05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1091–1100
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1091–1100
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कामो हि विविधाकारः सर्वं कामेन संततम् ॥ ३३ ॥
कामनासे युक्त हुए दूसरे मनुष्य समुद्रमें भी घुस जाते हैं । कामनाके विविध रूप हैं तथा सारा कार्य ही कामनासे व्याप्त है ॥ ३३ ॥
नास्ति नासीन्नाभविष्यद् भूतं कामात्मकात् परम् ।
एतत् सारं महाराज धर्मार्थावत्र संस्थितौ ॥ ३४ ॥
सभी प्राणी कामना रखते हैं । उससे भिन्न कामना -रहित प्राणी न कहीं है, न कभी था और न भविष्यमें होगा ही; अतः यह काम ही त्रिवर्गका सार है । महाराज! धर्म और अर्थ भी इसीमें स्थित हैं ॥ ३४ ॥
नवनीतं यथा दध्नस्तथा कामोऽर्थधर्मतः ।
श्रेयस्तैलं हि पिण्याकाद् घृतं श्रेय उदश्वितः ।
श्रेयः पुष्पफलं काष्ठात् कामो धर्मार्थयोर्वरः ॥ ३५ ॥
जैसे दहीका सार माखन है, उसी प्रकार धर्म और अर्थका सार काम है । जैसे खलीसे श्रेष्ठ तेल है, तक्रसे श्रेष्ठ घी है और वृक्षके काष्ठसे श्रेष्ठ उसका फूल और फल है, उसी प्रकार धर्म और अर्थ दोनोंसे श्रेष्ठ काम है ॥ ३५ ॥
पुष्पतो मध्विव रसः काम आभ्यां तथा स्मृतः ।
कामो धर्मार्थयोर्योनिः कामश्चाथ तदात्मकः ॥ ३६ ॥
जैसे फूलसे उसका मधु - तुल्य रस श्रेष्ठ है, उसी प्रकार धर्म और अर्थसे काम श्रेष्ठ माना गया है । काम धर्म और अर्थका कारण है, अतः वह धर्म और अर्थरूप है ॥ ३६ ॥
नाकामतो ब्राह्मणाः स्वन्नमर्थान् नाकामतो ददति ब्राह्मणेभ्यः । नाकामतो विविधा लोकचेष्टा तस्मात् कामः प्राक् त्रिवर्गस्य दृष्टः ॥ ३७ ॥
बिना किसी कामनाके ब्राह्मण अच्छे अन्नका भी भोजन नहीं करते और बिना कामनाके कोई ब्राह्मणोंको धनका दान नहीं करते हैं । जगत्के प्राणियोंको जो नाना प्रकारकी चेष्टा होती है वह बिना कामनाके नहीं होती; अतः त्रिवर्गमें कामका ही प्रथम एवं प्रधान स्थान देखा गया है ॥ ३७ ॥
सुचारुवेषाभिरलंकृताभि- र्मदोत्कटाभिः प्रियदर्शनाभिः । रमस्व योषाभिरुपेत्य कामं कामो हि राजन् परमो भवेन्नः ॥ ३८ ॥
अतः राजन्! आप कामका अवलम्बन करके सुन्दर वेषवाली, आभूषणोंसे विभूषित तथा देखनेमें मनोहर एवं मदमत्त युवतियोंके साथ विहार कीजिये । हमलोगोंको इस जगत्में कामको ही श्रेष्ठ मानना चाहिये ॥ ३८ ॥
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बुद्धिर्ममैषा परिखास्थितस्य मा भूद् विचारस्तव धर्मपुत्र । स्यात् संहितं सद्भिरफल्गुसारं ममेति वाक्यं परमानृशंसम् ॥ ३ ९ ॥ धर्मपुत्र! मैंने गहराईमें पैठकर ऐसा निश्चय किया है । मेरे इस कथनमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये । मेरा यह वचन उत्तम, कोमल, श्रेष्ठ, तुच्छतारहित एवं सारभूत है; अतः श्रेष्ठ पुरुष भी इसे स्वीकार कर सकते हैं ॥ ३ ९ ॥ धर्मार्थकामाः सममेव सेव्या यो ह्येकभक्तः स नरो जघन्यः । तयोस्तु दाक्ष्यं प्रवदन्ति मध्यं स उत्तमो योऽभिरतस्त्रिवर्गे ॥ ४० । मेरे विचारसे धर्म, अर्थ और काम तीनोंका एक साथ ही सेवन करना चाहिये । जो इनमेंसे एकका ही भक्त है, वह मनुष्य अधम है, जो दोके सेवनमें निपुण है, उसे मध्यम श्रेणीका बताया गया है और जो त्रिवर्गमें समानरूपसे अनुरक्त है, वह मनुष्य उत्तम है ॥ ४० ॥
प्राज्ञः सुहृच्चन्दनसारलिप्तो विचित्रमाल्याभरणैरुपेतः । ततो वचः संग्रहविस्तरेण प्रोक्त्वाथ वीरान् विरराम भीमः ॥ ४१ ॥
बुद्धिमान्, सुहृद्, चन्दनसारसे चर्चित तथा विचित्र मालाओं और आभूषणोंसे विभूषित भीमसेन उन वीर बन्धुओंसे संक्षेप और विस्तारपूर्वक पूर्वोक्त वचन कहकर चुप हो गये ॥ ४१ ॥
ततो मुहूर्तादथ धर्मराजो वाक्यानि तेषामनुचिन्त्य सम्यक् । उवाच वाचावितथं स्मयन् वै लब्धश्रुतां धर्मभृतां वरिष्ठः ॥ ४२ ॥
जिन्होंने महात्माओंके मुखसे धर्मका उपदेश सुना है, उन धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरने दो घड़ीतक पूर्व वक्ताओंके वचनोंपर भलीभाँति विचार करके मुसकराते हुए यह यथार्थ बात कही ॥ ४२ ॥
युधिष्ठिर उवाच निःसंशयं निश्चितधर्मशास्त्राः सर्वे भवन्तो विदितप्रमाणाः ।
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विज्ञातुकामस्य ममेह वाक्य- मुक्तं यद्वै नैष्ठिकं तच्छ्रुतं मे । इदं त्ववश्यं गदतो ममापि वाक्यं निबोधध्वमनन्यभावाः ॥ ४३ ॥
युधिष्ठिर बोले- बन्धुओ! इसमें संदेह नहीं कि आपलोग धर्मशास्त्रोंके सिद्धान्तोंपर विचार करके एक निश्चयपर पहुँच चुके हैं । आपलोगोंको प्रमाणोंका भी ज्ञान प्राप्त है । मैं सबके विचार जानना चाहता था, इसलिये मेरे सामने यहाँ आपलोगोंने जो अपना- अपना निश्चित सिद्धान्त बताया है, वह सब मैंने ध्यानसे सुना है । अब आप, मैं जो कुछ कह रहा हूँ, मेरी उस बातको भी अनन्यचित्त होकर अवश्य सुनिये ॥ ४३ ॥
यो वै न पापे निरतो न पुण्ये नार्थे न धर्मे मनुजो न कामे । विमुक्तदोषः समलोष्टकाञ्चनो विमुच्यते दुःखसुखार्थसिद्धेः ॥ ४४ ॥
जो न पापमें लगा हो और न पुण्यमें, न तो अर्थोपार्जनमें तत्पर हो न धर्ममें, न काममें ही । वह सब प्रकारके दोषोंसे रहित मनुष्य दुःख और सुखको देनेवाली सिद्धियोंसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है, उस समय मिट्टीके ढेले और सोनेमें उसका समान भाव हो जाता ॥ ४४ ॥
भूतानि जातिस्मरणात्मकानि जराविकारैश्च समन्वितानि । भूयश्च तैस्तैः प्रतिबोधितानि मोक्षं प्रशंसन्ति न तं च विद्मः ॥ ४५ ॥
जो पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेवाले तथा वृद्धावस्थाके विकारसे मुक्त हैं, वे मनुष्य नाना प्रकारके सांसारिक दुःखोंके उपभोगसे निरन्तर पीड़ित हो मुक्तिकी ही प्रशंसा करते हैं, परंतु हमलोग उस मोक्षके विषयमें जानते ही नहीं ॥ ४५ ॥
स्नेहेन युक्तस्य न चास्ति मुक्ति- रिति स्वयम्भूर्भगवानुवाच । बुधाश्च निर्वाणपरा भवन्ति तस्मान्न कुर्यात् प्रियमप्रियं च ॥ ४६ ॥
स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माजीका कथन है कि जिसके मनमें आसक्ति है, उसकी कभी मुक्ति नहीं होती । आसक्तिशून्य ज्ञानी मनुष्य ही मोक्षको प्राप्त होते हैं; अतः मुमुक्षु पुरुषको चाहिये कि वह किसीका प्रिय अथवा अप्रिय न करे ॥ ४६ ॥
एतत् प्रधानं च न कामकारो यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि ।
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भूतानि सर्वाणि विधिर्नियुङ्क्ते विधिर्बलीयानिति वित्त सर्वे ॥ ४७ ॥
इस प्रकार विचार करना ही मोक्षका प्रधान उपाय है, स्वेच्छाचार नहीं । विधाताने मुझे जिस कार्यमें लगा दिया है, मैं उसे ही करता हूँ। विधाता सभी प्राणियोंको विभिन्न कार्योंके लिये प्रेरित करता है । अतः आप सब लोगोंको ज्ञात होना चाहिये कि विधाता ही प्रबल ॥ ४७ ॥
न कर्मणाऽऽप्नोत्यनवाप्यमर्थं यद्भावि तद्वै भवतीति वित्त । त्रिवर्गहीनोऽपि हि विन्दतेऽर्थं तस्मादहो लोकहिताय गुह्यम् ॥ ४८ ॥
मनुष्य कर्मद्वारा अप्राप्य अर्थ नहीं पा सकता । जो होनहार है, वही होता है; इस बातको तुम सब लोग जान लो । मनुष्य त्रिवर्गसे रहित होनेपर भी आवश्यक पदार्थको प्राप्त कर लेता है; अतः मोक्षप्राप्तिका गूढ़ उपाय ( ज्ञान ) ही जगत्का वास्तविक कल्याण करनेवाला है ॥ वैशम्पायन उवाच ततस्तदग्र्यं वचनं मनोनुगं समस्तमाज्ञाय ततो हि हेतुमत् । तदा प्रणेदुश्च जहर्षिरे च ते कुरुप्रवीराय च चक्रिरेऽञ्जलिम् ॥ ४ ९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा युधिष्ठिरकी कही हुई बात बड़ी उत्तम, युक्तियुक्त और मनमें बैठनेवाली हुई। उसे पूर्णरूपसे समझकर वे सब भाई बड़े प्रसन्न हो हर्षनाद करने लगे । उन सबने कुरुकुलके प्रमुख वीर युधिष्ठिरको अञ्जलि बाँधकर प्रणाम किया ॥ ४ ९ ॥ सुचारुवर्णाक्षरचारुभूषितां मनोनुगां निर्धुतवाक्यकण्टकाम् । निशम्य तां पार्थिव पार्थभाषितां गिरं नरेन्द्राः प्रशशंसुरेव ते ॥ ५० ॥
जनमेजय! युधिष्ठिरकी उस वाणीमें किसी प्रकारका दोष नहीं था । वह अत्यन्त सुन्दर स्वर और व्यञ्जनके संनिवेशसे विभूषित तथा मनके अनुरूप थी, उसे सुनकर समस्त राजाओंने युधिष्ठिरकी भूरि- भूरि प्रशंसा की ॥ ५० ॥
स चापि तान् धर्मसुतो महामना- स्तदा प्रतीतान् प्रशशंस वीर्यवान् ।
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पुनश्च पप्रच्छ सरिद्वरासुतं ततः परं धर्ममहीनचेतसम् ॥ ५१ ॥
पराक्रमी धर्मपुत्र महामना युधिष्ठिरने भी उन समस्त विश्वासपात्र नरेशों एवं बन्धुजनोंकी प्रशंसा की और पुनः उदारचेता गङ्गानन्दन भीष्मजीके पास आकर उनसे उत्तम धर्मके विषयमें प्रश्न किया ॥ ५१ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि षड्जगीतायां सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमेंषड्जगीताविषयक एक सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६७ ॥
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अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः मित्र बनाने एवं न बनाने योग्य पुरुषोंके लक्षण तथा कृतघ्न गौतमकी कथाका आरम्भ युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ कुरूणां प्रीतिवर्धन ।
प्रश्नं कञ्चित् प्रवक्ष्यामि तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा- कौरवकुलकी प्रीति बढ़ानेवाले महाज्ञानी पितामह! मैं कुछ और
प्रश्न आपके सामने उपस्थित कर रहा हूँ । मेरे उन प्रश्नोंका विवेचन कीजिये ॥ १ ॥
कीदृशा मानवाः सौम्याः कैः प्रीतिः परमा भवेत् ।
आयत्यां च तदात्वे च के क्षमास्तान् वदस्व मे ॥ २ ॥
सौम्य स्वभावके मनुष्य कैसे होते हैं? किनके साथ प्रेम करना उत्तम होता है? वर्तमान और भविष्यमें कौन - से मनुष्य उपकार करनेमें समर्थ होते हैं? उन सबका मुझसे वर्णन कीजिये ॥ २ ॥
न हि तत्र धनं स्फीतं न च सम्बन्धिबान्धवाः ।
तिष्ठन्ति यत्र सुहृदस्तिष्ठन्तीति मतिर्मम ॥ ३ ॥
मेरी तो यह धारणा है कि जिस स्थानपर सुहृद् खड़े होते हैं वहाँ न तो प्रचुर धन काम दे सकता है और न सम्बन्धी तथा बन्धु बान्धव ही ठहर सकते हैं ॥ ३ ॥
दुर्लभो हि सुहृच्छ्रोता दुर्लभश्च हितः सुहृत् ।
एतद् धर्मभृतां श्रेष्ठ सर्वं व्याख्यातुमर्हसि ॥ ४ ॥
हितकी बात सुननेवाला सुहृद् दुर्लभ है तथा हितकारी सुहृद् भी दुर्लभ ही है ।
धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पितामह! इन सब प्रश्नोंका आप विशद विवेचन कीजिये ॥
भीष्म उवाच
संधेयान् पुरुषान् राजन्नसंधेयांश्च तत्त्वतः ।
वदतो मे निबोध त्वं निखिलेन युधिष्ठिर ॥ ५ ॥
भीष्मजीने कहा- राजा युधिष्ठिर! किनके साथ संधि ( मित्रता ) करनी चाहिये और किनके साथ नहीं? यह बात मैं तुम्हें ठीक -ठीक बता रहा हूँ। तुम सब कुछ ध्यान देकर सुनो ॥ ५ ॥
लुब्धः क्रूरस्त्यक्तधर्मा निकृतिः शठ एव च ।
क्षुद्रः पापसमाचारः सर्वशङ्की तथालसः ॥ ६ ॥
दीर्घसूत्रोऽनृजुः क्रुष्टो गुरुदारप्रधर्षकः ।
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व्यसने यः परित्यागी दुरात्मा निरपत्रपः ॥ ७ ॥
सर्वतः पापदर्शी च नास्तिको वेदनिन्दकः ।
सम्प्रकीर्णेन्द्रियो लोके यः कामं निरतश्चरेत् ॥ ८ ॥
असत्यो लोकविद्विष्टः समये चानवस्थितः ।
पिशुनोऽथाकृतप्रज्ञो मत्सरी पापनिश्चयः ॥ ९ ॥
दुःशीलोऽथाकृतात्मा च नृशंसः कितवस्तथा ।
मित्रैरपकृतिर्नित्यमिच्छतेऽर्थं परस्य यः ॥ १० ॥
ददतश्च यथाशक्ति यो न तुष्यति मन्दधीः ।
अधैर्यमपि यो युङ्क्ते सदा मित्रं नरर्षभ ॥ ११ ॥
अस्थानक्रोधनोऽयुक्तो यश्चाकस्माद् विरुध्यते ।
सुहृदश्चैव कल्याणानाशु त्यजति किल्बिषी ॥ १२ ॥
अल्पेऽप्यपकृते मूढस्तथाज्ञानात् कृतेऽपि च ।
कार्यसेवी च मित्रेषु मित्रद्वेषी नराधिप ॥ १३ ॥
शत्रुर्मित्रमुखो यश्च जिह्मप्रेक्षी विलोचनः ।
न विरज्यति कल्याणे यस्त्यजेत् तादृशं नरम् ॥ १४ ॥
पानपो द्वेषणः क्रोधी निर्घृणः परुषस्तथा ।
परोपतापी मित्रध्रुक् तथा प्राणिवधे रतः ॥ १५ ॥
कृतघ्नश्चाधमो लोके न संधेयः कदाचन ।
छिद्रान्वेषी ह्यसंधेयः संधेयानपि मे शृणु ॥ १६ ॥
जो लोभी, क्रूर, धर्मत्यागी, कपटी, शठ, क्षुद्र, पापाचारी, सबपर संदेह करनेवाला, आलसी, दीर्घसूत्री, कुटिल, निन्दित, गुरुपत्नीगामी, संकटके समय साथ छोड़कर चल देनेवाला, दुरात्मा, निर्लज्ज, सब ओर पापपूर्ण दृष्टि डालनेवाला, नास्तिक, वेदोंकी निन्दा करनेवाला, इन्द्रियोंको खुला छोड़कर जगत्में इच्छानुसार विचरनेवाला, झूठा, सबके द्वेषका पात्र, अपनी प्रतिज्ञापर स्थिर न रहनेवाला, चुगलखोर, अपवित्र बुद्धिवाला, ईर्ष्यालु, पापपूर्ण विचार रखनेवाला, दुष्ट स्वभाववाला, मनको वशमें न रखनेवाला, नृशंस, धूर्त, मित्रोंकी बुराई करनेवाला, सदा दूसरोंका धन लेनेकी इच्छा रखनेवाला, यथाशक्ति देनेवालेपर भी संतुष्ट न रहनेवाला, मन्दबुद्धि, मित्रको भी सदा धैर्यसे विचलित करनेवाला, असावधान, बेमौके क्रोध करनेवाला, अकस्मात् विरोधी होकर कल्याणकारी सुहृदोंको भी शीघ्र ही त्याग देनेवाला, अनजानमें थोड़ा-सा भी अपराध बन जानेपर मित्रका अनिष्ट करनेवाला, पापी, अपना काम बनानेके लिये ही मित्रोंसे मेल रखनेवाला, वास्तवमें मित्रद्वेषी, मुखसे मित्रताकी बातें करके भीतरसे शत्रुभाव रखनेवाला, कुटिल दृष्टिसे देखनेवाला, विपरीतदर्शी, भलाईसे कभी पीछे न हटनेवाले मित्रको भी त्याग देनेवाला, शराबी, द्वेषी, क्रोधी, निर्दयी, क्रूर, दूसरोंको सतानेवाला, मित्रद्रोही, प्राणियोंकी हिंसामें
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तत्पर रहनेवाला, कृतघ्न तथा नीच हो, संसारमें ऐसे मनुष्यके साथ कभी संधि नहीं करनी चाहिये । जो दूसरोंका छिद्र खोजता हो, वह भी संधि करनेके योग्य नहीं है । अब संधि करनेके योग्य पुरुषोंको बता रहा हूँ, सुनो ॥ ६-१६ ॥
कुलीना वाक्यसम्पन्ना ज्ञानविज्ञानकोविदाः ।
रूपवन्तो गुणोपेतास्तथाऽलुब्धा जितश्रमाः ॥ १७ ॥
सन्मित्राश्च कृतज्ञाश्च सर्वज्ञा लोभवर्जिताः ।
माधुर्यगुणसम्पन्नाः सत्यसंधा जितेन्द्रियाः ॥ १८ ॥
व्यायामशीला सततं कुलपुत्राः कुलोद्वहाः ।
दोषैः प्रमुक्ताः प्रथितास्ते ग्राह्याः पार्थिवैर्नराः ॥ १ ९ ॥
जो कुलीन, बोलनेमें समर्थ, ज्ञान -विज्ञानमें कुशल, रूपवान्, गुणवान्, लोभहीन, काम करनेसे कभी न थकनेवाले, अच्छे मित्रोंसे सम्पन्न, कृतज्ञ, सर्वज्ञ, लोभसे दूर रहनेवाले, मधुरस्वभाववाले, सत्यप्रतिज्ञ, जितेन्द्रिय, सदा व्यायामशील, उत्तम कुलकी संतान, अपने कुलका भार वहन करनेमें समर्थ, दोषशून्य तथा लोकमें विख्यात हों - ऐसे मनुष्योंको राजा अपना मित्र बनावे ॥ १७-१९ ॥ यथाशक्ति समाचाराः सम्प्रतुष्यन्ति हि प्रभो ।
नास्थाने क्रोधवन्तश्च न चाकस्माद् विरागिणः ।
विरक्ताश्च न दुष्यन्ति मनसाप्यर्थकोविदाः ॥ २० ॥
आत्मानं पीडयित्वापि सुहृत्कार्यपरायणाः ।
विरज्यन्ति न मित्रेभ्यो वासो रक्तमिवाविकम् ॥ २१ ॥
क्रोधाच्च लोभमोहाभ्यां नानर्थे युवतीषु च ।
न दर्शयन्ति सुहृदो विश्वस्ता धर्मवत्सलाः ॥ २२ ॥
लोष्टकाञ्चनतुल्यार्थाः सुहृत्सु दृढबुद्धयः ।
ये चरन्त्यभिमानानि सृष्टार्थमनुषङ्गिणः ॥ २३ ॥
संगृह्णन्तः परिजनं स्वाम्यर्थपरमाः सदा ।
ईदृशैः पुरुषश्रेष्ठैर्यः संधिं कुरुते नृपः ॥ २४ ॥
तस्य विस्तीर्यते राज्यं ज्योत्स्ना ग्रहपतेरिव ।
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प्रभो! जो अपनी शक्तिके अनुसार कर्तव्यका ठीक-ठीक पालन करते और संतुष्ट रहते हैं, जिन्हें बेमौके क्रोध नहीं आता, जो अकस्मात् स्नेहका त्याग नहीं करते, जो उदासीन हो जानेपर भी मनसे कभी बुराई नहीं चाहते, अर्थके तत्त्वको समझते हैं और अपनेको कष्टमें डालकर भी हितैषी पुरुषोंका कार्य सिद्ध करते हैं । जैसे रँगा हुआ ऊनी कपड़ा अपने रंग नहीं छोड़ता, उसी प्रकार जो मित्रकी ओरसे विरक्त नहीं होते हैं, जो क्रोधवश मित्रका अनर्थ करनेमें प्रवृत्त नहीं होते हैं तथा लोभ और मोहके वशीभूत हो मित्रकी युवतियोंपर अपनी आसक्ति नहीं दिखाते, जो मित्रके विश्वासपात्र और धर्मके प्रति अनुरक्त हैं, जिनकी दृष्टिमें मिट्टीका ढेला और सोना दोनों एक- से हैं, जो सदा सुहृदोंके प्रति सुस्थिर बुद्धि रखनेवाले हैं, सबके लिये प्रमाणभूत शास्त्रोंके अनुसार चलते हैं और प्रारब्धवश प्राप्त हुए धनमें ही संतुष्ट रहते हैं, जो कुटुम्बका संग्रह रखते हुए सदा अपने सुहृद् एवं स्वामीके कार्य - साधनमें तत्पर रहते हैं — ऐसे श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ जो राजा संधि ( मेल) करता है, उसका राज्य उसी तरह बढ़ता है, जैसे चन्द्रमाकी चाँदनी ॥ २०-२४३ ॥ शास्त्रनित्या जितक्रोधा बलवन्तो रणे सदा ॥ २५ ॥
जन्मशीलगुणोपेताः संधेयाः पुरुषोत्तमाः । जो प्रतिदिन शास्त्रोंका स्वाध्याय करते हैं, क्रोधको काबूमें रखते हैं और युद्धमें सदा प्रबल रहते हैं । जिनका उत्तम कुलमें जन्म हुआ है, जो शीलवान् और श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष ही मित्र बनानेके योग्य होते हैं ॥ २५३ ॥
ये च दोषसमायुक्ता नराः प्रोक्ता मयानघ ॥ २६ ॥
तेषामप्यधमा राजन् कृतघ्ना मित्रघातकाः ।
त्यक्तव्यास्तु दुराचाराः सर्वेषामिति निश्चयः ॥ २७ ॥
निष्पाप नरेश! मैंने जो दोषयुक्त मनुष्य बताये हैं, उन सबमें अधम होते हैं कृतघ्न । वे मित्रोंकी हत्यातक कर डालते हैं । ऐसे दुराचारी नराधमोंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये । यह सबका निश्चय है ॥ २६-२७ ॥ युधिष्ठिर उवाच
विस्तरेणाथ सम्बन्धं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।
मित्रद्रोही कृतघ्नश्च यः प्रोक्तस्तद् वदस्व मे ॥ २८ ॥
युधिष्ठिरने कहा - पितामह! आपने जिसे मित्रद्रोही और कृतघ्न कहा है, उसका यथार्थ इतिहास क्या है? यह मैं विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ, आप कृपा करके मुझे बताइये ॥ २८ ॥
भीष्म उवाच
हन्त ते वर्तयिष्येऽहमितिहासं पुरातनम् ।
उदीच्यां दिशि यद् वृत्तं म्लेच्छेषु मनुजाधिप ॥ २ ९ ॥
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भीष्मजीने कहा- नरेश्वर! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें एक पुराना इतिहास बता रहा हूँ । यह घटना उत्तरदिशामें म्लेच्छोंके देशमें घटित हुई थी ॥ २ ९ ॥
ब्राह्मणो मध्यदेशीयः कश्चिद् वै ब्रह्मवर्जितः ।
ग्रामं वृद्धियुतं वीक्ष्य प्राविशद् भैक्ष्यकांक्षया ॥ ३० ॥
मध्यदेशका एक ब्राह्मण, जिसने वेद बिलकुल नहीं पढ़ा था, कोई सम्पन्न गाँव देखकर उसमें भीख माँगनेके लिये गया ॥ ३० ॥
तत्र दस्युर्धनयुतः सर्ववर्णविशेषवित् ।
ब्रह्मण्यः सत्यसंधश्च दाने च निरतोऽभवत् ॥ ३१ ॥
उस गाँवमें एक धनी डाकू रहता था, जो समस्त वर्णोंकी विशेषताका जानकार था ।
उसके हृदयमें ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति थी । वह सत्यप्रतिज्ञ और दानी था ॥ ३१ ॥
तस्य क्षयमुपागम्य ततो भिक्षामयाचत ।
प्रतिश्रयं च वासार्थं भिक्षां चैवाथ वार्षिकीम् ॥ ३२ ॥
प्रादात् तस्मै स विप्राय वस्त्रं च सदृशं नवम् ।
नारीं चापि वयोपेतां भर्त्रा विरहितां तथा ॥ ३३ ॥
ब्राह्मणने उसीके घर जाकर भिक्षाके लिये याचना की । दस्युने ब्राह्मणको रहनेके लिये एक घर देकर वर्षभर निर्वाह करनेके योग्य अन्नकी भिक्षाका प्रबन्ध कर दिया, उपयुक्त नया वस्त्र दिया और उसकी सेवामें एक युवती दासी भी दे दी, जो उस समय पतिसे रहित थी ॥ ३२-३३ ॥
एतत् सम्प्राप्य हृष्टात्मा दस्योः सर्वं द्विजस्तथा ।
तस्मिन् गृहवरे राजंस्तया रेमे स गौतमः ॥ ३४ ॥
राजन्! दस्युसे ये सारी वस्तुएँ पाकर ब्राह्मण मन- ही - मन बड़ा प्रसन्न हुआ; और उस सुन्दर गृहमें दासीके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगा ॥ ३४ ॥
कुटुम्बार्थं च दास्याश्च साहाय्यं चाप्यथाकरोत् ।
तत्रावसत् स वषींश्च समृद्धे शबरालये ॥ ३५ ॥
वह दासीके कुटुम्बके लिये कुछ सहायता भी करने लगा । ब्राह्मणने भीलके उस समृद्धिशाली भवनमें अनेक वर्षोंतक निवास किया ॥ ३५ ॥
बाणवेधे परं यत्नमकरोच्चैव गौतमः ।
चक्राङ्गान् स च नित्यं वै सर्वतो वनगोचरान् ॥ ३६ ॥
जघान गौतमो राजन् यथा दस्युगणास्तथा ।
हिंसापटुर्घृणाहीनः सदा प्राणिवधे रतः ॥ ३७ ॥
उसका नाम गौतम था । उसने बाण चलाकर लक्ष्य बेधनेका वहाँ बड़े यत्नके साथ अभ्यास किया । राजन्! गौतम भी दस्युओंकी तरह प्रतिदिन जंगलमें सब ओर घूम-फिरकर