श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1071–1080
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1071–1080
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निवारण कर सकता है । जो अग्निको भ्रष्ट करता है, उसके लिये भी यही प्रायश्चित्त है ॥ ५ ९ -६१ ॥
त्यजत्यकारणे यश्च पितरं मातरं गुरुम् ।
पतितः स्यात्स कौरव्य यथा धर्मेषु निश्चयः ॥ ६२ ॥
ग्रासाच्छादनमात्रं तु दद्यादिति निदर्शनम् । (ब्रह्मचारी द्विजेभ्यश्च दत्त्वा पापात् प्रमुच्यते । ) कुरुनन्दन! जो अकारण ही पिता, माता और गुरुका परित्याग करता है, वह पतित हो जाता है । उसे केवल अन्न और वस्त्र दे और पैतृकसम्पत्तिसे वंचित कर दे । वह ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करते हुए ब्राह्मणोंको दान दे ( और पिता- माता आदिका पूर्ववत् आदर करने लगे ) तो उस पापसे मुक्त हो जाता है, यही धर्मशास्त्रोंका निर्णय है ॥ ६२३ ॥
भार्यायां व्यभिचारिण्यां निरुद्धायां विशेषतः ।
यत् पुंसः परदारेषु तदेनां चारयेद् व्रतम ॥ ६३ ॥
यदि पत्नीने व्यभिचार किया हो और विशेषतः इस कार्यमें पकड़ ली गयी हो तो परायी स्त्रीसे व्यभिचार करनेवाले पुरुषके लिये जो प्रायश्चित्तरूप व्रत बताया गया है, वही उससे भी करावे ॥ ६३ ॥
श्रेयांसं शयनं हित्वा याऽन्यं पापं निगच्छति ।
श्वभिस्तामर्दयेद् राजा संस्थाने बहुविस्तरे ॥ ६४ ॥
जो अपने श्रेष्ठ पतिको छोड़कर अन्य पापीकी शय्यापर जाती है, उस कुलटाको अत्यन्त विस्तृत मैदानमें खड़ी करके राजा कुत्तोंसे नोचवा डाले ॥ ६४ ॥
पुमांसमुन्नयेत् प्राज्ञः शयने तप्त आयसे ।
अप्यादधीत दारूणि तत्र दह्येत पापकृत् ॥ ६५ ॥
एष दण्डो महाराज स्त्रीणां भर्तृष्वतिक्रमात् ।
संवत्सराभिशस्तस्य दुष्टस्य द्विगुणो भवेत् ॥ ६६ ॥
द्वे तस्य त्रीणि वर्षाणि चत्वारि सहसेविनि ।
कुचरः पञ्चवर्षाणि चरेद् भैक्ष्यं मुनिव्रतः ॥ ६७ ॥
इसी तरह व्यभिचारी पुरुषको बुद्धिमान् राजा लोहेकी तपायी हुई खाटपर सुलाकर ऊपरसे लकड़ी रख दे और आग लगा दे, जिससे वह पापी उसीमें जलकर भस्म हो जाय । महाराज! पतिकी अवहेलना करके परपुरुषोंसे व्यभिचार करनेवाली स्त्रियोंके लिये भी यही दण्ड है, उपर्युक्त कहे हुएमें जिन दुष्टोंके लिये प्रायश्चित्त बताया है, उनके लिये यह भी विधान है कि एक वर्षके भीतर प्रायश्चित्त न करनेपर दुष्ट पुरुषको दूना दण्ड प्राप्त होना चाहिये । जो मनुष्य दो, तीन, चार या पाँच वर्षोंतक उस पतित पुरुषके संसर्गमें रहे, वह मुनिजनोचित व्रत धारण करके उतने ही वर्षोंतक पृथ्वीपर घूमता हुआ भिक्षावृत्तिसे जीवन-निर्वाह करे ॥ ६५—६७ ॥
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परिवित्तिः परिवेत्ता या चैव परिविद्यते ।
पाणिग्रहास्त्वधर्मेण सर्वे ते पतिताः स्मृताः ॥ ६८ ॥
ज्येष्ठ भाईका विवाह होनेसे पहले ही यदि छोटा भाई अधर्मपूर्वक विवाह कर ले तो ज्येष्ठको ‘ परिवित्ति ' कहते हैं; छोटे भाईको ' परिवेत्ता' हैं और उसकी पत्नीको जिसका परिवेदन (ग्रहण) किया जाता है, परिवेदनीया कहते हैं- ये सब - के - सब पतित माने गये हैं ॥ ६८ ॥
चरेयुः सर्व एवैते वीरहा यद् व्रतं चरेत् ।
चान्द्रायणं चरेन्मासं कृच्छ्रं वा पापशुद्धये ॥ ६ ९ ॥
इन तीनोंको पृथक् - पृथक् अपनी शुद्धिके लिये उसी व्रतका आचरण करना चाहिये जो यज्ञहीन ब्राह्मणके लिये बताया गया है । अथवा एक मासतक चान्द्रायण या कृच्छ्रचान्द्रायण व्रत करे ॥ ६ ९ ॥ परिवेत्ता प्रयच्छेत तां स्नुषां परिवित्तये ।
ज्येष्ठेन त्वभ्यनुज्ञातो यवीयानप्यनन्तरम् ।
एवं च मोक्षमाप्नोति तौ च सा चैव धर्मतः ॥ ७० ॥
परिवेत्ता पुरुष उस नववधूको पतोहूके रूपमें ज्येष्ठ भाईको सौंप दे और ज्येष्ठ भाईकी आज्ञा मिलनेपर छोटा भाई उसे पत्नीरूपमें ग्रहण करे । ऐसा करनेपर वे तीनों धर्मके अनुसार पापसे छुटकारा पाते हैं ॥ ७० ॥
अमानुषीषु गोवर्ज्यमनावृष्टिर्न दुष्यति ।
अधिष्ठात्रवमन्तारं पशूनां पुरुषं विदुः ॥ ७१ ॥
पशु जातियोंमें गौओंको छोड़कर अन्य किसीकी अनजानमें हिंसा हो जाय तो वह दोषावह नहीं मानी जाती; क्योंकि मनुष्यको पशुओंका अधिष्ठाता एवं पालक माना गया है ॥ ७१ ॥
परिधायोर्ध्ववालं तु पात्रमादाय मृन्मयम् ।
चरेत् सप्तगृहान्नित्यं स्वकर्म परिकीर्तयन् ॥ ७२ ॥
तत्रैव लब्धभोजी स्याद् द्वादशाहात्स शुद्धयति ।
चरेत् संवत्सरं चापि तद् व्रतं येन कृन्तति ॥ ७३ ॥
गोवध करनेवाला पापी उस गायकी पूँछको इस प्रकार धारण करे कि उसका बाल ऊपरकी ओर रहे । फिर मिट्टीका पात्र हाथमें लेकर प्रतिदिन सात घरोंमें भिक्षा माँगे और अपने पापकर्मकी बात कहकर लोगोंको सुनाता रहे । उन्हीं सात घरोंकी भिक्षामें जो अन्न मिल जाय, वही खाकर रहे । ऐसा करनेसे वह बारह दिनोंमें शुद्ध हो जाता है । यदि पाप अधिक हो तो एक वर्षतक उस व्रतका अनुष्ठान करे, जिससे वह अपने पापको नष्ट कर देता है ॥ ७२-७३ ॥ भवेत्तु मानुषेष्वेवं प्रायश्चित्तमनुत्तमम् ।
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दानं वा दानशक्तेषु सर्वमेतत् प्रकल्पयेत् ॥ ७४ ॥
इस प्रकार मनुष्योंके लिये परम उत्तम प्रायश्चित्तका विधान है । उनमें जो दान करनेमें समर्थ हों, उनके लिये दानकी भी विधि है । यह सब प्रायश्चित्त विचारपूर्वक करना चाहिये ॥ ७४ ॥
अनास्तिकेषु गोमात्रं दानमेकं प्रचक्षते ।
श्ववराहमनुष्याणां कुक्कुटस्य खरस्य च ॥ ७५ ॥
मांसं मूत्रं पुरीषं च प्राश्य संस्कारमर्हति । अनास्तिक पुरुषोंके लिये एक गोदानमात्र ही प्रायश्चित्त बतलाया गया है । कुत्ते, सूअर, मनुष्य, मुर्गे और गदहेके मांस और मल- मूत्र खा लेनेपर द्विजका पुनः संस्कार होना चाहिये ॥ ७५ ॥
ब्राह्मणस्तु सुरापस्य गन्धमादाय सोमपः ॥ ७६ ॥
अपस्त्र्यहं पिबेदुष्णं त्र्यहमुष्णं पयः पिबेत् ।
त्र्यहमुष्णं पयः पीत्वा वायुभक्षो भवेत् त्र्यहम् ॥ ७७ ॥
सोमपान करनेवाला ब्राह्मण यदि किसी शराबीकी गन्ध भी सूँघ ले तो वह तीन दिनोंतक गरम जल पीकर रहे, फिर तीन दिन गरम दूध पीये । तीन दिन गरम दूध पीनेके
बाद तीन दिनतक केवल वायु पीकर रहे । इससे वह शुद्ध हो जाता है ॥ ७६-७७ ॥
एवमेतत् समुद्दिष्टं प्रायश्चित्तं सनातनम् ।
ब्राह्मणस्य विशेषण यदज्ञानेन सम्भवेत् ॥ ७८ ॥
इस प्रकार यह सनातन प्रायश्चित्त सबके लिये बताया गया है । ब्राह्मणके लिये इसका विशेषरूपसे विधान है । अनजानमें जो पाप बन जाय, उसीके लिये प्रायश्चित्त है ॥ ७८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि प्रायश्चित्तीये पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें पापोंके प्रायश्चित्तकी विधिविषयक एक सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ७८३ श्लोक हैं ) * जिसने अग्निकी स्थापना नहीं की है, उसे ' अनाहिताग्नि' कहा जाता है । तात्पर्य यह कि उक्त दक्षिणा दिये बिना उसके द्वारा की हुई अग्निस्थापना व्यर्थ हो जाती है ।
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षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः खड्गकी उत्पत्ति और प्राप्तिकी परम्पराकी महिमाका वर्णन वैशम्पायन उवाच
कथान्तरमथासाद्य खड्गयुद्धविशारदः ।
नकुलः शरतल्पस्थमिदमाह पितामहम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! कथाप्रसङ्गकी समाप्तिके समय अवसर पाकर खड्गयुद्धविशारद नकुलने बाणशय्यापर सोये हुए पितामह भीष्मसे इस प्रकार प्रश्न किया ॥ १ ॥
नकुलउवाच
धनुः प्रहरणं श्रेष्ठमतीवात्र पितामह ।
मतस्तु मम धर्मज्ञ खड्ग एव सुसंशितः ॥ २ ॥
नकुल बोले- धर्मज्ञ पितामह! यद्यपि इस जगत्में धनुष अत्यन्त श्रेष्ठ अस्त्र समझा जाता है, तथापि मुझे तो अत्यन्त तीखा खड्ग ही अच्छा जान पड़ता है ॥ २ ॥
विशीर्णे कार्मुके राजन् प्रक्षीणेषु च वाजिषु ।
खड्गेन शक्यते युद्धे साध्वात्मा परिरक्षितुम् ॥ ३ ॥
राजन्! जब धनुष टूट जाय और घोड़े भी नष्ट हो जायँ तब भी युद्धस्थलमें खड्गके द्वारा अपने शरीरकी भलीभाँति रक्षा की जा सकती है ॥ ३ ॥
शरासनधरांश्चैव गदाशक्तिधरांस्तथा ।
एकः खड्गधरो वीरः समर्थः प्रतिबाधितुम् ॥ ४ ॥
एक ही खड्गधारी वीर धनुष, गदा और शक्ति धारण करनेवाले बहुत - से योद्धाओंको बाधा देनेमें समर्थ है ॥ ४ ॥
अत्र मे संशयश्चैव कौतूहलमतीव च ।
किंस्वित् प्रहरणं श्रेष्ठं सर्वयुद्धेषु पार्थिव ॥ ५ ॥
पृथ्वीनाथ! इस विषयमें मेरे मनमें संशय और अत्यन्त कौतूहल भी हो रहा है कि सम्पूर्ण युद्धोंमें कौन - सा आयुध श्रेष्ठ है? ॥ ॥
कथं चोत्पादितः खड्गः कस्मै चार्थाय केन च ।
पूर्वाचार्यं च खड्गस्य प्रब्रूहि प्रपितामह ॥ ६ ॥
पितामह! खड्गकी उत्पत्ति कैसे और किस प्रयोजनके लिये हुई? किसने इसे उत्पन्न किया? खड्गयुद्धका प्रथम आचार्य कौन था? यह सब मुझे बताइये ॥ ६ ॥
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वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा माद्रीपुत्रस्य धीमतः ।
स तु कौशलसंयुक्तं सूक्ष्मचित्रार्थसम्मतम् ॥ ७ ॥
ततस्तस्योत्तरं वाक्यं स्वरवर्णोपपादितम् ।
शिक्षया चोपपन्नाय द्रोणशिष्याय भारत ॥ ८ ॥
उवाच स तु धर्मज्ञो धनुर्वेदस्य पारगः ।
शरतल्पगतो भीष्मो नकुलाय महात्मने ॥ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं- भरतनन्दन! जनमेजय! बुद्धिमान् माद्रीपुत्र नकुलकी वह बात कौशलयुक्त तो थी ही, सूक्ष्म तथा विचित्र अर्थसे भी सम्पन्न थी । उसे सुनकर बाणशय्यापर सोये हुए धनुर्वेदके पारङ्गत विद्वान् धर्मज्ञ भीष्मने शिक्षाप्राप्त महामनस्वी द्रोणशिष्य नकुलको सुन्दर स्वर एवं वर्णोंसे युक्त वाणीमें इस प्रकार उत्तर देना आरम्भ किया ॥ ७- ९ ॥ भीष्म उवाच
तत्त्वं शृणुष्व माद्रेय यदेतत् परिपृच्छसि ।
प्रबोधितोऽस्मि भवता धातुमानिव पर्वतः ॥ १० ॥
भीष्मजीने कहा- माद्रीनन्दन! तुम जो यह प्रश्न कर रहे हो, इसका तत्त्व सुनो । मैं तो खूनसे लथपथ हो गेरूधातुसे रँगे हुए पर्वतके समान पड़ा हुआ था। तुमने यह प्रश्न करके मुझे जगा दिया ॥ १० ॥
सलिलैकार्णवं तात पुरा सर्वमभूदिदम् ।
निष्प्रकम्पमनाकाशमनिर्देश्यमहीतलम् ॥ ११ ॥
तात! पूर्वकालमें यह सम्पूर्ण जगत् जलके एकमात्र महासागरके रूपमें था । उस समय
इसमें कम्पन नहीं था । आकाशका पता नहीं था । भूतलका कहीं नाम भी नहीं था ॥ ११ ॥
तमसाऽऽवृतमस्पर्शमतिगम्भीरदर्शनम् ।
निःशब्दं चाप्रमेयं च तत्र जज्ञे पितामहः ॥ १२ ॥
सब कुछ अन्धकारसे आवृत था । शब्द और स्पर्शका भी अनुभव नहीं होता था । वह एकार्णव देखनेमें बड़ा गम्भीर था । उसकी कहीं सीमा नहीं थी, उसीमें पितामह ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १२ ॥
सोऽसृजद् वातमग्निं च भास्करं चापि वीर्यवान् ।
आकाशमसृजच्चोर्ध्वमधो भूमिं च नैर्ऋतीम् ॥ १३ ॥
उन शक्तिशाली पितामहने वायु, अग्नि और सूर्यकी सृष्टि की । आकाश, ऊपर, नीचे, भूमि तथा राक्षससमूहकी भी रचना की ॥ १३ ॥
नभः सचन्द्रतारं च नक्षत्राणि ग्रहांस्तथा ।
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संवत्सरानृतून् मासान् पक्षानथ लवान् क्षणान् ॥ १४ ॥
चन्द्रमा तथा तारोंसहित आकाश, नक्षत्र, ग्रह, संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, लव और क्षणोंकी सृष्टि भी उन्होंने ही की ॥ १४ ॥
ततः शरीरं लोकस्थं स्थापयित्वा पितामहः ।
जनयामास भगवान् पुत्रानुत्तमतेजसः ॥ १५ ॥
मरीचिमृषिमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।
वसिष्ठाङ्गिरसौ चोभौ रुद्रं च प्रभुमीश्वरम् ॥ १६ ॥
तदनन्तर भगवान् ब्रह्माने लौकिक शरीर धारण करके मुनिवर मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, अङ्गिरा तथा स्वभाव एवं ऐश्वर्यसे सम्पन्न रुद्र– इन तेजस्वी पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ १५-१६ ॥
प्राचेतसस्तथा दक्षः कन्याषष्टिमजीजनत् ।
ता वै ब्रह्मर्षयः सर्वाः प्रजार्थं प्रतिपेदिरे ॥ १७ ॥
प्रचेताओंके पुत्र दक्षने साठ कन्याओंको जन्म दिया। उन सबको प्रजाकी उत्पत्तिके लिये ब्रह्मर्षियोंने पत्नीरूपमें प्राप्त किया ॥ १७ ॥
ताभ्यो विश्वानि भूतानि देवाः पितृगणास्तथा ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव रक्षांसि विविधानि च ॥ १८ ॥
पतत्रिमृगमीनाश्च प्लवङ्गाश्च महोरगाः ।
तथा पक्षिगणाः सर्वे जलस्थलविचारिणः ॥ १ ९ ॥
उद्भिदः स्वेदजाश्चैव साण्डजाश्च जरायुजाः ।
जज्ञे तात जगत् सर्वं तथा स्थावरजङ्गमम् ॥ २० ॥
उन्हीं कन्याओंसे समस्त प्राणी, देवता, पितर, गन्धर्व, अप्सरा, नाना प्रकारके राक्षस, पशु, पक्षी, मत्स्य, वानर, बड़े - बड़े नाग, जल और स्थलमें विचरनेवाले सब प्रकारके पक्षिगण, उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज और जरायुज प्राणी उत्पन्न हुए । तात! इस प्रकार सम्पूर्ण स्थावर- जङ्गम जगत् उत्पन्न हुआ ॥ १८–२० ॥
भूतसर्गमिमं कृत्वा सर्वलोकपितामहः ।
शाश्वतं वेदपठितं धर्मं प्रयुयुजे ततः ॥ २१ ॥
सर्वलोकपितामह ब्रह्माने इन समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करके उनके ऊपर वेदोक्त सनातनधर्मके पालनका भार रखा ॥ २१ ॥
तस्मिन् धर्मे स्थिता देवाः सहाचार्यपुरोहिताः ।
आदित्या वसवो रुद्राः ससाध्या मरुदश्विनः ॥ २२ ॥
आचार्य और पुरोहितगणोंसहित देवता, आदित्य, वसुगण, रुद्रगण, साध्यगण, मरुद्गण तथा अश्विनीकुमार- ये सभी उस सनातन धर्ममें प्रतिष्ठित हुए ॥ २२ ॥
भृग्वत्र्यङ्गिरसः सिद्धाः काश्यपाश्च तपोधनाः ।
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वसिष्ठगौतमागस्त्यास्तथा नारदपर्वतौ ॥ २३ ॥
ऋषयो वालखिल्याश्च प्रभासाः सिकतास्तथा ।
घृतपाः सोमवायव्या वैश्वानरमरीचिपाः ॥ २४ ॥
अकृष्टाश्चैव हंसाश्च ऋषयो वाग्नियोनयः ।
वानप्रस्थाः पृश्नयश्च स्थिता ब्रह्मानुशासने ॥ २५ ॥
भृगु, अत्रि और अङ्गिरा – ये सिद्ध मुनि, तपस्याके धनी काश्यपगण, वसिष्ठ, गौतम, अगस्त्य, देवर्षि नारद, पर्वत, वालखिल्य ऋषि, प्रभास, सिकत, घृतप (घी पीकर रहनेवाले ), सोमप ( सोमपान करनेवाले ), वायव्य ( वायु पीकर रहनेवाले ), मरीचिप ( सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले) और वैश्वानर तथा अकृष्ट ( बिना जोते- बोये उत्पन्न हुए अन्नसे जीविका चलानेवाले ), हंसमुनि ( संन्यासी ), अग्निसे उत्पन्न होनेवाले ऋषिगण, वानप्रस्थ और पृश्निगण — ये सभी महात्मा ब्रह्माजीकी आज्ञाके अधीन रहकर सनातनधर्मका पालन करने लगे ॥ २३-२५ ॥
दानवेन्द्रास्त्वतिक्रम्य तत् पितामहशासनम् ।
धर्मस्यापचयं चक्रुः क्रोधलोभसमन्विताः ॥ २६ ॥
परंतु दानवेश्वरोंने क्रोध और लोभसे युक्त हो ब्रह्माजीकी उस आज्ञाका उल्लंघन करके धर्मको हानि पहुँचाना आरम्भ किया ॥ २६ ॥
हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षो विरोचनः ।
शम्बरो विप्रचित्तिश्च विराधो नमुचिर्बलिः ॥ २७ ॥
एते चान्ये च बहवः सगणा दैत्यदानवाः ।
धर्मसेतुमतिक्रम्य रेमिरेऽधर्मनिश्चयाः ॥ २८ ॥
हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, विरोचन, शम्बर, विप्रचित्ति, विराध, नमुचि और बलि — ये तथा और भी बहुत - से दैत्य और दानव अपने दलके साथ धर्ममर्यादाका उल्लङ्घन करके अधर्म करनेका ही दृढ़ निश्चय लेकर आमोद-प्रमोदमें जीवन व्यतीत करने लगे ॥ २७-२८ ॥
सर्वे तुल्याभिजातीया यथा देवास्तथा वयम् ।
इत्येवं धर्ममास्थाय स्पर्धमानाः सुरर्षिभिः ॥ २ ९ ॥
वे सभी दैत्य कहते थे कि ' हम और देवता एक ही जातिके हैं; अतः जैसे देवता हैं वैसे हम हैं। ' इस प्रकार जातीय धर्मका आश्रय लेकर दैत्यगण देवर्षियोंके साथ स्पर्धा रखने लगे ॥ २ ९ ॥
न प्रियं नाप्यनुक्रोशं चक्रुर्भूतेषु भारत ।
त्रीनुपायानतिक्रम्य दण्डेन रुरुधुः प्रजाः ॥ ३० ॥
भरतनन्दन! वे न तो प्राणियोंका प्रिय करते थे और न उनपर दयाभाव ही रखते थे । वे साम, दाम और भेद-इन तीनों उपायोंको लाँघकर केवल दण्डके द्वारा समस्त प्रजाओंको
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पीड़ा देने लगे ॥ ३० ॥
न जग्मुः संविदं तैश्च दर्पादसुरसत्तमाः ।
अथ वै भगवान् ब्रह्मा ब्रह्मर्षिभिरुपस्थितः ॥ ३१ ॥
तदा हिमवतः शृङ्गे सुरम्ये पद्मतारके ।
शतयोजनविस्तारे मणिरत्नचयाचिते ॥ ३२ ॥
वे असुरश्रेष्ठ घमण्डमें भरकर उन प्रजाओंके साथ बातचीत भी नहीं करते थे । तदनन्तर ब्रह्मर्षियोंसहित भगवान् ब्रह्मा हिमालयके सुरम्य शिखरपर उपस्थित हुए । वह इतना ऊँचा था कि आकाशके तारे उसपर विकसित कमलके समान जान पड़ते थे । उसका विस्तार सौ योजनका था । वह मणियों तथा रत्नसमूहोंसे व्याप्त था ॥ ३१-३२ ॥
तस्मिन् गिरिवरे पुत्र पुष्पितद्रुमकानने ।
तस्थौ स विबुधश्रेष्ठो ब्रह्मा लोकार्थसिद्धये ॥ ३३ ॥
बेटा नकुल! जहाँके वृक्ष और वन फूलोंसे भरे हुए थे, उस श्रेष्ठ पर्वतशिखरपर सुरश्रेष्ठ ब्रह्माजी सम्पूर्ण जगत्का कार्य सिद्ध करनेके लिये ठहर गये ॥ ३३ ॥
ततो वर्षसहस्रान्ते वितानमकरोत् प्रभुः ।
विधिना कल्पदृष्टेन यथावच्चोपपादितम् ॥ ३४ ॥
ऋषिभिर्यज्ञपटुभिर्यथावत् कर्मकर्तृभिः ।
समिद्भिः परिसंकीर्णं दीप्यमानैश्च पावकैः ॥ ३५ ॥
काञ्चनैर्यज्ञभाण्डैश्च भ्राजिष्णुभिरलंकृतम् ।
वृतं देवगणैश्चैव प्रवरैर्यज्ञमण्डलम् ॥ ३६ ॥
तथा ब्रह्मर्षिभिश्चैव सदस्यैरुपशोभितम् । तदनन्तर कई सहस्र वर्ष व्यतीत होनेपर भगवान् ब्रह्माने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार वहाँ एक यज्ञ आरम्भ किया । यज्ञकुशल महर्षियों तथा अन्य कार्यकर्ताओंने यथावत् विधिके अनुसार उस यज्ञका सम्पादन किया । वहाँ यज्ञवेदियोंपर समिधाएँ फैली हुई थीं । जगह-जगह अग्निदेव प्रज्वलित हो रहे थे । चमचमाते हुए सुवर्णनिर्मित यज्ञपात्र यज्ञमण्डपकी शोभा बढ़ाते थे । वह यज्ञमण्डल श्रेष्ठ देवताओं तथा सभासद् बने हुए महर्षियोंसे सुशोभित होता था ॥ ३४-३६३ ॥ तत्र घोरतमं वृत्तमृषीणां मे परिश्रुतम् ॥ ३७ ॥
चन्द्रमा विमलं व्योम यथाभ्युदिततारकम् ।
विकीर्याग्निं तथा भूतमुत्थितं श्रूयते तदा ॥ ३८ ॥
उस समय वहाँ एक अत्यन्त भयंकर घटना घटित हुई, जिसे मैंने ऋषियोंके मुँहसे सुना था । जैसे ताराओंके उगनेपर निर्मल आकाशमें चन्द्रमाका उदय हो, उसी प्रकार उस यज्ञमण्डपमें अग्निको इधर - उधर बिखेरकर एक भयंकर भूत प्रकट हुआ, ऐसा सुना जाता है ॥ ३७-३८ ॥
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नीलोत्पलसवर्णाभं तीक्ष्णदंष्ट्रं कृशोदरम् ।
प्रांशुं सुदुर्धर्षतरं तथैव ह्यमितौजसम् ॥ ३ ९ ॥
उसके शरीरका रंग नीलकमलके समान श्याम था, दाढ़ें अत्यन्त तीखी दिखायी देती थीं; और उसका पेट अत्यन्त कृश था । वह बहुत ऊँचा, परम दुर्धर्ष और अमित तेजस्वी जान पड़ता था ॥ ३ ९ ॥
तस्मिन्नुत्पतमाने च प्रचचाल वसुन्धरा ।
महोर्मिकलितावर्तश्चक्षुभे स महोदधिः ॥ ४० ॥
उसके उत्पन्न होते ही धरती डोलने लगी, समुद्र क्षुब्ध हो उठा और उसमें उत्ताल तरंगोंके साथ भँवरें उठने लगीं ॥
पेतुरुल्का महोत्पाताः शाखाश्च मुमुचुर्द्रुमाः ।
अप्रशान्ता दिशः सर्वाः पवनश्चाशिवो ववौ ॥ ४१ ॥
आकाशसे उल्काएँ गिरने लगीं, बड़े - बड़े उत्पात प्रकट होने लगे, वृक्ष स्वयं ही अपनी शाखाओंको गिराने लगे, सम्पूर्ण दिशाएँ अशान्त हो गयीं और अमङ्गलकारी वायु प्रचण्ड वेगसे बहने लगी ॥ ४१ ॥
मुहुर्मुहुश्च भूतानि प्राव्यथन्त भयात् तथा ।
ततः स तुमुलं दृष्ट्वा तं च भूतमुपस्थितम् ॥ ४२ ॥
महर्षिसुरगन्धर्वानुवाचेदं पितामहः । सभी प्राणी भयके मारे बारंबार व्यथित हो उठते थे । उस भयानक भूतको उपस्थित हुआ देख पितामह ब्रह्माने महर्षियों, देवताओं तथा गन्धर्वोंसे कहा- ॥ ४२ ॥
मयैवं चिन्तितं भूतमसिर्नामैष वीर्यवान् ॥ ४३ ॥
रक्षणार्थाय लोकस्य वधाय च सुरद्विषाम् । ' मैंने ही इस भूतका चिन्तन किया था । यह असि नामधारी प्रबल आयुध है । इसे मैंने सम्पूर्ण जगत्की रक्षा तथा देवद्रोही असुरोंके वधके लिये प्रकट किया है ॥ ४३३ ॥
ततस्तद्रूपमुत्सृज्य बभौ निस्त्रिंश एव सः ॥ ४४ ॥
विमलस्तीक्ष्णधारश्च कालान्तक इवोद्यतः । तत्पश्चात् वह भूत उस रूपको त्यागकर तीस अङ्गुलसे कुछ बड़े खड्गके रूपमें प्रकाशित होने लगा । उसकी धार बड़ी तीखी थी । वह चमचमाता हुआ खड्ग काल और अन्तकके समान उद्यत प्रतीत होता था ॥ ४४ ॥
ततः स शितिकण्ठाय रुद्रायार्षभकेतवे ॥ ४५ ॥
ब्रह्मा ददावसिं तीक्ष्णमधर्मप्रतिवारणम् । इसके बाद ब्रह्माजीने अधर्मका निवारण करनेमें समर्थ वह तीखी तलवार वृषभचिह्नित ध्वजावाले नीलकण्ठ भगवान् रुद्रको दे दी ॥ ४५३ ॥
ततः स भगवान् रुद्रो महर्षिजनसंस्तुतः ॥ ४६ ॥
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प्रगृह्यासिममेयात्मा रूपमन्यच्चकार ह ।
चतुर्बाहुः स्पृशन् मूर्ध्ना भूस्थितोऽपि दिवाकरम् ॥ ४७ ॥
उस समय महर्षिगण रुद्रदेवकी भूरि- भूरि प्रशंसा करने लगे । तब अप्रमेयस्वरूप भगवान् रुद्रने वह तलवार लेकर एक- दूसरा चतुर्भुज रूप धारण किया जो भूतलपर खड़ा होकर भी अपने मस्तकसे सूर्यदेवका स्पर्श कर रहा था ॥ ४६-४७ ॥
ऊर्ध्वदृष्टिर्महालिङ्गो मुखाज्ज्वालाः समुत्सृजन् ।
विकुर्वन् बहुधा वर्णान् नीलपाण्डुरलोहितान् ॥ ४८ ॥
उसकी दृष्टि ऊपरकी ओर थी, वह महान् चिह्न धारण किये हुए था । मुखसे आगकी लपटें छोड़ रहा था और अपने अङ्गोंसे नील, श्वेत तथा लोहित ( लाल ) अनेक प्रकारके रंग प्रकट कर रहा था ॥ ४८ ॥
बिभ्रत्कृष्णाजिनं वासो हेमप्रवरतारकम् ।
नेत्रं चैकं ललाटेन भास्करप्रतिमं वहन् ॥ ४ ९ ॥
शुशुभातेऽतिविमले द्वे नेत्रे कृष्णपिङ्गले । उसने काले मृगचर्मको वस्त्रके रूपमें धारण कर रक्खा था, जिसमें सुवर्णनिर्मित तारे जड़े हुए थे । वह अपने ललाटमें सूर्यके समान एक तेजस्वी नेत्र धारण करता था । उसके सिवा काले और पिङ्गलवर्णके दो अत्यन्त निर्मल नेत्र और शोभा पा रहे थे ॥ ४ ९ ॥ ततो देवो महादेवः शूलपाणिर्भगाक्षिहा ॥ ५० ॥
सम्प्रगृह्य तु निस्त्रिंशं कालाग्निसमवर्चसम् ।
त्रिकूटं चर्म चोद्यम्य सविद्युतमिवाम्बुदम् ।
चचार विविधान् मार्गान् महाबलपराक्रमः ॥ ५१ ॥
विधुन्वन्नसिमाकाशे तथा युद्धचिकीर्षया । तदनन्तर भगदेवताके नेत्रोंका नाश करनेवाले महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न शूलपाणि भगवान् महादेव काल और अग्निके तुल्य तेजस्वी खड्गको तथा बिजलीसहित मेघके समान चमकीली तीन कोनोंवाली ढालको हाथमें लेकर भाँति- भाँतिके मार्गोंसे विचरने लगे; और युद्ध करनेकी इच्छासे वह तलवार आकाशमें घुमाने लगे ॥ ५०-५१ ॥ तस्य नादं विनदतो महाहासं च मुञ्चतः ॥ ५२ ॥
बभौ प्रतिभयं रूपं तदा रुद्रस्य भारत । भरतनन्दन! उस समय जोर- जोरसे गर्जते और महान् अट्टहास करते हुए रुद्रदेवका स्वरूप बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ ५२ ॥
तद्रूपधारिणं रुद्रं रौद्रकर्मचिकीर्षया ॥ ५३ ॥
निशम्य दानवाः सर्वे हृष्टाः समभिदुद्रुवुः । भयानक कर्म करनेकी इच्छासे वैसा ही रूप धारण करनेवाले रुद्रदेवको देखकर समस्त दानव हर्ष और उत्साहमें भरकर उनके ऊपर टूट पड़े ॥ ५३ ॥