05.Mahabharata Volume 5 — पृष्ठ 1101–1110

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1101–1110

पृष्ठ 1101

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हंसोंका शिकार करने लगा। वह हिंसामें बड़ा प्रवीण था । उसमें दया नहीं थी । वह सदा प्राणियोंको मारनेकी ही ताकमें लगा रहता था ॥ ३६-३७ ॥

गौतमः संनिकर्षेण दस्युभिः समतामियात् ।

तथा तु वसतस्तस्य दस्युग्रामे सुखं तदा ॥ ३८ ॥

अगमन् बहवो मासा निघ्नतः पक्षिणो बहून् । डाकुओंके सम्पर्कमें रहनेसे गौतम भी उनके ही समान पूरा डाकू बन गया । डाकुओंके गाँवमें सुखपूर्वक रहकर प्रतिदिन बहुत -से पक्षियोंका शिकार करते हुए उसके कई महीने बीत गये ॥ ३८३ ॥

ततः कदाचिदपरो द्विजस्तं देशमागतः ॥ ३ ९ ॥

जटाचीराजिनधरः स्वाध्यायपरमः शुचिः ।

विनीतो नियताहारो ब्रह्मण्यो वेदपारगः ॥ ४० ॥

तदनन्तर एक दिन कोई दूसरा ब्राह्मण उस गाँवमें आया जो जटा, वल्कल और मृगचर्म धारण किये हुए था । वह स्वाध्यायपरायण, पवित्र, विनयी, नियमके अनुकूल भोजन करनेवाला, ब्राह्मणभक्त तथा वेदोंका पारङ्गत विद्वान् था ॥ ३ ९ -४० ॥

स ब्रह्मचारी तद्देश्यः सखा तस्यैव सुप्रियः ।

तं दस्युग्राममगमद् यत्रासौ गौतमोऽवसत् ॥ ४१ ॥

वह ब्रह्मचारी ब्राह्मण गौतमके ही गाँवका निवासी तथा उसका परमप्रिय मित्र था और घूमता हुआ डाकुओंके उसी गाँवमें जा पहुँचा था, जहाँ गौतम निवास करता था ॥ ४१ ॥

स तु विप्रगृहान्वेषी शूद्रान्नपरिवर्जकः ।

ग्रामे दस्युसमाकीर्णे व्यचरत् सर्वतोदिशम् ॥ ४२ ॥

वह शूद्रका अन्न नहीं खाता था; इसलिये दस्युओंसे भरे हुए उस गाँवमें ब्राह्मणके घरकी तलाश करता हुआ सब ओर घूमने लगा ॥ ४२ ॥

ततः स गौतमगृहं प्रविवेश द्विजोत्तमः ।

गौतमश्चापि सम्प्राप्तस्तावन्योन्येन संगतौ ॥ ४३ ॥

घूमता-घामता वह श्रेष्ठ ब्राह्मण गौतमके घरपर गया, इतनेहीमें गौतम भी शिकारसे

लौटकर वहाँ आ पहुँचा । उन दोनोंकी एक- दूसरेसे भेंट हुई ॥ ४३ ॥

चक्राङ्गभारस्कन्धं तं धनुष्पाणिं धृतायुधम् ।

रुधिरेणावसिक्ताङ्गं गृहद्वारमुपागतम् ॥ ४४ ॥

तं दृष्ट्वा पुरुषादाभमपध्वस्तं क्षयागतम् ।

अभिज्ञाय द्विजो व्रीडन्निदं वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ४५ ॥

ब्राह्मणने देखा, गौतमके कंधेपर मारे गये हंसकी लाश है, हाथमें धनुष और बाण है, सारा शरीर रक्तसे सींच उठा है, घरके दरवाजेपर आया हुआ गौतम नरभक्षी राक्षसके समान जान पड़ता है; और ब्राह्मणत्वसे भ्रष्ट हो चुका है । उसे इस अवस्थामें घरपर आया

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देख ब्राह्मणने पहचान लिया । पहचानकर वे बड़े लज्जित हुए और उससे इस प्रकार बोले ॥ ४४-४५ ॥

किमिदं कुरुषे मोहाद् विप्रस्त्वं हि कुलोद्वहः ।

मध्यदेशपरिज्ञातो दस्युभावं गतः कथम् ॥ ४६ ॥

‘ अरे! तू मोहवश यह क्या कर रहा है? तू तो मध्यदेशका विख्यात एवं कुलीन ब्राह्मण था । यहाँ डाकू कैसे बन गया? ॥ ४६ ॥

पूर्वान् स्मर द्विज ज्ञातीन् प्रख्यातान् वेदपारगान् ।

तेषां वंशेऽभिजातस्त्वमीदृशः कुलपांसनः ॥ ४७ ॥

‘ब्रह्मन्! अपने पूर्वजोंको तो याद कर । उनकी कितनी ख्याति थी । वे कैसे वेदोंके पारङ्गत विद्वान् थे और तू उन्हींके वंशमें पैदा होकर ऐसा कुलकलङ्क निकला ॥ ४७ ॥

अवबुध्यात्मनाऽऽत्मानं सत्त्वं शीलं श्रुतं दमम् ।

अनुक्रोशं च संस्मृत्य त्यज वासमिमं द्विज ॥ ४८ ॥

' अब भी तो अपने -आपको पहचान! तू द्विज है; अतः द्विजोचित सत्त्व, शील, शास्त्रज्ञान, संयम और दयाभावको याद करके अपने इस निवासस्थानको त्याग दे' ॥ ४८ ॥

स एवमुक्तः सुहृदा तेन तत्र हितैषिणा ।

प्रत्युवाच ततो राजन् विनिश्चित्य तदार्तवत् ॥ ४ ९ ॥

राजन्! अपने उस हितैषी सुहृद्के इस प्रकार कहनेपर गौतम मन- ही- मन कुछ निश्चय करके आर्त - सा होकर बोला-— ॥ ४ ९ ॥

निर्धनोऽस्मि द्विजश्रेष्ठ नापि वेदविदप्यहम् ।

वित्तार्थमिह सम्प्राप्तं विद्धि मां द्विजसत्तम ॥ ५० ॥

'द्विजश्रेष्ठ! मैं निर्धन हूँ और वेदको भी नहीं जानता; अतः द्विजप्रवर! मुझे धन कमानेके लिये इधर आया हुआ समझें ॥ ५० ॥

त्वद्दर्शनात् तु विप्रेन्द्र कृतार्थोऽस्म्यद्य वै द्विज ।

आवां हि सह यास्यावः श्वो वसस्वाद्य शर्वरीम् ॥ ५१ ॥

‘ विप्रेन्द्र! आज आपके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया । ब्रह्मन्! अब रातभर यहीं रहिये, कल सबेरे हम दोनों साथ ही चलेंगे ' ॥ ५१ ॥

स तत्र न्यवसद् विप्रो घृणी किञ्चिदसंस्पृशन् ।

क्षुधितश्छन्द्यमानोऽपि भोजनं नाभ्यनन्दत ॥ ५२ ॥

वह ब्राह्मण दयालु था । गौतमके अनुरोधसे उसके यहाँ ठहर गया, किंतु वहाँकी किसी भी वस्तुको हाथसे छूआ भी नहीं । यद्यपि वह भूखा था और भोजन करनेके लिये गौतमद्वारा उससे बड़ी अनुनय - विनय की गई तो भी किसी तरह वहाँका अन्न ग्रहण करना उसने स्वीकार नहीं किया ॥ ५२ ॥

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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६८ ॥

पृष्ठ 1104

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एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः गौतमका समुद्रकी ओर प्रस्थान और संध्याके समय एक दिव्य बकपक्षीके घरपर अतिथि होना भीष्म उवाच

तस्यां निशायां व्युष्टायां गते तस्मिन् द्विजोत्तमे ।

निष्क्रम्य गौतमोऽगच्छत् समुद्रं प्रति भारत ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं — भारत! जब रात बीती, सबेरा हुआ और वह श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँसे चला गया, तब गौतम भी घर छोड़कर समुद्रकी ओर चल दिया ॥ १ ॥

सामुद्रिकान् स वणिजस्ततोऽपश्यत् स्थितान् पथि ।

स तेन सह सार्थेन प्रययौ सागरं प्रति ॥ २ ॥

रास्तेमें उसने देखा कि समुद्रके आस- पास रहनेवाले कुछ व्यापारी वैश्य ठहरे हुए हैं । वह उन्हींके दलके साथ हो लिया और समुद्रकी ओर जाने लगा ॥ २ ॥

स तु सार्थो महान् राजन् कस्मिंश्चिद् गिरिगह्वरे ।

मत्तेन द्विरदेनाथ निहतः प्रायशोऽभवत् ॥ ३ ॥

राजन्! वैश्योंका वह महान् दल किसी पर्वतकी गुफामें डेरा डाले हुए था । इतनेहीमें एक मतवाले हाथीने उसपर आक्रमण कर दिया । उस दलके अधिकांश मनुष्य उसके द्वारा मारे गये ॥ ३ ॥

स कथंचिद् भयात् तस्माद् विमुक्तो ब्राह्मणस्तथा ।

कांदिग्भूतो जीवितार्थी प्रदुद्रावोत्तरां दिशम् ॥ ४ ॥

गौतम ब्राह्मण किसी तरह उस भयसे छूट तो गया; परंतु उस घबराहटमें वह यह निर्णय न कर सका कि मुझे किस दिशामें जाना है? अपने प्राण बचानेके लिये वह उत्तर दिशाकी ओर भाग चला ॥ ४ ॥

स तु सार्थपरिभ्रष्टस्तस्माद् देशात् तथा च्युतः ।

एकाकी व्यचरत् तत्र वने किंपुरुषो यथा ॥ ५ ॥

व्यापारियोंके दलका साथ छूट गया, अतः उस देशसे भी भ्रष्ट होकर वह अकेला ही उस वनमें विचरने लगा; मानो कोई किंपुरुष घूम रहा हो ॥ ५ ॥

स पन्थानमथासाद्य समुद्राभिसरं तदा ।

आससाद वनं रम्यं दिव्यं पुष्पितपादपम् ॥ ६ ॥

उस समय समुद्रकी ओर जानेवाला एक मार्ग उसे मिल गया और उसीको पकड़कर वह दिव्य एवं रमणीय वनमें जा पहुँचा । वहाँके सभी वृक्ष सुन्दर फूलोंसे सुशोभित

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थे ॥ ६ ॥

सर्वर्तुकैराम्रवणैः पुष्पितैरुपशोभितम् ।

नन्दनोद्देशसदृशं यक्षकिन्नरसेवितम् ॥ ७ ॥

सभी ऋतुओंमें फूलने - फलनेवाली आम्रवृक्षोंकी पंक्तियाँ उस वनकी शोभा बढ़ा रही थीं । यक्षों और किन्नरोंसे सेवित वह प्रदेश नन्दनवनके समान मनोरम जान पड़ता था ॥ ७ ॥

शालैस्तालैस्तमालैश्च कालागुरुवनैस्तथा ।

चन्दनस्य च मुख्यस्य पादपैरुपशोभितम् ।

गिरिप्रस्थेषु रम्येषु तेषु तेषु सुगन्धिषु ॥ ८ ॥

समन्ततो द्विजश्रेष्ठास्तत्राकूजन्त वै तदा । शाल, ताल, तमाल, काले अगुरुके वन तथा श्रेष्ठ चन्दनके वृक्ष उस वनको सुशोभित करते थे । वहाँके रमणीय और सुगन्धित पर्वतीय समतल प्रदेशोंमें चारों ओर उत्तमोत्तम पक्षी कलरव कर रहे थे ॥ ८३ ॥

मनुष्यवदनाश्चान्ये भारुण्डा इति विश्रुताः ॥ ९ ॥

भूलिङ्गशकुनाश्चान्ये सामुद्राः पर्वतोद्भवाः । कहीं मनुष्योंके समान मुखवाले ' भारुण्ड ' नामक पक्षी बोलते थे । कहीं समुद्रतट और पर्वतोंपर रहनेवाले भूलिङ्ग पक्षी तथा अन्य विहंगम चहचहा रहे थे ॥ ९ ३ ॥ स तान्यतिमनोज्ञानि विहगानां रुतानि वै ॥ १० ॥

शृण्वन् सुरमणीयानि विप्रोऽगच्छत गौतमः । पक्षियोंके उन मधुर मनोहर एवं रमणीय कलरवोंको सुनता हुआ गौतम ब्राह्मण आगे बढ़ता चला गया ॥ १० ॥

ततोऽपश्यत् सुरम्येषु सुवर्णसिकताचिते ॥ ११ ॥

देशे समे सुखे चित्रे स्वर्गोद्देशसमे नृप ।

श्रिया जुष्टं महावृक्षं न्यग्रोधं च सुमण्डलम् ॥ १२ ॥

शाखाभिरनुरूपाभिर्भूयिष्ठं क्षत्रसंनिभम् ।

तस्य मूलं च संसिक्तं वरचन्दनवारिणा ॥ १३ ॥

नरेश्वर! तदनन्तर उन रमणीय प्रदेशोंमेंसे एक ऐसे स्थानपर जो सुवर्णमयी बालुकाराशिसे व्याप्त, समतल, सुखद, विचित्र तथा स्वर्गीय भूमिके समान मनोहर था, गौतमने एक अत्यन्त शोभायमान बरगदका विशाल वृक्ष देखा, जो चारों ओर मण्डलाकार फैला हुआ था । अपनी बहुत-सी सुन्दर शाखाओंके कारण वह वृक्ष एक महान् छत्रके समान जान पड़ता था । उसकी जड़ चन्दनमिश्रित जलसे सींची गयी थी ॥ ११-१३ ॥

दिव्यपुष्पान्वितं श्रीमत् पितामहसभोपमम् ।

तं दृष्ट्वा गौतमः प्रीतो मनः कान्तमनुत्तमम् ॥ १४ ॥

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ब्रह्माजीकी सभाके समान शोभा पानेवाला वह वृक्ष दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित था । उस परम उत्तम मनोरम वटवृक्षको देखकर गौतमको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १४ ॥

मेध्यं सुरगृहप्रख्यं पुष्पितैः पादपैर्वृतम् ।

तमासाद्य मुदा युक्तस्तस्याधस्तादुपाविशत् ॥ १५ ॥

वह पवित्र, देवगृहके समान सुन्दर और खिले हुए वृक्षोंसे घिरा हुआ था । उस वृक्षके पास जाकर वह बड़े हर्षके साथ उसके नीचे छायामें बैठा ॥ १५ ॥

तत्रासीनस्य कौन्तेय गौतमस्य सुखः शिवः ।

पुष्पाणि समुपस्पृश्य प्रववावनिलः शुभः ।

ह्लादयन् सर्वगात्राणि गौतमस्य तदा नृप ॥ १६ ॥

कुन्तीनन्दन! गौतमके वहाँ बैठते ही फूलोंका स्पर्श करके सुन्दर- मन्द -सुगन्ध वायु चलने लगी, जो बड़ी ही सुखद और कल्याणप्रद जान पड़ती थी। नरेश्वर! वह गौतमके सम्पूर्ण अङ्गोंको आह्लाद प्रदान कर रही थी ॥ १६ ॥

स तु विप्रः प्रशान्तश्च स्पृष्टः पुण्येन वायुना ।

सुखमासाद्य सुष्वाप भास्करश्चास्तमभ्ययात् ॥ १७ ॥

उस पवित्र वायुका स्पर्श पाकर गौतमको बड़ी शान्ति मिली । वह सुखका अनुभव

करता हुआ वहीं लेट गया । उधर सूर्य भी डूब गया ॥ १७ ॥

ततोऽस्तं भास्करे याते संध्याकाल उपस्थिते ।

आजगाम स्वभवनं ब्रह्मलोकात् खगोत्तमः ॥ १८ ॥

तदनन्तर, सूर्यके अस्ताचलको चले जानेके पश्चात् संध्याकाल उपस्थित होनेपर

ब्रह्मलोकसे वहाँ एक श्रेष्ठ पक्षी आया। वह वृक्ष ही उसका घर या वासस्थान था ॥ १८ ॥

नाडीजङ्घ इति ख्यातो दयितो ब्रह्मणः सखा ।

बकराजो महाप्राज्ञः कश्यपस्यात्मसम्भवः ॥ १ ९ ॥

वह महर्षि कश्यपका पुत्र और ब्रह्माजीका प्रिय सखा था । उसका नाम था नाडीजङ्ग ।

वह बगुलोंका राजा और महाबुद्धिमान् था ॥ १ ९ ॥

राजधर्मेति विख्यातो बभूवाप्रतिमो भुवि ।

देवकन्यासुतः श्रीमान् विद्वान् देवसमप्रभः ॥ २० ॥

वह अनुपम पक्षी इस भूतलपर राजधर्माके नामसे विख्यात था । देवकन्यासे उत्पन्न होनेके कारण उसके शरीरकी कान्ति देवताके समान थी। वह बड़ा विद्वान् था और दिव्य तेजसे सम्पन्न दिखायी देता था ॥ २० ॥

मृष्टाभरणसम्पन्नो भूषणैरर्कसंनिभैः ।

भूषितः सर्वगात्रेषु देवगर्भः श्रिया ज्वलन् ॥ २१ ॥

उसके अङ्गोंमें सूर्यदेवकी किरणोंके समान चमकीले आभूषण शोभा देते थे । वह देवकुमार अपने सभी अङ्गोंमें विशुद्ध एवं दिव्य आभरणोंसे विभूषित हो दिव्य दीप्तिसे

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देदीप्यमान होता था ॥ २१ ॥

तमागतं खगं दृष्ट्वा गौतमो विस्मितोऽभवत् ।

क्षुत्पिपासापरिश्रान्तो हिंसार्थी चाभ्यवैक्षत ॥ २२ ॥

उस पक्षीको आया देख गौतम आश्चर्यसे चकित हो उठा । उस समय वह भूखा- प्यासा तो था ही, रास्ता चलनेकी थकावटसे भी चूर- चूर हो रहा था । अतः राजधर्माको मार डालनेकी इच्छासे उसकी ओर देखा ॥ २२ ॥

राजधर्मोवाच

स्वागतं भवतो विप्र दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मे गृहम् ।

अस्तं च सविता यातः संध्येयं समुपस्थिता ॥ २३ ॥

राजधर्मा ( पास आकर ) बोला - विप्रवर! आपका स्वागत है । यह मेरा घर है । आप यहाँ पधारे, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है । सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये । यह संध्याकाल उपस्थित है ॥ २३ ॥

मम त्वं निलयं प्राप्तः प्रियातिथिरनिन्दितः ।

पूजितो यास्यसि प्रातर्विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ २४ ॥

आप मेरे घर आये हुए प्रिय एवं उत्तम अतिथि हैं । मैं शास्त्रीय विधिके अनुसार आज आपकी पूजा करूँगा । रातमें मेरा आतिथ्य स्वीकार करके कल प्रातःकाल यहाँसे जाइयेगा ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कृतघ्नोपाख्याने एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमेंकृतघ्नका उपाख्यानविषयक एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६९ ॥

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सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः गौतमका राजधर्माद्वारा आतिथ्यसत्कार और उसका राक्षसराज विरूपाक्षके भवनमें प्रवेश भीष्म उवाच

गिरं तां मधुरां श्रुत्वा गौतमो विस्मितस्तदा ।

कौतूहलान्वितो राजन् राजधर्माणमैक्षत ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! पक्षीकी वह मधुर वाणी सुनकर गौतमको बड़ा आश्चर्य हुआ । वह कौतूहलपूर्ण दृष्टिसे राजधर्माकी ओर देखने लगा ॥ १ ॥

राजधर्मोवाच भोः कश्यपस्य पुत्रोऽहं माता दाक्षायणी च मे I अतिथिस्त्वं गुणोपेतः स्वागतं ते द्विजोत्तम ॥ २ ॥

राजधर्मा बोला — द्विजश्रेष्ठ! मैं महर्षि कश्यपका पुत्र हूँ । मेरी माता दक्ष प्रजापतिकी कन्या हैं । आप गुणवान् अतिथि हैं, मैं आपका स्वागत करता हूँ ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

तस्मै दत्त्वा स सत्कारं विधिदृष्टेन कर्मणा ।

शालपुष्पमयीं दिव्यां बृसीं वै समकल्पयत् ॥ ३ ॥

भीष्मजी कहते हैं — युधिष्ठिर! ऐसा कहकर राजधर्माने शास्त्रीय विधिके अनुसार गौतमका सत्कार किया । शालके फूलोंका आसन बनाकर उसे बैठनेके लिये दिया ॥ ३ ॥

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भगीरथरथाक्रान्तदेशान् गङ्गानिषेवितान् ।

ये चरन्ति महामीनास्तांश्च तस्यान्वकल्पयत् ॥ ४ ॥

राजा भगीरथके रथसे आक्रान्त हुए जिन भूभागोंमें श्रीगङ्गाजी प्रवाहित होती हैं, वहाँ गङ्गाजीके जलमें जो बड़े -बड़े मत्स्य विचरते हैं, उन्हींमेंसे कुछ मत्स्योंको लाकर राजधर्माने गौतमके लिये भोजनकी व्यवस्था की ॥ ४ ॥

वह्निं चापि सुसंदीप्तं मीनांश्चापि सुपीवरान् ।

गौतमायातिथये न्यवेदयत काश्यपिः ॥ ५ ॥

कश्यपके उस पुत्रने अग्नि प्रज्वलित कर दी और मोटे - मोटे मत्स्य लाकर अपने अतिथि गौतमको अर्पित कर दिये ॥ ५ ॥

भुक्तवन्तं च तं विप्रं प्रीतात्मानं महातपाः ।

क्लमापनयनार्थं स पक्षाभ्यामभ्यवीजयत् ॥ ६ ॥

वह ब्राह्मण उन मत्स्योंको पकाकर जब खा चुका और उसकी अन्तरात्मा तृप्त हो गयी, तब वह महातपस्वी पक्षी उसकी थकावट दूर करनेके लिये अपने पंखोंसे हवा करने लगा ॥ ६ ॥

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ततो विश्रान्तमासीनं गोत्रप्रश्नमपृच्छत ।

सोऽब्रवीद् गौतमोऽस्मीति ब्रह्म नान्यदुदाहरत् ॥ ७ ॥

विश्रामके पश्चात् जब वह बैठा, तब राजधर्माने उससे गोत्र पूछा । गौतमने कहा — ' मेरा नाम गौतम है और मैं जातिसे ब्राह्मण हूँ। '. इससे अधिक कोई बात वह बता न सका ॥ ७ ॥

तस्मै पर्णमयं दिव्यं दिव्यपुष्पाधिवासितम् ।

गन्धाढ्यं शयनं प्रादात् स शिश्ये तत्र वै सुखम् ॥ ८ ॥

तब पक्षीने उसके लिये पत्तोंका दिव्य बिछावन तैयार किया, जो फूलोंसे अधिवासित होनेके कारण सुगन्धसे मँह- मँह महक रहा था । वह बिछावन उसे दिया और गौतम उसपर सुखपूर्वक सोया ॥ ८ ॥

अथोपविष्टं शयने गौतमं धर्मराट् तदा ।

पप्रच्छ काश्यपो वाग्मी किमागमनकारणम् ॥ ९ ॥

धर्मराज! जब गौतम उस बिछौनेपर बैठा तब बात -चीतमें कुशल कश्यपकुमारने पूछा —‘ब्रह्मन्! आप इधर किसलिये आये हैं? ॥ ९ ॥

ततोऽब्रवीद् गौतमस्तं दरिद्रोऽहं महामते ।

समुद्रगमनाकांक्षी द्रव्यार्थमिति भारत ॥ १० ॥

भारत! तब गौतमने उससे कहा - ' महामते! मैं दरिद्र हूँ और धनके लिये समुद्रतटपर जानेकी इच्छा लेकर घरसे चला हूँ ' ॥ १० ॥

तं काश्यपोऽब्रवीत् प्रीतो नोत्कण्ठां कर्तुमर्हसि ।

कृतकार्यो द्विजश्रेष्ठ सद्रव्यो यास्यसे गृहान् ॥ ११ ॥

यह सुनकर राजधर्माने प्रसन्न होकर कहा– 'द्विजश्रेष्ठ! अब आप वहाँतक जानेके लिये उत्सुक न हों, यहीं आपका काम हो जायगा । आप यहींसे धन लेकर अपने घरको जाइयेगा ॥ ११ ॥

चतुर्विधा ह्यर्थसिद्धिर्बृहस्पतिमतं यथा ।

पारम्पर्यं तथा दैवं काम्यं मैत्रमिति प्रभो ॥ १२ ॥

'प्रभो! बृहस्पतिजीके मतके अनुसार अर्थकी सिद्धि चार प्रकारसे होती है— वंशपरम्परासे, प्रारब्धकी अनुकूलतासे, धनके लिये किये गये सकामकर्मसे और मित्रके सहयोगसे ॥ १२ ॥

प्रादुर्भूतोऽस्मि ते मित्रं सुहृत्त्वं च मम त्वयि ।

सोऽहं तथा यतिष्यामि भविष्यसि यथार्थवान् ॥ १३ ॥

‘ मैं आपका मित्र हो गया हूँ, आपके प्रति मेरा सौहार्द बढ़ गया है; अतः मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा जिससे आपको अर्थकी प्राप्ति हो जायगी ' ॥ १३ ॥

ततः प्रभातसमये सुखं दृष्ट्वाब्रवीदिदम् ।