, कौआ, साँप और चूहा आदि प्राणियोंको मारनेसे भी उक्त पशुवधके ही समान पाप बताया गया है ॥ ५८३ ॥
प्रायश्चित्तान्यथान्यानि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ॥ ५ ९ ॥
अल्पे वाप्यथ शोचेत पृथक् संवत्सरं चरेत् ।
त्रीणि श्रोत्रियभार्यायां परदारे च द्वे स्मृते ॥ ६० ॥
काले चतुर्थे भुञ्जानो ब्रह्मचारी व्रती भवेत् ।
स्थानासनाभ्यां विहरेत् त्रिरह्नाभ्युपयन्नपः ।
एवमेव निराकर्ता यश्चाग्नीनपविध्यति ॥ ६१ ॥
अब दूसरे प्रायश्चित्तोंका भी क्रमशः वर्णन करता हूँ । अनजानमें कीड़ों - मकोड़ोंका वध आदि छोटा पाप हो जाय तो उसके लिये पश्चात्ताप करे । इतनेहीसे उसकी शुद्धि हो जाती है । गोवधके सिवा अन्य जितने उपपातक हैं उनमेंसे प्रत्येकके लिये एक-एक वर्षतक व्रतका आचरण करे । श्रोत्रियकी पत्नीसे व्यभिचार करनेपर तीन वर्षतक और अन्य परस्त्रियोंसे समागम करनेपर दो वर्षोंतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए दिनके चौथे पहरमें एक बार भोजन करे । अपने लिये पृथक् स्थान और आसनकी व्यवस्था रखते हुए घूमता रहे । दिनमें तीन बार जलसे स्नान करे । ऐसा करनेसे ही वह अपने उपर्युक्त पापोंका